Lets change India
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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कृत्रिम उर्जा…!

Posted By: admin on May 31, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

दुनिया मे दो प्रकार के देश होते हैं (1) श्रम अभाव देश (2) श्रम बहुल देश। श्रम अभाव देषों मे श्रम बुद्धि  और धन के बीच कम अंतर होता है। श्रम का मूल्य बहुत ज्यादा होने से वहां  के नागरिकों को श्रम के विकल्प के रूप मे सस्ती कृत्रिम उर्जा डीजल, पेट्रोल,  बिजली, गैस, किरासन, कोयला का विकल्प देना सरकार की मजबूरी होती है। श्रम बहुल देशों को इसके ठीक विपरीत कृत्रिम उर्जा को श्रम का प्रतिस्पर्धी  मानकर ऐसी मूल्य नीति रखनी चाहिये जिससे श्रम की मांग बढ़े और श्रम, बुद्धि  और धन के बीच की दूरी बढती न चली जावे। भारत एक श्रम बहुल देश है किन्तु स्वतंत्रता के तत्काल बाद भारत की अर्थनीति मे बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड का एकाधिकार हो गया। इन्होने श्रम शोषण के उद्देश्य से भारत मे ऐसी अर्थनीति बनाई कि श्रम बुद्धि और धन के बीच दूरी लगातार बढती चली गई। श्रम बहुल देश मे कृत्रिम उर्जा श्रम शोषण का आधार बनती है। ये बुद्धिजीवी पूंजीपति अच्छी तरह जानते थे कि भारत श्रम बहुल देश है किन्तु इन्होने षणयंत्र पूर्वक श्रम मूल्य की तुलना मे कृत्रिम  उर्जा का मूल्य बहुत कम रखा क्योकि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढने से श्रम की मांग बढती है परिणम स्वरूप श्रम कर मूल्य बढता है जिसका लाभ श्रम बेचने वालो को होता और हानि श्रम खरीदने वालो को। स्पष्ट है कि गरीब तथा श्रम जीवी आम तौर पर श्रम बेचने वालों मे शामिल होते है तथा बुद्धिजीवी पूंजीपति श्रम खरीदने वालों मे । इस श्रम शोषण के षणयंत्र का नेतृत्व किया वामपंथियो ने और लाभ उठाया पूंजीपतियो ने। वामपंथियों समाजवादियों ने लगातार कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध किया क्योकि यदि कृत्रिम  उर्जा मूल्य बढने से श्रम का मूल्य बढ जाता तो भारत मे गरीब अमीर का टकराव नही होता जो वामपंथियो की सफलता के लिये आवश्यक मजबूरी है। वामपंथियो की खाडी देशों के साथ भी गुप्त सहानुभूति या समझौता रहा है । यह भी उनके विरोध की मजबूरी थी।

इन श्रम शोषण करने वालो ने इससे भी गन्दा काम यह किया कि इन्होने श्रम उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगा दिये। साइकिल पर प्रति साइकिल चार सौ रूपया टैक्स लेना और रसोई गैस पर तीन सौ रूपया छूट, देने से इनकी नीयत साफ हो जाती है । सब प्रकार के कृषि उत्पादो पर भी भारी कर लगाकर सस्ती बिजली सस्ता आवागमन की प्रथा पूरे भारत मे आज तक प्रचलित है।

श्रम शोषण की अर्थनीति को पलटना होगा। कृत्रिम उर्जा की बहुत भारी मूल्य वृद्धि करके गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुएं कर मुक्त करनी होंगी। बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड रूपी षणयंत्र को तोडना ही हमारी अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान हैं।

कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि हमारी सभी आर्थिक समस्याओं का भी एक मात्र समाधान है। इससे श्रम बुद्धि और धन के बीच का अंतर घटेगा , गरीब अमीर के बीच की दूरी घटेगी, शहरो की आबादी की गांवों की ओर वापसी होगी,  डीजल पेट्रोल गैस की खपत घटने से विदेशी मुद्रा बचेगी, पर्यावरण प्रदूषण घटेगा तथा ग्रामीण अर्थ व्यवस्था मजबूत होकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कमजोर करेगी। एक बिन्दु कर होने से भ्रष्टाचार भी घटेगा।

इससे कुछ लोगों को परेशानी भी होगी । आवागमन महंगा होगा। खाडी देश नाराज होकर हमारे कुछ राजनेताओं की गुप्त सहायता रोक सकते है । आयात के साथ साथ निर्यात पर भी कुछ विपरीत प्रभाव पडेगा। किन्तु लाभ की तुलना मे हानि की मात्रा नगण्य ही है। एक आकलन के अनुसार यदि कृत्रिम उर्जा का बाजार मूल्य दो गुना कर दे तो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह दो हजार रूपया कृत्रिम उर्जा सब्सीडी के रूप मे दिया जा सकता है। अन्य कई प्रकार के टैक्स हटाने के बाद भी।

हमारे भारत के राजनेता सरकारी खजाना भरने के लिये कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करने का ढोंग  करते है। इस कारण जनता ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध करती है । साथ मे खाडी देशों के एजेन्ट राजनेता भी विरोध का वातावरण बनाते है। यदि एक बार एक पृथक कोष बनाकर टैक्स वृद्धि के साथ अन्य राहत को जोडकर एक साथ घोषणा कर दे तो ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध न होकर स्वागत होगा।

विस्तृत वार्ता ए टू जेड चैनल मे दिनांक 20 मई को सायं 7 से 8 प्रसारित की गईं।

 

मैं आंदोलन अन्ना का सहयोगी हूं, सहभागी नहीं। क्यों? – बजरंग़ मुनि

Posted By: admin on May 30, 2012 in Recent Topics - Comments: 1 Comment »

पिछले दिनों मैंने कुछ लेख लिखे जो विरोधाभासी दिखते हैं। मैंने लिखा

1. वर्तमान समय में राजनीति में लगभग सारे लोग भ्रष्ट हैं। मनमोहन सिंह सहित

2. स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत में मनमोहन सिंह के रूप में एक अच्छा प्रधानमंत्री आया है।

हम नासमझी में या स्वार्थ वश उसे अस्थिर कर रहे हैं।

3 हम रामदेव जी के आंदोलन का समर्थन करते हैं, सहयोग नहीं।

4 हम अन्ना जी की टीम का सहयोग करते हैं, सहभागिता नहीं।

5 हमारे विचार में भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन समस्या का समाधान नहीं।

 इन सब लेखों ने पाठकों को असमंजस में डाल दिया है कि हम कहना क्या चाहते हैं ?

