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मंथन क्रमांक 128 ’’कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। आमतौर पर ऐसा संतुलन बन नहीं पाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संगठन से जुड जाता है और उसकी प्राथमिकताएं ...
मंथन क्रमांक 127 ’’सर्वोत्तम संभव का सिद्धान्त’’–बजरंग मुनि
आदर्शवाद और व्यावहारिकता बिल्कुल भिन्न-भिन्न होते है। आदर्श का अर्थ होता है क्या करना उचित है और व्यावहारिकता का अर्थ होता है कि क्या होना आसान है। उच्च आदर्श अव्यावहारिक हो सकता है और किसी ...
मंथन क्रमांक 126 ’’ सहजीवन और सतर्कता’’–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है और सहजीवन उसकी सामाजिक मजबूरी। स्वतंत्रता सबकी समान होती है। स्वतंत्रता की सीमा प्राकृतिक रूप से बनी हुयी है। कोई भी अन्य व्यक्ति ...
मंथन क्रमाॅक 125 ’’न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सीमाएं’’–बजरंग मुनि
दुनियां की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था आदर्श सामाजिक व्यवस्था से बहुत अलग है। आदर्श व्यवस्था में समाज सबसे उपर होता है और राष्ट्र या धर्म सहायक। वर्तमान में समाज से भी उपर राष्ट्र और धर्म बन ग...
मंथन क्रमांक-124 ’’मनरेगा कितना समाधान कितना धोखा’’–बजरंग मुनि
कुछ हजार वर्षों का विश्व इतिहास बताता है कि दुनियां में बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए नये-नये तरीकों का उपयोग किया। श्रम शोषण के लिए ही पश्चिम के देशों ने पूंजीवाद को महत्त्व दिया तो भार...
मंथन क्रमांक-123 ’’धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता कितना अपराध’’–बजरंग मुनि
धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड गया। धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भा...
मंथन क्रमांक-122 ’’गांधी, मार्क्स ओर अम्बेडकर’’–बजरंग मुनि
गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना कठिन होते हुये भी बहुत प्रासंगिक है क्योंकि तीनों के लक्ष्य और कार्यप्रणाली अलग-अलग होते हुये भी वर्तमान भारत की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर तीनों महाप...
मंथन क्रमांक-121 ’’राइट टू कंस्टीटयूशन’’–बजरंग मुनि
दुनियां की समाज व्यवस्था में व्यक्ति एक प्राकृतिक और प्राथमिक इकाई होता है तो समाज अमूर्त और अन्तिम। दुनियां के सभी व्यक्तियों के संयुक्त स्वरूप को समाज कहते हैं। समाज की एक व्यवस्था होती ...
मंथन क्रमांक-120 ’’संगठन कितनी आवश्यकता कितनी मजबूरी’’–बजरंग मुनि,
सामान्यतया संगठन और संस्था को एक सरीखा ही मान लिया जाता है किन्तु दोनो बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। संगठन को अंग्रजी में आर्गेनाईजेशन कहते है और संस्था को इंस्टीटयूशन, यद्यपि दोनो के अर्थ कभी-क...
मंथन क्रमांक 119 ’’व्यक्ति, परिवार और समाज’’–बजरंग मुनि,
पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में व्यक्ति और सरकार को मिलाकर व्यवस्था बनती है। सरकार को ही समाज मान लिया जाता है। इस्लामिक व्यवस्था में परिवार और धर्म को मिलाकर व्यवस्था बनती है। साम्यवाद रा...

मंथन क्रमांक 128 ’’कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद–बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 20, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। आमतौर पर ऐसा संतुलन बन नहीं पाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संगठन से जुड जाता है और उसकी प्राथमिकताएं बदलती रहती है। किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को सहजीवन अवश्य सीखना चाहिये। परिवार व्यवस्था स्वतंत्रता और सहजीवन के संतुलन सिखाने का सबसे अच्छा आधार है। किन्तु परिवार व्यवस्था कमजोर हो रही है और तालमेेल टूट रहा है। यही कारण है कि पूरी दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति में धीरे धीरे कट्टरवाद बढ रहा है। वर्ण व्यवस्था का कमजोर होना भी इसका एक मुख्य कारण है।

अब तक पूरी दुनियां में आतंकवाद की कोई साफ परिभाषा नहीं बन सकी है। संयुक्त राष्ट्र भी ऐसी परिभाषा बनाने के लिये प्रयत्नशील है। कट्टरवाद, उग्रवाद तथा आतंकवाद एक दूसरे साथ जुडे हुये शब्द है इसलिये विषय कठिन होते हुये भी इस पर चर्चा आवश्यक है, विशेष रूप से वर्तमान स्थिति में जब सारी दुनियां उग्रवाद और आतंकवाद से परेशान होकर उसका कोई न कोई समाधान करने का प्रयास कर रही है।

व्यक्ति से लेकर संपूर्ण समाज तक व्यवस्था की अनेक इकाई होती है। व्यक्ति से लेकर समाज तक के बीच की इकाईयां अंतिम इकाई नहीं होती। किन्तु जब कोई व्यक्ति बीच की किसी इकाई को अंतिम इकाई मानकर उपर की अन्य इकाईयाें का अस्तित्व अस्वीकार कर देता है तब उस व्यक्ति के स्वभाव में कट्टरता शुरू हो जाती है। इस कट्टरता के कारण उस व्यक्ति का सहजीवन सीमित हो जाता है। इसका अर्थ होगा कि वह व्यक्ति अपनी इकाई को अंतिम मानकर उसके साथ अच्छा तालमेल करता है तथा समाज की दूसरी इकाईयों के साथ सामन्जस्य नहीं बिठा पाता है। ऐसी कट्टरता जब दूसरी इकाईयाें से टकराव का कारण बनती है तब व्यक्ति के स्वभाव में कट्टरवाद उग्रवाद में बदल जाता है और जब ऐसा उग्रवाद सामूहिक हिंसा का रूप ले ले तब व्यक्ति को आतंकवादी मान लिया जाता है। कट्टरवाद सिर्फ विचारों तक सीमित होता है, उग्रवाद कभी कभी हिंसा का रूप ले लेता है और आंतकवाद स्थायी रूप से सामूहिक हिंसा के रूप में बदल जाता है। वैसे तो कट्टरवाद कई आधार पर आता है और उग्रवाद तथा आतंकवाद में बदलता रहता है किन्तु वर्तमान विश्व में धार्मिक और राष्ट्रीय आधार पर बढने वाला आतंकवाद ज्यादा खतरनाक हो चुका है। इसकी गति लगातार बढती ही जा रही है और इसका कोई समाधान नहीं दिख रहा है। दुनियां में दो प्रकार के लोग है, बुद्धिजीवी और भावना प्रधान। बुद्धिजीवी लोग आतंकवाद को संचालित करते हुये भी अप्रत्यक्ष रहते है और भावना प्रधान लोग ऐसे बुद्धिजीवियों से प्रभावित होकर आतंकवाद को कार्यान्वित करते है। बुद्धि प्रधान लोग सुरक्षित रहते है और भावना प्रधान लोग सक्रिय होने के कारण प्रत्यक्ष परिणाम भुगतते है। इन दोनो को यह अप्रत्यक्ष गठजोड उग्रवाद और आतंकवाद की रोकथाम में बडी बाधा है क्योंकि बुद्धिजीवी लोग प्रत्यक्ष दिखते नहीं और सारी बागडोर उन्हीं के हाथ में रहती है। किसी समस्या की जड तक पहुॅचे बिना पत्तों तक सीमित रहकर समाधान नहीं होता। इसी तरह क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच भी बहुत अंतर होता है। इन दोनो को अलग अलग ना समझने के कारण भी समाधान खोजना कठिन होता है। कोई व्यक्ति स्वतंत्रता संघर्ष में लगा है या आतंकवाद में यह अंतर करना भी कठिन होता है।

हम वर्तमान भारत की समीक्षा करे तो धर्म के नाम पर भारत में लगभग नब्बे प्रतिशत मुसलमान धार्मिक कट्टरवाद से प्रभावित है। उन्हें बचपन से ही कुछ इस प्रकार की संगठनात्मक शिक्षा दी जाती है कि वे अपने धार्मिक संगठन को ही समाज से उपर मानना शुरू कर देते है। इतना ही नहीं वे दुनियां को इस्लाम में बदलने को अपना पहला लक्ष्य मान लेते है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये ये निरंतर सक्रिय रहते है और इन्हीं कट्टरवादी मुसलमानों में से बडी संख्या मे लोग उग्रवादी हो जाते है जो हिंसा पर विश्वास करते है। ऐसे लोग भारत की लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था की अपेक्षा अपनी धार्मिक संगठनात्मक व्यवस्था को अधिक महत्व देते है। ऐसेे ही उग्रवादी मुसलमानों में से कुछ अति भावना प्रधान लोग आतंकवाद की तरफ चले जाते है। आमतौर पर मुसलमानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है और उनमें साहस बहुत अधिक होता है इसलिये कुछ लोग रोजगार के आधार पर भी आतंकवाद की तरफ बढ जाते है। इस प्रकार के इस्लामिक प्रयत्नों के खिलाफ कुछ कट्टरवादी हिन्दुओं में प्रतिक्रिया होती है। ऐसी प्रतिक्रिया संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, शिवसेना आदि के नाम पर संगठित हो जाती है और लोग उग्रवाद की दिशा में बढ जाते है। ऐसे ही उग्रवादियों मे से कुछ लोगो ने पिछले पांच दस वर्षो में आतंकवाद की दिशा में बढने का प्रयास किया किन्तु प्रारंभ में ही प्रशासनिक झटका खाने के कारण हिन्दू आतंकवाद आगे नहीं बढ सका। इसका एक कारण यह है कि आमतौर पर हिन्दू कट्टरवादी नही होता बल्कि यदि कायरता और कट्टरता में से एक का चुनाव करना हो तो वह मुसलमानों के ठीक विपरीत कट्टरता की जगह कायरता को चुनना अधिक पसंद करता है। मैं मानता हूॅ कि कट्टरता और कायरता के बीच क्या उचित है यह कहना वर्तमान में कठिन है किन्तु हिन्दू और मुसलमान के बीच यह कायरता और कट्टरता का अंतर साफ देखा जा सकता है। स्पष्ट है कि भारत में धार्मिक आतंकवाद की जो भी घटनाएं होती है उनमें लगभग सबमें मुसलमानों का ही अधिक हाथ पाया जाता है। संघ परिवार के लोग कट्टरवाद तक सीमित है और आशिंक रूप से उग्रवाद के तरफ भी चले जाते है किन्तु आतंकवाद की दिशा में नहीं बढ पाते। मैंने स्वयं देखा है कि संघ परिवार के लोग हिंसा प्रोत्साहित तो करते है किन्तु स्वयं उससे दूर रहते है।

राष्ट्रीय आधार पर भी भारत चीन से आयातित साम्यवादी उग्रवाद का निरंतर शिकार रहा है। साम्यवाद पूरी तरह राजनैतिक कट्टरवाद है और लगभग हर साम्यवादी उग्रवादी विचारों का संवाहक माना जाता है। ऐसे ही उग्रवादियों मेें से कुछ भावना प्रधान लोग नक्सलवाद के चंगुल में फंस जाते है जिन्हें हम आतंकवादी भी कहते है।

कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद में मूलभूत अंतर होता है। कट्टरवाद अपने आंतरिक विचारो तक सीमित होता है। उग्रवाद हिंसक टकराव में बदल जाता है और आतंकवाद एक पक्षीय हिंसा में। एक मूलभूत फर्क और होता है कि उग्रवादी अपने निश्चित लक्ष्य पर आक्रमण करता है तथा असंबद्ध लोगो को मारने में उसकी कोई सक्रियता नहीं होती। आतंकवादी इस बात की परवाह नहीं करता कि मरने वाला कौन है? वह असंबद्ध लोगो को भी मारना कर्तव्य मानता है। ऐसा आंतकवादी चाहे धार्मिक हो या नक्सलवादी किन्तु अधिक से अधिक हत्या करना उसका उददेश्य होता है इसलिये आतंकवाद को वर्तमान समय में सबसे बडी समस्या माना जा रहा है क्योंकि उसमें असंबद्ध लोग ही अधिक मारे जाते है। एक प्रश्न और उठता है कि भगत सिंह ने जो किया उसे किस श्रेणी में माना जाये? मेरे विचार से किसी राजनैतिक संवैधानिक गुलामी से मुक्ति के लिये यदि कोई हथियार उठाता है और वह कट्टरवाद तक सीमित है, उग्रवाद या आतंकवाद तक नहीं। ऐसे प्रयत्नों को आतंकवाद के साथ नहीं जोडा जा सकता है किन्तु यदि कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था में गोडसे बनकर गांधी की हत्या कर दे तो वह व्यक्ति अवष्य ही उग्रवादी माना जाना चाहिये। आज भी लोकतांत्रिक भारत में जो लोग भगत सिंह अथवा सुभाष चंद्र बोस के नाम पर हिंसा का समर्थन करते है ऐसे लोग कट्टरवादी तो है ही उनमें से अनेक उग्रवादी भी हो सकते है। इस प्रकार की विचारधारा का किसी भी रूप में समर्थन नहीं किया जा सकता। भले ही वह उग्रवाद के विरूद्ध ही क्यों न हो? हमें लोकतांत्रिक भारत में कानून का सहारा लेना चाहिये और यदि प्रशासन हमारे विरूद्ध है तो ऐसे प्रशासन को बदला जा सकता है किन्तु कानून हाथ में लेकर कट्टरवाद और उग्रवाद की इस्लामिक अवधारणा का अनुकरण नहीं किया जा सकता। मेरा यह स्पष्ट मत है कि आतंकवाद को सिर्फ कुचला ही जा सकता है चाहे वह बुद्धिजीवियों द्वारा कराया जाये अथवा भावना प्रधान लोगो द्वारा किया जाये। आतंकवादियों से बात करने या उनके हृदय परिवर्तन की वकालत करने वाले लोगो का या तो प्रशासनिक या कानून स्तर पर कोई इलाज हो अथवा इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाये। पूरी र्निममता से आतंकवाद को नष्ट करना चाहिये। उग्रवाद को रोकने के लिये कानून के अनुसार भय और दंड का सहारा लिया जा सकता है किन्तु आतंकवाद और उग्रवाद का प्रारंभ कट्टरवाद से होता है यदि कट्टरवाद को ही प्रारंभ में नियंत्रित करने का प्रयास हो तो ’’न रहेगा बांस न बजेगी बासुरी’’। आतंकवाद को तो सिर्फ सरकार ही कुचल सकती है और उग्रवाद के लिये भी कानून का सहारा लेना पडेगा किन्तु कट्टरवाद को न कोई सरकार रोक सकती है न कानून। कट्टरवाद सिर्फ समाज ही रोक सकता है और समाज की पहली इकाई है परिवार। इसलिये किसी भी रूप में कट्टरवाद को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिये चाहे वह धार्मिक कट्टरवाद हो अथवा राष्ट्रीय। वर्तमान समय में पूरी दुनियां और विशेषकर भारत के लिये आतंकवाद सबसे बडी समस्या है। इसमें भी मुस्लिम आतंकवाद सबसे उपर है। हमारी राजनैतिक व्यवस्था को इसे प्राथमिक समस्या मानकर और अधिक सक्रिय होना चाहिये जिससे आम शांति प्रिय लोगों का धैर्य टूटने न लगे। अभी न्यूजीलैंड की घटना ऐसे धैर्य टूटने का प्रत्यक्ष उदाहरण है। मानवता और भाईचारा के नाम पर आतंकवाद को कुचलने में किसी भी प्रकार की कमजोरी बडे संकट का रूप धारण कर सकती है। विश्व को भी सतर्क होना चाहिये और भारत को भी। भारत को शरणार्थी समस्या पर मानवता की जगह आतंकवाद नियंत्रण को अधिक प्राथमिकता देनी चाहिये।

मंथन क्रमांक 127 ’’सर्वोत्तम संभव का सिद्धान्त’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 16, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

