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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है 1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है। 2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं। 2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है ब...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

भाजपा का सैद्धान्तिक समझौता

Posted By: admin on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

सर्व विदित है कि तानाशाही में आसानी से व्यवस्था स्थापित की जाती है साथ ही इसमें अनुशासन व चरित्र एक विशेष दिशा में बढ़ता जाता है। यदि तानाशाह की नीति व नीयत भलाई की हो तो वह बहुत आसानी से सही दिशा में व्यवस्था दे सकता है किन्तु यदि उसकी नीति या नीयत में कोई खोट हो तो उतनी ही तेजी से समाज को गुलाम भी बना सकता है।

संपूर्ण भारत में सिर्फ दो ही दल लोकतांत्रिक व्यवस्था से चल रहे है – 1) जे.डी.यू   2) भारतीय जनता पार्टी । शेष सभी दल तानाशाही के रूप में अपने दल का नेतृत्व कर रहे है। लोकतंत्र जहां जीवन पद्धति में न आकर शासन पद्धति में आता है वहां अव्यवस्था निश्चित है। भारतीय राजनीति तथा उसके सभी राजनैतिक दल शासन पद्धति वाले लोकतंत्र को आधार बनाकर चलते है। परिणाम होता है अव्यवस्था । यही हुआ दोनों पार्टियो के साथ। जे.डी.यू लोकतंत्र पर अडिग रहकर अव्यवस्थित है। स्वतंत्रता के बाद साठ वर्षो तक भाजपा भी लोकतंत्र के कारण अव्यवस्थित होकर टूटती जुटती रही क्योंकि कभी अटल जी लोकतंत्र को मजबूत करने लगते थे तो कभी संघ व्यवस्था को मजबूत करने लगता था । अब जबकि संघ का पूरा नियंत्रण भाजपा पर हो चुका है, अटल जी वृद्ध होकर अलग-थलग हो चुके है वैसी स्थिति में भाजपा पुनः अनुशासित होकर अपने लोकतंत्र से समझौता करके पुनः केन्द्रित व्यवस्था के आधार पर खड़ा होने की कोशिश करेगी । उम्मीद है कि इस दिशा में चल कर वह तेजी से एक तानाशाह अनुशासित व्यवस्थित व सक्रिय पार्टी बन जायेगी। यह परिवर्तन भाजपा को पुनर्जीवित कर सकता है किन्तु क्या यह समाज के लिये उचित होगा ? इस तानाशाही के प्रभाव से उसका मुख्य नियंत्रक संघ भी अछूता नही रह सकेगा। आज भी सर्वाधिक अच्छे व नैतिक व्यक्ति संघ से जुडे़ हुये है। क्या वे भाजपा के चरित्र पतन को रोक पायेंगे जो असंभव दिखता है । स्वाभाविक है कि संघ में आन्तरिक असंतोष और अव्यवस्था होगी। क्योकि भाजपा के परिणाम से संघ को प्रभावित होते देखकर संघ के प्रति समर्पित लोगों को उत्तर देना कठिन होगा ।

क्या हमें यह मान लेना चाहिये कि जनसंघ या भाजपा के जन्म से ही भाजपा ने लोकतंत्रीय व्यवस्था की जो मसाल जलाई थी वह लोकतंत्रीय दुष्परिणामों से डरकर थक कर हार गई है और आंतरिक व्यवस्था में तानाशाही के रूप में चलने को मजबूर हो गई है।

यदि ऐसा है तो भाजपा क्यो श्रेष्ठ है क्यो हम उससे जुड़ाव रखे। जब अन्य पार्टी जैसा उसे भी रहना है तो क्यो न हम उस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देखकर उसके पक्ष चले जो राष्ट्र के लिये अच्छा कार्य करे, जो समाज के लिये अच्छा कार्य करे। जो समाज की शक्तियों का केन्द्रीयकरण न करके उन्हें विकेन्द्रीत करे एवं समाज के हर व्यक्ति को मजबूत करे । यदि अन्य कोई पार्टी ऐसा समाज सशक्तिकरण का कार्य करे तो व्यक्ति को उसी पार्टी के साथ जुड़ना चाहिये जो अधिकतम आजादी प्रदान करें । मेरा विचार है कि या तो हम तटस्थ होकर ऐसे दल की समीक्षा करे या कोई अन्य विकल्प खोजने का प्रयत्न करे ।

महिला आरक्षण का विरोध क्यों ?