 

सन् सैंतालीस से ही भारत संसदीय लोकतंत्र की लाइन पर चला जिसका अर्थ है संसद सर्वोच्च। इस संसदीय लोकतंत्र में राजनैतिक व्यवस्था के पास अधिकतम अधिकार अधिकतम दायित्व होते हैं। इसके पास संविधान संशोधन तक के अधिकार होते हैं। यह व्यवस्था समाज से भी उपर हो जाती है तथा समाज से लेकर व्यक्ति तक के हित के सारे अधिकार अपने पास समेट लेती है चाहे व्यक्ति चाहे या न चाहे। चाहे समाज की सहमति हो या न हो।

संसदीय लोकतंत्र तानाशाही से बचाता है किन्तु अव्यवस्था की दिशा में ले जाता है। संसदीय लोकतंत्र में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार निश्चित है। मैं अक्षरश सहमत हॅूं कि Power Corrupts a man and absolute  power corrupts absolutely जिस बात को मेरे जैसा साधारण व्यक्ति भी समझता है वह बात टीम अन्ना के पढ़े लिखे लोग नहीं समझते। ये पावर घटाने की अपेक्षा भ्रष्टाचार दूर करने पर ज्यादा जोर देते हैं जो असंभव कार्य है। यदि आप अव्यवस्था भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं तो संसदीय लोकतंत्र को बदलना ही होगा। इस बदलाव के दो ही मार्ग हैं (1. तानाशाही (2. सहभागी लोकतंत्र या लोकस्वराज्य। तीसरा कोई मार्ग नहीं। तानाशाही के मार्ग से अव्यवस्था भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, तीव्र विकास होगा किन्तु गुलामी आयेगी। तथा लोक स्वराज्य प्रणाली आने ही नहीं दी जायेगी क्योंकि सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था ने उसकी चर्चा तक को रोक रखा है। ऐसी स्थिति में मैंने विश्लेषण किया है कि समस्याओं का समाधान तो सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन अर्थात् लोक स्वराज्य प्रणाली की दिशा मात्र ही है। बाकी सारी चर्चाएं या आंदोलन तो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में सुधार तक सीमित है, समाधान नहीं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन भी ऐसे ही सुधार का एक भाग है।

मैं रामदेव जी का समर्थक हॅूं। ये वर्तमान स्वार्थ पूर्ण राजनेताओं को हटाकर अच्छे लोगों को सत्ता में लाना चाहते हैं। रामदेव जी अच्छा काम कर रहे हैं किन्तु रामदेव जी को लोक स्वराज्य प्रणाली का न ज्ञान है न विश्वास। सत्ता में अच्छे लोगों का जाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि पचास वर्ष पूर्व सत्ता में बहुत अच्छे लोग थे तब भी सत्ता बिगड़ती गई क्योंकि वह संसदीय लोकतंत्र प्रणाली का दोष था जो अच्छे लोगों को कमजोर करके बुरे लोगों को आकर्षित करने में सफल रही। दूसरा आंदोलन अन्ना जी तथा उनकी टीम का है। अन्ना जी लोक स्वराज्य को समझते भी हैं और उस दिशा में साफ साफ बढ़ना चाहते हैं। अन्ना जी की टीम के प्रमुख लोग अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्तभूषण आदि लोक स्वराज्य को समझते हैं और उसे समाधान भी मानते हैं किन्तु उन्हें जनता पर इतना विश्वास नहीं कि जनता इसे हाथो हाथ उठा लेगी। यही कारण है कि वे घूम फिर कर भ्रष्टाचार विरोध पर आ जाते हैं। भ्रष्टाचार विरोध एक लोक प्रिय मुद्दा है, सत्ता परिवर्तन का आधार हो सकता है किन्तु व्यवस्था परिवर्तन का आधार नहीं। मेरा मत है कि व्यवस्था परिवर्तन का आधार तो लोक संसद का आंदोलन ही है। जिससे टीम अन्ना को विष्वास होते हुए भी डर लगता है।

वर्तमान राजनैतिक वातावरण की समीक्षा करें तो मेरे विचार में बड़ी कुशलता से मनमोहन सिंह अघोशित रूप से ठीक दिशा में जा रहे हैं। सन् सैंतालीस से अब तक देश केन्द्रीयकरण की लाइन पर था। मजबूत प्रधानमंत्री थे जो हर छोटी से छोटी बात के लिये जिम्मेदार थे। किसी रेल दुर्घटना के लिये अपनी गलती न होते हुए भी रेलमंत्री का त्यागपत्र सिद्ध करता है कि सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था केन्द्रित थी। यह शास्त्री जी के त्याग का उदाहरण तो बना किन्तु व्यवस्था नहीं बनी। मनमोहन सिंह ने विकेन्द्रित शासन प्रणाली की शुरूआत की है। मनमोहन सिंह चाहते हैं कि व्यवस्था शक्तिशाली हो व्यक्ति या पद नहीं। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है और आप इतने सक्षम हैं कि उसका अन्याय दूर कर सकते हैं। जनता आपसे चाहती है कि आप उसका अन्याय दूर करें। मेरे विचार में यह लोक लुभावन मार्ग है। अच्छा तो यही है कि आप उस अन्याय को दूर करने योग्य व्यवस्था तैयार करें न कि स्वयं उसे ठीक करने में लग जायें। आज भारत में हर व्यक्ति स्वयं न्याय देना चाहता है। मनमोहन सिंह चाहते हैं कि स्वयं समस्याओं का समाधान करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र तो किसी व्यवस्था के अन्तर्गत समाधान होना है। ये पूरी तरह निजीकरण के पक्षधर हैं। मनमोहन सिंह जी ने न किसी व्यक्ति को भ्रष्टाचार करने से रोका न ही किसी को भ्रष्टाचार पकड़ने से। आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उन्होंने स्वयं को शासक समझा। उन्होंने जहां चाहा वहां भ्रष्टाचार करने वालों को रोका और जहां चाहा वहां भ्रष्टाचार रोकने वालों को भी रोककर भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला क्योंकि ये व्यवस्था को स्वयं से उपर नहीं मानते थे। मनमोहन सिंह व्यवस्था को स्वयं से उपर मानते हैं।

