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ज्ञानोत्सव 2019–बजरंग मुनि
दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-19 "भारत विभाजन भूल या मजबूरी" ........................................................................ ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन क...
ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि
दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार ............................................................. 1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर ज...
मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि
धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्त...
मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि
दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्ल...
मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इका...
मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि
ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है...
मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्व...
मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि
आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्...
मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि
आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यव...
मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...

ज्ञानोत्सव 2019–बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 22, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय
क्रमांक-19 “भारत विभाजन भूल या मजबूरी”
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ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन को आसानी से समझने मे मदद करेंगेः-
1. प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते हैं, आपस में टकराते है और अंत में विभाजन होता है।
2. किसी भी प्रकार की सत्ता हमेशा वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष का प्रयत्न करती है। वर्ग संघर्ष सत्ता के सशक्तिकरण का मुख्य आधार होता है। इसे ही ’डिवाइड एंड रूल अर्थात बॉटो और राज करो’ की नीति कहते है।
3. साम्यवाद तो खुलकर वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने व स्थापित करने का प्रयत्न करता है, समाजवाद अप्रत्यक्ष रूप से तथा पूंजीवाद आंशिक रूप से।
4. लोकतंत्र में संगठन वर्ग संघर्ष का आधार होता है और वर्ग संघर्ष ही समाज विभाजन की स्थितियां पैदा करता है।
5. मुसलमान चाहे जिस देश में रहे, स्वाभाविक रूप से वह संगठन भी बनायेगा और वर्ग विद्वेष बढ़ाकर विभाजन भी करायेगा। वर्ग विभाजन उसका लक्ष्य होता है मजबूरी नहीं क्योंकि उनकी धार्मिक व सांगठनिक मान्यताएं ही ऐसी है कि उनके अलावा सभी काफिर है।
6. हिन्दू कभी संगठन नहीं बनाता, और यदि अन्य लोग संगठित हैं तब भी वर्ग समन्वय का प्रयत्न करता है।
7. गांधी का मानना था कि हम अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू करें जिसमें हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न होकर प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो। या यदि मजबूरी ही हो तो वर्ग समन्वय होना चहिये, वर्ग संघर्ष नहीं।
8. गांधी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट्र, संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत और मुस्लिम लीग के लिये दारूल इस्लाम भारत।
9. एकमात्र गांधी को छोड़कर, देश के लगभग सभी प्रभावी राजनेता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतने लालायित थे कि उसके लिये वे देश के विभाजन की कीमत पर भी तैयार थे।
10. विभाजन की नींव हिन्दू मुस्लिम वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत में जिन्ना के द्वारा प्रारम्भ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बड़ा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये।
11. गांधी अकेन्द्रित शासन के पक्षधर थे तो संघ एकात्मक शासन का पक्षधर। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा।
12. यह ’वर्ग’ का चरित्र होता है कि वह कभी नहीं चाहता कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जब तक वह कमजोर होता है तब तक तो न्याय की बात करता है और जैसे ही मजबूत होता है तो व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिय तानाशाही की आवश्यकता की बात करने लगता है।
13. यदि आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक राष्ट्र के रूप में मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा।
14. पाकिस्तान और बांग्लादेश मुसलमानों को दे देने के बाद भी भारत में मुस्लिम समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।
15. भारत में इस्लामिक साम्प्रदायिकता बढ़ती चली गई, फिर भी, प्रत्यक्ष रूप से इसका मुख्य कारण तो संगठित मुस्लिम तथा संघ परिवार और हिन्दू महासभा की साम्प्रदायिक राजनीति में ही खोजा जाना चाहिये।
16. भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विस्तार के मुख्य दोषी पंडित नेहरू रहे।
17. गांधी हत्या के बाद हिन्दू साम्प्रदायिकता को कठोरता से कुचल देना चाहिये था किन्तु नेहरू ने ऐसा करने की अपेक्षा मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करके बैलेन्स बनाने की कोशिश की।
18.विभाजनकारी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, इस्लामिक विस्तारवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद की किसी भी संभावित त्रासदी से बचने के लिये शीघ्र अतिशीघ्र पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिये।

गौरवमय प्राचीनतम सभ्यता व संस्कृति की धरोहर सहेजे भारत विश्व का आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से सदा सिरमौर रहा है। सम्पन्नता एवं वैभव की दृष्टि से सोने की चिड़िया के नाम से प्रख्यात भारत ज्ञान-विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में विश्व गुरू के रूप में पूजनीय व आदरणीय रहा। आज भी सिन्धु घाटी सभ्यता व ऋग्वैदिक सभ्यता दुनियां के किसी भी प्राचीन व समकालीन सभ्यता-संस्कृति में अग्रगण्य है। अतीत के नालन्दा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय में दुनियां भर से खोजी विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते रहे हैं। प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली के सफल प्रयोग का सुफल प्रमाण देने वाला वैशाली का गणराज्य आधुनिक शासन प्रणाली हेतु एक उत्कृष्ट उदाहरण है। विज्ञान, कला, साहित्य व चिकित्सा, निर्माणकला, शल्य क्रिया, खगोल विद्या, अर्थशास्त्र, दर्शन एवं धर्मशास्त्र इत्यादि शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें समूचे विश्व को भारत का योगदान न रहा हो।

आर्थिक व्यापार के क्षेत्र मे तो भारतीय मसाले, रेशम, वस्त्र व लौह उत्पाद में भारत का कोई जोड़ ही नहीं था। समूचे विश्व में भारत पहला ऐसा देश था जिसके यहॉ क्रय-विक्रय और व्यापार-व्यवहार में विनिमय हेतु स्वर्ण मुद्राओं का चलन था। सब प्रकार के प्राकृतिक संसाधन से भरपूर, जीवन निर्वाह के लिये श्रेष्ठ-पोषक जलवायु व मनोवांछित सर्वथा अनुकूल परिस्थितियों वाले धन-धान्य से परिपूर्ण, भारत की सम्पन्नता व वैभव समूचे विश्व के लिये आकर्षण का कारण बना तथा आक्रान्ताओं व लुटेरों के लिये उनकी महत्वकांक्षा व लालच की पूर्ति का केन्द्र बना। अनेक विदेशी आयेः कुछ प्रचुर धन सम्पदा लूटकर वापस चले गये तथा कुछ स्थाई रूप से यहीं बस गये।शक, हूण, कुषाण, मंगोल आदि अनेक आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया व देश को लूटने में लगे रहे। यहॉ तक कि विश्व विजेता सिकन्दर भी भारत को जीतने का सपना पाले भारत आया और युद्ध में राजा पौरस को परास्त किया। अपने समक्ष मृत्यु दंड के लिये बन्दी बनाकर लाये गये राजा पौरस की बेखौफ हाजिरजबावी से प्रसन्न होकर उसने उसे माफ कर दिया। भारत की आध्यत्मिकता, ज्ञान व सरलहृदयता से वह अत्यन्त प्रभावित हुआ। अन्त में वह यहॉ से रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाकर कृतज्ञ भाव से वापस लौट गया। यहॉ आकर के स्थायी रूप से बस जाने वाले मुगल, तुर्क, पठान, तुगलक खिलजी आदि वंश वाले मुसलमान शासकों ने अपने सामर्थ्य व प्रभाव के अनुरूप यहॉ वर्षों तक शासन किया। कुछ सौ सालों बाद यूरोप निवासियों, डच, पुर्त्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेज भी भारत की राजनैतिक व्यवस्था की कमजोरी का लाभ उठाकर यहॉ पांव जमाने में सफल रहे लेकिन आखिर में अंग्रेजों की धूर्तता के सामने किसी की न चली और उनका एकछत्र राज्य लगभग पूरे भारत में हो गया। ’डिवाइड एंड रूल अर्थात बॉटो और राज करो’ की उनकी नीति इतनी घातक रही कि आजादी पाने के बाद भी हम भारत की सामाजिक व सांस्कृतिक एकता फिर से नहीं पा सके हैं। फलस्वरूप आज भारतीय समाज खण्ड खण्ड में बंटा हुआ है। आजादी के संघर्ष के दौरान ही अंग्रजों ने विभाजन का ऐसा विष बीज बो दिया कि बिना विखण्डित हुये भारत को आजादी ही न मिले। अन्ततः वही हुआ जिसका डर था। गांधी के अथक प्रयास के परिणाम स्वरूप भारत को आजादी तो मिली लेकिन अखण्ड भारत को नहीं बल्कि, टुकडों में बँटे भारत को हजारों लाशों के ढेर पर मिली। इस विभाजन का दंश हम आज भी झेल रहे है।

स्वतंत्रता के पूर्व धर्म के आधार पर राजनैतिक संगठन की शुरूआत मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने की थी। किसने किसकी प्रतिक्रिया में क्या कहा, क्या लिखा और क्या किया, यह एक अलग विषय है और इसपर चर्चा विषय से विषयांतर होना होगा, लेकिन दोनो तरफ से ही क्रिया प्रतिक्रिया लगभग साथ साथ हुई। इसी दौरान एक तीसरी शक्ति के रूप में गांधी का उदय हुआ। हिन्दू महासभा की यह मान्यता थी कि भारत हिन्दू राष्ट्र होना चाहिये। मुसलमान इसके विरोधी थे और पुनः मुस्लिम शासित मुस्लिम राष्ट्र का सपना देख रहे थे। उनका मानना था कि भारत की सत्ता मुसलमानों से अंग्रेजो ने छीनी है इसलिये मुसलमानों का उसपर पहला अधिकार है। हिन्दू महासभा का भी यह मानना था कि हिन्दुओं से मुसलमानों और मुसलमानों से अंग्रेजों ने सत्ता छीनी इसलिये भारत की सत्ता पर मूल रूप से हिन्दुओं का अधिकार है। इन दोनों से इतर मार्ग संघ ने अपनाया और माना कि अंग्रेजों की तुलना में मुसलमान अधिक घातक है इसलिये सारा विरोध मुसलमानों के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिये। गांधी का मानना था कि हम पहले अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो जाये और शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो जिसमें हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न करके या तो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो या यदि मजबूरी हो तो वर्ग समन्वय हो, वर्ग संघर्ष नहीं। इस प्रकार उपरोक्त चारों समूहों ने किसी अन्य के साथ कोई समझौता नहीं किया और चारों अलग अलग तरीके से सक्रिय रहे। आर्य समाज कभी संगठन नहीं रहा, बल्कि संस्था के रूप में रहा। यही कारण था कि आर्य समाज ने मुसलमानों को छोडकर शेष तीनों के साथ मिलकर स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया तथा स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने अपने को सत्ता संघर्ष से अलग कर लिया।

स्वतंत्रता संघर्ष में संघ लगभग निर्लिप्त रहा, इसलिये उसने अपने आप को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर लिया। लेकिन सतर्कतापूर्वक संघ ने सत्ता संघर्ष में अपनी संलिप्तता इस प्रकार रखी कि मुसलमान किसी भी रूप में कमजोर रहे। मतलब सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे। गांधी के लिये स्वतंत्रता प्राप्ति पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट्र, संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत और मुस्लिम लीग के लिये दारूल इस्लाम भारत। इसी बीच अम्बेडकर के रूप में एक पांचवे समूह का उदय हुआ और उसने आदिवासी हरिजन को मिलाकर एक नया वर्ग बनाया और अलग सत्ता की मांग शुरू कर दी। विभाजन रोकने के लिये गांधी अम्बेडकर की उस मांग से ऐसा समझौता करने को मजबूर हुये जो आजतक भारत की अखण्डता की कीमत चुका रहा है। गांधी चाहते थे कि जिन्ना और पटेल के बीच कोई समझौता हो जाये किन्तु दोनों अपनी-अपनी जिद पर अडे़ थे। एक तरफ तो जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ भी मानने को तैयार नहीं थे, वहीं दूसरी तरफ पटेल मुसलमानों को अलग वर्ग के रूप में भी मानने को तैयार नहीं थे। पटेल किसी भी रूप में मुसलमानों को किसी तरह का महत्व देना ही नहीं चाहते थे, भले ही विभाजन क्यों न स्वीकार करना पडे़। एकमात्र गांधी को छोड़कर, देश के लगभग सभी प्रभावी राजनेता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतने लालायित थे कि उसके लिये वे देश के विभाजन की कीमत पर भी तैयार थे। राजनैतिक स्वरूप के जितने भी लोग स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल थे, उनमे से कोई भी ऐसा नहीं निकला जिसने विभाजन का विरोध करने में गांधी का खुलकर साथ दिया हो। अंग्रेजों की भी रूचि विभाजन में थी। हिन्दू, मुस्लिम, आदिवासी संघर्ष समाप्त न हों इसलिये वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पीठ थपथपाते थे। अंत में सत्तालोलुप नेहरू, पटेल, अम्बेडकर तथा अन्य सबने मिलकर विभाजन स्वीकार कर लिया। स्पष्ट है कि विभाजन की नींव वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत में मुसलमानों के द्वारा प्रारम्भ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बड़ा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये। इसी तरह विभाजन का एकमात्र विरोधी सिर्फ गांधी को ही माना जाना चाहिये क्योंकि वो किसी भी रूप में विभाजन के विरोधी थे। यदि बीच के पटेल नेहरू और अम्बेडकर की बात करें तो इन सबकी विभाजन के प्रति पूरी सक्रियता रही। कांग्रेस पार्टी में सरदार पटेल का बहुमत था और नेहरू को पता था कि गांधीजी नेहरू को ही प्रधानमंत्री स्वीकार करेंगे। नेहरू, पटेल और अम्बेडकर जो आगे चलकर स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सत्ता के सपने देख रहे थे, इन तीनों ने मिलकर अन्य सबकी सहमति ले ली जिसके कारण गांधी भी विभाजन के लिये मजबूर हो गये।

राजनैतिक सत्ता बहुत चालाक होती है। वह षड़यंत्र तो स्वयं करती है और दोषारोपण दूसरे पर करती है। वह अपने चाटुकारों को प्रचार माध्यमों में लगाकर बेगुनाह को गुनाहगार प्रमाणित कर देती है। संघ स्वतंत्रता के पूर्व भले ही निर्लिप्त रहा हो किन्तु राजनैतिक सत्ता से उसकी दूरी कभी रही नहीं। स्वतंत्रता के बाद विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान अलग हुआ। अब संघ को दोहरी चिन्ता सता रही थी। जहॉ एक तरफ उसे भारतीय सत्ता पर पकड़ की चिंता थी वही दूसरी तरफ उसे विभाजन के प्रमुख दोषी पटेल को निष्कलंक-निर्दोष साबित करके अपनी छवि भी बचानी थी, क्योंकि अब तक संघ स्वयं को राष्ट्र की एकता अखंडता का झंडाबरदार/पुरोधा/प्रतीक कहता मानता आया था। पटेल को बचाने हेतु किसी को तो विभाजन का दोषी बताकर बलि का बकरा बनाना ही था। संघ के संगठित वर्ग निर्माण व हिन्दू राष्ट्र निर्माण के संकल्प-प्रयासों में गांधी जी बाधक साबित हो रहे थे और संघ गांधी से छुटकारा पाना ही चाहता था। गांधी की सभी नीतियां संघ की मान्यताओं से अलग थी। गांधी अकेन्द्रित शासन के पक्षधर थे तो संघ एकात्मक शासन का पक्षधर। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा। यह ’वर्ग’ का चरित्र होता है कि वह कभी नहीं चाहेगा कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जबतक वह कमजोर होता है तबतक तो न्याय की बात करता है और जैसे ही मजबूत होता है तो व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिय तानाशाही की आवश्यकता की बात करता है। गांधी यह बात बखूबी समझते थे और संघ को भी इसका पूरी तरह आभास था। संघ जानता था कि गांधी का विरोध करने के लिये गांधी की छवि को धूमिल-ध्वस्त किया जाना अत्यधिक आवश्यक था, क्योंकि गांधी के रहते संघ का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता था। अतः संघ ने एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया और उसने जानबूझकर गांधी को टार्गेट किया। तब संघ ने गांधी के जीवित रहने से लेकर मृत्युपर्यन्त बेगुनाह गांधी को विभाजन का दोषी प्रमाणित करने में अपनी सारी ताकत लगा दी और विभाजन के प्रमुख दोषी सरदार पटेल को साफ बचा लिया। कांग्रेस पार्टी सत्ता लोलुप थी। नेहरू स्वयं गांधी की छवि का लाभ तो उठाना चाहते थे, किन्तु गांधी की विचारधारा से उनका जीवन भर विरोध रहा। इसलिये कांग्रेस पार्टी ने संघ के इस गांधी विरोधी प्रचार से अपने को किनारे कर लिया। गांधीवादी धीरे-धीरे साम्यवादियों के चंगुल में फॅस गये इसलिये वे संघ का तो विरोध करते रहे किन्तु गांधी विचारों का समर्थन नहीं कर सके। विभाजन में गांधी की भूमिका ’विभाजन विरोधी’ की थी, यह बात स्पष्ट करने वाला कोई नहीं बचा था, इसलिये ’गांधी सर्वेसर्वा थे वे चाहते तो विभाजन रोक सकते थे’ की धारणा जनमानस में प्रचारित करके देश के विभाजन का सारा दोष इस निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया गया।
यदि आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक राष्ट्र के रूप में मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा। भारत के मुसलमान इससे पूरी तरह सहमत हो जायेगे। आज तक अखण्ड भारत का राग अलाप रहे संघ के लोग अब एक भारत कभी नहीं चाहेंगे क्योंकि वर्तमान में सोलह प्रतिशत की मुस्लिम आबादी ही यदि इतनी बड़ी समस्या के रूप में बनी हुई है तो पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुस्लिम आबादी एक साथ भारत में मिल जाने के बाद तो यह आबादी लगभग पच्चीस प्रतिशत हो जायेगी और तब शक्ति संतुलन और बिगड़ सकता है। इसलिये अखण्ड भारत का नारा संघ परिवार का नाटक मात्र है और कुछ नहीं।
पाकिस्तान और बांग्लादेश मुसलमानों को दे देने के बाद भी भारत में मुस्लिम समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। इस समस्या को बढ़ाने का काम उस विचारधारा ने भी किया जो यह मानती थी कि गांधी हत्या के बाद देश में गृहयुद्ध हो जायेगा और वे भारत को हिन्दू राष्ट्र बना लेंगे। ऐसे लोगों के सपने चूर करने के राजनैतिक प्रयत्नों में इस्लामिक साम्प्रदायिकता बढ़ती चली गई, फिर भी, प्रत्यक्ष रूप से इसका मुख्य कारण तो संगठित इस्लाम तथा संघ परिवार और हिन्दू महासभा की साम्प्रदायिक राजनीति में ही खोजा जाना चाहिये।

