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मंथन क्रमाँक-117 ’’भारतीय राजनीति मे अच्छे लोग’’–बजरंग मुनि
समाज मे अच्छे शब्द की जो परिभाषा प्रचलित है उस परिभाषा मे भी राजनीति को कोई अच्छा स्थान प्राप्त नही हैं। राजनीति कभी भी न समाज सेवा का सर्वश्रेष्ठ आधार बनी न ही व्यवस्था परिर्वतन का। इसलिये ...
मंथन क्रमांकः116 “#मानवाधिकार”–बजरंग मुनि
1. व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है 1. प्राकृतिक अथवा मौलिक 2. संवैधानिक 3. सामाजिक। मौलिक अधिकारो को ही प्राकृतिक अथवा मानवाधिकार भी कहा जा सकता है; 2. मानवाधिकार सृष्टि के प्रारम्भ से लेक...
मंथन क्रमाँक-115 ’’ज्ञान, बुद्धि, श्रम और शिक्षा’’–बजरंग मुनि
1. ज्ञान और शिक्षा अलग-अलग होते है। ज्ञान स्वयं का अनुभवजन्य निष्कर्ष होता है तो शिक्षा किसी अन्य द्वारा प्राप्त होती है; 2. ज्ञान निरंतर घट रहा है और शिक्षा लगातार बढ रही है। स्वतंत्रता के बाद भ...
मंथन क्रमांक-114 ’’ईश्वर का अस्तित्व’’–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है- 1. ईश्वर है, किन्तु यदि नहीं भी हो तो एक ईश्वर मान लेना चाहिए; 2. ईश्वर और भगवान अलग-अलग होते है। धर्म दोनों को अलग-अलग मानता है और सम्प्रदाय एक कर देता है; 3. ईश्वर एक अदृश्य शक्ति के...
मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...
मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः 1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ; 2. धर्म शब्द के अनेक अ...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...

मंथन क्रमाँक-117 ’’भारतीय राजनीति मे अच्छे लोग’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 3, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

समाज मे अच्छे शब्द की जो परिभाषा प्रचलित है उस परिभाषा मे भी राजनीति को कोई अच्छा स्थान प्राप्त नही हैं। राजनीति कभी भी न समाज सेवा का सर्वश्रेष्ठ आधार बनी न ही व्यवस्था परिर्वतन का। इसलिये राजनीति का नाम आते ही बहुत से अच्छे लोग उसके प्रति नफरत का भाव दिखाना शुरू कर देते है। किन्तु राजनीति समाज व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग होने से हम उस प्रक्रिया से बिल्कुल अलग नही हो सकते क्योकि हम चाहे राजनीति से कितनी भी दूरी क्यो न बना लें किन्तु उसका तो हमारे जन जीवन पर प्रभाव पडना ही है। शौच कर्म और शौचालय से हम चाहे कितनी भी घृणा क्यो न करते हों किन्तु वह हमारे जीवन प्रणाली का अभिन्न अंग होने से उसकी चिन्ता और व्यवस्था तो हमें करनी ही होगी।

राजनीति मे अच्छे शब्द की परिभाषा देशकाल परिस्थिति अनुसार बदलती रहती है। स्वतंत्रता के पूर्व राजनीति मे अच्छे लोग की परिभाषा यह थी कि वह व्यक्ति स्वतंत्रता संघर्ष के लिये किस सीमा तक संघर्ष और त्याग करता है। उस समय लाभ या भोग की तो कोई कल्पना ही नही थी। स्वतंत्रता के बाद यह परिभाषा बदली ओैर अच्छे लोग वे कहे जाने लगे जो अपने अपने परिवार के या अपने संगठन के लिये आर्थिक लाभ उठाने से दूर रहकर अन्य सम्मान या सुविधाएॅ लेते रहे । वर्तमान समय मे राजनीति मे अच्छे शब्द की परिभाषा और संकुचित होकर सिर्फ अपने या परिवार के आर्थिक लाभ से दूरी तक आकर सिमट गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति अपने संगठन, दल, जाति या धर्म के लाभ तक ही सीमित रहकर स्वय अपने या परिवार के लिये आर्थिक लाभ से बच जाता है तो वह अच्छा आदमी है। अब तो धीरे-धीरे यह परिभाषा भी और संकुचित होने की स्थिति में है क्योकि अब तो ऐसे लोग भी राजनीति मे अपवाद स्वरूप ही बचे है। इसलिये धीरे-धीरे अच्छे लोग की परिभाषा बदलकर यह बन गई है कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिगत या पारिवारिक लाभ के लिये बलात्कार, हत्या, लूटपाट, जालसाजी आदि का सहारा लिये बिना राजनीति मे सक्रिय रह सके वह अच्छा आदमी है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्टाचार करे किन्तु उसमे हिंसा, जालसाजी या लूटपाट आदि न हो तो वह अच्छा आदमी है अथवा वह चाहे कितनी भी हिंसा बलात्कार हत्या क्यो न करें किन्तु वह व्यक्तिगत या पारिवारिक हित मे न होकर दल हित या जन हित मेे हो तो भी वह अच्छा आदमी माना जा सकता है। अब तो यह परिभाषा और भी संकुचित होकर ऐसी बन गई है कि जो व्यक्ति ऐसे हत्या बलात्कार डकैती के जघन्य आरोपों मे न्यायालय द्वारा दण्डित न हो जावे तब तक वह अच्छा आदमी है। लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चैटाला आदि भी अब बुरे आदमी नहीं माने जा रहे हैं। पप्पू यादव, शिब्बू सोरेन तो अच्छे आदमी घोषित ही है। इस तरह यदि हम स्वतंत्रता के तत्काल बाद की अच्छे आदमी की वर्तमान राजनीति मे तलाश करें तो वह संख्या पूरी तरह शून्य हो चुकी है। यदि हम मध्य काल की परिभाषा मे आॅकलन करे तो अब राजनीति मे बहुत थोडे ही लोग बचे है जो स्वयं भ्रष्ट या अपराधी नही है किन्तु दल हित मे किये जा रहे भ्रष्टाचार या अपराध कार्य के विरूद्ध नही। यदि हम वर्तमान की परिभाषा से आॅकलन करे तो वर्तमान मे दस-पांच प्रतिशत प्रत्यक्ष दण्ड प्राप्त नेताओं अपराधियो को छोडकर सभी राजनीतिज्ञ अच्छे लोग है।

समाजशास्त्र के नियम कुछ अलग होते है। जब राजनीति मे अच्छे लोगो की संख्या नगण्य हो जावे अथवा अच्छे लोगो की परिभाषा औसत से नीचे चली जावे तब राजनीति मे समाज के हस्तक्षेप की जरूरत आ जाती है। यह हस्तक्षेप बिल्कुल भिन्न प्रकार का होता है। इस हस्तक्षेप के आधार पर समाज राजनीति मे सुधार के प्रयत्नो को असंभव मानकर पूरी राजनैतिक व्यवस्था को ही बदल देने की सोच शुरू कर देता है। ऐसे समय मे एक जन शक्ति खडी होती है जो समाज मे स्पष्ट विभाजन करके राजनीति से संबद्ध और उससे संघर्षरत जैसे दो गुट बनाती है। इस ध्रुवीकरण मे जो अच्छे लोग राजनीति को सुधारने की कोशिश मे लगे रहते है वे भी शत्रु पक्ष ही माने जाते है चाहे वे कितने भी अच्छे क्यो न हो। सीधा विभाजन होता है जिसमें एक पक्ष होता है राजनीति से जुडे लोगो का और दूसरा होता है व्यवस्था परिवर्तन वालो का। तीसरा कोई पक्ष होता ही नही। जब रामायण काल मे युद्ध की स्थिति आई तो जो लोग रावण को सुधारने के प्रयत्न मंे लगे थे वे सब शत्रु पक्ष मानकर आज भी अपमानित है। जो लोग रावण को छोडकर आये वे सम्मानित है भले ही वे राज परिवार के ही क्यो न हो। उचित अनुचित की सामाजिक परिभाषा को शिथिल करके देशकाल परिस्थिति अनुसार नई परिभाषा बनी जिसमें आंशिक छल कपट को भी मान्य किया गया। महाभारत काल मे भी जो अच्छे लोग कंस के खेमे में रह गये वे आज तक कलंकित है। विदुर और भीष्म पितामह की भूमिका अलग-अलग रही है। बलराम भी चूंकि तटस्थ थे इसलिये कृष्ण के परिवार होते हुए भी सम्मानित नही हुए। कृष्ण ने आवश्यकतानुसार छल कपट का भी सहारा लिया किन्तु वे पूज्य माने गये।

वर्तमान स्थिति मे राजनीति मे अच्छे लोगो की संख्या भी नगण्य हो गई है और परिभाषाएं भी लगातार सिकुडती जा रही है। राजनीति को सुधारने के प्रयत्न असफल सिद्ध हो रहे है। भविष्य मे भी सुधार की कोई संभावना न के बराबर ही है। इसके विपरीत ये नाम मात्र के अच्छे लोग स्पष्ट धु्रवीकरण में बाधक ही हो रहे है। जब महमूद गजनी ने भारत पर आक्रमण किया था तब अपने मुठ्ठी भर सैनिक के आगे गायो का एक झुंड रखकर इसलिये बढा कि ये गाये ही उसकी ढाल बन सकेंगी। आज भी सच्चाई यह है कि राजनीति मे नाम मात्र के अच्छे लोग इन दुष्टो के सुरक्षा कवच का काम कर रहे है।

अटल जी, मनमोहन सिंह सरीखे अच्छे प्रधानमंत्री अब तक राजनीति में सुधार करते-करते शहीद हो चुके है। नीतिश कुमार, नरेन्द्र मोदी और अखिलेष यादव सरीखे अच्छे लोग भी निरन्तर पूरी सक्रियता और ईमानदारी से राजनीति की गुणवत्ता को सुधारते-सुधारते शहादत की कगार पर खडे है। राहुल गांधी भी यह बेमतलब की कसरत करते हुये स्पष्ट ध्रुवीकरण में बाधक ही बनेंगे क्योंकि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में व्यक्ति बुरे नहीं, व्यवस्था बुरी है जो व्यक्ति को बुरा बनने के लिए प्रेरित या मजबूर कर रही है। एक सीधा सा सिद्धान्त है कि कोई भी राजनैतिक शक्ति किसी व्यक्ति के पास इकठ्ठी होती है तब बुरे लोग उस शक्ति को प्राप्त करने के लिये अधिक सक्रियता से प्रयत्न करते है। परिणाम होता है अच्छे लोगो का पलायन और बुरे लोगो वर्चस्व। यदि व्यवस्था खराब नहीं होती और अच्छे लोग ही व्यवस्था बनाते तो सन् 1947 में राजनीति ने अच्छे लोगो प्रतिशत आज की तुलना में कई गुना अधिक था फिर भी अच्छे लोगों प्रतिशत घटता चला गया तो अब यह मुठ्ठी भर अच्छे लोग बदलाव की मृग तृष्णा में स्पष्ट ध्रुवीकरण में बाधक क्यों बन रहे है। बाबा रामदेव, मोहन भागवत सरीखे लोगो को भी राजनीति से नारदमोह भंग नहीं हो रहा है। ये भी भविष्य में भीष्म पितामाह के सरीखे पूज्य माने जायेगे, विभीषण सरीखे कलंकित नहीं क्योंकि पूरी व्यवस्था कलंक और पूज्य होने की मनमानी परिभाषाएं बनाती रहती है। 70 वर्षो तक कुछ नासमझों और बुरे लोगों ने मिलकर समाज को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के भ्रम जाल में उलझाये रखा तो अब कुछ नये नासमझ और बुरे लोग मिलकर बहुसंख्यक तुष्टिकरण का नया प्रयोग कर रहे है। अब कुछ महीनों से राहुल गांधी फिर से अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की मुहिम को आधार बनाकर सारे बुरे राजेताओं के सुरक्षा कवच बन रहे है। मैं लम्बे समय से महसूस कर रहा हूॅ कि व्यक्ति गलत नहीं है भारत की राजनैतिक व्यवस्था गलत है और व्यवस्था में मौलिक संशोधन ही इसका समाधान हो सकता है।