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मैंने अपने पिछले लेख में महिला आरक्षण का इसलिए विरोध किया था क्योंकि ऐसा आरक्षण स्त्री और पुरुष के बीच पूरक के भावना को कमजूर करके प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ाएगा पर ऐसी प्रतिस्पर्धा की भावना पारिवारिक एकता के लिए घातक होगी | किन्तु में महिला आरक्षण के वर्तमान विरोध के तो और भी अधिक विरुद्ध हूँ क्योंकि यह विरोध पारिवारिक भावना से भी बहुत अधिक नीचे जाकर व्यक्तिगत स्वार्थ भाव को मजबूत करता है | महिला आरक्षण विरोधियों के तर्क भी गलत हैं और नीयत भी | उनके तर्क इसलिए गलत है क्योंकि वे आरक्षण में भी और आरक्षण की मांग करके आरक्षण भावना विस्तार के पक्षधर बन रहे हैं | दूसरी और उनके विरोध के पीछे उनका यह स्वार्थ भी छीपा है कि वे कहीं व्यक्तिगत रूप से बेदखल न होजाएं | वे कभी नही चाहेंगे कि उन्हें बेदखल करके उनकी पत्नी भी वह स्थान पा ले | आरक्षण के कारण कहीं वे स्वयं भी बहार हो जावें और पत्नी भी न आवे तब तो उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न हो गया  | ऐसे लोगों कि सोच इतनी पतित है कि वे पति पत्नी को एक दुसरे का पूरक न मानकर पत्नी को अपना पूरक तथा समाज को अपने परिवार का पूरक बनाना चाहते हैं |
महिला आरक्षण योजना कुल मिलाकर समाज व्यवस्था को छति पहुचाकर सक्षम परिवारों को सशक्त करने का षड़यंत्र है | इसका विरोध इस उद्देश्य से होना चाहिय | साथ ही महिला आरक्षण का वर्तमान विरोध व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया जाने वाला व्यक्तिगत षड़यंत्र है इसलिए ऐसे विरोध को किसी भी स्थिति में सफल नही होने देना चाहिए | मेरा कहने का आशय यह हे कि महिला आरक्षण विरोधियों का पूरी तरह विरोध करना चाहिये यदि उनका विरोध सैद्धांतिक न होकर स्वार्थ पूर्ण दिशा में दिखता हो | इसीलिए महिला आरक्षण सम्बन्धि पिछले लेख में मैंने यहाँ तक लिख दीया था कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक विरोध करना चाहिए और यदि देना  आवश्यक ही दीखे तो कुछ वर्षों के लिए सो प्रतिशत आरक्षण भले ही दे दे किन्तु वर्तमान आरक्षण का समर्थन न करे|

महिला आरक्षण : समस्या या समाधान

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किसी भी समस्या के समाधान के पूर्व समस्या की पहचान, कारण, समाधान के लाभ और हानि की समीक्षा स्वाभाविक है। महिला आरक्षण के विषय पर भी देश भर में समीक्षा हो रही है।

सिद्धान्त रूप में आरक्षण घातक होता है। हजारों वर्ष पूर्व परिवार में पुरूष प्रधानता आरक्षण के रूप में स्थापित हुई तथा उस प्रधानता ने समाज में भी पुरूष प्रधान व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण कर लिया । महिला और पुरूष दो वर्ग के रूप में स्थापित होने लगे । महिलाओं की क्षमता और योग्यता की सीमाएँ निर्धारित हुई जो पुरूषों द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों द्वारा ऐसी पुरूष प्रधानता का दुरूपयोग स्वाभाविक था । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों ने इसका लाभ भी खूब उठाया । इस्लाम में तो ऐसे एकपक्षीय नियम ही बना दिये गये कि परिवार में मालिक पति होगा किन्तु हिन्दुत्व में भी पुरूष मुखिया की व्यवस्था मालिक से कोई बहुत कम नहीं रही ।

