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मंथन क्रमाँक-117 ’’भारतीय राजनीति मे अच्छे लोग’’–बजरंग मुनि
समाज मे अच्छे शब्द की जो परिभाषा प्रचलित है उस परिभाषा मे भी राजनीति को कोई अच्छा स्थान प्राप्त नही हैं। राजनीति कभी भी न समाज सेवा का सर्वश्रेष्ठ आधार बनी न ही व्यवस्था परिर्वतन का। इसलिये ...
मंथन क्रमांकः116 “#मानवाधिकार”–बजरंग मुनि
1. व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है 1. प्राकृतिक अथवा मौलिक 2. संवैधानिक 3. सामाजिक। मौलिक अधिकारो को ही प्राकृतिक अथवा मानवाधिकार भी कहा जा सकता है; 2. मानवाधिकार सृष्टि के प्रारम्भ से लेक...
मंथन क्रमाँक-115 ’’ज्ञान, बुद्धि, श्रम और शिक्षा’’–बजरंग मुनि
1. ज्ञान और शिक्षा अलग-अलग होते है। ज्ञान स्वयं का अनुभवजन्य निष्कर्ष होता है तो शिक्षा किसी अन्य द्वारा प्राप्त होती है; 2. ज्ञान निरंतर घट रहा है और शिक्षा लगातार बढ रही है। स्वतंत्रता के बाद भ...
मंथन क्रमांक-114 ’’ईश्वर का अस्तित्व’’–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है- 1. ईश्वर है, किन्तु यदि नहीं भी हो तो एक ईश्वर मान लेना चाहिए; 2. ईश्वर और भगवान अलग-अलग होते है। धर्म दोनों को अलग-अलग मानता है और सम्प्रदाय एक कर देता है; 3. ईश्वर एक अदृश्य शक्ति के...
मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...
मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः 1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ; 2. धर्म शब्द के अनेक अ...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...

Posted By: admin on June 14, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

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Posted By: admin on June 8, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

मैं लंबे समय से लिखता रहा हूं कि भारत की अर्थव्यवस्था गरीब ग्रामीण श्रमजीवी उत्पादकों के विरुद्ध पूंजीपति शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्ताओं का मिलाजुला षड्यंत्र है।ं वर्तमान किसान आंदोलन भी पूंजीपति शहरी बुद्धिजीवी किसानों का षड्यंत्र है ।सभी किसान संगठन सस्ती बिजली डीजल खाद की मांग कर रहे हैं जिसका नाम मात्र का लाभ गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसानों को होगा । खाद बिजली डीजल का मूल्य दोगुना करके उससे प्राप्त धन गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसानों को बांट दीजिये । लेकिन आंदोलनकारी इससे कभी सहमत नहीं होंगे । मैं चाहता हूं कि इस समस्या का समाधान बैठकर किया जाना चाहिए वर्ग संघर्ष से नहीं

Posted By: admin on June 6, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

Posted By: admin on May 26, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

Posted By: admin on May 19, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

bajragmuni

Posted By: admin on April 14, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

bajrangmuni

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राष्ट्रगान आदेश कितना न्यायिक कार्य?

Posted By: admin on December 5, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »

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उच्चत्तम न्यायालय ने आदेश दिया है कि भारत के सिनेमा घरों में फिल्म के प्रारंभ में राष्ट्रगीत अनिवार्य होगा। मैं नहीं समझ सका कि न्यायपालिका का यह आदेश कार्यपालिक है या विधायी। क्योंकि इस आदेश को न्यायिक आदेश तो नहीं कहा जा सकता। प्रश्न यह भी उठता है कि क्या न्यायपालिका के पास इतना खाली समय बचने लगा है कि वह अपना आवश्यक न्यायिक कार्य पूरा करते हुए यह कार्य कर सकती है? अभी कुछ माह पूर्व ही तो न्यायपालिका ने देश के समक्ष यह समस्या रखी थी कि जजों की कमी के कारण अनेक न्यायिक कार्य पिछड़ रहे हैं तो एकाएक न्यायपालिका के पास इतनी सुलभता कहां से आ गई? क्या राष्ट्रगान का यह मामला इतना प्राथमिक था कि न्यायालय के लिये अपने सभी न्यायिक काम छोड़कर इस पर पहले निर्णय करना पड़ा? मैं इस आदेश के पक्ष विपक्ष की कोई समीक्षा नहीं कर रहा। मैं तो सिर्फ इतनी सी चिन्ता कर रहा हॅू कि ओवर लोडेड न्यायपालिका को अपना पिछड़ा हुआ न्यायिक काम छोड़़कर यह निर्णय लेने की पहल क्यों आवश्यक महसूस हुई?