लोकतंत्र हमारा आदर्श न था न है। विकल्प के अभाव में हमने लोकतंत्र का मार्ग चुना क्योकि लोक स्वराज्य की अवधारणा ही कभी साफ नही हुई और तानाशाही या लोकतंत्र मे एक को हमने चुना। अब हम लोक स्वराज्य को आधार बनाकर लोकतंत्र को चुनौती दे रहे है। लोकतंत्र लगातार या तो अव्यवस्था की दिषा मे बढ रहा है या तानाशाही की दिशा में। भारत में संविधान का शासन है कानून का नहीं। दुर्भाग्य से हमारे राजनेताओं ने स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही संविधान और कानून दोनो पर अपना नियंत्रण कर लिया है। मेरे विचार में इसमें प्रमुख भूमिका निभाने वाले संविधान निर्माताओं की नीयत खराब थी तभी उन्होंने संविधान संशोधन के असीम अधिकार भी उसी संसद को दे दिये जो कानून भी बनाती है और पालन भी कराती है। पूरा तंत्र संविधान के अंतर्गत काम करने का ढोंग भी करता है और संविधान को अपनी मुठ्ठी में कैद भी रखता है। भारत में संसदीय लोकतंत्र कहा जाता है किन्तु वास्तव में संसदीय तानाशाही है क्योंकि संविधान का शासन लोकतंत्र होता है और शासन का संविधान तानाशाही। समय आ गया है कि अब समाज इन बुरे लोगों पर नियंत्रण के लिये सीधा हस्तक्षेप करे जिसकी शुरूआत भारतीय संविधान को तंत्र की गुलामी से मुक्त कराने के प्रयत्नों से हो सकती है। हमारे तथाकथित नासमझ अच्छे लोग इस बीमार लोकतंत्र को जीवित रखने मे ही अपनी सफलता समझ रहे है। कोई इसे मजबूत होने का खिताब दे रहा है तो कोई दूसरा मतदान के महापर्व का। भारत मे लोक प्रति पांच वर्ष मे घर से बाहर निकलकर या निकाला जाकर इस लोकतंत्र पर मुहर लगा देता है। यह मोहर ही हमारी गुलामी की स्वीकृति की प्रतीक होती है तो यही इस लोकतंत्र की एकमात्र सफलता भी मानी जाती है और इस मुहर लगवाने मे हमारे सभी अच्छे लोग परेशान है। अब यह खेल या भूल लम्बे समय तक नही चल सकती और न चलनी चाहिये। मैं पिछले बीस वर्षो से अपनी गुलामी की स्वीकृति सहमति रूपी इस महापर्व से दूर रहा और वोट देने दिलाने नहीं गया। मुझे अपने कार्य पर संतोष है। लोकतंत्र पूरी तरह असफल हो चुका है। लोक स्वराज्य ही उसका एकमात्र विकल्प है। राजनीति मे जो अपने को अच्छे लोग मानते है वे अब लोकतंत्र की ढाल बनने का पाप न करे। यथाशीघ्र ध्रुवीकरण मजबूत करने की आवश्यकता है। आशा है कि हमारे अच्छे लोग इस आवष्यकता को समझने का प्रयास करेगें।

संसद मंदिर, संविधान भगवान।
नेता पुजारी, सफल दुकानदारी।।

मंथन क्रमांकः116 “#मानवाधिकार”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 29, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1. व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है 1. प्राकृतिक अथवा मौलिक 2. संवैधानिक 3. सामाजिक। मौलिक अधिकारो को ही प्राकृतिक अथवा मानवाधिकार भी कहा जा सकता है;
2. मानवाधिकार सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर सृष्टि के समापन तक स्थिर होते है। उनमें कभी कोई बदलाव नहीं आता;
3. मानवाधिकार का उल्लंघन अपराध, संवैधानिक अधिकारो का उल्लंघन गैरकानूनी तथा सामाजिक अधिकारो का उल्लंघन अनैतिक माना जाता है;
4. प्रत्येक व्यक्ति के मानवाधिकारो की सुरक्षा समाज का दायित्व होता है, स्वैच्छिक कर्तव्य मात्र नहीं;
5. प्रत्येक व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार है। कोई भी अन्य इस स्वतंत्रता की सीमा नहीं बना सकता;
6. प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक व्यवस्था में सहभागी होना उसके लिये बाध्यकारी है। सामाजिक व्यवस्था के समक्ष सम्पूर्ण समपर्ण उसकी मजबूरी है;
7. परिवार सामाजिक व्यवस्था की प्रथम तथा विश्व समाज व्यवस्था की अंतिम इकाई है। प्रत्येक व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता प्राप्त है जो उसे अपनी स्वेच्छा से परिवार के साथ जोडनी आवश्यक है;
8. मानवाधिकार व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता है और सहजीवन उसके अधिकारों का पूर्ण समर्पण। सहजीवन प्रत्येक व्यक्ति के लिये बाध्यकारी है, स्वैच्छिक नहीं;
9. दुनियां में किसी भी व्यक्ति के लिये अकेला रहना न संभव है न उचित। यदि कोई व्यक्ति दूसरो की सुरक्षा में भागीदार नही बनना चाहता तो कोई अन्य उसकी सुरक्षा की गांरटी क्यो लेगा;
10. व्यक्ति का सिर्फ एक ही प्राकृतिक अधिकार होता है असीम स्वतंत्रता तथा एक दायित्व होता है सहजीवन। स्वतंत्रता के चार भाग है 1. जीवन की 2. अभिव्यक्ति की 3. सम्पत्ति की 4. स्वनिर्णय की। सहजीवन के तीन भाग है 1. पारिवारिक 2. स्थानीय 3. राष्ट्रीय।
11. किसी भी इकाई में सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी व्यक्ति की ईकाई से अलग होने की स्वतंत्रता हमेशा सुरक्षित रहती है। किसी भी परिस्थिति में किसी समझौते के अंतर्गत संबंध विच्छेद की स्वतंत्रता में कटौती नही की जा सकती;
12. परिवार, गांव, राष्ट्र आदि इकाईयां समाज व्यवस्था की ईकाईयां मानी जाती है। किसी भी व्यक्ति की उसकी सहमति के बिना राज्य भी अपने साथ जुडकर रहने के लिये बाध्य नहीं कर सकता;
13. कोई भी संविधान व्यक्ति को मौलिक अधिकार न दे सकता है और न ले सकता है। संविधान उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गांरटी मात्र देता है। चाहे संविधान परिवार का हो स्थानीय हो अथवा राष्ट्रीय।
14. प्रत्येक व्यक्ति के मानवाधिकारों की सुरक्षा समाज व्यवस्था का दायित्व है। मनमाने तरीके से बने मानवाधिकार संगठन विष्व में और विशेषकर भारत में मानवाधिकार के नाम पर दुकानदारी चलाते है। उनका मानवाधिकार से कोई संबंध नहीं है;
15. सभी मानवाधिकार संगठनों का भारत में रिकार्ड बहुत खराब है। इन्हें निरूत्साहित करना चाहिये;
16. सिर्फ मनुष्य को ही मानवाधिकार प्राप्त हैं, पशु, पक्षी, पेड-पौधों को यह अधिकार प्राप्त नही है;
17. समाज संपूर्ण विश्व का एक होता है। समाज राष्ट्रों या समूहों का संघ नहीं हो सकता। समाज सिर्फ व्यक्तियों का समूह होता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकार समान होते है;
18. व्यक्ति चाहे कितना भी अधिक शक्तिशाली क्यों न हो, व्यवस्था हमेशा उसके उपर होती है। दुर्भाग्य से व्यवस्था के उपर व्यक्ति बनाये जा रहे है जो गलत है;
19. दुनियां में यह भ्रम फैला हुआ है कि राष्ट्र सम्प्रभुता सम्पन्न इकाई है जो मौलिक अधिकारों में फेरबदल कर सकती है। यह भ्रम दूर होना चाहिये;
20. इस्लाम और साम्यवाद घोषित रूप से मौलिक अधिकारों को अस्वीकार करते है। इस्लाम और साम्यवाद का अस्तित्व समाज के लिये सबसे बडा संकट है। पूरी दुनियां को चाहिये कि इन दो विचारधारा के लोगों को या तो सामाजिक व्यवस्था मानने के लिये सहमत करे या बाध्य करे;
21. मानवाधिकार की सुरक्षा के लिये सबसे पहला काम इस्लामिक तथा साम्यवादी विचारों पर दबाव बनाना है;
22. कोई बडे से बडा अपराधी भी समाज व्यवस्था की सहभागिता से वंचित नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि किसी दण्ड प्राप्त अपराधी को भी किसी कानून के अंतर्गत संसद की सहभागिता से तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक संसद संविधान संशोधन की अन्तिम अधिकार प्राप्त इकाई है;
23. समानता की सिर्फ एक परिभाषा होती है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान स्वतंत्रता। इसके अतिरिक्त समानता की सारी परिभाषायें असमानता पैदा करती है। समानता के नाम पर असमानता पैदा करके वर्ग विद्वेष बढाना राजनीति का मुख्य आधार है।

वैसे तो सारी दुनियां में मानवाधिकार के विषय में स्पष्ट धारणा का भाव है किन्तु भारत में यह अभाव बहुत व्यापक है। आमतौर पर यह धारणा बनी हुयी है कि संविधान मौलिक अधिकार देता भी है और ले भी सकता है। आम लोग कहते हैं कि संसद को संविधान संशोधन के असीम अधिकार होने चाहिये और अपराधियों को संसद प्रवेश से वंचित किया जाना चाहिये। अच्छे-अच्छे विद्वान भी यह बात ठीक से नही समझ पाते है कि व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार क्या है जिनमें उसकी सहमति के बिना कोई कटौती नहीं हो सकती। अनेक नासमझ तो राष्ट्र को अंतिम इकाई मान लेते है तथा समाज को राष्ट्र से नीचे सिद्ध करते रहते है। कई नासमझ तो व्यक्ति की अभिव्यक्ति की अथवा सम्पत्ति की अधिकतम सीमा भी बनवाने का प्रयास करते रहते है जबकि अभिव्यक्ति अथवा सम्पत्ति की कोई सीमा या तो व्यक्ति स्वयं की मर्जी से बना सकता है अथवा विश्व समाज की व्यवस्था से। वैसे तो किसी व्यक्ति को दंड देना भी विश्व व्यवस्था के कानूनों के अंतर्गत ही होना चाहिये। इसी व्यवस्था के अन्तर्गत दुनियां के साथ साथ भारत भी न्यायपालिका का यह दायित्व है कि वह किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के विरूद्ध किये गये किसी संविधान संशोधन को रद्द कर दे। मुस्लिम और साम्यवादी देशो को छोडकर दुनियां भर के न्यायालय इस दायित्व से बंधे है। यही कारण है कि इस्लामिक साम्यवादी विचारधारा दुनियां के मानवाधिकार के लिये सबसे बडा खतरा है। सबसे पहले इस विचारधारा से निपटना चाहिये।

यह बात भी विचारणीय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी अन्य के साथ सहजीवन षुरू करना उसकी बाध्यता है, स्वतंत्रता नही। कोई व्यक्ति इस बाध्यता से इंकार नही कर सकता। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की सुरक्षा में भागीदारी नहीं कर सकता है तो समाज उसकी स्वतंत्रता की गांरटी क्यो दे। इसलिये यह धारणा भी गलत है कि व्यक्ति अकेला रह सकता है। यह धारणा भी गलत है कि व्यक्ति के मौलिक अधिकार समय समय पर कम ज्यादा होते रहे है। मेरे विचार से सृष्टि के प्रारम्भ से अंत तक मानवाधिकार समान है। भारत में मानवाधिकार के नाम पर ब्लेकमेल करने वालो की बाढ सी आयी हुयी है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों के पक्ष में खडा होना तथा राज्य को कटघरे में खडा करना एक प्रकार का व्यवसाय बन गया है। इस तरह के व्यवसायियों से भी समाज को मुक्त करना चाहिये। जिस तरह समाज में एकात्ममानववाद के नाम पर किसी विचारधारा को प्रश्रय दिया जा रहा है उससे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि एकात्ममानववाद के साथ-साथ सर्वात्ममानववाद की चर्चा आगे बढायी जाये जिस पर अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सर्वात्ममानववाद अधिक महत्वपूर्ण है।

मानवाधिकार संरक्षण तथा सहजीवन का तालमेल आवष्यक है। इसके लिये हमें कुछ कदम उठाने चाहिये।
1. विश्व संविधान बनना चाहिये जिसके निर्माण में दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की बराबर भूमिका हो;
2. भारत के संविधान में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होनी चाहिये;
3. परिवार और गांव व्यवस्था को स्वतंत्र अधिकार दिये जाने चाहिये जिससे कोई भी व्यक्ति स्वतंत्रता पूर्वक परिवार से निकल सके। इसी तरह राष्ट्रीय व्यवस्था को भी यह स्वीकार करना चाहिये कि कोई भी व्यक्ति कभी भी देष छोडकर तब तक जा सकता है जबतक उसने कोई अपराध नहीं किया हैं।
भारत सरकार को यह स्वीकार करना चाहिये कि वह इस्लामिक या साम्यवादी व्यवस्था का अंग न होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंग है। उसे लोकतांत्रिक विश्व का पूरा पूरा सम्मान और सहभागिता करनी चाहिये। मानवाधिकार संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का महत्वपूर्ण दायित्व है और इस दायित्व को हम सबको पूरा करना चाहिये।