मनमोहन सिंह जी दुहरी समस्या से जूझ रहे हैं। गुलाम मानसिकता के लोग इन्हें मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं तथा सत्ता लोलुप लोग इन्हें कमजोर या भ्रष्ट कहकर स्वयं इनकी जगह आना चाहते हैं। सोनिया जी इन्हें असफल सिद्ध करके राहुल की ताजपोशी चाहती हैं किन्तु उन्हें डर है कि कहीं इनकी बिदाई कांर्गेस पार्टी की ही बिदाई न बन जाये। भारत की जनता के समक्ष दो मार्ग हैं (1, नरेन्द्रमोदी सरीखे कार्यकुशल तानाशाह प्रशासक के माध्यम से भ्रष्टाचार मुक्ति और विकास का मार्ग पकड़े अथवा (2, नीतिश कुमार मनमोहन सिंह सरीखे लोकतांत्रिक मार्ग को आगे बढ़ायें। भारत की जनता अव्यवस्था से उब चुकी है। वह नरेन्द्र मोदी के मार्ग पर जाना चाहती है जो उसकी मजबूरी है किन्तु मार्ग खतरनाक है। कांर्गेस पार्टी के नाम पर सोनिया राहुल सशक्तिकरण तो और भी खतरनाक है। ऐसी स्थिति में नीतिश या मनमोहन सिंह ही विकल्प दिखते हैं।

रामदेव जी को भारत की जनता पर पूर्ण विष्वास है कि वह भावनाप्रधान होने से आसानी से ठगी जा सकती है। टीम अन्ना को भारत की जनता पर विश्वास ही नहीं है कि वह सहभागी लोकतंत्र या लोक स्वराज्य की अवधारणा को समझ पायेगी। इसलिये ये भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाना चाहते हैं। भारत की जनता को विश्वास नहीं है कि भ्रष्टाचार के नाम पर सत्ता में आने वाले सहभागी लोकतंत्र की लाइन पर जायेंगे। चाहे और किसी को भले ही हो किन्तु मुझे तो नहीं है क्योंकि दो माह पूर्ण जिस तरह टीम अन्ना ने ललकारा था कि संसद अपराधियों का चारागाह होने से वह स्वयं में एक समस्या है, अब लाइन बदलकर प्रधानमंत्री सहित पंद्रह मंत्रियों की जांच के मुद्दे को टकराव का मुद्दा बनाने की घोषणा कर रही है। जब टीम अन्ना भी जानती है और पूरा देश भी जानता है कि संसद में इमान की कसौटी पर शायद ही कोई खरा उतर पाये तो ऐसा मुद्दा उठाना कितना उपयोगी है। भ्रष्टाचार करना और भ्रष्टाचार होते हुए देखने मे बहुत फर्क है। मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार किया नहीं। मनमोहन सिंह ने सक्षम होते हुए भी भ्रष्टाचार रोका नहीं यह उन पर आरोप है। मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध लोकतांत्रिक सक्रियता को पनपने की पूरी छूट दी यह उनकी विशेषता है। आरोप और विशेषता के बीच इस आधार पर तुलना होगी कि उनके मुकाबले में कौन है और उसकी विचार धारा क्या है  ? टीम अन्ना ने जिस तरह प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार प्रमाणित करने की पहल की वह मेरे विचार में यदि सच भी हो तब भी अनावश्यक थी, औचित्य हीन थी, टीम पर संदेह पैदा करने वाली थी कि टीम व्यवस्था परिवर्तन की लाइन से हटकर सत्ता संघर्ष की लाइन पर बढ़ रही है। वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था के जारी रहते यदि मनमोहन सिंह जी की जगह अरविन्द केजरीवाल भी प्रधानमंत्री बन जाये तो कोई सुधार संभव नहीं जब तक पावर का विकेन्द्रीयकरण न हो।

मैं अब तक नहीं समझ पा रहा कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार नियंत्रण की जगह पर संसद के अधिकारों के विभाजन को मुद्दा बनाने से क्यों कतरा रही है। यदि लोक संसद बनाकर वर्तमान संसद के तानाशाही अधिकारों में विभाजन का आंदोलन हो तो सबसे ज्यादा सुरक्षित और लोकप्रिय मुद्दा हो सकता है। यह मुद्दा न उठाने के पीछे यह संदेह है कि इससे तो भविष्य में बनने वाली संसद के अधिकार ही घट जायेंगे। अर्थात् यदि रामदेव जी या टीम अन्ना भ्रष्टाचार या मंहगाई आदि के आधार पर चुनाव जीत लेते हैं तो लोक संसद तो इनके लिये भी घातक हो सकती है। ऐसा संदेह स्वाभाविक है। यही संदेह मुझे टीम अन्ना के साथ सहभागिता से रोक रहा है। टीम अन्ना न कहीं संविधान संशोधन का मुद्दा उठा रही है न सहभागी लोकतंत्र का। संसदीय ढांचे पर भी प्रश्न उठाने के बाद उनकी लाइन अब फिर से बदलकर भ्रष्टाचार की तरफ मुड़ गई है। यदि ऐसा ही हुआ तो मेरे विचार में नीतिश कुमार या मनमोहन सिंह की लाइन ज्यादा विश्वास योग्य है क्योंकि दोनों में कहीं तानाशाही की गंध नहीं है।

यह सही है कि अन्ना हजारे स्वयं पूरी तरह सहभागी लोकतंत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता समझते हैं। टीम के सदस्य अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्तभूषण, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय आदि भी इस लाइन का महत्व समझते हैं भले ही वे किसी राजनीति के अन्तर्गत स्पष्ट बोलने में हिचक रहे हों। मेरी तो उन्हें सलाह है कि वे खुलकर अपनी लाइन बदलें और संविधान संशोधन, लोक स्वराज्य, सहभागी लोकतंत्र, लोक संसद जैसे शब्दों को आधार बनाये तो जनता आसानी से समझ सकेगी। 

टीम अन्ना का नया आंदोलन: बजरंग मुनि!

Posted By: admin on May 27, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »


 

टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध लडाइ के दूसरे चरण की घोषणा करके बहुत हिम्मत का काम किया है। लोकपाल की लडार्इ  का स्वरूप परिवर्तन होना ही चाहिये था। पंद्रह मे से कितने मंत्री भ्रष्ट है और कितने ठीक यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा किन्तु इतने स्पष्ट आरोपो के बाद जांच तो होनी ही चाहियें। इस संघर्ष मे हम टीम अन्ना का सहयोग करेंगे। यधपि मुझे विष्वास है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस जांच से बेदाग निकलेंगे।

टीम अन्ना ने अपने आंदोलन के साथ पेट्रोल की मूल्य वृद्धि तथा लगातार बढती मंहगार्इ की भी चर्चा कीं। इसके पूर्व अन्ना जी ने भी इस विषय पर आंदोलन की बात कही है। मेरे विचार मे पेट्रोल की मूल्य वृद्धि और मंहगार्इ का प्रचार सम्पन्न, बुद्धिजीवी, शहरी, तथा उपभोक्ता वर्ग द्वारा गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी तथा उत्पादक समूह के विरूद्ध साठ पैंसठ वर्षो  से जारी षडयंत्र कारी अर्थनीति का ही हिस्सा है जिस असत्य प्रचार के शिकार अन्ना जी या उनकी टीम के लोग हुए हैं।

