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ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 13.09.2019 को द्वितीय सत्र
दोपहर होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-27 "वर्ग समन्वय या वर्ग संघर्ष" .......................................................................... कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैंः- 1. शासन दो प्रकार के होते हैं- 1. तानाशाही 2. लोकतंत्र। तानाशाह...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 13.09.2019 को प्रथम सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-26 "भौतिक उन्नति या नैतिक पतन" .....................................…................................. कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1. किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्ति...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 12.09.2019 को द्वितीय सत्र
दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-26 "महिला सशक्तिकरण समस्या या समाधान " .....................................…................................. कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. पति और पत्नी के बीच आपसी संबंधों में प्रायः प...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 12.09.2019 को प्रथम सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-25 "वर्ण-व्यवस्था" .....................................…................................. कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था थी न कि कोई बुराई। 2. वर्ण और जाति अ...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 11.09.2019 को द्वितीय सत्र
दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-24 "वैदिक संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति" ........................................................................ कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. वैदिक धर्मावलम्बी सत्य, ज्ञान, विवे...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 11.09.2019 को प्रथम सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-23 "धर्म और संस्कृति" ....................................................................... कुछ सर्व-स्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. धर्म विज्ञान, विचार और मस्तिष्क से नियंत्रित होता है तो संस्कृति प...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 10.09.2019 को द्वितीय सत्र
दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-22 "व्यक्ति, परिवार और समाज" ........................................................................... कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. परिवार समाज व्यवस्था की पहली जीवंत इकाई है। परिवार स्...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 10.09.2019 को प्रथम सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-21 "संयुक्त परिवार प्रणाली" ................................................................ कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः- 1. मैं यह अनुभव करता हूं समाज व्यवस्था की प्रतिस्पर्धा में भारत क...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-19 "भारत विभाजन भूल या मजबूरी" ........................................................................ ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन को आसानी से समझने मे मदद क...
ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 08.09.2019 को द्वितीय सत्र
सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-18 "अपराध और अपराध नियंत्रण" ............................................................................ कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त/मान्यताएं हैंः- 1. व्यक्ति के मूल अधिकारों के उल्लंघन को अपराध (क...

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 13.09.2019 को द्वितीय सत्र

Posted By: admin on October 16, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दोपहर होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-27 “वर्ग समन्वय या वर्ग संघर्ष”
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कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैंः-
1. शासन दो प्रकार के होते हैं- 1. तानाशाही 2. लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग-निर्माण की जरूरत नहीं पड़ती। तानाशाही में वर्ग-संघर्ष होता ही नहीं है। लोकतंत्र में शासक लोक की एकता से भयभीत रहता है, इसलिये वह लोक को विभिन्न वर्गों में बाँटकर वर्ग-संघर्ष बढाता रहता है। लोकतंत्र भी दो प्रकार का होता है- 1. आदर्श 2. विकृत। भारत आज विकृत लोकतंत्र की श्रेणी में आता है।
2. आदर्श स्थिति में वर्ग दो प्रकार के होते हैं-1. शरीफ 2. अपराधी। विकृत लोकतंत्र में वर्ग दो हो जाते हैं- 1. शासक 2. शासित।
3. वर्ग-संघर्ष के तीन चरण होते हैं-1. वर्ग-निर्माण 2. वर्ग-विद्वेष 3. वर्ग-संघर्ष।
4. यदि किसी भी वर्ग को विशेष अधिकार दिये जाते हैं तो उस वर्ग के धूर्त शक्तिषाली होते हैं तथा विपरीत वर्ग के शरीफों का शोषण करते हैं। इस तरह से संपूर्ण समाज में शरीफ कमजोर और धूर्त मजबूत होते जाते हैं।
5. कमजोरों की मदद करना मजबूतोंका कर्तव्य होता है, कमजोरों का अधिकार नहीं। हर अपराधी और राजनेता अपने स्वार्थ के लिए इसे कमजोरों का अधिकार घोषित करते हैं। यह अधिकार घोषणा ही संघर्ष का मुख्य आधार बनती है।
6. किसी भी वर्ग में सबकी प्रवृत्ति एक समान नहीं होती। कुछ लोग शरीफ होते हैं तो कुछ अपराधी या धूर्त। वर्ग निर्माण धूर्तों तथा अपराधियों का सुरक्षा कवच होता है।
7. हर अपराधी वर्ग-निर्माण में अपनी सुरक्षा देखता है और राजनेता वर्ग-निर्माण के माध्यम से समाज को बाँटकर अपना खतरा कम करते रहते हैं।
8. किसी भी वर्ग का परीक्षण किया जाये तो उसका नेतृत्व कर्ता/विस्तारक या तो कोई अपराधी होता है या नेता।
9. योजनापूर्वक वर्ग-संघर्ष का विस्तार करने वालों को वर्ग-समन्वय की दिशा में मजबूर करना ही एकमात्र मार्ग है।

प्रवृत्ति के आधार पर दुनियां में दो ही वर्ग होते हैं- 1. शरीफ और 2. बदमाश। प्राचीन समय में इन्हें देव और असुर के नाम से जानते थे, जो बाद में मनुष्य और राक्षस तथा और बाद में सामाजिक और समाज विरोधी के नाम से कहे जाने लगे। इन दोनों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता है और चलता रहेगा। न कोई अंतिम रूप से जीत सकता है और न कोई अंतिम रूप से समाप्त होता है।शरीफ लोग अपनी व्यवस्था के लिए वर्ण, जाति, धर्म आदि में आन्तरिक विभाजन करते रहते हैं। दूसरी ओर बदमाश अपने को चोर, डाकू बलात्कारी, हिंसक, आतंकवादी के नाम से मानते हैं। दोनों वर्गों की अलग-अलग पहचान होती है और अलग-अलग गुण-धर्म होते हैं। एक वर्ग का व्यक्ति अपने गुणों में परिवर्तन किए बिना दूसरे वर्ग में शामिल नहीं हो पाता, ना ही उसमे उसकी कोई पहचान होती है। शरीफ लोगों के गुट को समूह कहते हैं, और और बदमाश लोगों के गुट को गिरोह कहते है।

राजनीति का चरित्र होता है कि वह अपने समूह अर्थात शासक वर्ग के लोगों को अधिकाधिक स्वतंत्रता देना चाहती है और दूसरे समूह अर्थात शासित लोगों को अपनी इच्छानुसार चलाना चाहती हैं अर्थात गुलाम बनाकर रखना चाहती है। लोकतंत्र में राजनेता इसके लिए आवश्यक मानते है कि समाज/लोक प्रवृत्ति के आधार पर विभाजित न होकर अन्य आधारों पर इस प्रकार विभाजित हो कि उससे सत्ता को कभी भी चुनौती न मिल सके। इस विभाजन के उद्देश्य से ही राजनीति समाज को अनेक भागों में विभाजित करके उन्हें वर्ग का नाम दे देती है तथा उसे वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्ष तक ले जाती है। यह सारा कार्य सत्ता से जुड़े लोग ही करते हैं क्योंकि इससे समाज को तोड़कर रखने में इनका उद्देश्य पूरा होता रहता है। वर्ग-संघर्ष के लिए मुख्य रूप से आठ आधारों पर काम चल रहा है-1. धर्म 2. जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रीयता 5. उम्र 6. लिंग 7. आर्थिक असमानता 8. उत्पादक-उपभोक्ता।इन आठ के अतिरिक्त भी अन्य नए-नए वर्ग-निर्माण के प्रयास निरंतर किए जा रहे हैं किंतु येआठ आधार ऐसे हैं जिनमें भारत का प्रत्येक राजनैतिक दल समान रूप से सक्रिय है तथा निरंतर अपनी सक्रियता बढ़ाता जा रहा है। ये सभी राजनैतिक दल युवा और वृद्ध तथा महिला और पुरुष के बीच वर्ग-विद्वेष निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं जिससे परिवार व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाए। जहां छः आधारों पर स्थिति वर्ग-संघर्ष तक चली गई है वहीं दो आधारों पर वर्ग-विद्वेष जारी है।इनके अतिरिक्त जो नए वर्गों का निर्माण शुरू हुआ है, उनमें शहर और गांव का नया ’ग्रामीण-शहरी’ वर्ग बनाने का पूरी ईमानदारी से ये राजनैतिक दल प्रयास कर रहे हैं। धीरे-धीरे इसे भी, वर्ग-विद्वेष और वर्ग-संघर्ष तक ये राजनैतिक दल पहुँचाकर ही मानेंगे।

इस वर्ग संघर्ष में हर राजनैतिक दल यह प्रयास करता है कि समाज में न्याय और व्यवस्था के बीच संतुलन कभी न रहे। अर्थात, न्याय की मांग इतनी ज्यादा उठती रहे कि व्यवस्था हमेशा कमजोर होती रहे तथा कमजोर व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर राज्य समाज को गुलाम बनाने के प्रयास करता रहे। मैंने अपने अनुभव से महसूस किया है कि वर्ग-अस्तित्व हमेशा अपराधियों के लिए एक ढाल या कवच के रूप में सुरक्षा का काम करता है।स्वतंत्रता के बाद भारत में अपराध और अपराधी सशक्तिकरण में सर्वाधिक योगदान वर्ग निर्माण, वर्गविद्वेष और वर्ग संघर्ष का ही पाया जाता है। दुनियां जानती है कि वर्ग संघर्ष के विनाशकारी परिणाम हुए हैं। दुनियां में जितने अत्याचार और हत्याएं अपराधियों ने नहीं किये उससे कई गुना अधिक धर्म और राष्ट्र के नाम पर हुई हैं। स्वतंत्रता के पूर्व भी, वर्ग निर्माण नेही भारत को बहुत पीछे ढकेल रखा था। सर्वण-अवर्ण का वैमनस्य जगजाहिर है। पाकिस्तान और भारत का विभाजन भी इसी वर्ग-विद्वेष का परिणाम रहा है। इन सबको देखते हुए भी हमारे भारत के राजनेता वर्ग-संघर्ष को निरंतर बढ़ावा देते रहते हैं। दिल्ली में राजघाट पर एक बोर्ड लगा है जिसमें लिखा है ’महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है।’ आज तक किसी बुद्धिजीवी, राजनेता, कानूनविद ने यह प्रश्न नहीं पूछा कि किसके ऊपर अत्याचार अपराध नहीं है। यह महिला शब्द लिखने की आवश्यकता ही प्रमाणित करती है कि राजनेताओं की नीयत खराब है। कुछ नेता कन्या भू्रण-हत्या के विरुद्ध भी जोरदार आवाज उठाते हैं। जब बालक भ्रूण हत्या होती ही नहीं, तो कन्या शब्द लिखना क्यों आवश्यक हैं।किन्तु ये लोग यह प्रश्न नहीं उठाते क्योंकि सबका स्वार्थ वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्ष के प्रोत्साहन में ही छिपा हुआ है।

यदि हम भारत के विभिन्न राजनैतिक दलों का अलग-अलग आँकलन करें तो, वैसे तो सभी राजनैतिक दल इस कार्य में समान रूप से पूरी ईमानदारी के साथआठों प्रकार के आधारों पर वर्ग-संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहे हैं,किन्तु इनमें भी वामपंथी/साम्यवादी समूह सबसे ऊपर है। जो लोग अमीरी-रेखा और गरीबी-रेखा की बात करते हैं, वो लोग मध्य-रेखा की बात नहीं करते क्योंकि मध्य-रेखा शब्द में वह वर्ग निर्माण नहीं होता जो अमीरी-रेखा में दिखता है। कुछ लोग आर्थिक न्याय व सामाजिक न्याय की बहुत चर्चा करते हैं, किंतु उन्हें श्रम के साथ अन्याय व राजनीतिक असमानता का अन्याय नहीं दिखता। उन्हें बुद्धिजीवी व पूंजीपतियों की एकाधिकारवादी अर्थनीति के दुष्परिणाम नहीं दिखते। उन्हें न्याय की मांग करने में बहुत आनंद आता है किंतु वे कभी व्यवस्था की बात नहीं करते। जबकि न्याय और व्यवस्था के बीच संतुलन आवश्यक है। वामपंथी साम्यवादी विचारधारा से जुड़े हुए लोगों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वे वर्ग-संघर्ष के लिये किस आधार को महत्वपूर्ण मानते है। कभी वे समाज को महिला-पुरूष के रूप में विभाजित करते है तो कभी सवर्ण-अवर्ण आदिवासी के रूप में,और कभी गरीब-अमीर के रूप में भी। सब जानते हैं कि साम्यवादी धर्म, जाति, परिवार, समाज व्यवस्था को बिल्कुल नहीं मानते, यहां तक कि स्त्री-पुरुष के बीच व्यक्तिगत संबंधों में किसी प्रकार की कोई नैतिकता को भी स्वीकार नहीं करते लेकिन शेष समाज में नैतिकता के उच्चतम मापदण्ड स्थापित करना चाहते हैं। जब समाज में वर्ग संघर्ष कराने की बात आती है तो साम्यवादी दुर्गा और महिषासुर को भी मानना शुरू कर देते हैं। मैंने पूर्व में भी लिखा है और फिर लिख रहा हूं कि साम्यवाद दुनियां का अकेला संगठन है जिसमें सबसे अधिक पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी, चालाक या धूर्त पाये जाते हैं। दूसरी ओर, संघ परिवार या इस्लाम में ठीक इसके विपरीत भावना प्रधान लोगों की बहुलता रहती है। वर्ग संघर्ष कराने वाले,शेष सबको किसी न किसी रूप में आपस में लड़ाकर अपने आप को सुरक्षित रखते हैं।

वर्ग संघर्ष कराने वाले निरंतर कुछ मुद्दे उठाते रहते हैं-

1. समाज में जो लोग कमजोर वर्ग के हैं उन्हें कानूनी अधिकार मिलना चाहिये।
2. कमजोर वर्ग के लोगों को कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
3. कमजोर व्यक्ति नहीं होता है बल्कि वर्ग होता है और वर्ग के आधार पर अधिकार दिया जाना चाहिए।
4. यदि व्यवस्था उनकी सुरक्षा न कर सके तो उन्हें दूसरे वर्ग से बलपूर्वक अपनी सुरक्षा करने का अधिकार है और उन्हें ऐसा करना चाहिए।

सच्चाई यह है कि व्यक्ति कमजोर होता है, वर्ग नहीं। कमजोरों को सुविधा या सहायता देना, मजबूतोंया सरकार का स्वैच्छिक कर्तव्य है, कमजोरों का अधिकार नहीं। कानून को भी इस मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कानून कमजोर व्यक्तियों की मदद कर सकता है, सुविधा दे सकता हैकिंतु अधिकार नहीं दे सकता क्योंकि अधिकार तो प्रत्येक व्यक्ति के समान ही होते हैं जो समान रूप से संविधान द्वारा दिए हुए भी हैं। किसी के अधिकार किसी भी परिस्थिति में कम या ज्यादा नहीं किए जा सकते और यदि ऐसा प्रयास किया जाता है तो वह हानिकारक ही होगा लाभदायक नहीं।

यह स्पष्ट है कि हमें वर्ग-निर्माण, वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्ष से मुक्ति पानी ही होगी। किंतु यह बात भी सच है कि वर्ग संघर्ष से लाभ उठाने वाले इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि शेष लोगों से उनकी तुलना’दिये और तूफान’ से की जा सकती है।सारे कानून बनाने वाले उसमें शामिल हैं, यहां तक कि न्यायपालिका और कार्यपालिका भी इस प्रचार से प्रभावित है। ऐसी परिस्थिति में वर्ग-समन्वय को मजबूत करने के लिए हमें योजनापूर्वक काम करना होगा और इसके लिये ये दो मार्ग हो सकते हैं- 1. वर्ग-समन्वय का प्रचार करें 2. वर्ग-संघर्ष एवं वर्ग-निर्माण का विरोध करें।

हम वर्ग-निर्माण के किसी भी प्लान से अपने को पूरी तरह दूर रखें। महिला-युवा-आदिवासी-हरिजन-हिंदू-गरीब आदि के सशक्तिकरण के नारे हमें तोड़ने के लिए और वर्ग-समन्वय को कमजोर करने के लिए लगाये जाते हैं। यहां तक कि अच्छे-अच्छे लोग भी ऐसे आकर्षक नारों के साथ हो जाते हैं। हम इससे बचें।

वर्ग संघर्ष का विरोध सबके साथ एक-साथ नहीं किया जा सकता क्योंकि वर्ग-संघर्ष में भी एक वर्ग धूर्त हैं, बुद्धिजीवी हैं तो दूसरा भावना प्रधान।एक वर्ग मोटिवेटर है, नचाता है, सबका उपयोग करता हैं तो दूसरा वर्ग मोटिवेटेड है, नाचता है, उपयोग में आता हैं। मैं जानता हूँ कि इस दूसरे वर्ग को समझाना बहुत टेढ़ा काम है किंतु इसके अतिरिक्त हमारे पास कोई अन्य मार्ग भी तो नहीं है। हम चाहे कितना भी चाहें, तो भी संघ परिवार या मुस्लिम समुदाय के अच्छे लोगों को भी यह बात नहीं समझा सकतेकि इस संकटकाल में हिंदू-मुस्लिम समस्या की अपेक्षा साम्यवाद सबसे ज्यादा खतरनाक पक्ष है। फिर भी कोई अन्य मार्ग नहीं होने से, हमें यह बात धीरे-धीरे समझनी ही होगी कि योजनापूर्वक वर्ग-संघर्ष का विस्तार करने वालों को वर्ग समन्वय की दिशा में मजबूर करना ही एकमात्र मार्ग है। मैं जानता हूँ कि जो लोग सोच समझकर वर्ग संघर्ष को हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे हैं वे न कभी स्वयं समझेंगे ना दूसरों को समझने देंगे। ऐसी स्थिति में हम यदि नासमझों को थोड़ा-सा भी समझाने में सफल हुए तो वर्ग-संघर्ष वर्ग-समन्वय में बदल सकता है। मैं चाहता हूं कि कुछ लोग तो वर्ग-निर्माण, वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्ष के विरूद्ध वर्ग-समन्वय के पक्ष में खड़े हों। अंत में यह स्पष्ट कर दूं कि शरीफ और बदमाश की लड़ाई में शरीफ कमजोरीकरण के लिये’वर्ग-संघर्ष’ एक मजबूत हथियार है और हमें बदमाशों को कमजोर करने के लिए उन्हें उनके इस हथियार से वंचित करने की पहल करनी चाहिए।

सारांशः कमजोरों की मदद करना मजबूतों का कर्तव्य है, कमजोरों का अधिकार नहीं। इस विचार को आधार बनाकर वर्ग संघर्ष को वर्ग समन्वय की दिशा में मोड़ा जा सकता है।
……………………………………..…………………
इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 13.09.2019 प्रथम सत्र दोपहर में होगा। ’’वर्ग समन्वय या वर्ग संघर्ष’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें। ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 13.09.2019 को प्रथम सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-26 “भौतिक उन्नति या नैतिक पतन”
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कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-
1. किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।
2. अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्नति के उददेश्य से किये जाते है और कर्तव्यों का प्रयत्न नैतिक उत्थान के निमित्त होता है। कर्तव्य हमेशा समाज को लाभ देते है।
3. धर्म हमेशा ही नैतिकता को मजबूत करता है। समाज नैतिकता और भौतिक उन्नति के बीच संतुलन बनाता है। राज्य सिर्फ आपराधिक आचरण से रोकता है।
4. व्यक्ति की भौतिक उन्नति और नैतिक उन्नति के बीच संतुलन होना चाहिए। सिर्फ भौतिक उन्नति हमेशा गलत दिशा में ले जा सकती है और सिर्फ नैतिकता व्यक्ति को निराश या असफल भी कर सकती है।
5. हर शरीफ या धूर्त चाहता है कि दूसरे लोग भौतिक प्रगति की जगह नैतिकता पर अधिक ध्यान दें। शरीफ आदमी अपने निकट के लोगों को अधिक कर्तव्य प्रेरित करता है तो धूर्त दूसरे लोगों को अधिक कर्तव्य प्रेरित करता है।
6. पूरे विश्व मे भौतिक विकास तो बहुत तेजी से हो रहा हैं, किन्तु उसके साथ साथ नैतिक पतन भी हो रहा हैं। विश्व के अनेक देशो मे यह नैतिक पतन धीरे-धीरे हो रहा हैं। किन्तु दक्षिण एशिया के देशो मे बहुत तीव्र गति से हो रहा है, और वह गति भारत मे और भी तीव्र हैं।
7. पूरे विश्व मे इस नैतिक पतन के कई कारण दिख रहे है जिनमे 6-7 प्रमुख है-1. संचालक और संचालित के बीच बढ़ती दूरी 2. निष्कर्ष निकालने मे विचार मंथन की जगह प्रचार का अधिक प्रभावकारी होना 3. राजनीति और समाज सेवा का व्यवसायीकरण 4. भौतिक पहचान का संकट 5. समाज का टूटकर वर्गो मे बदलना 6. निष्प्रभावी राज्य व्यवस्था 7. मानव स्वभाव ताप वृद्धि 8. मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि।
8. आवश्यकता यह है कि भौतिक उन्नति की बाधाओं के समाधान की चर्चाओं से किनारा करके नैतिक अवनति की रोकथाम पर चर्चा आगे बढ़े।
9. भौतिक उन्नति और समाज व्यवस्था के बीच सबसे अच्छा संतुलन भारतीय संस्कृति में रहा है।
10. यदि ज्ञान, सुरक्षा, सुविधा और सेवा के आधार पर बचपन से ही व्यक्तियों के योग्यतानुसार समूह बनाकर उन्हें उस दिशा में ट्रेनिंग दी जायेगी तो नैतिक पतन को रोका जा सकता है।
यदि हम भौतिक उन्नति और नैतिक पतन का विश्वव्यापी आकलन करें तो स्पष्ट है कि सारी दुनिया बहुत तेज गति से भौतिक प्रगति की दिशा में बढ़ रही है। सब प्रकार की सुविधाएं बढ़ रही हैं। ब्रम्हांड की खोज तक दुनिया निरंतर तेज गति से आगे बढ़ रही है। यहॉ तक कि गॉड पार्टकिल तक की खोज अंतिम चरण में है। विज्ञान ने हर मामले में इतनी सुविधायें जुटा दी हैं कि निकट भविष्य में कृत्रिम मनुष्य तक बनने की संभावनाए प्रबल हो गई हैं। इस भौतिक प्रगति के समानांतर विज्ञान ने विनाश के भी सारे साधन उपलब्ध करा दिये है। कब दुनिया में विश्वयुद्ध हो जाये और मनुष्य समाप्त हो जाये इसकी संभावना निरंतर बनी हुई है। भौतिक प्रगति के बाई प्रोडक्ट के रुप में पर्यावरण प्रदूषण भी एक समस्या बना हुआ है। नई नई बीमारियॉ भी बढ़ रही है तो उनका ईलाज भी उसी तरह बढ़ रहा है। बीमारियां और ईलाज एक दूसरे के पूरक बन गये है। जिस तरह दुनिया का प्रत्येक मनुष्य भौतिक प्रगति से सुख का अधिक अनुभव कर रहा है ठीक उसी गति से दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति किसी अज्ञात भय से चिंतित भी है। ये दोनों प्रक्रियाएं पूरी दुनिया में एक साथ चल रही हैं। भौतिक प्रगति की दुनिया में जो गति है ठीक वही गति नैतिक पतन की भी दिख रही है। पूरी दुनिया का हर व्यक्ति प्रतिक्षण नैतिकता के मापदण्ड में नीचे जा रहा है। दुनिया इस प्रकार केन्द्रित हो गई है कि यदि दो सर्वोच्च शासक युद्ध की घोषणा कर दें तो सारी दुनिया मिलकर भी उन दोनों की इच्छा के विपरीत अपनी सुरक्षा नहीं कर सकती और दोनों शक्तियों के बीच निरंतर टकराव का खतरा बना रहता है, बना हुआ है। एक तरफ मानवता के नाम पर सारी दुनिया को प्रवचन देने का काम भी चलता रहता है तो दूसरी तरफ सारी दुनिया में नैतिकता के सारे मापदण्डों के विपरीत तिकडम भी बढ़ती जा रही है। पूरी मानव जाति के स्वभाव में प्रतिक्षण आक्रोश की मात्रा बढ़ रही है। हर आदमी मजबूत से डर रहा है और कमजोर को डरा रहा है।
भारत भी भौतिक प्रगति और नैतिक पतन की विश्वव्यापी परिस्थितियों से अलग नहीं है। भारत में भी व्यक्ति से लेकर समूह तक की बहुत तेज गति से भौतिक उन्नति हो रही है। एक आकलन के अनुसार वर्तमान समय में भारत की भौतिक उन्नति प्रतिवर्ष छः से सात प्रतिशत की है। दूसरी ओर यदि हम नैतिक पतन का आकलन करे तो नैतिक पतन की भी वृद्धि दर प्रतिवर्ष छः से सात प्रतिशत अनुमानित होगी ही। छोटी छोटी बच्चियॉ तक सुरक्षित नहीं है। भाई भाई में विवाद तो आम बात हो गई है, किन्तु पति पत्नी के बीच भी निरंतर टकराव बढ़ रहे है। परिवार व्यवस्था टूट रही है। अविश्वास बढ़ रहा है। न्यायालयों में मुकदमों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। नकली संत एक बहुत बडी समस्या के रुप में सामने आ गये है। भ्रष्टाचार, जालसाजी, धोखाधड़ी, मिलावट अनियंत्रित होती जा रही है। समझ में नहीं आ रहा कि भौतिक प्रगति और नैतिक पतन के मामले में भारत किस दिशा में अधिक तेज गति से बढ़ रहा है। न्यायालयों में धर्मग्रंथो के उपर हाथ रखकर झूठी कसम खाना एक सामान प्रक्रिया बन गई है। राजनीति और धर्म तो लगभग व्यवसाय का रूप ले ही चुके है किन्तु समाज सेवा के नाम पर बनी संस्थाए भी अब व्यावसायिक केन्द्र बनती जा रही है।
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम दिया जाता है जिसमे पारिवारिक व्यवस्था भी शामिल होती है। बहुत प्राचीन समय मे व्यक्ति के गुण और स्वभाव के आधार पर परीक्षाए लेकर उनके वर्ण निर्धारित करने की प्रक्रिया बताई जाती है और वर्ण के आधार पर उनका कर्म के अनुसार विभाजन करके जातियां बनती थी। इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति महत्वपूर्ण न होकर चरित्र निर्माण मे व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी । बाद मे धीरे-धीरे व्यवस्था टूटने लगी और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगे। राजा का बेटा ही राजा और विद्वान का बेटा ही विद्वान घोषित होगा, चाहे उसके संस्कार कैसे भी हो, चाहे उसकी योग्यता कुछ भी क्यो न हो। परिवार का मुखिया भी मां के गर्भ से बनने लगा। इस सामाजिक विकृति के कारण अनेक प्रकर की समस्याएं पैदा हुइंर् ।
आज तक दुनियां मे ऐसा कोई भौतिक मापदंड नही बना जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिम रूप से अच्छा या बुरा मान लिया जाये। इसका अर्थ हुआ कि यदि व्यक्ति ही व्यवस्था बनाने का काम करेगा तो व्यवस्था के अच्छे या बुरे होने की संभावनाए पचास पचास प्रतिशत ही होगी क्योकि व्यवस्था बनाने वाला अच्छा आदमी होगा, इसका कोई पैमाना नही है। ऐसी अच्छी बुरी व्यवस्था मे जीने के लिये व्यक्ति समूह मजबूर होगा। इसलिये सारी दुनियां मे लगातार नैतिक पतन हो रहा है।
धूर्त लोग व्यवस्था बनाने मे आगे आ जाते है। आप विचार करिये कि हजारो वर्षो से स्वामी विवेकानंद, दयानंद, चाणक्य आदि अनेक महापुरूष सामाजिक व्यवस्था बनाते रहे। आज भी अनेक महापुरूष निरंतर सामाजिक व्यवस्था बनाने मे संलग्न हैं। राजनेता भी लगातार व्यवस्था बनाते रहे है और बना रहे हैं। स्वतंत्रता के तत्काल बाद की राजनैतिक व्यवस्था मे आज की अपेक्षा कई गुना चरित्रवान लोग थे। इन सब प्रयत्नो के बाद भी व्यक्ति का चरित्र नीचे जा रहा है। यहां तक कि चरित्र निर्माण करने वाले महत्वपूर्ण लोगो का भी चरित्र का स्तर गिर रहा है। स्वाभाविक है कि यदि चरित्र निर्माण का कार्य व्यवस्था की अपेक्षा व्यक्ति करेगा तो चरित्र पतन का खतरा निरंतर बना ही रहेगा। यदि व्यक्ति चरित्र निर्माण की भूमिका मे रहेगा तो ऐसा क्या तरीका हो सकता है कि किसी अच्छे व्यक्ति को चुनकर यह दायित्व सौपा जाये? आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति को चुनने वाला व्यक्ति चुने जाने वाले से अधिक चरित्रवान होना चाहिये। किन्तु दुनियां मे ऐसा कोई तरीका न तो आज तक बन सका है न ही बन सकेगा कि सर्वोच्च चरित्रवान को चरित्र निर्माण तथा व्यवस्था बनाने के लिये किसी तरीके से चुना जाये।
भौतिक उन्नति में विज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है। इसी तरह नैतिक पतन में भी राज्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। दुनिया में जिस गति से विज्ञान तरक्की कर रहा है उसी गति से समाज व्यवस्था भी निरंतर कमजोर हो रही है। भौतिक उन्नति और समाज व्यवस्था के बीच सबसे अच्छा संतुलन भारतीय संस्कृति में रहा है। प्राचीन समय में भारत भौतिक प्रगति में भी सारी दुनिया में आगे था और नैतिकता के आधार पर भी। जब भारत में वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर होने लगी तब समाज व्यवस्था छिन्न भिन्न हुई। परिणाम हुआ नैतिक पतन और आपसी टकराव जो धीरे धीरे हमारे गुलामी में बदल गया। इसी तरह पूरी दुनिया में जब इस्लाम और साम्यवाद ने मजबूत होकर धर्म और समाज की व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया तब पूरी दुनिया में भी नैतिक पतन तेज गति से बढ़ा। साम्यवाद ने धर्म को भी अफीम बता दिया तो उसने परिवार व्यवस्था को भी अप्रासंगिक सिद्ध कर दिया। व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक को राज्याश्रित बना दिया। परिणाम हुआ भयंकर नैतिक पतन जिसका दुष्परिणाम सारी दुनिया भोग रही है और भारत भी उससे बहुत प्रभावित है।
भारत मुख्य रुप से दो अलग-अलग विचारधाराओं पर चलता रहा है-(1)पश्चिम की भौतिक प्रगति की विचारधारा(2)भारत की आध्यात्मिक प्रगति की विचारधारा जिसे धार्मिक या नैतिक भी कहा जा सकता है। आमतौर पर भारतीय विचारधारा लगातार कमजोर हो रही है तथा पाश्चात्य भौतिक विचारधारा आगे बढ़ रही है। स्पष्ट दिखता है कि भौतिक प्रगति और नैतिक पतन के बीच दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है किन्तु यह बात भी साफ है कि भौतिक प्रगति और नैतिक पतन एक साथ समान गति से आगे बढ़ रहे है। भारत के जिन पहाड़ी क्षेत्रों का भौतिक विकास कम हुआ है वहॉ नैतिक पतन भी कम होना संदेह पैदा करता है कि दोनों के बीच में कही न कही कोई रिश्ता अवश्य है जो हमें नहीं दिखता।
अब हमें भौतिक उन्नति के साथ साथ नैतिक उत्थान को भी आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। दुनिया इस दिशा में पहल नहीं कर सकेगी किन्तु भारत से इसकी शुरुवात हो सकती है क्योंकि भारत को इसके संतुलन से होने वाले लाभ हानि का पर्याप्त अनुभव है। भारत में वैसे भी साम्यवाद लगभग समाप्त है और इस्लाम का भी भारतीय संस्करण धीरे धीरे आगे आ रहा है। नैतिक प्रगति की शुरुवात परिवार व्यवस्था, गांव व्यवस्था और समाज व्यवस्था को मजबूत करके की जा सकती है। इस दिशा में निरंतर प्रयत्न जारी है। नैतिक उत्थान के लिए धर्म व्यवस्था को भी आगे लाने का प्रयास करना चाहिए। इस मामले में हिन्दू, मुसलमान,इसाई , सिख का कोई भेद उचित नहीं है। साथ ही भारत में कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था का भी प्रयोग करना चाहिए। यदि ज्ञान, सुरक्षा, सुविधा और सेवा के आधार पर बचपन से ही व्यक्तियों के योग्यतानुसार समूह बनाकर उन्हें उस दिशा में ट्रेनिंग दी जायेगी तो नैतिक पतन को रोका जा सकता है। हमे यह भी करना होगा कि राज्य समाज व्यवस्था मे हस्तक्षेप न करे बल्कि समाज राज्य व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है क्योकि समाज राज्य से उपर होता है। मैं चाहता हॅू कि भौतिक उन्नति और नैतिक पतन के एक साथ चलने का जो कलंक दुनिया के माथे पर लगा है उसे धोने की शुरुवात भारत से हो सकती है।
सारांशः नैतिक उन्नति के बिना न तो भौतिक उन्नति को स्थायित्व मिल सकता है और न ही व्यक्ति, राष्ट्र और समाज का सही अर्थो में विकास होगा। क्योंकि नैतिक उन्नति के नेतृत्व के बिना भौतिक उन्नति की दशा-दिशा कभी भी विनाशकारी हो सकती है।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 13.09.2019 प्रथम सत्र सुबह में होगा। ’’ भौतिक उन्नति या नैतिक पतन’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें। ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 12.09.2019 को द्वितीय सत्र