मेरे विचार से तो विभाजन का असली दोषी कौन है इसकी खोज बन्द कर देनी चाहिये, और यह खोज भी तभी बन्द हो सकती है जब इसके वास्तविक दोषी को सामने खड़ा कर दिया जाये जिससे विभाजन विरोधी गांधी पर आक्रमण अपने आप बंद हो जाये और यह अखण्ड चर्चा ही पूरी तरह समाप्त हो जाये। विभाजन पूर्व जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। दूसरा पक्ष थी कांग्रेस। कोई तीसरा पक्ष था ही नहीं। कांग्रेस पार्टी में सरदार पटेल का पूर्ण बहुमत था। स्पष्ट है कि सरदार पटेल इस भूमिका में सबसे मजबूत किरदार थे जो विभाजन रोक सकते थे। गांधी की तो कोई अधिकृत भूमिका रही ही नहीं। नेहरू, पटेल ने विभाजन स्वीकार करने के बाद गांधी को सूचना दी। सारे विभाजन की घटनाक्रम में, विभाजन के विरूद्ध गांधी की तो ’विभाजन-विरोधी’ भूमिका का पता चलता है किन्तु पटेल का ऐसा कोई पता नहीं चलता कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी में कहीं खुलकर विभाजन का विरोध किया हो। अब हम वर्तमान स्थिति की समीक्षा करे। स्पष्ट है कि भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विस्तार के मुख्य दोषी पंडित नेहरू रहे। गांधी हत्या के बाद हिन्दू साम्प्रदायिकता को कठोरता से कुचल देना चाहिये था किन्तु नेहरू ने ऐसा करने की अपेक्षा मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करके बैलेन्स बनाने की कोशिश की। साम्यवाद से बहुत प्रभावित होने के कारण, नेहरू ’फूट डालो राज करो’ पर भी ज्यादा विश्वास करते थे। इसलिये नेहरू ने अल्पसंख्यक तुष्टीकरण को हथियार के रूप में स्वीकार किया और संघ को भी नेहरू की नीति में ही अपनी राजनैतिक शक्ति विस्तार की अधिक संभावना दिखी।
राजनेताओं की राजनैतिक तिकड़म का ही परिणाम है कि आज भारत एक नये विभाजन की दिशा में बढ़ रहा है। आसाम, बंगाल अशान्त होते जा रहे हैं। हिन्दू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है। मृतप्रायः साम्यवाद अब भी सांसे ले रहा है व अपनी चालें चल रहा है। आदिवासी हरिजनों को तीसरी शक्ति के रूप में इकठ्ठा करने के लिये नया अम्बेडकर बनने की दौड़ जारी है। कोई गांधी दिख नहीं रहा जो इन सत्ता लोलुप तत्वों पर नियंत्रण करने की कोशिश करे क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान ऐसा नियंत्रण करने वाले गांधी का अन्तिम परिणाम सबकी नजर में है। ठीक स्वतंत्रता पूर्व की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। राजनैतिक दल दो विपरीत समूहों में बंटकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने मे लगे हैं। एक भयप्रद आशंका मन में बनी हुयी है कि शायद देश के नये विभाजन की प्रारंभिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। फिर भी स्वतंत्रता पूर्व की देश विभाजन सरीखी स्थितियां होते हुये भी कुछ परिस्थितियां भिन्न भी है। उस समय भारत के राजनैतिक वातावरण में महत्वपूर्ण कारक अंग्रेज सत्ता थी। जो इसमें अलग चाल चलती थी। आज वह स्थिति नहीं है। उस समय दुनियां में इस्लाम इतना संदेह के घेरे में नहीं था जितना आज है। अब इस्लामिक संगठन प्राथमिक स्तर पर ही संदेहास्पद हो गये हैं। उस समय गांधी पर हिन्दुओं का अटूट विश्वास होने से हिन्दू बहुमत उस तरह इकठ्ठा नहीं हुआ जिस तरह मुसलमान। अब हिन्दुओं को कुछ अलग तरह का महसूस हो रहा है और वह पहले की तुलना में अधिक ध्रुवीकृत हो रहा है। उस समय साम्यवाद एक उभरती हुई शक्ति था और वह कोई न कोई तिकड़म करता रहता था। अब साम्यवाद अस्तांचल गामी है और उसकी साफ-साफ पोल खुल गई है कि वह अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के एक पोषक से भिन्न कुछ नहीं। इस तरह के भिन्न राष्ट्रीय और वैश्विक वातावरण में विभाजन का दॉव अल्पसंख्यकों के लिये उल्टा भी पड़ सकता है इसकी ज्यादा संभावना है। फिर भी इस खतरे को किसी दुर्घटना व दुष्परिणाम के पूर्व ही दूर कर देना चाहिये।

इसके लिये भारत सरकार को पहल करनी चाहिये। जिसके दो तरीके संभव हैं 1. पूरे भारत में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाये जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण निरूत्साहित हो 2. कश्मीर के विशेषाधिकार समाप्त कर दिये जायें।
इस प्रकार के प्रयत्न अल्पसंख्यकों को कोई एक दिशा चुनने के लिये मजबूर कर देंगे। मुठ्ठी भर साम्प्रदायिक अल्पसंख्यक तथा उनके सहयोगी अलग-थलग पड़ सकते हैं तथा कट्टरपंथी हिन्दुओं की साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की भी हवा निकल जायेगी। इस तरह विभाजन का खतरा सदा के लिये टल सकता है। हम प्रयत्न ही कर सकते हैं किन्तु भविष्य क्या होगा यह कहना संभव नही।

साराशः किसी भी प्रकार का विभाजन बहुत कष्टकारक होता है। वर्ग निर्माण विभाजन के लिये बीज का काम करता है। विभाजन की किसी भी संभावित त्रासदी से बचने के लिये शीघ्र अतिशीघ्र पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिये।
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इस विषय पर अभी हम फेसबुक, व्हाट्सअप के माध्यम से चर्चा कर रहे है साथ ही इस विषय पर विस्तृत चर्चा ज्ञानोत्सव 2019 के कार्यक्रम में दिनाॅक 09.09.2019 प्रथम सत्र सुबह में होगी। ’’भारत विभाजन भूल या मजबूरी ’’ विषय पर मुनि जी के विचार आपके सामने है। यदि आप भी इस विषय पर अपने विचार लिखकर भेजेंगे तो चर्चा के पूर्व सभी सहयोगियों को आपके विचार की प्रति उपलब्ध करा दी जायेगी। कार्यक्रम में समय सीमित है इसलिये आप पूर्व में विचार दे दें तो सुविधा रहेगी इसके साथ ही आपके द्वारा भेजे गये विचारो को हम फेसबुक, व्हाट्सअप पर अन्य साथियों के साथ भी साझा करेगें।

ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 14, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार
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1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो वही दूसरी तरफ सभी शरीफ समाज के साथ इकठठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति आदि को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषा बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को विशेष सुरक्षा दी जा रही है और न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतों के बीच टकराव बढाया जा रहा है।

2. राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निमार्ण, वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिग, गरीब-अमीर, किसान-मजदूर, शहरी-ग्रामीण आदि के नाम पर राज्य योजनाबद्ध तरीके से समाज में अलग-अलग संगठन बनाकर उनमें वर्ग विद्वेष का कार्य कर रहा है।

3. शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोजगार के अवसर के रूप में बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है।

4. प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को अधिक सम्मान प्राप्त था। मध्यकाल में राज्य शक्ति और धन शक्ति ने ज्ञान और त्याग को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। वर्तमान में भी राज्य शक्ति और धन शक्ति का ही बोलबाला है।

5. धूर्तता और स्वार्थ जैसे अवगुण सम्पूर्ण भारत में एक समान ही बढ़ रहे हैं। यह अलग बात है कि वर्तमान में गांव की अपेक्षा शहरों में यह बीमारी अधिक दिख रही है किन्तु यह भी सच है कि आज से 50-60 वर्ष पूर्व भी यह बीमारी गांव की अपेक्षा शहरों में ही ज्यादा थी।

6. सच्चाई यह है कि जितनी तेज गति से राजनीति चरित्र पतन कर रही है उसकी अपेक्षा चरित्र निर्माण की गति बहुत कम है।
ज्ञान यज्ञ बुद्धि और भावना के योग या सम्मिश्रण का व्यायाम मात्र है।

7. स्वस्थ शरीर के लिये व्यायाम और प्राणयाम विधि बताने वाले तो आपको गली-गली मिल जायेगे किन्तु स्वस्थ चिंतन के लिये मानसिक व्यायाम की आवश्यकता बताने व उसको पूरा करने वाली विधि के रूप में ज्ञान-यज्ञ अब तक ज्ञात एक मात्र उपाय है।

8. ज्ञानहीन सक्रिय लोग ज्ञानवानों से ही मार्गदर्शन प्राप्त करते है। यही हमारी परम्परा रही है। वर्तमान में इसका उल्टा हो रहा है।
9. बुद्धि प्रधान व्यक्ति मौलिक सोच रख सकता है जबकि भावना प्रधान व्यक्ति अनुसरण ही कर सकता है।

11. बुद्धि प्रधान व्यक्ति संचालन करता है चाहे वह समाज का शोषण करे या मुक्ति दिलावे। जबकि भावना प्रधान व्यक्ति संचालित होता है। फिर चाहे ऐसा शोषक द्वारा हो या शोषण मुक्तिदाता द्वारा।

12. बुद्धि प्रधान व्यक्ति सोच समझकर निर्णय करता है भावना प्रधान व्यक्ति सोचने समझने के स्थान पर भावुक होकर निर्णय करता है। भावुक व्यक्ति के निर्णय भावनाओं के अधीन होकर हुआ करते है।

13. हर बुद्धि प्रधान धूर्त प्रयास करता है कि समाज में भावनाओं का विस्तार हो।

व्यक्ति और समाज मूल इकाईयॉ होती है जहॉ व्यक्ति अंतिम इकाई है और समाज सर्वोच्च। व्यक्ति से लेकर समाज तक के बीच, व्यवस्था की अनेक इकाईयॉ होती है जिन्हें क्रमश: परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और राष्ट्र के रूप में माना जाता है। जो व्यक्ति सामाजिक अनुशासन को स्वीकार नहीं करते उन्हें नियंत्रित करने के लिये समाज एक अलग व्यवस्था बनाता है जिसे हम राज्य कहते है।

यदि हम वर्तमान सामाजिक स्थिति का ऑकलन करें तो दुनियॉ में अनेक प्रकार की समस्याएं निरन्तर बढती हुई दिख रही है। इनमें से पांच प्रमुख हैंः- 1. निरन्तर बढता भौतिक विकास और निरंतर होता नैतिक पतन। 2. लगातार होता शिक्षा का विस्तार और उसी गति से लगातार घटता हुआ ज्ञान। 3. प्रत्येक इकाई में हिंसा के प्रति बढता विश्वास और विचार-मंथन के प्रति घटता विश्वास। 4. भावना और बुद्धि के बीच लगातार बढती जा रही दूरी। 5. सत्ता का अधिकतम केन्द्रीयकरण।

हम विस्तार से चर्चा करें तो यह बात समझ में आती है कि भौतिक विकास के साथ नैतिक पतन का क्या सम्बन्ध है। भौतिक विकास की दृष्टि से, पूरा विश्व उन्नति के शिखर छूने का प्रयास कर रहा है। जीवन में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र बचा हो जहॉ पर भौतिक उन्नति अपनी उपस्थिति न दर्ज करवा रही हो। हर रोज कोई न कोई ऐसा प्रयास अकल्पनीय सफलता प्राप्त कर रहा है जो आज से पचास-सौ वर्ष पूर्व असम्भव सरीखा लगता था। भौतिक सुख सुविधाओं की उपलब्धता हर दिन हर रोज सहज-सुलभ हो रही है। वहीं इसके उलट, आज समाज में नैतिक पतन भी उतनी ही तेजी से हो रहा है। वर्ग विद्वेष, वर्ग निर्माण, वर्ग संघर्ष भी उतनी तेजी के साथ हो रहा है। हर व्यक्ति में स्वार्थ भाव बढता जा रहा है। अधिकतम स्वतंत्रता की भूख उच्श्रृंखलता में बदल रही है और कर्तव्य की प्रेरणा कम हो रही है। शिक्षा के बढने के साथ-साथ दुनियां में ज्ञान भी बढना चाहिये था किन्तु ज्ञान घट रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार ना मानकर रोजगार के अवसर के रूप में बदलने का प्रयास लगातार हो रहा है जिसका परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। आतंकवाद की दिषा में अधिक शिक्षित लोग भी प्रेरित हो रहे है। किसी कार्य को किस तरह किया जाये इस सम्बन्ध में तो प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो रहा है किन्तु कौन सा कार्य करना उचित है और कौन सा अनुचित यह निर्णय करने का विवेक घट रहा है। चाहे व्यक्ति हो अथवा कोई अन्य इकाई किन्तु हिंसा के प्रति उसका विष्वास बढ रहा है। प्रथम आक्रमण को सफलता का सर्वश्रेष्ठ आधार माना जा रहा है। ईश्वरऔर समाज का भय घटता जा रहा है और व्यवस्था ऐसी हिंसा को रोकना अपनी प्राथमिकता नहीं मानती। भावना और बुद्धि भी एक दूसरे के पूरक न होकर विपरीत दिशा में जा रहे है। बुद्धि प्रधान लोग चालाकी की तरफ बढ रहे है जो अन्ततः धूर्तता में बदल जाती है। भावना प्रधान लोग शराफत की दिशा में चले जाते है जो अन्ततः मूर्खता में बदल जाती है। भावना प्रधान लोग त्याग को अधिक महत्व देते है तो बुद्धि प्रधान संग्रह को। भावना प्रधान लोग दान देकर खुष होते है तो बुद्धि प्रधान लोग दान लेकर खुश होते हैं। खुश तो दोनों ही होते है। भावना प्रधान लोग श्रद्धा से ओत प्रोत होते हैं तो बुद्धि प्रधान लोग तर्क को अधिक महत्व देते है। भावना प्रधान लोग धार्मिक संस्थाओं से जुड जाते है तो बुद्धि प्रधान लोग राजनीति से। हर धूर्त यह लगातार प्रयत्न कर रहा है कि उसके अतिरिक्त अन्य सब लोग भावना प्रधान हों, अपना कर्त्तव्य करे और शराफत को महत्वपूर्ण समझे। दुनियां में बुद्धि प्रधान लोगो की बढती धूर्तता एक बडे संकट का रूप ले रही है। राजैनतिक शक्ति भी धीरे-धीरे कुछ व्यक्तियों के पास इकठठी होती जा रही है। दुनियां के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग यदि आप में टकरा जाये तो दुनियां के सात अरब लोग भी मिलकर इन दोनो को न रोक सकते है और ना ही अपनी सुरक्षा की अलग व्यवस्था कर सकते है। राजनैतिक शक्ति का इस तरह बेलगाम होना सम्पूर्ण समाज के लिये बहुत ही खतरनाक है किन्तु सत्ता का यह केन्द्रीयकरण बढता ही जा रहा है। दुनियां की प्रमुख समस्याओं से तो भारत प्रभावित है ही किन्तु अनेक अन्य समस्याएं भी भारत को अस्थिर कर रही हैं। इनमें ये पांच प्रमुख है-
1. वर्ग समन्वय का कमजोर होकर वर्ग विद्वेष वर्ग व वर्ग संघर्ष की दिशा में बढना।
2. संसदीय लोकतंत्र का संसदीय तानाशाही में बदलना।
वैचारिक धरातल पर भारत की नकल करने की मजबूरी।
3. परिवार व्यवस्था तथा समाज व्यवस्था का लगातार कमजोर होना।
4. धर्म, राजनीति और समाज सेवा का व्यवसायीकरण।