भारत की राजनैतिक व्यवस्था मे सन इक्यान्नवे तक का अधिकांश कार्यकाल नेहरू परिवार के नेतृत्व मे रहा। इस परिवार ने प्रारंभ से ही ऐसी अर्थ नीति का विकास किया जो गरीब ग्रामीण श्रमजीवी उत्पादको के विरूद्ध अमीर शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्तावाद को प्रश्रय देती रही। पंडित नेहरू एक बहुत ही चालाक राजनेता माने जाते रहे हैं। उनके पूंजीवादी चेहरे ने समाजवादी मुखौटा लगाकर अर्थव्यवस्था को अधिकतम राज्य केँद्रित करने का प्रयास किया। उन्होने हमेशा ही कृत्रिम उर्जा के मूल्य को श्रम मूल्य से नीचे ही रखने की कोशिश की। वे जानते थे कि यदि कृत्रिम उर्जा के मूल्य श्रम की तुलना मे उपर हो गये तो श्रम खरीदने वाला वर्ग तबाह हो जायेगा। नेहरू जी जानते थे कि पशचिम के अनेक देश श्रम अभाव देश हैँ।  वहां श्रम और बुद्धि के मूल्यो के बीच बहुत ज्यादा अंतर नही। वहां के लोगो को पेट भरने के लिये श्रम न करके सुविधा के लिये श्रम  करना है। इसलिये वहां कृत्रिम उर्जा को बहुत सस्ता रखना आवश्य़क है। दूसरी ओर भारत एक श्रम बहुल देश है। यहा यदि कृत्रिम उर्जा मंहगी नही होगी तो श्रम और बुद्धि के बीच का अंतर बहुत बढ जायगा। सब कुछ जानते हुए भी उन्होने न जाने क्या सोचकर कृत्रिम उर्जा को श्रम मूल्य से नीचे रखने का आत्मघाती मार्ग चुना। परिणाम जो होना था वही हुआ। श्रम, बुद्धि और धन के बीच लगातार दूरी बढती चली गर्इ। आवागमन सस्ता हुआ। लघु उधोगों का स्थान बडे-बडे दैत्याकार उधोगों ने ले लिया। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढा। विकास दर उल्टी हो गर्इ। उसे नीचे के वर्ग के लिये अधिक तथा उपर वालों के लिये कम होना चाहिये था। किन्तु इसके ठीक उलट गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान की विकास दर एक से पांच प्रतिषत के बीच तक रही तो मध्यम श्रेणी बुद्धिजीवी की विकास दर पांच से दस के बीच तथा उच्च श्रेणी पूंजीपति वर्ग की विकास दर दस से पंद्रह के बीच। इस सारे षडयंत्र के लिये सिर्फ एक ही काम किया गया कि कृत्रिम उर्जा के मूल्यों को श्रम मूल्य की तुलना मे कम से कम रखा जावे। श्रम बहुल भारत के गांव तक के कार्यो मे मशीनों का लगातार विस्तार इसी का परिणाम तो है। भारत मे कृषि उत्पादन तेजी से बढा है और गरीब किसान आत्महत्या कर रहा है यह सोचनीय है। भारत जैसे देश मे जहा वार्षिक विकास दर दुनिया मे उल्लेखनीय है वहां के श्रमजीवियों को नरेगा और गरीबो को सस्ता चावल दे देकर मरने से बचाया जा रहा है। विचारणीय है कि हमारे भारत का बुद्धिजीवी यदि सारी दुनिया मे प्रतिस्पर्धा करने मे सफल है या भारत के पूंजीपति अमेरिका और ब्रिटेन के पूंजीपतियों से भी आगे निकलने की दौड मे शामिल है उस देश के श्रमजीवी की यह दुर्दशा कि अमेरिका मे श्रमजीवी का एक दिन का जितना श्रम मूल्य है उतना भारतीय श्रमिक को एक माह मेँ भी नही मिलता। भारत मे नरेगा का अधिकतम श्रम मुल्य चार हजार रूपया मासिक है तो अमेरिका मे एक दिन का श्रम मूल्य इससे भी कही ज्यादा ही होगा।

नेहरू जी ने एक घपला और किया कि उन्होने गरीब ग्रामीण श्रम उत्पादन उपभोक्ता वस्तुओ पर भारी अप्रत्यक्ष कर लगा दिये। जिससे कुछ प्रत्यक्ष सब्सीडी देकर मियां की जूती मिंया का सर की कहावत भी चरितार्थ हो जाय और गरीब किसान अपने आंसू पोछते देखकर ऐसे नेताओ के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट करता रहे। अन्ना जी और उनकी टीम को जिस पेट्रोल की मूल्य वृद्धि की आज इतनी गंभीर याद आर्इ है उस टीम को क्या यह नहीं पता कि सम्पूर्ण भारत मे साइकिल पर चार साढे चार सौ रूपये कर लगाकर रसोर्इ गैस पर सब्सीडी दी जाती है, जहां बैलों की खाने वाली खली पर टैक्स लगाकर ट्रेक्टर को छूट मिलती है। क्या अन्ना जी नही जानते कि भारत मे वायु प्रदुषण करता है स्कूटर और कार वाला तो सफार्इ कर देता है पेड वाला। उन्हे यह भी जानना चाहिये कि हमारे छत्तीसगढ के गन्ना उत्पादक अपने खेत का गुड नही बना सकते। इतना ही नही, किसी षडयंत्र के अन्र्तगर्त हमारे पिछडे जिले सरगुजा या बस्तर का कोर्इ व्यकित अपने ही जिले मे जमीन खरीदकर न घर बना सकता है न खेती के अलावा कोर्इ छोटासा भी उधोग लगा सकता है। बडे-बडे शहरों मे या विकसित क्षेत्रों मे बेरोक टोक उधोग लगाये जा सकते है किन्तु पांचवी अनुसूची के क्षेत्र भी यदि विकसित हो गये तो हम अजायब घर दिखाने से वंचित रह जायेंगे।

अरविन्द जी, अन्ना जी ने मंहगार्इ के बढने की भी चर्चा की है। सच तो यह है कि बढती आर्थिक विशमता या श्रम शोषण पर से आम आदमी का ध्यान हटाने के लिये एक मंहगार्इ का झूठ बार बार बोला जा रहा है। दो वर्ग है (1) क्रेता (2) विक्रेता । हम अपनी कोर्इ चीज किसी दूसरे को देते है और हमे पहले की अपेक्षा कम वस्तु मिले तब हम उस वस्तु को मंहगा कह सकते है। साठ पैंसठ वर्षो मे सोना, चांदी जमीन को छोडकर कुछ भी मंहगा नही हुआ है। यदि साठ वर्ष पूर्व रूपया चांदी का था तो आज के रूपये के आधार पर उस तरह सामान मिलने की चर्चा करना मूर्खता है। महगांर्इ नाम की कोर्इ चीज नहीं है किन्तु स्वार्थ वश मंहगार्इ को भूत के रूप मे खडा किया गया है। सन साठ मे भी हर राजनेता या मध्यम वर्ग के लोग इसी तरह मंहगार्इ-मंहगार्इ चिल्लाते थे और आज भी। न उस समय मंहगार्इ थी न आज है।