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दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-26 “महिला सशक्तिकरण समस्या या समाधान ”
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कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. पति और पत्नी के बीच आपसी संबंधों में प्रायः पति आक्रामक तथा पत्नी आकर्षक मुद्रा में होती है।
2. स्त्री, पुरूष की तुलना आग और पेट्रोल से होती है। दूरी घटेगी तो ब्लास्ट का खतरा बढे़गा और दूरी बढ़ेगी तो सृजन रूकेगा।
3. प्राचीन काल में महिलाओं की शारीरिक संरचना और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर, स्वाभाविक कार्य विभाजन और व्यवस्था में पुरुष की भूमिका मुखिया की रही है, न कि महिलाओं को दबाने की नीयत से पुरुष मुखिया बना।
4. धूर्तों ने इस मुखिया की भूमिका को मालिक की भूमिका में बदलकर महिलाओं को एक गुलाम वर्ग के रूप में स्थापित किया।
5. ‘महिला‘ और ‘पुरुष‘ शब्द अलग-अलग या स्वतंत्र व्यक्ति रहने तक ही सीमित या सार्थक होते है। महिला और पुरूष के मिलकर परिवार बनाते ही वे दोनो परस्पर पति-पत्नी बन जाते है और पारिवारिक रूप से परिवार के सदस्य बन जाते है। 6.परिवार में न कोई महिला होती है न कोई पुरूष, सभी परिवार के सदस्य होते है।
7. परिवार व्यवस्था एक तीन पैर की दौड़ है जिसमें स्त्री-पुरूष का एकाकार होना अनिवार्य है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उनका स्वतंत्र क्षेत्र है, इसमे कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता।
8. मैं आज तक नहीं समझ सका कि महिला किससे सशक्त होना चाहती है पति से; पिता से, भाई से या अन्य किसी से? वह परिवार से सशक्त होना चाहती है या समाज से?
9. सवाल यह है कि यदि सशक्त होना है तो महिला या पुरुष को होना चाहिए या फिर परिवार व्यवस्था को व समाज व्यवस्था को?
10.पुरुष प्रधान व्यवस्था के विकल्प का चयन परिवार की सहमति के बजाय रूढ़िवश व परम्परागत हो जाने से परिवार व समाज में कुछ विकृतियां अवश्य आई हैं किन्तु महिला सशक्तिकरण उसका किसी भी रूप में समाधान नहीं है।
11. महिला सशक्तिकरण का नारा एक बड़ा परिवार तोड़क, समाज तोड़क समस्या के रूप में विस्तार पा रहा है।
12. कुछ आधुनिक महिलायें किसी परिवार रूपी खूंटे से बँधकर नहीं रहना चाहती है। उन्हें पूरी आजादी चाहिए भले ही उसके परिणाम कुछ भी क्यों न हो।
13.जो धूर्त लोग महिला और पुरुष के रूप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते है वे दहेज, सतीप्रथा, बहुविवाह, देवदासी आदि अनेक परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है।
14. महिला सशक्तिकरण का रोना उन तीन चौथाई परिवार की महिलाओं के लिए जो आज भी दौ सौ रुपये दैनिक से कम पर ही अपना गुजर-बसर करती है,बिल्कुल भी नहीं है।
15. सम्पन्न महिलायें अन्य तीन चौथाई महिलाओं के कष्टों के नाम पर महिला सशक्तिकरण का रोना रोकर अपना व्यापार चलाती हैं।
16. धूर्त महिलाओं को न समाज से मतलब है न न्याय से। ये तो येन-केन प्रकारेण देश की सुविधाओं का अधिकतम लाभ अपने परिवार के लिए लूट लेना चाहती हैं। ये ही महिलायें दिन-रात पुरुष प्रधान व्यवस्था के विरोध के बहाने अपना उल्लू सीधा करने में लगी रहती हैं ।
17. आज के समाज को देख कर यह तय नहीं किया जा सकता है कि समाधान के रूप में महिला पुरूष के बीच दूरी घटाने का प्रयास हो रहा है कि दूरी बढ़ाने का?
18. राजनेताओ में यह गुण होता है कि वे किसी समस्या का निश्चित समाधान होने नहीं देते क्योकि किसी समस्या का समाधान उनकी बेरोजगारी का आधार बन जाता है।
19. महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले धूर्तों का उद्देश्य महिला सशक्तिकरण नहीं है बल्कि परिवार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए महिला-पुरुष के बीच टकराव पैदा करना है।
20.परिवार के पारिवारिक और समाज के सामाजिक मामलों में सरकार को कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
21.परिवार में महिलाओं को सम्पत्ति तथा परिवार संचालन में समानता का अधिकार मिलना चाहिए जो अभी एक पक्षीय रूप से पुरुषों के पक्ष में है।
22. परिवार व्यवस्था लोकतान्त्रिक हो ये जरुरी है न कि बेटी बचाओ जैसे नारे।
23. हमारा कर्तव्य है कि महिला सशक्तिकरण के घातक नारे के विरुद्ध जनमत जागृत करें।
24. महिला सशक्तिकरण का रोना रोने वाली महिलाओं में से ज्यादातर या तो अपने शारीरिक और भौतिक सुख के लिए ऐसा दुष्प्रचार करती हैं या ये किसी विदेशी एजेंट के रूप में विदेशी धन लेकर महिला सशक्तिकरण का नारा प्रचारित करती हैं। ऐसी मुट्ठी भर पेशेवर महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
25. महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाली ऐसी मुट्ठी भर पेशेवर महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। मैं तो यहाँ तक सोचता हूँ कि इस प्रकार की महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिये।
26. राजनैतिक नेता अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये महिला सशक्तिकरण के नारे को हथियार के रूप में उपयोग कर रहे हैं। यह नारा परिवार और समाज व्यवस्था के लिये बहुत घातक है। ऐसे नारे का पूरी तरह विरोध होना चाहिये।
समाज में शराफत और धूर्तता के बीच हमेशा ही टकराव रहा है। शरीफ लोगों की संख्या अट्ठानवे प्रतिशत और अपराधी धूर्तो की दो प्रतिशत के आस-पास होती हैं। ये दो प्रतिशत लोग स्वयं को सुरक्षित बनाये रखने के लिए वर्ग निर्माण का सहारा लेते हैं। वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष ववर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोड़ता है। वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धूर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।धूर्त व अपराधियों की यह चालाकी हजारां वर्षां से चली आ रही है और, आज तो वर्ग निर्माण और भी तीव्र गति से बढ़ रहा है भले ही इसका स्वरूप कुछ बदल गया हो। इस प्रकार से, वर्ग-निर्माण के उपक्रम में आज बने हुये कई वर्गों में से एक वर्ग है ’महिला-पुरूष’।
समाज के प्राकृतिक स्वरूप में महिलाआें की आबादी लगभग पचास प्रतिशत मानी जाती है। समाज विस्तार के लिए महिला और पुरुष की एकाकार जीवन सहभागिता अनिवार्य होती है जिसे परिवार कहते है। इस प्रकार व्यक्ति और समाज के बीच परिवार एक अनिवार्य कड़ी के रूप में है जिसे व्यवस्था से बाहर करना संभव नहीं है।
पति और पत्नी के बीच आपसी संबंधों में प्रायः पति आक्रामक तथा पत्नी आकर्षक मुद्रा में होती है। इसी तरह स्त्री पुरूष की आपसी दूरी घटनी चाहिये या बढ़नी चाहिये यह आत तक तय नहीं हो सका। स्त्री, पुरूष की तुलना आग और पेट्रोल से होती है। दूरी घटेगी तो ब्लास्ट का खतरा बढे़गा और दूरी बढ़ेगी तो सृजन रूकेगा।
महिलाओं की शारीरिक संरचना और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर स्वाभाविक कार्य विभाजन और व्यवस्था में पुरुष की भूमिका मुखिया की रही है। धूर्तों ने इस मुखिया की भूमिका को मालिक की भूमिका में बदलकर महिलाओं को एक गुलाम वर्ग के रूप में स्थापित किया। महिलाओं के समान अधिकारों में कटौती की गई। कार्य विभाजन में तो कहीं भी महिलाओं के साथ असमानता नहीं थी लेकिन अधिकार विभाजन में पुरुषों ने भेदभाव शुरू कर दिया। परिवार में सम्पत्ति का विभाजन इस प्रकार किया गया कि उसमे से महिलाओं को बिल्कुल बाहर कर दिया। सबसे सरल और स्वाभाविक सम्पत्ति विभाजन यह होता है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य का सम्पत्ति में समान अधिकार हो। किन्तु उसे बहुत जटिल बनाकर पुरुषों ने अपना एकाधिकार बनाने का प्रयत्न किया। इस्लामिक समाज व्यवस्था ने तो इससे भी आगे बढ़ कर महिलाओं की गवाही को ही पुरुषों से आधे महत्त्व का मान लिया और रही सही कसर तलाक के एकपक्षीय पुरुष अधिकार ने पूरी कर दी। पुरुषों ने अधिकार विभाजन में अपने को एक वर्ग के रूप में स्थापित करने का पूरा प्रयत्न किया।
स्वभावतः इसके घातक परिणाम होने ही थे। पुरुष और महिला दो वर्ग के रूप में स्थापित होने लगे। दोनों के बीच शोषक और शोषित की पहचान बनने लगी। महिलाओं में हीन भावना और पुरुषों में उच्च भाव बढ़ा। ऐसे समय में समाज के शुभचिंतको ने महिला-पुरुष समानता की आवाज उठाई जो स्वाभाविक भी थी और उचित भी। इस समान अधिकार के लिये समाज में सोच बढ़नी शुरू हुई। स्वामी दयानंद, महात्मा गाँधी आदि ने पुरुषों की सोच बदलने का प्रयास किया जिसके अच्छे परिणाम आने शुरू हो गए। लेकिन दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता संघर्ष में लगे हर प्रकार के हथकण्डे अपनाने वाले सत्ता लोलुप राजनेताओंने महिला दशा सुधार की आड़ में, महिला उत्थान और महिला सशक्तिकरण की आवाज उठायी, जिसका इन्होंने राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इस से समाज व्यवस्था में राजैनतिक व्यवस्था का हस्तक्षेप बढ़ने लगा। उन्होंने समान अधिकार के लिए सामाजिक प्रयत्नों में सहयोग के विपरीत, महिलाओं को विशेषाधिकार दिलाने का आन्दोलन शुरू किया। महिलाओं को संगठित किया जाने लगा एवं पुरूषों के विरूद्ध वर्ग के रूप में अधिकार-जागरूक किया जाने लगा। धूर्त नेताओं और कुछ आधुनिक महिलाओं ने असमानता खत्म करने के नाम पर महिला उत्पीड़न रोकने के अनेक कानून बनाये। इन कानूनों से सम्पूर्ण समाज को लाभ कम और हानि ज्यादा हुई। यहॉ तक कि धूर्त पुरुषों ने भी शरीफ पुरुषां के उत्पीड़न के उद्देश्य से महिला उत्पीड़न प्रावधानों का भरपूर उपयोग किया जिससे वर्ग संघर्ष व वर्ग विद्वेष मजबूत हुआ और वर्ग समन्वय टूटा।
समाज में दो प्रकार के परिवार हैं- 1. पारम्परिक परिवार 2. आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवारों की महिलाओ की संख्या अट्ठानवे प्रतिशत है और आधुनिक परिवारों की करीब दो प्रतिशत। ये दो प्रतिशत आधुनिक महिलायें पूरे समाज का शोषण करना चाहती हैं क्योंकि इन्हें सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी जबकि पारम्परिक परिवार की महिलाओं को न समान अधिकार चाहिए और न विशेष। ये दो प्रतिशत महिलायें अपने आप को अट्ठानवे प्रतिशत महिलाओ की प्रतिनिधि घोषित करती हैं। ये सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे स्वतंत्रता कहती हैं। यहाँ तक कि ये महिलायें सारी सुविधायें भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती हैं।
कुछ दशक पूर्व तक सक्रिय, पुरूष प्रधानता की सोच से समाज में जो विकृति आई थी, उसके दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा भी समस्या का समाधान न होकर समस्या पैदा कर रहा है। महिला और पुरुष अलग-अलग/स्वतंत्र व्यक्ति रहने तक ही सीमित या सार्थक होते है। महिला और पुरूष के मिलकर परिवार बनाते ही वे दोनो परस्पर पति-पत्नी बन जाते है और पारिवारिक रूप से परिवार के सदस्य बन जाते है। परिवार में न कोई महिला होती है न कोई पुरूष, सभी परिवार के सदस्य होते है। अर्थात, बिना किसी परिवार का सदस्य हुये किसी व्यक्ति को महिला या पुरूष माना जाना सार्थक है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करे तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही ऐसी महिलायें होगी अन्यथा अन्य महिलायें तो परिवार की सदस्य होती है। ये माँ, बहन, पत्नी, बेटी तो हो सकती है किन्तु महिला के रूप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता है जब तक वे अकेली न हो। यदि किसी महिला और पुरुष द्वारा मिलकर तीन पैर की दौड़ होना अनिवार्य है तो उसमे एक पैर महिला का और एक पैर पुरुष का स्वाभाविक रूप से परस्पर जुड़ना आवश्यक है। ऐसी दौड़ में किसी एक इकाई को महत्त्व देना नुकसानदायक होता है। परिवार इसी दौड़ के समान है। परिवार व्यवस्था एक तीन पैर की दौड़ है जिसमें स्त्री-पुरूष का एकाकार होना अनिवार्य है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उनका स्वतंत्र क्षेत्र है, इसमे कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता क्यांकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी होता है तथा वह कभी नहीं चाहेगा कि दोनों कभी एकजुट होकर तीन पैर की दौड़ जीत सके। जब महिला का अपवाद स्वरूप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्त्वहीन है या घातक। मैं आज तक नहीं समझ सका कि महिला किससे सशक्त होना चाहती है पति से; पिता से, भाई से या अन्य किसी से? वह परिवार से सशक्त होना चाहती है या समाज से? आज तक महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाली किसी महिला ने इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। अब सवाल यह है कि यदि सशक्त होना है तो महिला या पुरुष को होना चाहिए या फिर परिवार व्यवस्था को व समाज व्यवस्था को? मैं मानता हूॅ कि पुरुष प्रधान व्यवस्था के विकल्प का चयन परिवार की सहमति के बजाय रूढ़िवश व परम्परागत हो जाने से परिवार व समाज में कुछ विकृतियां अवश्य आई हैं किन्तु महिला सशक्तिकरण उसका किसी भी रूप में समाधान नहीं है। बल्कि, यह एक बड़ी परिवार तोड़क, समाज तोड़क समस्या के रूप में विस्तार पा रही है। कुछ आधुनिक महिलायें किसी परिवार रूपी खूंटे से बँधकर नहीं रहना चाहती है। उन्हें पूरी आजादी चाहिए भले ही उसके परिणाम कुछ भी क्यों न हो। वैसे मैं मानता हूॅ कि इस सम्बन्ध में, महिलाओं को यदि अपनी स्वतंत्रता में सुख मिलता है तो हमें इसमे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
जो धूर्त लोग महिला और पुरुष के रूप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते है वे दहेज, सतीप्रथा, बहुविवाह, देवदासी आदि अनेक परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है। मेरे विचार में समय-समय पर देश-काल-परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यतायें बदलती रहती है। मेरे विचार से वर्तमान में विकृति माने जाने वाली ये परम्परायें पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि समाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराआें के रूप में विकसित किया गया था। ये परम्परायें बाद में परिस्थितियों में बदलाव होने से अनुपयोगी हो गइंर् या विकृत हो गईं और टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष का कई स्त्रियों के साथ विवाह माना जाता था तो भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहुविवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले की व्यवस्था विकृति थी न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जानी चाहिये। महिला सशक्तिकरण का रोना उन तीन चौथाई परिवार की महिलाओं के लिए जो आज भी दौ सौ रुपये दैनिक से कम पर ही अपना गुजर-बसर करती है,बिल्कुल भी नहीं है। संसद में एक तिहाई महिला आरक्षण हो या आधा या पूरा इन महिलाओं की रोजी-रोटी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। सम्पन्न महिलायें अन्य तीन चौथाई महिलाओं के कष्टों के नाम पर अपना व्यापार शुरू कर देती है। बेचारी गरीब महिलायें कष्ट उठाती हैं इसलिए उनके नाम पर इन संपन्न महिलाओं को लाभ के पद दे दिये जाते हैं जिससे शायद उन बेचारी महिलाओं का पेट भर जाये। धूर्त महिलाओं के ये कितने अमानवीय विचार हैं! सच्चाई यह है कि इन महिलाओं को न समाज से मतलब है न न्याय से। ये तो येन-केन प्रकारेण देश की सुविधाओं का अधिकतम लाभ अपने परिवार के लिए लूट लेना चाहती हैं। ये ही महिलायें दिन-रात पुरुष प्रधान व्यवस्था के विरोध के बहाने अपना उल्लू सीधा करने में लगी रहती हैं ।
यह आज तक तय नहीं हो सका कि समाधान के रूप में महिला पुरूष के बीच दूरी घटाने का प्रयास हो रहा है कि बढ़ाने का। यह भी स्पष्ट नहीं है कि नई व्यवस्था में पति आक्रामक पत्नी आकर्षक की स्थिति को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है और क्यों।
राजनेताओ में यह गुण होता है कि वे किसी समस्या का निश्चित समाधान होने नहीं देते क्योकि किसी समस्या का समाधान उनकी बेरोजगारी का आधार बन जाता है। वर्तमान समय में दो विपरीत बातें एक साथ समाज में कही जा रही हैंः-1.महिलाओं को परिवार और समाज में सशक्त होना चाहिए, उन्हें स्वावलम्बी होना चाहिए। 2.महिलाओ की संख्या निरंतर बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए। स्वाभाविक है कि दोनों उद्देश्य एक साथ पूरे नहीं हो सकते क्योकि यदि महिलाआें की संख्या बढ़ेगी तो उनका महत्त्व नहीं बढेगा। स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य महिला सशक्तिकरण नहीं है बल्कि परिवार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए महिला-पुरुष के बीच टकराव पैदा करना है। विवाह की उम्र, दहेज का लेन-देन, स्त्री-पुरुष आबादी का संतुलन, महिला उत्पीडन, महिला हीन भावना निवारण आदि हजारां कानून बनाकर परिवार व्यवस्था को धूर्तो ने छिन्न-भिन्न कर दिया। निकम्मे लोग अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए कानून बनाते हैं। ये कानून समाज को अधिक गुलाम बनाने में तो सफल होते हैं किन्तु समाज में व्यवस्था बनाने में कभी सफल नहीं हुए, न होंगे क्योंकि, कानून कभी समाज व्यवस्था के विकल्प नहीं हो सकते। कानून बीमारी की दवा है, टॉनिक नहीं। दुर्भाग्य से दवा ही अपने को टॉनिक समझने लगी है। दवा के साइड इफेक्ट को तो टॉनिक कम कर सकता है किन्तु टॉनिक का साइड इफेक्ट कौन ठीक करेगा। परिवार के पारिवारिक और समाज के सामाजिक मामलों में सरकार को कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
आज हमारे संत गुरु भी परम्परागत परिवार व्यवस्था में कोई संशोधन न करके महिला सशक्तिकरण का घातक समर्थन कर रहे हैं। वास्तव में तो परिवार में महिलाओं को सम्पत्ति तथा परिवार संचालन में समानता का अधिकार मिलना चाहिए जो अभी एक पक्षीय रूप से पुरुषों के पक्ष में है। हमारे संत लोग कोई ऐसा प्रयास नहीं कर रहे है कि परिवार में सम्पत्ति और संचालन के मामले में सब समान हों। हमारे नासमझ संत, हमारे धूर्त नेताओ के चक्कर में फॅसकर महिला सशक्तिकरण का घातक नारा लगाने में सहयोग करने लगे है जो ठीक नहीं है। परिवार व्यवस्था लोकतान्त्रिक हो इसमे तो हमारे संत महात्माओं को बुराई दिखती है लेकिन महिला सशक्तिकरण जैसी घातक बीमारी में उन्हें कोई बुराई नहीं दिखती। यहॉ तक कि अनेक संत गुरु तो अन्य सामाजिक कार्य छोडकर बेटी बचाओ जैसे नारों के प्रचार में ही लग गए हैं।
समाज व्यवस्था की कमजोरियों ने समाज में सामाजिक अन्याय पैदा किया है यह सच है किन्तु सामाजिक कमजोरियों के जितने दुष्परिणाम हजारो वर्षां के बाद दिखे हैं उससे अधिक दुष्परिणाम कानूनी व्यवस्था में कुछ वर्षों में दिखने लगे हैं। कानूनी व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था की सहायक तो हो सकती है किन्तु इसे विकल्प बनाने का प्रयास घातक होगा। साम्यवादी और पूंजीवादी विदेशी संस्कृतियॉ भारत की परिवार व्यवस्था पर लगातार आक्रमण कर रही हैं। महिलाओं को वर्ग के रूप में स्थापित करना उनके लिए बहुत सुविधाजनक है और इस कार्य के लिए सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर कानूनी व्यवस्था की स्थापना उनके लिए बहुत आसान मार्ग है। सबसे अधिक कष्टकारक स्थिति यह है कि विदेशी परिवार-तोड़क विचारों ने भारतीय सामाजिक संस्थाओ में भी धन या अन्य प्रलोभन के द्वारा घुसपैठ बना ली है। ये सामाजिक संस्थाएं भी समाज में कमियों को दूर करने की अपेक्षा इसके लिए कानूनी हस्तक्षेप का आह्वाहन करती है।ये संस्थाएं समाज को अधिक गुमराह कर रही हैं। राजनीति से जुड़े लोग बहुत तेज गति से समाज पर नियन्त्रण करने के षड़्यंत्र में लगे हुए हैं। ये सामाजिक व्यवस्था को सामाजिक न्याय की दिशा में कितना बढ़ा सकेंगे यह तो निश्चित पता नहीं है किन्तु यह तय है कि ये समाज व्यवस्था और परिवार व्यवस्था को इतना क्षत-विक्षत कर देंगे कि हम लम्बे समय तक उसके दुष्परिणाम भोगते रहेंगे।
आज भारत में संवैधानिक रूप से सबको सामान अधिकार प्राप्त है। उस अधिकार में किसी भी रूप में छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। हमारा कर्तव्य है कि महिला सशक्तिकरण के घातक नारे के विरुद्ध जनमत जागृत करें। जो पुरुष अनजाने में या भ्रमवश ऐसे नारे का समर्थन कर रहे है उन्हें हम वास्तविकता समझाने का प्रयास करे। जो लोग पुरूष प्रधानता/महिला हीनता की सोच रूपी वर्तमान सामाजिक विकृति में किसी प्रकार के संशोधन के विरुद्ध हैं उन्हें भी हम सहमत करें कि वे महिला-पुरुष के बीच भेदभाव को न चलने दें। हम सरकार को भी तैयार करे कि वह महिला सशक्तिकरण जैसे घातक प्रयासों को छोड़ दे किन्तु सबसे अधिक सतर्कता उन महिलाओं से आवश्यक है जो ’अपनी नाक कटाने में भगवान का दर्शन’ होने का घातक विचार समाज में फैला रही हैं। इन महिलाओं के पास न तो कुछ लिखने को है न बोलने को। ये परम स्वतन्त्र हैं। इन्हें न परिवार चलाना है न समाज। मुठ्ठी भर ऐसी महिलाओं में से ज्यादातर या तो अपने शारीरिक और भौतिक सुख के लिए ऐसा दुष्प्रचार करती हैं या ये किसी विदेशी एजेंट के रूप में विदेशी धन लेकर महिला सशक्तिकरण का नारा प्रचारित करती हैं। हमें ऐसे मामले में सतर्कता बरतनी चाहिए कि हमारे परिवार की महिलाआें के बीच में इस घातक दुष्प्रचार के विषाणु पैदा न हो पायें। ऐसी मुट्ठी भर पेशेवर महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। बल्कि मैं तो यहाँ तक सोचता हूँ कि इस प्रकार की विचारधारा युक्त महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिये।
किसी परिवार के सदस्य अपने आन्तरिक जीवन में मिल-बैठकर अपना निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हां। उनके आन्तरिक मामलों में टकराव पैदा करने का प्रयास बहुत अधिक घातक होगा। हमारे लिए उचित है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर हो रही किसी भी योजना को विफल करने में भरपूर सहयोग करें। इस निमित्त हमें चार काम करने चाहिए- 1. पारम्परिक परिवार व्यवस्था की जगह लोकतान्त्रिक परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित करें। 2. पुरुषों को इस बात के लिए तैयार करें कि वे महिलाओ के साथ समानता का व्यवहार करने की आदत डालें। 3. महिलाओं को यह बात स्पष्ट करें कि उनके साथ किसी तरह का कोई अन्याय नहीं हो रहा है, बल्कि परिवार-समाज तोड़क स्वार्थी तत्वों द्वारा अन्याय का प्रचार करके सहजीवन और परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुचाई जा रही हैं। 4. महिलाओं को यह आभास कराया जाये कि यदि पति-पत्नी के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी होगी तो वह महिलाओं के लिए भी हानिकारक होगी क्योंकि महिला और पुरुष एक-दूसरे के पूरक है। यदि हम ये बाते समझाने में सफल हो जाये तो महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले स्वार्थी तत्व अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे।
सारांशः राजनैतिक नेता अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये महिला सशक्तिकरण के नारे को हथियार के रूप में उपयोग कर रहे हैं। यह नारा परिवार और समाज व्यवस्था के लिये बहुत घातक है। ऐसे नारे का पूरी तरह विरोध होना चाहिये।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 12.09.2019 द्वितीय सत्र दोपहर बाद में होगा। ’’महिला सशक्तिकरण समस्या या समाधान ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 12.09.2019 को प्रथम सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-25 “वर्ण-व्यवस्था”