5. भारत में लगातार वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष तथा वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारत का हर बुद्धिजीवी वर्ग निर्माण में जाने-अनजाने सक्रिय दिखता है। वर्ग विद्वेष बढाने के लिये वर्तमान भारत में मुख्य रूप से आठ आधारों पर सक्रियता दिखती है-
1. धर्म 2. जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रीयता 5. उम्र 6. लिंग 7. गरीब अमीर 8. किसान मजदूर।

1. भारत का हर राजनैतिक दल सभी आठ आधारों पर वर्ग विद्वेष में सक्रिय रहता है किन्तु साम्यवादी एकमात्र ऐसे राजनीतिज्ञ होते हैं जो खुलकर वर्ग संघर्ष के पक्ष में खडे होते हैं जबकि अन्य दल छिपकर ऐसी कोशिश करते है। वर्ग समन्वय शब्द तो किसी राजनैतिक दल के एजेन्डे में है ही नहीं। अब तो अनेक धार्मिक- सामाजिक संगठन भी वर्ग विद्वेष के प्रयत्नों में सक्रिय हो गये है।

2. लोकतंत्र तथा तानाशाही में स्पष्ट अन्तर होता है। तानाशाही में तंत्र नियंत्रित संविधान होता है तो लोकतंत्र में संविधान नियंत्रित तंत्र। लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है जिसे गांधी हत्या के बाद लोक नियुक्त तंत्र के रूप में बदल दिया गया। संविधान में संशोधन के असीम अधिकार तंत्र के पास होने से भारत में संसदीय लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाषही है जिसे लोक को धोखा देने के उद्देश्य से लोकतंत्र कह दिया जाता है। आज राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुड़ रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठा हो रहे है। राज्य, सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषा बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतों के बीच टकराव बढाया जा रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज के शरीफ लोग अपनी सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियों की मदद लेने को मजबूर हो गये है। प्रति पांच वर्ष में वोट के माध्यम से हम ऐसी संसदीय गुलामी पर मुहर लगाकर अपनी सहमति व्यक्त करते है। परिणाम स्वरूप् यह संसदीय गुलामी निरन्तर बढती ही जा रही है।

3. बहुत प्राचीन काल में भारत विचारों का निर्यात करता था और विष्व गुरू कहा जाता था। पाणिनी सरीखे विश्व प्रसिद्ध विचारकों के मामले में भारत बहुत समृद्ध था। पिछले एक दो हजार वर्षो से भारत की वर्ण व्यवस्था विकृत हुई और धीरे धीरे भारत वैचारिक धरातल पर इतना कंगाल हुआ कि वह आज हर मामले में विदेशो की नकल करने को मजबूर हो गया। लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने भारत को और अधिक विदेशी विचारों पर आश्रित कर दिया। जे. कृष्णमूर्ति के बाद हम वैसा भी विचारक नहीं ला सके। वैचारिक धरातल पर तो भारत पिछडा ही किन्तु सामाजिक चिन्तन में भी भारत पिछडने लगा। गांधी की मृत्यु के बाद आंशिक रूप् से जय प्रकाश तथा उनके बाद हमें अन्ना हजारे तक ही संतोष करना पडा है। आगे तो भविष्य और भी अंधकार मय दिख रहा है। आखिर यह विचार का विषय है कि भारत में हमारी माताएं उच्चस्तर के वैज्ञानिक, पूंजीपति राजनेता अथवा कलाकारों को जन्म देने में सक्षम हैं तो हम विचारक या समाजिक चिन्तन के मामले में इतना पीछे क्यों है?

4. वैसे तो भारत में अंग्रेजों के समय से ही परिवार व्यवस्था तथा समाज व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशे शुरू हो गई थी किन्तु स्वतंत्रता के बाद तो राज्य सुनियोजित तरीके से परिवार और समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने में सक्रिय हो गया। समाज व्यवस्था की प्राथमिक इकाई परिवार तथा गांव को संवैधानिक मान्यता से बाहर कर दिया गया तो समाज तोडक धर्म और जाति को संवैधानिक मान्यता दे दी गई। परिवार के पारिवारिक मामलों में भी कानूनी हस्तक्षेप बढता गया तो समाज के सामाजिक बहिष्कार जैसे अधिकार भी छीन लिये गये। न्याय और सुरक्षा राज्य का दायित्व होता है किन्तु राज्य सुरक्षा और न्याय की तुलना में तम्बाकू और दहेज रोकने लगा।

5. भारत में स्वार्थ का महत्व निरन्तर बढ रहा है। व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक में स्वार्थ बढा है। ज्ञान और त्याग की तुलना में राजनैतिक पद और धन का प्रभाव बढा है। अच्छे-अच्छे धर्मगुरू भी धन और सत्ता के लिये लालायित दिखते है। राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गई है। मीडिया और शिक्षण संस्थाएॅ तो व्यावसायिक हैं ही किन्तु अब तो एनजीओ के नाम पर समाज सेवा तक का व्यवसायीकरण हो गया है। समाज सेवा का बोर्ड लगाकर उस नाम से अपनी राजनैतिक आर्थिक स्थिति मजबूत करने वालों की बाढ़ सी आ गई है।

भारत देश से लेकर हमारी परिवार व्यवस्था तक इन दस विकृतियों से प्रभावित हुई है। इन विकृतियों को दुष्परिणाम भी स्पष्ट दिख रहे हैं। नैतिक पतन के परिणाम स्वरूप समाज में ईश्वर और समाज का भय कम हो रहा है। कानूनों की मात्रा लगातार बढ रही है और उसी अनुपात में भ्रष्टाचार भी बढ रहा है। नैतिक पतन बढने के कारण राज्य पर निर्भरता और राज्य का हस्तक्षेप बढ रहा है। समाज अप्रत्यक्ष रूप से अस्तित्व खो रहा है। भौतिक उन्नति को ही सुख का एक मात्र आधार समझ लिया गया है। ज्ञान घटने के कारण व्यक्ति की नीर क्षीर विवेक की शक्ति घटी। अन्धानुकरण के कारण धूर्त लोग ब्रेनवाश में सफल होते जा रहे हैं। विचार और मंथन की जगह प्रचार अधिक प्रभावोत्पादक हो रहा है। शिक्षा को ही ज्ञान का पर्याय माना जाने लगा है। हिंसा पर विश्वास बढ रहा है। मानव स्वभाव ताप और स्वार्थ वृद्धि सम्पूर्ण मानवता के लिये एक बडे खतरे के रूप में प्रकट हो रही है। पर्यावरणीय ताप वृद्धि का तो समाधान खोजा जा रहा है किन्तु मानव स्वभाव में आ रहे निरन्तर बदलाव पर कहीं कोई खोज नहीं हो रही जबकि यह बदलाव कई गुना अधिक खतरनाक है। शास्त्रार्थ की जगह शस्त्रार्थ का प्रभाव बढ रहा है। विपरीत विचारों के लोग एक साथ बैठकर किसी समाधान पर चर्चा करने से भी डरने लगे हैं क्योंकि रूआ न सूत जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा का डर बढता जा रहा है। शराफत पर विश्वास घट रहा है क्योंकि शरीफ लोग पग पग पर धूर्तो द्वारा ठगे जा रहे हैं। कर्तव्य भाव घटकर अधिकार भाव मजबूत हो रहा है। राजनैतिक शक्ति के केन्द्रीयकरण के भी दुष्परिणाम दिख रहे हैं। दुनियां दो गुटों में धु्वीकृत हो रही है जिसमें एक तरफ तो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले है तो दूसरी तरह इस्लाम साम्यवाद और तानाशाही को अपनाने वाले है। इन दोनों गुटों में येन केन प्रकारेण आगे बढने की होड मची है। आज तक पूरी दुनियां का कोई ’एक विश्व-संविधान’ तक नहीं बना जो इन दोनों गुटों को अपनी सीमाएॅ बता सके। ये गुट ही आपस में जब चाहें तब अपनी नैतिकता की सीमाएं बना लेते हैं और जब चाहे तब तोड देते हैं। राष्ट्रहित को समाज हित से उपर माना जाने लगा है क्योंकि ये गुट समाज का कोई अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते। दोनो ही गुट अपनी आर्थिक तथा सामाजिक शक्ति का विस्तार करने में सक्रिय हैं तथा दोनो गुटों की कार्य प्रणाली में निर्णायक भूमिका के बटन का अन्तिम अधिकार राजनेताओं तक संकुचित हो गया है। अब उसमें विचारकों या सामाजिक चिन्तकों की भूमिका लगभग शून्य है।

भारत भी इन विश्वव्यापी समस्याओं से स्पष्टतः प्रभावित है। राजनैतिक दल सिर्फ भौतिक उन्नति की भूख पैदा करके उसके समाधान की चिन्ता कर रहे हैं। भारत में भी शिक्षा को ज्ञान की कीमत पर महत्व दिया जा रहा हे। राजनैतिक दल हिंसा को प्रोत्साहित करने में सक्रिय है। अधिकारों के लिये संघर्ष की प्रवृत्ति भी बढ रही है। पूरे भारत में मजबूत और केन्द्रित सत्ता को ही अव्यवस्था का एकमात्र समाधान मान लिया गया है। इनके अतिरिक्त भी भारत में कुछ विशेष परिणाम दिख रहे हैं। वर्ग संघर्ष बढाने के परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिकता, जातीय टकराव, महिला-पुरूष के बीच अविष्वास, गरीब-अमीर के बीच टकराव शहर-गांव के बीच असंतुलन आदि लक्षण बढ रहे हैं। संविधान तंत्र का गुलाम होने के कारण, तंत्र के ही दो सहभागी न्यायपालिका और विधायिका आपस में सर्वोच्चता की लडाई लड़ रहे है क्योंकि संविधान संशोधन का अन्तिम अधिकार जिसके पास होगा वही सर्वोच्च माना जायेगा। संसद को विचार मंथन का केन्द्र मानना चाहिये किन्तु संसद धीरे धीरे अपराधियों के अखाडे के रूप में बदलती जा रही है। अब तो न्यायपालिका भी संसदीय प्रणाली की नकल करती दिख रही है। भारत हर मामले में विदेशो की नकल कर रहा है। भारतीय संविधान पूरी तरह विदेशी संविधानों की नकल है। हमारी हालत यह है कि हम विदेशो की असत्य या अधकचरी परिभाषाओं को ही आधार बनाकर अपना समाधान खोजने के लिये प्रयत्नषील हैं। हम आज तक नहीं सोच सके कि मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अपराध, गैरकानूनी, अनैतिक, असामाजिक, समाज विरोधी, मौलिक अधिकार, संविधान और कानून, कर्तव्य और दायित्व आदि शब्दों की वर्तमान परिभाषा क्या है और क्या होनी चाहिये । हम आंख मूंदकर नकल करने की मजबूरी के कारण विचार और साहित्य का भी अन्तर नहीं समझ सके। हमने भी राष्ट्र को समाज से उपर मान लिया। हमने धर्म और सम्प्रदाय का भी अन्तर नहीं समझा क्योंकि हमने भी वैष्विक परिभाषाओं को आंख मूंदकर सही माना। मैंने ऐसी असत्य या अर्धसत्य परिभाषाओं की सूची बनाई तो वह सैकड़ों तक है। इसी तरह हम यह भी भूल गये कि देष काल परिस्थिति अनुसार परम्पराएं संशोधित भी होनी चाहिये। हम परंपराओं से इस तरह चिपके कि संशोधन के अभाव में विदेशी गलत परंपराएं हमारे बीच घुसपैठ करने में सफल हुई। हम परिवार व्यवस्था को भी ठीक से परिभाषित नहीं कर पा रहे है। हम या तो अपनी पारंपरिक परिभाषा से ही चिपके हैं या विदेशी नकल से प्रभावित सरकारी परिभाषा से ही संचालित होने के लिये मजबूर हैं। हमारी परिवार व्यवस्था सहजीवन की ट्रेनिंग की पहली पाठशाला है किन्तु परिवार व्यवस्था ही कमजोर हो रही है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में धर्म समाज और राज्य का समन्वय महत्वपूर्ण है किन्तु इनका व्यावसायीकरण घातक स्वरूप में आ गया है। पेशेवर लोग राज्य सत्ता द्वारा सम्मानित और प्रोत्साहित किये जाते हैं। प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। किन्तु वर्तमान समय में ज्ञान और त्याग इस सम्मान प्रतियोगिता से बाहर हो गये हैं। अब तो राजनैतिक सत्ता और धन सत्ता के बीच ही सम्मान शक्ति और सुविधा के एकत्रीकरण की प्रतिस्पर्धा चल रही है। अब तो इस प्रतिस्पर्धा में गुण्डा शक्ति भी शामिल हो गई है। जो जितना बड़ा गुण्डा; सम्मान, शक्ति और धन एकत्रीकरण में वह उतना ही ज्यादा सफल।

उपरोक्त सारी वैश्विक एवं राष्ट्रीय समस्याओं की तुलना में यदि हम आप अपनी भूमिका का ऑकलन करें तो हमारी स्थिति शून्यवत है। हमारी भूमिका एक बाल्टी से समुद्र सुखाने का सपना देखने वालों के समान है किन्तु निराशा किसी समस्या का समाधान नहीं है इसलिये समाधान तो खोजना ही होगा। हम ऐसी खराब स्थिति के कारणों पर विचार करें तो इसका सबसे प्रमुख कारण दिखता है- भारत में विचार मंथन का अभाव। प्राचीन समय में समाज का एक वर्ग वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत चयनित होकर बचपन से ही विचार मंथन करके निष्कर्ष निकालता था और शेष समाज उन निष्कर्षो के आधार पर सक्रिय होता था। योग्यता के ऑकलन की अपेक्षा, जन्म अनुसार वर्ण व्यवस्था के प्रचलन ने चिंतन का महत्व कम किया। मौलिक सोच की जगह पुरानी सोच को अन्तिम मानने से रूढिवाद आया। नई सोच के अभाव में राजनेता ही विचारक के रूप में समाज का मार्गदर्शन करने लगे। राजनेता भी पश्चिम के अधकचरे विचार समाज को देने लगे और अव्यवस्था शुरू हो गई। इस अव्यवस्था के घाव पर मक्खी के समान मड़राते हुये साम्यवादियों ने लाभ उठाया और हमारी परिवार व्यवस्था व समाज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश की। प्राचीन समय के विचारक समस्याओं के समाधान पर चिन्तन मनन करते थे तो हमारे साम्यवादी विचारक ऐसी समस्याओं से लाभ उठाने तक ही चिन्तन मनन करते रहे। अब ऐसे साम्यवादियों से तो मुक्ति मिल गई है किन्तु नये सिरे से विचार मंथन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। यदि हम फिर से उसी पुरानी रूढिवादी परंपराओं की नकल करने लगेगें तो कोई लाभ नहीं होगा। लाभ तो तब होगा जब नये तरीके से विचार मंथन की प्रक्रिया आगे बढे़।