एक चौथा षडयंत्र यह भी है कि उसी समय से नेताओं ने दोहरी चाल चली। एक तरफ तो वे कृत्रिम उर्जा सस्ती करके गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगाकर तथा मंहगाइ-मंहगार्इ का भ्रम फैलाकर इनके शोषण की पृष्ठभुमि तैयार करते रहे हैं तो दूसरी ओर गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान को अमीर शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्ता के विरूद्ध संघर्ष के लिये भी लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं। इस वर्ग के बिचौलिये लगातार घूम-घूम कर गरीब  ग्रामीण श्रमजीवी उत्पादक के हितैषी बनकर उनके वकील बने रहते हैं। उचित तो यही था कि वैचारिक बहस खडी करके ऐसे षडयंत्र को उजागर किया जाय किन्तु दुख होता है कि ऐसा करने की क्षमता रखने वाले लोग ही इस असत्य प्रचार के शिकार हो गये हैं।

अभी-अभी मै ए टू जेड न्यूज चैनल मे पेट्रोल की मूल्य वृद्धि पर चर्चा के लिये था। उपसिथत सौ लोगों मे मै अकेला था जो इस मूल्य वृद्धि को निरर्थक कह रहा था। मेरा विचार था कि भारत की सभी आर्थिक समस्याओ का एक ही समाधान है कि डीजल, पेट्रोल, गैस, बिजली, मटटी–तेल तथा कोयले के दाम कम से कम दो गुना करके ग्रामीण गरीब  श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुएं कर मुक्त कर दें, सब प्रकार के निजी वनोपज भी कर मुक्त कर दें तथा प्रत्येक व्यकित को शेष बची रकम प्रति व्यकित प्रति माह दो हजार रूपया उर्जा सब्सीडी के रूप मे दे दें। वहा एक भी व्यकित ऐसा नही मिला जो मेरी बात से सहमत हो। अनेक लोगो ने तो यहां तक कहा कि आज हमे खोजने से भी मजदूर नही मिलता। इस तरह तो मजदूर कभी मिलेगा ही नहीं। कुछ लोगो ने दलील दी कि गरीब तो अपने भाग्य की सीमाए समझकर संतुष्ट है और अमीर को कोर्इ फर्क नही पडेगा। वास्तव मे तो हम बीच वाले परेशान होंगे। मै देख रहा था कि वहा बैठा एक भी व्यकित ऐसा नही था जो श्रम खरीदने वाला न हो। वे स्वयं तो पंद्रह-बीस हजार रूपया का काम करना चाहते है और अपने घरेलू काम के लिये चार पांच हजार का मजदूर चाहते है। स्वाभाविक है कि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि ऐसे मध्यम वर्ग पर भी बुरा प्रभाव डालेगी जो पांच लोगों के परिवार मे पांच हजार रूपया मासिक से भी अधिक की उर्जा उपभोग करते हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ऐसे उच्च माध्यम वर्ग के हितो के लिये निम्न वर्ग की बलि चढा दी जावे। वर्तमान सरकार कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि न कर रही है न करना चाहती है। वह भी चाहती है कि गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान की कीमत पर उसका उच्च मध्यम बुद्धिजीवी वर्ग खुश रहे। इस वर्ग की शिक्षा, चिकित्सा आदि पर भारी खर्च की भरपार्इ के लिये मामूली सी पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि पर भी इतनी हाय तौबा मचती है जैसे कोर्इ बडा खतरनाक तूफान आने वाला हो। मुरार जी के कार्यकाल तथा विश्वनाथ प्रताप सिह जी के या अटल जी के गैर नेहरू परिवार शासन काल मे भारी डीजल, पेट्रोल, बिजली की मूल्य वृद्धि हुर्इ थी। तब नेहरू परिवार के नेतृत्व मे ही तो ऐसी मूल्य वृद्धि और मंहगार्इ के विरूद्ध आंदोलन करके सत्ता परिवर्तन हुआ। यदि अब विपक्ष के भाग्य से वही समय आया है तो हम उस विपक्ष को क्यों कोसें? किन्तु हमे तो अपनी बात रखने मे सत्य असत्य का भी ख्याल रखना होगा और जनहित का भी। इसके पूर्व भी टीम अन्ना सोने पर लगने वाले टैक्स का विरोध करके संदेह के घेरे मे आ चुकी है। अब प्रेट्रोल की मूल्य वृद्धि के विरोध ने तो सिथति को और खराब कर दिया है । आवष्यक नही कि हर मुददे पर अपनी राय व्यक्त ही की जावे। जो विषय ऐसे है उन पर बहुत सोचकर ही बोला जावे और यदि कोई विषय गरीब ग्रामीण किसान से जुडा हो तो और भी ज्यादा सतर्कता आवष्यक है।

हम जे पी आंदोलन के साथ लगातार जुडे रहे। वह आंदोलन भी धीरे धीरे सत्ता परिवर्तन तक सिमट गया। यह नया आंदोलन भ्रष्टाचार संघर्ष से शुरू होकर व्यवस्था परिवर्तन की दिशा मे बढना चाहिये। किन्तु सस्ती लोकप्रियता के चक्कर मे कहीं यह आंदोलन भी मंहगार्इ और डीजल-पेट्रोल जैसे अनावश्यक मुददो की भेंट न चढ जावे। यही सोचकर मैने एक सहायक के नाते सतर्क करना ठीक समझा । यदि कृत्रिम उर्जा या मंहगार्इ के विषय मे कोर्इ अपने वक्तब्य को ठीक मानता हो तो मै उन सबके बीच भी खुली चर्चा हेतु तैयार हूं। मै यह स्पष्ट कर दूं कि मै टीम अन्ना से ऐसी अपेक्षा नही करता कि वे अपना महत्वपूर्ण कार्य छोडकर इन कार्यो मे लगे किन्तु मै इतना अवश्य चाहता हू कि वे अपनी सोच को बिल्कुल साफ रखें कि कृत्रिम उर्जा का मंहगा होना भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का एकमात्र समाधान है।

श्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर, जनसत्ता अठाइस मार्च बारह, श्री कुलदीप नैयर, पंजाब केशरी पचीस अप्रेल बारह ।

Posted By: admin on May 23, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

 