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कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था थी न कि कोई बुराई।
2. वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियां सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण-कर्म-स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियां बनती है।
3. किसी भी बालक की प्रवृत्ति में तीन परिस्थितियों का समावेश होता है- 1. जन्म पूर्व के संस्कार 2. पारिवारिक वातावरण 3. सामाजिक परिवेश।
4. निरभिमानी, ज्ञान और त्याग से युक्त को ब्राह्मण; वीर, युद्धप्रिय, मरने और मारने को तैयार, स्वाभिमानी को क्षत्रिय; जो मरने मारने से डरे, व्यावहार-व्यापार कुशल, संग्रह प्रधान उसे वैश्य; जो बालक श्रम प्रधान होता था बुद्धिप्रधान नहीं, उसे श्रमजीवी मानकर शूद्र रहने दिया जाता था। इन सबमें ब्राह्मण प्रवृत्ति को सर्वोच्च तथा शूद्र प्रवृत्ति को सबसे कम महत्व दिया जाता था।
5. अधिकतम से न्यूनतम की ओर उत्तरोत्तर घटते क्रम में ब्राह्मण को सम्मान पावर, धन और सुख, क्षत्रिय को पावर सम्मान धन और सुख, वैश्य को धन सुख पावर सम्मान और शूद्र को सुख धन पावर सम्मान प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी थी व सीमा भी।
6. ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शूद्र को श्रम के आधार पर जीवन यापन करने की सीमाएं बनी हुयी थी।
7. जो लोग सामाजिक व्यवस्था का घोर उल्लंघन करते थे, उनका सामाजिक बहिष्कार करने की प्रथा थी। ऐसे ही बहिष्कार के अन्तर्गत लोग अवर्ण या अछूत कहे जाने लगे। शूद्र न कभी अछूत थे न अवर्ण।
8. बहुत लम्बे समय के बाद रूढ़िवादिता के कारण वर्ण-व्यवस्था योग्यता तथा प्रवृत्ति का ऑकलन किये बिना जन्म के आधार पर ही घोषित होने लगी जिसके दुष्परिणाम ने उस पूरी व्यवस्था को ही विकृत व सामाजिक रूप से अमान्य कर दिया।
9. जब वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित होती है तब ’महाजनों येन गतः स पन्थाः’ का आंख मूंदकर अनुकरण करना चाहिये और जब जन्म पर आधारित हों तब बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहिये।
10. अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र ब्राह्मण बनने लगे, कायर राजा पुत्र राजा, अकुशल वैश्य बनने लगे तथा अच्छे-अच्छे योग्य लोग भी शूद्र से आगे नहीं बढ़ सके। वर्ण व्यवस्था इस प्रकार से लगभग समाप्त सी हो गई।
11. वर्तमान समय में भी वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य कोई श्रेष्ठ मार्ग नहीं दिखता है। वर्ण व्यवस्था के अप्रभावी होने के फलस्वरूप दिशाविहीन समाज में अव्यवस्था आ गई।
12. दयानन्द सरीखे महापुरूषों ने इस विकृति को समझा और जन्म के आधार पर वर्ण और जाति को अस्वीकार करके ब्राह्मण आदि चतुर्विधि प्रवृत्ति को समझा और कर्म के आधार पर सामाजिक मान्यता दिलाने की कोशिश की।
13. हम समझते है कि वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
14. संविधान निर्माताओं को वर्ण व्यवस्था को जन्म की अपेक्षा कर्म के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिये था किन्तु इसके ठीक विपरीत इन्होंने वर्ण व्यवस्था को जन्म के आधार पर मान्यता दे दी। उन्होंने वर्ण व्यवस्था के सुधार के स्थान पर वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष को प्रोत्साहित किया।
15. यदि हम पूरी दुनियां का ऑकलन करें तो भारत की व्यवस्था ही एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें प्रवृत्ति योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य विभाजन था। उसमें भी ज्ञान और त्याग को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
16. भारतीय संस्कृति को छोड़कर किसी भी अन्य संस्कृति में चारों गुणों का सामन्जस्य नहीं दिखता।
17. सामाजिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रवेश जितना बढ़ता है उतनी ही अव्यवस्था बढ़ती है। जैसा कि भारत में हो रहा है।
18. वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वर्णो का निर्धारण जन्म के आधार पर न होकर प्रवृत्ति, गुण और स्वभाव के आधार पर किसी परीक्षा के बाद ही घोषित होना चाहिये।
यह निर्विवाद सत्य है कि भारत की अति प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पूरी दुनियां की तुलना में अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक थी। उस समय तो भारत वैज्ञानिक मामलों में भी दुनियां से ऊपर था और सामाजिक मामलां में तो था ही। दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते है,- सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्मपूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला-जुला प्रभाव व स्वरूप होता है। गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर यदि ऑकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलते हैं। इन चारों गुणों के कुछ अंश प्रत्येक व्यक्ति में जन्म से मृत्यु तक रहते हैं किन्तु चारों के कुछ अंश होते हुये भी प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष योग्यता भी होती है। इस विशेष योग्यता के ऑकलन के बाद ही इन्हें हम मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक के रूप में विभाजित कर सकते हैं। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था। प्रत्येक बालक को बचपन में ही उसकी प्रवृत्ति का ऑकलन करके उसे सही दिशा में प्रशिक्षित किया जाता था।
किसी भी बालक की प्रवृत्ति में तीन परिस्थितियों का समावेश होता है- 1. जन्म पूर्व के संस्कार 2. पारिवारिक वातावरण 3. सामाजिक परिवेश। जन्म पूर्व के संस्कार पैतृक होते हैं या पूर्व जन्म के या दोनो ही मिलकर यह अब तक स्पष्ट नहीं है, किन्तु जन्म पूर्व के संस्कार प्रवृत्ति को प्रभावित तो करते ही हैं। यह सत्य है कि जन्म के बाद बचपन के संस्कारों में परिवार का प्रभाव पड़ता है तथा छः से लेकर बारह वर्ष तक की उम्र के बाद सामाजिक प्रभाव भी पड़ना शुरू हो जाता है। यही कारण है कि अति प्राचीन समय में प्रवृत्ति का ऑकलन करते समय छः से बारह वर्ष तक की उम्र ही उचित मानी जाती थी। वर्ण व्यवस्था में आठवें वर्ष में ब्राह्मण, दसवें वर्ष में क्षत्रिय तथा बारहवें वर्ष में वैश्य घोषित किया जाता था तथा पहचान स्वरूप यज्ञोपवीत दिया जाता था। ’जन्मना जायते शूद्रः’ के अनुसार जन्म से लेकर यज्ञोपवीत तक प्रत्येक बालक शूद्र होता था तथा यदि यज्ञोपवीत नहीं मिला तो वह शूद्र ही रह जाता था। वर्ण व्यवस्था में शूद्र का अर्थ श्रमजीवी होता था। इस कालखण्ड में जिस बालक मे जो प्रवृत्ति अधिक प्रभावी दिखती थी उसे उसी प्रवृत्ति के वर्णानुसार दिशा में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्रवर्ण का कहा जाता था। जिस बालक में चिन्तन का अधिक प्रभाव होता था, जो मरने से तो न डरे किन्तु मारने से पूरी तरह अलग रहे तथा जो किसी दूसरे पर अपनी बात बलपूर्वक थोपने को एक बुराई समझे उसे ब्राह्मण प्रवृत्ति का मान लिया जाता था। ऐसा बालक शान्त, गम्भीर, निरभिमानी, ज्ञान और त्याग से भरपूर माना जाता था। इसके ठीक विपरीत युद्धप्रिय, मरने और मारने को तैयार, दूसरों पर शासन करने की इच्छा रखने वाले स्वाभिमानी को क्षत्रिय कहा जाता था। ऐसा बालक निडर, साहसी प्रवृत्ति का माना जाता था। इन दोनो के विपरीत जो मरने मारने से डरे तथा दूसरों पर अपनी बात न थोपता हो उसे वैश्य मानते थे। ऐसा बालक चालाक, लोभी और डरपोक माना जाता था। जो बालक श्रम प्रधान होता था बुद्धिप्रधान नहीं, उसे श्रमजीवी मानकर शूद्र रहने दिया जाता था। इन सबमें ब्राह्मण प्रवृत्ति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था तथा शूद्र प्रवृत्ति को सबसे कम महत्व दिया जाता था।
आश्रम व्यवस्था में भी वर्ण व्यवस्था का समावेश था। अर्थात ब्राह्मण को जीवन के अन्तिम समय में सन्यास तक पहुॅचना होता था। जबकि क्षत्रिय वानप्रस्थ तक ही था, वैश्य और शूद्र गृहस्थ तक ही थे। प्राचीन समय में ऐसी व्यवस्था थी कि ब्राह्मणों के साथ किसी प्रकार का बल प्रयोग अनुचित था दूसरी ओर ब्राह्मण को सम्मान के अतिरिक्त कोई राजनैतिक पद अथवा धन रखने पर पूरी तरह प्रतिबन्ध था। अगर वह इन सब का प्रयत्न करता था तो उसे असामाजिक मान लिया जाता था अथवा उसका वर्ण बदल भी दिया जाता था। इसी तरह क्षत्रिय को ब्राह्मण की तुलना में कम सम्मान और सामान्य धन के आधार पर जीवन बिताना पड़ता था। वैश्य को सबसे कम सम्मान तथा राजनैतिक शक्ति शून्य पर संतोष करना था किन्तु वैश्य को सब प्रकार की अधिकतम धन सम्पत्ति सुविधाओं की स्वतंत्रता थी। श्रमिक को सर्वोच्च सुख की सुविधा प्राप्त थी। उसे सम्मान, पावर और धन से मुक्त होकर सेवा के माध्यम से अधिकतम सुख प्राप्त करने की व्यवस्था थी। समाज द्वारा उसकी सामान्य जीवन उपयोगी मूलभूत आवश्यकतायें पूरी करने की गारंटी थी। ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शूद्र को श्रम के आधार पर अपनी सुविधाएं इकठ्ठी करने की सीमाएं बनी हुयी थी। इन सीमाओं को न कोई तोड़ सकता था न ही उनकी तोड़ने की मजबूरी थी क्योंकि समाज व्यवस्था इतनी मजबूत और सुचारू ढंग सेचल रही थी कि किसी के सामनें कोई संकट या मजबूरी कभी आती ही नहीं थी। कार्य विभाजन सबका अलग-अलग था और व्यवस्थित था। एक वर्ण दूसरे वर्ण के कार्य/व्यवसाय में न हस्तक्षेप करता था न प्रतिस्पर्धा करता था। कोई व्यक्ति एक से अधिक कार्य अपने पास केन्द्रित नहीं कर पाता था। परिणाम स्वरूप किसी भी वर्ण मे बेरोजगारी का खतरा नहीं था। स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था भारत के अतिरिक्त दुनियां के अन्य देशों में न के बराबर थी। महिलाओं के सम्बन्ध में उच्च वर्ण के पुरूष द्वारा निम्न वर्ण की महिलाओं के साथ विवाह और संतान उत्पत्ति मान्य थी। निम्न वर्ण के पुरूष द्वारा उच्च वर्ण की महिलाओं से विवाह या संतान उत्पत्ति वर्जित थी। सुप्रजनन इसका उद्देश्य था। यह सब सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक संरचना के आधार पर चल रही थी।
आदर्श वर्ण व्यवस्था में मार्गदर्शक की सीमा सर्वोच्च सम्मान तक, रक्षक की सर्वोच्च शक्ति तक, पालक की सर्वोच्च सुविधा एवं धन सम्पत्ति तक तथा सेवक की सर्वोच्च सुख तक होती है। आदर्श वर्ण व्यवस्था में मार्गदर्शक अर्थात ब्राह्मण मर सकता है मार नहीं सकता, हृदय परिवर्तन कर सकता है पर डरा नहीं सकता सत्य छुपा सकता है किन्तु झूठ नहीं बोल सकता। रक्षक अर्थात क्षत्रिय कूटनीति का प्रयोग कर सकता है बल प्रयोग कर सकता है किन्तु उपदेश तथा प्रवचन नहीं दे सकता। मरने और मारने के लिये तैयार रहता है। पालक अर्थात वैश्य जनहित में सच छुपा भी सकता है और झूठ भी बोल सकता है। मरने और मारने से बचेगा। लालच दे सकता है, शत्रु को धोखा भी दे सकता है किन्तु प्रवचन, उपदेश नहीं दे सकता तथा डर, भय नहीं दिखा सकता। वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियां सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण-कर्म-स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियां बनती है। ब्राह्मणों में भी कार्य के अनुसार पुजारी, द्विवेदी या अन्य जातियाँ थी। यहां तक कि ब्राह्मणों में ही महाब्राह्मण की भी एक जाति थी। इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों में भी जातियां-उपजातियां बनी हुई थीं। जो लोग सामाजिक व्यवस्था का घोर उल्लंघन करते थे, उन्हें भी किसी प्रकार का दण्ड नहीं दिया जा सकता था किन्तु उनका सामाजिक बहिष्कार करने की प्रथा थी। ऐसे ही बहिष्कार के अन्तर्गत सामाजिक दण्ड स्वरूप अलग-अलग किये गये लोग अवर्ण या अछूत कहे जाने लगे। शूद्र न कभी अछूत थे न अवर्ण।
बहुत लम्बे समय के बाद जब सामाजिक व्यवस्थायें रूढ़ होकर विकृत हो जाती है तो उसके दुष्परिणाम उस पूरी व्यवस्था को ही सामाजिक रूप से अमान्य कर देते हैं। इसी रूढ़िवादिता के कारण वर्ण-व्यवस्था योग्यता तथा प्रवृत्ति का ऑकलन किये बिना जन्म के आधार पर ही घोषित होने लगी। यह विकृति उच्च वर्ण वालों की धूर्तता के कारण आई अथवा स्वाभाविक रूप से शिथिलता के कारण, यह कहना कठिन है। किन्तु यह विकृति आयी अवश्य। इसी तरह जो लोग सामाजिक बहिष्कार के आधार पर अछूत कहे गये, उनकी आगे आने वाली पीढ़ियां भी अछूत रह गयी। कोई परम्परा जब रूढ़ि बन जाती है तो वह परम्परा विकारग्रस्त हो जाती है तथा उसके परिणाम स्वरूप सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाने लगती है। सामाजिक व्यवस्था की इस विकृति का ही परिणाम था कि भारत धीरे-धीरे गुलामी की ओर चला गया क्योंकि अयोग्य लोग अपने को ब्राह्मण या धर्मगुरू घोषित करके पूज्य बनने लगे तथा अच्छे-अच्छे योग्य लोग भी शूद्र से आगे नहीं बढ़ सके। राजा के पुत्र राजा बनने लगे भले ही उनमें कायरों से भी अधिक बड़ा दुर्गुण क्यों न हो। विचार-चिंतन भी बंद हो गया तथा शक्ति-सुरक्षा भी कमजोर हो गई। वर्ण व्यवस्था इस प्रकार से लगभग समाप्त सी हो गई परन्तु वर्तमान समय में भी वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य कोई श्रेष्ठ मार्ग नहीं दिखता है। वर्ण व्यवस्था के अप्रभावी होने के फलस्वरूप दिशाविहीन समाज में अव्यवस्था आ गई। हम समझते है कि वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
जब वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित होती है तब ’महाजनों येन गतः स पन्थाः’ का आंख मूंदकर अनुकरण करना चाहिये और जब जन्म पर आधारित हों तब बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहिये। गुलामी के कालखण्ड में स्वामी दयानन्द सरीखे कुछ महापुरूषों ने इस विकृति को समझा और जन्म के आधार पर वर्ण और जाति को अस्वीकार करके ब्राह्मण आदि चतुर्विधि प्रवृत्ति को समझा और कर्म के आधार पर सामाजिक मान्यता दिलाने की कोशिश की। महात्मा गांधी ने उस कोशिश को और आगे बढ़ाया और ऐसा लगा कि बहुत कम समय में वर्ण व्यवस्था में जन्म का आधार हटकर प्रवृत्ति और कर्म का प्रवेश हो जायेगा किन्तु अम्बेडकर, नेहरू, सरदार पटेल सरीखे सत्ता लोलुप लोगों को यह सुधार पसन्द नहीं आया क्योंकि ऐसा सुधार समाज को तोड़ने और सत्ता के मजबूत करने में बाधक था। संविधान निर्माताओं को वर्ण व्यवस्था को जन्म की अपेक्षा कर्म के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिये था किन्तु इसके ठीक विपरीत इन्होंने वर्ण व्यवस्था को जन्म के आधार पर मान्यता दे दी। उन्होंने वर्ण व्यवस्था के सुधार के स्थान पर वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष को प्रोत्साहित किया। राजनेताओं के राजनैतिक लाभ उठानें के प्रयासो को उन हिन्दू सवर्णो का भी भरपूर समर्थन मिला जो अयोग्य होते हुये भी पूज्य बनकर समाज में रहना चाहते थे। हमारे संविधान निर्माताओं ने गांव, जिले को संविधान से बाहर करके धर्म और जाति को संवैधानिक मान्यता दे दी। इस तरह अम्बेडकर, नेहरू, पटेल आदि सत्तालोलुप राजनेताओं और पूज्य बने रहने की चाह रखने वाले हिन्दू सर्वणों के रूप में दो अलग-अलग समूहों ने गांधी और दयानन्द के प्रयत्नों का भरपूर विरोध किया। गायत्री परिवार के आचार्य श्री राम शर्मा ने भी इस विकृत व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयत्न कियें किन्तु उनके जाने के बाद वे प्रयत्न भी रूढ़ हो गये। आज स्थिति यह है कि भारत इस वर्ण व्यवस्था में न सुधार करने की स्थिति मे है और न समाप्त करने की स्थिति में, बल्कि भारत में तो सिर्फ एक ही स्थिति है कि जन्मना वर्ण और जाति को लगातार मजबूत करके दो पक्ष आपस में टकराने का नाटक करते रहे जिससे समाज धीरे-धीरे दो गुटों में बंटकर उनका गुलाम हो जाये।
यदि हम पूरी दुनियां का ऑकलन करें तो भारत की व्यवस्था ही एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें प्रवृत्ति योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य विभाजन था। उसमें भी ज्ञान और त्याग को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। यदि हम इस्लामिक व्यवस्था का ऑकलन या तुलना करें तो इस्लाम क्षत्रिय गुण प्रधान, पाश्चात्य संस्कृति वैश्य गुण प्रधान तथा साम्यवाद तो पूरी तरह शूद्र गुण प्रधान है ही। भारतीय संस्कृति को छोड़कर किसी भी अन्य संस्कृति में चारों गुणों का सामन्जस्य नहीं दिखता। किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भारत के स्वार्थी नेता और धर्मगुरू वर्ण व्यवस्था को गाली देने तक ही अपने को सीमित रखते है जबकि वर्ण व्यवस्था समाज व्यवस्था की सबसे सशक्त इकाई है। उसका राजनीति से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। सामाजिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रवेश जितना बढ़ता है उतनी ही अव्यवस्था बढ़ती है। जैसा कि भारत में हो रहा है।
वर्ण व्यवस्था का संशोधित स्वरूप
मैं अच्छी तरह समझता हॅू कि समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिये वर्ण व्यवस्था से अच्छी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। इस बात को ध्यान में रखकर मैं वर्ण व्यवस्था का एक संशोधित स्वरूप प्रस्तुत कर रहा हॅू। मैं समझता हूॅ कि ऐसी कोई नई व्यवस्था बनाना बहुत कठिन कार्य है किन्तु इसकी शुरूवात तो की ही जानी चाहिये। मेरे हिसाब से यह इस तरह हो सकती है कि बालक की प्रारंभिक प्रवृत्तियों को चार भाग 1. ज्ञान 2. शक्ति 3. सुविधा 4. सेवा में बांटकर तदनुसार प्रारंभिक टेस्ट की व्यवस्था करनी चिहये। यह पूरा टेस्ट 12 वर्ष की उम्र के पूर्व ही हो जाना चाहिये। टेस्ट में उत्तीर्ण बालक उसी प्रकार की प्रवृत्ति की उच्चस्तरीय योग्यता वृद्धि के निमित्त ही भिन्न विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करेगा। वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के नाम से संशोधित या प्रचलित करना न संभव है न उचित। कुछ नये नामों पर विचार करके फिर से वर्ण व्यवस्था को सक्रिय और प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिये। ब्राह्मण की जगह मार्गदर्शक, क्षत्रिय की जगह रक्षक, वैश्य की जगह पालक सरीखे नाम दे सकते है। शूद्र की जगह सेवक उपयुक्त नामकरण है। किन्तु वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वर्णो का निर्धारण जन्म के आधार पर न होकर प्रवृत्ति, गुण और स्वभाव के आधार पर किसी परीक्षा के बाद ही घोषित होना चाहिये।
इस सम्बन्ध में मेरा सुझाव यह है कि जो बालक ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करेगा वही बालक भविष्य में विधायिका के लिये चुनाव लड़ सकेगा, अन्य नहीं। विधायिका का काम नीति निर्धारण है। इसके लिये विशेष ज्ञान व त्याग की जरूरत होती है। भावना प्रधान लोभी, आवेशी व्यक्ति नीति निर्माण में बहुत अधिक घातक हो सकता है। इसी तरह न्यायिक और राष्ट्रपति का पद भी इसी वर्ग के लिये आरक्षित कर देना चाहिये क्योंकि इन दायित्वों के लिये विशेष ज्ञान और त्याग चाहिये। कार्यपालिका के सभी पद द्वितीय श्रेणी या क्षत्रिय वर्ण के लिये आरक्षित हो। सेना, पुलिस सहित मुख्य सचिव से लेकर तृतीय श्रेणी तक के पद इस श्रेणी के लिये आरक्षित हो सकते है। क्योंकि इस दायित्व के लिये ज्ञान का सर्वोच्च महत्व न होकर सामान्य ज्ञान से भी काम चल सकता है किन्तु विशेष कार्य कुशलता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इन सब व्यक्तियों के पास शक्ति अर्थात पद रहेगा। ये सभी लोग उसी प्रकार की शिक्षा लेकर निकलेंगे। अर्थपालिका तथा वित्तीय प्रबंधन के सभी पद तृतीय श्रेणी के लिये आरक्षित होंगे। जो लोग किसी परीक्षा में पास नही होंगे या परीक्षा ही नहीं देगे वे चौथी श्रेणी अर्थात श्रमजीवी मानें जायेंगे।
चारों श्रेणियों की उपलब्धियां भी भिन्न-भिन्न होगीं। प्रथम श्रेणी के लोगों को सर्वोच्च सम्मान मिलेगा। ऐसे लोग श्रेष्ठता के क्रम में भी उपर रहेंगे। सर्वोच्च ज्ञानी हर परिस्थिति में सर्वोच्च शासक से अधिक सम्मान प्राप्त करेगा। द्वितीय श्रेणी के व्यक्ति के पास सर्वोच्च शक्ति रहेगी। तृतीय श्रेणी के पास अधिकाधिक सुविधा होगी तथा श्रमिक को पूरी चिन्ता मुक्ति मिलेगी। किन्तु यह आवश्यक होगा कि प्रथम श्रेणी के व्यक्ति को सर्वाच्चसम्मान ही मिलेगा पद, धन या निश्चिन्तता नहीं। उसका जीवन बिल्कुल साधारण होगा। सुविधा के नाम पर वह साधारण सुविधा से अधिक नहीं पा सकता। संग्रह तो वह कर ही नहीं सकेगा। दूसरी श्रेणी का व्यक्ति दूसरी श्रेणी के सम्मान तथा सर्वोच्च सुविधा का पात्र होगा किन्तु संग्रह नही कर सकता। तीसरी श्रेणी का व्यक्ति सम्मान के हिसाब से तो तीसरा रहेगा तथा शक्ति भी नहीं रहेगी किन्तु उसे अधिकतम धन-सम्पत्ति संग्रह करने की छूट रहेगी। सुविधा के हिसाब से भी वह दूसरे क्रम के बाद का रहेगा। चौथे क्रम का व्यक्ति चिन्ता मुक्त रहेगा। उसकी सभी मूलभूत आवश्यकतायें समाज पूरी करेंगा। सम्मान शक्ति सुविधा के सब मामलों में वह चौथे क्रम पर रहेगा। निश्चित उम्र के किसी बालक या वृद्ध में कोई विशेष योग्यता दिखती है तो उसका क्रम या वर्ण उसकी प्रवृत्ति, गुण व स्वभाव के आधार पर बदला जा सकता है।
वर्तमान समय में बने हुये बौद्धिक, राजनैतिक, व्यावसायिक या श्रमिक वर्गो को मान्यता देकर हम एक शुरूवात कर सकते है जो फिर से सम्मान, शक्ति, सुविधा और सेवा को योग्यता और क्षमतानुसार अपनी-अपनी सीमाओं में बिना किसी राजनैतिक कानून के दबाव में बनाने और संचालित करने में सक्षम हो। इसका अर्थ हुआ कि अधिवक्ता समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं तय करें तो वस्त्र व्यवसायी अपनी व्यवस्था स्वयं करें। इसी तरह संत समाज भी अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं बना ले। शिक्षक और श्रमिक समूह भी अपनी आंतरिक व्यवस्था और नियमावली स्वयं बना सके। मैं तो इस मत का हूॅ कि विवाह, शादी तथा अन्य सामाजिक सम्बन्धों में भी यदि जाति और वर्ण को प्राथमिकता दी जाये तो व्यवस्था और अच्छी होगी। यदि वकील लड़के का विवाह वकील लड़की से हो और श्रमिक का विवाह श्रमिक कन्या से हो तो इसमें लाभ ही होगा हानि नहीं। इस तरह धीरे-धीरे नये तरह की आदर्श वर्ण व्यवस्था एक स्वरूप ग्रहण कर सकती है। मैं समझता हूॅ कि मेरी प्रस्तावित व्यवस्था वर्तमान व्यवस्था का एक संशोधित स्वरूप है। मेरे विचार में आज पूरी दुनियां में प्रवृत्ति के आधार पर वर्ग निर्माण का कोई तरीका नहीं है जो होना चाहिये। परिणाम स्वरूप हर आदमी सब प्रकार की दौड़ में शामिल है तथा सम्मान, शक्ति, धन, सम्पत्ति सब कुछ अपने पास ही इकठ्ठी कर लेना चाहता है। एक अजीब सी छीना छपटी का वातावरण बना हुआ है। इस वातावरण से मुक्ति मिलनी ही चाहिये।
साराशः जन्मानुसार वर्ण व्यवस्था के विकल्प के रूप में कर्मानुसार वर्ण व्यवस्था विकसित की जानी चाहिये जिसमें गुण-कर्म-स्वभाव का ऑकलन करके बालक को मार्गदर्शक, रक्षक, पालक या सेवक घोषित किया जाये। ऐसे घोषित बालक को उसी प्रकार की विशेष शिक्षा भी दें और उसी योग्यता का दायित्व भी दिया जाये।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 12.09.2019 प्रथम सत्र सुबह में होगा। ’’वर्ण व्यवस्था ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 11.09.2019 को द्वितीय सत्र