इस समाज व्यवस्था को तोड़ने के नाम से महिला उत्पीड़न रोकने के अनेक कानून बने । महिला आरक्षण प्रयास उसी की एक कड़ी है। निसंदेह ऐसे प्रयत्नों से पुरूष प्रधान व्यवस्था टूटेगी और महिलाओं को आगे आने का अवसर मिलेगा । किन्तु विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इन प्रयत्नों का संपूर्ण समाज व्यवस्था पर क्या और कितना प्रभाव पडेगा । एक सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे कानूनों का सर्वाधिक लाभ धूर्त महिलाओं ने उठाया है। यहाँ तक कि धूर्त पुरूषों ने भी शरीफ पुरूषों के उत्पीड़न के उद्देश्य से महिला उत्पीड़न प्रावधानों का भरपूर दूरूपयोग किया । कुल मिलाकर वर्ग विद्वेष व वर्ग संघर्ष मजबूत हुआ और वर्ग समन्वय टूटा । परिवार व्यवस्था में भी टूटन बढ़ने लगी । वर्तमान महिला आरक्षण विधेयक इस टूटन को और अधिक बढ़ाएगा ।

वर्तमान आरक्षण विधेयक का एक और दुष्प्रभाव होगा । कानूनी अधिकार सक्षम परिवारों की ओर केन्द्रित हो जायेंगे। पहले संसद में यदि चार सौ परिवारों का प्रतिनिधित्व था तो वह अब घटकर तीन सौ परिवारों तक सिमट जायेगा । यदि युवको को भी आरक्षण दे दिया जाय तो फिर तो और भी सुविधा हो जायेगी, सौ परिवारों की ही ठेकेदारी में संसद सिमट जायेगी । सरकारी नौकरियों का भी यही हाल होगा कि नौकरियाँ कुछ परिवारों तक सिमटने लगेंगी । यह केन्द्रीयकरण तो और भी अधिक घातक होगा।

महिला और पुरूष के बीच की दूरी क्या हो यह भी एक विषय है। यह दूरी यदि सीमा से अधिक बढ़ी तो नई पीढ़ी का सृजन रूकेगा और सीमा से अधिक घटी तो विध्वंस होगा। स्त्री और पुरूष की तुलना आग और बारूद से की जाती है। आग और बारूद की सीमा क्या हो यह तय करना आसान नहीं । इसलिये समाज ने सहमत स्त्री पुरूष के बीच की दूरी को न्यूनतम कर दिया और उसे पति पत्नी के रूप में भी मान्यता दे दी और वैश्यालय के रूप में भी। दूसरी ओर असहमत स्त्री पुरूष के बीच इस दूरी को अधिकतम कर दिया यहाँ तक कि परिवार में भी। वर्तमान व्यवस्था इस दूरी की सीमाओं के निर्धारण में खिलवाड़ कर रही है। सहमत स्त्री पुरूषों के बीच दूरी बढ़ाई जा रही है वैश्यालय या बार बालाओं पर रोक लगाकर तो असहमतों के बीच दूरी घटाई जा रही है सहशिक्षा प्रोत्साहन या सरकारी नौकरी संसद आदि में आरक्षण देकर । यह दूरी घटेगी तो उससे होने वाली असुरक्षा भी सिर दर्द बनेगी ही। एक ओर आग और बारूद की दूरी घटाने का आनन्द और दूसरी ओर रूचिका राठौर या नारायण दत्त तिवारी विध्वंस पर हाय तोबा एक साथ कैसे संभव है।

महिला आरक्षण विधेयक की समीक्षा में हमें प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी कि हम भारत में चरित्र पतन भ्रष्टाचार आदि को पहली प्राथमिकता मानते हैं या महिला पुरूष असमानता को ।  यह असमानता जन जागृति से कम होने में लम्बा समय लगेगा किन्तु दुष्प्रभाव नहीं होगा। यदि यह काम कानून से होगा तो जल्दी होगा और अनेक समस्याएँ पैदा करेगा। मैं तो इस मत का हॅू कि यदि महिला पुरूष असमानता जल्दी दूर हो और वर्ग विद्वेष को बढ़ावे, अधिकार सक्षम परिवारों तक केन्द्रित करे तथा धूर्तता को मजबूत करे तो यह प्रयास लाभ कम और हानि अधिक करेगा। ऐसी जल्दबाजी से बचना चाहिये । पुरूष प्रधानता धीरे धीरे कम हो और परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर न हो यह अधिक सुरक्षित मार्ग होगा ।