अमेरिका की एक पत्रिका के सर्वे ने यह पाया कि आज के लिए प्रासंगिक चिंतकों में मार्क्स का नाम सबसे उपर है। पिछले कुछ वर्षों में गांधी और आंबेडकर भी विश्व बौद्धिक समाज को बेहद आकर्षित कर रहे हैं। लेकिन इस आकर्षण में एक राज भी छिपा है। गांधी, मार्क्स और आंबेडकर का जिक्र अब जिस तरह से हो रहा है उसमें उनका क्रांतिकारी तेवर गायब होता जा रहा है। सोवियत क्रांति के बाद बहुत-से देशों ने केवल राज्यसत्ता को वैध बनाए रखने के लिए मार्क्स के नाम का उपयोग किया। ठीक उसी तरह जैसे गांधी के नाम का उपयोग भारतीय राज्य ने किया। गांधी को महज महापुरूष, महात्मा और राष्ट्रपिता के रूप में पूज कर उनके संघर्ष के तेवर को कुंद कर दिया गया। आंबेडकर का भी कुछ यही हाल होने जा रहा है। मार्क्स पर कई उतर आधुनिकता के प्रवर्तक कुछ इस प्रकार लिखने लगे हैं कि उनकी एक नई छवि बनती जा रही है। गांधी पर भी लिखने वाले उदारवादी चिंतकों ने उनकी शांतिप्रियता को ही मूल तथ्य बना डाला है। एक तरफ जहां इनके विचारों से प्रभावित आंदोलन आपस में संवाद नहीं कर पा रहे हैं या एक दूसरे का विरोध करते पाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इनके विचारों की क्रातिकारिता पर परदा डालने में लगे हैं।

ऐसे में आनंद पटवर्धन की फिल्म ‘जय भीम कामरेड‘ इन तीनों चिंतकों के बीच एक संवाद की संभावना की खोज है। एक मार्क्सवादी कवि, गायक और चिंतक ने आत्महत्या करते समय घर की दीवार पर मोटे अक्षरों में लिख डाला कि ‘दलित अस्मिता की लड़ाई लड़ो।‘ यह आश्चर्यजनक घटना नहीं है, लेकिन इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है कि जीवन भर मार्क्स के विचारों पर चलने वाले एक कामरेड ने आत्महत्या क्यों की और उसे दलित अस्मिता इतनी महत्वपूर्ण क्यों लगी।

भारत में ऐसे विचारकों की कमी नहीं है जो दलित चेतना को मानव कल्याण की चेतना से जोड़ कर देखना चाहते हैं। उनके लिए गांधी एक महात्मा हैं जो आंबेडकर जैसे महात्मा के साथ सतत संवाद में लगे रहे। राजनीतिक विरोध परिस्थितिजन्य था, लेकिन वैचारिक साम्यता लक्ष्यजन्य थी। उनके लिए आंबेडकर का बुद्ध और मार्क्स के बीच तुलना करना एक को दूसरे के विरोध में खड़ा करना कतई नहीं था, बल्कि उनके बीच एक संवाद के सूत्र तलाशने का प्रयास था।

इस प्रयास की कुछ आवश्यक शर्ते हैं। पहली शर्त है कि हमारा लक्ष्य उनके बीच विवाद पैदा करने के बदले तत्कालीन संघर्ष के उनके अनुभवों को आधार बना कर नए संघर्ष की रूपरेखा खड़ी करना हो। वर्चस्व की संरचनाओं को समझने में उनकी मदद लें, विभिन्न मुद्दों पर उनके साथ संवाद कर देश, काल और परिस्थिति के संदर्भ में नई समझ बनाएं, ताकि संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके। संवाद की यह प्रक्रिया दुनिया भर के मुक्ति-संघर्षों के अलावा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फल-फूल रही दार्शनिक परंपराओं के साथ भी चलनी चाहिए। आने वाले समय में मुक्ति-संग्राम की दिशा इस बात से तय होगी कि अलग-अलग मुद्दों को लेकर संघर्षरत लोग इन चिंतकों से संवाद किस तरह स्थापित कर पाते हैं। ‘जय भीम कामरेड‘ फिल्म इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरूआत है।

श्री कुलदीप नैयर, पंजाब केशरी पचीस अप्रेल बारह। आस्ट्रेलिया के एक सम्पादक ने जब भारतीय प्रेस से सवाल किया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई दलित, अछूत शीर्ष स्थान पर क्यों नहीं है तो मैं परेशान हो गया। मैं इसे एक गलती मानता हूं जिसे बहुत पहले ठीक कर लिया जाना चाहिए था। मुझे लगा कि अब आगे कोई और देर किए बिना इसे ठीक कर लिया जाएगा।

लेकिन जब कुछ दिन पहले दलितों के गांधी डा. भीम राव अम्बेडकर की 121वीं जयंती पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया तो मुझे लगा कि दलितों के खिलाफ भेदभाव एक पूर्वाग्रह है जिसे समाप्त होने में दशकों लग जाएंगे। दलित हिंदू समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं और उनके खिलाफ बहुत पहले से ही दुराग्रह बना हुआ है। इस दुराग्रह को बनाए रखने में कोई शर्मिंदगी नहीं महसूस की गई है। अनुसूचित जातियों यानी दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में है। हालांकि यह प्रावधान उनके विरोध के बावजूद किया गया था। अम्बेडकर आरक्षण के खिलाफ थे। आरक्षण की तुलना उन्होंने बैसाखी से की थी लेकिन उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस के दूसरे नेता उन पर भारी पड़े और 10 सालों के लिए आरक्षण की व्यवस्था उन्हें स्वीकारनी पड़ी।

उस वक्त अम्बेडकर ने ऐसा नहीं सोचा था कि एक ओर राजनीतिक दल तो दूसरी ओर दलितों के बीच के निहित स्वार्थ वाले, खासकर क्रीमीलेयर वाले लोग आरक्षण की इस व्यवस्था को चुनावी लाभ के लिए लम्बे समय तक खींचते चले जाएंगे। चुनावी लाभ का लोभ इतना बड़ा है कि संसद में बिना किसी बहस के आरक्षण का यह प्रावधान दशक-दर-दशक बढ़ाया जाता रहा है।