आदर्शवाद और व्यावहारिकता बिल्कुल भिन्न-भिन्न होते है। आदर्श का अर्थ होता है क्या करना उचित है और व्यावहारिकता का अर्थ होता है कि क्या होना आसान है। उच्च आदर्श अव्यावहारिक हो सकता है और किसी भी व्यक्ति को असफल बना सकता है। उच्च व्यावहारिकता व्यक्ति को पतित बना सकती है और सफलता के कीर्तिमान बना सकती है। सर्वोत्तम का सफल होना कभी संभव नहीं होता और जो आसानी से होना संभव है, वह सर्वोत्तम नहीं हो सकता क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की सोच नीयत और क्षमता अलग-अलग होती है। चाहे आदर्श हो अथवा व्यवहार कोई भी कभी भी व्यक्तिगत नहीं हो सकता। एक से अधिक व्यक्ति जुडते ही है इसलिये सबके तरीके और परिणाम अलग-अलग होते है।
व्यक्ति दो प्रकार होते है-1. बुद्धि प्रधान और 2. भावना प्रधान। बुद्धि प्रधान व्यक्ति व्यावहारिक अधिक होते है और सैद्धांतिक कम। दूसरी ओर भावना प्रधान व्यक्ति आदर्शवादी अधिक होते है, व्यावहारिक कम। इस प्रकार के लोगो को व्यावहारिकता सिखाने के लिये संस्कारित किया जाता है और संस्कार ही आदर्श को व्यावहारिकता से तालमेल की ट्रेनिंग देता है। दुनियां की सभी व्यवस्थाओं में भारतीय सामाजिक व्यवस्था एक मात्र ऐसी रही है जिसमें वर्ण व्यवस्था के माध्यम से आदर्श और व्यवहार के सामन्जस्य का प्रयास किया गया। मार्गदर्शक अर्थात ब्राह्मण आदर्श की ट्रेनिंग देते थे तो अन्य तीन रक्षक, पालक और सेवक अर्थात क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उस आदर्श के साथ व्यावहारिकता का तालमेल करके उसे प्रयोग में लाते थे। आदर्श और व्यवहार का वर्ण व्यवस्था में अच्छा तालमेल था। जब वर्ण व्यवस्था विकृत हुयी और उसकी जगह कोई अधिक अच्छी व्यवस्था नहीं आ सकी तब आदर्श और व्यवहार का तालमेल टूट गया। परिणाम हुआ कि आदर्शवादी लोग अपने जीवन में अव्यावहारिक होकर असफल होने लगे तो उच्च व्यावहारिक लोग अपने जीवन में आदर्श को त्याग कर सफलता की सीढ़ियां चढने लगे। स्पष्ट है कि आदर्श कमजोर होकर पुरानी किताबो तक सीमित हो गया और व्यावहारिक धरातल से दूर हो गया। वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को किसी संशोधित स्वरूप में जीवित करना कठिन कार्य है इसलिये आपातकाल समझकर प्रत्येक व्यक्ति को आदर्श और व्यवहार के बीच संतुलन बनाने के लिये सर्वोत्तम संभव का मार्ग सीखना चाहिये। सर्वोत्तम का प्रयास व्यक्ति को जीवन में असफल कर देता है और अधिकतम संभव का प्रयास पतित इसलिये सर्वोत्तम संभव का मार्ग अपनाना चाहिये। इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति को अपनी योग्यता और क्षमता का आँकलन करके उसके अनुसार अपना लक्ष्य बनाना चाहिये लेकिन लक्ष्य आदर्श के साथ जुडा हुआ भी होना चाहिये।
मैं देखता हूॅ कि उच्च आदर्श वाले लोग समाज से अलग थलग होते जा रहे है और समाज में समस्याएं पैदा कर रहे हैं क्योकि ऐसे उच्च चरित्रवान लोग स्वयं को छोडकर अन्य सबको चरित्र हीन मानते है, उन्हें उच्च आदर्शवादी बनने की प्ररेणा देते है और ऐसा व्यक्ति क्षमता न होने के कारण उस प्रयास में या तो असफल हो जाता है या उसके विरूद्ध हो जाता है। ये उच्च चरित्रवान लोग वर्तमान स्थिति का ठीक से आँकलन नहीं कर पाते। यदि कोई सिद्धांत व्यावहारिक ना हो तो वह घातक होता है इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह वर्तमान स्थिति में सर्वोत्तम संभव अर्थात बेस्ट पासिबुल के आधार पर नीति निर्धारण करे। इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप लक्ष्य चाहे जितना उॅचा रखे किन्तु कार्य योजना बनाते समय परिस्थितियों और अपनी क्षमता का आँकलन करके अल्पकालिक योजना बनावें, उस योजना की समीक्षा करे और उसे समय-समय पर संशोधित भी करते रहेे। अव्यावहारिक लक्ष्य बनाना उचित नहीं होता इसलिये आदर्श और व्यवहार का तालमेल होना चाहिये।
मैंने अपने जीवन में बहुत बाद में इस सर्वोत्तम संभव का महत्व महसूस किया। प्रारंभ में मैंने उच्च आदर्शवादी विचारों को सक्रिय करने का प्रयत्न किया। उस समय संचार माध्यमों का अभाव था और मैं नहीं समझ पाया कि पूरी दुनियां या भारत का सैद्धांतिक धरातल कितना नीचे चला गया है। मैंने अपने छोटे से परिवार और शहर पर उच्च आदर्शवादी नीतियां लागू करने का प्रयत्न किया। परिवार पर तो प्रभाव पडा किन्तु शहर पर प्रभाव क्षणिक ही हुआ और वह प्रयत्न आगे नहीं बढ सका। मैंने शहर में जाति प्रथा को तोडने का प्रयास किया तथा मेरे द्वारा अपराध नियंत्रण के लिये भी बहुत प्रयास किया गया। हडताल और दवाब से चंदा रोका गया। साम्प्रदायिक कटुता को भी रोका गया। वहां लोगो ने भरपूर साथ दिया। ऐसा लगने लगा कि हमारा यह प्रयत्न बहुत अधिक सफल हो सकता है किन्तु इस प्रयत्न को जितना ही ज्यादा आदर्शवाद की दिशा में बढाने की कोशिश हुई उतना ही अधिक यह प्रयत्न अव्यावहारिक होता चला गया। अब स्थिति यह है कि सारे प्रयत्न धीरे धीरे फिर सैद्धांतिक और आदर्शवादी धरातल से दूर होते जा रहे है फिर से वहीं बुराईयां शुरू हो रही है जिन्हे रोकने का प्रयास हुआ। महसूस किया गया कि उच्च आदर्शवादी लक्ष्य यदि अव्यावहारिक हो तो दीर्घकालिक परिणाम नहीं दे सकते इसलिये मैंने निष्कर्ष निकाला कि प्रत्येक व्यक्ति को आदर्श और उसकी सफलता की संभावनाओं के साथ तालमेल करके ही किसी कार्य की योजना बनानी चाहिये। उच्च आदर्शवादी बाते प्रवचन व उपदेश के लिये तो उपयोगी हो सकती है किन्तु व्यावहारिक धरातल पर उतारना कठिन कार्य है। आमतौर पर लोग दूसरों की समीक्षा न करके आलोचना अधिक करते है और बिना आवश्यकता के सलाह देते है। प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और परिस्थितियां अलग अलग होती है। आप अपनी क्षमतानुसार आँकलन करके दूसरो की आलोचना करें, यह अव्यावहारिक और अनुचित है इसलिये इससे बचना चाहिये।
इस संबंध में हम सब साथी मिलकर एक नया प्रयत्न कर रहे है। ज्ञान यज्ञ के माध्यम से हम प्रयत्न कर रहे है कि व्यक्ति की स्वयं की उचित अनुचित के बीच निर्णय करने की क्षमता बढे। बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान के माध्यम से हम प्रयत्न कर रहे है कि कुछ निश्चित विषयों पर कुछ अच्छे विचारकों की एक टीम बने जो सिर्फ विचार मंथन तक सीमित रहे। दोनों आधार पर देश भर में प्रयत्न जारी है।

मंथन क्रमांक 126 ’’ सहजीवन और सतर्कता’’–बजरंग मुनि

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स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है और सहजीवन उसकी सामाजिक मजबूरी। स्वतंत्रता सबकी समान होती है। स्वतंत्रता की सीमा प्राकृतिक रूप से बनी हुयी है। कोई भी अन्य व्यक्ति या व्यवस्था किसी अन्य की सहमति के बिना उसकी कोई सीमा नहीं बना सकता। सामाजिक जीवन प्रत्येक व्यक्ति की मजबूरी है। इसी मजबूरी के अन्तर्गत पहली इकाई परिवार बनती है और उसके बाद ग्राम सभा, प्रदेश, राष्ट्र आदि। किसी अन्य व्यक्ति के साथ जुड़ते ही स्वतंत्रता अपने आप सामूहिक और सीमित हो जाती है। सहजीवन के लिये बनने वाली सामाजिक इकाई के रूप में परिवार पहली इकाई है। वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था के अनुसार अधिकांश परिवार प्राकृतिक रूप से चलते रहते है और विशेष परिस्थिति में मत विभिन्नता होने पर टूटकर अलग होते है। कभी-कभी ही अलग-अलग लोग आपस में सहमत होकर परिवार बनाते है।

सफलतापूर्वक सहजीवन का निर्वाह करना आमतौर पर कठिन होता है क्योंकि व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि उसे दूसरे व्यक्ति के साथ किस सीमा तक, किस तरह व्यवहार करना चाहिये। दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव, गुण-अवगुण और अच्छी- बुरी नीयत का निर्णय आसान नहीं होता इसलिये यह निर्णय और भी कठिन हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता भी समान नहीं होती इसलिये भी उसे सही निर्णय करने में कठिनाई होती है। फिर भी यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी अन्य के साथ व्यवहार करते समय कुछ बातों का ध्यान रखे। सामान्यतया सम्बन्ध आठ प्रकार के माने जाते है- 1. सहभागी 2. सहयोगी 3. समर्थक 4. प्रशंसक 5. समीक्षक 6. आलोचक 7. विरोधी 8. शत्रु। 1. सहभागी व्यक्ति वह होता है जो आपकी पूरी सफलता-असफलता या लाभ-हानि में बराबर का भागीदार होता है। आपका और उसका सबकुछ सामूहिक होता है, किसी का कुछ व्यक्तिगत नहीं होता। इस श्रेणी में आमतौर पर परिवार को माना जाता है। 2. सहयोगी उस व्यक्ति को माना जाता है जो आपके किसी कार्य में सक्रिय सहयोग तो करता है किन्तु लाभ-हानि में हिस्सेदार नहीं होता। आमतौर पर सहयोगी संगठन से बाहर का व्यक्ति या सदस्य होता है। 3. समर्थक वह व्यक्ति होता है जो आपके किसी कार्य का बाहर रहकर सिर्फ मौखिक समर्थन करता है, सक्रिय सहयोग नहीं करता। 4. प्रशंसक वह व्यक्ति माना जाता है जो आपके अच्छे कार्याे की प्रशंसा करता है किन्तु आप यदि गलती करते है या बुरा करते है तब वह व्यक्ति चुप रहता है। इसी तरह आपका कोई कार्य जनहित में है तब प्रशंसक की भूमिका अलग होती है और सक्रिय होती है किन्तु यदि वह कार्य जनहित के विरूद्ध है तब प्रशंसक उसमें चुप हो जाता है। यदि आपका कोई कार्य गलत भी है तो सहभागी उसे कुछ झूठ बोलकर, तोड़ मरोड़ कर सही सिद्ध कर देता है। सहयोगी सिर्फ घुमाफिराकर अर्थ बदल देता है। समर्थक और प्रशंसक ऐसी गलती के मामले में प्रायः चुप हो जाते है। 5. समीक्षक उस व्यक्ति को कहते है जो आपके बिल्कुल भी पक्ष या विपक्ष में नहीं होता है। वह व्यक्ति पूरी तरह तटस्थ होता है और गुण-अवगुण, अच्छे-बुरे की तटस्थ समीक्षा करता है। 6. आलोचक वह होता है जो आपके अच्छे कार्यो में तो चुप हो जाता है और गलत कार्यो को समाज के समक्ष जैसा है, वैसा ही प्रस्तुत करता है। आलोचक किसी घटना को घुमाफिराकर अथवा तोड़ मरोड़ कर प्रस्तृत नहीं करता। 7. विरोधी वह व्यक्ति होता है जो आपके गलत कार्यो को तो गलत कहता ही है किन्तु सही कार्यो को भी घुमाफिराकर अथवा तोड़ मरोड़ कर गलत सिद्ध करने का प्रयास करता है किन्तु विरोधी किसी मामले में भी झूठ नहीं बोलता। 8. शत्रु वह होता है जो आपके विषय में किसी प्रकार का झूठ बोल सकता है। शत्रु उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय की परवाह नहीं करता। इस तरह व्यक्तियों में आठ प्रकार की भूमिकाएं होती है। आमतौर पर कोई व्यक्ति इस तरह अलग-अलग ना समझने के कारण भ्रम में पडकर गलत निर्णय कर लेता है और उसका उसे नुकसान होता है। बुद्धि प्रधान लोग प्रायः गलत आँकलन नही करते किन्तु भावना प्रधान लोग प्रायः गलत आँकलन करते है। मैंने कई लोगों को देखा है जो सामान्यतया मित्र के साथ भाई जैसा पारिवारिक व्यवहार रखते है किन्तु वे किसी एक जरा सी बात पर इतनी जल्दी नाराज हो जाते है कि उसे शत्रुवत मान लेते है। होना तो यह चाहिये कि किसी को मित्र अथवा भाई के समान मानने के पूर्व लम्बे समय तक उसका व्यावहारिक परीक्षण किया जाये और सम्बन्ध बिगड़ते समय भी उस गलत व्यवहार की गंभीरता से क्रमशः आँकलन किया जाये। भावना में बहकर जल्द बाजी में लिये गये निर्णय हमेशा घातक होते है। सोच समझकर निर्णय करना चाहिये और धीरे-धीरे व्यक्ति के साथ व्यवहार में उपर नीचे का बदलाव करना चाहिये। एकाएक या जल्दबाजी में नहीं।