जब भंयकर आग लगी हो तब तात्कालिक परिस्थितियों का ऑकलन करके तय होता है कि हम अपने सीमित संसाधन से आग बुझाने को प्राथमिक माने या अपना घर बचाने को। वर्तमान परिस्थितियां पूरी तरह समस्याओं के विस्तार करने वाली हैं और समाधान के प्रयत्न निराश करने वाले। राजनैतिक व्यवस्था इन परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिये निरन्तर आग में घी डालने का काम कर रही हैं। ऐसे वातावरण में हम जैसे विचारकों का दायित्व है कि हम समाज का ठीक-ठीक मार्ग दर्षन करें। दो अलग-अलग दिशाओं से काम शुरू होना चाहिये 1. राज्य कमजोरीकरण। 2. समाज सशक्तिकरण। राज्य कमजोरीकरण के प्रयास के रूप में पहले भारतीय संविधान को तंत्र की गुलामी से मुक्ति के लिये समाज में इच्छा शक्ति जागृत करना होगा। इस जनजागरण में एक टीम निरन्तर सक्रिय है किन्तु इसके साथ समाज सशक्तिकरण के लिये भी जन-जागृति करनी होगी। समाज व्यवस्था एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें अनेक विपरीत क्षमताओं के लोग रहते हैं। अलग-अलग व्यक्तियों की क्षमताओं के अनुसार अलग-अलग समूह बनना चाहिये। हम समाज को चार समूहों में विभक्त कर सकते हैं 1. मार्गदर्शक 2. रक्षक 3. पालक 4. सेवक। सब लोग अपनी-अपनी क्षमता का ऑकलन करके एक मार्ग चुनें। इस तरह समाज सशक्तिकरण की शुरूआत हो सकती है।

मेरी उम्र क्षमता और स्वास्थ के आधार पर मैं मार्गदर्शक तक सीमित हॅू। मुझे भगवान कृष्ण का कथन प्रभावित करता है कि जब समाज के समक्ष विशेष संकट काल हो तब हमें ज्ञान यज्ञ के माध्यम से समाधान का मार्ग तलाशना चाहिये। उस समय ज्ञान-यज्ञ पद्धति क्या थी यह मुझे नहीं पता किन्तु हम सबने महसूस किया कि भावना और बुद्धि अथवा शरीफ और चालाक के अलग-अलग समूह न बनकर यदि प्रत्येक व्यक्ति में दोनो का संतुलन हो तो समझदारी विकसित हो सकती है और समझदारी का बढ़ना एक अच्छा समाधान हो सकता है। समझदारी के लिये श्रद्धा और तर्क का एक साथ समन्वय होना चाहिये। उदाहरण स्वरूप, ’एक छोटे धार्मिक अनुष्ठान के साथ एक बडे़ स्वतंत्र विचार-मंथन का समन्वय’। यह प्रणाली मैंने आर्य समाज से सीखी, यद्यपि आर्य समाज में भी अब स्वतंत्र विचार-मंथन करीब-करीब बन्द हो रहा है। ज्ञान-यज्ञ का प्रयोग हम सबने एक छोटे शहर में लगातार चौसठ वर्ष तक किया और अब भी जारी है। इस प्रणाली में पहले आधे घंटे का यज्ञ अथवा कोई अन्य धार्मिक आयोजन करके उसके तत्काल बाद दो या ढाई घंटे का एक स्वतंत्र विचार मंथन होता है। विपरीत या भिन्न विचारों के लोग एक साथ बैठकर किसी पूर्व घोषित विषय पर स्वतंत्र विचार प्रस्तुत करते हैं। साथ में प्रश्नोत्तर भी होता है किन्तु वहां न कोई निष्कर्ष निकाला जाता है न प्रस्ताव पारित होता है न कोई योजना बनती है। प्रत्येक व्यक्ति भिन्न निष्कर्ष निकालने हेतु स्वतंत्र है। अन्त में ज्ञान यज्ञ प्रार्थना होती है ’’हे प्रभो, आप मुझे शक्ति दो कि मैं दूसरों को अपनी इच्छा अनुसार संचालित करने की इच्छा अथवा दूसरों की इच्छानुसार संचालित होने की मजबूरी से दूर रह सकूॅ। यदि ऐसा न हो तो सबको सहमत कर सकूॅ और फिर भी ऐसा न हो तो, ऐसी इच्छाओं का अहिंसक प्रतिरोध करूं।’’ उसके बाद प्रसाद वितरण तथा अगले कार्यक्रम का विषय घोषित करके यज्ञ समाप्त होता है। हमारे जीवन के चौसठ वर्ष के इस प्रयोग का बहुत लाभ दिखा। इस सफलता से आश्वस्त हमारे साथियों ने इसे देशव्यापी विस्तार देने की योजना पर कार्य करना शुरू किया है। माना गया कि हम समस्याओं के समाधान पर कार्य न करके समस्याओं के कारणों पर विचार-मंथन करे। आज स्थिति यह है कि अच्छे-अच्छे विद्वान यह नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक में क्या अंतर है। समाज, राष्ट्र और धर्म में कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान में क्या अंतर है, अपराध, गैरकानूनी और अनैतिक में क्या अन्तर है, कार्यपालिका और विधायिका में क्या अंतर है आदि आदि। आखिर हम वर्ग विद्वेष में सक्रिय समूहों का विरोध न करके सामाजिक एकता की एक ओर बड़ी लकीर खीचने का प्रयास क्यो न करें? अर्थात हम जाति, धर्म, भाषा आदि के नाम पर बने संगठित समूहों का विरोध न करके एक संयुक्त समूह की ओर बढने का प्रयास करे जैसा कि उपरोक्त चौसठ वर्षो के प्रयोग में हुआ है।

अब मैं आचार्य पंकज तथा कुछ अन्य विद्वानों के साथ ऋषिकेश में रहता हूॅ। महसूस किया गया कि ज्ञान यज्ञ को क्रांतिकारी रूप से प्रभावी और परिणाम उत्पादक बनाने के लिये कुछ अन्य चीजों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। देखा गया कि ज्ञान यज्ञ में शामिल व्यक्ति को तो लाभ होता है तथा इस प्रणाली से विचार मंथन आगे भी बढ़ता है। किन्तु जो लोग व्यस्तता या अरूचि के कारण शामिल नहीं हो पाते उनके लिये ज्ञान यज्ञ परिवार अपनी तरफ से कुछ पहल करे, ऐसा भी महसूस किया गया। यदि परिवारों के बीच आपस में संवाद प्रक्रिया विकसित हो तो कुछ बदलाव संभव है। इस संबंध में सोचा गया है कि धीरे-धीरे हर परिवार को ज्ञान यज्ञ प्रार्थना का सरल मार्ग दिया जावे। जो लोग ज्ञान यज्ञ का आयोजन नहीं कर पाते वे अपने परिवार में किसी सर्व सुलभ स्थान पर ज्ञान यज्ञ प्रार्थना को लिखकर या चिपकाकर रखें। विश्वास करें कि इस प्रार्थना से आपको अवश्य लाभ होगा। यदि कभी कहीं ज्ञान यज्ञ आयोजित हो तो उसमें शामिल होने से आपकी समझदारी और विकसित हो सकती है।

ज्ञान यज्ञ परिवार ने भारत में निरन्तर जारी असत्य प्रचार को तार्किक चुनौती देने के उद्देश्य से ऋषिकेश में बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान भी शुरू किया है जिसके निदेशक सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य पंकज जी है। यह संस्थान मेरे द्वारा निकाले गये अनेक निष्कर्षो के साथ साथ कुछ अन्य विद्वानों के समसामयिक निष्कर्षो पर भी व्यापक शोध कार्य आयोजित तथा प्रोत्साहित करेगा। यह शोध कार्य भी प्रारंभ हो गया है। हमारे जो साथी वर्तमान राजनैतिक व संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव हेतु सक्रिय होगे उन्हें भी ज्ञान यज्ञ परिवार सब प्रकार की सहायता करता है।

हम इस पूरे कार्यक्रम को एक जन जागरण के रूप में बढ़ा रहे है। हम चाहते हैं कि पूरे देश के अधिक से अधिक परिवारों में इस प्रार्थना का समावेश हो। लिखित प्रार्थना को आप घर में कहीं चिपका कर रखें और हमें सूचित करें तो हम आपको अपना साधारण सदस्य मान लेंगे। जो लोग कुछ अधिक करना चाहते हैं वे कम से कम वर्ष में एक बार किसी स्थान पर ज्ञान यज्ञ आयोजित करें। ऐसी घोषणा करने वालों को हम सक्रिय सदस्य मानेंगे। ऐसे वार्षिक कार्यक्रम में मैं या कोई अन्य विद्वान भी सूचना मिलने पर शामिल हो सकते है। जो साथी एक से अधिक स्थानों पर अपने परिचितों को न्यूनतम वर्ष में एक बार ज्ञान यज्ञ आयोजन हेतु प्रेरित करेगे उन्हें हम विशेष सदस्य के रूप में स्वीकार करेंगे। हम चाहते हैं कि आप अपने सारे कार्य पूर्ववत करते हुये कुछ खाली समय इस दिशा में लगाये तो संभव है कि इस विश्वव्यापी संकट से निकलने का कोई मार्ग निकल सके। यदि हम परिवार में कभी सामूहिक प्रार्थना तथा आपसी संवाद की स्थिति बनायेगे तो लाभ अवश्य होगा। यदि आप भिन्न विचारों के लोगों को एक साथ बिठाकर स्वतंत्र विचार मंथन हेतु अवसर देंगे तो इसका पूरा लाभ समाज के साथ साथ आपको भी होगा।

ऋषिकेश कार्यालय में प्रत्येक रविवार को शाम छः से साढ़े आठ तक साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ होता है। महिने में एक बार रविवार को विशेष ज्ञान यज्ञ भी शुरू हो रहा है। इसका सारा संचालन ज्ञान यज्ञ परिवार प्रमुख अभ्युदय द्विवेदी जी करते है। सोलह दिनों का विशेष वार्षिक ज्ञान यज्ञ ऋषिकेश में 31 अगस्त से 15 सितम्बर तक आयोजित है। इसमें प्रतिदिन यज्ञ, प्रार्थना, कुछ विद्वानों के प्रवचन के साथ साथ प्रतिदिन 11 घंटे का विचार मंथन भी होगा जो प्रतिदिन पांच-पांच घंटे का दो विषयों पर होगा। आप सभी लोग आमंत्रित हैं तथा अपनी अपनी रूचि और समय के अनुसार विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित हो सकते है। इस सोलह दिवसीय ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था ऋषिकेश की संचालन समिति करेगी और पूरे आयोजन में यदि कोई विशेष आवश्यकता होगी तो अन्तिम निर्णय मेरा होगा।

सारांश: विश्व की सभी समस्याओं के समाधान की पहली सीढ़ी है प्रत्येक में समझदारी और ज्ञान का विस्तार। ज्ञान यज्ञ ऐसे विस्तार का एक माध्यम है।

मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि

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धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्तियों का मार्गदर्शन करता है और राज्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी लेता है। इस तरह राज्य का एकमात्र दायित्व होता है प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा। दायित्व और कर्तव्य बिल्कुल अलग-अलग होते है। दायित्व हमेशा बाध्यकारी होता है और कर्तव्य स्वैच्छिक। दायित्व उसे उपर की इकाई द्वारा सौंपा जाता है और राज्य उस उपर की इकाई के लिये उत्तरदायी होता है। कर्तव्य करना या न करना उसके उपर निर्भर होता है। राज्य चाहे तो कर्तव्य कर सकता है और न चाहे तो नहीं भी कर सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम भी होती है और समान भी। किसी भी व्यक्ति की किसी भी स्वतंत्रता की न कोई सीमा बनाई जा सकती है और न ही कोई बाधा पैदा की जा सकती है। राज्य भी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नहीं बना सकता। जिस तरह व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता प्राप्त है उसी तरह उसे स्वनिर्मित परिवार रूपीसंगठन के अनुशासन में रहना उसकी मजबूरी भी है। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी व्यक्ति जिस पारिवारिक संगठन का सदस्य है, उस संगठन में रहते हुये वह पूरी तरह परतंत्र है। यह असीम स्वतंत्रता और शून्य स्वतंत्रता का तालमेल ही सहजीवन माना जाता है।
राज्य के दायित्व क्या है और उसकी सीमाएं क्या है इसको स्पष्ट करने के लिये समाज एक संविधान बना देता है जिसे मानना राज्य की मजबूरी मानी जाती है। राज्य के तीन प्रमुख न्यायपालिका, विधायिका, और कार्यपालिका मिलकर भी किसी भी परिस्थिति में संविधान द्वारा निर्मित सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते क्योंकि संविधान समाज द्वारा निर्मित होता है और राज्य उसके अनुसार चलने वाली इकाई होती है। यह अलग बात है कि वर्तमान समय में राज्य के इन तीनों अंगों ने मिलकर संविधान पर अपना कब्जा जमा लिया है। स्वतंत्रता के समय भारत गुलाम था और उस समय संविधान निर्माताओं की कुछ मजबूरियाॅ रही हांेगी कि उन्होंने संविधान निर्माण में विदेशो की नकल मात्र की। वैसे भी लम्बे समय से भारत वैचारिक धरातल पर कमजोर होता गया और हर मामले मे नकल करने के लिये मजबूर हुआ। यह नकल करने की मजबूरी आज तक बनी हुई है। यही कारण है कि हम भारत के लोग अबतक संविधान को भी तन्त्र की गुलामी से मुक्त नहीं करा सके तथा अपने उस मजबूरी में बने संविधान में एक भी संशोधन नहीं करा सके। यह नकल करने का ही परिणाम हुआ कि हम दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अन्तर भी राज्य को नहीं बता सके।

दायित्व बाध्यकारी होता है और कर्तव्य स्वैच्छिक। कोई भी इकाई जब दायित्व और कर्तव्य का अन्तर नहीं समझती है तब वह दायित्व की जगह स्वैच्छिक कर्तव्यों को अधिक प्राथमिकता देती है क्योंकि उन कर्तव्यों से उसे लोकप्रियता भी अधिक मिलती है ओर उन्हें करना आसान ही होता है। राज्य का प्रमुख दायित्व होता है सुरक्षा ओर न्याय। पश्चिम के देशो ने सुरक्षा और न्याय के साथ साथ जनकल्याणकारी कार्य को भी अपने दायित्व में शामिल कर लिया तो भारत ने अपनी भारतीय परिस्थितियों का आँकलन किये बिना जनकल्याणकारी कार्यो को संविधान के दायित्वों में शामिल कर लिया और परिणाम हुआ कि भारत की राज्य व्यवस्था सुरक्षा और न्याय के स्थान पर जनकल्याणकारी कार्यो को अधिक प्राथमिकता देने लगी। यदि हम भारत की प्रमुख ग्यारह समस्याओं का आँकलन करें तो उनमें पांच 1. चोरी, डकैती, लूट 2. बलात्कार 3. मिलावट, कमतौल 4. जालसाजी, धोखाधडी 5. हिंसा, बल प्रयोग व आतंक ये सुरक्षा और न्याय से जुडे हुये है। अन्य छः समस्याये 1. भ्रष्टाचार 2. चरित्र पतन 3. साम्प्रदायिकता 4. जातीय कटुता 5. आर्थिक असमानता 6. श्रम शोषण ये समस्याये सामाजिक समस्याये है। सच्चाई ये है कि पांच वास्तविक समस्याये समाज में इसलिये बढ रही है क्योंकि राज्य इन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं देता। शेष छः समस्याये इसलिये बढ रही है कि इनमें राज्य दखल देता है। यदि राज्य छः समस्याओं के समाधान से स्वयं को अलग कर ले तो ये छः समस्याये अपने आप समाप्त भी हो जायेगी और राज्य को सुरक्षा और न्याय के लिये पर्याप्त शक्ति और साधन भी प्राप्त हो जायेगे। जो राज्य बलात्कार नहीं रोक पा रहा है वह वेश्यावृत्ति, बारबालाओं पर प्रतिबंध लगाने का नाटक करता है। जो राज्य आतंकवाद नहीं रोक पा रहा है, वही राज्य ब्लैक और तस्करी रोकने का प्रयत्न करता है। परिवार के पारिवारिक मामलों में राज्य को किसी भी रूप में दखल नहीं देना चाहिये। किन्तु राज्य हमेषा ही दखल देता है। जनकल्याण के सभी कार्य राज्य के लिये स्वैच्छिक कर्तव्य तक सीमित होते हैं। उनसे समाज की सुरक्षा करना धर्म का दायित्व है किन्तु राज्य इनमें अनावश्यक हस्तक्षेप करता है तथा हमारे निकम्मे धर्मगुरू भी, जो स्वयं प्रभावहीन हो चुके हैं, वे निरन्तर राज्य की चापलूसी में यह मांग करते है कि राज्य शराब जुआ, रोके या राज्य ही महिला उत्पीडन रोकेे। यहाॅ तक कि किसी भी प्रकार का शोषण रोकना या तो धर्म का काम है या समाज का। शोषण सिर्फ अनैतिक होता है अमानवीय तथा असामाजिक होता है, कोई अपराध नहीं होता न ही किसी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। निकम्मे धर्म गुरू अथवा नासमझ समाजशास्त्री सरकार से मांग करते हैं कि सरकार शोषण रोके और सरकार ऐसे निवेदन को स्वीकार कर लेती हैं। कोई व्यक्ति भूख से मर रहा है तो उसकी भूख दूर करना समाज का दायित्व है राज्य का नहीं। राज्य अनावश्यक रूप से अपने जरूरी कार्यों को छोडकर भूख दूर करने को अपना दायित्व मान लेता है। इसके दुष्परिणाम समाज को भोगने पडने है। जब सारा काम राज्य अपने उपर ले लेता है तो समाज पर भी उसका कुछ दुष्प्रभाव पडता है अर्थात समाज राज्य का मुखापेक्षी बन जाता है।