बजट का रोना

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बजट म जबूरी का रोना नही, सिद्धान्तों का आइना होना चाहिये। महिनों से प्रतीक्षित प्रणव मुखर्जी का केन्द्रीय बजट प्रस्तुत हुआ । बजट में हिम्मत तो दिखाई गई है किन्तु यथार्थ को छिपाया गया है। भारत का यथार्थ यही है कि उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य उस सीमा तक बढ़ने चाहिये जहाँ तक कृषि और श्रमिक उत्पादन प्रभावित न हो।

भारत का यथार्थ यह भी है कि कृत्रिम उर्जा को उस सीमा तक मंहगा किया जाय कि श्रम की मांग बढ़ने लगे। दोनो ही मामलो में कांग्रेस सरकार यथार्थवादी मार्ग की ओर चलने का प्रयास तो कर रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार नही कर रही है। सरकार उत्पादन बढ़ाने के लिये मंहगाई बढ़ा रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार न करके मजबूरी में । सरकार डीजल पेट्रोल का मूल्य भी बढ़ा रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार न करके किसी तरह मजबूरी दिखाकर, रोते धोते ।

प्रस्तुत बजट में बड़ी मश्किल से दो तीन रूपया प्रति लीटर डीजल पेट्रोल का मूल्य बढ़ा, और उसे भी मजबूरी बताया जा रहा है। हमारे देश के अर्थशास्त्रियों ने सिर्फ पश्चिम के किताबों को पढ़ पढ़ कर अर्थशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की । भारत का श्रम शास्त्र कहता है कि कृत्रिम उर्जा श्रम की प्रतिस्पर्धी होती है और बुद्धिजीवियों की सहायक । हमारे अर्थशास्त्री श्रम और बुद्धि की तुलना में बुद्धि की ओर एकपक्षीय झुक जाते हैं। यह प्रवृति श्रम के साथ छल है। हमारी संपूर्ण अर्थनीति गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, किसान, के नाम पर पर इन चारो के छदम शोषण के मार्ग पर चल रही है। प्रणव मुखर्जी  के बजट ने इसके विरूद्ध हिम्मत तो दिखाई है किन्तु समझदारी नहीं दिखाई। समझदारी तो यह होती कि वे संसद के  बहाने समाज के समक्ष प्रस्ताव रखते कि कृत्रिम उर्जा पर बीस प्रतिशत मूल्य वृद्धि करके संपूर्ण प्राप्त राशि गरीबी रेखा के नीचे के पचीस करोड़ व्यक्तियों में बराबर बराबर बांट दी जायगी यह राशि करीब पांच सौ रूपया प्रति व्यक्ति प्रतिमाह होगी अर्थात वर्ष में एक परिवार के पांच आदमी को 72000 रू.। प्रणव दादा कल्पना तो करे कि जनता क्या चाहेगी। जनता पर आप बोझ बढ़ावे, और गुलछर्रे उढ़ावें, भ्रष्टाचार बढ़ावें शिक्षा पर बजट बढ़ावें, दिल्ली में खेल आयोजित  करावें । इसलिये टैक्स स्वीकार नहीं । टैक्स बढ़ाइये और ग्रामीण गरीब श्रमजीवी को दीजिये तो जनता आपका स्वागत करेगी ।
विपक्ष को न डीजल पेट्रोल की मूल्य वृद्धि की चिन्ता है न गरीब ग्रामीण श्रम जीवी की । वामपंथी दलों को खाड़ी देशो से मिलने वाली सहायता के कारण उनकी वकालत करनी ही पड़ती है। यदि डीजल पेट्रोल का मूल्य बढ़ने से खपत घटी तो खाड़ी देशो पर दुष्प्रभाव होगा । भाजपा को अर्थनीति का ज्ञान कभी हुआ ही नहीं । लालू मुलायम मयावती आदि मनमोहन सोनिया की बढ़ती प्रतिशत से चिन्तित है। सबकी अपनी अपनी मजबूरी है, कांग्रेस के विरूद्ध विपक्षी एक जुटता उनकी मजबूरी है। दूसरी ओर जीवन भर मंहगाई और डीजल पेट्रोल की मूल्य वृद्धि  के विरूद्ध  बोलने वाली कांग्रेस को भी यथार्थ स्वीकारने में कठिनाई है। यथार्थ यह है कि-
कृत्रिम उर्जा सस्ती हो यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है,
श्रम का शोषण करने का यह पूंजीवादी मंत्र है।
फिर भी प्रणव मुखर्जी ने हिम्मत का काम तो किया ही है। इसके लिये उन्हें बधाई ही देनी चाहिये ।