मैंने स्वयं इन स्थितियों में धीरे-धीरे आँकलन करने की आदत डाली। परिणाम हुआ कि मुझे अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में बहुत ही कम लोगों के विषय में अपनी धारणाओं में बहुत अधिक बदलाव करना पडा। यदि बदलाव भी किया गया तो बदलाव बहुत धीरे-धीरे किया गया और सोच समझकर किया गया। मेरी राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक मामलों में अनेक प्रमुख लोगों के विषय में निश्चित धारणा रही है। इसी तरह ऐसे सिद्धान्तों पर भी और ऐसी घटनाओं पर भी मैं निश्चित प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहा हूॅ जो दो-तीन दशकों से लगातार ज्ञान तत्वों में प्रकाशित होती रही है। धार्मिक मामलों में, मैं हिन्दुत्व का पूरी तरह समर्थक रहा हूॅ। इसाईयत का समीक्षक, इस्लाम का विरोधी तथा साम्यवाद को शत्रुवत मानता रहा हूॅ। मेरे विचार से साम्यवाद में एक भी ऐसा गुण नहीं है जिसके कारण उसे शत्रु से अलग किया जाये। हिन्दुओं में भी मैं संघ परिवार, शिवसेना आदि का आलोचक रहा हूॅ। संघ परिवार में अनेक अच्छाईयां होते हुये भी गांधी हत्या के विषय में उनकी धारणा से मुझे बहुत विरोध है। मैं पूरी तरह गांधी का प्रशंसक हूॅ और किसी भी स्थिति में गांधी हत्या को हिन्दुत्व के विरूद्ध समझता हूॅ इसलिये मेरे मन से यह धारणा बिल्कुल नहीं निकल पाती है। राजनैतिक आधार पर मैं मनमोहन सिंह, नीतिश कुमार, नरेन्द्र मोदी, अखिलेश यादव, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंदन, बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटटाचार्य, ए.के. एंटोनी, शांता कुमार, शिवराज सिंह चैहान, रमन सिंह, खंडूरी, बाबूलाल मरांडी आदि को अच्छे राजनीतिज्ञों में गिनता हूॅ और इनका प्रशंसक हूॅ। दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती, मुलायम सिंह यादव, प्रकाश करात, ममता बनर्जी, शिब्बू सोरेन, नवजोत सिंह सिद्धू का मैं हमेशा से आलोचक हॅॅू। इसी सूची से करूणा निधि, जय ललिता आदि की मृत्यु के कारण उनके नाम निकाल दिये गये है। इन सब के बाद भी मैं वर्तमान परिस्थितियों में व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी को सबसे अच्छा मानता हॅू किन्तु उन्हें किसी भी परिस्थिति में दस से पंद्रह वर्ष सत्ता के पदों पर जाने के पूरी तरह विरूद्ध हॅू क्योंकि राहुल गांधी में कुटनीतिक दूरदर्शिता का अभाव है तथा राहुल गांधी का आगे बढना एक पारिवारिक गुलामी का आभाष कराता है, योग्यता का नहीं। इसी तरह सत्ता के मामले में नरेन्द्र मोदी को एक मात्र सफल व्यक्तित्व मानता हूॅ और वर्तमान समय में, मैं उनका पूरी तरह पक्षधर हूॅ। मैं तानाशाही, लोकतंत्र और लोकस्वराज्य का अंतर समझता हॅू। व्यवस्था का अंतिम पडाव या तो तानाशाही है या लोकस्वराज्य। लोकतंत्र बीच की सीढी है। यदि लोकतंत्र लम्बे समय तक चलेगा तो अव्यवस्था निश्चित है और अव्यवस्था का एक मात्र समाधान है तानाशाही। मनमोहन सिंह लोकतंत्र के आधार पर चले जिसका परिणाम हुआ अव्यवस्था और अव्यवस्था का परिणाम हुआ तानाशाही की भूख अर्थात नरेन्द्र मोदी। इसलिये वर्तमान अव्यवस्था का एक मात्र समाधान नरेन्द्र मोदी ही दिखते है। यदि स्वतंत्रता के समय के राजनेताओं का आँकलन करे तो मैं सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद आदि के मार्ग को ठीक नहीं मानता क्योंकि मैं गांधी मार्ग का पक्षधर हूॅ। संघ परिवार ने भी स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के शीघ्र बाद जिस तरह राजनीति में हस्तक्षेप किया वह अच्छा नहीं था। संघ परिवार की तुलना में आर्य समाज की भूमिका अच्छी थी। स्वतंत्रता के बाद जो लोग सत्ता में आये उनमें सबसे अधिक गलत भूमिका भीम राव अम्बेडकर की रही है। यही कारण है कि मैं हमेशा उनका विरोधी रहा। नेहरू, सरदार पटेल आदि की भी भूमिका स्वतंत्रता के बाद बहुत अच्छी नहीं रही है। इन लोगों ने जिस तरह का संविधान बनाकर दिया उसे देखते हुये मैं हमेशा इनका आलोचक रहा हूॅ। इन सबकी गलतियों के कारण ही समाज में अव्यवस्था भी फैली और वर्ग संघर्ष भी। इन लोगों ने मिलजुलकर जयप्रकाश नारायण, डाॅ राममनोहर लोहिया जैसे लोगो को किनारे कर दिया। मैं राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण का समर्थक रहा हूॅ। सामाजिक मामलों में भी मैं समाज सुधार के लिये कानून के हस्तक्षेप को घातक मानता रहा हूॅ। समाज की बुराईयाॅ दूर करना समाज का काम है राज्य का नहीं। कानून को सुरक्षा और न्याय तक सीमित रहना चाहिये इसलिये मैं किसी भी सरकार द्वारा छुआछूत उन्मूलन, गरीबी अमीरी रेखा, शराब बंदी, गो हत्या पर प्रतिबंध, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा विस्तार जैसे प्रयत्नों का आलोचक रहा हूॅ। मैं हिन्दू धर्म व्यवस्था का बहुत अधिक प्रशंसक हूॅ क्योंकि हिन्दुओं में परिवार व्यवस्था, पहचान प्रधान की जगह गुण प्रधान धर्म को महत्व, धर्म परिवर्तन के प्रयत्नों का विरोध तथा वर्ण व्यवस्था को अन्य सब की तुलना में बहुत अच्छा मानता हॅू। यद्यपि कानून के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण ये व्यवस्थाएं कुछ-कुछ विकृत हो गई हैं जिन्हें ठीक करना चाहिये। व्यक्ति को जीवन में सफल होने के लिये इस प्रकार की ट्रेनिंग होनी चाहिये कि वह प्रत्येक व्यक्ति के विषय में ठीक ठीक आँकलन कर सके। मैं महसूस करता हूॅ कि जीवन में सफलता के लिये समाज को सर्वोच्च मानना चाहिये। इसके लिये प्रत्येक व्यक्ति में सहजीवन की ट्रेनिंग होनी चाहिये और सहजीवन की ट्रेनिंग का प्रारंभ परिवार से ही हो सकता है जिससे व्यक्ति धीरे-धीरे अन्य व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार उसके साथ अपने सम्बन्धों की सीमाएं निर्धारित करने की आदत डाल सके। यह अंतर ना समझने के कारण ही समाज में अव्यवस्था फैलती है। आमतौर पर अच्छे लोगो में यह कमी होती है कि वे अन्य व्यक्तियों के विषय में कुछ व्यक्तिगत धारणाएं बना लेते है। यदि उनकी दृष्टि में कोई बहुत अच्छा आदमी है और वह थोडी सी गलती कर दे तो यह अच्छे लोग उसके आलोचक हो जाते है। दूसरी ओर यदि कोई बहुत बुरा आदमी थोडा सा अच्छा काम कर दे तो ये प्रशंसक हो जाते है। यदि अच्छे लोगो की समझदारी बढ जाये तो ऐसी गलती नही होगी। इसलिये मेरा यह मत है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी धारणा निश्चित करने के पूर्व समझदारी बढनी चाहिये।

जो लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे सम्पर्क में रहते है उन्हें यदि आठ आधारों पर विभाजित करके हम व्यवहार निष्चित करेंगे तो हमें बहुत सुविधा होगी। जो लोग हमारे प्रशंसक, समर्थक, सहयोगी या सहभागी है उनकी कभी सार्वजनिक आलोचना नही करनी चाहिये। ऐसे लोगो पर कभी व्यक्तिगत टिप्पणी से भी बचना चाहिये। जो लोग हमारे शत्रु या विरोधी है उन्हें बिना मांगे सलाह नहीं देनी चाहिये। इसी तरह आलोचक, विरोधी या शत्रु से किसी विषय पर अकेले में तर्क नहीं करना चाहिये तथा सार्वजनिक रूप से भी तर्क करते समय सर्तक रहना चाहिये। इस तरह की अनेक सावधानियां संकट से बचा सकती है।

मंथन क्रमाॅक 125 ’’न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सीमाएं’’–बजरंग मुनि

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दुनियां की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था आदर्श सामाजिक व्यवस्था से बहुत अलग है। आदर्श व्यवस्था में समाज सबसे उपर होता है और राष्ट्र या धर्म सहायक। वर्तमान में समाज से भी उपर राष्ट्र और धर्म बन गये है। यह दूरी बढती जा रही है। आदर्श व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता प्राकृतिक रूप से समान होती है। इसकी सीमा कोई अन्य नहीं बना सकता। इस स्वतंत्रता की सुरक्षा ही न्याय है। न्याय देना सम्पूर्ण मानव समाज का दायित्व है। वर्तमान स्थिति में राज्य न्याय को परिभाषित करने लगा है तथा राज्य ही व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं भी बनाने लगा है। आदर्श व्यवस्था में पूरी दुनियां का एक संविधान होना चाहिये जिसमें दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका हो। प्रत्येक व्यक्ति को सर्वप्रथम विश्व नागरिक होना चाहिये। वर्तमान समय मेें दुनियां का ऐसा कोई संविधान नहीं बना है ना ही प्रत्येक व्यक्ति को विश्व नागरिकता प्राप्त है। वर्तमान समय में राष्ट्र संप्रभुता सम्पन्न इकाई है और विश्व व्यवस्था राष्ट्रो की सहमति असहमति पर निर्भर करती है।

भारत भी वर्तमान विकृत समाज व्यवस्था के अंतर्गत एक संप्रभुता सम्पन्न राष्ट्र है जिसे अपना संविधान बनाने एवं क्रियान्वित करने की अनियंत्रित स्वतंत्रता है। आवश्यक है कि हम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सीमाओं की चर्चा भारत की वर्तमान व्यवस्था तक सीमित रहकर करें। भारत में लोकतंत्र है जिसका अर्थ होता है न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका का समन्वित स्वरूप। संविधान के अनुसार तीनों के कार्य इस प्रकार अलग-अलग बंटे हुये हैं कि सबके अधिकार तथा हस्तक्षेप बराबर हों। विधायिका न्याय को परिभाषित कर सकती है, न्यायपालिका उक्त परिभाषा के अनुसार न्याय की समीक्षा करके न्याय अन्याय को अलग अलग करती है और कार्यपालिका न्यायिक समीक्षा के आधार पर क्रियान्वयन करती है। प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी ही न्याय है और यह प्राकृतिक अधिकार सिर्फ स्वतंत्रता तक सीमित होता है इसलिये न्यायपालिका को एक विशेषाधिकार दिया गया है कि यदि विधायिका द्वारा किया गया कोई संविधान संशोधन व्यक्ति की प्राकृतिक स्वतंत्रता के विरूद्ध हो तो न्यायपालिका उक्त संविधान संशोधन को अमान्य घोषित कर सकती है। अन्य किसी मामले में न्यायपालिका किसी संविधान संशोधन की समीक्षा नहीं कर सकती।

जिस तरह व्यक्ति को प्रकृति प्रदत्त स्वतंत्रता प्राप्त है उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को सहजीवन अपनाने की बाध्यता भी है। इस बाध्यता को क्रियान्वित कराना विधायिका का काम है और कार्यपालिका तदनुसार क्रियान्वित करती है। इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई व्यक्ति अपनी सीमाएं तोडता है तो विधायिका और कार्यपालिका मिलकर उसे दंडित कर सकते है जिससे वह अपनी सीमाएं ना तोड सके। विधायिका इस मामले में संविधान संशोधन करती है और न्यायपालिका उसकी तब तक समीक्षा नहीं कर सकती जब तक वह संशोधन व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के विरूद्ध ना हो। इस प्रकार संविधान के अनुसार न्यायपालिका की सीमाएं भी निश्चित हैं। भारत में लोकतंत्र है और इसलिये व्यक्ति से राज्य तक के बीच में प्रशासन की विभिन्न सीढियां बनी हुयी है। इसका अर्थ हुआ कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका संविधान के अनुसार कार्य करने के लिये बाध्य हैं। विधायिका भी संविधान के अनुसार ही कानून बना सकती है और कार्यपालिका कानून के अनुसार ही कार्य कर सकती है, कानून से हटकर नहीं। कार्यपालिका का कोई भी अधिकार प्राप्त व्यक्ति कानून से हटकर कोई आदेश नहीं दे सकता और कोई व्यक्ति बिना आदेश के कार्य नहीं कर सकता। यदि विधायिका या कार्यपालिका की कोई भी इकाई अपनी सीमाओं को तोडती है तो न्यायपालिका उसकी समीक्षा करके उसे अपनी सीमा में रहने के लिये बाध्य कर सकती है। इसका अर्थ हुआ कि संविधान समीक्षा के साथ-साथ संविधान के द्वारा न्यायपालिका को यह दायित्व भी दिया गया है कि संविधान के विरूद्ध बनने वाले किसी कानून, कानून के विरूद्ध पारित किसी प्रकार के आदेश तथा आदेश के विरूद्ध की जाने वाली किसी क्रिया को अलोकतांत्रिक घोषित करके उस क्रिया को रोक सके। न्यायपालिका ऐसे आदेश को गैरकानूनी घोषित कर सकती है किन्तु कोई नया आदेश नहीं दे सकती। कोई नया आदेश विधायिका ही दे सकती है।

जब भारत का संविधान बना तो संविधान भारतीय चिंतन मनन से दूर हटकर विदेशों की नकल मात्र था इसलिये उसमें कुछ कमजोरियां रह गयी । इन कमजोरियों का लाभ उठाकर न्यायपालिका और विधायिका ने समय समय पर अपनी मनमानी करने की कोशिश की। यह कोशिश सर्वप्रथम विधायिका के द्वारा शुरू की गयी जब संविधान बनने के दो वर्ष बाद ही पंडित नेहरू के नेतृत्व में संविधान संशोधन करके न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर कर दिया गया। उसके बाद संविधान संशोधन करके कार्यपालिका के प्रमुख राष्ट्रपति के भी अधिकार सीमित कर दिये गये। सन् 1973 में न्यायपालिका ने असंवैधानिक तरीके से स्वयं को विधायिका के समकक्ष स्थापित किया। 1975 में इंदिरा गांधी ने फिर से तानाशाही थोपने का प्रयास किया जो 1977 में विफल हो गया। लगभग दस वर्ष बाद न्यायपालिका ने असंवैधानिक तरीके से विधायिका को और कमजोर करना शुरू किया जनहित याचिका सुनना या काॅलेजियम सिस्टम बनाना इसी तरह का प्रयास रहा है और न्यायपालिका का यह प्रयत्न 2012 तक निरंतर जारी रहा। 2012 के बाद विधायिका सक्रिय हुयी और नरेन्द्र मोदी के आने के बाद विधायिका न्यायपालिका से अप्रत्यक्ष टकराव में शामिल हो गयी। यह टकराव निरंतर जारी है। न्यायपालिका स्वयं को सर्वोच्च समझती है क्योंकि उसे संविधान के विभिन्न प्रावधानों की समीक्षा का सर्वोच्च अधिकारी मान लिया गया है। दूसरी ओर विधायिका अपने को संविधान संशोधन की सर्वोच्च अधिकार सम्पन्न इकाई मानती है। वर्तमान समय में न्यायपालिका इस सम्बन्ध में लगभग एकजुट है किन्तु विधायिका अन्य टकरावों के कारण न्यायपालिका से सम्बन्धों को विशेष महत्व नहीं दे रही है इसलिये यह टकराव अभी प्रत्यक्ष संघर्ष न होकर शीत युद्ध टिका हुआ है। न्यायपालिका को बहुत विशेष परिस्थिति को छोडकर कभी भी विधायी या कार्यपालिक आदेश नहीं देने चाहिये लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत की न्यायपालिका दिन रात केवल विधायी और कार्यपालिक आदेश पारित करने में ही सक्रिय रहती है।

जनहित क्या है इसको सिर्फ विधायिका ही परिभाषित कर सकती है न्यायपालिका नहीं क्योंकि न्यायपालिका व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा तक ही सीमित है। सुरक्षा के अतिरिक्त न्यायपालिका व्यक्ति के हित की कोई चिंता नहीं कर सकती। व्यक्ति के हित की चिंता व्यवस्था का काम है, न्यायपालिका का नहीं। इसका अर्थ हुआ कि न्यायपालिका को जनहित की याचिकाएं सुनने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायपालिका अर्थात न्यायाधीशों को जनहित याचिका के माध्यम से अपनी वरीयता सिद्ध करने में आंनद आने लगा और उसका परिणाम हुआ कि न्यायपालिका के अपने सारे कार्य पिछडते चले गये। कितनी खराब स्थिति है कि न्यायपालिका राष्ट्रपति को निर्देश देती है कि फांसी की सजा का निर्णय अधिकतम किस समय सीमा में किया जाये या प्रधानमंत्री कितने महिनों तक किसी फाइल को रोककर रख सकते है। उन्हीं न्यायाधीशों ने कभी यह सीमा नहीं बनायी कि न्यायपालिका द्वारा किसी गंभीर आपराधिक मामले में निर्णय देने की समय सीमा क्या हो। आपराधिक मामले जीवन पर्यन्त चलते रहें और न्यायालय जनहित की चिंता करता रहे। यह धारणा जनहित के विरूद्ध है लोकतंत्र के भी विरूद्ध है और संविधान की मूल भावना के भी विरूद्ध है। न्यायपालिका की उच्श्रृंखलता वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने में महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हो रही है। अब तक जो कुछ भी हुआ उसे हम भूल जायें। विधायिका ने 70 वर्ष पूर्व गलतियां की उसे भी भूल जाने की आवश्यकता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि विधायिका की गलतियाें का लाभ उठाकर न्यायपालिका तानाशाही की ओर बढना शुरू कर दे। भारत की जनता न किसी अव्यवस्था को स्वीकार करेगी न तानाशाही को। न्यायपालिका समाज में निरंतर यह विचार फैला रही है कि यदि विधायिका गलती करेगी तो न्यायपालिका का उसे रोकने के लिये आगे आना उसकी मजबूरी है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। सबसे उपर भारत की जनता है, विधायिका से भी उपर, न्यायपालिका से भी उपर और संविधान से भी उपर। विधायिका से उपर न्यायपालिका तो कभी हो ही नहीं सकती क्योंकि विधायिका की गलतियाें के लिये पांच वर्ष में समाज समीक्षा कर सकता है किन्तु यदि न्यायपालिका ने गलती कर दी तो उसकी समीक्षा कौन कर सकता है। उसकी समीक्षा न विधायिका कर सकती है न मतदाता। सन् 1975 में जब भारत में तानाशाही आयी थी तथा न्यायपालिका ने भी विधायिका और कार्यपालिका के समक्ष सरेन्डर कर दिया था तब भारत की जनता आगे आयी थी इसलिये न्यायपालिका को गंभीरतापूर्व अपनी सीमाओं को समझना चाहिये। यदि कहीं समाज को न्यायपालिका के विरूद्ध खडा होना पडा तो वह ज्यादा बुरा कालखंड होगा।