पुलिस और न्यायालय ओवर लोडेड बन गये है। गंभीर आपराधिक मुकदमें भी मृत्यु तक नहीं निपटते। न्यायालय और पुलिस राज्य की गलत प्राथमिकताओं के कारण ओवर लोडेड हैं। न्यायपालिका भी जनहित को परिभाषित और क्रियान्वित करने लगी है। न्यायपालिक भी अपनी न्यायिक प्रतिबद्धताओं से दूर हटकर जनकल्याण के नाम पर विधायी और कार्यपालिका आदेश पारित करने लगी है। राज्य की सभी इकाइयां अपने को ओवर लोडेड मानती है। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि राज्य अपनी वर्तमान शक्ति का आँकलन करके उसके अनुसार प्राथमिकता के स्तर पर कुछ कार्यो तक स्वयं को सीमित कर ले और अन्य कार्य समाज पर छोड दे। सम्भवतः राज्य के दायित्व भी पूरे हो जायेगे और अन्य कार्यो को करने में समाज या धर्म भी सक्रिय हो सकता है। यह कैसे उचित माना जा सकता है कि आप जितना वजन नहीं उठा सकते उतना वजन उठाने की मूर्खता करें और न उठाने का बहाना बनावें। ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। दुनियां में क्या हो रहा है, उससे सीख लेना तो उचित हो सकता है किन्तु बिना अपनी परिस्थितियों का आँकलन किये उनकी नकल करना बहुत ही घातक होता है जैसा वर्तमान भारत में हो रहा है।

मैं नहीं कह सकता कि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था ऐसी भूल जानबूझकर कर रही है अथवा अज्ञानतावश। किन्तु भूल तो हो रही है और उसके दुष्परिणाम से पूरा भारत प्रभावित हो रहा है। हमें चाहिये कि हम दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्यों का अन्तर समझे। हम राज्य समाज और धर्म का भी अन्तर समझे। हम अपने दायित्व और कर्तव्य छोडकर राज्य के उपर पूरी तरह निर्भर न हो जाये। समस्यायें प्राकृतिक नहीं है बल्कि हमारी और राज्य के बीच नासमझी के परिणाम हैं और हम यदि इन्हें ठीक से समझना शुरू कर देंगे तो हम दुनियां को एक नया मार्गदर्शन देने में सफल हो सकेेंगे।

मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि

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दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्लाम 3. साम्यवाद। कुछ बातें तीनों में समान हैं। तीनों किसी न किसी तरह किसी भी रूप में राजनैतिक सत्ता के साथ जुडने का प्रयास करते हैं। तीनों में से किसी का संस्थागत चरित्र नहीं रहा हैं यद्यपि संघ और इस्लाम अपने विचार के उददेश्य से कुछ संस्थागत गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। तीनों ही मजबूतों से सुरक्षा और न्याय का नाटक करते हैं, साथ ही तीनों कमजोरों का शोषण भी करते हैं। तीनों में से कोई भी समाज को सर्वोच्च नहीं मानता। साम्यवाद राज्य सत्ता को सर्वोच्च मानता है और इस्लाम धर्म को। संघ धर्म और राष्ट्र दोनो को समाज से उपर मानता है। तीनों का चरित्र ओर कार्यप्रणाली रक्षक अर्थात क्षत्रिय प्रवृत्ति की है। तीनों ही हिंसा पर विश्वास करते है और अपनी तुलना शेर से करने में गर्व महसूस करते हैं।

तीनों में अनेक समानताएं होते हुये भी कुछ विरोधाभाष है। हिंसक गतिविधियों में इस्लाम और साम्यवाद आमतौर पर पहल करते हैं और संघ परिवार प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा में सक्रिय होता हैं। मुसलमान बचपन से ही क्षत्रिय प्रवृत्ति का होता है और हिन्दू बचपन से अहिंसक प्रवृत्ति का होता है। किसी मुसलमान को सूफी या अन्य अहिंसक गतिविधियों के साथ जुडने में स्वयं को बदलना पडता है और हिन्दू को संघ के साथ जुडने में अपनी मूल प्रवृत्ति बदलनी पडती है। यही कारण है कि संघ को अपने साथ हिन्दुओं को जोडने में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पडता है। साम्यवादियों की बचपन से कोई अलग प्रवृत्ति नहीं होती है क्योंकि हिन्दू मुसलमान तो बचपन से होते हैं, लेकिन साम्यवादी बाद में बनते हैं। संघ इस्लाम को सबसे अधिक घातक मानता है। लेकिन इस्लाम संघ को शत्रु नहीं मानता क्योंकि इस्लाम विस्तारवादी होता है और संघ सुरक्षात्मक। संघ और इस्लाम सांस्कृतिक धरातल के संगठन हैं तो साम्यवाद वैचारिक धरातल का। साम्यवाद की एक स्वतंत्र विचारधारा और कार्य प्रणाली है। संघ और इस्लाम में भावना प्रधान लोग अधिक होते हैं, विचार प्रधान कम। साम्यवाद में कोई भावना प्रधान तो होता ही नहीं है, जो कोई भी छोटे से छोटा साम्यवादी होगा तो वह बुद्धिप्रधान ही होगा। संघ और इस्लाम में धार्मिक भावनाओं को छोडकर अन्य सभी मामलों में शराफत की भावना होती है। साम्यवादी सिर्फ चालाक ही होता है। उसमें शराफत का भाव नहीं होता। संघ और इस्लाम धार्मिक मामलों को छोडकर अन्य सभी मामलों में वर्ग संघर्ष से दूर रखते है। साम्यवाद वर्ग संघर्ष को ही आधार बनाकर अपना विस्तार करता है। साम्यवाद हमेशा श्रम शोषण के नये नये तरीके खोजता रहता है। जबकि संघ और इस्लाम का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता। पूरी दुनियां में श्रमजीवियों को धोखा देने में साम्यवाद ही सबसे आगे रहा है। साम्यवादियों में यह विशेषता होती है कि वे अपनी बौद्धिक क्षमता के आधार पर किसी भी अन्य व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित कर लेते है। यहाॅ तक कि साम्यवादी किसी भी अन्य संस्था में घुसकर उसमें निर्णायक जगह प्राप्त कर लेते है, लेकिन संघ और इस्लाम में यह क्षमता नहीं है। वर्तमान समय में दुनियां में साम्यवाद सबसे अधिक खतरनाक विचारधारा है किन्तु संघ या मुसलमान साम्यवाद को उतना अधिक खतरनाक नहीं मानते।

वर्तमान विश्व में साम्यवाद असफल होकर अन्तिम सांसे गिन रहा है। भारत में भी धीरे धीरे यही स्थिति बन रही है। इसलिये साम्यवाद ने इस्लाम के कन्धे पर बन्दूक रखकर अपनी गतिविधियाॅ जारी रखने की कोशिश की है लेकिन धीरे धीरे पूरी दुनियां में इस्लाम भी संदेह के घेरे में आ गया है। मुसलमान चाहे कितना भी अच्छा क्याें न हो, लेकिन पूरी दुनियां उसपर आंशिक रूप से कट्टरता का संदेह करने लगी है। आज मुसलमान भी इस बात को समझ रहा है लेकिन उसे भी अपनी बचपन से प्राप्त प्रवृत्ति में सुधार करना कठिन हो रहा है। इस्लाम किसी भी रूप में धर्म नहीं है। उसमें धर्म का एक भी लक्षण नहीं है। इस्लाम सिर्फ संगठन है किन्तु दुनियां में सफलतापूर्वक मजबूत होते जाने के कारण वह धर्म बन गया।

मैं मानता हूॅ कि भारत में इस्लाम से हिन्दुत्व की सुरक्षा के लिये संघ परिवार ने बहुत अच्छा काम किया है। फिर भी हिन्दुओं का बहुमत आज भी संघ परिवार के पक्ष में नहीं है क्योंकि हिन्दू बचपन से ही समाज को सर्वोच्च मानता है और संघ परिवार संगठन को। हिन्दू बहुमत आज भी महसूस करता है कि कई हजार वर्ष की गुलामी के बाद भी हिन्दूत्व भारत में बचा रह सका तो अपने धार्मिक गुणों के कारण, संगठन के कारण नहीं। हिन्दू यह मानता है कि संघ परिवार इस्लामिक विस्तारवाद के विरूद्ध एक दवा के रूप में तो मान्य है किन्तु यदि हिन्दुत्व के मूल संस्कार में मुसलमानों के सरीखे ही कट्टरता आ गई तो फिर दाढी वाले मुसलमान और चोटी वाले मुसलमान में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। आज भी भारत का आम हिन्दू संघ परिवार की कार्यप्रणाली को पसंद नहीं करता है किन्तु स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षो में जिस तरह मुसलमानों ने वोट बैंक बनकर राजनेताओं से सांठ गाॅठ की और हिन्दूओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा उसके कारण बहुत से हिन्दू न चाहते हुये भी संघ के साथ जुडते चले गये। यदि गम्भीरता से देखा जाये तो भारत के हिन्दुओं ने स्वतंत्रता के बाद भी बहुत एकतरफा पक्षपात झेला है और अपना धैर्य नहीं खोया, लेकिन अब दुनियां की परिस्थिति को देखते हुये भारत का हिन्दू भी अपना धैर्य खो रहा है।

समस्या बहुत कठिन है। यदि हिन्दू भी संगठित हो गये तो भारत गृह युद्ध की चपेट में आ जायेगा। मुसलमान अपने विशेषाधिकार छोडेगा नहीं, अपने संख्या विस्तार की नीति से अलग नहीं होगा तो हिन्दुओं पर इसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। हो सकता है कि हिन्दू कुआँ और खाई में से किसी एक को चुनने के लिये बाध्य हो जाये, लेकिन जो भी होगा वह भले ही मजबूरी हो किन्तु अच्छा नहीं होगा। संघ भी एक संगठन है और किसी भी संगठन का विस्तार समाज के लिये घातक ही होता है। मैं देख रहा हूॅ कि जो संघ मोदी के पूर्व समान नागरिक संहिता और धारा 370 की समाप्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता देता था वहीं संघ अब हिन्दू राष्ट्र का नारा बुलन्द कर रहा है। जिस तरह संगठित इस्लाम ने 70 वर्षों से आज तक राजनीति को ढाल बनाकर हिन्दुओं को दूसरे दर्जे के नागरिक तक सीमित रख दिया गया था उसी तरह अब संघ भी मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की सोचता है। न तो पहले की स्थिति अच्छी थी न भविष्य के कदम अच्छे दिख रहे है।

फिर भी संघ चाहे गलत हो या सही किन्तु वर्तमान स्थितियों में समाधान के लिये भारत के मुसलमानों को ही पहल करनी चाहिये। जिस तरह दुनियां संगठित हो रही है उसमें अब मुसलमानों की जिद्द उनके अस्तित्व के लिये घातक हो सकती है। भारत के मुसलमानों के लिये एक बहुत अच्छा अवसर है कि वे राजनैतिक पहल करें और स्वयं आगे आकर समान नागरिक संहिता तथा काश्मीर में धारा 370 समाप्ति की मांग करें। मैं समझता हूॅ कि यदि मुसलमान समान नागरिक संहिता की मांग करेगा तो संघ परिवार उस मांग का भरपूर विरोध करेगा क्योेंकि संघ परिवार समान आचार संहिता को ही समान नागरिक संहिता समझता है और जब वास्तव में समान नागरिक संहिता आएगी तो संघ परिवार विरोध करेगा ही। धारा 370 यदि समाप्त होती है तो भारत के मुसलमानों का उससे कोई नुकसान नहीं होगा। अब भारत के मुसलमानों को यह विष्वास कर लेना चाहिये कि भविष्य में वे धर्म के आधार पर न तो भारत का कोई नया विभाजन कराने में सफल हो पाएंगे न ही आबादी बढाकर विस्तार कर पाएंगे। चीन ने मुसलमानों के साथ किये जाने वाले व्यवहार में जो पहल की है वह दुनियां के और देषों में न हो, यह बात भारत के मुसलमानों को समझनी चाहिये। हिन्दू अब भी सावधानी पूर्वक धीरे धीरे कदम बढा रहा है। अगला कदम बढाने की जिम्मेदारी मुसलमानों की ही है।

मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि

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व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इकाईयां व्यवस्था की मानी जाती हैं। परिवार व्यवस्था की सबसे पहली इकाई होती है और परिवार ही व्यक्ति को सहजीवन या अनुुुशासन सिखाने की पहली पाठशाला है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये यह आवश्यक होता है कि वह अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल करके चले। दोनों एक दूसरे के विपरीत दिखते हैं, किन्तु तालमेल अनिवार्य भी होता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास उसके स्वतंत्र अधिकार होते हैं और साथ ही उसके कर्तव्य भी बाध्यकारी होते हैं। परिवार और समाज व्यवस्था का ढांचा इतना जटिल और उलझा हुुआ है कि उसे ठीक ठीक बताना कठिन कार्य है। फिर भी उसपर चर्चा तो करनी ही पडती है।

व्यक्ति अपने पूरे जीवन में स्वशासन, अनुशासन, शासन और सहजीवन जैसे शब्दो के मकडजाल में उलझा रहता है। एक तरफ तो उसे मौलिक अधिकार के रूप में असीम स्वतंत्रता प्राप्त होती है, दूसरी और किसी दूसरे के साथ जुडकर परिवार बनाते ही उसकी सारी स्वतंत्रता तब तक शून्य हो जाती है जब तक वह उस परिवार से जुडा रहता है। परिवार से जुडे रहने के बाद किसी भी व्यक्ति को कोई भी संवैधानिक, सामाजिक या मौलिक अधिकार अलग से नहीं होता। उसके सारे अधिकार सामूहिक हो जाते हैं। उसे सिर्फ एक स्वतंत्रता रहती है कि वह जब चाहे परिवार को छोडकर स्वतंत्र हो सकता है और अपने सारे अधिकार पुनः जीवित कर सकता है। लेकिन यह पुनःजीवन भी लगभग क्षणिक ही होता है क्योकि उसके लिये अनिवार्य है कि वह किसी नये परिवार के साथ जुडे। व्यक्ति कभी भी अकेला नहीं रह सकता क्योंकि समाज के साथ जुडकर रहना उसकी मजबूरी है। स्वशासन, अनुशासन और शासन बिल्कुल ही अलग अलग होते हैं। व्यक्ति स्वयं उचित अनुचित का अन्तर करके तथा सोच समझकर अपने हित अहित के निर्णय लेता है तो उसे स्वशासन कहते हैं। व्यक्ति जब अपने परिवार के या समाज के प्रमुख लोगों की इच्छाओं का सम्मान करते हुये अपने कार्य सम्पादित करता है उसे अनुशासन कहते हैं। व्यक्ति अपने किसी अधिकार प्राप्त प्रमुख के भय से अपनी इच्छाओं के विरूद्ध कोई कार्य करता है उसे शासन कहते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और प्रवृत्ति अलग अलग होती है। किसी एक ही परिवार का एक सदस्य बहुत बडा विद्वान निकल सकता है तो दूसरा बिल्कुल विपरीत प्रवृत्ति का भी हो सकता है। कोई सदस्य सामाजिक प्रवृत्ति का भी हो सकता है तो कोई आपराधिक प्रवृत्ति का भी। ये भिन्नताएं इसलिये स्वाभाविक हैं क्योंकि व्यक्ति अपने जन्म पूर्व के संस्कार लेकर आता है और जन्म के बाद पारिवारिक, सामाजिक वातावरण उस जन्मपूर्व के संस्कार से मिलकर नई प्रवृत्ति बनाते हैं। इसलिये सहजीवन और शासन बिल्कुल विपरीत होते हुये भी दोनो को समाज व्यवस्था में एक साथ कार्यान्वित करना पडता है।
परिवार व्यवस्था का स्वरूप ऐसा है कि उसमें कोई एक प्रमुख होता है और उस प्रमुख के द्वारा अन्य सदस्य अनुशासित या शासित होते हैं। आदर्श व्यवस्था में परिवार का मुखिया पूरे परिवार के सामूहिक नियंत्रण में होना चाहिये। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का प्रत्येक सदस्य परिवार के मुखिया से अनुशासित होगा और परिवार का मुखिया परिवार के सभी सदस्यों के सामूहिक निर्णय को मानने के लिये बाध्य होगा। यही व्यवस्था सहजीवन होती है, यद्यपि भारत की वर्तमान परिवार व्यवस्था में यह कमी है कि मुखिया अन्य सदस्यों को नियंत्रित करना चाहता है किन्तु स्वयं परिवार की सामूहिकता से नियंत्रित नहीं होना चाहता। इस तरह धीरे धीरे परिवार में घुटन शुरू होती है जो कालांतर में टूटन के रूप में बदल जाती है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जिस परिवार में जितना अधिक अनुशासन होगा उस परिवार की प्रगति उतनी ही कमजोर होगी क्योंकि संवादहीनता के कारण अन्य सदस्यों का बौद्धिक और सामाजिक विकास कम होता है। दूसरी ओर यदि परिवार में अनुशासन की कमी हो तब भी उच्श्रृंखलता का खतरा बढ जाता है तथा परिवार संकट में आ जाता है। इसलिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार अपने सदस्यों का ठीक ठीक आँकलन करके अनुशासन या स्वतंत्रता का उपयोग करे और दोनों का अधिकतम तालमेल रखे। यह तालमेल ही सहजीवन माना जा सकता है।