हिन्दू समाज को डा. अम्बेडकर और उनके अनुयायियों का आभारी होना चाहिए कि इन लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। भेदभाव से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ इस्लाम धर्म कबूल कर लेने की बात कही तो महात्मा गांधी ने उनसे ऐसा नहीं करने का आग्रह किया और यहां तक कि आमरण अनशन पर बैठ जाने की धमकी दी। डा. अम्बेडकर गांधी की इच्छा के आगे झुक गए लेकिन फिर से हिन्दू धर्म स्वीकारने से इन्कार कर दिया। लेकिन धर्मांतरण से भी दलितों को कोई लाभ नहीं हुआ। इस्लाम, ईसाई या सिख धर्म में भी उनके साथ कमोवेश हिन्दू समाज जैसा ही व्यवहार होता रहा है। हालांकि इस्लाम, ईसाई या सिख धर्म समानता की बात करते हैं लेकिन दलित जहां कहीं भी गए, उन्हें भेदभाव और असहायता    दंश झेलना पड़ा। इस तरह हिन्दुत्व के बाहर भी दलितों को जाति व्यवस्था की बुराइयों से मुक्ति नहीं मिली। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इंगित किया है कि इस्लाम धर्म कबूल करने के बाद भी दलितों को अमानवीय व्यवहारों का सामना करना पड़ता है।

आज भी दलित सिर पर मैला ढोते हैं। सरकार इस पर रोक लगाने की बात करती है। यह बात 50 साल पहले ही शुरू की गई थी। उस वक्त भी गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए थे, लेकिन उस वक्त से आज तक स्थिति में बहुत थोड़ा ही बदलाव आया है क्योंकि सरकार इस प्रचलन को सिर्फ कानून बनाकर रोकने का प्रयास करती रही है। मुझे तो लगता है कि अगर दलित खुद सिर पर मैला ढ़ोने से इन्कार कर दें तो उनकी स्थिति ज्यादा बेहतर हो सकती है लेकिन वे इतने गरीब हैं कि अपनी आजीविका पर लात मारने की हिम्मत नहीं कर सकते।

अब यह बात साफ हो जानी चाहिये कि किसी कानून या किसी सरकारी प्रयास से अस्पृश्यता समाप्त नहीं होने वाली। दरअसल मानसिकता बदले बगैर कामयाबी नहीं हासिल की जा सकती। बच्चे जिस परंपरा और धर्म के नाम पर बड़े हो रहे हैं, वह दुराग्रहपूर्ण है। जब तक समाज को पक्षपाती रवैया छोड़ने को मजबूर नहीं किया जाता तब तक यह स्थिति नहीं बदलने वाली। देष में सामाजिक क्रांति के लिए कोई आंदोलन हो रहा हो, यह मुझे दिख नहीं रहा। उदाहरण स्वरूप लड़कियों को बोझ मानने का प्रचलन है। कितनी बच्चियां गर्भ में या जन्म के बाद मार दी जाती है। यह कोई तसल्ली देने वाला बात नहीं है कि ऐसी वारदातें तो ज्यादातर सिर्फ उत्तर भारत और खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ही होती हैं।

मानसिकता बदलने और दामन के धब्बे खत्म करने के लिए निरंतर प्रयास करने का असर बड़े पैमाने पर व्याप्त इन बुराइयों को समाप्त करने पर पड़ सकता है लेकिन ऐसा करने को कोई राजनीतिक दल तैयार नहीं है और न ही कोई एक्टीविस्ट इस दिशा में कुछ सोच रहा है।

उत्तर-  बजरंग़ मुनि- आप दोनों ही स्थापित विचारक हैं। आपने गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना की है। विषय अधिक गंभीर है। मेरी आप सबसे आंशिक सहमति तथा व्यापक असहमति है। अतः मैंने इसी अंक में इस संबंध में एक पूरा लेख लिखना ठीक समझकर मार्क्स गांधी और अम्बेडकर शीर्षक से लिखा है।

आपने दलित शब्द का बार बार उल्लेख किया है। कुछ वर्ष पूर्व दलित शब्द में वे सब लोग आते थे जो समाज में दबे कुचले हैं चाहे ये गरीब हों या हरिजन या आदिवासी। धीरे धीरे कुछ लोगों ने दलित शब्द हरिजन जाति के लिये रिजर्व कर लिया। पहले तो वैश्याएं भी दलित में ही मानी जाती थीं। आपने जिस वामपंथी नेता की आत्महत्या में दलित शब्द का उल्लेख किया है वह दलित शब्द जाति सूचक न होकर आर्थिक रूप से दबे हुए लोगों के लिये था। उनका आशय दबाये गये वर्ग से था न कि उनका आशय मायावती रामबिलास पासवान और मीरा कुमार से। आप अपनी भूल सुधार लें।

मानव स्वभाव है कि पूर्वाग्रह भुलाये तो जा सकते हैं किन्तु छुड़ाये नहीं जा सकते। दलित पूर्वाग्रह बढ़ने का कारण सिर्फ ये लोग हैं जो ऐसे पूर्वाग्रह को भूलने नहीं दे रहे। मौलिक अधिकारो की सुरक्षा आपका अधिकार है। संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा आपका अधिकार न होकर राज्य का कर्तव्य है। इसी तरह सामाजिक अधिकार आपका अधिकार न होकर सामने वाले का कर्तव्य है। आप उसके लिये दावा नहीं कर सकते। समानता किसी भी रूप में मौलिक अधिकार नहीं। स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार है। जानकारी के अभाव में हमारे संविधान में समानता को मौलिक अधिकार में डाल दिया गया। आप लोगों ने इस भूल को ठीक करने की अपेक्षा जोर से पकड़ लिया। आश्चर्य है कि कुलदीप नैयर जी सरीखे विद्वान भी मूल अधिकार की ठीक ठीक व्याख्या न करके गलत व्याख्या से चिपटे हुए हैं। समानता का व्यवहार किसी का अधिकार नहीं जो दावा करें।

आप दोनों दलितों के सम्बन्ध में समाज से निवेदन कर रहे हैं या शिकायत। दलित तो शिकायत कर ही नहीं सकते क्योंकि समानता को मूल अधिकार संविधान ने घोशित किया है, समाज ने नहीं। समाज ने स्वतंत्रता को मूल अधिकार माना है। मेरा आप सबसे निवेदन है कि किसी समाज शास्त्री के साथ बैठकर इन विषयों पर गंभीर चर्चा करिये और तब ऐसे शब्दों का प्रयोग करिये। सामाजिक भेदभाव कानून से मिटाना संभव नहीं। आप कानून से मूल अधिकारों की तो सुरक्षा कर नहीं पा रहे और सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा का दायित्व ले रहे हैं । मूल अधिकारों की सुरक्षा संविधान का दायित्व है। सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा संविधान का दायित्व न होकर कर्तव्य है जो स्वैच्छिक है। आप दायित्व पूरा करते हुए ही स्वैच्छिक कर्तव्य कर सकते हैं, दायित्व की अनदेखी करके नहीं। इन मुद्दों पर विचार करिये। दलित शोषित, पिछड़े आदि शब्दों का अनावश्यक उच्चारण आपको लाभ दे सकता है किन्तु समाधान नहीं दे सकता। समाधान तो सिर्फ एक ही है और वह है समान नागरिक संहिता।