अंत में मेरा सुझाव है कि न्यायपालिका और विधायिका अपनी अपनी संवैधानिक सीमाओं को समझे और सर्वोच्च बनने के प्रयत्न से अपने को दूर कर लें। संविधान सर्वोच्च है और संविधान पर नियंत्रण के कोई भी प्रयास अनुचित माने जायेंगे, चाहे वे विधायिका के द्वारा किये जायें या न्यायपालिका के द्वारा।

मंथन क्रमांक-124 ’’मनरेगा कितना समाधान कितना धोखा’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 23, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ हजार वर्षों का विश्व इतिहास बताता है कि दुनियां में बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए नये-नये तरीकों का उपयोग किया। श्रम शोषण के लिए ही पश्चिम के देशों ने पूंजीवाद को महत्त्व दिया तो भारतीय उपमहाद्वीप ने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को हटाकर जन्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था को मजबूत किया। श्रम शोषण के पश्चिमी तरीको का लाभ उठाकर साम्यवाद दुनियां में मजबूत हुआ तो भारत की जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को मनुवाद नाम देकर अम्बेडकर ने इसका लाभ उठाने की पूरी कोशिश की। साम्यवाद बहुत तेजी से बढ़ा और असफल हो रहा है। अम्बेडकर वाद अब तक भारतीय समाज व्यवस्था को ब्लैकमेल कर रहा है। आज भी भारत की संपूर्ण राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी के विरुद्ध बुद्धिजीवी शहरी पूंजीपतियों का एकाधिकार है। सब प्रकार की नीतियां ये लोग बनाकर गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों पर थोप देते है।

भारत में पहली बार इस एकाधिकार पर अंकुश लगाने का ईमानदार प्रयास 2005 में हुआ जिसे नरेगा का नाम दिया गया। इस योजना के अंतर्गत देश के किसी भी परिवार के एक सदस्य को न्यूनतम वर्ष में 100 दिन रोजगार गारंटी दी गई थी। इसके अंतर्गत जाति, धर्म का भेद नहीं था, महिला पुरुष का भेद नहीं था, व्यक्ति के स्थान पर परिवार इकाई बनाया गया था। इसी तरह भारत में पहली बार शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से अलग किया गया। नरेगा योजना को शारीरिक श्रम तक सीमित किया गया। सन् 2005 में श्रम मूल्य 60 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन निश्चित किया गया था। उद्देश्य था कि देश में रोजगार की असमानता कम हो और पिछड़े क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र में पलायन करने की मजबूरी ना हो। प्रयास पूरी तरह ईमानदारी भरा था और ईमानदारी से लागू भी किया गया था। यहां तक प्रावधान था कि यदि सरकार किसी व्यक्ति को कोई काम नहीं दे सकेगी तो उसे आंशिक रूप में बेरोजगारी भत्ता देने को बाध्य होगी। कानून लागू होने के बाद ऐसा शुरू हुआ भी। इस योजना का प्रस्ताव साम्यवादियों का था और मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी की जोड़ी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करके आगे बढ़ाया। मनरेगा योजना एकमात्र ऐसी ईमानदार कोशिश रही जो मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी के राजनैतिक ईमानदारी की प्रतीक रही। तब तक किसी अन्य ने इस दिशा में कोई योजना नहीं बनाई थी। साम्यवादी श्रम शोषण की गंभीर योजनाएं बनाने के लिए सारी दुनियां में कुख्यात हैं। साम्यवादी कभी नहीं चाहते कि श्रम का मूल्य बढे क्योंकि यदि श्रम का मूल्य बढ़ जायेगा तो साम्यवाद का किला अपने आप ध्वस्त हो जाएगा। मुझे ऐसा लगता है कि साम्यवादियों को यह उम्मीद नहीं थी कि मनमोहन, सोनिया की जोड़ी इतनी ईमानदारी से इस दिशा में आगे बढ़ जाएगी। यही सोचकर उन्होंने इस प्रस्ताव पर जोर दिया था जिसके स्वीकार होते ही उनके समक्ष संकट पैदा हुआ।

स्वाभाविक था कि साम्यवादी योजना से पीछे नहीं हट सकते थे और आगे भी बढ़ने देना उनके लिए बड़ा खतरा था इसलिए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से इस योजना को असफल करने का प्रयत्न किया। ईमानदार प्रयत्न यह होता कि न्यूनतम श्रम मूल्य जो 2005 में 60 रूपये रखा गया था उसे मुद्रास्फीति के साथ तथा कोई न्यूनतम विकास दर के साथ अपने आप बढ़ जाने की व्यवस्था होती। लेकिन कई वर्षों तक न्यूनतम श्रम मूल्य 60 रूपये ही रखा गया और उसे बढ़ाने का अधिकार भी केंद्र सरकार के पास हो गया। परिणाम हुआ कि सरकारों ने इसे मनमाने तरीके से घटाया बढ़ाया। सन् 2005 में जो न्यूनतम गारंटी मूल्य 60 रूपये था वह अविकसित क्षेत्रों की न्यूनतम मजदूरी से अधिक था। इसका अर्थ हुआ कि उस अधिक मजदूरी के कारण पिछड़े क्षेत्रों का पलायन रुका और विकसित क्षेत्रों में मजदूरों का अभाव हुआ। साम्यवादियों ने सरकार पर दबाव डालकर विकसित क्षेत्रों की मजदूरी बहुत अधिक बढ़ा दी और अविकसित क्षेत्रों की मजदूरी मुद्रा स्फीति की तुलना में भी कम बढ़ाई गई। वर्तमान समय में बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे अविकसित क्षेत्रों की मनरेगा की मजदूरी दर 170 रूपये के आसपास है। यह दर 2005 की मुद्रास्फीति के आधार पर भी कम है तथा विकास मूल्य को जोड दे तो बहुत कम है दूसरी ओर हरियाणा, पंजाब, केरल, कर्नाटक जैसे विकसित क्षेत्रों की मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी 270 रूपये के आसपास है। स्पष्ट है कि योजना के वास्तविक लाभ को असफल करने का प्रयास किया गया। प्रारंभिक योजनानुसार इस योजना को अविकसित क्षेत्रों में लागू होना था किंतु धीरे-धीरे इसे पूरे देश में लागू करने का षडयंत्र किया गया। इस योजना को धीरे-धीरे इतना बोझिल बना दिया गया कि सरकारें इसे आगे बढ़ाने में कमजोरी अनुभव करने लगी। मनरेगा का बजट असंतुलित हुआ तो वामपंथी और शिक्षा शास्त्री सरकार पर दबाव डालकर शिक्षा का बजट बढाते रहे। शिक्षा कभी रोजगार पैदा नहीं करती बल्कि रोजगार में छीना झपटी करती है। स्वाभाविक था कि श्रम की तुलना में शिक्षा का बजट बढना श्रमिक रोजगार पर बुरा प्रभाव डालता है। नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद इस षडयंत्र की समीक्षा की। होना तो यह चाहिए था कि मोदी जी इस षड्यंत्र से बचाकर इस योजना को आदर्श स्थिति से आगे बढ़ाते किंतु मोदी जी ने इस पूरी योजना को ही अवांछित श्रेणी में डाल दिया। अब ना योजना जिंदा है, ना मरी हुई है, ना योजना से लाभ है, ना कोई नुकसान है। एक ईमानदार प्रयास जो कई हजार वर्षों के बाद शुरू हुआ था वह बुद्धिजीवी, पूंजीपति षड्यंत्र का शिकार हो गया।

इस योजना के खिलाफ किस तरह के गुप्त षडयंत्र हुए इसकी भी जानकारी देना आवश्यक है। देश के प्रख्यात बुद्धिजीवियों जिनमें 1. न्यायाधीश एस0एन0 वेंकटचलैया (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश)। 2. न्यायाधीश जे0एस0 वर्मा (भारत के पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 3. न्यायाधीश वी0आर0 कृष्णा अयर (भारत के पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 4. जस्टिस पी0बी0 सावन्त (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीष)। 5. जस्टिस के रामास्वामी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीष)। 6. जस्टिस सन्तोष हेगड़े (लोकायुक्त कर्नाटक व पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 7. जस्टिस ए पी शाह (पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिल्ली उच्च न्यायालय)। 8. जस्टिस वी0एस0 दवे (पूर्व जज, राज, उच्च न्यायालय)। 9. डाॅ0 उपेन्द्र बक्षी (प्रोफेसर आफ लाॅ, दिल्ली विद्यालय)। 10. डाॅ0 मोहन गोयल (पूर्व कानून के प्रो0 लाॅ स्कूल आफ इण्डिया, बेंगलोर)। 11. फली एस नरीमन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 12. कामिनी जायसवाल (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 13. डाॅ0 राजीव धवन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 14. प्रषान्त भूषण (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 15. वृन्दा ग्रोवर (अधिवक्ता दिल्ली उच्च न्यायालय) शामिल थे। उन्होंने सरकार को इस योजना के अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावहीन करने के लिए लिखित रूप में प्रभाव डाला। स्पष्ट होता है कि यह लोग मनरेगा योजना को असफल करना चाहते थे और उनमें सफल भी हुए। इसी तरह देश के संपन्न क्षेत्रों के सांसदों की एक कमेटी बनाई गई और इस कमेटी ने गुप्त रूप से यह रिपोर्ट दी कि यदि यह योजना इसी तरह लागू रही तो अविकसित क्षेत्रों के मजदूरों का विकसित क्षेत्रों में पलायन रूक जाएगा जिसके परिणाम स्वरूप कृषि उत्पादन प्रभावित होगा। भारत सरकार ने दोनों प्रस्ताव के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से योजना को असफल कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि यदि बुद्धिजीवी संपन्न वर्ग नाराज हो जाएगा तो सरकार के राजनैतिक हितो पर उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।
मेरा यह स्पष्ट मानना है कि मनरेगा योजना गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को आत्मनिर्भर तथा स्वाभाविक रूप से जीवित रहने के प्राकृतिक अधिकार का संवैधानिक प्रयास थी। यह योजना हजारों वर्षों के बाद बनी थी किंतु फिर से अमीर बुद्धिजीवियों और शहरी लोगों ने पूरी योजना को असफल कर दिया। श्रम की मांग बढे और श्रम की मांग बढ़ने के परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढ़े यह आदर्श अर्थव्यवस्था होती है। यदि इसमें कोई दिक्कत हो तो सरकार गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को रोजगार उपलब्ध होने की गारंटी दे। न्यूनतम श्रम मूल्य का अर्थ होता है उक्त घोषित श्रम मूल्य पर रोजगार गांरटी। यदि श्रम मूल्य बढा दिया जाये और रोजगार गारंटी न हो तो श्रम मूल्य पर विपरीत प्रभाव पडता है। जो धन सरकारे इन गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को सुविधा सहायता के नाम पर देती हैं अथवा श्रम मूल्य बढाने पर खर्च करती है। वही धन यदि उन्हें स्वरोजगार के आधार पर मिले तो इसमें भ्रष्टाचार भी नहीं होगा और गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों का आत्मसम्मान भी बचा रहेगा लेकिन पूंजीवादी, बुद्धिजीवी एकाधिकार इसमें सहमत नहीं है। वह हमेशा चाहता है कि गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी का सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक शोषण करके उसका थोड़ा सा भाग इस प्रकार सुविधा के नाम पर उन्हें दे दिया जाए कि वह बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों और शहरी लोगों के मुखापेक्षी बने रहे। वे हमेशा कृतग्य रहे। मनरेगा योजना इस परिणाम में बाधक थी और सबने मिलकर इस अच्छी योजना की भ्रुण हत्या कर दी। मुझे नहीं लगता कि अब भविष्य में इस तरह की कोई नई योजना आ सकेगी अथवा इस योजना में किसी तरह का बदलाव आ सकेगा। योजना निरूउद्देश्य निष्फल हो गई है।

मंथन क्रमांक-123 ’’धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता कितना अपराध’’–बजरंग मुनि

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धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड गया। धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भारतीय व्यवस्था में धर्म परिवर्तन की कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि पहचान प्रधान धर्म तो बदल सकता है किन्तु गुण प्रधान नहीं। मेरी चर्चा का उपरोक्त विषय सिर्फ पहचान प्रधान धर्म तक सीमित है गुण प्रधान से नहीं।

पहचान प्रधान धर्म संगठन के रूप में होते हैं। यदि किसी धर्म का स्वरूप संस्थागत हो तो कोई समस्या नहीं होती किन्तु जब धर्म संगठन का रूप ग्रहण कर लेता है तब उसमें संख्यात्मक विस्तार की छीना झपटी शुरू हो जाती है। यह छीना झपटी ही घातक हो जाती है। जब तक हिन्दू धर्म संगठनात्मक स्वरूप से दूर रहा तब तक कोई टकराव नहीं आया क्योंकि हिन्दू संस्कार गुलामी सह सकता है किन्तु गुलाम बना नहीं सकता, अत्याचार सह सकता है किन्तु कर नहीं सकता, अपनों पर अत्याचार कर सकता है किन्तु दूसरों पर नहीं कर सकता, किसी को धर्म से निकाल सकता है किन्तु दूसरे को अपने धर्म में शामिल नहीं कर सकता। हिन्दुत्व को गर्व है कि उपरोक्त व्यवस्थाओं से सुसज्जित वह दुनियां का अकेला धर्म है और आज तक सब प्रकार के आक्रमणों में नुकसान उठाने के बाद भी अपनी मान्यता पर कायम है।

हिन्दू धर्म जब तक इस प्राचीन संस्कार तक सीमित रहा तब तक इस्लाम और इसाइयों की पौबारह रही। वे लोभ लालच दबाब अथवा धार्मिक कमजोरियों का लाभ उठाकर अपनी संख्या विस्तार करते रहे किन्तु जब आर्य समाज या संघ परिवार ने बाधा पैदा की तब मुसलमान हिंसा पर आ गये और अनेक आर्य विद्वानों की हत्या कर दी। स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षो तक जो सरकारें शासन में रही उन्होंनं अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के नाम पर मुसलमानों इसाइयों को संख्या विस्तार में पूरा संरक्षण दिया। संख्या विस्तार के लिये लोभ लालच अथवा बल प्रयोग को अन्देखा किया गया। एक दो प्रदेशो ने धर्म स्वातंत्र विधेयक लागू किया किन्तु बाद में धीरे धीरे उसे भी निष्क्रिय कर दिया गया क्योंकि अल्पसंख्यक वोट राजनीतिक सत्ता का एक मजबूत हथियार बन गया। धर्म निरपेक्षता का अर्थ बदलकर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण कर दिया गया। हिन्दू कोड बिल बनाकर मुसलमानों को चार विवाह तक छूट दी गई तो हिन्दुओं को एक विवाह तक सीमित किया गया। अल्पसंख्यक वोट वृद्धि के उददेश्य से इतना निर्लज्ज प्रयास भारत की धरती पर हुआ किन्तु हिन्दू कुछ नहीं कर सकता था। हिन्दुओं की जनसंख्या धीरे धीरे घटने लगी किन्तु वह मन मसोस कर रहा क्योंकि हिन्दू अपने पूर्व संस्कारों से बंधा था और उसका अस्तित्व ही धीरे-धीरे संकट में आ रहा था। संघ परिवार ने खतरे को समझा और समझाया भी किन्तु संघ परिवार की गांधी विरोधी मान्यता ने संघ को हिन्दुओं में विश्वसनीय नहीं होने दिया।