सहजीवन की कमी परिवार में सबसे बडा संकट है। सहजीवन की ट्रेनिंग के लिये परिवार के सभी सदस्यों में आपसी तथा बेझिझक संवाद होना चाहिये। सहजीवन की जगह बचपन से ही अनुशासन का पाठ महत्वपूर्ण बन जाने से सहजीवन में कमी आती है। बचपन से ही परिवार के सदस्यों कोे बताया जाना चाहिये कि परिवार के सभी सदस्यों के अधिकार संयुक्त हैं अैर कर्तव्य या दायित्व अलग अलग। परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिये परिवार का निर्णय मानना बाध्यकारी है और यदि उसके किये स्वीकार करना असंभव है तो वह अलग हो सकता है किन्तु परिवार मे रहते हुय परिवार के निर्णय को अस्वीकार नहीं कर सकता। अधिकांश परिवार तो कभी साथ बैठते ही नहीं। अनेक भ्रम चर्चा के अभाव में जीवन भर बने रहते हैं। स्वार्थी तत्व मित्र बनकर ऐसे वातावरण का लाभ उठाते हैं। मेरा मत है कि अनुशासन की तुलना में सहजीवन का प्रशिक्षण सफल परिवार व्यवस्था के लिये अधिक उपयोगी है।

इस सहजीवन को नुकसान पहुॅचाने में भारतीय कानूनों की बहुत बडी भूमिका रहती है। किसी परिवार के साथ जुडते ही व्यक्ति के सारे अधिकार सामूहिक हो जाते है किन्तु वर्तमान कानून परिवार में रहते हुये भी व्यक्ति के सब प्रकार के अधिकार मान्य करके टकराव के बीज बोता है। जब व्यक्ति परिवार का सदस्य है तब उसकी कोई भी सम्पत्ति अथवा आय व्यय व्यक्तिगत कैसे हो सकता है? चाहे उसे संकट आवे अथवा लाभ हो किन्तु होना चाहिये सब सामूहिक ही। इसी तरह जब व्यक्ति सहमति से परिवार के साथ जुडा है तब उसमें संवैधानिक अधिकार भी अलग कैसे हो सकते हैं, लेकिन कानून ये सारे झगडे पैदा करता है। परिवार के पारिवारिक मामलों में कानून को तब तक कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जब तक परिवार सहमति से चल रहा है। ये कानूनी हस्तक्षेप सहजीवन के प्रशिक्षण में सबसे बडी बाधा है।

इस सम्बन्ध मेें हमें दोनों दिशाओं से काम करना चाहिये। हम समाज को यह बात समझाने का प्रयास करें कि परंपरागत परिवार व्यवस्था में आयी कुछ कमजोरियां दूर करके हमें नई व्यवस्था के लिये सोचना चाहिये। दूसरी ओर हमें इस बात के लिये भी जन जागरण करना चाहिये कि राज्य परिवार व्यवस्था के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे। परिवार व्यवस्था विश्व व्यवस्था की सबसे पहली सीढी है और उस सीढी का कमजोर होना बहुत अधिक घातक है।

मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि

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ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है। हवा को भी आंशिक रूप से कृत्रिम ऊर्जा में माना जा सकता है। जैविक ऊर्जा भी दो प्रकार की होती है। 1. मानवीय 2. पशु। इन दोनो में यह अंतर है कि मनुष्य मानव समाज का अंग है और पशु मनुष्य का सहायक। पषुओं को कोई मौलिक अधिकार नहीं होता। जबकि मनुष्यों को होते हैं, इसलिये सारी व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु मनुष्य ही होता है।

मनुष्य भी दो प्रकार के होते हैं 1. श्रमजीवी 2. बुद्धिजीवी। श्रमजीवी मनुष्य अपनी स्वयं की मानवीय ऊर्जा का उपयोग करके अपना भरण पोषण करता है, और बुद्धिजीवी दूसरों की मानवीय ऊर्जा का अपने भरण पोषण में अधिक उपयोग करता है। इस तरह एक व्यक्ति अपना श्रम बेचता है जबकि दूसरा श्रम खरीदकर उसका लाभ उठाता है संपूर्ण सामाजिक तथा राजनैतिक व्यवस्था में श्रम खरीदने वालो का विशेष प्रभाव रहता है इसलिये श्रम खरीदने वाले ऐसे अनेक प्रयत्न करते रहते हैं जिससे मानवीय श्रम की मांग और मूल्य न बढे़।

बहुत प्राचीन समय में श्रम शोषण के उददेश्य से ही बुद्धिजीवियों ने जन्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को अनिवार्य किया और अपनी श्रेष्ठता आरक्षित कर ली। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने श्रम शोषण के लिये कृत्रिम ऊर्जा के अधिक उपयोग को आधार बनाया। नई नई मशीनों का उपयोग बढा और कृत्रिम ऊर्जा को सस्ता रखने के लिये मानव अथवा पशु द्वारा उत्पादित एवं उपभोग की वस्तुओं पर विभिन्न प्रकार के टैक्स लगा दिये गये। इस समस्या को दृष्टिगत रखते हुये अलग अलग समय में महापुरूषों ने अलग अलग प्रयोग किये। स्वामी दयानंद ने जन्मना जाति व्यवस्था को बदलकर कर कर्म आधारित दिशा देने की कोशिश की जिसे स्वतंत्रता के बाद बुद्धिजीवियों ने विफल कर दिया। पश्चिमी देशों में मार्क्स ने एक नया प्रयोग किया जिसके अनुसार मशीनों के प्रयोग से प्राप्त सारा धन आम जनता के बीच वितरित करने की कोशिश हुई। एक अन्य महापुरूष महात्मा गांधी ने प्रयत्न किया कि मशीनों का प्रयोग कम से कम किया जाये और मानवीय श्रम को अधिक से अधिक महत्वपूर्ण बनाया जाये। मार्क्स का सिद्धांत इसलिये असफल हुआ क्योंकि मशीनों से प्राप्त सारा धन आम नागरिको में न बंटकर राष्ट्रीय सम्पत्ति के रूप में संग्रहित हो गया, जिसमे सरकार ही सब कुछ हो गई। गांधी का विचार पूरी तरह छोड दिया गया, क्योंकि बुद्धिजीवियों को यह विचार पसंद नहीं था, साथ ही पूंजीवादी देशों से भारत को आर्थिक आधार पर प्रतियोगिता भी करना आवश्यक था। वैसे भी पूरी दुनियां में पूंजीवाद सर्वमान्य सिद्धांत के रूप में स्थापित हो रहा है इसलिये मार्क्स और गांधी के प्रयत्नों पर कोई विचार उचित नहीं है। पूंजीवाद, श्रम शोषण की असीम स्वतंत्रता का पक्षधर है इसलिये यह संकट पूरी दुनियां के लिये स्थापित है कि मानवीय श्रम को बुद्धिजीवियों और पूंजीपतियों के शोषण से कैसे बचाया जाये। भारत इस समस्या से अधिक प्रभावित है, क्योंकि भारत श्रम बहुल देश है और पश्चिम श्रम अभाव देश। श्रम अभाव देशों में श्रम शोषण की समस्या कोई महत्व नहीं रखती है जबकि भारत में बहुत महत्व रखती है।

हमें निर्यात भी बढाना है और देश का उत्पादन भी बढाना है, इसलिये हम मशीनों का उपयोग कम नहीं कर सकते किन्तु हमें श्रम के साथ न्याय भी करना होगा। इसके लिये हमें पूंजीवाद का अंधानुकरण न करके नई अर्थव्यवस्था बनानी होगी अर्थात कृत्रिम ऊर्जा को इतना अधिक मंहगा कर दिया जाये कि समाज में श्रम की मांग बढे और श्रम का मूल्य भी बढे तथा साथ साथ देश का उत्पादन भी बढे। यदि कृृत्रिम ऊर्जा को मंहगा कर दिया जायेगा तो हमारी बेकार पडी श्रम शक्ति भी उत्पादन में लग सकेगी तथा अनावश्यक उपयोग में खर्च हो रही कृत्रिम ऊर्जा भी उत्पादन में लग सकेगी। इसका एक लाभ यह भी होगा कि गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी के उत्पादन और उपभोग की वस्तुयें कर मुक्त हो सकेंगी। इससे प्राप्त अतिरिक्त धन समाज में समान रूप से वितरित भी किया जा सकता है तथा विदेशों से निर्यात भी प्रभावित नहीं होगा क्योंकि हम निर्यात में आवश्यक छूट दे सकेगे। विदेशों से डीजल, पेट्रोल का आयात कम हो जायेगा और सौर उर्जा का उपयोग बढ जायेगा। पर्यावरण प्रदूषण कम हो जायेगा तथा अन्य अनेक लाभ भी होगें किन्तु सबसे बडा लाभ श्रम के साथ न्याय को माना जाना चाहिये।

मैं जानता हूॅ कि वर्तमान पूंजीवाद ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेगा। आर्थिक असमानता और श्रम शोषण के आधार पर ही वर्तमान में पूंजीवाद की दीवार बनी हुई है। यदि कृत्रिम ऊर्जा की मूल्य वृद्धि हो गई तो पूंजीवादी दीवार की जडे़ खोखली हो जायेगी। पूंजीवाद और पूंजीवाद का लाभ उठा रहे लोग कृत्रिम ऊर्जा का मूल्य कभी नहीं बढने देंगे। किन्तु मानवीय आधार पर हम सबको आवश्यक रूप से विचार करना चाहिये कि श्रम शोषण भले ही अपराध न हो किन्तु अमानवीय भी है और अनैतिक भी। मेरा आप सब से निवेदन है कि हम अपने स्वार्थ से थोडा उपर उठकर इस सुझाव पर सोचने का प्रयास करे कि श्रमजीवियों की और पशुओं की कीमत पर हमारा विकास कितना उचित है। हम कृत्रिम ऊर्जा मूल्य वृद्धि का समर्थन करके इस कलंक से बच सकते हैं।

मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि

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किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्वयं की कोई भूमिका नहीं होती। इसका मुख्य उददेश्य श्रोता तक अपने विचार ठीक ठीक पहुंचने तक सीमित होता है। भाषा का चयन हमेशा श्रोता की क्षमता के आधार पर होता है। भाषा का चयन कभी वक्ता की इच्छानुसार नही होता। भाषा हमेशा व्यक्तिगत होती है समूहगत नहीं। भाषा वक्ता और श्रोता के बीच संवाद का माध्यम है।

राज्य हमेशा ही समाज को विभाजित देखना चाहता है, इस प्रयत्न में वह आठ आधारों का सहारा लेता है-1. धर्म 2.जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रीयता 5. उम्र 6. लिंग 7. आर्थिक भेद 8. उत्पादक एवं उपभोक्ता। इन आधारों में समय समय पर भाषा के नाम पर टकराव पैदा करने का भी प्रयत्न लम्बे समय से जारी है। शांत वातावरण में पंडित नेहरू ने सबसे पहले भाषावार प्रांत के नाम से विष बीज बोया, जिसने भारत को स्थायी रूप से उत्तर-द़िक्षण में बांट दिया, वह खाई अबतक नहीं मिटी है। करूणानिधि ने उस विष बीज को खाद पानी देकर एक ऐसा वृक्ष का स्वरूप दे दिया जिसके फलों के आधार पर करूणानिधि का पूरा जीवन सत्ता सुख में बीत गया। भाषा के नाम पर क्षेत्रीयता का उभार बढाया जा रहा है।

भाषा को संस्कृति के साथ भी जोडा जाता हैै, जबकि भाषा और संस्कृति लगभग पूरी तरह अलग-अलग होते हैं। संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति के मनोभाव, चिंतन तथा कार्य प्रणाली से जुडा होता है जिसका भाषा से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। मैंने सुना है कि अटल जी ने प्रधानमंत्री रहते हुये संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर उसे सांस्कृतिक भावनात्मक स्वरूप देने का प्रयास किया। यह प्रयास पूरी तरह गलत था। दुनियां जानती है कि विचारप्रस्तुत करते समय व्यक्ति के हावभाव का भी बहुत प्रभाव पडता है। द्विभाषिया द्वारा प्रस्तुत विचार की उपादेयता घट जाती है। जिस सभा में विचारों का महत्व हो वहां आप भाषा प्रेम के चक्कर मेें विचारो के महत्व को कम करने की भूल करे यह सोच गलत है। अटल जी ने यह गलती की, और सारे भारत में हिन्दी में बोलने के कारण उन्हें प्रशंसा मिली।

भाषा को कभी भी रोजगार का माध्यम नहीं होना चाहिये। नेहरू की गलतियों के कारण अंग्रेजी भाषा नौकरी और रोजगार का मुख्य आधार बन गई। परिणामस्वरूप दक्षिण भारत ने इस कमजोरी का अधिकाअधिक लाभ उठाना चाहा और वे पूरी तरह अंग्रेजी से चिपक गये। यहां तक कि स्वतंत्रता के सत्तर वर्षाे बाद भी उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। जब भाषा श्रोता की होती है और वक्ता अपनी भाषा तय करने का अधिकार नहीं रखता, तब मुझे किस भाषा में बात करनी चाहिये, इसकी सलाह कोई अन्य क्यों दे? पत्नी पति के बीच किस भाषा का उपयोग हो यह उन्हें तय करने दीजिये। किसी गूंगे बहरे को समझाने के लिये मुझे कौन सी भाषा का उपयोग करना है इसके लिये आप की सलाह की आवश्यकता नहीं है। दक्षिण भारत की यात्रा के समय रामाराव के आंदोलन के कारण हम परिवार और मित्रों सहित एक ऐसे गांव में रूक गये, जहां कोई हिन्दी अंग्रेजी जानने वाला नहीं था। रोते हुये बच्चे को दूध के लिये हमें नयी भाषा का सहारा लेना पडा। एक गाय के नीचे बर्तन रखकर दूध दूहने का नाटक (इशारा) करना पडा। तब एक महिला इशारा समझकर दूध लेकर आयी।