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दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-24 “वैदिक संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति”
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कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. वैदिक धर्मावलम्बी सत्य, ज्ञान, विवेक, विचार मंथन को सर्वोच्च महत्व देते थे।
2. धर्म की व्यक्तिगत आचरण की वैदिक परिभाषा मे विकृति आनी शुरू हुई।
3. इस तरह कुछ सौ वर्षों में ही धर्म, वैदिक पद्वति से निकलकर जैन बुद्व इसाइयत होता हुआ इस्लाम की हिंसा समर्थन तक गिरता चला गया।
4. वैदिक काल मे धार्मिक विद्वानों को राज्य से दूरी बनाने का स्पष्ट निर्देश था। जैन और बौद्व काल तक यह सीमा रेखा बनी रही।
5. जैन और बौद्व सम्प्रदाय दोनो ही वैदिक मत से अलग सम्प्रदाय बने और शास्त्रार्थ की परिपाटी पर प्रश्न चिन्ह लगा।
6. बुद्व और जैन के बाद धर्म को संगठन का स्वरूप दिया इशु मसीह ने। इशु मसीह ने भी अहिंसा का प्रबल समर्थन किया, किन्तु धर्म को संगठन का रूप देने की कोशिश की। भारत मे प्रचलित वैदिक धर्म से उनकी प्रणाली बिल्कुल अलग थी।
7. वेदों को मानना एक गुण हो सकता है और न मानना अवगुण किन्तु वेदों को न मानना कोई दुर्गुण नहीं कहा जा सकता।
8. वैदिक काल की समाज व्यवस्था जिसमे समाज सर्वशक्तिमान था तथा राज्य व्यक्ति धर्म गौण थे।
9. गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक, सनातन, हिन्दू या भारतीय संस्कृति भी कहते हैं।
10. वैदिक संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लगभग एक ही बताया जाता है इसलिये दोनो के बीच अंतर करना बहुत कठिन कार्य है। किन्तु मेरे विचार में तो दोनो में बहुत अंतर है।
11. वैदिक संस्कृति मे वैदिक या सनातनी ही माने जाते हैं।
12. हिन्दू संस्कृति मे वैदिक या सनातनी, जैन, बौद्ध और सिख मिलकर माने जाते है।
13. भारतीय संस्कृति मे वैदिक या सनातनी, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, इस्लाम, पारसी और इसाइयत मिलकर माने जाते हैं।
14. वैदिक संस्कृति मे त्याग महत्वपूर्ण था, गुलामी के बाद विकसित भारतीय संस्कृति मे त्याग की जगह संग्रह प्रधान बन गया।
15. वैदिक पंचायतों के समय मे भी निर्वाचन बहुमत के द्वारा नही सर्वमत के द्वारा ही किया जाता था।
16. स्वराज्य की अवधारणा बहुत पुरानी है। कुछ लोग इसे वैदिक अवधारणा मानते हैं।
17. पंचायत व्यवस्था न केवल शासन व्यवस्था के रूप मे बल्कि यहॉ की जीवन-पद्धति के रूप मे विकसित हुई थी। वैदिक काल मे तो गॉव से लेकर राष्ट्र तक ही नही अपितु समूचे विश्व भर की शासन व्यवस्था पंचायत प्रणाली पर आधारित थी।
18. वैदिक काल के समय तक तो राजा शब्द का प्रचलन ही न हुआ था। समितिः आमन्त्रण और ग्राम सभा आदि शब्दों का ही प्रचलन दिखाई देता है। जो वेद मनीषियों के अनुसार पंचायत के ही पर्यायवाची शब्द थे।
वैदिक संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लगभग एक ही बताया जाता है इसलिये दोनो के बीच अंतर करना बहुत कठिन कार्य है। किन्तु मेरे विचार में तो दोनो में बहुत अंतर है। वैदिक संस्कृति मे त्याग महत्वपूर्ण था, गुलामी के बाद विकसित भारतीय संस्कृति मे त्याग की जगह संग्रह प्रधान बन गया। वैदिक संस्कृति मे वर्ग समन्वय महत्वपूर्ण था। कोई भी समूह संख्या विस्तार को महत्व नही देता था बल्कि हर समूह गुण प्रधानता को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। भारतीय संस्कृति में वैदिक संस्कृति के ठीक विपरीत संख्या विस्तार को महत्व दिया जाने लगा। येन केन प्रकारेण वैदिक संस्कृति के लोगो की मान्यता और विश्वास को बदलकर उसे अपने साथ ले लेने को महत्व दिया गया।
प्राचीन वैदिक संस्कृति लगभग सत्ता निरपेक्ष थी लेकिन वर्तमान भारतीय संस्कृति पूरी तरह सत्ता और धन सापेक्ष हो गई है। वैदिक संस्कृति मे वसुधैव कुटुम्बकम सर्वधर्म समभाव का महत्व था। उस समय धर्म और राष्ट्र की तुलना मे समाज को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते थे। स्वराज्य की अवधारणा बहुत पुरानी है। कुछ लोग इसे वैदिक अवधारणा मानते हैं। पंचायत व्यवस्था न केवल शासन व्यवस्था के रूप मे बल्कि यहॉ की जीवन-पद्धति के रूप मे विकसित हुई थी। वैदिक काल मे तो गॉव से लेकर राश्ट्र तक ही नही अपितु समूचे विश्व भर की शासन व्यवस्था पंचायत प्रणाली पर आधारित थी। वैदिक काल मे राजा शब्द का प्रचलन ही न हुआ था बल्कि समितिः, आमन्त्रण और ग्राम सभा आदि शब्दों का ही प्रचलन उस काल मे दिखाई देता है। जो वेद मनीषियों के अनुसार पंचायत के ही पर्यायवाची शब्द थे।
वैदिक संस्कृति गुलामी सह सकती है किन्तु गुलाम नही बना सकती। हिन्दू संस्कृति गुलामी सह सकती है किन्तु गुलाम नही बना सकती। वर्तमान भारतीय संस्कृति गुलामी सह तो सकती ही नही है बल्कि गुलाम बनाने को अपनी सफलता मानने लगी है। यही कारण है कि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे निरंतर हिंसा के प्रति विश्वास बढ़ रहा है।
यह भी प्रत्यक्ष है कि हिन्दू संस्कृति अपने को सुरक्षात्मक मार्ग पर आगे बढा़ रही है तो भारतीय संस्कृति विस्तारवादी नीति पर चल रही है। हिन्दू संस्कृति का पक्षधर एक महत्वपूर्ण अंश संघ परिवार के नाम से भारतीय संस्कृति के मार्ग पर तेजी से बढ़ने का प्रयास कर रहा है। नई पीढ़ी शराफत को छोड़कर अधिक से अधिक चालाक बनने की ओर अग्रसर है। वर्तमान भारतीय संस्कृति एक मुख्य पहचान बना चुकी है कि मजबूत से दबो और कमजोर को दबाओ। इसका प्रमुख कारण है कि वैदिक संस्कृति मे संगठन का कोई महत्व नही था जबकि वर्तमान भारतीय संस्कृति में सगठन को ही सबसे अधिक सफलता का मापदंड मान लिया गया है। गर्व के साथ संघे शक्ति कलौ युगे का खुले आम नारा लगाया जाता है। मै समझता हॅू कि हिन्दू संस्कृति पर आये विस्तारवादी संकट से सुरक्षा की आवश्यकता समझकर कुछ लोगो ने यह नारा लगाया है कि किन्तु यह नारा हिन्दू संस्कृति की परंपरा और पहचान के रूप मे स्वीकार नही किया जा सकता।
वैदिक संस्कृति में व्यवस्था प्रमुख थी, राजनैतिक व्यवस्था का हस्तक्षेप सामाजिक व्यवस्था मे न्युनतम था। दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था भी राजनैतिक व्यवस्था मे हस्तक्षेप नही करती थी। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे धन और सत्ता इतने महत्व पूर्ण हो गये हैं कि इन्होने मिलकर पूरे समाज को ही गुलाम बना दिया।
वर्तमान भारतीय संस्कृति मे समाज और धर्म की परिभाषा भी बदल दी गई और महत्व भी बदल दिया गया। अब समाज की जगह या तो धर्म को उपर माना जाता है या राष्ट्र को। धर्म का अर्थ गुण प्रधान से बदलकर पहचान प्रधान हो गया है तो राष्ट्र का अर्थ बदलकर राज्य तक सीमित हो गया है। अब समाज सर्वोच्च तो रहा ही नही। वैदिक संस्कृति मे नैतिक प्रगति को भौतिक उन्नति की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाता था। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे नैतिक पतन की तो कोई चिंता ही नही है। भौतिक उन्नति ही सब कुछ मान ली गई है। इस तरह यदि हम वर्तमान भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण व्याख्या करे तो उसमे दो निष्कर्ष निकलते है। 1 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना। 2 कम से कम परिश्रम और अधिक से अधिक लाभ का प्रत्यन करना। दोनो दिशाओ मे भारत दूनिया के अन्य देशो की तुलना मे अधिक तेज गति से छलांग लगा रहा है।
हम इसके कारणो पर विचार करे तो पायेंगे कि वैदिक संस्कृति की सुरक्षा के लिये धर्मगुरू और राजनेता महत्वपूर्ण हुआ करते थे। सम्पूर्ण समाज इन दो के पीछे चला करता था। आज भी सम्पूर्ण समाज तो इन दो के पीछे चल रहा है किन्तु इन दोनो की नीयत खराब हो गई है। धर्मगुरू भी समाज को गुलाम बनाने का प्रयास कर रहे है जबकि उन्हे मार्ग दर्शन देना चाहिये था तो सत्ता भी गुलाम बनाने का प्रयास कर रही है जबकि उन्हे सुरक्षा और न्याय की गारंटी देनी चाहिये थी। हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति मे प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय की गारंटी थी, प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार प्राप्त थे। समाज किसी को भी अनुशासित तो कर सकता था किन्तु दंडित नही कर सकता था। वर्तमान संस्कृति मे समाज विदेशियों की नकल करके दंडित करना सीख गया तो राज्य समाज के हाथ से अनुशासित करने के अधिकार को भी छीन चुका है। अब खाप पंचायते दंड भी देने लग गई हैं तो राज्य समाज को बहिष्कार के अधिकार से भी वंचित कर रहा है।
भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण अंश तो हिन्दु संस्कृति का ही है किन्तु धर्म निरपेक्ष शासन व्यवस्था होने से इसमे इस्लाम और इसाइयत का भी प्रभाव शामिल है जो भले ही कम हो किन्तु है तो अवश्य ही। भारतीय संस्कृति धीरे धीरे सिद्धांतचाद को छोड़कर यथार्थवाद की ओर बढ़ रही है। परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था कमजोर होकर व्यक्तिवाद बढ़ रहा है। आध्यात्म लगातार भौतिकवाद की तरफ सरक रहा है। सबसे अधिक खतरनाक बुराई सम्पूर्ण भारत मे यह बढ़ी है कि ये अपनी सफलता के लिये चालाकी को किसी भी सीमा तक उपयोग करने को अच्छा मानने लगे है। यह बुराई भारतीय संस्कृति मे बढ़ती ही जा रही है। जो लोग भारतीय संस्कृति मे आई गिरावट का कारण पाश्चात्य या इस्लामिक संस्कृति मे खोजने का प्रयास करते है वे बताने की कृपा करे कि इस छल कपट की बुराई वृद्धि मे किसका कितना हाथ है? स्वाभाविक है कि यह बुराई न पश्चिम से आई है न इस्लामिक संस्कृति की देन है । हिन्दु संस्कृति मे भी चाहे और जो भी कमियॉ रही हो किन्तु यह बुराई तो नही थीं । यदि हम वर्तमान भारतीय संस्कृति की वर्तमान गंभीर बुराई को खोजना शुरू करे तो यह गंभीर बुराई किसी अन्य संस्कृति से न आकर हमारी भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से आई है और लगातार चुपचाप आती जा रही है।
प्राचीन और वर्तमान संस्कृति में आये बदलाव का परिणाम साफ दिख रहा है। परिवार व्यवस्था टूट रही है। राज्य व्यवस्था भी अव्यवस्था की तरफ जा रही है। सुरक्षा और न्याय पर से विश्वास घटकर सामाजिक हिंसा पर विश्वास बढ़ रहा है। लोकतंत्र की जगह तानाशाही की आवश्यकता महसूस हो रही है। सम्पूर्ण समाज किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति मे है। वह अपनी गौरवशाली प्राचीन संस्कृति का अनुकरण करके ठगा जाता रहे अथवा वर्तमान भारतीय संस्कृति के साथ घुल मिलकर औरों को ठग ले यह निश्चय करना कठिन हो रहा है। ऐसी परिस्थिति मे क्या करना चाहिये यह बहुत कठिन है। न तो हम ठगे जाने तक की शराफत की सलाह दे सकते है न ही ठग लेने तक की चालाकी को हम अच्छा मान सकते है। इसलिये जो कुछ हमारी हिन्दू संस्कृति का आधार है उसका ही आखं मूंदकर अनुकरण किया जाये इससे मै सहमत नही। साथ ही मै इस धारणा के भी विरूद्ध हॅू कि जो कुछ पुराना है वह पूरी तरह रूढ़िवादी है , विकास विरोधी है और उसे आंख मूदकर बदल देना चाहिये ।
मै तो इस मत का हॅू कि हम शराफत और चालाकी की जगह समझदारी से काम ले अर्थात प्राचीन वैदिक संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति के सैद्धान्तिक गुण दोषो की विवेचना करके उन्हे व्यावहारिक धरातल की कसौटी पर कसा जाये, उसके बाद कोई मार्ग समाज को दिया जाये। इस संबंध मे मेरा विचार यह है कि सबसे पहले पूरे भारत मे इस धारणा को विकसित किया जाये कि समाज सर्वोच्च ह,ै धर्म और राष्ट्र उसके सहायक या प्रबंधक है। परिवार को समाज की प्राथमिक और अनिवार्य इकाई माना जाये। अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी के साथ मिलकर सहजीवन मे जीवन जीने की शुरूआत करनी होगी। परिवार के बाद गांव को भी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई माना जाये। भारतीय संविधान मे से धर्म और जाति की जगह परिवार ओर गांव को शामिल किया जाये। व्यवस्था के मार्गदर्शन का अंतिम अधिकार धर्मगुरूओ तथा राजनेताओ से निकाल कर संपूर्ण समाज की भूमिका महत्वपूर्ण की जाये।
इसका अर्थ हुआ कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र से निकालकर लोक को अथवा लोक द्वारा बनायी गई किसी व्यवस्था को दिया जाये जिसमे तंत्र से जुड़ी किसी इकाई का कोई हस्तक्षेप न हो। यहां से हम शुरूआत करे तो आगे आगे कुछ और मार्ग निकल सकते है जिसके परिणाम स्वरूप प्राचीन संस्कृति और वर्तमान संस्कृति के बीच का कोई संशोधित मार्ग निकल सकता है जो हमारे लिये आदर्श बने।
यदि हम अपनी समीक्षा करें तो राज्य पद्धति की लाइलाज बीमारी को छोड़कर भारतीय संस्कृति के लिये उचित क्या है? इस्लामिक संस्कृति की ओर मुँह करे या पश्चिम की ओर। मेरे विचार मे दोनो ही संस्कृतियो के कुछ अलग अलग गुण दोष है। किसी एक से चिपटना न उचित है न संभव। अच्छा तो यही होगा कि हम हिन्दू संस्कृति के सिद्धान्तवाद को पश्चिमी संस्कृति के कठिन यथार्थवाद से जोड़कर अपनी राह बनावें। हम न आध्यात्म के मार्ग से चिपटे रहे न भौतिकवाद के आकर्षक राह पर ही दौड़ना शुरू कर दें। हम करें सिर्फ यही कि हिन्दू धर्म को विज्ञान के साथ तालमेल करके भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम करें।
हम अनावश्यक कानूनो को समाप्त कर, परिवार गांव जिले को अधिकतम अधिकार सौप दे अथार्त्, लोक स्वराज्य को लागू करें, तब संभव है कि हमारी भारतीय संस्कृति अपने कंलक से मुक्त हो जावे और बीच का कोई सम्मान जनक मार्ग निकल आवे।
साराशः वैदिक संस्कृति हमारा स्वर्णिम अतीत है और भारतीय संस्कृति हमारा समस्याग्रस्त वर्तमान। यदि हम समाज-केंद्रित वैदिक संस्कृति के गुणों को विज्ञान और यथार्थ के साथ अपना सके तो हमारा वर्तमान भी समस्यामुक्त होगा और हमारा भविष्य भी।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 11.09.2019 द्वितीय सत्र दोपहर बाद में होगा। ’’वैदिक संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 11.09.2019 को प्रथम सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-23 “धर्म और संस्कृति”
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कुछ सर्व-स्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. धर्म विज्ञान, विचार और मस्तिष्क से नियंत्रित होता है तो संस्कृति परम्परा, भावना, और हृदय प्रधान होती है।
2. धर्म ज्ञान और सिद्धान्त प्रधान है, संस्कृति क्रिया और व्यावहार प्रधान है।
3. व्यक्तिगत स्तर पर, धर्म का प्रभाव चरित्र प्रधान होता है और संस्कृति का प्रभाव आचरण प्रधान होता है।
4. धर्म व्यक्तिगत आचरण तक सीमित होता है तो संस्कृति सामूहिक आचरण तक। धर्म में विचार अधिक होता है भावना कम, किन्तु संस्कृति भावनात्मक ही अधिक होती है।
5. धर्म और संस्कृति कुछ मामलां मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलां मे अलग अलग भी।
6. धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तव्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरां के प्रति किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा।
7. धर्म व्यक्तिगत होता है समूहगत नही होता, जबकि संस्कृति समूहगत होती है व्यक्तिगत नहीं।
8. धर्म और संस्कृति बिल्कुल अलग अलग विषय हैं।
9. धर्म हमेशा सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है और संस्कृति नकारात्मक भी हो सकती है।
10. अब तो धीरे धीरे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि अनेक सम्प्रदाय और संगठन भी स्वयं को धर्म कहने लग गये हैं और संस्कृति के साथ भी स्वयं को जोड़ रहे हैं।
11. धर्म हमेशा गुण प्रधान होता है तथा समाज के हित मे कार्य करता है। संस्कृति पहचान प्रधान भी हो सकती है और समाज के लिए लाभदायक या हानिकारक भी हो सकती है।
धर्म और संस्कृति बिल्कुल अलग अलग विषय हैं। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तव्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा। धर्म व्यक्तिगत होता है समूहगत नही होता जबकि संस्कृति समूहगत होती है व्यक्तिगत नहीं।
धर्म विज्ञान, विचार और मस्तिष्क नियंत्रित होता तो संस्कृति परम्परा, भावना और हदय प्रधान होती है। धर्म हमेशा गुण प्रधान होता है तथा समाज के हित मे कार्य करता है। संस्कृति किसी भी प्रकार की हो सकती है। संस्कृति पहचान प्रधान भी हो सकती है और समाज के लिए लाभदायक या हानिकारक भी हो सकती है। धर्म हमेशा सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है और संस्कृति नकारात्मक भी हो सकती है। धर्म व्यक्ति केंद्रित होता है और संस्कृति समूह केंद्रित।
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते हैं। इसलिये धर्म और संस्कृति का एक दूसरे पर प्रभाव भी पड़ता है। लोग जैसा धर्म अपनाते हैं वैसा ही वे आचरण करते हैं। जन्म लेते ही व्यक्ति पर अपने चारों ओर के परिवेश व माहौल का प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है। लोगों की जैसी धार्मिक स्थिति-अवस्था होती है उसी से प्रेरित-प्रभावित उनका चरित्र व आचरण होता है। वैसी ही शिक्षा प्रारम्भ से बच्चों को दी जाने लगती है, तदनुसार बच्चे आचरण करने लगते हैं जो दीर्घकाल में गहराई में जाकर सूक्ष्म रूप से संस्कार बन जाते हैं। कालान्तर में समूहगत हुए यही संस्कार संस्कृति का रूप ले लेते हैं।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि प्रत्येक व्यक्ति का जन्म किसी न किसी प्रकार के सांस्कृतिक माहौल व परिवेश में होता ही है। वह उसी प्रभाव में पलता-बढ़ता व शिक्षा ग्रहण करता है। जीवन यात्रा के स्वाभविक सामान्य क्रिया कलापों, अनुभवों व चितन-मनन के फलस्वरूप वह किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। ऐसे ही मार्गदर्शक निष्कर्ष प्रमाणित, घोषित व मान्य होकर धर्म का रूप ले लेते हैं।
जब समाज में कोई शब्द बहुत अधिक सम्मानजनक अर्थ ग्रहण कर लेता है तब कुछ अन्य शब्द उस शब्द के साथ घालमेल करके उसका अर्थ विकृत कर देते हैं। धर्म शब्द बहुत अधिक सम्मानजनक था तो धर्म के साथ संस्कृति का घालमेल हुआ। ये दोनों बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी समानार्थी होते चले गये। अब तो धीरे धीरे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि अनेक सम्प्रदाय और संगठन भी स्वयं को धर्म कहने लग गये हैं और संस्कृति के साथ भी स्वयं को जोड रहे हैं। धर्म किसी भी परिस्थिति में संगठन नहीं हो सकता, कभी अधिकार की मांग नहीं कर सकता, मुख्य रुप से व्यक्तिगत आचरण तक सीमित होता है, अपनी कोई पृथक पहचान नहीं बनाता, धर्म किसी अन्य के साथ भेद-भाव भी नहीं करता किन्तु तथाकथित धर्म, सम्प्रदाय स्वयं को धर्म कहकर इन सब दुर्गुणो का धर्म में समावेश कर देते हैं।
कुछ हजार वर्ष पूर्व दुनिया में दो संस्कृतियां प्रमुख थीं- 1 भारतीय संस्कृति 2 यहूदी संस्कृति। भारतीय संस्कृति में चार वर्ण और चार आश्रम को मुख्य आधार बनाया गया था तो यहूदी संस्कृति में धन-सम्पत्ति मुख्य आधार थे। आज भी दोनों के अलग अलग लक्षण देखे जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में आई विकृतियों के सुधार स्वरुप बौद्ध और जैन संगठन अस्तित्व में आये। दूसरी ओर यहूदी संस्कृति में सुधार के लिए इसाईयत और इस्लाम आगे आये। स्वाभाविक है कि दोनों संस्कृतियों के आगे आने वाले संगठनों के भी गुण और प्रभाव अलग अलग रहे। इन सबने संगठन बनाये, विस्तार करने का प्रयास किया और धीरे धीरे स्वयं को धर्म कहना शुरु कर दिया। यहीं से संस्कृति, धर्म, सम्प्रदाय और संगठन का आपस में घालमेल शुरु हो गया। धर्म का वास्तविक अर्थ भी विकृत हुआ और धर्म कर्तव्य से दूर होकर अन्य अर्थो में प्रयुक्त होने लगा।
किन्तु यदि हम भारतीय संस्कृति से निकले बौद्ध, जैन तथा यहूदी संस्कृति से निकले ईसाइयत इस्लाम की तुलना करें तो दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क दिखता है। भारतीय संस्कृति नुकसान सह सकती है, कर नहीं सकती है। आज भी दूनिया में हिन्दू संस्कृति ही अकेली ऐसी संस्कृति है जिसने अपनी संगठन शक्ति में संख्यात्मक विस्तार के प्रयास कभी नहीं किये और इसके दरवाजे पूरी तरह बंद कर रखे हैं। हिन्दू संगठन, धर्म या संस्कृति में किसी अन्य को प्रवेश कराने का प्रयास वर्जित है। गुण प्रधान धर्म में कोई भी शामिल हो सकता है। दूसरी ओर इस्लाम और इसाईयत अपनी संख्यात्मक वृद्धि के लिए सभी प्रकार के उचित अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं। भारतीय संस्कृति, सँख्या विस्तार के दृष्टिकोण से अनाक्रामक, निरुत्साहित व संतुष्ट है। संख्यात्मक वृद्धि के विरुद्ध, भारतीय संस्कृति की यह एकपक्षीय सोच/घोषणा उसकी मूर्खता तो कहीं जा सकती है किन्तु धूर्तता बिल्कुल भी नहीं। यह उसके लिए गर्व करने का विषय हो सकता है, शर्म करने का नहीं। इस प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्षों तक गुलामी सही है किन्तु किसी को गुलाम नहीं बनाया। इस गलती के कारण हिन्दूओं की संख्या लगातार घटती गई है किन्तु कभी उन पर धर्मान्तरण के प्रयास का कलंक या आरोप नहीं लगा। सारी दुनियां मे कोई ऐसा देश नही जहां मुसलमान दूसरो को शान्ति से रहने देते हां । इन्होने कभी सहजीवन सीखा ही नही। दूसरी ओर हिन्दू जहां भी है वहां कोई अशान्ति पैदा नही करते। यहूदी संस्कृति से निकले इस्लाम और इसाईयत को इस बात का संतोष हो सकता है कि उसने पूरी दुनिया में अपना विस्तार बढाया है। किन्तु सौम्यता, सदभाव व सम्मान की दृष्टि से ये संस्कृतियॉ भारतीय संस्कृति का मुकाबला नहीं कर सकती।
ऐसे ही संक्रमणकाल में एक साम्यवादी संस्कृति का उदय हुआ जिसने भारतीय और यहूदी संस्कृति से भी अलग जाकर अपनी भिन्न पहचान बना ली। उसका भी बहुत तेज गति से विस्तार हुआ और उतनी ही तेज गति से उसका समापन भी शुरु हो गया है। जिस गति से इस्लामिक संस्कृति ने अपना विस्तार किया है उस पर भी धीरे धीरे संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
भारतीय संस्कृति मुख्य रुप से गुण प्रधान थी। लोग जिस तरह का धार्मिक आचरण करते थे, वैसी ही शिक्षा प्रारंभ से ही बच्चों को दी जाती जो कि आचरण, अभ्यास और आदत से होते हुए उन बच्चों के संस्कार बन जाती थी। वह संस्कार बढ़ते बढ़ते भारतीय संस्कृति के रुप में विकसित हुए जिनमें सहजीवन, वसुधैव-कुटुम्बकम, कर्तव्य प्रधानता, सहन शक्ति, सर्वधर्म-समभाव संतोष आदि गुण प्रमुख रहे। इसके ठीक विपरीत, इस्लाम ने अपने बच्चां पर मदरसों के माध्यम से जिस शिक्षा का विस्तार किया वह कुछ ही समय के बाद इस्लामिक संस्कृति बनकर दुनियां को अशान्त किये हुए हैं।
इस्लामिक संस्कृति तथा इसाई संस्कृति ने भारतीय संस्कृति पर कुछ प्रभाव डाला। भारतीय संस्कृति में भी अपनी सुरक्षा की चिंता घर करने लगी। ऐसी चिंता के परिणाम स्वरुप ही सिख समुदाय का भारत में विस्तार हुआ और वह भी धीरे धीरे पहले सम्प्रदाय संगठन और अब अपने को धर्म कहने लग गया है। पिछले कुछ वर्षों से इसी सुरक्षा की चिंता के परिणामस्वरुप संघ नामक संगठन का विस्तार हुआ । उसने अभी स्वयं को अलग सम्प्रदाय या धर्म तो नहीं कहा है किन्तु पूरी ताकत से भारतीय संस्कृति के मूल स्वरुप को बदलने का प्रयास कर रहा है। जो दुर्गुण विदेशी संस्कृतियों में थे उन्हीं दुगुर्णो का भारतीय संस्कृति में भी लगातार प्रवेश हो रहा है। अब धर्म का अर्थ पूजा पद्धति और पहचान तक सीमित हो रहा है। अब धर्म कर्तव्य प्रधान की जगह अधिकार प्रधान बन रहा है। अब भारतीय संस्कृति भी सख्यात्मक विस्तार की छीना-झपटी में शामिल होने का प्रयास कर रही है। अब भारतीय संस्कृति भी सहजीवन की अपेक्षा प्रतिस्पर्धा की ओर बढ रही है।
धार्मिक आधार पर भारत में बड़ा बदलाव दिख रहा है। भारत गुण प्रधान धर्म के स्थान पर धर्म के संगठनात्मक स्वरूप की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह पूरी तरह इस्लाम का प्रभाव है। होना तो यह चाहिये था कि इस्लाम को भारत गुण प्रधान धर्म की दिशा में बढ़ने के लिये मजबूर कर देता किन्तु राजनैतिक स्वार्थ के कारण हिन्दूत्व अपनी दिशा बदलने को मजबूर हुआ। अब नई सरकार के बाद कुछ बदलाव संभव है। सांस्कृतिक धरातल पर भारत में पश्चिम और साम्यवाद के व्यापक प्रभाव के कारण भारत एक खिचड़ी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। जो भारतीय संस्कृति सहजीवन, वसुधैव-कुटुम्बकम, सर्वधर्म-समभाव के आधार पर चल रही थी अब उसमें दो स्पष्ट दुर्गुण प्रवेश कर गये हैं- 1 न्युनतम श्रम अधिकतम लाभ के प्रयत्न। 2 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना।
मैं मानता हॅू कि ये दोनों दुगुर्ण विदेशी संस्कृति के प्रभाव से आये या कुछ परिस्थितिवश मजबूरी से आये किन्तु आये अवश्य है। अब हिन्दू जनमानस स्वयं को इस बात के लिए तैयार करने में लगा है कि मुसलमानों को येनकेन प्रकारेण हिन्दू बनाने का प्रयास किया जाये। धार्मिक आधार पर संगठित होकर राजनैतिक शक्ति संग्रह करने की इच्छा भी बलवती होती जा रही है। धर्म तो अपना अर्थ और स्वरुप खोता ही जा रहा है किन्तु संस्कृति भी धीरे धीरे विकारग्रस्त होती जा रही है। दिखता है कि हिन्दू संस्कृति अपना प्राचीन गौरवशाली इतिहास खो देगी और इस्लामिक संस्कृति को अपनी वास्तविक शक्ति का परिचय करा देगी। परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता किन्तु ऐसा होता हुआ स्पष्ट दिख रहा है।
परिस्थितियां जटिल है। किसी एक तरफ निष्कर्ष निकालना कठिन है। ऐसी परिस्थिति में गुण प्रधान धर्म का विस्तार कैसे हो? मैं तो यही सोचता हॅू कि परिस्थितियां इस्लाम को इस बात के लिए मजबूर करें कि वह विस्तारवादी संस्कृति को छोडकर सहजीवन के मार्ग पर आ जाये। साथ ही हम भारतीय संस्कृति के लोग मुसलमानों को इस बात के लिए आश्वस्त करें कि भारतीय संस्कृति अपनी मूल पहचान सहजीवन से जरा भी अलग नही होगी। जो लोग शान्ति से रहना चाहेंगे उन्हे पूरा सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध होगा।
सारांशः भारतीय संस्कृति के समक्ष दुविधा पैदा हो गई है कि वह अपनी गुण प्रधान परंपराओं को अक्षुण रखते हुये निरंतर नुकसान उठाती रहे अथवा दूसरी पहचान प्रधान संस्कृति के आधार पर बदलाव करके उनसे मुकाबला करे। मुझे महसूस होता है कि दोनो मार्ग ठीक नहीं हैं। आदर्श स्थिति यह होगी कि भारत की राजनैतिक व्यवस्था भारतीय संस्कृति को सुरक्षा कवच उपलब्ध करावे तथा भारतीय संस्कृति अपनी गुण प्रधान संस्कृति की दिशा में निरंतर बढ़ती रहे।
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ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 10.09.2019 को द्वितीय सत्र