भले ही धर्म परिवर्तन के मामले में हिन्दू खतरा नहीं समझता किन्तु यह प्रश्न विचारणीय तो है। संख्या विस्तार की छीना झपटी कहीं हिन्दू समाज में एकाएक विस्फोटक न बन जावे उसके पूर्व ही इस पर गंभीर विचार मंथन आवश्यक है।

इतिहास गवाह है कि दुनियां में कुल मिलाकर जितनी हत्याएं और अत्याचार हुये हैं उनमें सबसे ज्यादा अत्याचार धार्मिक टकराव के कारण हुये। धार्मिक मान्यता सिर्फ विचारों तक सीमित न होकर सांस्कृतिक, संगठनात्मक तथा राष्ट्रीय स्तर तक को प्रभावित करती है। इस संबंध में मेरी प्रतिष्ठित गांधीवादी सर्वनारायण दास जी से चर्चा हुई। उन्होंने धर्म परिवर्तन के संबंध में चर्चा करते समय यह बताया कि गांधी एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिसके जीवन पर गीता के बाद Sermon on the mount का ही सर्वाधिक प्रभाव था, जिसके मित्रों और प्रशंसको की संख्या उस देश में भी अनगिनत थी, जिसकी सल्तनत के खिलाफ भारत जूझ रहा था और उन मित्रों व प्रशंसको में ईसाई धर्माचार्यो की संख्या कम नहीं थी, जिसकी पहली जीवनी लिखने का श्रेय दक्षिण अफ्रिका के रेवरेंड डोक को है, जिसके नेतृत्व में चले स्वराज्य-आन्दोलन में अमेरिका में धर्मप्रचार के लिये भारत आये रेवरेंड कैथान ने भाग लिया था, जिसके लिये इस अमेरिकी पादरी को ब्रिटीश हुकूमत ने प्रथम देश निकाला और फिर जेल की सजा दी थी, इंग्लैंड के वैभव भरे जीवन का त्याग कर मीरा बहन (मिस स्लेड) सरला बहन मार्जरी साइक्स जैसी कुमारिकाओं ने जिसकी छाया मे रहना स्वीकार कर लिया और जिसके बताये सेवा कार्यों में आजीवन तल्लीन रही। उस गांधी ने खीस्ती मिशनरियों के धर्मान्तरण-सम्बन्धी क्रियाकलाप को सर्वथा अधार्मिक ही करार दिया था। मिशनरियों द्वारा कुष्ठ सेवा, आरोग्य आदि क्षेत्रों में की जा रही सेवा के लिये गहरा प्रषंसा-भाव रहते हुये भी धर्मान्तरण की दृष्टि रखकर किये जाने की वजह से गांधी जी की नजर में उस सेवा की कीमत बहुत घट जाती थी । सेवा दूषित हो जाती थी। इस तरह गांधी भी धर्म परिवर्तन को अच्छा मार्ग नहीं मानते थे।

धर्म परिवर्तन करना कोई सामान्य मत परिवर्तन नहीं है क्योंकि इससे संस्कृति तथा जीवन पद्धति में भी बदलाव आता है। यदि पूरा परिवार ही धर्म बदल ले तब तो बडी समस्या नहीं किन्तु एक सदस्य बदल ले तो या तो टकराव होगा या विघटन और यदि वह प्रमुख है तो अन्य सदस्यों की स्वतंत्रता पर आक्रमण। इसलिये धर्म परिवर्तन करने से बचना चाहिये। फिर भी यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से वैचारिक रूप से सोच समझकर प्रतिबद्ध होकर धर्म बदलना चाहे तो उसे किसी भी कानून के द्वारा नहीं रोका जा सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सहजीवन की अपनी-अपनी सीमाएं है। धर्म परिवर्तन को सामाजिक स्तर पर निरूत्साहित करना चाहिये किन्तु किसी कानून या बल प्रयोग द्वारा नहीं रोका जा सकता क्योंकि यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है।

इस स्थिति में हमारे पास बीच का मार्ग यही है कि यदि कोई व्यक्ति या समूह धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है तो उस कार्य को असामाजिक कार्य मानकर ऐसे व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाये। यदि कोई व्यक्ति या परिवार धर्म परिवर्तन के लिये लोभ लालच या भय का उपयोग करे तो ऐसे कार्य को अपराध मानकर दण्ड की व्यवस्था की जाये। धर्म परिवर्तन एक विषेष प्रभाव डालता है इसलिये ऐसे किसी भी धर्म परिवर्तन की सामाजिक अथवा प्रषासनिक जांच उपरांत ही उसे परिवर्तित माना जाये। फिर भी यदि कोई व्यक्ति घोषित रूप से धर्म न बदलकर किसी अन्य विधि से भी पूजा पाठ करे किन्तु न अपना नाम बदले न धर्म, तो वह कर सकता है। इसमें एक बात और जुडनी चाहिये कि इसाइयत और इस्लाम में बहुत फर्क है। इसाइयत व्यक्ति के मौलिक अधिकार मानती हैं किन्तु इस्लाम नहीं मानता। इस्लाम व्यक्ति को धार्मिक संगठन का सदस्य मानता है अर्थात व्यक्ति की स्वतंत्रता मान्य नहीं। यह खतरनाक बदलाव है। इसलिये कोई भी धर्म परिवर्तन करके यदि मुसलमान बनता है तो उसकी विषेष शर्त होनी चाहिये कि वह धार्मिक इस्लाम तक सीमित हो सकता है किन्तु संगठित इस्लाम का सदस्य नहीं हो सकता।

हिन्दुओं के भी कुछ संगठन घर वापसी के नाम पर धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाते है। यह भी अच्छा कार्य नहीं है जब तक अन्य लोग धर्म परिवर्तन के प्रयत्नों को बंद नहीं करते तब तक हिन्दू संगठनों की भी सलाह नहीं दी जा सकती कि वे शुद्धि आंदोलन बंद कर दे। मैं मानता हूॅ कि भारतीय संस्कृति ऐसी किसी घर वापसी को ठीक नहीं मानती किन्तु यदि विशेष परिस्थिति में कोई ऐसा करता है तो उसे एक पक्षीय रोका भी नहीं जा सकता। मैं यह भी समझता हूॅ कि यदि घर वापसी की मुहिम तेज हो जाये तो मुसलमान और ईसाई अपने आप धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध के लिये मांग करने लगेंगे। फिर भी मैं घर वापसी की अपेक्षा अधिक अच्छा समझता हूॅ कि कानून के द्वारा इस गंदे खेल को रोका जाये। यदि कानून के द्वारा धर्म परिवर्तन कराने पर प्रतिबंध लगता है तो घर वापसी पर भी उसी तरह का कानून लागू होना चाहिये। जिस तरह सत्तर वर्षो तक बुरी नीयत से अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहित किया गया। उसी तरह बुरी नीयत से बहुसंख्यकों को यदि प्रोत्साहित किया गया तो यह हिन्दू धर्म के लिये एक कलंक होगा। आज हिन्दू धर्म गर्व से अपने को विचारधारा और जीवन पद्धति तक सीमित मानता है। यदि हम भी अन्य सम्प्रदाय का अनुकरण करने लगेंगे तो हिन्दू भी धर्म की जगह सम्प्रदाय के रूप में माना जाने लगेगा और यह हिन्दू धर्म के लिये दीर्घकालिक क्षति होगी। सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे उसका सबसे अच्छा समाधान है धर्म स्वातंत्र विधेयक। मैं जानता हूॅ कि भारत में ऐसा कानून बनाना बहुत पेचीदा मामला है। इसलिये वर्तमान समय में वर्तमान धर्म स्वातंत्र विधेयक जो कुछ प्रदेषों में लागू है उसे पूरे भारत में लागू कर देना चाहिये। एक दूसरा तरीका यह भी है कि समान नागरिक संहिता लागू करके धर्म जाति के मामले सामाजिक मानकर कानून उससे दूर हो जाये। अब तक मुसलमानों के पक्ष में खडे होकर सरकार ने हिन्दुओं के विरूद्ध जो हिन्दू कोड बिल लागू किया उसे समाप्त कर दिया जाये।

मंथन क्रमांक-122 ’’गांधी, मार्क्स ओर अम्बेडकर’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 8, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना कठिन होते हुये भी बहुत प्रासंगिक है क्योंकि तीनों के लक्ष्य और कार्यप्रणाली अलग-अलग होते हुये भी वर्तमान भारत की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर तीनों महापुरूषों का व्यापक प्रभाव है।

गांधी की तुलना मे मार्क्स और अम्बेडकर कहीं नही ठहरते। तुलना के लिये आवश्यक है कि तीनो के लक्ष्य मे कुछ समानता हो भले ही मार्ग भिन्न ही क्यो न हो। यहाॅ तो तीनो के लक्ष्य भी अलग अलग हैं और मार्ग भी। गांधी सामाजिक स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाकर चल रहे थे। गांधी के लक्ष्य मे कही भी सत्ता संघर्ष नहीं था। वे तो सत्ता मुक्ति के प्रयत्नों तक सीमित थे। मार्क्स का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन था। गांधी का लक्ष्य अकेन्द्रीयकरण था तो मार्क्स का केन्द्रीयकरण। अम्बेडकर का लक्ष्य तो और भी सीमित था। मार्क्स सत्ता को समस्याओं का समाधान बताते थे किन्तु स्वयं सत्ता संघर्ष मे नहीं थे। अम्बेडकर स्वयं प्रारंभ से ही सत्ता की तिकडम करते रहे। मार्क्स पूंजीवाद को हटाकर धनहीनों की सत्ता चाहते थे तो अम्बेडकर समाज व्यवस्था का लाभ उठा रहे सवर्णो के लाभ मे अवर्ण बुद्धिजीवियों का हिस्सा मात्र चाहते थे। गांधी किसी भी प्रकार के वर्ग संघर्ष के विरूद्ध थे तो मार्क्स गरीब अमीर के बीच तथा अम्बेडकर सवर्ण अवर्ण के बीच संघर्ष के पक्षधर थे। गांधी वर्ग संघर्ष के परिणाम मे समाज टूटन विषरूपी परिणाम देखकर चिन्तित थे तो मार्क्स और अम्बेडकर वर्ग संघर्ष के परिणाम स्वरूप समाज टूटन को सत्ता रूपी मक्खन समझकर प्रसन्न होते थे। गांधी अधिकतम अहिंसा के पक्षधर थे तो मार्क्स अधिकतम हिंसा के और अम्बेडकर को हिंसा अहिंसा से कोई परहेज नही रहा।

मार्क्स का एक नारा था कि शासन मुक्त व्यवस्था। मार्क्स मानते थे कि ईश्वर का भय समाज में कम होने के कारण राज्य के अदृश्य भय का बढना आवश्यक है। मार्क्स मानते थे कि राज्य धीरे-धीरे अदृश्य होकर अस्तित्वहीन हो जायेगा तथा समाज अस्तित्वहीन राज्य के भय से स्वाभाविक रूप से चलता रहेगा। मार्क्स की यह धारणा कालान्तर में घातक सिद्ध हुई। मार्क्स के नाम पर स्थापित राज्य ने ईश्वर और समाज के भय को तो कम किया और अपना भय बढा दिया किन्तु स्वयं को अस्तित्व हीन होने के पूरी तरह विपरीत स्थायी स्वरूप देना शुरू कर दिया।

परिणाम स्पष्ट था कि मार्क्स के कथनानुसार चलने वालो को पूरा पूरा सत्ता सुख मिला जिसमे कहीं भी समाज के लिये गुलामी के अतिरिक्त कुछ और नही था तो अम्बेडकर जी के मार्ग पर सत्ता की दिशा चलने वालों को लूट के माल मे हिस्सा मिलना शुरू हो गया। समाज को न मार्क्स की दिशा मे गुलामी से राहत मिली न अम्बेडकर के मार्ग से श्रमजीवी अवर्णो को। गांधी की चर्चा इसलिये संभव नहीं क्योकि गांधी तो स्वतंत्रता के पहले पडाव पर ही मार दिये गये। सत्ता के दो दावेदार गुटो मे से एक ने गांधी के विरूद्ध ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी की शारीरिक हत्या हो गई तो दूसरे ने गांधी के वारिस बनकर ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी विचारों की हत्या हो गई।

गांधी का प्रयत्न था कि दुनियां के सभी शरीफ लोग अपराधियों के विरूद्ध एक जुट हो जावें। गांधी हृदय परिवर्तन पर ज्यादा जोर देते थे। मार्क्स का नारा था कि दुनियां के सभी मजदूरों एक हो जाओ। इसमें वर्ग संघर्ष को आधार बनाया गया। अम्बेडकर भी भारत के सभी अवर्णो को सवर्णो के विरूद्ध एक जुट होकर संघर्ष का नारा देते रहे।

यदि हम भारत का आकलन करें तो यहाॅ आपको मार्क्स की लाइन पर चलने वाले भी बडी संख्या मे मिल जायगें क्योकि इस लाइन पर चलने मे कहीं न कहीं सत्ता की उम्मीद है। अम्बेडकर की लाइन पर चलने मे भी लाभ ही लाभ है क्योकि वहां भी सत्ता मे हिस्सेदारी की पूरी व्यवस्था अम्बेडकर जी सदा सदा के लिये कर गये है। बेचारे गांधी के मार्ग पर क्या मिलने वाला है? क्यों कोई गांधी मार्ग पर चले? आज भारत मे बेचारे गांधी का हाल यह है कि यदि किसी से कहा जाय कि तुम्हारे बेटे के रूप मे गांधी का जन्म होने वाला है तो वह चाहेगा कि गांधी के रूप वाला बेटा पडोसी के घर चला जाये। उसे तो नेहरू, बिडला या अम्बेडकर सरीखे बेटे से ही काम चल जायगा। गांधी की लाइन पर चलने वाले को न तो कोई व्यक्तिगत लाभ है न ही पारिवारिक। इस लाइन पर चलकर सिर्फ सामाजिक लाभ ही संभव है जिसमे चलने वालो की रूचि नगण्य है। दूसरी ओर मार्क्स या अम्बेडकर की लाइन पर चलने वाले को व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ भरपूर है। इतना ज्यादा कि वह पूरे समाज के लाभ को भी अपने घर मे डाल रखने की शक्ति पा जाता है। बताइये कि आज के भौतिक युग मे कोई गांधी मार्ग पर क्यो चले?