भाषा दो व्यक्तियों के बीच व्यक्तिगत विचारों के आदान प्रदान का माध्यम है, किन्तु भाषा दो इकाईयों के बीच विचारों के आदान प्रदान का भी आधार है। इसका अर्थ हुआ कि कोई देश अपनी सुविधानुसार एक भाषा को आधार बना सकता है, किन्तु कोई देश अपनी बात अन्य नागरिकों पर जबरदस्ती थोप नहीं सकता। मुसलमानों ने उर्दू को या अंग्रेजो ने अंग्रेजी को अपना माध्यम बनाया, किन्तु दूसरों को उसका उपयोग करने या सीखने के लिये मजबूर नहीं किया। स्वतंत्रता के बाद डाॅ लोहिया ने भाषा को जन आंदोलन बनाने प्रयास किया। बलपूर्वक अंग्रेजी के नाम पट मिटाये जाने लगे। स्पष्ट है कि यह तरीका अतिवाद से प्रेरित था और इसमें भाषा से प्रेम की अपेक्षा राजनीति की गंध अधिक आती है। आप किसी को भी कोई भाषा लिखने पढ़ने या उपयोग करने से नहीं रोक सकते। भाषा को धर्म या राष्ट्रवाद से भी नहीं जोड़ना चाहिये।
प्राचीन समय मे शिक्षा राज्य मुक्त थी। अंग्रेजो ने अधिक से अधिक लोगो को अपना नौकर बनाने के लिये सरकारी शिक्षा की प्रथा शुरू की। मैं अपने बच्चे को किस भाषा में शिक्षा दूं ये मेरी स्वतंत्रता है, किन्तु शिक्षा के अधिकाधिक सरकारीकरण के कारण उसमें भाषा विवाद का समावेश हो गया। देशभर में किस प्रकार कितनी भाषाएं पढाई जाये इसका निर्णय करने में भी कई दशक लग गये और आज तक निर्णय नहीं हो सका है। इस संबंध में हर पांच दस वर्ष में सरकार का तुगलकी फरमान जारी हो जाता है। अंग्रेजी से निपटने के लिये अकेले हिन्दी जब कमजोर पडने लगी तब उसने क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा लिया। स्पष्ट दिख रहा था कि क्षेत्रीय भाषाओं का विस्तार भविष्य में अधिक घातक होगा, किन्तु पूरे देश में ऐसा प्रयोग हुआ। आज क्षेत्रीय भाषाऐें इस समस्या के समाधान में बडी बाधक बनी हुई हैं। भाषा के नाम पर अलग अलग संगठन बना कर अपनी अपनी दुकानदारी चला रहे हैं, और समाज में टकराव पैदा कर रहे हैं। बंगाल में हिन्दी में लिखे बोर्ड भी मिटाने का प्रयास होता है। छत्तीसगढ़ हिन्दी भाषी प्रदेश है किन्तु वहां भी अब छत्तीसगढ़ी के नाम पर राजनैतिक रोटी सेकी जा रही है। दो चार लोग एक संगठन बनाकर इस कार्य के नाम पर कुछ न कुछ करते रहते है। एक तरफ क्षेत्रीय भाषाओं के विस्तार के लिये अनेक संगठन सक्रिय रहते हैं तो दूसरी ओर हिन्दी भाषा के विस्तार के लिये भी अनेक संगठन बने हुये है। आराम से संगठनों को सरकारी सहायता मिलती रहती है और इन संगठनों को कोई अन्य कार्य करने की आवश्यकता नहीं होती। मेरे एक मित्र लगभग बीस वर्षो से हिन्दी प्रेमी है। वे टेलीफोन या मोबाइल को दूरभाष बोलने में बहुत सतर्क रहते हैं। मुझे भी मोबाइल या फोन को दूरभाष कहने में कोई दिक्कत नहीं होती, किन्तु मैं जितनी सुविधानुसार मोबाइल के नाम से श्रोता को समझा पाता हूॅ वह मौलिकता दूरभाष शब्द में नहीं है इसलिये मैं बोल चाल में इस शब्द का उपयोग नहीं करता हूॅ। अंग्रेजी या उर्दू के अनेक शब्द बोलचाल की भाषा में घुलमिल गये हैं। कुछ विशेष हिन्दी प्रेमी ऐसे शब्दो के उपयोग पर यदा कदा आपत्ति करते रहते हैं। मुझे ऐसी आपत्ति में कोई सार नहीं दिखता। अंग्रेजी हिन्दी उर्दू चाहे अकेली भाषा हो या खिचडी बनी हुयी, हमारा उददेश्य विचार प्रकट करने से है जो श्रोता आसानी से समझ सकें। उसके साथ भावनाओं को नहीं जुडना चाहिये।
वर्तमान भारत में भाषा समाज में टकराव पैदा करने का एक बडा माध्यम है। इस टकराव से समाज को हमेशा नुकसान होता है और राजनेताओं को लाभ होता है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस प्रकार के भावनात्मक टकराव से बचें और राजनेताओं की स्वार्थ पूर्ति का माध्यम न बने।

मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 21, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्त है। प्राचीन समय से हिन्दू धर्म की दो अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं- एक गुण प्रधान हिन्दुत्व और दूसरे पहचान प्रधान। गांधी गुण प्रधान हिन्दुत्व की विचारधारा से ओतप्रोत थे और हत्या करने वाला पहचान प्रधान हिन्दुत्व से। गांधी में हिन्दुत्व के मौलिक गुण कूट कूट कर भरे पडे़ थे और वे गुण प्रधान हिन्दुत्व को अपने जीवन में पूरी तरह उतार रहे थे। वे कहीं भी पहचान प्रधान हिन्दुत्व की जीवन पद्धति में बाधक नहीं थे। वैसे भी आमतौर पर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में पूरी तरह अहिंसक होता है। यदि कभी हिंसा करनी हो तो हिन्दू धर्मव्यवस्था में ऐसी हिंसा राज्य व्यवस्था के माध्यम से ही हो सकती है, सीधे नहीं। इसलिये इस प्रश्न का उत्तर और जटिल हो गया है।

गांधी के कार्यकाल में अनेक संगठन गांधी के विरूद्ध काम कर रहे थे। गांधी स्वतंत्रता को पहला उददेश्य मान कर चल रहे थे तो विभिन्न संगठन स्वतंत्रता से अलग कुछ और भी उददेश्य आगे रखकर चल रहे थे जिनमें चार प्रकार के लोग प्रमुख थे- 1. संघ 2. जिन्ना 3. अम्बेडकर 4. कम्युनिस्ट। ये चारो समूह गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि गांधी स्वतंत्रता को सबसे प्रमुख महत्व देते थे और ये चारों अलग-अलग उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे भले ही स्वतंत्रता कुछ पिछड ही क्यों न जायें। इन चारो में भी जिन्ना अम्बेडकर और कम्युनिस्टों के अपने-अपने स्वार्थ थे और संघ की प्राथमिकता स्वार्थ से कुछ भिन्न थी। संघ अंग्रेजो की तुलना में मुसलमानों को अधिक घातक मानता था। गांधी अंग्रेजो की गुलामी से मुक्ति को प्राथमिकता देते थे। ये चारो समूह आपस में भी टकराते रहते थे, जिसे गांधी निपटाने का प्रयास करते थे किन्तु चारों आपस में चाहे जितना भी टकराते हो किन्तु गांधी विरोध में चारो की भाषा एक होती थी। इस संबंध में कोई किसी से नहीं टकराता था। ये सभी गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि चारो के अलग-अलग संगठन थे। संगठनों का उददेश्य स्वार्थ से जुडा होता है और संस्थाओं का परमार्थ से। चारो में किसी का स्वरूप संस्थागत नहीं था भले ही संघ अपने को संस्था कहने का ढोेंग करता था।

गांधी विदेशी गुलामी से हर भारतीय की मुक्ति को अंतिम लक्ष्य मान कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता को पड़ाव मानते थे। गांधी का अंतिम लक्ष्य था व्यक्ति स्वातंत्र। इसलिये गांधी ने हिन्द स्वराज के बाद ग्राम स्वराज को लक्ष्य घोषित किया। स्वतंत्रता संघर्ष में जो प्रमुख लोग सक्रिय थे उनमें से अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्रीय स्वराज्य को अंतिम लक्ष्य मानते थे। यही कारण था कि कांग्रेस के नेहरू, पटेल सहित प्रमुख नेता गांधी की कोई बात कभी स्वीकार नहीं करते थे भले ही स्वार्थ वश मान लेते थे और वैसा करते थे। यदि कभी भी कांग्रेस पार्टी में मतदान हुआ तो गांधी की सोच के विपरीत हुआ और गांधी के डर से मान लिया गया। गांधी के साथ देश के करोड़ो लोगो की भावना जुडी हुई थी तो इन नेताओं को अपने स्वार्थ के कारण कुछ स्वार्थी लोगों के अतिरिक्त किसी एक का भी समर्थन प्राप्त नहीं था। वैसे भी भारत हिन्दू बहुल देश था और हिन्दू आमतौर पर व्यवस्था के साथ चलने वाला होता है। सामान्य हिन्दू आबादी राजनीति में दखल नहीं देती और राजा को श्रद्धा देती है। स्वतंत्रता के बाद भी आजतक आमतौर पर स्वतंत्रता पूर्व के राजाओं या उनके वंशजों को बहुत श्रद्धा प्राप्त है। स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू को श्रद्धा प्राप्त हुई और आजतक इनके वंशज उसका लाभ उठा रहे है। यह हिन्दुओं का स्वभाव है। स्वतंत्रता के पूर्व भारत की लगभग पूरी हिन्दू आबादी ने गांधी और उनकी नीतियों पर विश्वास कर लिया था। इसी का परिणाम था कि सभी नेता गांधी की नीतियों का विरोध करने के बाद भी गांधी के आदेश को चुपचाप स्वीकार कर लेते थे। पंडित नेहरू तथा अन्य राजनेता भी गांधी की नीतियों से नाराज रहते थे लेकिन खुलकर नहीं बोल पाते थे।
स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस पार्टी नेतृत्व कर रही थी। कांग्रेस का चरित्र संस्थागत था संगठनात्मक नहीं। अनेक विचारों के लोग स्वतंत्रता के लिये एक मंच पर आये थे। जब स्वतंत्रता मिलने के लक्षण दिखने लगे तब गांधी को किनारे करके कांग्रेस को संगठनात्मक स्वरूप देना शुरू हुआ। इस मामले में पंडित नेहरू सबसे अधिक दोषी हैं। स्वतंत्रता के समय पंडित नेहरू की सत्ता के प्रति नीयत बिगड गई। सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह आदि का मार्ग गलत था नीयत गलत नहीं। नेहरू के अतिरिक्त अन्य चार की तो नीतियां भी गलत थी और नीयत भी। मैंने सुना है कि गांधी कांग्रेस को संगठन के रूप में न बनाकर उसे स्वतंत्रता के बाद भंग करना चाहते थे लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया।
गांधी विचारो से सबसे अधिक चिढ़ सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के कारण थी चाहे कोई राजनेता रहा हो अथवा हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाला। कोई भी नहीं चाहता था कि देश में ग्राम स्वराज आवे और सत्ता अकेन्द्रित होकर परिवारो तक चली जाये। गांधी इन सबके लिये सबसे बडी बाधा थे। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी के विरूद्ध वातावरण बनाने में गांधी की स्वराज की यह परिभाषा भी सहायक सिद्ध हुई होगी। कुछ लोग ऐसा भी बताते है कि गांधी हत्या का प्रयास स्वतंत्रता से कई वर्ष पूर्व भी हुआ था। यदि यह बात सच है तो फिर उस समय तक न पाकिस्तान बना था न ही कोई 55 करोड रूपया देने का मामला था। साथ ही यदि गांधी हत्या में हिन्दू मुसलमान की बात ही प्रमुख होती तो स्वतंत्रता के बहुत पूर्व हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर बंगाल में सरकार चलाई जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि भी शामिल थे। एक अन्य बात यह भी है कि यदि विभाजन इसका कारण था तो विभाजन में मुख्य भूमिका नेहरू, पटेल तथा जिन्ना की रही, गांधी की नहीं। यदि इस कारण से ही हत्या होती तो इन तीनो मे से किसी की होनी चाहिये थी किन्तु यदि इन सबको छोडकर गांधी की हत्या हुई तो इसका कारण कहीं और खोजा जाना चाहिये। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी हत्या का मुख्य कारण गांधी की सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की नीति रही जिसके लियेे बहाना विभाजन को बनाया गया और लोगो के बीच भ्रम फैलाया गया। गांधी के हत्यारे गोडसे के मन में भले ही विभाजन या हिन्दू मुसलमान की बात रही हो किन्तु हत्या का वातावरण बनाने के पीछे देश के राजनेताओं की सत्तालोलुपता थी जिसमें गांधी सबसे बडी बाधा थे। वैसे भी नेताओं की नजर में गांधी का उपयोग अब समाप्त हो चुका था। पंडित नेहरू ने गांधी विचारो को तिलांजलि देकर साम्यवाद की नीति अपना ली। जिन्ना पहले से ही अलग हो चुके थे। अम्बेडकर ने कानून मंत्री बनकर हिन्दू कोड बिल का ताना बाना बुनना शुरू कर दिया और बचे संघ, हिन्दू महासभा तो, इन्होंने गांधी के खिलाफ वातावरण बनाना शुरू कर दिया। सबने अपना-अपना अलग-अलग गांधी विरोधी मार्ग पकड लिया था। यदि गांधी जीवित रहते तो इनके लिये कुछ समस्याएं ही पैदा करते इसलिये किसी मुर्ख ने गांधी की हत्या कर दी और बाकी सब लोगो ने राहत की सांस ली। ठीक गांधी विचार के विपरीत सत्ता का ढांचा तैयार किया गया और लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल दी गई। आज पूरी तरह गांव और परिवार को संविधान से बाहर करके राजनैतिक सत्ता अधिक से अधिक केन्द्रीयकरण की दिशा में बढ रही हैं।

गांधी पर चर्चा के बाद गोडसे पर भी चर्चा समीचीन है। कोई हिन्दू कभी स्वेच्छा से और बिना समाज से अधिकार प्राप्त किये किसी पर बल प्रयोग नहीं कर सकता। मुस्लिम संस्कृति इसकी इजाजत देती है। विषेषकर यदि कोई हिन्दू किसी हिन्दू की हत्या करे और वह भी किसी गुण प्रधान हिन्दू की तो यह बात पूरी तरह इस्लामिक संस्कृति से मेेल खाती है। ऐसे संस्कार गोडसे में कहा से आये यह अलग शोध का विषय है किन्तु ये संस्कार हिन्दुत्व विरोधी थे, यह पूरी तरह सच है। कुुछ इक्का दुक्का लोग आज भी ऐसी हिंसा के प्रशंसक या समर्थक मिल जाते है जिनकी संख्या धीरे धीरे बढ रही है। समाज को चाहिये कि हिन्दुओं में बढती ऐसी इस्लामिक संस्कृति के विरूद्ध वातावरण बनावे। यदि आप शेर से नहीं टकरा सकते तो गाय की हत्या कर दें यह तो और भी अधिक कायरता है। गोडसे का कार्य और उसका समर्थन पूरी तरह हिन्दू विरोधी माना जाना चाहिये।

स्पष्ट है कि आज हमारे बीच गांधी नहीं है किन्तु जिस समय गांधी ने स्वतंत्रता के लिये योजना बनानी शुरू की उस समय भी देश में कोई स्थापित गांधी नहीं था। करमचंद मोहन दास ने शून्य से आगे बढकर गांधी तक का सफर तय किया है। गांधी के मरते ही यदि फिर से स्थिति बिगडते बिगडते शून्य तक पहुंच गई तो अब फिर से बदलाव के लिये किसी को नये गांधी के रूप में सामने आना चाहिये। फिर से राजनैतिक सत्ता के अकेन्द्रीयकरण की आवाज उठनी चाहिये। मुझे पूरा विश्वास है कि भारत की जनता फिर से नये गांधी का समर्थन करने के लिये तैयार दिखेगी।

मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि

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आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यवस्था में प्रदेश और केन्द्र दो ऐसी ही अलग-अलग इकाईयां हैं। प्रदेशो को अनेक प्रकार की स्वतंत्रताएं दी जाती हैं। इन स्वतंत्रताओं का दुरूपयोग करके प्रदेश यदि अन्य प्रदेशो से टकराव का स्वरूप ग्रहण कर लें तब पूरी राष्ट्रीय एकता पर बुरा प्रभाव पडता है।