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दोपहर बाद होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-22 “व्यक्ति, परिवार और समाज”
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कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. परिवार समाज व्यवस्था की पहली जीवंत इकाई है। परिवार स्वयं एक स्वतंत्र इकाई है, स्त्री-पुरूष का संघ नहीं, जैसा पश्चिम की व्यवस्था मानती है। समाज में स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं। समाज में स्त्री और पुरूष को पृथक वर्ग के रूप में मान्यता देना या प्रोत्साहन घातक है, परिवार और समाज व्यवस्था के लिए विघटनकारी है।
2. भारतीय संविधान में परिवार शब्द या परिवार व्यवस्था के संबंध में कुछ भी नहीं है। संवैधानिक व्यवस्था में परिवार को भी मान्यता मिलनी चाहिए।
3. सामूहिक स़ंपत्ति तथा सामूहिक उत्तरदायित्व के आधार पर एक साथ रहने वाले व्यक्तियों के समूह को परिवार कहते हैं। परिवार की स़ंपत्ति पर सबका समान अधिकार होगा अर्थात् किसी का कोई अधिकार तब तक नहीं होगा जब तक वह परिवार में है। परिवार के प्रत्येक अच्छे बुरे कार्य के परिणाम में सबका बराबर दायित्व या अधिकार होगा। परिवार के किसी भी सदस्य के लिये अपराध का उत्तरदायित्व भी पूरे परिवार का होना चाहिये।
4. परिवार में दो पद होने चाहिये- 1. मुखिया जो कार्यपालक हो तथा सबकी राय से चुना जाये। 2. प्रमुख, जो औपचारिक हो, पारम्परिक हो तथा परिवार के सदस्यों में सबसे अधिक उम्र का हो।
5. स़ंपत्ति का विभाजन, मुखिया का चुनाव, प्रमुख का चुनाव (उम्र छोड़कर) अपराधों के परिणाम में सहभागिता या निर्णय में सहभागिता में उम्र, लिंग या योग्यता का कोई भेद नहीं होना चाहिये।
6. परिवार की संरचना में रक्त संबंधों की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिये। परिवार शब्द की नई व्यवस्था चीन के कम्यून गांधीजी के ट्रस्टीशिप के आर्थिक सिद्धान्त और भारतीय परिवार पद्धति को एक साथ मिलाकर बनाई गई है। स़ंपत्ति के संबंध में अब तक तीन सिद्धान्त स्थापित हुये है।-
1. पश्चिम का व्यक्तिगत स़ंपत्ति का 2. गांधीजी का ट्रस्टीशिप का 3. साम्यवाद का सामाजिक स़ंपत्ति का। वर्तमान समय में पहला सिद्धान्त चल रहा है। मेरा पारिवारिक स़ंपत्ति का सिद्धान्त व्यक्तिगत स़ंपत्ति और ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त के बीच का है जिसमें स़ंपत्ति पूरे परिवार की सामूहिक होगी जो परिवार से पृथक होते समय ही सदस्य संख्या के आधार पर उसे मिल सकती है तथा वह स़ंपत्ति स्वयं की न होकर उस परिवार की होगी जिसमें वह जाकर शामिल होगा।
7. प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिवार का सदस्य होगा।
8. भारत की परिवार व्यवस्था को तोड़ने में पश्चिम के देशों की भी बहुत रूचि है और वामपंथियों की भी। परिवार व्यवस्था को कमजोर करने के नये-नये प्रयोग होते रहते हैं।
9. विवाह में लड़के लड़की की स्वीकृति, परिवार की सहमति और समाज की अनुमति को परम्परा के रूप में स्वीकार किया गया है। प्रेम विवाहों को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर उनका विरोध करना जितना घातक है उससे अधिक घातक है उनका प्रोत्साहन क्योंकि ऐसे विवाह परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुॅचाते हैं।
10. किसी व्यक्ति का स्वतंत्र या अकेला रहना उसका मौलिक अधिकार है किन्तु उस व्यक्ति को परिवार व समाज के साथ रखना या न रखना परिवार व समाज का मौलिक अधिकार है।
11. पश्चिम के देशों में व्यक्ति और समाज, मुस्लिम देशों में व्यक्ति परिवार और धर्म, साम्यवादी देशों में व्यक्ति और राज्य तथा भारत में व्यक्ति, परिवार और समाज रूपी त्रिस्तरीय व्यवस्था है।
12. दुनिया में तमाम प्रहारों को झेलते हुए इतनी लम्बी गुलामी के बाद भी भारत में व्यक्ति परिवार समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था सफलता पूर्वक चलती रही। यह इस व्यवस्था की सफलता का मापदण्ड है।
13. व्यक्ति पर कानून का, कानून पर सरकार का, सरकार पर संसद का, संसद पर व्यवस्था का, व्यवस्था पर संविधान का, और संविधान पर समाज का अंकुश होना ही चाहिये।
व्यवस्था की पहली इकाई परिवार मानी जाती है। व्यक्ति व्यवस्था की इकाई नहीं हो सकता क्योकि व्यक्ति स्वयं से पैदा होता ही नहीं। उसका जन्म परिवार से होता है तथा वह बालिग होकर परिवार के रूप में ही नये व्यक्ति का निर्माण करता है। न कोई अकेला जन्म ले सकता है न ही दे सकता है। इसलिये परिवार समाज व्यवस्था का एक अनिवार्य और पहला भाग होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी परिवार का अंग नहीं है तो वह अपवाद स्वरूप है या परिवार का टूटा हुआ भाग है अन्यथा सामान्यतया व्यक्ति किसी न किसी के साथ जुड़कर परिवार बनाता ही है चाहे उसका रक्त सम्बन्ध हो या न हो।
व्यक्ति अकेला रह नही पाता। परिवार भी उपर की किसी इकाई से जुड़कर रहना चाहता है। यह उपर की इकाई उसे सुविधा के लिये भी आवश्यक लगती है और सुरक्षा के लिये भी। इसलिये वह ऐसी इकाई के साथ तालमेल बनाकर रखता ही है। ऐसी उपर की इकाइयॉ दो प्रकार की होती हैं 1. परिवार ,गांव , जिला, प्रदेश ,देश, विश्व। 2. परिवार, कुटुम्ब , जाति, वर्ण, धर्म,समाज। ये दोनो ही संगठन हजारों वर्श पूर्व से आज तक चल रहे हैं तथा आज तक यह निर्णय ही नहीं हो पाया कि आदर्श स्थिति क्या है।
आज सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि परिवार के पारिवारिक मामलां मे समाज के हस्तक्षेप करने की सीमा क्या हो और समाज के सामाजिक मामलां मे कानून के हस्तक्षेप की सीमा क्या हो? जब कोई परिवार इन दोनो सीमाओ को तोड़ता है तभी कानून को हस्तक्षेप करना चाहिये। वर्तमान स्थिति तो यह है कि कानून निर्माता न परिवार की सीमाओं को समझ रहे है न समाज की। इनकी स्वय की क्षमता और चरित्र भी परिवारों और समाज के औसत चरित्र की अपेक्षा कमजोर ही है।
दुनियां की अनेक व्यवस्थाओ मे से भारतीय समाज व्यवस्था ही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जो सबसे ज्यादा लम्बे समय से सफलता पूर्वक चल रही है तथा वह विपरीत परिस्थितियों मे भी लम्बे समय तक टिकी रह सकती है अन्यथा अन्य कोई समाज व्यवस्था नही है जो दूसरी समाज व्यवस्थाओं के इतने आक्रमणों के बाद भी जीवित बच सके।
भारतीय समाज व्यवस्था मे दो मौलिक इकाइयां ‘‘व्यक्ति और समाज‘‘ के बीच एक तीसरी इकाई है जिसे परिवार कहते है। जिस तरह व्यक्ति और समाज को पृथक-पृथक मौलिक अधिकार प्राप्त है, उस तरह के मौलिक अधिकार तो परिवार को प्राप्त नही होते किन्तु परिवार भी कोई ऐसी इकाई नही होती जो कुछ व्यक्तियों की साझेदारी से बनता हो अथवा किसी तरह का जोड़ तोड़ करके बनाया जा सके। परिवार भी स्वयं मे एक स्वतंत्र अस्तित्व वाली इकाई होती है जो एक विशेष महत्व रखती है।
परिवार व्यवस्था मे परिवार के प्रत्येक सदस्य का सम्पूर्ण समर्पण भाव एक आवश्यक शर्त होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य का परिवार मे सम्पूर्ण समर्पण न होकर आंशिक समर्पण भाव हो अथवा दुहरी निष्ठा हो तो परिवार व्यवस्था ठीक से नहीं चल पाती। मेरी मान्यता तो यह है कि परिवार व्यवस्था मे परिवार के प्रत्येक सदस्य को मौलिक अधिकार तो प्राप्त है किन्तु संवैधानिक या समाजिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। परिवार का सदस्य परिवार मे विलीन होता है। उसकी न तो पृथक से स़ंपत्ति हो सकती है न ही पृथक प्रतिबद्धता। उसकी सर्वप्रथम प्रतिबद्धता परिवार के प्रति होती है तथा परिवार की सहमति या अनुमति से ही वह कही और अपनी प्रतिबद्धता जोड़़ सकता है।
वर्तमान समय में समाज व्यवस्था को तोड़कर राज्य व्यवस्था को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का राजनेताओं व साम्यवादियों का षड़यंत्र सफल हो गया। धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर हो रही है, टूट रही है और राज्य व्यवस्था अधिक से अधिक शक्तिशाली होती जा रही है।
किसी व्यक्ति का अकेला रहना उसकी स्वतंत्रता है तथा मौलिक अधिकार है। हम किसी के मौलिक अधिकार को नहीं छीन सकते। किन्तु उक्त व्यक्ति को समाज के साथ रखना या न रखना समाज का मौलिक अधिकार है। जो व्यक्ति समाज के अनुशासन को स्वीकार नहीं करता उसे समाज अकेला छोड़़ने का निर्णय कर सकता है। यह संभव नहीं कि व्यक्ति समाज से तो सब प्रकार से सहयोग ले किन्तु समाज के अनुशासन से स्वयं को दूर रखे।
दुनिया में भारतीय व्यवस्था एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जहॉं व्यक्ति परिवार और समाज रूपी त्रिस्तरीय व्यवस्था है। पश्चिम के देशों में व्यक्ति और समाज, मुस्लिम देशों में व्यक्ति परिवार और धर्म तथा साम्यवादी देशों में व्यक्ति और राज्य ही व्यवस्था के आधार होते हैं। दुनिया में इतनी लम्बी गुलामी के बाद भी भारत में व्यक्ति परिवार समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था सफलता पूर्वक चलती रही। यह इस व्यवस्था की सफलता का मापदण्ड है। स्वतंत्रता के बाद नेहरू और अम्बेडकर ने मिलकर परिवार व्यवस्था को किनारे करके पश्चिमी व्यवस्था की दिशा में भारत को धकेलना शुरू किया तबसे परिवार व्यवस्था टूटने लगी। आज भारत में जो सामाजिक अव्यवस्था दिख रही है उसके अनेक कारणों में से परिवार व्यवस्था का कमजोर होना एक प्रमुख कारण रहा है। परिवार व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें व्यक्ति सहजीवन के प्रारंभिक पाठ सीखता है। यह प्रणाली अनुशासन सिखाने का भी एक उचित माध्यम है। यह प्रणाली राज्य व्यवस्था का भी बोझ हल्का करती है। परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था में बहुत सहायक होती है।
स्वतंत्रता के बाद भी परिवार व्यवस्था तो रही किन्तु परिवार व्यवस्था का कोई संवैधानिक ढांचा स्वीकार नहीं किया गया। इसके विपरीत लिंग भेद तथा उम्र भेद को संवैधानिक मान्यता देकर परिवार व्यवस्था के टूटने के आधार बना दिये गये। मेरा मानना है कि परिवार व्यवस्था को संवैधानिक इकाई के रूप में स्वीकार किया जाये। यदि आप परिवार को संवैधानिक इकाई मान लेंगे तो अपने आप समाज को उसके लाभ मिलने लगेंगे।
परिवार व्यवस्था को संवैधानिक इकाई स्वीकार करते ही व्यक्ति और समाज के बीच एक नई इकाई बन जायेगी। स्वाभाविक है कि उसके लिये कुछ तो व्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती करनी होगी तथा कुछ समाज की सार्वभौमिकता में। यह तो संभव ही नहीं है कि व्यक्ति के अधिकारों में तो कोई कटौती न हो तथा परिवार नाम की एक संवैधानिक इकाई बन जावे। इस समबन्ध में मैंने कुछ सुझाव दिये हैंः-
(1) परिवार की संरचना में रक्त संबंधों की अनिवार्यता हटा दी जाये।
(2) न्यूनतम दो व्यक्तियों की सहमति को भी परिवार मान लिया जाये।
(3) किसी भी व्यक्ति को कभी भी परिवार छोड़़ने तथा नये परिवार से जुड़ने की स्वतंत्रता हो।
(4) परिवार के प्रत्येक सदस्य का स़ंपत्ति में समान अधिकार हो।
(5) व्यक्ति की व्यक्तिगत स़ंपत्ति पर प्रतिबंध हो।
(6) व्यक्ति और समाज के साथ आपसी व्यवहार में परिवार का सामूहिक उत्तरदायित्व हो। परिवार के किसी सदस्य की लाभ हानि का परिणाम पूरे परिवार का सामूहिक हो।
(7) समाज के साथ संबंधों का निर्णय सामूहिक हो।
(8) व्यक्ति के संवैधानिक सामाजिक अधिकार परिवार मे सामूहिक हों व्यक्तिगत नहीं।
हजारो वर्श से यह बहस चली आ रही है कि व्यक्ति और समाज के बीच, व्यक्ति स्वातंत्र और सामाजिक नियत्रंण के बीच का अनुपात क्या है और उसकी सीमा रेखा क्या हो? समाज के लोग व्यक्ति के व्यक्तिगत मामलो मे नैतिकता की दुहाई देकर अधिक नियंत्रण करना चाहते है जबकि व्यक्ति ऐसे नियंत्रण को तोड़ कर अधिक से अधिक स्वतंत्र रहना चाहता है।
व्यक्ति की नीयत पर विश्वास तो आवश्यक है किन्तु वह विश्वास अंतिम सीमा तक नही हो सकता। ऐसी अंतिम सीमा से उपर किसी न किसी व्यवस्था का नियंत्रण होना ही चाहिये। व्यक्ति पर कानून का, कानून पर सरकार का, सरकार पर संसद का, संसद पर व्यवस्था का, व्यवस्था पर संविधान का, और संविधान पर समाज का अंकुश होना ही चाहिये।
न व्यक्ति को ही निर्णय का अन्तिम अधिकार देना ठीक है न परिवार और समाज को। तीनों का एक दूसरे पर आंशिक अंकुश हो। व्यक्ति से लेकर विश्व मानव समाज तक एक कड़ी जुड़़ती हुई होनी चाहिये जो एक दूसरे की पूरक भी हो और नियंत्रक भी। इन सब इकाइयों की अपनी अपनी निश्चित सीमाएॅं हो जिस सीमा का कोई इकाई यदि अतिक्रमण करें तो उपर की इकाई उस अतिक्रमण को रोके और यदि वह इकाई अपनी सीमा में हो तो कोई भी अन्य इकाई उसमें हस्तक्षेप न करे। ऐसी इकाइयॉं घोषित करके उनके अधिकारों का विभाजन हो जाना ही उचित व्यवस्था है।
सारांशः मूल इकाई व्यक्ति से निर्मित व्यवस्था की पहली इकाई परिवार सहजीवन का प्रशिक्षण देने वाली पाठशाला है। यह सहजीवन व्यवस्था की सर्वोच्च इकाई समाज व्यवस्था हेतु अनिवार्य रुप से आवश्यक है। व्यक्ति और समाज के बीच कड़ी के रुप में परिवार व्यवस्था को लगातार सशक्त करने की आवश्यकता है।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 10.09.2019 द्वितीय सत्र दोपहर बाद में होगी। ’’ व्यक्ति, परिवार और समाज ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 10.09.2019 को प्रथम सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-21 “संयुक्त परिवार प्रणाली”
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कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैंः-
1. मैं यह अनुभव करता हूं समाज व्यवस्था की प्रतिस्पर्धा में भारत की संयुक्त परिवार-ग्राम-गणराज्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ है।
2. न तो पुरूषों का कोई भिन्न परिवार है, न ही महिलाओं का। परिवार दोनो की संयुक्त भूमिका से ही अस्तित्व में आते हैं।
3. पुराने समय मे परिवार का अर्थ था एक ही चूल्हे तथा एक मुखिया की व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले रक्त संबंधियो का समूह।
4. सामूहिक सम्पत्ति तथा सामूहिक उत्तरदायित्व के आधार पर एक साथ रहने वाले व्यक्तियो के समूह को परिवार कहते है।
5. यदि सभी भाई, भाइयों की पत्नी और बच्चे एक साथ मिलकर रहते हैं तो वह संयुक्त परिवार ही कहा जायेगा।
6. मार्क्सवादी सिद्धांत की मानें तो आर्थिक संबंध भी कई बार सामाजिक संस्थाओं में बदलाव का बड़ा कारण बनते है। इस दृष्टि से, संयुक्त परिवार की संस्था में टूटन का एक कारण यह भी है।
7. भारत की सम्पूर्ण व्यवस्था मे सबसे घातक कार्य यह हुआ कि संयुक्त परिवार भावना को तोड़कर सम्मिलित परिवार भावना का विकास किया गया। जब कि पूरा परिवार एक इकाई होना चाहिये न कि विभिन्न व्यक्तियों का संघ।
8. भारत का बंटवारा दो भाईयां के बीच का बंटवारा नहीं था बल्कि एक संयुक्त परिवार से एक भाई का अलग हो जाना था।
9. परिवार व्यवस्था को तोड़ने का जो काम अंग्रेज बहुत डर-डर कर गुप्त रूप से कर रहे थे वह काम अम्बेडकर और नेहरु इन दोनो ने मिलकर समाज सुधार के रूप मे शुरू कर दिया। इन दोनो ने मिलकर ऐसी व्यवस्था चलाई कि संयुक्त परिवार व्यवस्था, सम्मिलित परिवार व्यवस्था मे बदल गई। परिवार मे शामिल प्रत्येक सदस्य का अलग से संवैधानिक अस्तित्व भी हो गया तथा अधिकार भी
10. परंपरागत महिलाएॅ परिवार के सुचारू संचालन के लिये अनुशासन, सन्तानोत्पत्ति, नैतिक उन्नति व सहजीवन को अधिक महत्वपूर्ण मानकर संयुक्त परिवार को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाएॅ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सेक्स, भौतिक विकास व निजी हितों को अधिक महत्व देकर परिवारों को छोटे से छोटा करने को महत्वपूर्ण मानती हैं।
11. संयुक्त परिवार में रहते हुए प्रत्येक सदस्य के संवैधानिक सामाजिक आर्थिक अधिकार संयुक्त हो जाते हैं। किसी सदस्य के कोई पृथक अधिकार नहीं हो सकते।
12. अम्बेडकर के हिन्दु कोड बिल लागू करने का प्रमुख उद्देश्य संयुक्त परिवार प्रणाली को सम्मिलित परिवार प्रणाली में बदलना था। अम्बेडकर का यह प्रयत्न सफल हुआ। अब, नये प्रावधान के अनुसार संयुक्त परिवार के स्थान पर ;ज्मदंदजे पद ब्वउउवदद्ध टिनेंट्स इन कॉमन/सम्मिलित परिवार प्रणाली मान ली गई।
13. संयुक्त परिवार का कोई सदस्य विदेश में जाकर नौकरी कर सकता है तथा वहॉ निवास कर सकता है, तब भी उसे संयुक्त परिवार का सदस्य बने रहना चाहिये, जब तक कि वह वहॉ का नागरिक नहीं बन जाता तथा परिवार से अपना स्वयं संबंध विच्छेद नहीं कर लेता।
14. परिवार के पारिवारिक सामंजस्य को न्यूनतम क्षति हो और महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्त हों ऐसे प्रयास होने चाहिये।
15. भारत के संवैधानिक स्वरूप में परिवार प्रणाली को कहीं स्वीकृति या मान्यता नहीं है। व्यक्ति को सीधा राज्य से जोड़़ दिया गया। परिवार और गांव की न कोई संवैधानिक रचना की गई न ही उनके अधिकारों को परिभाषित किया गया।
16. लोकतंत्र, इस्लाम और साम्यवाद की संयुक्त खिचड़़ी भारत की परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को समाप्त कर रही है। आज तक भारत में परिवार व्यवस्था, समाज व्यवस्था कभी इतनी कमजोर नहीं रही जितनी आज है।
17. जब भारत अंग्रेज व्यवस्था का गुलाम हुआ तो अंग्रेजों ने परिवार व्यवस्था को राज्य मान्यता देने से इन्कार कर दिया, क्योंकि पश्चिमी जगत में व्यक्ति और राज्य की द्धिस्तरीय व्यवस्था ही मान्य रही है, फिर भी परिवार व्यवस्था के सामाजिक स्वरूप के साथ उन्होंने छेड़छाड़ नहीं की।
18. संयुक्त परिवार मे चरित्र महत्वपूर्ण था। आधुनिक प्रणाली मे चरित्र की जगह धन महत्वपूर्ण हो गया।
19. पारंपरिक पद्धति मे व्यक्ति पर परिवार का तथा परिवार पर समाज का अनुशासन था। अब सारा अनुशासन समाप्त होकर व्यक्ति और सरकार के बीच शासन के रूप मे तब्दील हो गया।
20. परिवार व्यवस्था की पारंपरिक प्रणाली को कमजोर करके आधुनिक व्यक्ति केन्द्रित प्रणाली का आधुनिक परिवारो को भौतिक लाभ बहुत हो रहा है।
21. पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक संयुक्त परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
22. संयुक्त परिवार के विघटन पर गंभीर चिन्ता की जानी चाहिये साथ ही साथ यह भी देखा जाना चहिये कि एकल परिवारों की इतना ज्यादा सँख्या वृद्धि आखिर किस वजह से है?
माँ से बच्चे का जन्म होते ही न्यूनतम दो व्यक्तियों का अघोषित संगठन बन जाता है और मनुष्य इतिहास का पहला परिवार निर्मित होता है। इस प्रकार से परिवार की उत्पत्ति हुयी। जीवन-निर्वहन हेतु मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता-पूर्ति, सुरक्षा, उत्तरजीविता के लिए एक व्यवस्था की आवश्यकता हुई। इस प्रकार से परिवारों का चलन प्रारम्भ हुआ।
कालान्तर में अपनों के बीच परस्पर संवाद-आचार-व्यवहार के लिए एक व्यवस्था की आवश्यकता हुई। इस प्रकार से परिवार ही विकास क्रम से गुजरता हुआ एक नये स्वरुप में विकसित हुआ/ संयुक्त परिवार के रूप में विकसित हुआ जो प्रभाव, सं्चालन और व्यवस्था की दृष्टि से एक सम्पूर्ण इकाई माना गया। इसे संयुक्त परिवार कहा गया।
मनुष्य के विकास के कालक्रम में, सभी मनुष्यों के बीच परस्पर संवाद-आचार-व्यावहार के लिए व्यापक स्तर पर एक व्यवस्था विकसित हुई। इस प्रकार से समाज की उत्पत्ति हुयी। समाज की प्रथम इकाई के रूप में परिवार को माना गया।