यदि अम्बेडकर या मार्क्स मे आंशिक रूप से भी सामाजिक भाव होता तो वे श्रम, बुद्धि और धन के बीच श्रम की मांग और मूल्य बढने की बात करते जिससे आर्थिक सामाजिक विषमता कम होती । गांधी ने लगातार श्रम और बुद्धि के बीच दूरी घटाने की कोशिश की। अम्बेडकर को तो श्रम से कोई मतलब था ही नहीं। न अच्छा न बुरा। अम्बेडकर तो सिर्फ सामाजिक असमानता का लाभ उठानें तक ही पर्याप्त थे। किन्तु मार्क्स को आधार बनाकर बढने वालों ने श्रम को धोखा देने के लिये मानसिक श्रम नामक एक नया शब्द बना लिया जो पूरे पूरे शारीरिक श्रम का हिस्सा निगल गया। बुद्धि जीवियों ने शारीरिक श्रम शोषण के ऐसे ऐसे तरीके खोज लिये कि श्रम और बुद्धि के बीच दूरी लगातार बढती चली गई। यदि गांधी के अनुसार मशीन और शारीरिक श्रम के बीच कोई मानवीय संतुलन रखा गया होता तो आज जैसी अराजकता नहीं होती। किन्तु मार्क्सवादियो की निगाहें श्रम पर थी और निशाना बुद्धि को लाभ पहुंचाने का। भारत में समाजवादी लोकतंत्र नामक आंशिक साम्यवाद ही आ पाया किन्तु यहाॅ भी श्रम और बुद्धि के बीच लगातार बढता फर्क स्पष्ट है। यदि श्रम की मांग और महत्व बढ जाता तो जातीय आरक्षण की जरूरत ही नही पडती। किन्तु भारत मे सत्ता लोलुप त्रिगुट श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयास से ही आतंकित थे। नेहरू के नेतृत्व का कांग्रेसी गुट बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को अधिकाधिक सुविधा देकर उनके वोट लेने का प्रयास करता रहा तो साम्यवादी श्रम प्रधान लोगों को बहकाकर उन्हे पूंजीवाद के विरूद्ध नारा लगवाने का औजार मानते रहे और अम्बेडकर वादियों की खास समस्या रही कि यदि श्रम और बुद्धि के बीच की दूरी घट गई तो जातीय आरक्षण महत्वहीन हो जायगा। तीनो के अलग अलग स्वार्थ थे और इस स्वार्थ का उजागर करने वाला कोई था नहीं। संघ परिवार से कुछ उम्मीद की जा सकती थी किन्तु उसे भी हिन्दू मुसलमान के अतिरिक्त किसी समस्या से कोई मतलब नहीं था।

गांधी कट्टर हिन्दू थे। वे मानते थे कि हिन्दू धर्म की वाह्य मान्यताएॅ अन्य सभी धर्माे की अपेक्षा अधिक मानवीय है। मार्क्स अपना स्वयं का धर्म चलाना चाहते थे। उनके अनुसार धर्म समाज मे होता है। यदि राज्य ही समाज बनकर समाज के सभी काम करने लगे तो किसी धर्म की जरूरत ही क्या है। अम्बेडकर को हिन्दू धर्म से विशेष द्वेष था। वे बचपन से ही हिन्दू धर्म छोडकर उससे प्रत्यक्ष टकराव चाहते थे किन्तु गांधी जी ने कडाई से उन्हे रोक दिया। अम्बेडकर बहुत चालाक थे। उन्होने समझा कि कुछ वर्ष हिन्दू ही रहकर उसकी जडो मे मठ्ठा डालने का काम क्यो न करें? जहाॅ लोहिया, जयप्रकाश, नेहरू, पटेल आर्थिक विषमता को दूर करना अपनी प्राथमिकता घोषित कर रहे थे वहीं अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के पीछे अपनी सारी शक्ति लगा दी। वे मुसलमान होना चाहते थे किन्तु मुस्लिम महिलाओं को उन्होंने अपने कोड बिल के सुधारवादी कदम से बाहर रखा। रोकने वाला कोई था नही। गांधी थे ही नही, नेहरू जी अंबेडकर से डरते थे। गांधी हत्या के बाद संघ अविश्वसनीय हो चुका था। अम्बेडकर के इस प्रयत्न को कौन रोकता? हिन्दू धर्म के तथाकथित अगुवा सवर्ण स्वयं अवर्ण शोषण के कलंक से मुंह छिपा रहे थे। अम्बेडकर जी हिन्दू कोड बिल बनवाने मे सफल रहे। मुझे आश्चर्य होता है कि गांधी के कट्टर हिन्दू होते हुए भी हिन्दुत्व के किसी राजनैतिक स्वार्थ पूर्ण प्रचार से प्रभावित होकर किसी मूर्ख हिन्दू ने ही गांधी की हत्या कर दी। मै समझ नही पाता कि हिन्दुत्व का शत्रु कौन? अम्बेडकर, मार्क्स अथवा वह स्वार्थ पूर्ण प्रचार जिसने सत्ता के फेर मे पडकर गांधी को उसमे बाधक मान लिया। कुछ ही वर्ष बाद बात उजागर हो गई जब ऐसे तत्वो ने हिन्दू संगठन के नाम पर अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया। मै अब भी मानता हॅू कि हिन्दू धर्म मे आंतरिक बुराइयां थी और अब भी है किन्तु अन्य धर्मो के साथ संबंध मे हिन्दू धर्म के मुकाबले कोई नही। गांधी हिन्दू धर्म की आंतरिक बुराइयों को दूर करना चाहते थे और अम्बेडकर उसका लाभ उठाना चाहते थे यही तो है इनका तुलनात्मक विश्लेषण ।

वर्तमान समय में तीनों ही महापुरूष जीवित नहीं हैं किन्तु तीनों की छाया आज भी भारतीय समाज व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। गांधी टोपी गांधी की खादी और गांधी का झंडा हाथ में लेकर गांधीवादी राजनेताओं ने सारे देश को आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से लूट लिया। आज आपको भारत में ऐसे धूर्त राजनेता भी मिल जायेगे जो एक ओर तो अपने नाम के साथ गांधी उपनाम जोडते हैं तो दूसरी ओर राजनैतिक सत्ता की दौड में भी शामिल रहते हैं। असली गांधी ने अपने कार्यकाल में मिलती हुई सत्ता को त्याग दिया था तो नकली नामधारी गांधी न मिलती हुई सत्ता के पीछे भी दौडे़ चले जा रहे हैं।

गांधी व्यक्ति स्वातंत्र के पक्षधर थे तो गांधीवादियों ने सारी सत्ता अपने पास समेट कर समाज को गुलाम बना लिया। गांधी न्यूनतम मशीनीकरण के पक्षधर थे तो गांधीवादियों ने डीजल, पेट्रोल, बिजली को अधिकतम सस्ता कर दिया। गांधी वर्ग समन्वय के पक्षधर थे तो गांधीवादियों ने वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को ही सत्ता का आधार बना लिया। गांधी के अराजनैतिक उत्तराधिकारियों से समाज को कुछ उम्मीद थी किन्तु वे भी राजनैतिक गांधीवादियों के ऐसे प्रभाव में आये कि उन्होंने ग्राम स्वराज्य की परिभाषा ही बदल दी। गांधी स्वराज ग्राम के पक्षधर थे और ग्राम स्वावलम्बन को स्वायत्ता का परिणाम मानते थे तो गांधीवादी ग्राम स्वावलम्बन को ही मुख्य मानने लगे। विनोबा के नेतृत्व में गांधीवादी आदर्श ग्राम बनाते रहे तो सत्ताधीश गांधीवादी सत्ता की सारी माल मलाई खाते रहे। गांधीवादियों ने अपने पूरे कार्यकाल में संघ परिवार का विरोध करने के पीछे अपनी इतनी शक्ति लगाई कि अपना अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। दूसरी ओर संघ परिवार ने भी गांधी को बदनाम करने के पीछे इतनी ज्यादा ताकत लगाई कि वह कभी हिन्दुओं का विश्वास अर्जित नहीं कर सका। भारत का हर हिन्दू समझता है कि यदि कोई व्यक्ति गांधी हत्या का समर्थक है तो वह व्यक्ति हिन्दुत्व को बिल्कुल नहीं समझता।

मार्क्स के नाम पर भारत में साम्यवाद आया। सत्ता प्राप्ति ही उसका एक मात्र लक्ष्य था। वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को साम्यवाद ने अपना मुख्य आधार बनाया। नेहरू, पटेल, अम्बेडकर आदि से भी साम्यवादियों को फूट डालो राजकरो की नीतियों का भरपूर समर्थन मिला। साम्यवादियों ने लोकतंत्र की अपेक्षा हिंसा पर अधिक विश्वास किया। सम्पूर्ण भारत में बंगाल, केरल और त्रिपुरा में सबसे अधिक हिंसा को सत्ता परिवर्तन का आधार मानने का प्रचलन अब तक है। साम्यवाद का ही अतिवादी स्वरूप नक्सलवाद के रूप में सामने आया जिसने पूरे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोडी। साम्यवाद ने परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को निरंतर कमजोर किया। साम्यवाद ने हिन्दुत्व की अवधारणा को ही अपने लक्ष्य में बाधक माना और जब जहाॅ जरूरत पडी इस्लाम से समझौता कर लिया। साम्यवाद गरीब अमीर के बीच वर्ग संघर्ष के लिये आवश्यक समझता है कि दोनो के बीच दूरी लगातार बढती रहे। साम्यवाद अच्छी तरह जानता है कि कृत्रिम उर्जा श्रम शोषक है और श्रम मूल्य वृद्धि के लिये कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि आवश्यक है फिर भी वह हमेशा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि के खिलाफ सबसे आगे रहता है क्योंकि ऐसा होते ही उसका वर्ग संघर्ष का आधार टूट जायेगा। साम्यवादी कृत्रिम उर्जा पर टैक्स का तो विरोध करते है किन्तु गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, कृषि उत्पादन पर लगने वाले करों का विरोध नहीं करते। उन्होंने बंगाल, केरल में भी ये कर नहीं हटाये।

अम्बेडकर जी की तो शुरू से ही नीयत खराब थी। वे सिर्फ सत्ता लोलुप थे। परिणामस्वरूप उनके वारिस भी उसी राह पर चलते रहे। भारत में एस.सी, एस.टी की कुल संख्या यदि तीस करोड मान लें तो इनमें से पंचान्नवे प्रतिशत आज भी श्रमजीवी हैं। दो तीन प्रतिशत बुद्धिजीवी अवर्णो ने अपने अवर्ण श्रमजीवियों का लगातार शोषण किया। इन मुठठी भर बुद्धिजीवी अवर्णो ने अम्बेडकर के नाम पर सम्पूर्ण भारत को ब्लैक मेल किया है। सारा देश जानता है कि वर्तमान संविधान भारत की सारी समस्याओं की जड है। जब तक इस संविधान में व्यापक संशोधन नहीं होते तब तक कोई सुधार संभव नहीं। किन्तु संविधान की बात उठते ही ये मुठठी भर अम्बेडकर वादी ऐसा आसमान सर पर उठा लेते है कि कोई सही बात कह ही नहीं पाता। इस संविधान का लाभ उठा रहे सभी बुद्धिजीवी राजनेता चाहे वह सवर्ण हो या अवर्ण, अम्बेडकर जी और उनके संविधान को भगवान की तरह स्थापित करते है। वे भूल जाते है कि भविष्य के इतिहास में भीमराव अम्बेडकर खलनायक सिद्ध होने वाले हैं।

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते है कि गांधी की नीतियां और नीयत दोनो ठीक थी, मार्क्स की नीयत ठीक थी नीतियां गलत थी और अम्बेडकर की नीतियां और नीयत दोनो गलत थी। गांधीवादियों ने गांधी की नीतियों के विपरीत आचरण करके, मार्क्सवादियों ने मार्क्स की नीतियों में संशोधन करके तथा अम्बेडकरवादियों ने अंबडेकर की नीतियों पर अक्षरषः आचरण करके भारत की सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था को गंभीर श्रति पहुंचाई है।

मेरे विचार से भारत की वर्तमान अव्यवस्था का एक ही समाधान है गांधी। हम मार्क्स और अम्बेडकर के चक्रव्यूह से भारत को निकालकर गांधी मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करें।

मंथन क्रमांक-121 ’’राइट टू कंस्टीटयूशन’’–बजरंग मुनि

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दुनियां की समाज व्यवस्था में व्यक्ति एक प्राकृतिक और प्राथमिक इकाई होता है तो समाज अमूर्त और अन्तिम। दुनियां के सभी व्यक्तियों के संयुक्त स्वरूप को समाज कहते हैं। समाज की एक व्यवस्था होती है। प्रत्येेक व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकार होते हैं जिन्हें कोई भी सामाजिक व्यवस्था किसी भी परिस्थिति में तब तक न संशोधित कर सकती है न उसकी कोई सीमा बना सकती है जब तक व्यक्ति ने कोई अपराध न किया हो। व्यक्ति के उपर कानून, कानून के उपर तंत्र, तंत्र के उपर संविधान तथा संविधान के उपर समाज होता है। तंत्र हमेशा मैनेजर होता है जो समाज द्वारा बनाये गये संविधान के अनुसार कार्य करता है।

सारी दुनियां के सभी व्यक्तियों को मिलाकर समाज होता है इसलिये आदर्श व्यवस्था में पूरी दुनिया का एक संविधान होना चाहिये। ऐसे संविधान निर्माण में दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होनी चाहिये किन्तु अब तक ऐसी कोई विश्व व्यवस्था और विश्व संविधान नहीं बन पाया है इसलिये हम भारतीय संविधान को ही अन्तिम मानकर उसकी समीक्षा करने तक सीमित हैं।

तानाशाही और लोकतंत्र बिल्कुल विपरीत प्रणालियां है। तानाशाही में शासन का संविधान होता है और लोकतंत्र मे संविधान का शासन। भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसलिये हम कह सकते है कि यहां संविधान का शासन है भी और होना भी चाहिये। दुनियां के अधिकांश लोकतांत्रिक देशो में संविधान का शासन माना जाता है। यदि हम पूरी दुनियां का आॅकलन करें तो अन्य लोकतांत्रिक देशो मे भी वर्तमान संविधान अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे किन्तु यदि हम भारत का आॅकलन करे तो भारतीय संविधान सत्तर वर्षो में ही विपरीत परिणाम देता रहा है और यह गति आज तक बढ रही है। दुनियां के संविधान बनाने वालों की यदि समीक्षा करें तो हो सकता है कि उनसे कुछ भुलें भी हुई हो अथवा लम्बा समय बीतने के बाद कुछ परिस्थितियां बदली हों किन्तु भारतीय संविधान बनाने वालो से अनेक भूले तो हुई ही किन्तु उनकी नीयत पर भी संदेह होता है।

यदि हम लोकतंत्र को ठीक-ठीक परिभाषित करें तो लोकतंत्र का अर्थ होना चाहिये लोक नियंत्रित तंत्र। भारतीय संविधान निर्माताओ ने इसे बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दिया। वैसे तो पूरी दुनियां में कहीं भी लोकतंत्र की आदर्श परिभाषा स्पष्ट नही है किन्तु भारत ने तो दुनियां से अलग लोकतंत्र की अपनी अलग परिभाषा बना ली। ऐसा लगता है कि हमारे संविधान निर्माताओ मे सत्ता प्राप्त करने की बहुत ज्यादा जल्दी थी। आदर्श स्थिति मे तंत्र प्रबंधक होता है और लोक मालिक किन्तु भारतीय संविधान निर्माताओ ने तंत्र को प्रबंधक की जगह शासक कहना शुरू कर दिया, जिसका अर्थ हुआ कि लोक मालिक नही बल्कि शासित है। तंत्र के अधिकार लोक की अमानत होते है किन्तु हमारे तंत्र से जुडे लोगो ने उन्हे अमानत न समझ कर अपना अधिकार मान लिया।

पूरी दुनियां मे न तो संविधान की कोई स्पष्ट परिभाषा बनी न ही मूल अधिकार की। यहां तक कि अपराध, गैर कानूनी, अनैतिक की भी अलग अलग व्याख्या दुनियां मे नही हो पाई। राज्य का दायित्व क्या हो और स्वैच्छिक कर्तव्य क्या हो, यह भी नही हो पाया। दुर्भाग्य से हमारे संविधान निर्माताओ ने जल्दवाजी मे या ना समझी मे इस प्रकार की परिभाषाओ पर चिंतन मंथन करने की अपेक्षा विदेशी संविधानों की नकल करना उचित समझा। परिणाम आपके सामने है कि आज तक ऐसे गहन मौलिक विषयो को कभी परिभाषित नही किया गया। न ही भारत मे और न ही दुनियां मे। संविधान की परिभाषा यह होती है कि तंत्र के अधिकतम और लोक के न्यूनतम अधिकारो की सीमाए निश्चित करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते है और व्यक्ति के अधिकतम तथा तंत्र के न्यूनतम अधिकारो की सीमाएं निश्चित करने का कार्य कानून कहा जाता है। कानून तो तंत्र के द्वारा बनना स्वाभाविक है किन्तु संविधान या तो लोक के द्वारा बनाया जायेगा अथवा लोक और तंत्र की समान भूमिका होगी। किन्तु हमारे संविधान निर्माताओ ने तंत्र को ही संविधान संशोधन के असीम अधिकार दे दिये जिसका अप्रत्यक्ष अर्थ हुआ कि भारत मे संविधान तंत्र नियंत्रित हो गया अर्थात तंत्र की तानाशाही हो गई। संविधान के मौलिक सूत्रो का निर्माण समाज शास्त्र का विषय है और व्यावहारिक स्वरूप या भाषा राजनीति शास्त्र का। भारत का संविधान बनाने मे मौलिक सोच भी राजनेताओ की रही और भाषा देने मे भी लगभग अधिवक्ताओ का ही अधिक योगदान रहा। परिणाम हुआ कि भारत की संवैधानिक संरचना वकीलो के लिये स्वर्ग के समान बन गई।

भारतीय संविधान मे कुछ कमियां प्रारंभ से ही दिखती हैं।

1. संविधान को हमेशा स्पष्ट अर्थ प्रदाता होना चाहिये, द्विअर्थी नही। आज स्थिति यह है कि न्यायालय तक संविधान की विपरीत व्याख्या करते देखे जाते है। ऐसा महसूस हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच के उपर भी कोई और बेंच होती तो फुल बेंच के अनेक निष्कर्ष बदल सकते थे।