मंथन क्रमाँक-115 ’’ज्ञान, बुद्धि, श्रम और शिक्षा’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 17, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1. ज्ञान और शिक्षा अलग-अलग होते है। ज्ञान स्वयं का अनुभवजन्य निष्कर्ष होता है तो शिक्षा किसी अन्य द्वारा प्राप्त होती है;
2. ज्ञान निरंतर घट रहा है और शिक्षा लगातार बढ रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी शिक्षा लगभग चार गुनी बढी है तो ज्ञान उसी मात्रा में कम हो गया है;
3. बुद्धि और विवेक में बहुत फर्क होता है। विवेक निष्कर्ष निकालता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं। बुद्धि निष्कर्ष के आधार पर कार्य पूरा करने का माग तलाशती है;
4. विवेक और ज्ञान भी अलग-अलग होते है। ज्ञान सब प्रकार अच्छे-बुरे कार्याे के लाभहानि के अनुभव तक सीमित होता है तो विवेक करने योग्य और न करने योग्य कार्यो को अलग कर देता है;
5. शिक्षा हमेशा व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का विस्तार करती है चाहे व्यक्ति ज्ञान की दिशा में हो अथवा आपराधिक कार्यो में लिप्त हो। शिक्षा कभी चरित्र निर्माण का माध्यम नहीं होती, सिर्फ सूचना तक सीमित होती है;
6. हर बुद्धिजीवी समाज के समक्ष यह सिद्ध करता है कि शिक्षा का चरित्र निर्माण पर प्रभाव पडता है किन्तु यह बात गलत है;
7. शिक्षा पूरी तरह शासन मुक्त होनी चाहिये। शिक्षा पर सरकार को किसी प्रकार का कोई धन खर्च नहीं करना चाहिये क्योंकि शिक्षा अच्छे और बुरे दोनों की क्षमता के विस्तार में भेद नहीं करती;
8. ज्ञान के तीन स्रोत होते हैः-1. जन्म पूर्व के संस्कार 2. पारिवारिक वातावरण 3. सामाजिक परिवेश। परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को कमजोर करने के कारण पूरी दुनियां में और विशेषकर भारत में ज्ञान तेजी से घट रहा है;
9. पिछले कुछ हजार वर्षो से बुद्धिजीवियों ने भारत में श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे है। स्वतंत्रता के पूर्व जाति आरक्षण का सहारा लिया गया तो स्वतंत्रता के बाद शिक्षा विस्तार, जातीय आरक्षण तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण को आधार बनाया गया;
10. ज्ञान हमेशा सकारात्मक दिशा में निष्कर्ष निकालता है तो बुद्धि दोनो दिशाओं में चलायमान रहती है;
11. सरकार हमेशा श्रमजीवियों के पक्ष में दिखती है और रहती है हमेशा बुद्धिजीवियों के पक्ष में। साम्यवादी इस मामले ये सबसे अधिक सक्रिय रहते है बुद्धिजीवियों के पक्ष में और दिखते है श्रमजीवियों के साथ।
12. भीमराव अम्बेडकर की सभी नीतियां श्रमजीवियों के विरूद्ध और बुद्धिजीवियों के पक्ष में रही। आज भारत का हर अवर्ण या सवर्ण बुद्धिजीवी अम्बेडकर जी का प्रशंसक है;
13. भारत की सम्पूर्ण अर्थनीति गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी उत्पादकों के विरूद्ध पूंजीपति, शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्ताओं के पक्ष में कार्य करती है;
14. शिक्षा को योग्यता और कार्यक्षमता विस्तार के माध्यम तक सीमित होना चाहिये था किन्तु भारत में शिक्षा योग्यता की जगह रोजगार के अवसर का माध्यम बन गयी है;
15. वर्तमान समय में बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम के विरूद्ध किये जाने वाला षडयंत्र एक बहुत बडा अन्याय है। इसे प्राथमिकता के आधार पर समाधान की आवश्यकता है;
16. गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी तथा उत्पादको को न्याय मांगने या न्याय के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा देना असामाजिक कार्य माना जाना चाहिये। क्योंकि इससे वर्ग विद्वेष बढता है।
17. पूंजीपति, शहरी, बुद्धिजीवी तथा उपभोक्ताओं को शोषितों की सहायता के लिये प्रेरित करना, सामाजिक कार्य होगा। तात्कालिक रूप से सरकार को समझाना या मजबूर करना चाहिये;
18. भारत में अविकसित, अशिक्षित क्षेत्रों के निवासियों की तुलना में विकसित तथा शिक्षित क्षेत्रों के निवासियों में ज्ञान विवेक और नैतिकता का अधिक पतन हुआ है।

सम्पूर्ण समाज में स्वार्थ, हिंसा तथा अनैतिकता का विस्तार हो रहा है। शिक्षा व्यक्ति की क्षमता का विकास करती है। नैतिकता मात्र का नहीं। एक ही गुरू से एक साथ एक ही प्रकार की शिक्षा लेने वाले तो शिक्षार्थीयों में एक युधिष्ठिर तथा दूसरा दुर्योधन बन जाता है। स्पष्ट है कि शिक्षा का चरित्र निर्माण से कोई संबंध नहीं। यही कारण है कि ज्यों-ज्यों भारत में शिक्षा का तेज गति से विस्तार हो रहा है उतनी ही तेज गति से स्वार्थ, हिंसा तथा अनैतिकता भी बढ रही है। दोनों का कोई संबंध नहीं है। आवश्यक नहीं कि चरित्र पतन के विस्तार में शिक्षा की कोई भूमिका रही होे किन्तु चरित्र पतन बढने के साथ साथ यदि शिक्षा का विस्तार होता है तो चरित्र पतन की भी गति बढ जाती है। क्योंकि शिक्षा का विस्तार पतित चरित्र को अधिक प्रभावशाली बनाता है। भारत में यही हो रहा है।

जातीय आरक्षण के माध्यम से स्वतंत्रता के पूर्व सफलता पूर्वक श्रम शोषण किया जाता था। स्वतंत्रता के बाद अम्बेडकर जी ने सवर्ण अवर्ण बुद्धिजीवियों का जातीय आरक्षण के माध्यम से समझौता कराकर श्रम शोषण जारी रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। साम्यवादियों ने कृत्रिम उर्जा को सस्ता रखने का दबाव बनाकर श्रमशोषण का एक और आधार बना दिया। सशक्त बुद्धिजीवियों ने सरकार पर दबाव डालकर शिक्षा का बजट बढवाया। यहाॅ तक कि बुद्धिजीवियों ने गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी एवं उत्पादकों की भी कोई परवाह नही की और उनके उत्पादन, उपभोग की वस्तुओं पर भारी कर लगा कर अपना वेतन, सुविधा, शिक्षा का बजट बढवाते रहे। निरंतर हो रही किसान आत्महत्या तथा उपभोक्ता वस्तुओं का लगातार सस्ता होना यह प्रमाणित करता है कि बुद्धिजीवियों का षडयंत्र सफल हो रहा है। साम्यवादियों ने बडी बेशर्मी से गरीब तबके को यह विश्वास दिलाया कि कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण तथा शिक्षा का विस्तार ही उनके हित में है। बेचारे नैतिकता प्रधान गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, उत्पादक इन चालाक संगठित बुद्धिजीवियों पर विश्वास करके ठगे गये।

मैं मानता हूॅ कि बडी संख्या में बुद्धिजीवी यह जानते ही नहीं कि वे श्रमजीवियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। वे भी यह समझते हैं कि सरकार की यह शिक्षा विस्तार, कृत्रिम उर्जा नीति श्रमिकों के हित में है। बडी संख्या में बुद्धिजीवी जानबूझकर ऐसा नहीं करते। यदि उन्हे यह पता चले कि वे अन्याय कर रहे हैं तो अनेक बुद्धिजीवी भी इसका समर्थन छोड देगे किन्तु उन्हें बताने वाला चाहिये। यह सच्चाई गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, उत्पादकों को बताना भी घातक है क्योंकि पहली बात तो यह है कि उन्हे संगठित गिरोहो ने भरपूर विश्वास दिला रखा है दूसरी बात यह भी है कि इससे वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष का खतरा बढ जायेगा। इसलिये बुद्धिजीवियों को ही सच्चाई बताने की जरूरत है। बडी संख्या में बुद्धिजीवी इस अनैतिकता को समझेगे और श्रम शोषण के विरूद्ध आपका साथ देंगे।

समस्या बहुत विकराल भी है और जटिल भी। समस्या विश्वव्यापी होते हुये भी भारत में बहुत बढी हुई है। इसके समाधान के लिये चौतरफा प्रयास करने होगे। शुरूआत सरकार पर दबाव बनाने से हो सकती है। 1. ज्ञान वृद्धि के लिये परिवार गांव और समाज व्यवस्था को अधिक निर्णय के अधिकार दिये जाने चाहिये क्योेंकि ज्ञान के विस्तार में यही प्रमुख सहायक होते है; 2. शिक्षा को पूरी तरह स्वावलम्बी और शासन मुक्त होना चाहियें। शिक्षा पर होने वाला खर्च तथा उसकी नीति समाज संचालित होनी चाहिये, राज्य संचालित नहीं। 3. श्रम और बुद्धि के बीच वर्तमान आर्थिक असंतुलन बंद होना चाहिये। गरीब, ग्रामीण श्रमजीवी तथा उत्पादकों के उत्पादन और उपभोग की सभी वस्तुएं कर मुक्त होनी चाहियें। 4. पूंजीपतियों, शहरी आबादी बुद्धिजीवी तथा उपभोक्ताओं को किसी भी प्रकार की आर्थिक सुविधा बंद की जानी चाहिये। रोजगार को श्रम के साथ जोडा जाना चाहिये और बौद्धिक रोजगार को बाजार पर स्वतंत्र कर देना चाहिये।

मेरा यह स्पष्ट मत है कि ज्ञान का घटना एक बहुत ही बडी समस्या है। इसके साथ ही श्रम के साथ अन्याय भी एक बडी समस्या के साथ साथ अमानवीय कार्य भी है। इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

मंथन क्रमांक-114 ’’ईश्वर का अस्तित्व’’–बजरंग मुनि

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कुछ निष्कर्ष है-
1. ईश्वर है, किन्तु यदि नहीं भी हो तो एक ईश्वर मान लेना चाहिए;
2. ईश्वर और भगवान अलग-अलग होते है। धर्म दोनों को अलग-अलग मानता है और सम्प्रदाय एक कर देता है;
3. ईश्वर एक अदृश्य शक्ति के रूप में होता है और भगवान प्रेरणादायक महापुरूष के रूप मे;
4. अदृश्य भय व्यक्ति को गलत करने से रोकता है और दृश्य भय, ब्लैकमेल भी कर सकता है। ईश्वर अदृश्य भय होने के कारण बहुत उपयोगी होता है;
5. ईश्वर का भय कम होते जाने के कारण मार्क्स ने अ दृश्य भय के लिए नया तरीका खोजा था। मार्क्स की नीयत ठीक थी, तरीका गलत था। मार्क्स ने व्यवस्था की तुलना में व्यक्ति पर अधिक विश्वास करने की भूल की।
6. दर्शन और धर्म अलग-अलग होते है और दोनों का समन्वय समाज के लिए उपयोगी है। दार्शनिक समझता है कि ईश्वर नहीं होता है किन्तु समाज को समझाता है कि ईश्वर है क्योंकि समाज के ठीक-ठीक संचालन के लिए ईश्वरीय सत्ता का अस्तित्व मानना आवश्यक होता है;
7. ईश्वर निराकार होता है और भगवान साकार होते हैं। ईश्वर की मुर्ति नहीं होती, भगवान की होती है। रामकृष्ण भगवान माने जाते है, ईश्वर नहीं;
8. ईश्वर एक है। हिन्दू हो या ईसाई मुसलमान, नाम या भाषा के आधार पर अलग-अलग हो सकते है;
9. मूर्ति पूजा दार्शनिकों के लिए निरर्थक है और सामान्य व्यक्तियों के लिए सार्थक। वैसे भी मूर्ति पूजा निरर्थक कार्य हो सकती है किन्तु समाज विरोधी कार्य नहीं। इसलिए मूर्ति पूजा का विरोध करना निरर्थक कार्य माना जाता है;
10. ईश्वर के प्रति विश्वास होना चाहिये और महापुरूष के प्रति श्रद्धा। अदृश्य के प्रति विश्वास और दृश्य के प्रति श्रद्धा होती है। महापुरूषों की मूर्तियां दृश्य मानी जाती है।
इस प्रकार की बहस में कभी नहीं पडना चाहिये कि ईश्वर है कि नहीं क्योंकि ईश्वर काल्पनिक है और प्रकृति वास्तविक।
11. जब किसी का अस्तित्व कल्पना से भी बाहर हो जाता है तब उसे ईश्वर मान लेना चाहिए। ब्रह्मांड का विस्तार कल्पना से भी अधिक दूर है और ब्रह्मांड की सूक्ष्मता भी कल्पना से बाहर है। इसलिए ईश्वर को मान लेना उचित होता है;
12. जो लोग नास्तिक होते है वे सत्य जानते है कि ईश्वर नहीं होता। किन्तु वे समाज व्यवस्था के ठीक संचालन के लिए ईश्वर की आवश्यकता है ऐसा न मानकर भूल करते है।
13. भारतीय वर्ण व्यवस्था में ईश्वर को मानने और न मानने का एक बहुत अच्छा संतुलन है। अधिकांश विद्वान ईश्वर को नहीं मानते किन्तु अन्य तीन वर्णो को ईश्वर पर विश्वास कराने का पूरा प्रयत्न करते है।