सृष्टि के प्रारम्भ से ही परिवार की संरचना शुरू हो गई। दुनिया के किसी भी देश मे किसी भी समय परिवार शब्द समाप्त नही हुआ भले ही समय समय पर उसके अर्थ बदलते रहे हो। पुराने समय मे परिवार का अर्थ था एक ही चूल्हे तथा एक मुखिया की व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले रक्त संबंधियो का समूह। इस परिभाषा मे बाद मे बदलाव हुआ और परिवार का अर्थ पिता माता और बच्चों तक सिमट गया। यदि उसमे चाचा-चाची आदि भी शामिल हो तो उसे संयुक्त परिवार कहा जाने लगा।
अनेक देशों मे संयुक्त परिवार के स्थान पर कबीला शब्द भी प्रचलित हुआ। प्राचीन काल के परिवार मे सम्पति पर परिवार का अधिकार होता था तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य के सुख दुख का दायित्व परिवार का होता था। बाद मे यह व्यवस्था बदल गई और सम्पति व्यक्तिगत तथा सुख-दुख भी व्यक्तिगत होने लगा। चीन मे परिवार की इस परिभाषा को समाप्त करके एक नई परिभाषा तैयार हुई जिसमें ‘परिवार‘ के स्थान पर ‘कम्यून‘ शब्द आ गया। इसमे रक्त संबंध से कोई मतलब नही रखा गया बल्कि आपसी सहमति के आधार पर एक साथ रहने वालों को कम्यून नाम दिया गया है।
सम्पूर्ण विश्व में खासकर भारत के समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली बहुत प्राचीन समय से ही विद्यमान रही है। विभिन्न संस्कृतियों, क्षेत्रों, धर्मों, जातियों और समुदायों में नेतृत्व, अधिकार दायित्व एवं कर्त्व्य, सम्पत्ति, विवाह-विवाह विच्छेद, आदि सम्बन्धों की दृष्टि से अनेक भेद पाए जाते हैं, किंतु फिर भी संयुक्त परिवार का बेसिक स्ट्रक्चर प्रायः एक जैसा रहा है। प्रथा-परम्पराएं, परम्परागत पारिवारिक व्यवसाय, सम्मिलित प्रयासों से जीवन-निर्वहन में सुगमता, संघर्षशील वातावरण में सुरक्षा की तलाश और उत्तरजीविता का प्रयास अन्य अनेक कारणों के साथ संयुक्त परिवार का प्रमुख कारण रहे हैं।
प्राचीन परम्परागत संयुक्त परिवार में घर का सबसे अधिक वयोवृद्ध पुरुष संयुक्त परिवार का कर्ता-धर्ता अथवा मुखिया माना जाता है जो कहीं-कहीं मालिक या स्वामी भी कहा जाता हैं। यह पुरुष कर्ता अन्य वयोवृद्ध अथवा वयस्क सदस्यों की सलाह से या बिना सलाह के परंपरा के आधार पर परिवार में कार्य का विभाजन, उत्पादन, उपभोग आदि की व्यवस्था करता है और परिवार तथा उसके सदस्यों से संबंधित कार्यां का निर्णय करता है। पारंपरिक विवाह मे तीन का समिश्रण आवश्यक होता है-1. वर वधु की स्वीकृति 2. परिवार की सहमति 3. समाज की अनुमति।
मेरे विचार से लोकतांत्रिक ढंग के संयुक्त परिवार में, परिवार का सबसे अधिक वयोवृद्ध सदस्य, वह पुरुष हो या स्त्री, परिवार का कर्ता-धर्ता अथवा मुखिया माना जाता है। मुखिया परिवार में निर्णय, संचालन आदि की व्यवस्था करता है जिसमे परिवार के सभी सदस्यों की सहमति या तो अनिवार्य होती है या फिर स्वाभाविक। उसे मालिक या स्वामी मानना सर्वथा गलत हैं।
अनुशासन और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं। परंपरागत या संयुक्त परिवारों में अनुशासन की जगह नियंत्रण बढा और आधुनिक परिवारों में अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता। सामान्य सिद्धान्त है, यदि अनुशासन की जगह अनावश्यक नियंत्रण बढ़ता है तो आवश्यक अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता आती है।
इसलिये परिवार में सहजीवन की दृष्टि से अनुशासन और नियंत्रण का सन्तुलन-तालमेल होना चाहिये। इस दृष्टि से लोकतांत्रिक ढ़ग की संयुक्त परिवार प्रणाली अब तक की सर्वश्रेष्ठ परिवार प्रणाली है।
संयुक्त परिवार में एकाधिक दंपत्ति अपने बच्चों के साथ सहमति और साझेदारीपूर्वक, संयुक्त संपत्ति और संयुक्त दायित्व के आधार पर एक स्थान पर रहते हैं। इनमे प्रायः रक्त संबंधों अथवा नातेदारी की निकटता होती है। असंयुक्त परिवार भी कालक्रम में संयुक्त परिवार का रूप ले सकता है।
संयुक्त परिवार में व्यक्ति के बजाय परिवार केन्द्र में होता है। वहां व्यक्तिगत पहचान की जगह परिवार की पहचान प्रमुख होती है। परिवार के सभी सदस्यों की आम राय के आधार पर, परिवार का एक आतंरिक अनुशासन होता है जिसका पालन परिवार के सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से करना पड़ता है और जिसका पालन वे प्रायः करते भी हैं। व्यक्ति के बजाय परिवार को महत्त्वपूर्ण मानना पड़ता है।
भारत में संयुक्त परिवार का प्रमुख कारण यहां की प्राचीन परंपराओं, मान्यताओं तथा आदर्शों में निहित है। भारत के पारम्परिक संयुक्त परिवार प्रणाली के आंतरिक स्वरूप में नेतृत्व, अधिकार दायित्व एवं र्क्तव्य, सम्पत्ति, उत्तराधिकार, बहुर्विवाह, विवाह-विवाह विच्छेद, अन्यान्य सम्बन्ध आदि कार्य धर्म, प्रथा-परम्परा व वर्तमान में राज्य के अनुसार संचालित होते रहे हैं।
मेरे विचार से लोकतान्त्रिक ढंग के आधुनिक संयुक्त परिवार में, परिवार के सब कार्यों मे परिवार का सबसे अधिक वृद्ध परिवार प्रमुख, सहमति व चुनाव के आधार पर चुना गया परिवार का मुखिया और परिवार के सभी सदस्यों की आम राय ही एक मात्र निर्णायक कारक होते हैं। इसमें परिवार के सभी सदस्य मिलकर यह तय करते हैं कि किस सदस्य को किस प्रकार का कार्य प्रमुखता से करना है। बचपन या प्रारम्भ से ही परिवार के सदस्यों को बताया जाता है कि परिवार के सभी सदस्यों के अधिकार व दायित्व संयुक्त हैं अैर कर्तव्य अलग अलग।
लोकतान्त्रिक ढंग के आधुनिक संयुक्त परिवार म,ें परिवार के सुचारू संचालन के लिये सन्तुलित, परिवार प्रधान या पारिवारिक महिलाए सहजीवन की भावना व अनुशासन, इच्छापूर्ति व सन्तानोत्पत्ति तथा बच्चों के भौतिक-नैतिक समग्र विकास में सन्तुलन व तालमेल बनाये रखने को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं।
प्राचीन संयुक्त परिवार प्रणाली के आंतरिक स्वरूप, प्रक्रिया, संचालन, नियमों आदि में, समय और परिस्थिति अनुसार परिवर्तन होता आया है। विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वार्थों ने तो परंपरागत संयुक्त परिवार का स्वरूप ही भंग कर दिया है हालांकि इसका कारण औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप नई अर्थव्यवस्था और नये औद्योगिक तथा आर्थिक संगठनों का आरंभ होना, रोजगार की तलाश और बढ़ते हुए यंत्रीकरण के फलस्वरूप व्यक्ति को परिवार से बाहर मिली आजीविका, सुरक्षा और उन्नति की सुविधाओं को भी माना जाता है।
प्राचीन संयुक्त परिवार प्रणाली के विघटन के परिणामस्वरूप एकल परिवारों या एक दंपत्ति वाले परिवारों का जन्म शुरू हुआ। एकल परिवारों में पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों पर अहम टकराने लगते हैं। उनके बीच के मनमुटाव को दूर करने व अन्य किसी से अपनी बात को कहने-समझने-साझा करने के लिए उनके पास कोई तीसरा व्यक्ति या विकल्प नहीं होता है। परिणामस्वरुप तलाक, आत्महत्या, आपसी कलह और मानसिक अवसाद की समस्यायें जन्म लेती हैं।
परिवार के युवा सदस्यों द्वारा वृद्ध जनों के प्रति उदासीनता का कारण, संयुक्त परिवार प्रणाली को तोड़ने के प्रयत्नों में देखे जाने की जरूरत है। संयुक्त परिवार प्रणाली को तोड़ने के बजाय इसे लोकतान्त्रिक ढंग से लागू किये जाने की जरूरत है। यदि लोकतान्त्रिक ढंग का संयुक्त परिवार होता, तो परिवार में सम्पूर्ण सम्पत्ति पर सबका समान अधिकार होता और सम्पत्ति के लिए न तो इतना दांव-पेंच होता, न ही वृद्ध लोग सम्पत्ति विहीन होते। यदि कभी बच्चे परिवार के बुजुर्गों के प्रति उदासीन होते तो वृद्ध अपने हिस्से की सम्पत्ति कभी भी लेकर अलग हो सकते थे। स्पष्ट है कि संयुक्त परिवार प्रणाली को तोड़ने के बजाय इसमे सुधार किये जाने की जरूरत है।
आज भी संयुक्त परिवार को ही सम्पूर्ण परिवार माना जाता है .वर्तमान समय में भी समाज में, एकल परिवार को एक मजबूरी या वर्जना के रूप में ही देखा जाता है .हमारे देश में आज भी एकल परिवार को श्रेयस्कर मान्यता प्राप्त नहीं है। आधुनिकता की विकृतियों से अछूते भारतीय समाज में आज भी एकल परिवार को प्राथमिकता के क्रम में प्रथम स्थान नहीं दिया जाता है और ना ही सराहा जाता है। स्पष्ट है कि संयुक्त परिवार का महत्त्व कम नहीं हुआ है।
संयुक्त परिवार का निर्माण व्यक्ति व समाज के सर्वांगीण विकास हेतु व्यवस्था की प्राथमिक व लघुतम इकाई के रूप में हुआ था किन्तु स्वार्थ व नासमझी के चलते हमने परिवार को घुटन, शोषण, छल-कपट, क्लेश-कलह का घर बना दिया।
पारम्परिक या प््राचीन संयुक्त परिवार व्यवस्था में आंतरिक रुप से व्यक्ति के साथ अन्याय होता है। उसे उसकी मौलिक स्वतंत्रता से भी वंचित रखा जाता है। न तो परिवार के सदस्यों को सम्पत्ति के समान अधिकार प्राप्त होते है,न ही अभिव्यक्ति के। यहॉ तक की परिवार के प्रमुख के चयन में भी न योग्यता का कोई मापदण्ड रहता हैं न ही परिवार के अन्य सदस्यों की कोई भूमिका। कोई व्यक्ति परिवार में घुटन महसूस करके छोड़ना चाहे, तब भी उसे पचीस तरह की कठिनाइयॉ झेलनी पड़ती हैं। महिला और युवा को परिवार में समान अधिकार प्राप्त नहीं होते। उन्हें कर्तव्य करने की तो बाध्यता है किन्तु अधिकार नहीं।
यदि निष्पक्षतापूर्वक विचार किया जाये तो परंपरागत प्राचीन संयुक्त परिवार व्यवस्था में कुछ इस प्रकार के दोष व विकृतियां आ गई हैं-
1. मुखिया की तानाशाही; मुखिया की अयोग्यता और दोषों का पूरे परिवार पर प्रभाव; मुखिया का पक्षपातपूर्ण व असमान व्यवहार। पारदर्शिता का अभाव।
2. रूढ़िवादिता, पुराने से चिपकना और नए से बिदकना, पुराने पैर्टन को ही फॉलो करना।
3. प्रभाव, सामर्थ्य और अर्थ से रहित सदस्यों का परिवार में निम्नतर स्थान होना।
4. महिलाओं की हीन दशा व सीमित-संकुचित भूमिका।
5. बड़ों का या जबरन व अनावश्यक हस्तक्षेप, बड़ों का अपने छोटों पर सही-गलत रौब गाँठना।
6. व्यक्तिगत विकास में बाधा,
7. स्वतंत्रता का हनन, निजता की उपेक्षा, एकान्त की कमी का अखरना।
8. परम्परा के नाम पर सदस्यों को गलत रुप से दबाना, निर्बल सदस्यों का अपनी बात न मनवा पाना।
9. एक का बोझा, ढोवें सब; बोझ किसी का, ढोवे कोई; करे कोई-भरे कोई का चरितार्थ होना।
10. परिवार में कोई काम चोर, तो कोई कर कर के मरा जा रहा। कोई तो जान खपाये दे रहा है और कोई मजे उड़ा रहा है।
11. कानाफूसी, कान भरना, षड़यन्त्र व राजनीति का माहौल,
स्पष्ट है कि वर्तमान में संयुक्त परिवार व्यवस्था दोषपूर्ण है। उसमे व्यक्ति पर परिवार व्यवस्था या मुखिया का अनुशासन तो है किन्तु व्यवस्था पर व्यक्ति समूह का नियंत्रण नहीं है। परंपरागत संयुक्त परिवारों के सदस्यों में घुटन अधिक है टूटन कम। आधुनिक परिवारों के सदस्यों में परिवार के प्रति टूटन अधिक है घुटन कम। दोनों स्थितियां ठीक नहीं। परंपरागत संयुक्त परिवारों में आयी विकृतियों के कारण ही पारम्परिक व्यवस्था की अपेक्षा आधुनिक एकल परिवार व्यवस्था तेजी से बढ रही है।
इस प्रकार से, प्राचीन संयुक्त परिवार व्यवस्था मे अनेक कमिंया थी। किन्तु उन कमियों को दूर करने की अपेक्षा संयुक्त परिवार व्यवस्था को ही तोड़ने की योजना के घातक परिणाम हुए।
यदि हम परिवार व्यवस्था के आधार पर आकलन करें तो मुस्लिम संस्कृति और हिन्दू संस्कृति के बीच बहुत एकता है। जबकि पाश्चात्य संस्कृति और साम्यवादी संस्कृति के बीच भी बहुत सीमा तक एकता है। ये दोनों संस्कृतियां मिलकर भारतीय और इस्लामिक परिवार व्यवस्था को किसी भी तरह तोड़ना चाहती हैं। इस टूटन का ही प्रयोग स्थल भारत बना हुआ है। स्वाभाविक है कि परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के लिये महिला और पुरुष के बीच अविश्वास की दीवार खड़़ी करनी आवश्यक है। यदि परिवार की महिला सदस्यों के मन में संदेह के बीज बो दिये जायें तो परिणामस्वरुप पाश्चात्य और साम्यवादी संस्कृति अपने प्रतिस्पर्धी को पराजित कर सकती हैं। इसी बुरी नीयत को आधार बनाकर भारत में इन दोनों संस्कृतियों के एजेंट सफलतापूर्वक यह धारणा फैला रहे हैं कि महिला एक पृथक वर्ग है, संयुक्त परिवार की सदस्य नहीं।
मै मानता हॅू कि भारत की स्वतंत्रता के पूर्व की परिवार व्यवस्था को संवैधानिक रूप से तोड़ने की योजना सिर्फ भीमराव अम्बेडकर के ही व्यक्तिगत दिमाग की उपज थी। नेहरू ने उसमे सहायता थी। सबसे पहले अम्बेडकर ने ही प्रस्ताव किया था कि संयुक्त परिवार प्रणाली को बदलकर सहभागी परिवार मे कर दिया जाये। अम्बेडकर के हिन्दु कोड बिल लागू करने का प्रमुख उद्देश्य संयुक्त परिवार प्रणाली को सम्मिलित परिवार प्रणाली में बदलना था। अम्बेडकर का यह प्रयत्न सफल हुआ और नये प्रावधान के अनुसार संयुक्त परिवार के स्थान पर ;ज्मदंदजे पद ब्वउउवदद्ध टिनेंट्स इन कॉमन/सम्मिलित परिवार प्रणाली मान ली गई।
यदि हम दुनिया भर का विचार करें तो पश्चिम की परिवार व्यवस्था टूट गई है, जबकि चीन रूस आदि में लगभग समाप्त सी हो गयी। भारत मे वर्तमान व्यवस्था अब भी रक्त संबंधो के साथ जुड़ी है यद्यपि परिवारिक भावना, संरचना तथा व्यवस्था लगातार टूटती जा रही है।
उत्तरजीविता की दृष्टि से स्त्री और पुरूष का मिलकर एक साथ रहना एक प्राकृतिक मजबूरी है। प्रचीन काल से ही, स्त्री और पुरूष के मिलन से एक नये परिवार का प्रारम्भ माना जाता रहा है। इन दोनो का पूर्ण समर्पण भाव से एकाकार होना ही, प्रक्रियागत रुप से विवाह तथा व्यवस्थागत रुप से परिवार कहा जाता है। इन दोनो को विशेष परिस्थिति में ही अलग-अलग होने की छूट थी तथापि इस वीटो का उपयोग भी असामाजिक कार्य ही माना जाता था। स्त्री पुरूष का एक साथ जुड़ना दो परिवारो का जुड़ना माना जाता था न कि दो व्यक्तियो का।
यदि पचास वर्ष पूर्व के भारत मे परिवारां की सदस्य संख्या का औसत सात था तो दस वर्ष पूर्व यह औसत घटकर पांच और अब तो पांच सदस्य प्रति परिवार से भी कम हो गया है। स्वतंत्रता के समय तेंतीस करोड़ की आबादी मे यदि पांच करोड़ परिवार थे तो आज एक सौ तीस करोड़ की आबादी मे तीस करोड़ तक परिवार बन गये है । परिवार मे टूटन लगातार तीव्र गति से जारी है।
आज दुनिया की संस्कृतियां अपने-अपने आधार पर प्रतिस्पर्धा में संलग्न हैं। लोकतंत्र, इस्लाम और साम्यवाद की संयुक्त खिचड़़ी भारत की परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को समाप्त कर रही है। आज तक भारत में परिवार व्यवस्था, समाज व्यवस्था कभी इतनी कमजोर नहीं रही जितनी आज है। मुस्लिम शासन काल और अंग्रेजों के समय भी नही।ं आज तो हाल यह है कि भारत की समाज व्यवस्था पर (1) पश्चिम के लोकतंत्र, (2) साम्यवाद के राजतंत्र और (3) इस्लाम के धर्मतंत्र के लगातार आक्रमण तो हो ही रहे हैं, भारत के अन्दर से भी राष्ट्रवाद, समाजवाद और संस्कृति जैसे भारी-भरकम सम्मानजनक शब्द उसे अर्थ-भ्रमित कर रहे हैं।
राजनेताओं ने तो भारतीय समाज परिवार गणराज्य व्यवस्था को तोड़ने का धूर्ततापूर्ण षड़यंत्र जारी रखा ही है, किन्तु हमारे धर्म संस्कृति प्रमुखों को क्या हो गया है कि वे भी समाज, ग्राम, परिवार गणराज्य व्यवस्था को कमजोर करने में लगे हुए हैं। सचाई यह है कि राजनीति और राजनीतिज्ञों से सम्पूर्ण समाज व्यवस्था या परिवार व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है। राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के नाम पर उस खतरे को अर्थ-भ्रमित कर बढ़ावा दिया जा रहा है और समाज, गांव, परिवार असहाय हैं। अब तक तो व्यक्ति परिवार और समाज के अधिकारों की कोई स्पष्ट व्याख्या या सीमाएं ही समाज में स्पष्ट नहीं दिखती तो कहां से पहल की जाये यह चिन्ता विषय है। धर्म संस्कृति राष्ट्र आदि शब्द समाज को और राजनीति तो सम्पूर्ण परिवार-समाज व्यवस्था को निगल कर आत्मसात करने को व्याकुल हैं। समाज को इस सम्बन्ध में चिन्ता करनी चाहिए। क्योंकि समय रहते समाज ने संयुक्त परिवार व्यवस्था को राजनीति से नहीं बचाया तो भारत की परिवार व्यवस्था का भी वही हाल होगा जो समाज व्यवस्था का हो रहा है।
मेरे विचार से व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से हटकर सोचने के लिए अर्थात सहजीवन के लिए संयुक्त संयुक्त परिवार एक प्रशिक्षण केंद्र है। जिसमे व्यक्ति सफलता-असफलता, हानि-लाभ, स्वास्थ्य और बीमारी, सुख और दुःख से परे एक दूसरे के प्रति परस्पर प्रतिबद्ध होना और रहना सीखता है।
संयुक्त परिवार अपनी प्रकृति से ही सब प्रकार से लाभकारी है जिसमे प्रमुख रुप से हर छोटी-बड़ी सामान्य-विशेष बातों में परस्पर राय-मशविरा और सहयोग, सुख-दुःख में परस्पर भागेदारी , सुरक्षा और स्वास्थ्य निर्माण, रूचि क्षमता और सुविधानुसार विभिन्न कार्यों का विभाजन, वृद्धजनों की समुचित देखभाल, भावी पीढ़ी का समुचित विकास, न्यूनतम व्यय में अधिकतम लाभ, परस्पर भावनात्मक सहयोग, चरित्र निर्माण में सहयोग आदि शामिल हैं।
सारांशः अनुशासन, नैतिक उन्नति, सन्तानोत्पति व सहजीवन की प्रथम एवं महत्वपूर्ण पाठशाला संयुक्त परिवार ही है जिसे योजनाबद्ध तरीके से तोड़ने का कुचक्र दशको से चल रहा है। एकल परिवार न तो कभी संयुक्त परिवार का विकल्प था और न ही कभी होगा।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 10.09.2019 प्रथम सत्र सुबह में होगी। ’’संयुक्त परिवार प्रणाली ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-19 “भारत विभाजन भूल या मजबूरी”
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ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन को आसानी से समझने मे मदद करेंगेः-
1. प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते हैं, आपस में टकराते है और अंत में विभाजन होता है।
2. किसी भी प्रकार की सत्ता हमेशा वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष का प्रयत्न करती है। वर्ग संघर्ष सत्ता के सशक्तिकरण का मुख्य आधार होता है। इसे ही ’डिवाइड एंड रूल अर्थात बॉटो और राज करो’ की नीति कहते है।
3. साम्यवाद तो खुलकर वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने व स्थापित करने का प्रयत्न करता है, समाजवाद अप्रत्यक्ष रूप से तथा पूंजीवाद आंशिक रूप से।
4. लोकतंत्र में संगठन वर्ग संघर्ष का आधार होता है और वर्ग संघर्ष ही समाज विभाजन की स्थितियां पैदा करता है।
5. मुसलमान चाहे जिस देश में रहे, स्वाभाविक रूप से वह संगठन भी बनायेगा और वर्ग विद्वेष बढ़ाकर विभाजन भी करायेगा। वर्ग विभाजन उसका लक्ष्य होता है मजबूरी नहीं क्योंकि उनकी धार्मिक व सांगठनिक मान्यताएं ही ऐसी है कि उनके अलावा सभी काफिर है।
6. हिन्दू कभी संगठन नहीं बनाता, और यदि अन्य लोग संगठित हैं तब भी वर्ग समन्वय का प्रयत्न करता है।
7. गांधी का मानना था कि हम अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू करें जिसमें हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न होकर प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो। या यदि मजबूरी ही हो तो वर्ग समन्वय होना चहिये, वर्ग संघर्ष नहीं।
8. गांधी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट्र, संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत और मुस्लिम लीग के लिये दारूल इस्लाम भारत।
9. एकमात्र गांधी को छोड़कर, देश के लगभग सभी प्रभावी राजनेता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतने लालायित थे कि उसके लिये वे देश के विभाजन की कीमत पर भी तैयार थे।
10. विभाजन की नींव हिन्दू मुस्लिम वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत में जिन्ना के द्वारा प्रारम्भ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बड़ा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये।
11. गांधी अकेन्द्रित शासन के पक्षधर थे तो संघ एकात्मक शासन का पक्षधर। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा।