2. परन्तु के बाद मूल अर्थ न बदलकर अपवाद ही आना चाहिये किन्तु भारत के संविधान मे परन्तु के बाद उसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया जाता है। भारत मे धर्म, जाति, लिंग, का भेद नही होगा। सबको समान अधिकार होगे। किन्तु महिलाओ, अल्प संख्यको, आदिवासियों, पिछडों के लिये विशेष कानून बनाये जा सकते है। स्पष्ट है कि भारत की 90 प्रतिशत आबादी समानता के अधिकारो से वंचित हो जाती है।

3. धर्म, जाति, भाषा, लिंग आदि के भेद समाज के आंतरिक मामले है जबकि परिवार, गांव, जिले व्यवस्था की इकाइया है। भारतीय संविधान ने परिवार, गांव, जिले को तो संविधान से बाहर कर दिया और धर्म, जाति, भाषा, लिंग भेद को संविधान मे घुसा दिया। परिणाम हुआ कि वर्ग समन्वय टूटा और वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष बढ गया।

4. संविधान बनाने वालो ने तंत्र के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अंतर नही समझा । तंत्र का दायित्व होता है सुरक्षा और न्याय और स्वैच्छिक कर्तव्य होता है अन्य जन कल्याणकारी कार्यो मे सहायता। संविधान निर्माताओ ने सुरक्षा और न्याय की तुलना मे जन कल्याण को अधिक महत्व दिया। यहां तक कि संविधान मे व्यावहारिकता का भी पूर्णतः अभाव रहा। ऐसी ऐसी आदर्शवादी घोषणाए कर दी गई जो संभव नही थी। उसका परिणाम हुआ अव्यवस्था।

5. संविधान निर्माताओ ने उद्देश्यिका मे नासमझी मे समानता शब्द शामिल कर दिया जबकि समानता की जगह स्वतंत्रता शब्द होना चाहिये था। उन्होने समानता का अर्थ भी ठीक ठीक नही समझा। आर्थिक असमानता की तुलना मे राजनैतिक असमानता अधिक घातक होती है। हमारा संविधान आर्थिक सामाजिक असमानता को अधिक महत्व देता है और उसके कारण राजनैतिक असमानता बढती चली जाती है।

6. सिद्धान्त रूप से कमजोरो की सहायता मजबूतो का कर्तव्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही। हमारे संविधान निर्माताओ ने इस सहायता को कमजोरो का अधिकार बना दिया। इसके कारण अक्षम और सक्षम के बीच वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष बढा । मजबूतो को कमजोरो ने सहायक न मानकर शोषक मान लिया।

7. संविधान हमेशा तंत्र को नियंत्रित करता है तथा तंत्र की अधिकतक सीमाएं निश्चित करता है। संविधान कभी तंत्र का मार्गदर्शक नहीं होता न ही संविधान समाज का मार्गदर्शक होता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में नीति निर्देशक तत्व तथा व्यक्ति के मौलिक कर्तव्य जैसे अनावश्यक प्रावधान शामिल करके एक ओर तो संविधान को बहुत बडा बना दिया तो दूसरी ओर उसका वास्तविक स्वरूप ही धूमिल कर दिया।

8. सैद्धान्तिक रूप से संविधान तंत्र से उपर होता है। संविधान ही तंत्र को अधिकार देता भी है और तंत्र पर नियंत्रण भी करता है। स्वाभाविक है कि संविधान संशोधन में तंत्र की कोई भूमिका नहीं हो सकती। हमारे संविधान निर्माताओं ने तंत्र को ही संविधान संशोधन के भी अन्तिम अधिकार दे दिये। भारत में कहा जाता है कि संसदीय लोकतंत्र है किन्तु यह बात पूरी तरह गलत है। सच बात यह है कि भारतीय शासन व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही है जिसे समाज को धोखा देने के लिये लोकतंत्र कहा जाता है।

किसी संविधान मे यदि एक मौलिक कमी हो तो वह अकेली कमजोरी भी दूरगामी प्रभाव डालती है । किन्तु भारतीय संविधान मे तो सारी कमियां ही विद्यमान है और हर साख पर उल्लू बैठा है के अन्जाम के आधार पर परिणाम स्पष्ट दिख रहा है। आज यदि भारत की जनता बढती हुई अव्यवस्था के समाधान के लिये किसी तानाशाह का भी सम्मान करने को तैयार है तो यह दोष जनता का न होकर हमारे संविधान निर्माताओ का ही माना जाना चाहिये। इसलिये मै समझता हॅू कि कही न कही संविधान निर्माताओ की नीयत मे भी खराबी थी तभी उन्हेाने संविधान संशोधन तक के अधिकार लोक से छीनकर तंत्र को दे दिये तथा लोकतंत्र की परिभाषा पूरी तरह बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दी।

हम भारतीय संविधान के कुछ परिणामो की व्याख्या करें।
1. भारतीय संविधान का पहला परिणाम यह दिख रहा है कि तंत्र शरीफो, गरीबो, ग्रामीणो, श्रमजीवियों के विरूद्ध धूर्तो, अमीरों, शहरियों, बुद्धिजीवियों का मिला जुला षणयंत्र दिखने लगा है।

2. स्पष्ट दिख रहा है कि संसद एक जेल खाना है जिसमे हमारा भगवान रूपी संविधान कैद है। संविधान एक ओर तो संसद की ढाल बन जाता है तो दूसरी ओर संविधान संसद की मुठ्ठी मे कैद भी है।

3. न्यायपालिका और विधायिका के बीच ऐसी अधिकारो की छीना झपटी दिख रही है जैसे लूट के माल के बटवारे मे दिखती है।

4. लोक और तंत्र के बीच दूरी लगातार बढती जा रही है। लोक हर क्षेत्र मे तंत्र का मुखापेक्षी हो गया है। यहा तक कि तंत्र और लोक के बीच शासक और शासित की भावना तक घर कर गई है।

5. समाज के हर क्षेत्र मे वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग विद्वेष बढ रहा है।

6. तंत्र का प्रत्येक अंग हर कार्य मे समाज को दोष देने का अभ्यस्त हो गया है। तंत्र का काम सुरक्षा और न्याय है । किन्तु तंत्र इसके लिये भी लोक को ही दोषी कहता हे। यहा तक कि कुछ वर्ष पूर्व भारत के प्रधान मंत्री राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता तक ने कहा या कि संविधान दोषी नही है बल्कि उसका ठीक ठीक पालन नही होता। पालन न करने वाले दोषी है। दोषी संविधान है, व्यवस्था है, तंत्र है, और समाज मे हम सुधरेगें जग सुधरेगा जैसा गलत विचार प्रसारित किया जा रहा है ।

7. भारत मे लगातार अव्यवस्था बढती जा रही है। भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और उससे भी अधिक तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।

समस्याओ पर हमने विचार किया किन्तु समाधान भी सोचना होगा। समस्या विश्वव्यापी है किन्तु समाधान की शुरूआत भारत कर सकता है और भारत की शुरूआत हम आप कर सकते है। 1. परिवार और गांव को तत्काल संवैधानिक अधिकार दिये जाने चाहिये। इससे तंत्र का बोझ घटेगा और तंत्र सुरक्षा और न्याय की ओर अधिक सक्रिय हो सकेगा। 2. संविधान को संसद के जेलखाने से मुक्त कराने की पहल होनी चाहिये। संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्रमुक्त किसी इकाई को दिये जाने चाहियें। 3. लोकतंत्र, मूल अधिकार अपराध, समानता आदि की वर्तमान भ्रम पूर्ण मान्यताओ को चुनौती देकर वास्तविक अर्थ स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये। 4. संविधान कानून आदि शब्दो की भी स्पष्ट परिभाषा बननी चाहिये। भले ही अब तक दुनियां मे न बनी हो। संसदीय लोकतंत्र को बदल कर सहभागी लोकतंत्र की दिशा मे बढना चाहिये। 5. सांसद को दल प्रतिनिधि की जगह जन प्रतिनिधि होना चाहिये। संसदीय लोकतंत्र को बदलकर निर्दलीय व्यवस्था की ओर जाना चाहिये। जिस तरह आज संसद असंसदीय दृश्य प्रस्तुत करती है वह हमारे लिये शर्म और चिन्ता का विषय है। 6. भारतीय संविधान मे कुछ मौलिक सुधार की आवश्यकता है। ऐसे सुधार भी होने चाहिये।

मुझे विश्वास है कि भारतीय संविधान की कमजोरियां को दूर करने की हमारी कोशिश विश्वव्यापी परिवर्तन की दिशा मे ले जा सकती है हमे इस दिशा मे विचार मंथन करना चाहिये।

स्पष्ट है कि भारत की वर्तमान अव्यवस्था के लिये भारतीय संविधान ही सर्वाधिक दोषी है। संविधान में संशोधन या बदलाव के दुनियां में चार मार्ग ही उपलब्ध हैं
1. जयप्रकाश आंदोलन के अनुसार चुनावों के माध्यम से संसद में दो तिहाई बहुमत लाकर संविधान संशोधित कर दिया जावे।
2. अन्ना आंदोलन के अनुसार जनता का इतना व्यापक दबाव दिखने लगे कि वर्तमान संसद ही डरकर संविधान को संशोधित करके उसे जनता के लिये स्वतंत्र कर दे।
3. मिश्र टयूनीशिया के समान एकाएक जन विस्फोट हो और उस जन विस्फोट में संविधान पूरी तरह बदल जावे।
4. लीबिया के समान गृह युद्ध हों और मरेंगे मारेंगे के आधार पर संविधान बदल दिया जावे।

‌भारत में तानाशाही न होकर विकृत लोकतंत्र है इसलिये चौथे मार्ग पर सोचने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। तीसरा मार्ग स्व निर्मित है। उसमें हमारी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं हो सकती। हम तो सिर्फ प्रतीक्षा कर सकते हैं। हमारे पास पहले और दूसरे मार्ग ही उपलब्ध हैं किन्तु जे पी और अन्ना आंदोलन से निकले परिणामों ने समाज की हिम्मत खत्म कर दी है इसलिये कोई आंदोलन संभव नहीं दिखता। किन्तु निराशा की जगह कुछ न कुछ करना तो होगा ही और लोकतंत्र के दोनो मार्गो में जन जागरण की ही मुख्य भूमिका है। इसलिये अब समय आ गया है कि देश में राइट टू कंस्टीटयूशन अर्थात संविधान का अधिकार के लिये एक सूत्रीय जन जागरण हो। यदि भारत में यह मार्ग सफल हो सका तो सारे विश्व के लिये यह मार्गदर्शक हो सकेगा और हम विश्व संविधान की दिशा में बढ सकेगे।

मंथन क्रमांक-120 ’’संगठन कितनी आवश्यकता कितनी मजबूरी’’–बजरंग मुनि,

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सामान्यतया संगठन और संस्था को एक सरीखा ही मान लिया जाता है किन्तु दोनो बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। संगठन को अंग्रजी में आर्गेनाईजेशन कहते है और संस्था को इंस्टीटयूशन, यद्यपि दोनो के अर्थ कभी-कभी मिला दिये जाते है। संगठन संस्था से बिल्कुल भिन्न होता है। संगठन अधिकार प्रधान होता है संस्था कर्तव्य प्रधान। संगठन अपने अधिकारों के लिये संघर्षरत रहता है जबकि संस्था ऐसे किसी संघर्ष से दूर रहती है। संगठन में आमतौर पर अपनत्व होता है। उसमें अपने जुडे हुये लोग साथी तथा सहयोगी माने जाते है और संगठन से बाहर के लोग बाहरी। संस्था में ऐसा भेद नहीं होता बल्कि संस्था अपनो की अपेक्षा दूसरों को अधिक महत्व देती है। संगठन कभी सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, संस्था को सुरक्षा की ऐसी कोई चिंता नहीं रहती। संगठन मजबूतों के शोषण से बचने के लिये बनाया जाता है किन्तु बाद में संगठन कमजोरों का शोषण करने लगता है। संस्था कभी कमजोरों का शोषण करती ही नही है बल्कि कमजोरो को शोषण से बचाने में सहायता करती है। संगठन में शक्ति होती है। जो लोग संगठित होते है वे असंगठितों की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली हो जाते है। संगठन में शक्ति केन्द्रित होती है। संस्थाओं में शक्ति अकेन्द्रित होती है। संस्थाये सेवा कार्य में लगी होती है और कभी भी शक्ति संग्रह का प्रयास नहीं करती। संगठन अपने संगठन के हित में नैतिकता की परिभाषा भी बदलते रहता है। वह दूसरों से कर्तव्य की अपेक्षा करता है और उन्हें नैतिकता की सलाह देता है किन्तु स्वयं कभी कर्तव्य की चिंता नही करता। संगठन का शक्तिशाली होना ही उसकी नैतिकता की परिभाषा होती है। संगठन प्रचार माध्यमों का भरपूर उपयोग करता है। आमतौर पर वह इसके लिये छल कपट का भी सहारा लेता है। संस्थाएं प्रचार माध्यमों से दूर रहती है। वे प्रचार के लिये कभी छल कपट का सहारा लेती ही नहीं। संगठन की सोच बहुत संकीर्ण होती है और संस्थाओं की व्यापक। संगठन दूसरे संगठनों से प्रतिस्पर्धा करते है किन्तु संस्थाएं अन्य संस्थाओं की सहायता करती है क्योंकि संस्थाओं का मुख्य उददेश्य सेवा होता है तो संगठनों का संग्रह।

दुनियां में कई प्रकार के संगठन भी बने हुये और संस्थाएं भी है। राजनैतिक, सरकारी कर्मचारियों के, किसानों और व्यापारियों के, महिला और पुरूष के, युवक वृद्धों के तथा अन्य अनेक आधार पर संगठन बने हुये है। ये संगठन दिन-रात समाज में टकराव और अव्यवस्था फैलाते रहते है। यदि हम और स्पष्ट विचार करे तो दुनियां में धर्म के नाम पर इस्लाम और राजनीति के नाम पर साम्यवाद पूरी तरह वैचारिक धरातल पर भी संगठन है और क्रियात्मक रूप में भी। संघ परिवार और सिख समुदाय भी ऐसे ही संगठन माने जाते है। रेड क्रोस सोसायटी संस्थाओं के रूप में बहुत विख्यात है। किन्तु इन सब से हटकर गायत्री परिवार, आर्य समाज, सर्वोदय जैसे कहे जाने वाले समूह संस्था माने जाते है, संगठन नही। इस्लाम, संघ, साम्यवाद, सिख तथा गायत्री परिवार, आर्य समाज, सर्वोदय आदि की कार्य प्रणाली और परिणाम ठीक से देखने पर संगठन और संस्था का अंतर साफ पता चल जाता है।

मुसलमानों और सिखों में भी कुछ सामाजिक संस्थाएं है। यद्यपि हिन्दुओं की तुलना में कम है। धीरे-धीरे भारत में संस्थाएं कम हो रही है और संगठन बढ रहे है। संगठनों का जितना ही विस्तार हो रहा है उतना ही अधिक समाज में टकराव बढ रहा है और उसी गति से अव्यवस्था भी बढ रही है। राजनैतिक दल तो लगभग पूरी तरह संगठन का रूप ले चुके है। राजनैतिक दल अप्रत्यक्ष रूप से व्यावसायिक संगठन तो है ही किन्तु धीरे-धीरे आंशिक रूप से अब आपराधिक संगठन सरीखा सा भी होते जा रहे है। आदर्ष स्थिति में राजनैतिक कार्य संस्थागत अधिक और संगठनात्मक कम माना जाता है किन्तुु वर्तमान समय में राजनीति में संस्थागत नैतिकता लगभग शून्य हो गई है और संगठनात्मक दुर्गुण हावी हो गये है।