मैंने भी ईश्वर के अस्तित्व पर अपने पूरे जीवन काल में बहुत सोचा समझा। जिस तरह प्रकृति किसी व्यवस्था के आधार पर किसी बने बनाये नियम के अनुसार चलती है उससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर है। मनुष्य का शरीर भी जितनी जटिल प्रक्रिया से बना है उससे आभास होता है कि उसका बनाने वाला कोई अवष्य होगा। किन्तु साथ ही यह प्रश्न भी खडा होता है कि यदि मानव शरीर और प्रकृति को किसी ने बनाया है तो उस बनाने वाले को किसने बनाया? मैं कभी इन दोनों प्रश्नों का उत्तर नही खोज सका। इसलिए मैं इस निष्कर्ष पर पहुॅचा हूॅ कि चाहे ईश्वर हो या न हो किन्तु हमें ईश्वर के अस्तित्व को मान लेना चाहिये। मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी कुछ ऐसी घटनाये घटी जिनके आधार पर मैंने यह माना कि किसी अदृश्य शक्ति द्वारा मेरी सहायता की जा रही है। उन घटनाओं ने भी मुझे ईश्वर का अस्तित्व मानने के लिए मजबूर किया। मुझे यह पूरा विश्वास है कि मूर्तियॉ या मूर्तियों में कोई अलग से ईश्वर नहीं है किन्तु मैं मूर्ति पूजा पर पूरी तरह अविश्वास करते हुए भी मूर्ति पूजा का विरोध नहीं करता क्योंकि कुछ वर्षो तक आर्य समाज में सक्रिय रहने के बाद मैंने यह महसूस किया कि मेरी तर्क शक्ति बहुत तेजी से बढ रही है और श्रद्धा घट रही है। अर्थात मैं धीरे-धीरे नास्तिकता की ओर बढ रहा हूॅ। कर्मकांड तो छूट गया किन्तु यज्ञ पर विश्वास बढने की अपेक्षा यज्ञ भी औपचारिक होने लगा। इसलिए मैंने उचित समझा कि मूर्ति पूजा का विरोध करना अकर्म है, आवश्यक नहीं, उचित भी नहीं। मुझे पूरा विश्वास है कि स्वामी दयानंद ठीक समझते थे कि ईश्वर निराकार है, मूर्ति पूजा निरर्थक है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में समाज के ठीक-ठीक संचालन के लिए मूर्तियां भय पैदा करती है तो जब तक उसका अच्छा विकल्प न बने तब तक उसका विरोध नहीं करना चाहिए। मार्क्स ने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करके राज्य को तैयार करने का प्रयास किया था। उनका मानना था कि राज्य को एक ऐसी अदृश्य शक्ति के रूप में खडा किया जाये जो धीरे-धीरे अपने आप अदृश्य हो जाये और समाज उस अदृश्य शक्ति से भयभीत होकर ठीक चलता रहे। इसलिए मार्क्स ने कहा था कि मार्क्सवाद का चरम उत्कर्ष होगा जब राज्य पूरी तरह अदृश्य हो जायेगा। स्टेट शैल विदर अवे। दुर्भाग्य से वह राज्य अदृश्य होकर समाज को काल्पनिक भय से संचालित करने के ठीक विपरीत दृश्य भय के रूप में गुलाम बनाकर रखने लगा अर्थात साम्यवाद अदृश्य शक्ति की जगह तानाशाही में बदल गया और यह स्पष्ट है कि साम्यवाद दुनियां में सबसे बुरी व्यवस्था है। साम्यवाद ने सारी दुनियां में अव्यवस्था पैदा की और अब धीरे-धीरे साम्यवाद से पिंड छूट रहा है अर्थात साम्यवाद प्रभावित देशो में भी ईश्वर को मानने वालों की संख्या बढ़ रही है।

ईश्वर को मानने वाले ईश्वर को एक शक्ति के रूप में मानते है, किसी व्यक्ति या जीव के रूप में नहीं, चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान।, ईसाई मुसलमान भी खुदा और पैगम्बर को अलग-अलग मानते है तो ईसाई भी गॉड और यीशू को एक नहीं मानते है। स्पष्ट है कि महापुरूष धीरे-धीरे भगवान कहे जाते है। ऐसे ही भगवानों में बुद्ध, महावीर और राम कृष्ण भी हुये। अब तो कुछ लोग साई बाबा को भी उस दिशा में आगे बढा रहे है। वैसे तो रजनीश को भी भगवान कहना शुरू कर दिया गया था किन्तु इन सबको भगवान मानने की एक सीमा है। उन्हें ईश्वर नहीं माना जाता है। यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप से समाज में भय पैदा करने के लिए कुछ ऐसी काल्पनिक दंत कथाएं जोड दी जाती है जो इन महापुरूषो की लौकिक घटनाओं को अलौकिक सिद्ध कर देती है। हो सकता है कि कुछ घटनाएं वास्तविक भी हो किन्तु अधिकांश घटनाएं काल्पनिक और कहानियों के रूप में होती है। इसलिए हमें चाहिए कि यदि कोई घटना तर्क संगत नहीं है तो किसी महापुरूष को स्थापित करने के लिए हमें उस घटना का उपयोग नहीं करना चाहिए। साथ ही हमें ऐसी काल्पनिक घटनाओं का विरोध करने में भी शक्ति नहीं लगानी चाहिए क्योंकि हम स्पष्ट नहीं है कि घटना असत्य ही है और यह भी साफ नहीं है कि उस काल्पनिक घटना का समाज में बुरा प्रभाव पडेगा ही। मैं देखता हूॅ कि अनेक लोग अपना सारा काम छोडकर अंध विश्वास निवारण को अपना व्यवसाय बना लेते है। मैं इसे ठीक नहीं मानता। अंध विश्वास दूर होना चाहिए यह सही है किन्तु यह प्रयत्न दुधारी तलवार के समान है जिसका लाभ भीं हो सकता है और नुकसान भी। मैंने स्वयं अपने परिवार और सीमित मित्रों के बीच अंध विश्वास दूर करने का पूरा प्रयास किया किन्तु मैं देख रहा हूॅ कि अंध विश्वास कम होते-होते ईश्वर के प्रति विश्वास भी कम होता जा रहा है।

ईश्वर का अस्तित्व तर्क का विषय न होकर श्रद्धा और विश्वास का है। हमारा प्राचीन विश्वास रहा है कि ईश्वर है। पहले मुसलमानों और बाद में अंग्रेजों की गुलामी ने हमारी प्राचीन विद्वत्ता और वैज्ञानिक क्षमता पर संदेह पैदा करके यह समझाया कि भारत प्राचीन समय में वैज्ञानिक आधार पर बहुत पिछडा था। यहां तक झूठ समझाया गया कि आर्य विदेशो से आये और आदिवासी यहां के मूलनिवासी थे। स्वतंत्रता के बाद हम भौतिक गुलामी से मुक्त होकर साम्यवाद समाजवाद की वैचारिक गुलामी से जकड गये। परिणाम हुआ कि हमारी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियां और अधिक संदेह के घेरे में आ गयीं। हर पढा, लिखा भारतीय यह समझने लगा कि जो कुछ प्राचीन था वह अधिकांश अंधविश्वास था। मैं इससे सहमत नहीं। मैं समझता हूॅ कि प्राचीन समय की कुछ मान्यताएं अंधविश्वास हो सकती हैं तो कुछ वैज्ञानिक आधार पर भविष्य में प्रमाणित भी हो सकती हैं। हमारी पुरानी मान्यता ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करती है और जब तक यह पूरी तरह प्रमाणित न हो जाये कि ईश्वर नहीं था, न है, तब तक यदि कोई ईश्वर को मानता है तो गलत नहीं। मेरा सुझाव है कि हम ईश्वर भूत प्रेत तंत्र मंत्र पूजा के अस्तित्व को माने या न माने यह हमारी स्वतंत्रता है किन्तु इन मान्यताओं का खुलकर विरोध करना भी उचित नहीं, जब तक कोई मान्यता पूरी तरह अंध विश्वास और समाज के लिए घातक सिद्ध न हो जाये। मेरा तो ईश्वर पर विश्वास है किन्तु यदि किसी को नहीं है तो यह उसका व्यक्तिगत विश्वास है। मैं उसे अपना विश्वास बता सकता हॅू किन्तु उसे सहमत करने का प्रयत्न उचित नहीं क्योंकि ईश्वर तर्क का विषय न होकर श्रद्धा विश्वास तक सीमित है।

मैं हरि अनंत हरि कथा अनंता पर विश्वास करता हूॅ। ईश्वर की चर्चा भी अनंत काल से चलती रही है और चलती रहेगी। उसी कडी में मैं भी इस चर्चा में शामिल हुआ हूॅ और आपसे भी अपेक्षा करता हूॅ कि आप इस संबंध में अपने विचार देकर इस चर्चा को आगे बढायेगे।

मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 2, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-
1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;
2. दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति सुख की इच्छा करता है और सुख मिलता है निरन्तर भौतिक विकास और संतुष्टि के समन्वय से;
3. वर्तमान समय में पूरी दुनियां में पर्यावरण का संतुलन बिगड रहा है। मानव शरीर के पांचों मूल तत्व विकृत होते जा रहे है। इसका दुष्प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य से लेकर उसके स्वभाव पर भी स्पष्ट दिखता है।
4. जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी अर्थात सभी पांचो मूल तत्व बहुत तेजी से विकृत हो रहे है। इसका प्रभाव संपूर्ण मानव एवं जीव जन्तु पर पड रहा है किन्तु भारत पर इसका प्रभाव और भी ज्यादा है;
5. आकाश में खतरा ओजोन गैस का है। अग्नि को खतरा विनाशक हथियारों तथा बारूद का है। जल, पृथ्वी और वायु निरंतर प्रदूषित हो रहे है। प्लास्टिक का बढता उपयोग भी पृथ्वी के लिये समस्या बनता जा रहा है।
6. पर्यावरण ताप वृद्धि बहुत बडी समस्या है और इस संबंध में निरन्तर चिंता भी हो रही है। किन्तु उससे भी ज्यादा खतरनाक समस्या है मानव स्वभाव ताप वृद्धि। दुर्भाग्य से इस खतरनाक समस्या पर पूरी दुनियां में कोई चिंता नहीं हो रही है;
7. मानव स्वभाव ताप वृद्धि तथा मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि दुनियां की सबसे अधिक गंभीर समस्याएं है। किन्तु इस खतरे की गंभीरता को नहीं समझा जा रहा है।
8. भारत में पर्यावरण और मानवाधिकार के नाम पर बने हुये पेशेवर संगठन पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुॅचा रहे है। ये संगठन विदेशो से धन लेकर भारत की सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था को असंतुलित करते है;
9. पर्यावरण के नाम पर काम कर रहे पेशेवर संगठन अपनी दुकानदारी चलाने के लिये समाज में जागरूकता के नाम पर भय पैदा करने का काम करते है;
10. कोई संगठन ओजोन गैस के नाम पर डर दिखाता है तो कोई दूसरा हिमयुग अथवा तापवृद्धि का। जबकि सामान्य जन जीवन पर इसका न कोई प्रभाव पडता है, न ही समाधान में भूमिका होती है।

यह निर्विवाद सत्य है कि पर्यावरण बहुत तेजी से बिगड रहा है। सारी दुनियां के साथ-साथ भारत की गति औेर भी अधिक तेज है। प्राचीन समय में आबादी बहुत कम थी। लोग अशिक्षित, अविकसित और गरीब थे।
समाज में कई कुरीतियाॅ थी किन्तु पर्यावरण के प्रति सजग थे। सामाजिक व्यवस्था में पानी को गंदा करना अनैतिक माना जाता था। वृक्षारोपण को बहुत महत्व दिया जाता था और पेडों तक की पूजा होती थी। वायु शुद्धि के लिये भी यज्ञ आदि करके एक भावनात्मक वातावरण विकसित किया जाता था। धीरे-धीरे हम विकास की दौड में आगे बढे किन्तु भौतिक विकास की गति बहुत तेज रही और नैतिक पतन बढता चला गया। विकास और नैतिकता का संतुलन बिगड गया। पर्यावरण के प्रति जो भावनात्मक श्रद्धा थी उसे अंधविश्वास के नाम पर समाप्त कर दिया गया। पेशेेवर लोग पर्यावरणवादी बनकर सामाजिक वातावरण को और अधिक नुकसान पहुॅचाते रहे। ये विदेशी दलाल विदेशों से धन या बडे-बडे सम्मान लेकर भारत के वातावरण को बिगाडते रहे। जो व्यक्ति पूरे जीवन में कभी एक भी पेड नहीं लगाया है वह भारत के पर्यावरण संरक्षकों में शामिल हो जाता है समाज में जागरूकता की जगह भय पैदा किया जाता है। कोई कहता है कि वातावरण इतना गरम हो जायेगा कि बर्फ पिघल जायेगी और नदियों में बाढ आ जायेगी तो दूसरा पर्यावरणवादी यह भी कहता है कि जल संकट आने वाला है और पानी की इतनी कमी हो जायेगी कि पानी के लिये मार-काट हो जायेगी। इस तरह की ऊल-जलूल बातें 60-70 वर्ष पूर्व भी सुनाई देती थी और आज भी सुनाई देती है लेकिन इन पेेशेवर लोगों का धंधा निरन्तर बढता जा रहा है।

वर्तमान समय में भारत की आबादी तेज गति से बढी। उचित होता कि पर्यावरण संरक्षण के लिये कुछ विशेष व्यवस्था की जाती किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत। पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन व्यवस्था को अंधविश्वास के नाम पर छोड दिया गया। अब कोई गंगा नदी में तांबे का पैसा डाल दे तो अंध विश्वास कहा जायेगा। फलदार वृक्षों की पूजा भी अंध विश्वास। यज्ञ करना अंध विश्वास। पानी में गंदगी डालना पाप मानना अंधविश्वास। पर्यावरण संरक्षण विकास की दौड की भेंट चढ गया। सारी दुनियां तेज विकास के लिये पर्यावरण का शोषण कर रही है इसलिये भारत भी पीछे क्यों रहे, इसे आवश्यकता मान लिया गया। पर्यावरण सुरक्षा समाज शास्त्र का विषय न रहकर पेशेवर पर्यावरण वादियों मानवाधिकार वादियों का व्यवसाय बन गया।

परिणाम हुआ कि भारत में भी पंचतत्व बहुत तेज गति से प्रदुषित हुये। सबसे ज्यादा प्रदूषित हुई वायु। पेड कटे और वायु में डीजल पेट्रोल का प्रदूषण तेजी से बढा। भारत की आबादी सत्तर वर्षो में चार गुना बढी किन्तु डीजल पेट्रोल की खपत चालीस गुनी बढ गई। मनुष्य और पशु बेरोजगार बेकार घूम रहे हैं। सौर उर्जा के मामले में भारत सौभाग्य शाली है किन्तु बिजली के बिना कोई छोटा सा काम भी संभव नहीं और बिजली बनेगी कोयले से भले ही प्रदूषण कितना भी क्यों न हों। भारत का जल भी जहरीला बन गया। सारी मानवीय से लेकर औद्योगिक तक गंदगी नदियों में डालकर अब उस पानी को साफ करके उपयोग करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पृथ्वी तत्व भी लगातार प्रदूषित हो रहा है। रासायनिक खाद से लेकर प्लास्टिक तक को सस्ता किया जा रहा है। कृषि उत्पादन, वन उत्पादन पर टैक्स लगाकर रासायनिक खाद या प्लास्टिक का महत्व बढाया जा रहा है। अग्नि तथा आकाश के प्रदूषण में भारत की गति शेष दुनियां से कुछ कम है। सारी दुनियां जिस तरह रासायनिक हथियार तथा ओजोन परत को नुकसान कर रही है उस मामले में भारत अभी बहुत पीछे अवश्य है किन्तु प्रयत्नशील तो है ही।