12. यह ’वर्ग’ का चरित्र होता है कि वह कभी नहीं चाहता कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जब तक वह कमजोर होता है तब तक तो न्याय की बात करता है और जैसे ही मजबूत होता है तो व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिय तानाशाही की आवश्यकता की बात करने लगता है।
13. यदि आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक राष्ट्र के रूप में मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा।
14. पाकिस्तान और बांग्लादेश मुसलमानों को दे देने के बाद भी भारत में मुस्लिम समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।
15. भारत में इस्लामिक साम्प्रदायिकता बढ़ती चली गई, फिर भी, प्रत्यक्ष रूप से इसका मुख्य कारण तो संगठित मुस्लिम तथा संघ परिवार और हिन्दू महासभा की साम्प्रदायिक राजनीति में ही खोजा जाना चाहिये।
16. भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विस्तार के मुख्य दोषी पंडित नेहरू रहे।
17. गांधी हत्या के बाद हिन्दू साम्प्रदायिकता को कठोरता से कुचल देना चाहिये था किन्तु नेहरू ने ऐसा करने की अपेक्षा मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करके बैलेन्स बनाने की कोशिश की।
18.विभाजनकारी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, इस्लामिक विस्तारवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद की किसी भी संभावित त्रासदी से बचने के लिये शीघ्र अतिशीघ्र पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिये।
गौरवमय प्राचीनतम सभ्यता व संस्कृति की धरोहर सहेजे भारत विश्व का आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से सदा सिरमौर रहा है। सम्पन्नता एवं वैभव की दृष्टि से सोने की चिड़िया के नाम से प्रख्यात भारत ज्ञान-विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में विश्व गुरू के रूप में पूजनीय व आदरणीय रहा। आज भी सिन्धु घाटी सभ्यता व ऋग्वैदिक सभ्यता दुनियां के किसी भी प्राचीन व समकालीन सभ्यता-संस्कृति में अग्रगण्य है। अतीत के नालन्दा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय में दुनियां भर से खोजी विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते रहे हैं। प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली के सफल प्रयोग का सुफल प्रमाण देने वाला वैशाली का गणराज्य आधुनिक शासन प्रणाली हेतु एक उत्कृष्ट उदाहरण है। विज्ञान, कला, साहित्य व चिकित्सा, निर्माणकला, शल्य क्रिया, खगोल विद्या, अर्थशास्त्र, दर्शन एवं धर्मशास्त्र इत्यादि शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें समूचे विश्व को भारत का योगदान न रहा हो।
आर्थिक व्यापार के क्षेत्र मे तो भारतीय मसाले, रेशम, वस्त्र व लौह उत्पाद में भारत का कोई जोड़ ही नहीं था। समूचे विश्व में भारत पहला ऐसा देश था जिसके यहॉ क्रय-विक्रय और व्यापार-व्यवहार में विनिमय हेतु स्वर्ण मुद्राओं का चलन था। सब प्रकार के प्राकृतिक संसाधन से भरपूर, जीवन निर्वाह के लिये श्रेष्ठ-पोषक जलवायु व मनोवांछित सर्वथा अनुकूल परिस्थितियों वाले धन-धान्य से परिपूर्ण, भारत की सम्पन्नता व वैभव समूचे विश्व के लिये आकर्षण का कारण बना तथा आक्रान्ताओं व लुटेरों के लिये उनकी महत्वकांक्षा व लालच की पूर्ति का केन्द्र बना। अनेक विदेशी आयेः कुछ प्रचुर धन सम्पदा लूटकर वापस चले गये तथा कुछ स्थाई रूप से यहीं बस गये।शक, हूण, कुषाण, मंगोल आदि अनेक आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया व देश को लूटने में लगे रहे। यहॉ तक कि विश्व विजेता सिकन्दर भी भारत को जीतने का सपना पाले भारत आया और युद्ध में राजा पौरस को परास्त किया। अपने समक्ष मृत्यु दंड के लिये बन्दी बनाकर लाये गये राजा पौरस की बेखौफ हाजिरजबावी से प्रसन्न होकर उसने उसे माफ कर दिया। भारत की आध्यत्मिकता, ज्ञान व सरलहृदयता से वह अत्यन्त प्रभावित हुआ। अन्त में वह यहॉ से रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाकर कृतज्ञ भाव से वापस लौट गया। यहॉ आकर के स्थायी रूप से बस जाने वाले मुगल, तुर्क, पठान, तुगलक खिलजी आदि वंश वाले मुसलमान शासकों ने अपने सामर्थ्य व प्रभाव के अनुरूप यहॉ वर्षों तक शासन किया। कुछ सौ सालों बाद यूरोप निवासियों, डच, पुर्त्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेज भी भारत की राजनैतिक व्यवस्था की कमजोरी का लाभ उठाकर यहॉ पांव जमाने में सफल रहे लेकिन आखिर में अंग्रेजों की धूर्तता के सामने किसी की न चली और उनका एकछत्र राज्य लगभग पूरे भारत में हो गया। ’डिवाइड एंड रूल अर्थात बॉटो और राज करो’ की उनकी नीति इतनी घातक रही कि आजादी पाने के बाद भी हम भारत की सामाजिक व सांस्कृतिक एकता फिर से नहीं पा सके हैं। फलस्वरूप आज भारतीय समाज खण्ड खण्ड में बंटा हुआ है। आजादी के संघर्ष के दौरान ही अंग्रजों ने विभाजन का ऐसा विष बीज बो दिया कि बिना विखण्डित हुये भारत को आजादी ही न मिले। अन्ततः वही हुआ जिसका डर था। गांधी के अथक प्रयास के परिणाम स्वरूप भारत को आजादी तो मिली लेकिन अखण्ड भारत को नहीं बल्कि, टुकडों में बँटे भारत को हजारों लाशों के ढेर पर मिली। इस विभाजन का दंश हम आज भी झेल रहे है।
स्वतंत्रता के पूर्व धर्म के आधार पर राजनैतिक संगठन की शुरूआत मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने की थी। किसने किसकी प्रतिक्रिया में क्या कहा, क्या लिखा और क्या किया, यह एक अलग विषय है और इसपर चर्चा विषय से विषयांतर होना होगा, लेकिन दोनो तरफ से ही क्रिया प्रतिक्रिया लगभग साथ साथ हुई। इसी दौरान एक तीसरी शक्ति के रूप में गांधी का उदय हुआ। हिन्दू महासभा की यह मान्यता थी कि भारत हिन्दू राष्ट्र होना चाहिये। मुसलमान इसके विरोधी थे और पुनः मुस्लिम शासित मुस्लिम राष्ट्र का सपना देख रहे थे। उनका मानना था कि भारत की सत्ता मुसलमानों से अंग्रेजो ने छीनी है इसलिये मुसलमानों का उसपर पहला अधिकार है। हिन्दू महासभा का भी यह मानना था कि हिन्दुओं से मुसलमानों और मुसलमानों से अंग्रेजों ने सत्ता छीनी इसलिये भारत की सत्ता पर मूल रूप से हिन्दुओं का अधिकार है। इन दोनों से इतर मार्ग संघ ने अपनाया और माना कि अंग्रेजों की तुलना में मुसलमान अधिक घातक है इसलिये सारा विरोध मुसलमानों के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिये। गांधी का मानना था कि हम पहले अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो जाये और शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो जिसमें हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न करके या तो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो या यदि मजबूरी हो तो वर्ग समन्वय हो, वर्ग संघर्ष नहीं। इस प्रकार उपरोक्त चारों समूहों ने किसी अन्य के साथ कोई समझौता नहीं किया और चारों अलग अलग तरीके से सक्रिय रहे। आर्य समाज कभी संगठन नहीं रहा, बल्कि संस्था के रूप में रहा। यही कारण था कि आर्य समाज ने मुसलमानों को छोडकर शेष तीनों के साथ मिलकर स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया तथा स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने अपने को सत्ता संघर्ष से अलग कर लिया।
स्वतंत्रता संघर्ष में संघ लगभग निर्लिप्त रहा, इसलिये उसने अपने आप को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर लिया। लेकिन सतर्कतापूर्वक संघ ने सत्ता संघर्ष में अपनी संलिप्तता इस प्रकार रखी कि मुसलमान किसी भी रूप में कमजोर रहे। मतलब सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे। गांधी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट्र, संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत और मुस्लिम लीग के लिये दारूल इस्लाम भारत। इसी बीच अम्बेडकर के रूप में एक पांचवे समूह का उदय हुआ और उसने आदिवासी हरिजन को मिलाकर एक नया वर्ग बनाया और अलग सत्ता की मांग शुरू कर दी। विभाजन रोकने के लिये गांधी अम्बेडकर की उस मांग से ऐसा समझौता करने को मजबूर हुये जो आजतक भारत की अखण्डता की कीमत चुका रहा है। गांधी चाहते थे कि जिन्ना और पटेल के बीच कोई समझौता हो जाये किन्तु दोनों अपनी-अपनी जिद पर अडे़ थे। एक तरफ तो जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ भी मानने को तैयार नहीं थे, वहीं दूसरी तरफ पटेल मुसलमानों को अलग वर्ग के रूप में भी मानने को तैयार नहीं थे। पटेल किसी भी रूप में मुसलमानों को किसी तरह का महत्व देना ही नहीं चाहते थे, भले ही विभाजन क्यों न स्वीकार करना पडे़। एकमात्र गांधी को छोड़कर, देश के लगभग सभी प्रभावी राजनेता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतने लालायित थे कि उसके लिये वे देश के विभाजन की कीमत पर भी तैयार थे। राजनैतिक स्वरूप के जितने भी लोग स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल थे, उनमे से कोई भी ऐसा नहीं निकला जिसने विभाजन का विरोध करने में गांधी का खुलकर साथ दिया हो। अंग्रेजों की भी रूचि विभाजन में थी। हिन्दू, मुस्लिम, आदिवासी संघर्ष समाप्त न हों इसलिये वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पीठ थपथपाते थे। अंत में सत्तालोलुप नेहरू, पटेल, अम्बेडकर तथा अन्य सबने मिलकर विभाजन स्वीकार कर लिया। स्पष्ट है कि विभाजन की नींव वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत में मुसलमानों के द्वारा प्रारम्भ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बड़ा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये। इसी तरह विभाजन का एकमात्र विरोधी सिर्फ गांधी को ही माना जाना चाहिये क्योंकि वो किसी भी रूप में विभाजन के विरोधी थे। यदि बीच के पटेल नेहरू और अम्बेडकर की बात करें तो इन सबकी विभाजन के प्रति पूरी सक्रियता रही। कांग्रेस पार्टी में सरदार पटेल का बहुमत था और नेहरू को पता था कि गांधीजी नेहरू को ही प्रधानमंत्री स्वीकार करेंगे। नेहरू, पटेल और अम्बेडकर जो आगे चलकर स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सत्ता के सपने देख रहे थे, इन तीनों ने मिलकर अन्य सबकी सहमति ले ली जिसके कारण गांधी भी विभाजन के लिये मजबूर हो गये।
राजनैतिक सत्ता बहुत चालाक होती है। वह षड़यंत्र तो स्वयं करती है और दोषारोपण दूसरे पर करती है। वह अपने चाटुकारों को प्रचार माध्यमों में लगाकर बेगुनाह को गुनाहगार प्रमाणित कर देती है। संघ स्वतंत्रता के पूर्व भले ही निर्लिप्त रहा हो किन्तु राजनैतिक सत्ता से उसकी दूरी कभी रही नहीं। स्वतंत्रता के बाद विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान अलग हुआ। अब संघ को दोहरी चिन्ता सता रही थी। जहॉ एक तरफ उसे भारतीय सत्ता पर पकड़ की चिंता थी वही दूसरी तरफ उसे विभाजन के प्रमुख दोषी पटेल को निष्कलंक-निर्दोष साबित करके अपनी छवि भी बचानी थी, क्योंकि अब तक संघ स्वयं को राष्ट्र की एकता अखंडता का झंडाबरदार/पुरोधा/प्रतीक कहता मानता आया था। पटेल को बचाने हेतु किसी को तो विभाजन का दोषी बताकर बलि का बकरा बनाना ही था। संघ के संगठित वर्ग निर्माण व हिन्दू राष्ट्र निर्माण के संकल्प-प्रयासों में गांधी जी बाधक साबित हो रहे थे और संघ गांधी से छुटकारा पाना ही चाहता था। गांधी की सभी नीतियां संघ की मान्यताओं से अलग थी। गांधी अकेन्द्रित शासन के पक्षधर थे तो संघ एकात्मक शासन का पक्षधर। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा। यह ’वर्ग’ का चरित्र होता है कि वह कभी नहीं चाहेगा कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जबतक वह कमजोर होता है तबतक तो न्याय की बात करता है और जैसे ही मजबूत होता है तो व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिय तानाशाही की आवश्यकता की बात करता है। गांधी यह बात बखूबी समझते थे और संघ को भी इसका पूरी तरह आभास था। संघ जानता था कि गांधी का विरोध करने के लिये गांधी की छवि को धूमिल-ध्वस्त किया जाना अत्यधिक आवश्यक था, क्योंकि गांधी के रहते संघ का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता था। अतः संघ ने एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया और उसने जानबूझकर गांधी को टार्गेट किया। तब संघ ने गांधी के जीवित रहने से लेकर मृत्युपर्यन्त बेगुनाह गांधी को विभाजन का दोषी प्रमाणित करने में अपनी सारी ताकत लगा दी और विभाजन के प्रमुख दोषी सरदार पटेल को साफ बचा लिया। कांग्रेस पार्टी सत्ता लोलुप थी। नेहरू स्वयं गांधी की छवि का लाभ तो उठाना चाहते थे, किन्तु गांधी की विचारधारा से उनका जीवन भर विरोध रहा। इसलिये कांग्रेस पार्टी ने संघ के इस गांधी विरोधी प्रचार से अपने को किनारे कर लिया। गांधीवादी धीरे-धीरे साम्यवादियों के चंगुल में फॅस गये इसलिये वे संघ का तो विरोध करते रहे किन्तु गांधी विचारों का समर्थन नहीं कर सके। विभाजन में गांधी की भूमिका ’विभाजन विरोधी’ की थी, यह बात स्पष्ट करने वाला कोई नहीं बचा था, इसलिये ’गांधी सर्वेसर्वा थे वे चाहते तो विभाजन रोक सकते थे’ की धारणा जनमानस में प्रचारित करके देश के विभाजन का सारा दोष इस निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया गया।
यदि आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक राष्ट्र के रूप में मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा। भारत के मुसलमान इससे पूरी तरह सहमत हो जायेगे। आज तक अखण्ड भारत का राग अलाप रहे संघ के लोग अब एक भारत कभी नहीं चाहेंगे क्योंकि वर्तमान में सोलह प्रतिशत की मुस्लिम आबादी ही यदि इतनी बड़ी समस्या के रूप में बनी हुई है तो पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुस्लिम आबादी एक साथ भारत में मिल जाने के बाद तो यह आबादी लगभग पच्चीस प्रतिशत हो जायेगी और तब शक्ति संतुलन और बिगड़ सकता है। इसलिये अखण्ड भारत का नारा संघ परिवार का नाटक मात्र है और कुछ नहीं।
पाकिस्तान और बांग्लादेश मुसलमानों को दे देने के बाद भी भारत में मुस्लिम समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। इस समस्या को बढ़ाने का काम उस विचारधारा ने भी किया जो यह मानती थी कि गांधी हत्या के बाद देश में गृहयुद्ध हो जायेगा और वे भारत को हिन्दू राष्ट्र बना लेंगे। ऐसे लोगों के सपने चूर करने के राजनैतिक प्रयत्नों में इस्लामिक साम्प्रदायिकता बढ़ती चली गई, फिर भी, प्रत्यक्ष रूप से इसका मुख्य कारण तो संगठित इस्लाम तथा संघ परिवार और हिन्दू महासभा की साम्प्रदायिक राजनीति में ही खोजा जाना चाहिये।
मेरे विचार से तो विभाजन का असली दोषी कौन है इसकी खोज बन्द कर देनी चाहिये, और यह खोज भी तभी बन्द हो सकती है जब इसके वास्तविक दोषी को सामने खड़ा कर दिया जाये जिससे विभाजन विरोधी गांधी पर आक्रमण अपने आप बंद हो जाये और यह अखण्ड चर्चा ही पूरी तरह समाप्त हो जाये। विभाजन पूर्व जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। दूसरा पक्ष थी कांग्रेस। कोई तीसरा पक्ष था ही नहीं। कांग्रेस पार्टी में सरदार पटेल का पूर्ण बहुमत था। स्पष्ट है कि सरदार पटेल इस भूमिका में सबसे मजबूत किरदार थे जो विभाजन रोक सकते थे। गांधी की तो कोई अधिकृत भूमिका रही ही नहीं। नेहरू, पटेल ने विभाजन स्वीकार करने के बाद गांधी को सूचना दी। सारे विभाजन की घटनाक्रम में, विभाजन के विरूद्ध गांधी की तो ’विभाजन-विरोधी’ भूमिका का पता चलता है किन्तु पटेल का ऐसा कोई पता नहीं चलता कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी में कहीं खुलकर विभाजन का विरोध किया हो। अब हम वर्तमान स्थिति की समीक्षा करे। स्पष्ट है कि भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विस्तार के मुख्य दोषी पंडित नेहरू रहे। गांधी हत्या के बाद हिन्दू साम्प्रदायिकता को कठोरता से कुचल देना चाहिये था किन्तु नेहरू ने ऐसा करने की अपेक्षा मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करके बैलेन्स बनाने की कोशिश की। साम्यवाद से बहुत प्रभावित होने के कारण, नेहरू ’फूट डालो राज करो’ पर भी ज्यादा विश्वास करते थे। इसलिये नेहरू ने अल्पसंख्यक तुष्टीकरण को हथियार के रूप में स्वीकार किया और संघ को भी नेहरू की नीति में ही अपनी राजनैतिक शक्ति विस्तार की अधिक संभावना दिखी।
राजनेताओं की राजनैतिक तिकड़म का ही परिणाम है कि आज भारत एक नये विभाजन की दिशा में बढ़ रहा है। आसाम, बंगाल अशान्त होते जा रहे हैं। हिन्दू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है। मृतप्रायः साम्यवाद अब भी सांसे ले रहा है व अपनी चालें चल रहा है। आदिवासी हरिजनों को तीसरी शक्ति के रूप में इकठ्ठा करने के लिये नया अम्बेडकर बनने की दौड़ जारी है। कोई गांधी दिख नहीं रहा जो इन सत्ता लोलुप तत्वों पर नियंत्रण करने की कोशिश करे क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान ऐसा नियंत्रण करने वाले गांधी का अन्तिम परिणाम सबकी नजर में है। ठीक स्वतंत्रता पूर्व की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। राजनैतिक दल दो विपरीत समूहों में बंटकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने मे लगे हैं। एक भयप्रद आशंका मन में बनी हुयी है कि शायद देश के नये विभाजन की प्रारंभिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। फिर भी स्वतंत्रता पूर्व की देश विभाजन सरीखी स्थितियां होते हुये भी कुछ परिस्थितियां भिन्न भी है। उस समय भारत के राजनैतिक वातावरण में महत्वपूर्ण कारक अंग्रेज सत्ता थी। जो इसमें अलग चाल चलती थी। आज वह स्थिति नहीं है। उस समय दुनियां में इस्लाम इतना संदेह के घेरे में नहीं था जितना आज है। अब इस्लामिक संगठन प्राथमिक स्तर पर ही संदेहास्पद हो गये हैं। उस समय गांधी पर हिन्दुओं का अटूट विश्वास होने से हिन्दू बहुमत उस तरह इकठ्ठा नहीं हुआ जिस तरह मुसलमान। अब हिन्दुओं को कुछ अलग तरह का महसूस हो रहा है और वह पहले की तुलना में अधिक ध्रुवीकृत हो रहा है। उस समय साम्यवाद एक उभरती हुई शक्ति था और वह कोई न कोई तिकड़म करता रहता था। अब साम्यवाद अस्तांचल गामी है और उसकी साफ-साफ पोल खुल गई है कि वह अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के एक पोषक से भिन्न कुछ नहीं। इस तरह के भिन्न राष्ट्रीय और वैश्विक वातावरण में विभाजन का दॉव अल्पसंख्यकों के लिये उल्टा भी पड़ सकता है इसकी ज्यादा संभावना है। फिर भी इस खतरे को किसी दुर्घटना व दुष्परिणाम के पूर्व ही दूर कर देना चाहिये।
इसके लिये भारत सरकार को पहल करनी चाहिये। जिसके दो तरीके संभव हैं 1. पूरे भारत में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाये जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण निरूत्साहित हो 2. कश्मीर के विशेषाधिकार समाप्त कर दिये जायें।
इस प्रकार के प्रयत्न अल्पसंख्यकों को कोई एक दिशा चुनने के लिये मजबूर कर देंगे। मुठ्ठी भर साम्प्रदायिक अल्पसंख्यक तथा उनके सहयोगी अलग-थलग पड़ सकते हैं तथा कट्टरपंथी हिन्दुओं की साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की भी हवा निकल जायेगी। इस तरह विभाजन का खतरा सदा के लिये टल सकता है। हम प्रयत्न ही कर सकते हैं किन्तु भविष्य क्या होगा यह कहना संभव नही।
साराशः किसी भी प्रकार का विभाजन बहुत कष्टकारक होता है। वर्ग निर्माण विभाजन के लिये बीज का काम करता है। विभाजन की किसी भी संभावित त्रासदी से बचने के लिये शीघ्र अतिशीघ्र पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिये।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 09.09.2019 प्रथम सत्र सुबह में होगी। ’’भारत विभाजन भूल या मजबूरी ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, दिनांक 08.09.2019 को द्वितीय सत्र