राज ठाकरे और इतिहास के सबक

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जब भी किसी तात्कालिक उद्देश्य के लिये आवंछित लोगों को आगे बढाया जाता है तब उसके घातक परिणाम स्वयं को ही भुगतने पडते है। स्वतन्त्रन्ता के पूर्व संघ परिवार मे गाधीं जी के विरूद्ध जो वातावरण बना था वह संघ परिवार के नियन्त्रण से बाहर हो गया । परिणाम स्वरूप संघ परिवार की कोई  योजना न होते हुए भी गांधी जी की हत्या हो गई।

अमेरिका ने रूस को अफगानिस्तान से बाहर करने के उद्देश्य से लादेन को सशक्त किया था। लादेन अमेरिका के नियन्त्रण से बाहर हुआ और परिणाम आप सबके सामने है। इंदिरा जी ने सिख राजनीति से परेशान होकर सन्त भिण्डरा वाले को खडा किया। परिणाम सबके सामने है। आपरेशन ब्लूस्टार भी करना पड़ा और इन्दिरा जी की जान भी चली गई। इसी तरह राजीव गांधी ने श्रीलंका को अस्थिर करने हेतु प्रभाकरण को पाल पोसकर बड़ा किया था । प्रभाकरण भी राजीव गांधी का काल बन गया । इतिहास ऐसी अनेक घटनाओ से भरा पड़ा है । भले ही हम इतिहास से कोई अनुभव न प्राप्त करें।

वर्तमान कांग्रेस पार्टी शिवसेना को किसी तरह कमजोर करना चाहती थी उसने फिर से उसी भूल का सहारा लिया । राज ठाकरे को काग्रेस ने जिन्दा किया । जब राज ठाकरे बाल ठाकरे को कमजोर कर रहे थे और शिव सेना का मुद्दा छीन रहे थे तब कांग्रेस पार्टी की प्रसन्नता देखते ही बनती थी। हर कांग्रेसी इसी कार्य को अपनी बहुत बड़ी कामयाबी समझ रहा था । अब राज ठाकरे कांग्रेस से हटकर अलगाव की भाषा बोलने लगे है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे के बीच मराठी जन भावना को उभारने की प्रतिस्पर्धा इस सीमा तक चली जायेगी कि महाराष्ट्र को भारत से अलग होने तक की आवाज उठने लगे तब कांग्रेस पार्टी की चिन्ता बढ़ी है। बाल ठाकरे शरीर से भी बुढ़े हो गये है और प्रतिष्ठा से भी । संघ परिवार को भी कुछ अकल आ गई है किन्तु राज ठाकरे जवान भी है और उभरती हुई ताकत भी । कांग्रेस के समक्ष कुऑ और खाई की स्थिति बनती जा रही है। यदि राज ठाकरे थोड़ा भी और अधिक शक्तिशाली हुआ तो वह किसी भी सीमा तक जा सकता है। न कांग्रेस उसे रोक सकेगी न ही देश की और ताकत। ऐसी स्थिति भयावह होगी और उसका क्या परिणाम होगा यह अभी बताना सम्भव नही । किन्तु इतना अवश्य बताया जा सकता है  कि परिणाम न देश के हित मे होगा न ही कांग्रेस पार्टी के हित में।

महापुरूषो की इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिये कि तात्कालिक उद्देश्यों के लिये अवांछित तत्वों को प्रोत्साहन हमेशा कष्टकारक ही होते है।