एक तरफ पूरे भारत में तेज गति से भौतिक विकास की आवाज उठाई जा रही है तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण के कारण भौतिक विकास में बाधाएं भी पैदा करने का प्रयत्न निरन्तर जारी है। भौतिक विकास की मांग करने वाले और विरोध करने वाले अपने रोजी-रोटी की व्यवस्था कर लेते है और शेष भारत उन धूर्तो से ठगा जाता है। एक धूर्त कहता है सबको जमीन दो तो दूसरा कहता है अधिक से अधिक पेड लगाओं, तीसरा कहता है खेती का रकबा बढाओं और चौथा कहता है गांव-गांव में कुएं और तालाब बने और सिंचाई के साधन हो। एक तरफ आबादी बढने के कारण जमीन की कमी हो रही है तो दूसरी ओर मुसलमानों को मरने के बाद भी जमीन पर कव्जा चाहिये। मैं नही समझता कि ये सभी बैठकर एक साथ तय क्यों नहीं कर लेते कि जमीन का बंटवारा किस तरह हो। जब जमीन बढाई नही जा सकती यह सभी जानते है तो मिल बैठकर निर्णय करने अथवा सुझाव देने के अपेक्षा मांग करने का औचित्य क्या है? एक सामाजिक शुभचिंतक भारत को अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न बनने की मांग करता है तो दूसरा वैसा ही शुभचिंतक भारत को हिंसक शास्त्रों से दूर रहने की बात भी करता है ऐसे विपरित विचारों के लोग पर्यावरण के लिये सबसे बडी समस्या है।

सब मानते है कि यदि आबादी बढेगी तो पर्यावरण प्रदूषण बढेगा। यदि भौतिक विकास तेज होगा तब भी पर्यावरण प्रदूषण बढेगा लेकिन इनके संतुलन की किसी कोशिश को महत्व नहीं दिया जा रहा है। आबादी वृद्धि की बात छोड दीजिए। आबादी का घनत्व भी शहरों की ओर बढाकर लगातार असंतुलित किया जा रहा है किन्तु इस विषय पर आज तक भारत में कोई समाधान नहीं खोजा गया।

भारत में चार प्रकार की समस्याएं है। 1. व्यक्तिगत 2. सामाजिक 3. आर्थिक और 4. राजनैतिक। व्यक्तिगत समस्याओं का एक मात्र समाधान अपराध नियंत्रण की गारंटी से है, जो राज्य को देना चाहिए। सामाजिक समस्याओं का एक मात्र समाधान समान नागरिक संहिता है। इसी तरह राजनैतिक समस्याओं का एक मात्र समाधान लोक स्वराज्य प्रणाली से है। हम वर्तमान समय में पर्यावरण की समस्याओं की चिंता कर रहे है और पर्यावरण में समस्याओं की वृद्धि का मुख्य कारण तीव्र भौतिक विकास है।

इसका समाधान आर्थिक ही हो सकता है और भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का एक-मात्र समाधान है, कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि। आश्चर्य व दुख होता है कि जब भी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की बात आती है तब सभी पेशेवर, पर्यावरणवादी, मानवाधिकारवादी और अन्य एक जुट होकर इस मांग का विरोध करते है। यदि कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि हो गयी तो भौतिक विकास की गति भी अपने आप बढ जायेगी और पर्यावरण भी अपने आप ठीक हो जायेगा। शहरी आबादी कम हो जायेगी वातावरण में जहर नहीं घुलेगा। पानी अशुद्ध नहीं होगा लेकिन पेशेवर पर्यावरणवादियों की दुकानदारी बंद हो जायेगी क्योंकि उन्हें गांव में जाकर पेड़ लगाने पड़ेंगे । खेती करनी पड़ेगी अथवा कोई अन्य व्यवसाय करना पड़ जायेगा।

यदि किसी परिवार में पारिवारिक वातावरण प्रदूषित है और वह परिवार चिन्ता नहीं कर रहा है तो उसकी चिंता पूरे समाज को क्यों करनी चाहिए। जब तक वह समस्या गांव की न हो तब तक गांव को चिंता नहीं करनी चाहिए। यहाॅ तो स्थिति यह हो गई है कि जो काम नगरपालिका और नगर निगम को करना चाहिए वह काम भी सुप्रीम कोर्ट करने लगा है। किसी शहर में किसी मकान की उंचाई कितनी हो यह उसी शहर पर क्यो न छोड दिया जाये? क्यों उसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप करे? ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से असंतुलन पैदा होता है। किसी नदी का पानी गंदा है तो उस गंदगी की चिंता उस नदी का पानी उपयोंग करने वाले मिलकर बैठकर करे और या तो साफ करने की व्यवस्था करे या गंदा करने वालो पर रोक लगावे। यह चिंता करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। पेशेवर पर्यावरण वादी ऐसे मामलों में न्यायालय को घसीटते है और न्यायालय को भी अपना आवश्यक काम छोडकर ऐसा करने में आनंद आता है।

मैं मानता हूॅ कि आकाश, जल, अग्नि पृथ्वी और हवा का प्रदूषित होना एक बहुत बढी समस्या है। इसका मानव जीवन पर दूरगामी प्रभाव पडेगा। किन्तु मैं यह भी समझता हूॅ कि इस प्राकृतिक संकट की तुुलना में मानव स्वभाव में ताप और स्वार्थ वृद्धि कई गुना बडी समस्या है। मानव स्वभाव तापवृद्धि इस प्रकार के पर्यावरणीय संकट में भी एक बडी भूमिका निभाती है। मानव स्वभाव तापवृद्धि हथियारों के संग्रह का भी एक प्रमुख कारण है। दुर्भाग्य से जितनी चर्चा ओजोन परत, बढते तापमान, वायु और जल प्रदूषण की हो रही है उसका एक छोटा सा हिस्सा भी मानव स्वभाव मे बढते आक्रोश ओर स्वार्थ के समाधान के लिये नहीं हो रहा। दिल्ली में वायु प्र्रदूषण रूके इसके लिये सुप्रीम कोर्ट बहुत चिंतित है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज तक यह चिंता नहीं की कि दिल्ली के लोगो में इतनी तेजी से हिंसा और स्वार्थ के प्रति आकर्षण क्यों बढ रहा है। क्यों दिल्ली की आबादी इतनी तेजी से बढ रही है और क्यों इतनी प्रदूषित वायु होते हुये भी भारत के लोग भाग-भाग कर दिल्ली आ रहे है। हमारे पर्यावरण की चिंता करने वाले सारे भारत को पानी बचाओं बिजली बचाओं का संदेश देते है तो दिल्ली का वायु प्रदुषण दूर करने के लिये सडकों और पेडों पर जल छिडकाव की व्यवस्था की जाती है। क्यों ऐसा प्रदूषित वातावरण बन गया है कि जहाॅ शुद्ध हवा है वहाॅ से भागकर लोग गंदी जगह में आ रहे है और उस गंदी हवा को साफ करने के लिय मुख्य सकडों के बीचोबीच पेड लगाने का नाटक कर रहे है। पर्यावरण प्रदूषण के लिये इतना नाटक ओर ढोंग करने की अपेक्षा क्यों नहीं कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि कर दी जाये कि शहरों की आबादी अपने आप कम हो जायेगी और न रहेगा बाँस न बजेगी बांसुरी।

मैं तो इस मत का हूँ कि भारत की पर्यावरण संबंधी सभी समस्याओं के समाधान में कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है ओैर इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। पर्यावरण का बढता प्रदूषण मानव अस्तित्व के लिये एक गंभीर संकट है। इसके समाधान के चौतरफा प्रयास करने होंगे। विकास की प्रतिस्पर्धा और संतुष्टि के बीच तथा भावना और बु़िद्ध के बीच समन्वय करना होगा। पर्यावरण को प्रदूषित करके उसे साफ करने की अपेक्षा प्रदूषण बढाने वालों के प्रयत्नों को निरूत्साहित करना होगा। पर्यावरण प्रदूषण कम करने का सारा दायित्व सरकारों पर न छोडकर उसमें जन जन से लेकर स्थानीय संख्याओं की सहभागिता जोडनी होगी। शहरी आबादी वृद्धि एक बडी समस्या है। उसका समाधान करना ही होगा। प्लास्टिक तथा कृत्रिम उर्जा की इस सीमा तक मूल्य वृद्धि करनी होगी कि इनका उपयोग निरूत्साहित हो। पेशेवर पर्यावरणवादियों को सिर्फ रोजगार से हटकर प्रदूषण कम करने की दिशा में वास्तविक सक्रियता की दिशा में प्रेरित करना होगा।

पर्यावरण प्रदूषण कोई प्राकृतिक समस्या न होकर मानवीय समस्या है। छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलाव इस समस्या से मुक्ति दिला सकते हैं।

मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 19, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः

1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;
2. धर्म शब्द के अनेक अर्थ प्रचलित है। व्यक्ति के दुसरों के हित में किये जाने वाले निस्वार्थ कार्य को भी धर्म कहते है तो समाज को उचित मार्गदर्शन करने वाली प्रणाली भी धर्म कही जाती है;
3. धर्म के दस लक्षणों में ईश्वर अथवा कोई पूजा पद्धति शामिल नहीं है। धर्म गुण प्रधान जीवन पद्धति हैं तो सम्प्रदाय संख्या विस्तार प्रधान संगठन होता है;
4. हिन्दु विचार तर्क और श्रद्धा के समन्वय से आगे बढता है, ईसाई प्रेम, सेवा, करूणा, सहायता और सदभाव से और इस्लाम संगठन शक्ति से;
5. धर्म जीवन पद्धति है सम्प्रदाय संख्या विस्तार। धर्म में न्याय प्रधान होता है सम्प्रदाय में अपनत्व प्र्रधान। धर्म का चरित्र संस्थागत होता है सम्प्रदाय का संगठनात्मक;
6. धर्म कर्तव्य प्रधान होता है सम्प्रदाय अधिकार प्रधान, धर्म समाज व्यवस्था का सहयोगी होता है सम्प्रदाय समाज का सहभागी;
7. धर्म किसी विचार अथवा धर्मग्रन्थ को अतिंम सत्य नहीं मानता, देश काल परिस्थिति अनुसार संशोधन सम्भव है। सम्प्रदाय में संशोधन सम्भव नहीं है;
8. धर्म का न कोई प्रारम्भकर्ता होता है न कोई प्रारंभिक समय। धर्म शास्वत चलता है। सम्प्रदाय किसी व्यक्ति अथवा किसी धर्म ग्रन्थ द्वारा किसी खास समय से शुरू होता है;
9. धर्म व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता देता है, सम्प्रदाय ऐसी मान्यता नही देता। सम्प्रदाय व्यक्ति को अपनी संगठनात्मक सम्पत्ति मानता है;
10. धर्म में अनुशासन अनिवार्य नही है और विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सम्प्रदाय में अनुशासन भी अनिवार्य है और वैचारिक स्वतंत्रता भी नहीं है;
11. धर्म समाज को सर्वोच्च मानता है और राज्य का मार्ग दर्शन करता है। सम्प्रदाय संगठन को सर्वोच्च मानता है और राज्य पर नियंत्रण करता है;
12. धर्म का मूल स्रोत दर्शन है तो सम्प्रदाय का संस्कृति। हिन्दु धर्म का अधिकांश आज भी दर्शन को महत्व देता है तो इस्लाम में दर्शन को महत्व देने वाले सूफी लगातार कमजोर किये जा रहे हैं। ईसाईयत में लगभग बीच की स्थिति है;
13. धर्म में आस्था पर विज्ञान भारी होता है। परिस्थिति अनुसार आस्था में संशोधन संभव है। सम्प्रदाय में आस्था विज्ञान पर भारी होती है और आस्था में संशोधन संभव नही है;
14. धर्म के नाम पर पूरी दुनियां में सम्प्रदायों ने जितनी हिंसा और अत्याचार किये है उतना अपराधियोें ने भी नहीं किये।

सम्प्रदाय का तो अर्थ कठिन नहीं किन्तु धर्म की व्याख्या बहुत कठिन हेै। धर्म के अनेक अर्थ हैैं। धर्म के अर्थ परम्परागत भी होते हैं और शास्त्र सम्मत भी। धर्म का अर्थ व्यक्तिगत, पारिवारिक या राष्ट्र के लिये किये जाने वाले कर्तव्य से भी जुड सकता है तो सम्पूर्ण मानव समाज से भी। धर्म वर्ण आश्रम व्यवस्था के परिपालन से भी जुड सकता है। यही कारण है कि धर्म का कोई निश्चित अर्थ नहीं निकल पाता और सम्प्रदाय भी धर्म शब्द के साथ स्वयं को जोडने में सफल हो जाता है।