मंथन क्रमांक -10 प्रश्नोत्तर- राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?

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आचार्य पंकज,वाराणसी
प्रश्न – मैं जानता हॅू कि आप अनेक गंभीर तथा विश्वस्तरीय विषयों पर लीक से हटकर मौलिक विचार रखते हैं। मैं यह भी जानता हॅू कि आपकी कही कई बातें प्रारंभ में गलत दिखती हैं किन्तु बाद में सत्य सिद्ध होती हैं। किन्तु आपने पंडित नेहरु जैसे देशभक्त की तुलना में नाथूराम गोडसे जैसे हत्यारे को देशभक्त लिखकर पूरी तरह सत्य की अन्देखी की है। पंडित नेहरु ने गाॅधी जी के कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया। कई बार जेल भी काटी। सम्पन्न परिवार की सभी संभव सुख सुविधाएॅ छोडकर दर दर भटकते रहे। दूसरी ओर रहा गोडसे जिसका स्वतंत्रता संग्राम में कभी कोई योगदान नहीं था। उसने अपने पूरे जीवन में यदि कोई काम किया तो वह था गाॅधी हत्या का। गोडसे ने यह एक काम छोडकर देश या समाज के लिये कुछ और किया हो तो आप बताइये। ऐसे व्यक्ति को महिमा मंडित करनेे में आपसे कुछ भूल हुई है। कृपया मार्ग दर्शन करें।
उत्तरः- मैं आपसे पूरी तरह सहमत हॅू कि स्वतंत्रता के पूर्व पंडित नेहरु का त्याग बहुत ही उल्लेखनीय रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व नाथूराम गोडसे का कोई योगदान नहीं रहा और यदि रहा भी होगा तो वह स्वतंत्रता के प्रयासों के विपरीत ही होगा किन्तु स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरु के सारे प्रयास गाॅधी विचारधारा तथा समाज सशक्तिकरण के विपरीत रहे। जबकि गोडसे का तो गाॅधी हत्या के बाद इतिहास ही समाप्त हो गया । मैं मानता हॅू कि गोडसे का कार्य इतिहास के लिए लम्बे समय तक कलंक बना रहेगा क्योकि गोडसे ने जो अपराध किया वह कभी माफ करने लायक नहीं है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि पंडित नेहरु ने देश को जो विपरीत दिशा दी उसके लिए पंडित नेहरु मांफ करने योग्य है। यदि कोई शराबी शराब के नशे में अपने पिता की हत्या कर दे तो कानून उस हत्यारे पुत्र को दण्डित करेगा और समाज उस पुत्र को माफ करके शराब के विरुद्ध अभियान चलायेगा जिससे कोई भविष्य में शराब के नशे में ऐसी गलती न करे। कानून ने गोडसे को सजा दे दी गोडसे को ऐसा विपरीत कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाली विचारधारा 70 वर्षाे बाद भी तेजी से फल फूल रही हैं और समाज आज सिर्फ गोडसे से घृणा मात्र कर रहा है । निश्चित ही इस विचारधारा के निरंतर विस्तार में न कोई गाॅधी की भूमिका है और न ही गोडसे की। यदि इसके विस्तार में किसी की गलत भूमिका रही तो वह पंडित नेहरु ,अम्बेडकर आदि की ही मानी जा सकती है जिन्होने स्वतंत्रता संघर्ष के लिए गाॅधी का भरपूर उपयोग किया और स्वतंत्रता के प्रांरभ से ही गाॅधी विचारधारा को बिल्कूल छोड दिया। मैं स्पष्ट कर दॅू कि गाॅधी के जीवित रहते ही नेहरु,अम्बेडकर आदि गाॅधी की स्वतंत्रता पश्चात की किसी योजना से सहमत नही थे। मैं कह सकता हॅू कि वर्तमान में जो दो विपरीत विचारधाराएॅ भारत में दिख रही है उनमें एक गाॅधी का स्पष्ट विरोध करके आगे बढ रही है तो दूसरी गाॅधी को माला पहनाकर, अपने नाम के साथ गाॅधी शब्द जोडकर, खादी और चरखा का ढोंग करके,तथा गाॅधी विचारधारा के विपरीत चलकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही है। क्या यह हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय नहीं है कि दोनों विचारधाराएॅ एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हुए भी तथा गाॅधी विचार विरोधी होते हुए भी निरंतर आगे बढती जा रही हैं और हम किसी तीसरी दिशा में आगे नहीं सोच पा रहे। आप सोचिये कि वर्तमान स्थिति में इन दोनों विचारधाराओं में से मैं किसकी प्रशंसा करु और क्यों करुं?