जब आम लोगो को व्यवस्था से न्याय मिलने की पूरी उम्मीद रहती है तब संगठन नहीं बनते। यदि बनते है तो उन संगठनों को समाज में कोई सम्मान नहीं मिलता। किन्तु जब समाज में अव्यवस्था फैल जाती है, न्याय मिलना अनिश्चित हो जाता है तब हर व्यक्ति सुरक्षा के लिये किसी न किसी प्रकार से संगठित होने का प्रयास करता है। इसका अर्थ हुआ कि सभी अपराधियों के विरूद्ध सारे शरीफ लोगों को संगठित हो जाना चाहिये। यदि उसके बाद भी कोई खतरा हो तब सरकार को सक्रिय होकर न्याय और सुरक्षा की गांरटी देनी चाहिये। किन्तु जब प्रवृत्ति का आधार छोडकर अन्य आधारों पर संगठन बनने लगे तथा सरकार भी न्याय और सुरक्षा की जगह अन्य संगठनों को मान्यता और प्रोत्साहन देने लगे तब अव्यवस्था फैलती है। जब समाज में अव्यवस्था फैलती है तब धुर्त या अपराधी स्वभाव के लोग प्रवृत्ति के आधार के विपरीत अन्य आधारों पर संगठित होना शुरू कर देते है। जब सारा कार्य सरकार अपने पास संभाल लेती है और सरकार में व्यवस्था टूटकर भ्रष्टाचार में बदल जाती है तब नये-नये संगठन सामने आकर उस भ्रष्टाचार या अव्यवस्था का लाभ उठाना शुरू कर देते है। यदि मेरे घर में सांप के घुसने की कोई संभावना न हो अथवा मैं निश्चित रहूॅ कि सांप घुसेगा तो व्यवस्था के द्वारा मेरी सुरक्षा निश्चित है तब मैं अपने घर में डंडा नहीं रखूॅगा। असुरक्षा होने पर या सांप के घुसने पर मैं सतर्क भी रहूॅगा या डंडा रखूॅगा।

जब समाज में अपराधियों की बाढ आयी हुई हो और सुरक्षा का दायित्व संभाल रही सरकार जनकल्याण के आलतू फालतू कार्यो में व्यस्त हो तब स्वाभाविक है कि हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की स्वयं चिंता करे। ऐसी स्थिति में सुरक्षा के नाम पर संगठन बन जाते है और ऐसे संगठन बाद में कमजोरों का या असंगठितों का शोषण करते है। मैंने तो कई बार यह देखा है कि अनेक शरीफ लोग अपनी सुरक्षा के लिये अलग-अलग तरह के आपराधिक गिरोहो के साथ भी समझौता करने को बाध्य होते है। ऐसे लोग एक तरफ तो सरकार को टैक्स देते ही है दूसरी ओर संगठित गिरोह को भी टैक्स देने के लिये मजबूर रहते है। भारत में अब भी हिन्दू का बहुमत धार्मिक आधार पर संगठित नहीं होना चाहता किन्तु जिस तरह स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति ने अल्पसंख्यक तृष्टिकरण को बढावा दिया उससे हिन्दुओं के संस्थागत चरित्र को भी संगठित होने की मजबूरी दिखी। नरेन्द्र मोदी का निर्वाचन ऐसी ही मजबूरी माना जा सकता है। सरकार का काम असुरक्षितों की सुरक्षा करना होता है। यदि सरकार अपना काम ठीक से करे तो संगठन बनेगे ही नहीं किन्तु सरकार अपना काम छोडकर एक ओर तो जुआ, शराब वैश्यावृत्ति और तम्बाकू रोकने में लग गयी तो दूसरी ओर उसने संगठनों को मान्यता भी दे दी। परिणाम हुआ कि भारत में कुकरमुतों की तरह गांव गांव में संगठन बन गये। हर क्षेत्र में किसी भी आधार पर अलग-अलग प्रकार के संगठन बनने लगे और सरकारें ऐसे संगठनों को मान्यता देकर प्रोत्साहित करने लगी। यहां तक कि सरकार संगठितों को संगठित होने की सलाह भी देने लगी। कितनी बेशर्म सलाह है कि हमारी सरकार महिलाओं को कराटे की ट्रैंनिग देती है या नागरिकों को शस्त्र का लाइसेंस देती है। सुरक्षा देना उसका काम है तो वह काम नहीं करती और सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिये अनावश्यक हस्तक्षेप करती रहती है जो उसका काम नहीं है। दहेज प्रथा सरकार दूर करती है और अपनी शारीरिक सुरक्षा के लिये महिला को टकराव के लिये प्रेरित करती है। यह समझ में नही आता। मेरी यह मान्यता है कि सारी समस्याओं की जड मुख्य रूप से राजनैतिक व्यवस्था में है जो संस्थाओं को निरूसाहित और संगठनवाद को प्रोत्साहित करती है। यदि सरकार जनहित के काम छोडकर सुरक्षा देने में सक्रिय हो जाये तो संगठनों की बाढ रूक सकती है। फिर भी मैं यह चाहता हूॅ कि हम आप संगठनवाद को प्रोत्साहित न करे यदि संगठन बनाना हो तो अन्य सब प्रकार के भेदभाव समाप्त करके प्रवृत्ति के आधार पर अर्थात अपराधियों के विरूद्ध शेष लोगो का एक संगठन बने। अन्य सारे संगठन समाप्त कर दिये जाये चाहे किसी आधार पर क्यों न बने हो। संस्थागत चरित्र को प्रोत्साहित किया जाये। साथ ही राजनीति को इस दिषा में मजबूर किया जाये कि वह आम लोगो को संगठित होने की मजबूरी से बचा सके अर्थात सुरक्षा और न्याय सबको दे और किसी प्रकार के बने हुये वर्तमान संगठन को सरकारी मान्यता समाप्त कर दे। संगठन बनाना किसी भी परिस्थिति में अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु दीर्घकालिक सिद्धान्त नहीं हो सकती। इसलिये हमे दीर्घकालिक समाधान की दिशा में प्रयत्नशील रहना चाहिये।

मंथन क्रमांक 119 ’’व्यक्ति, परिवार और समाज’’–बजरंग मुनि,

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पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में व्यक्ति और सरकार को मिलाकर व्यवस्था बनती है। सरकार को ही समाज मान लिया जाता है। इस्लामिक व्यवस्था में परिवार और धर्म को मिलाकर व्यवस्था बनती है। साम्यवाद राज्य के अतिरिक्त किसी को मानता ही नहीं। न साम्यवाद व्यक्ति को मानता है, न परिवार, धर्म, समाज या किसी अन्य को। राज्य ही व्यवस्था की एक मात्र इकाई है। भारतीय व्यवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज को मिलाकर व्यवस्था बनती है। भारतीय व्यवस्था सीढीनुमा होती है जिसमें व्यक्ति, परिवार, कुटुम्ब, ग्राम या नगर से होते हुये समाज तक जाती है। राज्य को व्यवस्था की अंतिम इकाई न मानकर सहायक इकाई के रूप में माना जाता है। भारतीय व्यवस्था में राज्य को समाज का प्रतिनिधि नहीं माना जाता किन्तु व्यक्ति और परिवार को समाज का प्रतिनिधि माना जाता है। इस तरह भारत के अतिरिक्त अन्य सभी व्यवस्थाओं में राज्य समाज से भी उपर की भूमिका रखता है, जबकि भारत में नहीं।

पुराने जमाने में व्यवस्था की अंतिम इकाई नगर को माना जाता था इसलिये नगर के साथ नागरिक शब्द बना। अंग्रेजी में सिटी के साथ सिटीजन शब्द बना। स्पष्ट होता है कि नगर व्यवस्था की अंतिम इकाई थी। ऐसे अनेक नगरों को मिलाकर एक सम्मलित इकाई भी बन जाया करती थी जिसमें नगरों की विशेष भूमिका होती थी। आज भी विदेशों में काउंटि शब्द से कन्ट्री बन जाता है। स्पष्ट होता है कि कन्ट्री का अर्थ नगर से लिया जाता होगा। भारतीय व्यवस्था में परिवार एक संम्प्रभुता सम्पन्न इकाई थी जिसमें राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। नीचे की इकाई उपर वालों को कुछ दायित्व सौंपकर व्यवस्था बनाती रहती थी किन्तु उपर की इकाई नीचे वाली इकाई के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी। मैं यह कह सकता हूॅ कि व्यक्ति, परिवार और समाज का भारतीय संतुलन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ही देखने को मिलता है, दुनियां की किसी अन्य सामाजिक व्यवस्था में नहीं। सीढीनुमा व्यवस्था अन्य व्यवस्था की तुलना में अधिक आदर्श और सुविधाजनक मानी जाती है। राज्य का काम सुरक्षा और न्याय देने तक सीमित होता है। इस सुरक्षा और न्याय में ही परिवार, गांव, नगर, जिला तथा समाज राज्य की सहायता करता है। इस तरह राज्य की भूमिका विशेष परिस्थितियों में ही होती है। इसका अर्थ हुआ कि राज्य के अतिरिक्त अन्य इकाईयां भी किसी प्रकार का अपराध होने की स्थिति में अपराध नियंत्रण का उस सीमा तक प्रयत्न करती है जब तक व्यक्ति को दंडित करने की कोई मजबूरी न हो अर्थात आपसी समझौते द्वारा अथवा सामाजिक बहिष्कार के भय का उपयोग करके व्यक्ति की उच्श्रृंखलता को नियंत्रित करने का प्रयास होता है। इसलिये परिवार की आदर्श परिभाषा यह होती है कि परिवार संयुक्त संपत्ति और संयुक्त उत्तरदायित्व के आधार पर एक साथ रहने के लिये सहमत व्यक्तियों का समूह होगा। मैं मानता हूॅ कि अब तक भारतीय परिवार व्यवस्था में भी यह धारणा स्पष्ट नहीं दिखती है। हो सकता है कि गुलामी के बाद भारत की पारिवारिक व्यवस्था में यह कमी आई हो। यदि यह इसके पहले भी कभी रही होगी तो अब बदलने की आवश्यकता है। इसका अर्थ हुआ कि परिवार की संपूर्ण चल-अचल सम्पत्ति सामूहिक होगी, व्यक्तिगत नहीं। व्यक्तिगत सम्पत्ति का पश्चिम का सिद्धांत पूरी तरह गलत है। परिवार एक संस्था है और उस संस्था में सभी सदस्यों का अधिकार दायित्व और सम्पत्ति सामूहिक होती है अर्थात व्यक्ति परिवार छोडते समय अपना बराबर का हिस्सा लेकर जा सकता है तथा नये परिवार में सम्मलित करना अनिवार्य है। कोई भी व्यक्ति न अकेला रह सकता है न अपनी सम्पत्ति अलग रख सकता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति की मान्यता घातक है जो भारत में पश्चिम से आई और खतरनाक रूप से शामिल हो गयी।, इसी तरह परिवार के प्रत्येक सदस्य के अधिकार और दायित्व भी सामूहिक होते है। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का सदस्य परिवार में रहते हुये कोई अपराध करता है जिस अपराध में परिवार की भी मौन सहमति प्राप्त है तो उस अपराध के लिये पूरे परिवार को भी दंडित किया जा सकता है। परिवार का सामूहिक उत्तरदायित्व है व्यक्तिगत नहीं। यदि परिवार का कोई सदस्य मनमानी करता है तो या तो परिवार उसे परिवार से निकाल दे या सामूहिक दंड के लिये तैयार रहे। इसी तरह यदि कोई परिवार किसी रूप में सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुॅचाता है तो पूरे परिवार का भी बहिष्कार संभव है। इस प्रकार परिवार तथा अन्य सामाजिक इकाईयां व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर सामाजिक नियंत्रण रखती है और कोई व्यक्ति जब किसी नियंत्रण को नहीं मानता तब विशेष परिस्थिति समझकर राज्य व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में कटौती करने का दंड देता है अन्यथा किसी स्थिति में दंड देने की आवश्यकता नहीं पडती।

परिवार में व्यक्ति को अनुशासन, समानता और सहजीवन की पूरी-पूरी ट्रैनिंग मिल जाती है। परिवार का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण। व्यक्ति के परिवार का सदस्य बनते ही उसके सभी अधिकार उसकी सहमति तक परिवार में समाहित हो जाते हैं। इसका अर्थ हुआ कि परिवार में व्यक्ति सिर्फ कर्तव्य करता है, उसके कोई अधिकार तब तक नहीं जब तक वह परिवार का सदस्य है। समाज की हर इकाई में व्यक्ति कर्तव्य प्रधान तथा अधिकार शून्य होता है। व्यक्ति के अधिकार तो संवैधानिक ही होते हैं। परिवार का ढाॅचा सबकी सहमति से बनता है और नगर का ढांचा परिवारों की सहमति से बनता है। उपर की इकाईयां भी इसी तरह बनती चली जाती है। यह सभी इकाईयां व्यवस्था की इकाई होती है। एक अतिरिक्त इकाई बनती है। जिसे हम राज्य कहते है। राज्य किसी संवैधानिक इकाई का नाम है। राज्य संविधान के अंतर्गत काम करता है। संविधान निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होती है। राज्य व्यक्ति के व्यक्तिगत, परिवार के पारिवारिक और समाज के सामाजिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि यह सब समाज व्यवस्था की इकाईयां है। राज्य तो सिर्फ प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय देने तक सीमित होता है। पश्चिमी संसदीय लोकतंत्र की विभिन्न बुराईयों ने भारतीय पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था को भी विकृत कर दिया। यहां तक कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने पश्चिम की नकल करते हुये परिवार व्यवस्था को संवैधानिक इकाई न मानकर कानूनी इकाई घोषित करने की भूल कर दी। परिणाम हुआ कि परिवार नगर, गांव, समाज सभी प्रमुख इकाईयां राज्य के हस्तक्षेप के अंतर्गत समाहित हो गई जिसके फलस्वरूप राज्य प्रबंधक की जगह मालिक बन गया और धीरे-धीरे उसने संविधान पर भी कब्जा कर लिया। जब तक मुस्लिम शासन काल था तब तक परिवार व्यवस्था और नगर व्यवस्था में सरकार का हस्तक्षेप न के बराबर था क्योंकि मुस्लिम व्यवस्था परिवार और कुटुम्ब को महत्वपूर्ण मानती है लेकिन अंग्रेजों की गुलामी के बाद परिवार और नगर व्यवस्था पूरी तरह राज्य के नियंत्रण में आ गई। यद्यपि मुस्लिम शासन में व्यक्ति का महत्व नहीं था जो अंग्रेजी शासन काल में स्थापित हो गया।

हम कह सकते है कि भारत की सम्पूर्ण व्यवस्था में व्यक्ति को पूरी तरह उसी तरह मौलिक अधिकार प्राप्त था जिस तरह पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में है। भारत की व्यवस्था में परिवार और कुटुम्ब का भी पूरा-पूरा स्थान था जिस तरह मुस्लिम व्यवस्था में है। भारत में ग्राम और नगर व्यवस्था को भी पूरी-पूरी मान्यता थी। राज्य को विशेष परिस्थिति में न्याय और सुरक्षा तक सीमित रखा गया था। गुलामी के बाद भारत की सारी की सारी सामाजिक व्यवस्था विकृत हो गयी और स्वतंत्रता के बाद पश्चिम और साम्यवाद की नकल करने वाले संविधान निर्माताओं ने भारत की अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह संविधान से बाहर कर दिया। भारत, जो व्यक्ति, परिवार और समाज के संतुलन से चलने वाली व्यवस्था का आदर्श माना जाता रहा है वही भारत इस्लाम, पश्चिम और साम्यवादी देशों के तालमेल से बनी खिचडी व्यवस्था से इतना प्रभावित हुआ कि उसकी मौलिक व्यवस्था ही समाप्त हो गई। परिवार और समाज व्यवस्था का अस्तित्व संकट में है। व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों को भी तंत्र द्वारा बनाया गया संविधान प्राकृतिक की जगह संवैधानिक मानने लगा है अर्थात व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता अभिव्यक्ति व सम्पत्ति आदि मूल अधिकारों की भी सीमाएं बनने लगी है। व्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है, उसे संविधान परिभाषित करने लगा है। भारत की अपनी मौलिक सोच विदेशों की नकल के कारण अपनी वास्तविक स्वरूप खो रही है।

आज दुनियां एक संकटकालीन अव्यवस्था से भयभीत है। भारत तो ऐसी अव्यवस्था से दिन रात ग्रसित है। इस अव्यवस्था का सिर्फ एक ही समाधान है कि हम भारत के लोग भारत की अपनी परम्परागत व्यक्ति, परिवार और समाज के संतुलन की व्यवस्था पर लौटकर आ जाये और सारी दुनियां को यह संदेश दे सके कि व्यक्ति, परिवार और समाज का संतुलन ही वर्तमान विश्वव्यापी भय मुक्ति का तरीका है। मेरा निवेदन है कि हम इस अभिनव प्रयोग के लिये भारत में पहल करें और भारत की व्यक्ति, परिवार, समाज व्यवस्था को राजनैतिक संवैधानिक व्यवस्था के चंगुल से मुक्त करावे।

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