वर्तमान दुनियां में हम पिछले तीन हजार वर्षो की समीक्षा करे तो दो ही धर्म सनातन दिखते है एक आर्य सनातन हिन्दू जीवन पद्धति दूसरा पाश्चात्य व यहूदी जीवन पद्धति। हिन्दू जीवन पद्धति से कुछ संगठन निकलकर तेजी से बढे जो प्रारम्भ में संगठन रहे, जब उनका विस्तार कई वर्षो तक जारी रहा तब वे सम्प्रदाय कहे जाने लगे और ऐसे सम्प्रदाय जब कई हजार वर्षो तक विस्तार करते रहे तो उन्होंने अपने को धर्म कहना शुरू कर दिया। ऐसे सम्प्रदायों में ही जैन, बौद्ध अथवा सिख माने जाते है। इसी तरह की प्रक्रिया यहूदियों में भी दोहरायी गयी और कालांतर से उसी तरह ईसाई और इस्लाम नामक सम्प्रदाय धर्म के रूप में आगे आये। हिन्दू और यहूदी मान्यताएं अलग-अलग प्रवृत्तियों में समन्वय को महत्व देती थी और सम्प्रदाय समन्वय की जगह किसी एक दिशा को अधिक महत्व देने लगे। जैन और बौद्ध ने अहिंसा को अधिक महत्व दिया तो सिखों ने हिंसा को, उसी तरह ईसाईयों ने अंहिसा को अधिक महत्व दिया तो इस्लाम ने हिंसा को। इन विपरित विचारधाराओं के वैचारिक टकराव ने हिन्दू और यहूदियों की धार्मिक समन्वय की नीतियों को गंभीर क्षति पहुॅचायी। गुण प्रधान धर्म कमजोर होता गया और संगठन प्रधान धर्म मजबूत होता रहा।

ऐसे ही कालखण्ड में एक नये धर्मविहीन संगठन का ’साम्यवाद’ के नाम से उदय एवं प्रवेश हुआ। उसने वर्ग संघर्ष और ईश्या, द्वेष को मुख्य आधार बनाकर बहुत तेजी से विस्तार किया। यद्यपि उतनी ही तेजी से साम्यवाद का पतन भी हुआ और वह संगठन से आगे बढकर धर्म का नाम ग्रहण नहीं कर सका। आज मजबूरी में साम्यवाद यहूदियों के इस्लाम और हिन्दुओं के गांधीवाद का सहारा लेकर अपना अस्तिव बचा रहा है।

पूरी दुनियां में धर्म और सम्प्रदाय इतने समानार्थी हो गये है कि दोनों के बीच अंतर करना ही कठिन हो गया है। गुण प्रधान धर्म संकट में है और संगठन प्रधान सम्प्रदाय समाज से लेकर राज्य व्यवस्था तक में धर्म के नाम पर स्थापित हो गया है। भारत की स्थिति तो और भी जटिल है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर भारत में सम्प्रदायों ने हिन्दुत्व प्रधान धर्म व्यवस्था को ही संकट में डालना शुरू कर दिया है। यदि धर्म का अर्थ गुण प्रधान है तो कोई भी राजनीतिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती। किन्तु यदि धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक संगठन से जुडा हो, पूजा पद्धति अथवा किसी संस्कृति को आधार मानता हो तो उस आधार पर राज्य व्यवस्था को पूरी तरह ही धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये। धर्म के दोनों विपरीत अर्थ यह निष्कर्ष नही निकलने देते कि राज्य को धर्मप्रधान होना चाहिए अथवा धर्मनिरपेक्ष। यह टकराव लम्बे समय से जारी है और अब वास्तविक धर्म के समक्ष संकट के रूप में खडा है। साम्प्रदायिक समूह आपस में एक-दूसरे से हिंसा टकराव करते है और परिणाम स्वरूप बीच मे रहने वाले वास्तविक धार्मिक लोग उसका नुकसान उठाते है। परिणामस्वरूप गुण प्रधान धर्म कमजोर होता है और साम्प्रदायिकता मजबूत।

वर्तमान दुनियां में इस्लाम सर्वाधिक खतरनाक सम्प्रदाय के रूप में चिन्हित हो रहा है। सूफी सरीखे धार्मिक मान्यता वाले संत किनारे किये जा रहे हैं। इस्लाम की धार्मिक पांच प्रतिबद्धताओं की जगह विवादास्पद साम्प्रदायिक प्राथमिकताएं मजबूत हो रही हैं। हिन्दू धर्म वाले भी असमंजस के शिकार हैं कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये संघ परिवार की बात मानकर संगठनात्मक साम्प्रदायिकता के मार्ग की ओर बढ जावें अथवा गुण प्रधान हिन्दुत्व के मार्ग पर चलते हुए संगठनात्मक इस्लाम से मुक्ति के प्रयत्न को मजबूत करें। जिस तरह संगठित इस्लाम की आशा की एकमात्र किरण चीन ने इनके खिलाफ अमानवीय कदम उठाये हैं तथा जिस तरह सारी दुनियां में संगठित इस्लाम के समक्ष धार्मिक मार्ग पर लौटने या समाप्त होने का स्पष्ट विकल्प दिखने लगा है उससे स्पष्ट दिखता है कि गुण प्रधान हिन्दुत्व को धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिये। वैसे भी हिन्दुओं के सामान्य जनजीवन में सहजीवन का धार्मिक पाठ इतने अन्दर तक प्रवाहित है कि उन्हें बदलना आसान नहीं। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं को अपनी सनातन धर्म की विचार धारा को छोडकर साम्प्रदायिक होने की जल्दबाजी क्यों करनी चाहिये? अच्छा होगा कि हम साम्प्रदायिकता के विरूद्ध जारी विश्वव्यापी प्रयत्नों के साथ तालमेल करें।

फिर भी सतर्कता आवश्यक है। अब तक मानवता के नाम पर साम्प्रदायिकता के खतरनाक सांपों को दूध पिलाया गया उन्हें अब जहर देने की जरूरत है। जो साम्प्रदायिक तत्व किसी संकट के कारण विदेशों से भारत का रूख करते हैं वैसे धर्म विरोधियों से मानवता का व्यवहार कैसा? सरकारों को मजबूर किया जाये कि वे अब पुनः वैसी भूल न करें।

धर्म एक पवित्र शब्द है जिसे साम्प्रदायिकता ने कलंकित कर दिया है। साम्प्रदायिकता से मुक्ति भारत के प्रमुख लक्ष्य में से एक होना चाहिये। मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जिस तरह धार्मिक हिन्दुत्व के समक्ष असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है उससे मुक्ति के किये भारत सरकार को तत्काल पहल करनी चाहिये।

1. सम्पूर्ण भारतीय संविधान से धर्म शब्द को निकालकर समान नागरिक संहिता लागू कर देना चाहिये। राज्य के समक्ष व्यक्ति एक इकाई हो। कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक न हो;
2. धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों को दण्डनीय अपराध घोषित किया जाये;
3. जो मुसलमान संगठनात्मक इस्लाम से हटकर धार्मिक इस्लाम की ओर बढें उन्हें सम्पूर्ण संरक्षण दिया जाना चाहिये;
4. विदेशों से चोरी छिपे आये लोगों को अमानवीय तरीके से भारत से बाहर करके दुनियां को स्पष्ट संदेश दिया जाये कि भारत मानवता के नाम पर अपने सहजीवन को खतरे में नहीं डाल सकता।

जो मित्र धैर्य छोडने की बात कर रहे है उनसे मेरा निवेदन है कि वे अपना धर्म छोडने की गलती करने की अपेक्षा साम्प्रदायिक तत्वों को साम्प्रदायिकता छोडने के लिये मजबूर करने हेतु राज्य को प्रेरित करें। जिस तरह राहुल, ममता, अखिलेश ने हिन्दुत्व के पक्ष में यू टर्न लिया है उससे आशा की किरण मजबूत होती है कि धर्म की जडे पाताल तक हैं और रहेंगी।

मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 15, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ निष्कर्ष हैं।
1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;
2. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की उपलब्धियां सीमित होती हैं। मार्गदर्शक की सीमा सर्वोच्च सम्मान तक, रक्षक की सर्वोच्च शक्ति तक, पालक की सर्वोच्च सुविधा एवं धन संपत्ति तक तथा सेवक की सर्वोच्च सुख तक होती हैं;
3. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्तियां भी अलग-अलग होती हैं। मार्गदर्शक अर्थात ब्राह्मण मर सकता हैं मार नहीं सकता, हृदय परिवर्तन कर सकता हैं डरा नहीं सकता, सत्य छुपा सकता हैं किन्तु झूठ नहीं बोल सकता;
4. आदर्श वर्ण व्यवस्था में रक्षक अर्थात क्षत्रिय कूटनीति का प्रयोग कर सकता हैं बल प्रयोग कर सकता हैं किन्तु उपदेश अथवा प्रवचन नहीं दे सकता। मरने और मारने के लिये तैयार होता हैं;
5. आदर्श वर्ण व्यवस्था में पालक अर्थात वैश्य जनहित में सच छुपा भी सकता हैं और झूठ भी बोल सकता हैं। मरने से भी बचेगा और मारने से भी बचेगा। लालच दे सकता हैं शत्रु को धोखा भी दे सकता हैं किन्तु प्रवचन उपदेश अथवा डर भय नहीं दिखा सकता;
6. वर्तमान भारतीय राजनीति में कोई अच्छा व्यक्ति चुनाव में नहीं जीत सकता। यदि अपवाद स्वरूप जीत भी गया तो अच्छा नहीं रहेंगा और यदि कोई फिर भी अच्छा रह गया तो जल्दी ही निकाल दिया जायेगा;
7. नीति निर्धारण में विचार महत्वपूर्ण होते हैं चरित्र नहीं। क्रियान्वन में चरित्र का महत्व हैं विचारों का नही;
8. जो कुछ पुराना हैं वह सब सही हैं अथवा जो कुछ पुराना हैं सब गलत हैं ऐसी धारणा उचित नहीं हैं अतिवादी लोग ऐसी धारणा बनाकर उसे स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं;
9. भारत की प्राचीन राजतंत्र प्रणाली आदर्श नहीं हैं, राजतंत्र या तानाशाही की तुलना में लोकतंत्र अधिक अच्छा हैं किन्तु अपर्याप्त और असफल हैं। लोकतंत्र की जगह लोक स्वराज अधिक अच्छी प्रणाली हैं;
10. प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को अधिक सम्मान प्राप्त था। मध्यकाल में राजषक्ति और धनशक्ति ने ज्ञान और त्याग को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। दस वर्ष पूर्व तक भारत में गुण्डा शक्ति सर्वोच्च स्थान पर थी जो अब कमजोर हो रही हैं;
11. व्यवसाय के माध्यम से तीन प्रकार के लोग आगे बढते हैंः-1. जो सेवा के उद्देश्य से बिना लाभ-हानि के लागत मूल्य पर व्यापार करते हैं 2. जो उचित लाभ लेकर तथा नैतिकता के आधार पर व्यापार करते हैं 3. जो मिलावट और कमतौल के माध्यम से अनैतिक व्यापार करते हैं।

राजनीति में भी तीनों प्रकार के लोग होते हैं। कुछ लोग बिना लाभ-हानि के राजनीति करते हैं। कुछ लोग भ्रष्टाचार की राजनीति करते हैं तो कुछ लोग राजनीति में हत्या, डकैती जैसे अपराधों का भी सहारा लेते हैं। भारतीय राजनीति में वर्तमान समय मे तीसरे प्रकार के लोग अधिक आगे बढते देखे गये हैं। पहले प्रकार के लोगों की असफलता को देखकर अब राजनीति में अच्छे लोगों का आकर्षण खत्म हो गया हैं क्योंकि व्यापार और राजनीति अथवा धन और सत्ता का पूरी तरह घालमेल हो गया हैं। सत्ता धन के साथ सामंजस्य बिठाकर चल रही हैं तो पूंजीपति भी सत्ता को अपने हाथ में रखने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।

भ्रष्टाचार करना राजनेताओं की कुछ मजबूरी भी बन गया हैं। चुनाव में बेतहाशा खर्च करना पडता हैं। कार्यकर्ता आधारित चुनाव व्यवस्था होने के कारण कार्यकर्ताओं को भी खुश रखना पडता हैं। उन पर खर्च भी करना पडता हैं और उनके अवैध कार्य को संरक्षण देना भी मजबूरी बन गया हैं। परिवार, रिश्तेदार और मित्र भी बहुत अपेक्षा रखते हैं। इसलिये बिरले लोग ही स्वयं को भ्रष्टाचार से मुक्त रख पाते हैं। मैंने स्वयं देखा हैं कि चालीस वर्ष पूर्व जब मैं राजनीति में अच्छे पदों पर था तब मेरे साथ सक्रिय साथियों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। हमारे जिले के लोग विकास में बहुत पीछे होते हुए भी संतुष्ट थे। फिर भी हमारे सब साथी पूरी तरह ईमानदार रहे। आज उसी तरह के राजनीतिक पद रखने वालों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हैं क्षेत्र भी बहुत विकसित हुआ हैं फिर भी शायद ही कोई ईमानदार हो। यहाॅ तक कि पार्टी के लिये बेइमानी करने को ईमानदारी ही माना जाता हैं किन्तु ऐसा भी व्यक्ति मिलना मुश्किल हैं। बाद मे मैनें स्वयं प्रयोग किया और रामानुजगंज शहर का नगरपालिका अध्यक्ष बना तब मेरे सामने भी ऐसी ही मजबूरी आयी मैंने भी अपने मतदाताओं से सलाह लेकर दस प्रतिशत भ्रष्टाचार की छूट प्रदान की। सोचा जा सकता हैं कि राजनेताओं के सामने भी कुछ मजबूरियाॅ हैं और मतदाताओं के सामने भी। यदि किसी साधारण भ्रष्ट को किसी तरह हटने के लिये सहमत भी कर लिया जाये तो आगे आने वाला उससे कई गुना अधिक भ्रष्ट होना निष्चित दिखता हैं। ऐसे में मतदाता के पास क्या विकल्प हैं।