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सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-18 “अपराध और अपराध नियंत्रण”
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कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त/मान्यताएं हैंः-
1. व्यक्ति के मूल अधिकारों के उल्लंघन को अपराध (क्राइम) तथा सामाजिक या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन को असामाजिक (अनसोशल) या गैर कानूनी (इल्लीगल) कार्य कहते हैं।
2. मेरा मूल अधिकार से आशय स्वाभाविक या नैसर्गिक-प्राकृतिक अधिकारों से ही है जो किसी भी देश या काल में सिर्फ चार ही होते हैं- 1. जीने का अधिकार 2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार 3. संपत्ति का अधिकार 4. स्वनिर्णय का अधिकार। इन मूल अधिकारों पर आक्रमण ही अपराध है।
5. अपराध सिर्फ पांच ही हो सकते हैं 1. चोरी, डकैती, लूट 2. बलात्कार 3. मिलावट, कमतौल 4. जालसाजी, धोखाधड़ी 5. हिंसा, आतंक, बल प्रयोग।
6. आमतौर पर प्रत्येक अपराध गैर कानूनी होता ही है किन्तु आवश्यक नहीं कि प्रत्येक गैर कानूनी कार्य अपराध हो ही।
गैर कानूनी कार्यों को अपराध घोषित कर देने से अपराधों की पहचान भी कठिन हो जाती है और नियंत्रण भी। अपराध नियंत्रण में यह एक प्रमुख बाधक तत्व है।
7. दण्ड का उपयोग इस तरह हो कि वह प्रतीकात्मक परिणाम दे अर्थात् दण्ड अन्य अपराधियों में भय उत्पत्ति का माध्यम बने। दण्ड का संतुलन कुछ इस तरह का होना चाहिये कि अपराधी भयभीत हो और सामाजिक व्यक्ति भयमुक्त।
8. भारत में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि भारत के अपराधी तो लगभग भय मुक्त हो गये तथा आम नागरिक पुलिस से भी भयभीत है और अपराधियों से भी। अपराधियों का कानून पर विश्वास बढ़ा है और नागरिकों का घटा है।
9. जिस तरह सन् सैंतालिस में संघ की विचारधारा को गांधी हत्या में अप्रत्यक्ष सहायक माना जाता है उसी प्रकार वर्तमान समय में मानवाधिकार के नाम पर काम कर रहे संगठनों की भूमिका अपराध वृद्धि में सहायक है। अनेक अपराधी भी मानवाधिकार संगठनों में शामिल होकर काम करने लगें हैं।
मानवाधिकार प्रत्येक कार्य वास्तविक अपराधियों के पक्ष में शुरू होता है।
10. मानवाधिकार संगठनों का संगठन और उनसे जुड़े लोग सिर्फ अपराधियों के पक्ष में ही हल्ला करते हैं। ये अपराधियों के विरूद्ध कभी भी पुलिस और न्यायालय की सहायता करते हुए नहीं मिलेंगे।
11. भारतीय कानूनों में ऐसा फेर-बदल किया जाना चाहिए कि पांच प्रकार के अपराधों में सबूत का भार अपराधी का हो।
दुनियॉं में जब से मानव की उत्पत्ति हुई होगी, उसके कुछ समय बाद ही अपराध भी शुरू हुए होंगे। बिल्कुल ही प्रारंभिक काल को छोड़कर कोई ऐसा समय नहीं आया होगा जब समाज अपराध शून्य रहा हो। प्राचीन काल के विषय में तो सिर्फ कल्पना ही संभव है किन्तु जब से प्रत्यक्ष का इतिहास या किवदंती की चर्चा उपलब्ध है, तब से तो निरंतर अपराधों का अस्तित्व रहा ही है, चाहे उनकी मात्रा कम हो या ज्यादा।
व्यक्ति के अधिकार दो प्रकार के होते हैं। 1. स्वाभाविक, प्राकृतिक या मूल अधिकार। 2. सामाजिक या संवैधानिक अधिकार। यहॉं मूल अधिकार का आशय भारतीय संविधान में वर्णित मूल अधिकारों से नहीं है क्योंकि संविधान में मूल अधिकार के संबंध में अनेक विसंगतियोॅं मौंजूद हैं। मेरा मूल अधिकार से आशय स्वाभाविक या नैसर्गिक-प्राकृतिक अधिकारों से ही है जो किसी भी देश या काल में सिर्फ एक ही होता है असीम स्वतंत्रता का। इस मूल अधिकार के चार भाग होते हैं- 1. जीने का अधिकार 2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार 3. संपत्ति का अधिकार 4. स्वनिर्णय का अधिकार। इन मूल अधिकारों पर आक्रमण ही अपराध है। अपराध की स्पष्ट परिभाषा के आधार पर अपराध सिर्फ दो ही होते हैं – 1. बल प्रयोग 2. जालसाजी या छल कपअं इन दोनो के पांच भाग हो सकते हैं 1. चोरी, डकैती, लूट 2. बलात्कार 3. मिलावट, कमतौल 4. जालसाजी, धोखाधड़ी 5. हिंसा, आतंक, बल प्रयोग। इन पांच को छोड़कर आज तक कोई भी कार्य न अपराध माना गया है न ही होगा क्योंकि चार प्रकार के मूल अधिकारों के उल्लंघन के ये पांच ही मार्ग होते हैं।
व्यक्ति के मूल अधिकारों के उल्लंघन को अपराध (क्राइम) तथा सामाजिक या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन को असामाजिक (अनसोशल) या गैर कानूनी (इल्लीगल) कार्य कहते हैं। ये असामाजिक या गैर कानूनी कार्य अपराधों से बिल्कुल भिन्न प्रकृति के होते हैं। इन असामाजिक या गैर कानूनी कार्यों की पहचान, प्रभाव तथा नियंत्रण बिल्कुल भिन्न होता है। आमतौर पर प्रत्येक अपराध गैर कानूनी होता ही है किन्तु आवश्यक नहीं कि प्रत्येक गैर कानूनी कार्य अपराध हो ही। उपर लिखे पांच प्रकार के सभी अपराध गैर कानूनी हैं किन्तु इन पांच को छोड़कर अन्य हजारों प्रकार के कानूनों का उल्लंघन गैर कानूनी होते हुए भी अपराध नहीं। इनमें आदिवासी हरिजन महिला संबंधी विशेष कानून, तस्करी, ब्लैक, शराब गांजा अफीम हेरोइन आदि का उपयोग या व्यवसाय, टैक्स चोरी, दहेज, बालविवाह, आत्महत्या, स्वैच्छिक सतीप्रथा, छुआछूत, वन अपराध, वैश्यावृत्ति आदि। इन गैर कानूनी कार्यों से किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों पर कोई आक्रमण नहीं होता, भले ही उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन क्यों न होता हो।
यद्यपि सभी अपराध गैर कानूनी घोषित हैं किन्तु अपवाद स्वरूप मकान किराया कानून कुछ ऐसा बना है जिसमें किसी के मकान को किराये में लेकर खाली न करना अपराध होते हुए भी कानून सम्मत है। मैं आज तक नहीं समझ सका कि भारत के किन नासमझों ने ऐसा कानून बनाया किन्तु आज भी ऐसा कानून भारत में मौजूद है। ऐसे और भी कानून हो सकते हैं जो अभी मेरे ध्यान में नहीं हैं। ऐसे कानूनों का होना आश्चर्यजनक है।
गैर कानूनी कार्यों को अपराध मानने और घोषित करने के दो कारण संभव है -
1. जब शासक में समझदारी की अपेक्षा शराफत अधिक हो, भावना प्रधान हो, उच्च आदर्शवादी हो। स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक काल में कुछ ऐसी ही स्थिति थी। इस स्थिति में शासक भूलवश ऐसा करता है।
2. जब शासक अपराधियों के चंगुल में हो। वर्तमान स्थिति ऐसी ही है। इस स्थिति में शासक अपराधियों के प्रभाव-दवाबवश जान बूझकर ऐसा करता है।
गैर कानूनी कार्यों को अपराध घोषित कर देने से अपराधों की पहचान भी कठिन हो जाती है और उन पर नियंत्रण भी। अपराध नियंत्रण में यह एक प्रमुख बाधक तत्व है।
अपराध दो कारणों से होते हैं 1. मजबूरी 2. स्वार्थ। सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ है कि पंद्रह से बीस प्रतिशत अपराध ही मजबूरी में होते हैं अन्यथा आम तौर पर अपराध स्वार्थ के कारण ही होते रहे हैं। जो लोग गरीब और शक्तिहीन हैं वे शायद ही एक दो प्रतिशत अपराध करते हों। अपराध या तो धनी लोग करते हैं या शक्ति सम्पन्न चाहे वे शारीरिक रूप से शक्तिशाली हों या राजनैतिक सामाजिक रूप से।
अपराध नियंत्रण के तीन मार्ग माने जाते हैं – 1. परिस्थिति परिवर्तन। 2. हृदय परिवर्तन। 3. भय। परिस्थिति परिवर्तन एक निरंतर चलने वाली सतत् प्रक्रिया है जिसका प्रभाव अपराध नियंत्रण की प्रक्रिया में सिर्फ परोक्ष ही होता है, प्रत्यक्ष नहीं। हृदय परिवर्तन का प्रभाव स्थायी तथा दूरगामी होता है किन्तु नगण्य होता है। गांधी हत्या के बाद हृदय परिवर्तन का सिर्फ एक प्रयास ही सफल हुआ जिसमें भिण्ड मुरैना के अनेक दुर्दान्त डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया। इस एक सफलता के अतिरिक्त हृदय परिवर्तन को कहीं कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। अपराध नियंत्रण के लिये सबसे अधिक प्रचलित और उपयोगी तरीका भय का ही है जो प्रारंभ से लेकर आज तक एक समान रूप से उपयोगी बना हुआ है। भय तीन प्रकार का होता है 1. ईश्वर का 2. समाज का 3. सरकार का। इन तीनों का उपयोग समान परिणाम देता है। प्राचीन समय में पहले और दूसरे मार्ग का अधिक और तीसरे का नगण्य उपयोग होता था। आम लोग धर्म प्रधान भी थे तथा समाज व्यवस्था भी मजबूत थी। इसलिये बहुत कम मामलों में शासकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होती थी। अपराध नियंत्रण में धीरे धीरे ईश्वरीय भय का प्रभाव शून्यवत हो गया। बड़े-बड़े डकैत धर्म का उपयोग अपराध सहायक रूप में करने लगे हैं। अब तो स्थिति यह हो गई है कि धर्म का अर्थ आचरण और गुणों से हटकर संगठन के रूप में हो गया है। अपराध नियंत्रण का दूसरा आधार ‘सामाजिक शक्ति‘ भी निष्प्राण हो गई है। समाज का कोई स्वरूप रहा ही नहीं। अब तो अनेक अपराधी ही समाज से सुरक्षा पाने लगे हैं क्योंकि समाज का स्थान भी शासन ने ले लिया। आज ले-देकर शासन ही एकमात्र ऐसी इकाई बची है जो अपराध नियंत्रण में भय का उपयोग कर सकती हैं। अतः कुल मिलाकर शासन व्यवस्था से ही अपराध नियंत्रण-अपराध शमन की कोई तात्कालिक संभावना दिखती है यही कारण है कि हम इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
भय पैदा करने के लिये दण्ड ही एक मात्र मार्ग है क्योंकि ईश्वरीय भय और सामाजिक बदनामी का भय प्रभावहीन हो गया है। अपराध के लिये दिये जाने वाले दण्ड के चार उद्देश्य होते हैं 1. दण्ड का समाज पर पड़ने वाला प्रभाव 2. अपराधी के मन में पैदा होने वाला भय 3. पीड़ित को मिलने वाला संतोष 4. राज्य के दायित्व की पूर्ति। जब समाज हृदय परिवर्तन के प्रयास में असफल हो जाता है तभी अन्तिम उपाय के रूप् में दण्ड का प्रयोग होता है। जो लोग दण्ड का उद्देश्य हृदय परिवर्तन या सुधार के रूप में मानते हैं वे गलत हैं। जेल किसी स्थिति में सुधार गृह नहीं है बल्कि दण्ड के भय से सुधार तो सिर्फ परिणाम मात्र है। दण्ड का संतुलन कुछ इस तरह का होना चाहिये कि अपराधी भयभीत हो और सामाजिक व्यक्ति भयमुक्त। दण्ड की मात्रा और अपराधी की पहचान अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। यदि दण्ड की मात्रा कम होगी तो अपराधियों की शक्ति कम होने की अपेक्षा उसी तरह बढ़ती है जिस तरह मच्छरों या बीमारियों के निवारण हेतु उपयोग की गई दवा की कम मात्रा होने से कोई असर तो होता ही नहीं बल्कि, उल्टा मच्छर और बीमारियां उस मात्रा को सहने की अभ्यस्त हो कर अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और विपरीत प्रभाव डालते है। इसी तरह यदि अपराधी की ठीक ठीक पहचान नहीं हुई तो अनुचित दण्ड समाज पर विपरीत भावनात्मक प्रभाव छोड़ता है। इन सब के साथ-साथ दण्ड का उपयोग इस तरह हो कि वह प्रतीकात्मक परिणाम दे अर्थात् दण्ड अन्य अपराधियों में भय उत्पत्ति का माध्यम बने। तानाशाही व्यवस्था में तो यह काम बिल्कुल आसान है किन्तु प्रजातंत्र में इसके लिये बहुत सतर्कता की आवश्यकता है। इस सतर्कता के लिये न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका में बहुत सामंजस्य की आवश्यकता है। अपराध नियंत्रण में कार्यपालिका का प्रतिनिधित्व पुलिस करती है। भारत में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि भारत के अपराधी तो लगभग भय ँमुक्त हो गये तथा आम नागरिक पुलिस से भी भयभीत है और अपराधियों से भी। अपराधियों का कानून पर विश्वास बढ़ा है और नागरिकों का घटा है। भागलपुर में नागरिकों के इशारे पर पुलिस ने अपराधियों की आँख फोड़कर नागरिकों से प्रशंसा प्राप्त की। नागपुर की महिलाओं ने अक्कू यादव की न्यायालय परिसर में ही हत्या करके सम्पूर्ण भारत के नागरिकों का सम्मान प्राप्त किया। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि आम नागरिक कानून को नपुंसक मानकर अपराधियों को प्रत्यक्ष दण्डित करने में विश्वास करने लगे हैं। कानून और समाज के बीच दूरी बढ़ गई है। भारत में हो रहे कुल अपराधों में सजा का प्रतिशत घटकर एक से भी कम रह गया है। पंचान्नबे प्रतिशत अपराध तो अब थाने तक ही नहीं पहुॅंचते। पांच प्रतिशत में से कुछ पुलिस में कुछ कोर्ट में छूट जाते है। एकाध को कभी सजा हो पाती है। संभवतः अपराधों में सजा का यह प्रतिशत भारत सरीखे कुछ दक्षिण एशियाई देशों को छोड़कर न पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में है न पूर्व के साम्यवादी देशों में।
ऐसा हुआ क्यों ? इसके निम्न कारण हैं -
1. पुलिस और न्यायालय की मात्रा बढ़ाकर दायित्वों में वृद्धि- भारत में कुल बजट का एक प्रतिशत पुलिस और न्यायालय पर खर्च होता है। स्वतंत्रता के समय यह मात्रा एक प्रतिशत ही थी। किन्तु उस समय की अपेक्षा आज पुलिस और न्यायालयों पर पच्चीस गुना अधिक बोझ लाद दिया गया है। अब गांजा, भांग, बालविवाह, दहेज, आदिवासी, हरिजन, महिला आदि हजारों ऐसे गैर कानूनी कार्य है, जिन्हें अपराध घोषित करके पुलिस और न्यायालय पर डाल दिया गया है। आश्चर्य की बात है कि बजट में कोई वृद्धि किये बिना अपराधों की संख्या में वृद्धि करने की लगातार कोशिश की गइ्र्र। इससे वास्तविक अपराध और अपराधियों की पहचान पूरी तरह समाप्त हो गई जैसे नकली वस्तुओं के ढे़र में असली वस्तु की पहचान कठिन हो जाया करती है। इससे पुलिस और न्यायालय ओवरलोडेड हो गये। परिणाम स्वरूप सजा में बहुत विलम्ब होने लगा और न्याय मिलना कठिन हो गया।
इस कठिनाई का समाधान संभव है- 1. पुलिस और न्यायालय पर व्यय सम्पूर्ण बजट का प्रथम दो वर्ष में बीस प्रतिशत और बाद में घटाकर पांच प्रतिशत कर दिया जावे। 2. पांच प्रकार के अपराधों को छोड़कर अन्य सभी गैर कानूनी कार्यों की समीक्षा करके दो चार अति आवश्यक कानूनों को शासन अपने जिम्मे रखे। शेष को या तो मुक्त कर दे या स्थानीय इकाईयों को दे दे। इन दो चार गैर कानूनी कार्यो की रोकथाम भी किसी विशेष विभाग और विशेष न्यायालय को दे। सामान्य पुलिस और सामान्य न्यायालय पर कोई अतिरिक्त वजन न डाले।
2. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा अप्रत्यक्ष अपराधी सहायता- जिस तरह सन् सैंतालिस में संघ की विचारधारा को गांधी हत्या में अप्रत्यक्ष सहायक माना जाता है उसी प्रकार वर्तमान समय में मानवाधिकार के नाम पर काम कर रहे संगठनों की भूमिका अपराध वृद्धि में है। अनेक अपराधी भी मानवाधिकार संगठनों में शामिल होकर काम करने लगें हैं। आज तक शायद ही कोई उदाहरण मिला हो जिसमें मानवाधिकार संगठनों ने किसी अपराधी को पकड़वाने और सजा दिलवाने में मदद की हो। यदि पुलिस अपराधी को न पकड़े तो पुलिस के विरूद्ध पकड़ने के लिये आंदोलन करना और यदि पकड़ने में या पकड़ने के बाद पुलिस कोई भूल करे तो फिर पुलिस के विरूद्ध आंदोलन करने की ठेकेदारी इन सबने ले रखी है। मानवाधिकार के नाम पर काम कर रहे लोगों की यदि पूरी तरह जांच की जाय तो पाया जायेगा कि ये कभी अपराधी को पकड़ने या सजा दिलवाने में सहायक नहीं होते।
ख. मानवाधिकारी कोई उत्पादक काम नहीं करते। यदि इनके भरण पोषण की जांच करें तो अधिकांश लोग तो विदेशों से या भारतीय पूंजीपतियों से पोषित होते या शासकीय धन पर पलते हुए दिखेंगे।
ग मानवाधिकारी का प्रत्येक कार्य वास्तविक अपराधियों के पक्ष में शुरू होता है।
मुझे याद है कि अंसल प्लाजा में दो आतंकवादियों को पकड़ कर नकली मुठभेड़ में मारने के नाम पर ऐसे ही कुछ मानवाधिकारी ठेकेदारों ने चिल्ल पों मचाई थी। अभी कुछ वर्ष पूर्व गुजरात पुलिस द्वारा चार आतंकियों को मारने में भी इशरत जहां को हीरो बनाकर इन पेशेवर मानवाधिकारियों ने हो हल्ला किया था। राजनैतिक दलों का तो इस हल्ले के पीछे राजनैतिक स्वार्थ था किन्तु ये मानवाधिकारी किस उद्देश्य से ऐसी बेशर्मी पर उतर गये यह विचारणीय है। अन्त में कुछ ही दिनों में सारी पोल खुल गई और हल्ला करने वालों के मुॅंह पर ताले लटक गये। मेरे विचार में पूरे भारत में ऐसे पेशेवर लोगों की जॉंच की जानी चाहिये कि उनकी आय के स्त्रोत क्या हैं जो इतनी तल्लीनता से समाज सेवा करते हैं। ऐसे लोगों के सामाजिक रेकार्ड को भी देखा जाये कि वे सिर्फ अपराधियों के पक्ष में ही हल्ला करते हैं या अपराधियों के विरूद्ध भी कभी पुलिस और न्यायालय की सहायता करते हैं।
भारतीय कानूनों में ऐसा फेर बदल किया जाय कि पांच प्रकार के अपराधों में सबूत का भार अपराधी का हो या प्रारंभ में ही अपराधी का विस्तृत बयान न्यायालय में ले लिया जावे। मुलजिम के बयान के साथ ही न्यायालय में कार्यवाही प्रारंभ हो।
आम तौर पर भारत मेंं पुलिस को अधिक शक्ति देने की बात होती रही हैं। पोटा जैसा कानून उसका उदाहरण हैैै। पिछले पचीस तीस वर्षां से किसी न किसी रूप में ऐसे कानूनों पर विचार हुआ। मैं पुलिस को ऐसे अधिकार देने के विरूद्ध हूॅं क्योंकि ऐसे कानूनों का राजनीतिज्ञ दुरूपयोग कर सकते हैं। किन्तु मैं पोटा से भी अधिक कठोर कानून का पक्षधर हूॅं जो न्यायालयों को शक्ति प्रदान करे और राजनेताओं की छाया से दूर रहे। मेरे विचार में अपराधियों के भय से गवाहों का बदल जाना इसमें एक महत्वपूर्ण कारण होता है। सामान्य स्थितियों मे तो किसी विशेष कानून की जरूरत नहीं। किन्तु जिस जिले के कलेक्टर, एस0पी0 और जिला जज मिलकर ऐसा महसूस करें तो वहॉं न्यायपालिका को विशेषाधिकार दिया जाय इसके अन्तर्गत उस विशेष क्षेत्र में न्यायालयों को गुप्तचर जांच शाखा दी जाय जो गुप्तचर पुलिस से प्राप्त गंभीर प्रकरणों पर गुप्तचर जॉंच के बाद सजा दे सकती है। सारी न्यायिक कार्यवाही पुलिस या अपराधी से गुप्त होगी। पुलिस या अपराधी अपील कर सकता है जहॉं उपर की न्यायिक गुप्तचर शाखा जांच करके निर्णय देगी। यह एक संशोधन बहुत प्रभावकारी होगा। राजनेताओं में भी स्वयं ही बहुत सुधार हो जायेगा। मैं जानता हूॅं कि कुछ लोग इस कानून की आलोचना करेंगे कि इसमें अपराधी को सफाई का अवसर नहीं मिला या दुरूपयोग की आशंका है आदि। मैं आपात क्षेत्र में ही सीमित समय तक ऐसे कानून का पक्षधर हूॅं। यदि कोई इस कानून से अच्छा सुझाव दे तो मैं अवश्य उस सुझाव पर विचार करने के लिये तैयार हूॅं।
3. दण्ड का मानवीय होना- भी ये नासमझी की बात है। इसका भी विपरीत असर होता है। अपराधी को दण्ड मिले यह हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिये। हमारा उद्देश्य यह हो कि दण्ड प्रतीकात्मक हो, अन्य अपराधियों के मन में भय पैदा करें। देश के अनेक बुद्धिजीवी दण्ड को मानवीय होने की वकालत करते है। मेरे मन में ऐसे लोगों के बुद्धिजीवी होने पर ही संदेह होता है। ये लोग संत हो सकते हैं, शरीफ हो सकते हैं, मानवता प्रेमी और दयालु तो हो सकते हैं किन्तु बुद्धिजीवी नहीं। दण्ड का तरीका ऐसा होना चाहिये जो भय उत्पादक हो। उसका तरीका और उसकी मात्रा किसी सिद्धान्त पर तय न होकर तात्कालिक परिस्थितियॉं पर निर्भर करती है। धनंजय की फांसी का विरोध करने वालों ने क्या कभी बलात्कार और जघन्य हत्या के किसी मामले में अपराधी को पकड़वाने और सजा दिलवाने में पुलिस की सहायता की है? क्या उनके पास ऐसे जघन्य अपराध न हो ऐसा भय अपराधियों में पैदा करने की कोई योजना है ? यदि हो तो मैं उन्हें बुद्धिजीवी मान सकता हूॅं। अक्कू यादव प्रकरण में महिलाओं का पक्ष लेने वाले यह बताने की कृपा करें कि यदि इस मामले में अक्कू यादव को महिलाएॅं न मारती बल्कि वह पुलिस हिरासत में मारा जाता तो ये लोग पुलिस का समर्थन करते या विरोध ? यदि अक्कू यादव को नियमानुसार मुकदमा चलाकर न्यायालय परिसर में दिन दहाड़े जल्लाद द्वारा फासी दी जाती तो उसका समर्थन होता या विरोध ? दागी राजनेताआें के प्रकरण में मैं सिर्फ यही जानना चाहता हॅू कि अनेक गंभीर अपराधिक पृष्टभूमि वाले नेताओं के विरूद्ध लम्बित गिरफ्तारी के विषय में हमारे बुद्धिजीवियों ने क्या कुछ सक्रियता दिखाइ्र्र। दस बीस हत्याओं के अपराधी के नेता बनने और मंत्री बनने के विरूद्ध हमारे बुद्धिजीवियों ने क्या किया ? क्या हमारे बुद्धिजीवियों को जानकारी नहीं थी कि ये मंत्री फरार रहे हैं। क्या ऐसे अपराधियों के मामलों में कानून की सहायता करना बुद्धिजीवियों का कर्तव्य नहीं था ? भारत के बुद्धिजीवियों को ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना चाहिये।
मैं तो इस मत का हूॅ कि यदि वर्तमान दण्ड की मात्रा पर्याप्त भय पैदा नहीं कर पा रही है तो अल्प काल के इसे उस सीमा तक अमानवीय बनाया जाये जब तक वह भय पैदा करने में सक्षम न हो। यदि आवश्यक हो तो खुली फांसी भी शुरू की जा सकती है। फांसी का भी एक नया विकल्प हो सकता है कि फांसी की सजा की प्रतीक्षारत कोई व्यक्ति अपनी दोनो आंख दान देकर तथा अंधा रहकर जीवित रहने की मांग करे तो न्यायालय उसे तब तक जमानत पर छोड़ सके जब तक न्यायालय संतुष्ट हो। यह प्रावधान भी बहुत कारगार हो सकता है।
इस तरह हम गैर कानूनी कार्यों को अपराध की श्रेणी से हटाकर न्यायिक प्रक्रिया में कुछ संशोधन करके, न्यायालयों को विशेष स्थिति में गुप्तचर सेवा के उपयोग की अनुमति देकर, तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उचित मार्ग दर्शन देकर तीन माह में ही अपराधों पर रोकथाम सफल कर सकते हैं। अपराध नियंत्रण कोई्र लाइलाज बीमारी नहीं है। आवश्यकता यह है कि हम कम बल प्रयोग करने की अपेक्षा संतुलित तथा आवश्यक बल प्रयोग अवश्य करें।
इस संबंध में हमें कुछ सामाजिक सोच में भी बदलाव लाना चाहिये। अब तक सम्पूर्ण भारत में यह सोच काम करती है कि जब तक किसी व्यक्ति के विरूद्ध अपराधी होने का पर्याप्त आधार न हो तब तक वह मानवीय सहायता का पात्र है। हम उसकी निरपराध मानकर सहायता करें। मेरे विचार में यह सोच बिल्कुल बदलने योग्य है। अब हम ऐसा फेर बदल कर सकते हैं कि जब तक किसी के शरीफ होने का पर्याप्त आधार न हो तब तक हमें किसी को निरपराध मानकर उसकी सहायता नहीं करनी चाहिये। यदि किसी अपराधी का भूलवश भी आप सहायता करते हैं तो आपका कार्य दोषपूर्ण तो है, भले ही आपने जानबूझकर न किया हो। लापरवाही पूर्वक किया गया आपका कार्य सामाजिक अपराध है ऐसा आपको समझना चाहिये, तब अपराध रोकना आसान होगा। यह कार्य बहुत कठिन नहीं क्योंकि मैं अपने जीवन में लम्बे समय से इस नीति पर चल रहा हूॅं। मुझे पुरा विश्वास है कि समाज और शासन के सामंजस्य से यह काम सफल किया जा सकता है।
साराशः-यदि न्याय और कानून के बीच एक चुनना मजबूरी हो तो न्याय प्राथमिकता है कानून नहीं। यदि किसी क्षेत्र में आम लोग गवाही देने से डरने लगें तो उस क्षेत्र में आपात काल घोषित करके गुप्तचर न्याय प्रणाली लागू कर देनी चाहिये।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 08.09.2019 द्वितीय सत्र के दोपहर बाद में होगी। ’’अपराध व अपराध नियंत्रण ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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