धर्म

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धर्म की परिभाशा है “ व्यक्ति के किसी अन्य के हित में किया गया जाने वाला नि:स्वार्थ कार्य । धर्म हमेशा ही व्यक्तिगत रहा है। धर्म हमेशा कर्तव्य तक सीमित रहा है। धर्म न कभी संगठन के रूप में रहा है न ही उसकी कोई अधिकार के रूप में उपयोगिता रही है। बुद्ध के समय पहली बार धर्म ने संगठन बनाना ‘ाुरू किया अन्यथा बुद्ध के पहले तो संगठन सम्प्रदाय ही होती था । उसके पूर्व धर्म के साथ न कोई पूजा पद्धति जुडी होती न ही ईश्वर आराधाना । नास्तिक भी धर्म मान्य हुआ करता था ।
इशुमसीह तथा इस्लाम ने धर्म को विशेश रूप से पूजा पद्धति से जोड़ा और बुद्ध के संगठन की नीति को विस्तार दिया । परिणाम हुआ कि धर्म कर्तव्य से हटकर अधिकारों के साथ जुडा । अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि धर्म के आधार पर बने संगठन सिर्फ अपने संख्या विस्तार को ही धर्म मानने लग गये है। भारत में धर्म प्रचार का सर्वश्रेश्ठ आधार तर्क या विचार मन्थन तक सीमित था। पिश्चम ने उसके स्थान पर धन सेवा प्रेम और सदभाव को महत्व दिया और इस्लाम ने संगठन ‘ाक्ति और तरवार को । भारतीय तर्क व्यवस्था पर या तलवार की ताकत भारी पड़ी।  आचरण, चरित्र, धर्म की नई प्रस्तुति की सफलता  को देख देख कर हिन्दू धर्मावलिम्बयों के कुछ समूह भी संगठन, ईश्वर पूजा पद्धति को आधार बनाकर अन्य धर्म कहे जाने वाले साम्प्रदायों से प्रतिस्पर्धा करने लगें है। ये भी धर्म प्रचार के लिये तर्क और विचार मन्थन की जगह संगठन ‘ाक्ति या बल प्रयोग का सहारा लेने लगें है। जिस तरह पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचार और हत्याएं हुई है, उसी दिशा में भारत भी लगतार बढ़ता जा रहा है जो धर्म का एक निकृश्टम स्वरूप है।
आवश्यकता यह है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप भी समाज के समक्ष आवे और वह सिर्फ आदशZ मात्र न होकर इतना व्यावहारिक हो कि उसके समक्ष साम्प्रदायिक ‘ाक्तियॉ कमजोर हो जावें । इसलिये आज धर्म के मामले में भी समाज को एक नई दिशा की आवश्यकता है ।

राजनीति

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भारत सहित दुनिया के अनेक विद्वानों ने एक ओर राजनीति को धूर्तता का खेल बताया है तो कुछ दूसरो ने व्यवस्था का अनिवार्य अंग । मेरे विचार में राजनीति को यदि अनियन्त्रित रूप में स्वतन्त्र छोड़ दिया जावें तो वह सत्ता संधशZ का माध्यम बन जाती है और यह संधशZ ही धूर्तता के खेल मे बदल जाता है। यदि राजनीति पर समाज का अंकुश हो तो राजनीति समाज विरोधी तत्वो पर नियन्त्रण का आधार बन जाया करती है।
भारतीय राजनीति ने जन्म काल से ही समाज को आठ आधारों पर विभाजित करके स्वयं को इतना स्वतन्त्र बनाने की कोशिश की और जिसमें वे सफल भी रहे कि समाज व्यवस्था ही छिन्न भिन्न होने लगी । परिणाम यह हुआ कि राजनीति पर समाज का कोई नियन्त्रण नहीं रहा और वह “धूर्तता का खेल“ में बदल गई है। राजनीति, भ्रश्टाचार और अपराध एक दूसरे के पूरक बन चुके है। अच्छे लोग राजनीति से असफल बाहर निकल रहे है अथवा अपमानित होकर निकाले जा रहे है। सत्ता के केन्द्रीयकरण भ्रश्टाचार का एक सबसे बडा आधार है। आज की राजनीति सत्ता को तो अधिक से अधिक केन्द्रीत करती रहती है और भ्रश्टाचार रोकने का नाटक करती रहती है जो सम्भव ही नहीं है।
वर्तमान राजनीति में किसी प्रकार का कोई सुधार तब तक सम्भव नहीं जब तक उसकी संग्रह की भूख न मिटा दी जाय और यह भूख तब तक नहीं मिट सकती जब तक उस पर समाज का अंकुश न हों । इस अंकुश के प्रयास का नाम ही है लोक स्वराज्य ।