मैंने सन 55 से 84 तक पच्चीसों बार चुनावों का संचालन किया हैं और हर चुनाव में मतदाताओं को पैसा, शराब अथवा अन्य किसी प्रकार से उपकृत करना पडा हैं। मैंने तो एक बार मतदाताओं को सलाह दी थी कि यदि राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं तो आप किसी अच्छे या कम भ्रष्ट को प्राथमिकता दे। यदि ऐसा न हो तो ऐसा कोई चुने जो आपका अच्छा परिचित हो और सुख-दुख के समय में काम आ सके और फिर भी कोई नही हैं तो तत्काल जो भी मिले तो वह ले लेना कोई अपराध नहीं हैं क्योंकि जब राजनीति व्यवसाय हैं तब मुफ्त में वोट देने की मूर्खता क्यों की जाये। इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि किसी अपराधी या हत्यारें को किसी भी परिस्थिति में वोट न दिया जाये। वोट की सौदेबाजी कोई गलत कार्य नहीं हैं।

मेरे विचार से भारत की राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं और सबसे खतरनाक इसका अपराधीकरण की तरफ बढना हैं। अपराध मुक्त करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं फिर भी यह स्थिति आदर्श नही हैं और इसे पूरी तरह बदलना चाहिये। जो लोग मतदाताओं को बदलना चाहते हैं वे भी कहीं न कही नासमझ हैं जो लोग राजनेताओं को बदलना चाहते हैं वे भी या तो ढोंग कर रहैं हैं या गलती। न मतदाता बदल सकता हैं न ही राजनेता। हमें तो पूरी राजनीति को बदलना पडेगा और जब तक पावर इकठ्ठा होता रहेगा तब तक राजनीति का व्यवसायीकरण नहीं रोका जा सकता। यदि राजनेताओं की संवैधानिक शक्ति विकेन्द्रित हो जाये तो सारी समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता हैं न राजनेताओं को सुधारना पडेगा और न मतदाताओं को। इसलिये मेरा मत हैं कि हमे अन्य सब कार्य छोडकर राजनीतिक सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की दिशा में आगे बढना चाहिये।

राजनीति बन गयी तवायफ नेता हुये दलाल,

ऐसे में क्या होगा भैया इस समाज का हाल,

संसद को एक पलंग समझ कर उस पर शयन किया

संविधान को मानकर चादर खींचा ओढ़ लिया

अब तक हमने बहुत सहा अब सहेंगे नहीं हम, चुप रहेंगे नहीं चादर हटा देंगे हम, सब कुछ दिखा देंगे हम, कचरा जला देंगे हम !!!!!

मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि

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कुछ निष्कर्ष है।
1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है;
2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनैतिक है न करने योग्य कार्य करना अपराध होता है;
3. प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यवस्था से संचालित होता है और व्यवस्था व्यक्ति समूह से जिस समूह में वह स्वयं शामिल होता है;
4. व्यवस्था पारिवारिक, समाजिक तथा राजनीतिक होती है। तीनों व्यवस्थायें अगल-अगल होते हुये भी एक-दूसरे की पूरक होती है;
5. स्वतंत्रता, अनुशासन और शासन का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत होती है, किसी अन्य से जुडते ही वह अनुशासन में बंध जाती है। स्वतंत्रता शासन व्यवस्था से बाध्य होती है;
6. प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वभाव होता है कि वह स्वयं दूसरों से अधिकाधिक स्वतंत्रता चाहता है और दूसरों को कम से कम स्वतंत्रता देना चाहता है;
7. सारी दुनियां में व्यवस्था का केन्द्रीयकरण हो रहा है। राजनीतिक सत्ता समाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले रही है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी संकुचित होती जा रही है;
8. परंपरागत परिवार व्यवस्था दोषपूर्ण है उससे व्यक्ति पर व्यवस्था का अनुशासन तो है किन्तु व्यवस्था पर व्यक्ति समूह का नियंत्रण नहीं है;
9. साम्यवादी तथा इस्लामिक व्यवस्थायें व्यक्ति को स्वतंत्रता को न मानने के कारण त्यागने योग्य है। भारतीय परिवार व्यवस्था संशोधन योग्य है और लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुकरणीय है;
10. व्यवस्था से चरित्र बनता है। चरित्र से व्यवस्था नही। जो लोग व्यवस्था में चरित्र को महत्वपूर्ण मानते है वे गलत है क्योंकि व्यवस्था व्यक्ति से नहीं व्यवस्था से व्यक्ति संचालित होता है;
11. नीति निमार्ण में विचार महत्वपूर्ण होता है और क्रियान्वय में चरित्र की भूमिका प्रमुख होती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति-निमार्ण विधायिका का और क्रियान्वन कार्यपालिका का कार्य माना जाता है;
12. संघ परिवार चरित्र को हर मामले में महत्वपूर्ण मानता है तो साम्यवाद किसी मामले में चरित्र को महत्वपूर्ण नहीं मानता मेरे विचार से दोनो गलत है;
13. यदि व्यवस्था ठीक हो तो हमें चरित्र निमार्ण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये यदि अव्यवस्था या कुव्यवस्था हो तो चरित्र निमार्ण को रोक कर व्यवस्था परिवर्तन का कार्य करना चाहिये;
14. यदि अपराध अनियंत्रित हो तो शराब, जुआ, वैश्यावृत्ति जैसे अनैतिक कार्यो करने वालों से दूरी घटा लेनी चाहिये। चरित्र निमार्ण के प्रयत्न घातक होते है;
15. यदि गाडी का ड्राइवर गलत हो तब भी अव्यवस्था होगी और गाडी खराब हो तो भी। वर्तमान समय में व्यवस्था रूपी गाडी ही गडबड है इसलिये गाडी ठीक करना आवश्यक है।
16. क्या करना चाहिये इसका निर्णय व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता है। न करने योग्य कार्य करने से रोकने का काम व्यवस्था का है। चरित्र व्यक्तिगत होता है और व्यवस्था सामुहिक होती है;

वैसे तो सारे विश्व की ही व्यवस्था गडबड है क्योंकि जब तक साम्यवाद और इस्लाम से व्यवस्था मुक्त नहीं होती तब तक व्यवस्था में सुधार सम्भव नहीं। सौभाग्य से भारत की व्यवस्था इन दोनों से बहुत कम प्रभावित है फिर भी पिछले समय में जो अव्यवस्था विकसित हुयी है उसे व्यवस्था परिवर्तन से ही सुधारा जा सफल है चरित्र निमार्ण से नहीं। क्योंकि तानाशाही में चरित्र से व्यवस्था सुधरती है और लोकतंत्र में व्यवस्था से चरित्र सुधरता है। भारत सैकडो वर्षो तक गुलाम रहने के कारण व्यक्ति के नेतृत्व से व्यवस्था के संचालन का अभयस्त हो गया है जो उचित नहीं है। व्यवस्था निरंतर प्रभावहीन होती जा रही है दूसरी ओर अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, संघ परिवार, गायत्री परिवार या आर्य समाज पूरी ईमानदारी और सक्रीयता से चरित्र निमार्ण के कार्य में लगे हुये है किन्तु औसत चरित्र गिरता जा रहा है क्योंकि व्यवस्था दोषपूर्ण है और जितनी गति से चरित्र निमार्ण हो रहा है उसकी तुलना में कई गुना अधिक चरित्रपतन राजनीतिक व्यवस्था कर रही है। कुल मिलाकर चरित्र गिर रहा है किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हम व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को नहीं समझ पा रहे है। व्यवस्था में भी पारिवारिक आर्थिक, समाजिक व्यवस्था को राजनीतिक व्यवस्था ने इतना गुलाम बना लिया है कि सब प्रकार की व्यवस्थाये राजनीतिक अव्यवस्था से प्रभावित हो रही है। राजनीतिक व्यवस्था को ठीक किये बिना चरित्र पतन रूक नही सकता भले ही हम चरित्र निमार्ण द्वारा आंशिक रूप से उस पतन को गति को कम कर सके। इसके बाद भी व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को न समझकर चरित्र निमार्ण पर अधिकतम शक्ति लगाना ना समझी का कार्य है जो हम लगातार किये जा रहे है। राजनीतिक व्यवस्था में भी हमने कई बार ड्राइवर बदलने का प्रयास किया किन्तु गाडी आगे बढकर पीछे ही जा रही है क्योंकि हम समझ ही नहीं रहे है कि गाडी खराब है ड्राइवर नहीं।

आवश्यकता इस बात की है कि महत्वपूर्ण लोगो को चरित्र निमार्ण की तुलना में व्यवस्था परिवर्तन पर अधिक शक्ति लगानी चाहिये और समझना चाहिये कि लोकतंत्र में चरित्र से व्यवस्था नहीं बल्कि व्यवस्था से चरित्र बनता है। जब यह अंतिम सत्य है कि व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति समूह अर्थात समाज होता है तब हम उल्टी दिशा में चलकर समाज के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति का प्रयोग क्यों करें। उचित होगा कि इस वर्तमान प्रणाली को पलटकर व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था और व्यवस्था के उपर समाज का प्रयोग करें।

मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 6, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-
1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है;
2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगाकर कमजोर लोगों को कर मुक्त करना चाहिये। वर्तमान समय में इसका उल्टा हो रहा है;
3. आर्थिक विषमता बहुत बडी समस्या होती है। आर्थिक विषमता को कम किया जाना चाहिये;
4. हजारों वर्षों से बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे और उनका लाभ उठाया। वर्तमान भारत में भी बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम शोषण के नये-नये तरीके खोजे जा रहे है।
5. राज्य को सिर्फ सुरक्षा और न्याय तक सीमित रहना चाहिये राज्य को कभी समाज सुधार अथवा व्यापार नहीं करना चाहिये;
6. भारत की संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी होनी चाहिये जिस पर संविधान के अतिरिक्त किसी अन्य का नियंत्रण न हो;
7. कोई भी बुद्धिजीवी श्रम के साथ न्याय के प्रयत्न नहीं करता। हर बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध करता है क्योंकि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि श्रम की मांग और श्रम का मूल्य बढाने में सहायक है;
8. सभी प्रकार के कर हटाकर एक सुरक्षा कर होना चाहिये जो सम्पत्ति कर के रूप में हो सकता है;
9. किसी प्रकार की सुविधा के लिये सरकार को फीस लेने की व्यवस्था करनी चाहिये, टैक्स नहीं;
10. राज्य की भूमिका सुरक्षा का वातावरण बनाने तक सीमित होती है। सुरक्षित रहना व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है।
11. सुरक्षा में बाधा की स्थिति में राज्य को मुआवजा देना चाहिये। अन्य किसी प्रकार का मुआवजा बंद कर दिया जाये;
12. सुरक्षा का अर्थ सुरक्षित रखना नहीं है बल्कि सुरक्षा की बाधाओं को दूर करना है। राज्य को कभी सुरक्षा नहीं देनी चाहिये बल्कि बाधाओं को दूर करना चाहिये;

भारत में अर्थव्यवस्था पूरी तरह विपरीत दिशा में जा रही है। समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद जैसे दुनियां के अनेक वादों के चक्कर में भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है। समाजवादी और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में सरकारीकरण को मजबूत किया तो पूंजीवाद ने सरकारीकरण को तो कमजोर किया किन्तु आर्थिक असमानता को मजबूत किया। आदर्श स्थिति में अर्थव्यवस्था न तो पूरी तरह सरकार के अधीन होनी चाहिए न ही पूरी तरह बाजार के अधीन।

भारत में एक बडी समस्या श्रम शोषण की है। गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी और कृषि उत्पादन पर भारी कर लगाकर बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, उपभोक्ताओं तथा शहरी लोगों ने आर्थिक विषमता भी बढाई है और श्रम शोषण भी किया है। इन दोनों समस्याओं से निपटना न्याय संगत है। इसके लिए राज्य को अल्पकाल के लिये विषेष प्रवाधान करना चाहिये जिसमें सब प्रकार के कर हटाकर एक कृत्रिम उर्जा कर इस प्रकार लगाया जाये ताकि उसका कोई भी धन सरकारी खजाने में न जाये। बल्कि वह प्रत्येक नागरिक में इस तरह बराबर-बराबर बाँट दिया जाये जिसके परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढे, शहरी आबादी घटे, कृत्रिम उर्जा का उपयोग नियंत्रित हो जाये, विदेशी कर्ज घट जाये, पर्यावरण सुधर जावें। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य भारत में आपातकाल समझ कर ढाई गुना कर दिया जाये तो आर्थिक विषमता भी बहुत कम हो जायेगी अन्य अनेक समस्यायें अपने आप घटेगी।

सरकार का काम न तो सुविधा देना होता है न ही सुरक्षित रखना। सरकार का सिर्फ एक काम होता है अपराध नियंत्रण जिसका अर्थ होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करना। राज्य वर्तमान समय में अपराध नियंत्रण छोडकर हर मामले में हस्तक्षेप करता है। वह व्यक्ति को सुरक्षा देता है और सुविधा भी देता है जो उसका काम नहीं है। इस तरह यदि राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेगा तो राज्य का बजट बहुत कम हो जायेगा और कर भी बहुत कम लगाना पडेगा। राज्य को सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में एक कर लेकर अन्य सारे कर समाप्त कर देना चाहिये। राज्य को पुलिस, सेना और न्याय का बजट सम्पत्ति कर के रूप में पूरा करना चाहिये क्योंकि राज्य प्रत्येक व्यक्ति के जान-माल की सुरक्षा की गांरटी देता है। अन्य किसी प्रकार का होने वाला खर्च फीस के रूप में लिया जा सकता है चाहे शिक्षा और स्वास्थ्य हो अथवा अन्य कोई भी सुविधा।