राज्य अर्थात राष्ट्रीय सरकारें यह प्रयत्न करती हैं कि समाज कभी एकजुट न हो जाये। यदि समाज एकजुट हो जाये तब राज्य को अपने उपर खतरा दिखने लगता है। इस सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिये राज्य फूट डालों और राज करों की नीति पर निरंतर चलता रहता है। इसके लिये राज्य अनेक शस्त्रों का उपयोग करता है। ऐसे शस्त्रों में आठ प्रमुख माने जाते है। 1. धर्म 2. जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रियता 5. उम्रभेद 6. लिंग भेद 7. आर्थिक भेद 8. उत्पादक/उपभोक्ता। इन आठों में से प्रत्येक पर राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। चाहे सरकार किसी भी दल की क्यों न हो किन्तु पूरी ईमानदारी से सभी दल इस फूट डालो की नीति पर मिल जुलकर काम करते हैं। कभी किसी एक मुद्दे को आगे बढाकर वर्ग संघर्ष को बढाया जाता है तो उस मुददे को ठंडा होते ही कोई एक नये वर्ग संघर्ष की तैयारी होने लगती है निरंतर वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाज में टकराव चलता रहे इसके लिये लगातार किसी न किसी मुददे को आगे बढाना ही सफल राजनीति मानी जाती है। क्षेत्रियता अर्थात प्रादेशिकता भी इन आठ प्रकार के टकरावों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हर एक-दो वर्ष में कहीं न कही क्षेत्रियता के नाम पर जन उभार का प्रयत्न शुरू किया जाता है। सभी राजनैतिक दल दो गुटों में बंटकर आपस में टकराव का नाटक करते है और उस नाटक के दर्शक भावनाओं में बहकर आपस में वास्तविक टकराव में उलझ जाते हैं। परिणाम होता है कि दोनो सामाजिक समूहों में स्थायी रूप से वैमनस्यं की मजबूत दीवार खडी हो जाती है। राजनैतिक दल इस प्रकार के क्षेत्रीय संघर्ष को रोकने के नाम पर कुछ नये कानून बनाकर अपनी शक्ति बढ़ा लेते हैं तथा कुछ वर्षो के बाद किसी दूसरे क्षेत्र में पुनः उस शस्त्र का उपयोग करते है।
हम वर्तमान भारत का आंकलन करें तो स्वतंत्रता के बाद लगातार पूरे देश में क्षेत्रियता का विस्तार किया गया। शान्त वातावरण में पंडित नेहरू ने सबसे पहले भाषा वार प्रांत रचना के नाम से ऐसा बीच बोया जिसने भारत को स्थायी रूप से उत्तर और दक्षिण में बाॅट दिया। वह खाई अब तक नहीं मिटी है। इस क्षेत्रिय विभाजन के प्रमुख सूत्रधार एम करूणा निधि जी इसी माध्यम से सत्ता के शीर्ष तक बनें रहने में कामयाब रहे । उनकी सबसे बडी खूबी यही मानी जाती है कि उन्होंने क्षेत्रीयता को सत्ता का माध्यम मान लिया और सफल हुुये । इसी प्रकार बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र और मराठी के नारे को सत्ता का माध्यम बना लिया और सफल भी हुये, इन लोगो ने खुले आम हिंसा को प्रोत्साहित किया। उन्होंने सारी संवैधानिक और सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन किया यहाॅ तक कि बाल ठाकरे तो अपनी तुलना शेर से करने लगे थे। किसी लोकतांत्रिक देश में कोई दादा समाज की तुलना गाय से और स्वयं की शेर से करे और वह व्यक्ति सम्मानित हो यह लोकतंत्र का खुला अपमान है। इस सीमा तक क्षेत्रियता का नंगा नाच हम सबने देखा है। यदि हम व्यक्तिगत आधार को छोड़ दे और सामान्य जन मानस में क्षेत्रियता के जहर का आॅकलन करें तो इसमें सबसे ऊपर नंबर बिहार का आता है। आबादी बढाने में भी बिहार आगे रहता है तो दूसरे प्रदेशो में रहते हुये क्षेत्रिय एकता का दुरूपयोग करने में भी बिहार की अग्रिम भूमिका रहती है। जब क्षेत्रियता के नाम पर सारे नियम कानून को किनारे करके कोई व्यक्ति या समूह समाज में प्रगति करने लगता है तो अन्य लोग भी उस मार्ग पर चलना शुरू कर देते है। इस प्रकार अन्य प्रदेशो में भी छत्तीसगढी या गढवाली के नाम पर क्षेत्रियता के विष बीज अंकुरित होने लगते है। स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ ऐसे अंकुरण का लाभ उठाने को तैयार दिखते हैं और खाद पानी देकर उस विष वृक्ष को इतना मजबूत कर देते है कि वह उन लोगो के लिये छाया बन जाता है। मैंने स्वयं देखा है कि क्षेत्रियता की आवाज मजबूत करने वाला हर व्यक्ति कहीं न कहीं राजनैतिक व्यवसाय से जुड़ने की इच्छा रखता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता जो सामाजिक धारणा भी रखता हो और क्षेत्रियता को भी प्रोत्साहन दे। राजनीति का तो क्षेत्रियता के प्रोत्साहन देना मुख्य आधार ही माना जाता है।

क्षेत्रियता के विस्तार में मुख्य रूप से बुद्धि जीवियों का स्वार्थ छिपा होता है किन्तु बहुत चालाकी से ऐसे लोग भावना प्रधान लोगो को आगे करके उन्हें टकराव के लिये प्रोत्साहित करते हैं। समाज के लोग दो गुटों में बंटकर टकराते हैं तथा दोनो गुट अपना नुकसान करते हंै किन्तु राजनेता इस टकराव का लाभ उठाते हैं। समस्या बहुत जटिल हो गयी है अब तो पूरे भारत में क्षेत्रियता की भावना बढती जा रही हैं। योग्यता के स्थान पर स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकताये दी जाये इसकी मांग खुलेआम होने लगी है। क्षेत्रीयता और भाषा को भावनात्मक मुददा बनाने के लिये उसके साथ संस्कृति को भी जोड लिया जाता है। इस तरह भाषा और संस्कृति को जोड़कर क्षेत्रियता की आग जलाई जाती है जबकि न भाषा का क्षेत्रियता से कोई संबंध होता है न संस्कृति का।

समस्या जटिल है किन्तु बहुत खतरनाक है। समस्या लगातार बढती जा रही है राजनीति से जुडे लोग इस समस्या को उभार कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने में लगे हैं। समाज के ही विद्वानों को इसका समाधान खोजना चाहिये। सबसे बडी भूल संविधान निर्माताओं से हुई कि उन्होंने प्रदेशो को अंतिम अधिकार दे दियें। यदि केन्द्र से लेकर कुछ अधिकार प्रदेशो को दिये गये थे तो प्रदेशो से लेकर कुछ अधिकार जिला, गांव और परिवार तक विकेंद्रित करने चाहिये थे। यदि अधिकारों का केन्द्रीयकरण प्रदेश और केन्द्र तक नहीं होता तो न राष्ट्रवाद पंनपता न ही क्षेत्रवाद। अधिकारों का इकट्ठा होना ही राजनेताओं को आकर्षित करता है और ऐसे राजनेता अपने स्वार्थ के लिये इन भावनात्मक मुददों को उछालकर उनका लाभ उठाते हैंै। इसलिये अधिकारों का विकेन्द्रीयकरण इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान है। समान नागरिक संहिता भी इस समाधान में सहायक हो सकती है। हमें चाहिये कि हम क्षेत्रीयता के नाम पर लाभ उठानेे वाले राजनेताओं की मंशा को समझें और ऐसे प्रयत्नों से अपने को दूर रखें।

मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 3, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा समाज के लिये अनिवार्य है तो समाज के साथ जुडकर रहना व्यक्ति की मजबूरी है। जब व्यक्ति स्वतंत्रता की सीमायें तोडता है तब वह उच्श्रृंखल हो जाता है। जब व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमायें टूटती है तब वह गुलाम हो सकता है। उच्श्रृंखल व्यक्ति पर नियंत्रण और गुलामी से सुरक्षा के लिये समाज एक व्यवस्था बनाता है। इस व्यवस्था को व्यक्ति और समाज अपने अधिकार देते हैं, तब ऐसे अधिकार उस व्यक्ति की शक्ति बन जाते हैं। इस शक्ति के बल पर ही वह व्यवस्था सेना, पुलिस, वित्त आदि के अधिकार अपने पास रखती है, ऐसी अधिकार प्राप्त इकाई मनमानी न करने लगे इसलिये उसे अधिकार देने वाली इकाई उसके अधिकारों और हस्तक्षेप की सीमाये निश्चित कर देती है। ऐसी सीमायें निश्चित करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते हैं। ऐसे संविधान प्रत्येक इकाई के अलग-अलग हो सकते हैं, किन्तु यह आवश्यक है कि संविधान बनाने में इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की समान और स्वतंत्र भूमिका हो। किसी एक व्यक्ति को भी निकालकर किसी इकाई का संविधान नहीं बन सकता।

व्यवस्था की कई इकाईयां होती है, और सबके अपने अपने संविधान भी हो सकते हैं। परिवार व्यवस्था की पहली इकाई है इसी तरह ग्राम व्यवस्था राष्ट्र व्यवस्था और विश्व व्यवस्था को माना जा सकता है। स्वाभाविक है कि सबके अपने अपने स्वतंत्र संविधान हों। हो सकता है कि ऐसे संविधान लिखित हों भी और न भी हों किन्तु सभी सदस्यों की सहमति से बनी परम्परा भी संविधान मानी जाती है। यदि कोई अधिकार प्राप्त व्यक्ति है तो उसके अधिकारों की सीमायें निश्चित करने वाले प्रावधान संविधान की अनिवार्य आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति के कुछ मौलिक अधिकार होते हैं। उस व्यक्ति की सहमति के बिना उन प्राकृतिक अधिकारों में कभी कोई कटौती नहीं की जा सकती। इसका अर्थ हुआ कि संविधान बनाने में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति अनिवार्य है। किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारो के विषय में उसकी सहमति के बिना ना कोई समझौता हो सकता है और ना ही क्रियान्वित हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति की सहमति से कोई ऐसा समझौता होता है जो उसकी स्वतंत्रता के विरूद्ध है तो उस व्यक्ति की सहमति के बिना यह समझौता लागू नहीं किया जा सकता। कल्पना करिये कि मैंने किसी व्यक्ति या इकाई से यह समझौता कर लिया कि यदि मैं आपको गाली दूंगा तो आप मुझे पीट सकते हैं किन्तु इस समझौते के बाद भी यदि मैं गाली देता हूॅ तो वह व्यक्ति मेरी सहमति या स्वीकृति के बिना मुझे पीट नहीं सकता। मेरी उच्श्रृंखलता के दंड के लिये मैं या वह दोनो को समाज के पास पक्ष प्रस्तुत करके निर्णय कराना ही होगा। बिना मेरी स्वीकृति या समाज के निर्णय के मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नही हो सकता।

परिवार, गांव और राष्ट्र आदि व्यवस्था की इकाईयां है और जाति, धर्म क्षेत्रीयता आदि इन व्यवस्थाओं की सहायक इकाईयां। जाति, धर्म आदि को कोई शक्ति प्राप्त नहीं होती। वह मार्गदर्शक अथवा समन्वयक इकाई मानी जाती है इसलिये इन सबका कोई संविधान नहीं होता, किन्तु परिवार, गांव, राष्ट्र आदि शक्ति संपन्न इकाईयां हैं इसलिये इनके संविधान होते है। आदर्श स्थिति में परिवार, गांव, राष्ट्र और विश्व के अपने अपने संविधान होने चाहिये और ऐसे प्रत्येक संविधान निर्माण में उस इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होनी चाहिये। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का संविधान भी परिवार के सभी सदस्यों की सहमति से ही बन सकता है और राष्ट्रीय संविधान भी उस देश में रहने वाले सभी नागरिकों की सहमति से बनेगा। विश्व संविधान में भी दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्र और समान भूमिका होनी चाहिये। राष्ट्र प्रमुख मिलकर कोई दुनियां का संविधान नहीं बना सकते, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका अनिवार्य होती है। दुर्भाग्य से अब तक विश्व सरकार नहीं बन पाई है, और विश्व का संविधान भी नहीं बन सका है जो बनना चाहिये। इसी तरह परिवार व्यवस्था और ग्राम व्यवस्था को भी आतंरिक स्वतंत्रता न देकर राष्ट्र व्यवस्था ने इनका अपहरण कर लिया है। इसलिये परिवार और गांव के भी संविधान नही बने हैं। राष्ट्रों के कुछ देशों में संविधान बने है और जिन देशों में संविधान बने हैं ऐसे देशों में भारत भी एक है।

जिस समय भारत का संविधान बनना शुरू हुआ उस समय भारत गुुलाम था इसलिये संविधान बनाने में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति न लेकर अंग्रेजो ने अपनी इच्छा से एक बीच का मार्ग निकाला और एक संविधान सभा बनाकर उसके प्रस्ताव को ही जन स्वीकृति मान लिया और संविधान में लिख दिया कि हम भारत के लोग अपने लिये संविधान को आत्म समर्पित करते है। उक्त प्रस्ताव के आधार पर जो चुनाव हुआ उस चुनाव को ही जन स्वीकृति घोषित कर दिया गया। स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति मिलकर संविधान बनाते है उन व्यक्तियों को ही संविधान संशोधन का अधिकार होता है। इसका अर्थ हुआ कि भारत के सभी नागरिकों की सहमति अथवा स्वीकृति के बिना कोई संविधान संशोधन नहीं हो सकता, किन्तु भारतीय संविधान में एक ऐसा प्रावधान डाल दिया गया जिसके अनुसार संविधान संशोधन के असीम अधिकार तंत्र को दे दिये गये और लोक को उस भूमिका से बाहर कर दिया गया। व्यवस्था का ढाॅचा इस तरह होता है कि सबसे उपर लोक अर्थात समाज होता है उसके नीचे एक संविधान होता है जो राज्य पर अनुशासन बनाता है, राज्य कानून बनाता है और व्यक्ति सबसे नीचे की इकाई होता है अर्थात वह कानून का पालन करने के लिये बाध्य है। जब संविधान तंत्र पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से बनाया जाता है तब तंत्र संविधान का पालन करने के लिये बाध्य है संविधान तंत्र को अधिकार देता है लेता नहीं, किन्तु छलपूर्वक संविधान निर्माताओं ने तंत्र को ही संविधान संशोधन के असीम अधिकार दे दिये। व्यक्ति के मौलिक अधिकार स्वैच्छिक है और मौलिक अधिकारों में कोई भी संविधान उसकी इच्छा के बिना कोई कटौती नहीं कर सकता किन्तु संविधान निर्माताओं ने संसद को वह अधिकार भी सौप दिया यद्यपि 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक तरीके से संसद के उक्त अधिकार पर आशिंक रोक लगाई। संविधान संशोधन का अधिकार लोक के अतिरिक्त किसी और को दिया जाना प्राकृतिक न्याय के विपरीत है, किन्तु आज तक इस संबंध में न कोई मामला भारतीय न्यायालय में प्रस्तुत हुआ ना ही विश्व व्यवस्था में। प्रस्तुत करने का भी लाभ नहीं दिखता क्योंकि ना तो कोई विश्व संविधान बना है ना ही विश्व व्यवस्था। भारतीय न्याय व्यवस्था भी तंत्र का एक हिस्सा है और वह भी संविधान को गुलाम बनाकर रखने की लडाई ने विधायिका के साथ संलग्न है इसलिये उसकी भी कोई रूचि नहीं है। परिवार व्यवस्था और गांव व्यवस्था को तोड मरोडकर छिन्न-भिन्न कर दिया गया है। देश के प्रमुख विद्वानों और विचारको को भी कई प्रकार के सम्मान और लालच से उनका मुॅह बंद कर दिया गया है, इसलिये वे भी मुॅह नहीं खोल पाते। यदि कुछ लोग समझते भी हैं तो उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान हो जाती है। किन्तु सब कुछ होते हुये भी यह एक मौलिक समस्या है, कि संविधान निर्माण और संशोधन में प्रत्येक व्यक्ति की स्वंतत्र भूमिका का होना ही लोकतंत्र है यदि संविधान निर्माण मेें ऐसी भूमिका नहीं है तो भारत का लोकतंत्र, लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही है जिसे छलपूर्वक लोकतंत्र कहा जा रहा है। लोकतंत्र के लिये पूरे देश में आवाज उठनी चाहिये और उसका प्रारंभ यही से हो सकता है कि संविधान संशोधन के तंत्र के असीम अधिकारो में किसी न किसी प्रकार की कटौती होनी चाहिये।

यह प्रश्न भी विचारणीय है कि संविधान संशोधन के लिये ऐसी क्या व्यवस्था हो सकती है जो व्यावहारिक हो। इस संबंध में कई तरीके हो सकते हैं। संसद द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधन के लिये एक अलग प्रक्रिया बन सकती है, उसके लिये जनमत संग्रह हो सकता है, उसके लिये सभी सरपंच अथवा ग्राम सभाओं की स्वीकृति का प्रावधान बनाया जा सकता है, उसके लिये एक अलग संविधान सभा बन सकती है जो नागरिको के द्वारा चुनी जाये अथवा किसी और प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है किन्तु किसी भी परिस्थिति में लोकतंत्र की जगह संसदीय तानाशाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह कार्य अत्यन्त कठिन है किन्तु आवश्यक भी है और इस संबंध में सामाजिक जागृति ही इसकी शुरूआत हो सकती है क्योकि तंत्र से जुडे लोग अथवा उससे लाभान्वित व्यक्ति जन जागृति के पक्ष में नहीं खडे होगे। इसलिये हम लोगों ने संपूर्ण समाज के समक्ष इस समस्या को प्रस्तुत किया है। ज्ञान यज्ञ परिवार और बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान ने मिलकर ऋषिकेश में पंद्रह दिनों का ज्ञानोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया है। उस कार्यक्रम में पांच सितम्बर को तथा आठ सितम्बर को इस विषय पर विस्तृत रूप से चर्चा होगी। इस चर्चा के माध्यम से पूरे देश में इस आवश्यकता की भूख पैदा हो यह प्रयत्न होगा। इस विचार मंथन के निष्कर्ष भी समाज के सामने आयेंगे ही। अधिक से अधिक लोगो को ज्ञानोत्सव 2019 में शामिल होना चाहिये।

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