आतंकवाद और हमारे राष्ट्र भक्त

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आज दिल्ली बम ब्लास्ट काण्ड का एक आरोपी आजमगढ़ से ही पकड़ा गया । उसी आजमगढ़ से जिसकी चर्चा पिछले वर्ष बाटला हाउस मुठभेड़ काण्ड में मारे गये मुस्लिम युवक के साथ साथ सम्पूर्ण भारत में इस तरह हुई थी कि आजमगढ़ जिले का संजरपुर गांव और निकटवर्ती कुछ गांव पूरे भारत में मुस्लिम आतंकवाद के केन्द्र बने हुये है। उस समय कुछ देश भक्त मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, जामिया मिलिया के कुलपति मुनिरूल हसन, सबाना आजमी तथा बड़ी मात्रा  में मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं ने उक्त प्रचार को असत्य कहकर आजमगढ़ जिले को बदनाम करने की साजिश बताया था । हद तो तब हुई जब इन लोगो ने ‘शहीद पुलिस इंस्पेक्टर की ‘शहादत पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था । एक केन्द्रीय मन्त्री ए. आर. अन्तुले तक ने उनका साथ दिया था । घटनाएं स्पष्ट है कि उक्त संजर पुर गांव के कुछ मुस्लिम युवकों की पोल खुलते ही सम्पूर्ण भारत में हो रहे सिलसिलेवार बम धमाके बन्द हो गये । सिद्ध हो गया कि बम धमाकों के तार आजमगढ़ जिले के मुस्लिम युवकों के साथ जुड़े थे और युवकों के तार मुलायम अमर सहित पेशेवर मानवाधिकारवादियों के साथ ।

आतंकवाद की दूसरी घटना की चर्चा तीन दिन पूर्व ही समाचारों में आई कि दो तीन वर्ष पूर्व हिन्दू आतंकवाद के लिये गिरफ्तार प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पूरोहित ने अपनी आतंकवादी घटनाओं के लिये पाकिस्तान के मुस्लिम आतंकवादियों तक की सहायता ली थी । उस समय जब प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित प्रकाश में आये तब संध शिव सेना तथा भाजपा के लोग इन आतंकवादियों के समर्थन में उठ खडे हुये थे  । इन लोगो ने भी उस बेचारे हेमन्त करकरे को गद्दार कह दिया था जिसने इस काण्ड का पर्दाफाश किया था और जो कुछ माह बाद ही बम्बई आतंकवादी हमले मे मारा गया । इन दोनों आतंकवादी हिन्दुओं की करतूतो से पहली बार हिन्दू समाज का सर झुका था किन्तु बेशर्म गिरोह बाज फिर भी सर उठाकर चलते रहे । यहॉ तक पोल खुली थी कि प्रज्ञा और पुरोहित ने इन्द्रेश जी सहित संघ के दो उच्च पदाधिकारियों की हत्या की योजना इसलिये बनाई थी कि ये दोनो संघ पदाधिकारी हिन्दू मुस्लिम मेल मिलाप की बात करते है। दुख होता है जब संघ शिव सेना ऐसे आतंकवादियों के समर्थन में खड़ी होती है। कर्नल पुरोहित की संलिप्तता की जानकारी  पाकिस्तान के एक मन्त्री ने भारत सरकार को दी । इस संबंघ में हमारे कर्नल पुरोहित समर्थकों को स्थिति स्पष्ट करानी चाहिये ।

विचार करिये कि बाटला हाउस घटना में मारे गये मोहन लाल ‘शर्मा और प्रज्ञा पुरोहित की पोल खोलने वाले हेमन्त करकरे जैसे ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की प्रशंसा पूजा सम्मान की जगह मुलायम अमर सिंह सुदर्शन बाल ठाकरे इसलिये बदनाम करे क्योकि इन लोगों ने साम्प्रदायिकता की दो दुकाने खोल रखी है और दोनो पक्षो के इनके ग्राहकों की पोल खुल रही है। तो दो ‘शहीद अफसरों के परिवार क्या सोचते होगें । इन दोनो गुटो में ‘शामिल हिन्दू और मुसलमान कितने चरित्रवान है ? कितने देश भक्त है ? आज यह विचार करने का समय है कि समाज इन पेशेवर दुकानदारों की खुली दुकानों से कैसे मुक्त हो ? दोनों घटनाओं का संक्षिप्त विवरण कई वर्ष पूर्व प्रकाशित ज्ञानतत्व 165 तथा 169 के शीर्ष लेखों में भी पढ़े ।

संविधान – गोरों की गुलामी से अपनों की गुलामी तक

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संविधान:-</strong> राज्य के अधिकार, हस्तक्षेप तथा दायित्व की अधिकतम सीमाएं निश्चित करने वाले दास्तावेज को संविधान कहते है।