प्रश्न – वर्तमान समय में पूरा भारत अनिश्चय के दौर से गुजर रहा है। आप भी स्पष्ट नहीं कर रहे कि नोट बंदी भारत के हित में है या नहीं । कृपया और स्पष्ट करें।
उत्तरः- मेरा काम किसी समाधान के गुण दोष की व्याख्या करना मात्र है। किस दिशा मे बढना है यह निर्णय करना आप सब का काम है, मेरा नहीं।
समाज के समक्ष तीन स्थितियाॅ होती हैं- 1 तंत्र आश्रित समाज व्यवस्था 2 तंत्र मुक्त समाज व्यवस्था 3 तंत्र रहित समाज व्यवस्था। तंत्र रहित की कल्पना युटोपिया है अतः तंत्र मुक्त या तंत्र निर्भर पर सोचा जा सकता है। अर्थव्यवस्था भी सम्पूर्ण व्यवस्था का एक छोटा सा भाग है। अर्थव्यवस्था में दो मार्ग संभव है – तंत्र मुक्त व्यवस्था की दिशा में बढना हो तो टैक्स सिस्टम में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। वस्तु विनिमय को पूरी तरह कर मुक्त करना होगा तथा इनकम टैक्स आदि भी समाप्त होंगे। सरकार के खर्च के लिए सम्पत्ति कर लगाकर तथा खर्च घटाकर व्यवस्था करनी होगी। राज्य मुक्त वस्तु विनिमय की स्वतंत्रता होगी तथा सरकारी करेंसी में एक लाख रु का नोट भी मान्य करना होगा। यदि हम तंत्र निर्भर व्यवस्था की ओर बढना चाहते है तो पूरी तरह करेंसी को विभिन्न चरणों में समाप्त करना होगा जिससे वस्तु विनिमय में टैक्स की किसी तरह की कोई हेरा फेरी न हो सके।सारा वस्तु विनिमय तथा आय व्यय बैंक के माध्यम से ही करना होगा। दोनों व्यवस्थाएॅ एक साथ नहीं चल सकतीं क्योंकि दोनों के अलग अलग गुण दोष हैं। वर्तमान भारत तंत्र निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ रहा है जिस दिशा में नरेन्द्र मोदी का साहसपूर्ण कदम बिल्कुल उचित है। होना तो यह चाहिए की सरकार साथ ही यह भी घोषित कर देती कि सन 2018 के प्रारंभ के बाद 50 रु से अधिक के नोट भी बंद कर दिये जायेंगे। इस घोषणा के बाद भारत में अनिश्चय का वातावरण नहीं होता और हर आदमी यह समझ जाता कि अब उसे किस दिशा में बढना है। सम्भवतः इस घोषणा के बाद बैंको में लम्बी लाईने लगनी बंद हो जाती क्योंकि करेंसी के प्रति मोह टूट जाता। अब भी सरकार ऐसा कर दे तो बहुत कुछ सुधर सकता है।
मैं स्पष्ट हॅू कि मैं राज्य आश्रित व्यवस्था को आदर्श नहीं मानता किन्तु मैं यह जानता हूॅ कि राज्य आश्रित व्यवस्था का यही एक मात्र मार्ग है। आदर्श स्थिति अर्थात राज्य मुक्त समाज व्यवस्था की ओर बढने के लिए विश्वस्तरीय प्रयत्न करने होंगे जिसकी पहल भारत से शुरु हो चुकी है। मैं जानता हॅू कि ‘व्यवस्थापक’ भारत की एक मात्र ऐसी संस्था है जो राज्य मुक्त व्यवस्था की ओर बढने के लिए जनमत जागरण कर रही है। किन्तु मैं संतुष्ट हॅू कि इस संबंध में निरंतर प्रयास बढ़ रहे है तथा मुझे भविष्य में स्पष्ट दिखता है कि या तो जागृत जनमत के समक्ष वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था झुकेगी या प्रबल जनमत उसे झुकाने में सफल होगा। मैं चाहता हॅू कि वर्तमान आर्थिक परिवर्तन का समर्थन करने की आवश्यकता है तथा साथ ही राज्य मुक्त व्यवस्था की ओर तेजी से जनमत जागरण में भी लगने की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि समाधान के प्रयत्न टुकडें न करके समग्र समाधान की ओर बढना होगा।

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