मैं जानता हूॅ कि भारत का कोई पूंजीपति सम्पत्ति कर से सहमत नहीं होगा भले ही उसे कुछ भी करना पडे। इसी तरह भारत का कोई भी बृद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से भी सहमत नही होगा क्योंकि ये दोनों सुझाव दोनों प्रकार के लोगों अर्थात पूंजीपतियों, बुद्धिजीवियों के लिये घातक है। इस सुझाव के आधार पर आवागमन मंहगा हो जायेगा शहरी उद्योग गांव की ओर चले जायेगें मशीनीकरण घट जायेगा तथा श्रम बहुत मंहगा हो जायेगा जो न कोई बुद्धिजीवी चाहता है न ही पूंजीपति। भारत का हर बुद्धिजीवी गरीबी दूर करने और अमीर-गरीब के बीच टकराव वर्धक सुझाव पर विश्वास करता है लेकिन समाधान की चर्चा नहीं करता है। क्योंकि समाधान उनकी सुविधाओं में कटौती कर देगा और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर प्रष्न चिन्ह खडा करेगा। भारत का हर समाजवादी प्रशासनिक तरीके से आर्थिक समस्याओं के समाधान की बात करता है और किसी भी प्रकार के निजीकरण के विरूद्ध होता है। इसी तरह भारत का हर वामपंथी पूंजीवाद का विरोध करता है, श्रमजीवियों के समर्थन का नाटक करता है, अमीरी रेखा और गरीबी रेखा के लिये आंदोलन करता है, किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि के विरोध में सबसे आगे रहता है क्योंकि समस्या का जीवित रहना ही उसके अस्तित्व के लिये आवश्यक है। सभी राजनैतिक दल आर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान करना चाहते है, आर्थिक नहीं।

मेरा सुझाव है कि 1-राज्य का सारा खर्च सुरक्षा और न्याय तक सीमित करके सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में पूरा किया जाना चाहिये। 2-एक स्वतंत्र अर्थपालिका होनी चाहिये जो राज्य के आय-व्यय की समीक्षा करे और उसका बजट बनावें। 3-श्रम के साथ न्याय हो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये और इसके लिये कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि होनी चाहिये तथा देष का निर्यात इतना अधिक बढाया जाये कि उपभोक्तावाद पर अकुंश लगे और उत्पादक सुखी हो। 4-समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद जैसी बुराईयों से पिंड छुडाकर हमें समाजीकरण की दिशा में बढना चाहिये जिसका अर्थ है प्रत्येक गांव को संवैधानिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वतंत्रता। मेरे विचार से यह सुझाव आदर्श अर्थव्यवस्था के लिये मील का पत्थर बन सकता है।

आदर्श स्थिति तो सम्पूर्ण समाजीकरण ही है जिसमें अन्य मामलों के अतिरिक्त आर्थिक स्वतंत्रता से भी राज्य का हस्तक्षेप समाप्त हो कर समाज का नियंत्रण होना चाहिये किन्तु व्यावहारिक रूप से अभी तत्काल ऐसी संभावना नही है। इस लिये तात्कालिक रूप से हमें ऐसी नीति बनानी चाहिये जिससे आर्थिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप और शक्ति कम होती चली जाये। जो लोग अमीरी या गरीबी रेखा के नाम पर राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने के पक्षधर है वे गलत है। सम्पत्ति कर के नाम पर राज्य को मनमानी करने के अधिकार देना भी उचित नहीं है तथा कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करके राज्य अपना खजाना भरता रहे ऐसी मांग का समर्थन भी करना उचित नहीं है। राज्य के आर्थिक अधिकार समाज नियंत्रित होने चाहिये और राज्य सम्पत्ति कर तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से प्राप्त धन किसी स्वतंत्र अर्थपालिका के निर्देशानुसार खर्च करने को वाध्य हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये। अभी तात्कालिक रूप से अधिकतम निजीकरण का समर्थन और राज्य की शक्तियों का आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप कम होना ही व्यावहारिक दृष्टिकोण होना चाहिये।

मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि

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कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है।
1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये।
2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमजोर तथा धूर्तता को मजबूत करता है।
3 आरक्षण सिर्फ व्यक्ति की प्रवृत्ति के आधार पर दिया जाना चाहिये। कानून का पालन करने वालो को सुरक्षा का आश्वासन ही एक मात्र आरक्षण दिया जाना चाहिये।
4 आरक्षण हमेशा घातक होता है। स्वतंत्रता पूर्व का जातीय अथवा परिवार व्यवस्था मे पुरूषो को प्राप्त सामाजिक आरक्षण भी घातक था और स्वतंत्रता के बाद का संवैधानिक आरक्षण भी घातक है।
5 संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है । आरक्षण उस समानता को अ समान बना देता है।
6 जातीय आरक्षण, महिला आरक्षण, धार्मिक आरक्षण अथवा गरीबी आरक्षण के दुष्परिणाम स्वाभाविक होते है। भारत इन दुष्परिणामो की चपेट मे है।
7 किसी भी प्रकार के अन्य आरक्षण की तुलना मे महिला आरक्षण अधिक घातक है। अन्य आरक्षण समाज को तोडते है और महिला आरक्षण परिवार को ।
8 स्वतंत्रता के पूर्व भी श्रम के विरूद्ध बुद्धिजीवियो ने आरक्षण प्राप्त कर लिया था तथा स्वतंत्रता के बाद भी श्रमजीवियो के खिलाफ बुद्धिजीवियो का आरक्षण जारी रहा । यह आरक्षण अंबेडकेर जी का षणयंत्र था।
9 भारतीय राजनैतिक व्यवस्था मे सबसे अधिक घातक भूमिका अम्बेडकर जी की रही है। उन्होने निरंतर जान बूझकर सत्ता की लालच मे समाज को खंड खंड करने का काम किया ।
10 वर्तमान समय मे सवर्णो द्वारा आरक्षण का विरोध स्वार्थ पूर्ण है, क्योकि वे सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है। महिला आरक्षण धार्मिक आरक्षण आर्थिक आरक्षण का नही करते है।
हजारो वर्षो से पूरी दुनियां मे श्रम शोषण के नये नये तरीके बुद्धिजीवियो द्वारा खोजे जाते रहे है। भारत मे भी यह प्रकृया लम्बे समय से चलती रही है और आज भी जारी है। स्वतंत्रता के पूर्व बुद्धिजीवियो ने जन्म के आधार पर वर्ण और जाति बनाकर श्रमशोषण का रास्ता खोला था। इसी तरह पूरूष प्रधान व्यवस्था भी मजबूत की गई थी । स्वतंत्रता के बाद भी बुद्धिजीवियो का उद्देश्य श्रम शोषण ही रहा किन्तु स्वरूप बदल दिया गया। बुद्धिजीवियो ने अम्बेडकर जी के नेतृत्व मे श्रम के विरूद्ध सफल षणयंत्र किया और सवर्ण बुद्धिजीवी तथा अवर्ण बुद्धिजीवी के बीच समझौता कराकर जातीय आरक्षण का एक नया कानून लागू कर दिया गया। श्रम के प्रति न्याय होता तो श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयत्न होते किन्तु ऐसे प्रयत्नो को रोकते हुए जातीय आरक्षण लागु कर दिया गया। इस आरक्षण को लगातार आज भी जारी रखा जा रहा है। एक नया आरक्षण महिलाओ के नाम से लाने का प्रयत्न हो रहा है। उचित होता कि महिलाओ को पारिवारिक व्यवस्था मे समान भूमिका दे दी जाती तथा परिवार की संपूर्ण सम्पत्ति मे भी बराबर का अधिकार दे दिया जाता। सारे विवाद खत्म हो जाते । किन्तु महिला आरक्षण के नाम पर कुछ न कुछ समस्याओ के विस्तार का षणयंत्र चलता रहता है। हिन्दू मुसलमान के नाम पर भी आरक्षण की आवाज उठती रहती है। यदि सबको समान अधिकार मिल जाता तो यह समस्या पैदा ही नही होती । गरीबो की सहायता के नाम पर भी आर्थिक आरक्षण की बात उठती रहती है। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढा दिया जाता तो गरीब अमीर की खाई अपने आप खत्म हो जाती और श्रम का मूल्य बढ जाता । ग्रामीण उधोग मजबूत हो जाते और शहरी आबादी अपने आप संतुलित हो जाती किन्तु आर्थिक आरक्षण के नाम पर यह षणयंत्र भी अब तक जारी है। भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। क्योकि आरक्षण के नाम पर कमजोरो का शोषण करने का बुद्धिजीवियो को अप्रत्यक्ष लाभ भी होता है तथा साथ ही कमजोरो की मदद करने से उनकी सहानुभूति का प्रत्यक्ष लाभ भी मिलता है । यही कारण है कि भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी रूप मे भीम राव अंबेडकर का प्रशंसक है, क्योकि सब प्रकार के आरक्षण के मार्ग खोलने का पहला श्रेय भीम राव अम्बेडकर को जाता है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी तथा संघ परिवार भी अंबेडकर के प्रशंसक बन गये है।
किसी भी प्रकार का आरक्षण वर्ग विद्वेष का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। वर्ग विद्वेष को योजना पूर्वक बढाया जाता है और उसके दुष्परिणामो से सुरक्षा का ढोंग भी साथ साथ किया जाता है। यदि वर्ग विद्वेष पैदा ही न हो तो किसी प्रकार के समाधान की आवश्यकता ही नही है। किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा धूर्तता और अपराधो का विस्तार करता है। जिस वर्ग को आरक्षण प्राप्त होता है उस वर्ग के धूर्त भिन्न वर्ग के शरीफो का शोषण करने का अधिकार प्राप्त कर लेते है। इस तरह शराफत कमजोर होती जाती है और धूर्तता मजबूत । आज भारत का हर बुुद्धिजीवी अधिक से अधिक चालाक होने का प्रयत्न कर रहा है जिससे वह मजबूतो के शोषण से बच भी सके और कमजोरो का शोषण कर भी सके। व्यवस्था लगातार टूट रही है धूर्तता मजबूत हो रही है।
कुछ लोग जातीय आरक्षण का विरोध कर रहे है। ये लोग सब प्रकार के आरक्षण का विरोध न करके सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है क्योकि स्वतंत्रता के पूर्व उन्हे शोषण का एकाधिकार प्राप्त था । स्वतंत्रता के बाद उस एकाधिकार मे से थोडा सा हिस्सा अवर्णो के खाते मे चला गया। ऐसे लोग समान नागरिक संहिता के लिये कोई आंदोलन नही करते न ही कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि के लिये करते है। ऐसे लोग महिला आरक्षण गरीबो का आरक्षण धार्मिक आरक्षण का भी खुला विरोध नही करते। कुछ लोग हिन्दू राष्ट की मांग करते हे तो कुछ अन्य लोग मुसलमानो का आरक्षण देना चाहते है। अनेक लोग महिला सशक्तिकरण का नारा लगाते है तो अनेक लोग गरीबो को आर्थिक आरक्षण देने की वकालत करते है । जबकि स्पष्ट दिखता है कि किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा घातक होता है । अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है। किसी को भी विशेष अधिकार देते है तो समानता का सिद्धान्त अपने आप खंडित हो जाता है। किसी विशेष स्थिति मे किसी की सहायता की जा सकती है और की जानी चाहिये किन्तु अधिकार किसी को अलग से नही दिये जा सकते ।
मै लम्बे समय से आरक्षण का विरोधी रहा हूॅ और आज भी हॅू । मै अपने व्यक्तिगत जीवन मे प्र्रयत्न करता हॅू कि जो अवर्ण जातीय आरक्षण का समर्थन करते है उन्हे अछूत मानू और उनसे दूरी बनाकर रखूं। इसी तरह जो महिलाएं महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण का समर्थन करती है उन्हे अपने घर मे न घुसने दूं क्योकि वे समाज के लिये गंभीर समस्या है । जो हिन्दू या मुसलमान धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग करते है उनसे भी अधिक से अधिक दूरी बनाकर रखता हॅू। जो लोग गरीब और अमीर के बीच मे समाज को विभाजित करना चाहते है उन्हे भी मै खतरनाक मानता हॅू। मेरे विचार से सब प्रकार के आरक्षण समाप्त करके नयी व्यवस्था शुरू होनी चाहिये, जिसमे 1 समान नागरिक संहिता हो । व्यक्ति एक ईकाई हो। धर्म जाति, गरीब अमीर, महिला पूरूष का भेद न हो। 2 कृत्रिम उर्जा की भारी मुल्य वृद्धि करके सब प्रकार के टैक्स तथा सबसीडी समाप्त कर दी जाये। 3 परिवार की आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्था परंपरागत की जगह लोकतांत्रिक हो । परिवार मे व्यक्ति का सम्पत्ति अधिकार सामूहिक हो और सम्पूर्ण सम्पत्ति मे सिर्फ परिवार छोडते समय उसे बराबर का हिस्सा दिया जाये। इन सब सुधारो मे भी समान नागरिक संहिता तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि विशेष महत्व रखते है। जो बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि या समान नागरिक संहिता का विरोध करते है ऐसे श्रम शोषक बुद्धिजीवियो से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। अंत मे मेरा यह सुझाव है क किसी भी प्रकार के आरक्षण का पूरी तरह विरोध करना चाहिये। मै ऐसे विरोध का पक्षधर हॅू।

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