संविधान और कानून अलग अलग होते है । संविधान में राज्य के अधिकतम और समाज के न्यूनतम अधिकारों की सीमाएं निश्चित होती है जबकि कानून मे राज्य के न्यूनतम और समाज क अधिकतम अधिकारों की सीमाएं निश्चित होती है।

<strong>वर्तमान संविधान निम्न कारण से असफल हुआ -</strong>

1.     अपराध नियन्त्रण की अपेक्षा जनकल्याण को प्राथमिकता ।

2.    अस्पष्ट भाषा, द्विअर्थी भाषा, अधिकाधिक Interpretations

3.    अस्पष्ट उद्देश्य, धाराओं के बीच contradiction

4.    वर्ग मान्यता ।

5.    उच्च आदर्श वादी स्वरूप ।

6.    व्यवस्था की इकाईयों में परिवार का अभाव ।

7.    राज्य की भूमिका मैनेजर की न होकर कस्टोडियन की होना ।

दोष किसका:-संविधान की अपेक्षा लागू करने वालों को दोश देने का कार्य हास्यप्रद और वैसा ही बेतुका है जैसे पागल खाने के डाक्टर का यह तर्क कि रोगी उसके समझता हीं नहीं । संविधान की आवश्यकता ही ऐसे गलत चरित्र वालों पर नियन्त्रण हेतु हैं। यदि सब लोग स्वयं ही ठीक हो जावें तो संविधान की आवश्यकता ही क्या है?

समाधान

समाज सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करता है और सरकार समाज का । अत: सम्पूर्ण विश्व का एक ही संविधान होना चाहिये और एक ही सरकार । समाज का कोई स्थिर स्वरूप न होने से राष्ट ने स्वयं को समाज घोषित कर दिया जो अस्थायी स्वरूप है।

किसी भी संविधान की सफलता की एक मात्र कसौटी है ‘शासन द्वारा व्यक्ति के मूल अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी । यदि चरित्र पतन होता है तो वह संविधान की विफलता मानी जायेगी ।

संविधान संशोधन :- देश के समाज ‘शास्त्रियों को मिल जुलकर संविधान के मूल तत्वों पर विचार मन्थन करके कुछ निष्कर्ष  निकालने चाहिये ।

समाज : – मैं टूट रहा हूँ

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भारत दुनिया में एक मात्र ऐसा देश है जहॉ समाज सर्वोच्च होता है अन्यथा पिश्चम के देशों में व्यक्ति, इस्लाम में धर्म तथा साम्यवाद में राज्य ही सर्वोच्च मना जाता हैं ।
भारत कई सौ सालों तक गुलाम रहने के बाद भी अपने समाज व्यवस्था को बचाने मे सफल रहा । इस्लाम या अंग्रेज हमारी परिवार व्यवस्था ग्राम व्यवस्था को तोड़ नही पाये । किन्तु स्वतन्त्रता के बाद भारत की समाज व्यवस्था को लगातार तोडा जा रहा है या कमजोर किया जा रहा है। धर्म, जाति, भाशा, क्षेत्रवाद, उम्र, लिंगभेद, गरीब-अमीर, उत्पादक-उपभोक्ता के आधारों पर समाज व्यवस्था, परिवार व्यवस्था को लगातार तोड़ा जा रहा है और इनके टूटने का सारा दोश समाज पर डाला जा रहा है।
जबकि सच्चाई यह है कि समाज टूट नही रहा बल्कि इसलिये तोडा जा रहा है कि  समाज को गुलाम बनाकर रखने वालों को समाजिक एकता से भय है। अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि एक ओर तो राज्य ने स्वयं को समाज का वैद्य प्रतिनिधि घोषित कर दिया है तो दूसरी ओर धर्म, जाति आदि समाज तोडक संगठन भी स्वयं को समाज कहने में पीछे नही रहते । समाज व्यवस्था संकट में है। धर्म, धन, राज्य और अपराध पूरी समाज व्यवस्था को नियन्त्रण में करने की प्रतिस्पर्धा में लगे है।
यदि समाज व्यवस्था नही बची तो न धर्म बचेगा न धन । चारो ओर या तो तानाशाही का खतरा है या अराजकता का । आवश्यकता यह है कि समाज को एक ऐसी दिशा मिले जो कि वर्ग विद्वेश, हिंसा तथा राज्य की गुलामी की मानसिकता को छोड़कर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व खड़ा हो सके । ऐसी नई दिशा के लिये ही……………………..

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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