 

मार्कस, गांधी और अम्बेडकर- बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 22, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

गांधी माकर्स और अम्बेडकर के बीच तुलनात्मक विवेचना कठिन कार्य है क्योकि गांधी की तुलना मे मार्कस और अम्बेडकर  कहीं नही ठहरते। तुलना के लिये आवश्यक है कि तीनो के लक्ष्य मे कुछ समानता हो भले ही मार्ग  भिन्न ही क्यो न हो। यहां  तो तीनो के लक्ष्य भी अलग अलग हैं और मार्ग भी । गांधी सामाजिक स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाकर चल रहे थे । गांधी के लक्ष्य मे कही भी सत्ता संघर्ष  नहीं था।  वे तो सत्ता मुक्ति के प्रयत्नों तक सीमित थे। मार्कस का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन था । गांधी का  लक्ष्य अकेन्द्रीयकरण था तो मार्कस का केन्द्रीयकरण। अम्बेडकर का लक्ष्य तो और भी सीमित था। मार्कस सत्ता को समस्याओं का समाधान बताते थे किन्तु स्वयं  सत्ता संघर्ष  मे नहीं थे किन्तु अम्बेडकर स्वयं प्रारंभ से ही सत्ता की तिकडम करते रहे। मार्कस पूंजीवाद  को हटाकर धनहीनों की सत्ता चाहते थे तो अम्बेडकर समाज व्यवस्था का लाभ उठा रहे सवर्णो के लाभ मे अवर्ण बुद्धिजीवियों का हिस्सा मात्र चाहते थे। गांधी किसी भी प्रकार के वर्ग संघर्ष  के विरूद्ध थे तो मार्कस गरीब अमीर के बीच तथा अम्बेडकर सवर्ण अवर्ण के बीच संघर्ष के पक्षधर थे। गांधी वर्ग संघर्ष के परिणाम मे समाज टूटन विषरूपी परिणाम देखकर चिन्तित थे तो मार्कस  और अम्बेडकर  वर्ग संघर्ष  के परिणाम स्वरूप  समाज टूटन को सत्ता रूपी मक्खन समझकर प्रसन्न होते थे। गांधी अधिकतम अहिंसा के पक्षधर थे तो मार्कस अधिकतम हिंसा के और अम्बेडकर को हिंसा अहिंसा से कोई परहेज नही रहा। इतनी सारी विसंगतियों के बाद तीनो के बीच कैसे तुलना संभव है।

कुछ लोग कहते हैं कि मार्कस का अन्तिम लक्ष्य शासन मुक्त व्यवस्था थी । यह एक ऐसा झुठ प्रचार था जिसका उसी तरह कोई सिर पैर नही था जिस तरह निर्मल बाबा के समोसे मे। अम्बेडकर जी का कथन बिल्कुल स्पष्ट था। उसमे मार्कस के समान असत्य कल्पना नही थी। परिणाम स्पष्ट था कि मार्कस के कथनानुसार चलने वालो को पूरा पूरा सत्ता सुख मिला जिसमे कहीं भी समाज के लिये गुलामी के अतिरिक्त कुछ और नही था तो अम्बेडकर जी के मार्ग पर सत्ता की दिशा चलने वालों को लूट के माल मे हिस्सा मिलना शुरू हो गया। समाज को न मार्कस की दिशा मे गुलामी से राहत मिली न अम्बेडकर के मार्ग से। गांधी की चर्चा इसलिये संभव नहीं क्योकि गांधी तो स्वतंत्रता के पहले पडाव पर ही मार दिये गये। सत्ता के दो दावेदार गुटो मे से एक ने गांधी के विरूद्ध ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी की शारीरिक हत्या हो गई तो दूसरे ने गांधी के वारिस बनकर ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी विचारों की हत्या हो गई।

यदि हम भारत का आकलन करें तो यहां आपको मार्कस की लाइन पर चलने वाले भी बडी संख्या मे मिल जायगें क्योकि इस लाइन पर चलने मे कहीं न कहीं सत्ता की उम्मीद है। अम्बेडकर की लाइन पर चलने मे भी लाभ ही लाभ है क्योकि वहां भी सत्ता मे हिस्सेदारी की पूरी व्यवस्था अम्बेडकर जी सदा सदा के लिये कर गये है। बेचारे गांधी के मार्ग पर क्या मिलने वाला है? क्यो    कोई गांधी मार्ग पर चले । आज भारत मे बेचारे गांधी का हाल यह है कि यदि किसी से कहा जाय कि तुम्हारे बेटे के रूप मे गांधी का जन्म होने वाला है तो वह चाहेगा कि गांधी के रूप वाला बेटा पडोसी के घर चला जाय। उसे तो नेहरू    बिडला या अम्बेडकर सरीखे बेटे से ही काम चल जायगा। गांधी की लाइन पर चलने वाले को न तो कोई व्यक्तिगत लाभ है न ही पारिवारिक। इस लाइन पर चलकर सिर्फ सामाजिक लाभ ही संभव है जिसमे चलने वालो का भाग नगण्य है। दूसरी ओर मार्कस या अम्बेडकर की लाइन पर चलने वाले को व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ भरपूर है। इतना ज्यादा कि वह पूरे समाज के लाभ को भी अपने घर मे डाल रखने की शक्ति पा जाता है। बताइये कि आज के भौतिक युग मे कोई गांधी मार्ग पर क्यो चले?

यदि अम्बेडकर या मार्कस मे आंशिक रूप से भी सामाजिक भाव होता तो वे श्रम, बुद्धि और धन के बीच श्रम की मांग और मूल्य बढने की बात करते जिससे आर्थिक सामाजिक विषमता कम होती । गांधी ने लगातार श्रम और बुद्धि के बीच दूरी घटाने की कोशिश की । अम्बेडकर को तो श्रम से कोई मतलब नहीं था। न अच्छा न बुरा। अम्बेडकर तो सिर्फ सामाजिक असमानता का लाभ उठानें तक ही पर्याप्त  थे। किन्तु मार्कस को आधार बनाकर बढने वालों ने श्रम को धोखा देने के लिये मानसिक श्रम नामक एक नया शब्द  बना लिया जो पूरे पूरे  शारीरिक श्रम का हिस्सा निगल गया। बुद्धि जीवियों ने शारीरिक श्रम शोषण के ऐसे ऐसे तरीके खोज लिये कि श्रम और बुद्धि के बीच दूरी लगातार बढती चली गई । यदि गांधी के अनुसार मशीन और शारीरिक श्रम के बीच कोई मानवीय संतुलन रखा गया होता तो आज जैसी अराजकता नहीं होती। किन्तु मार्कस वादियों की निगाहें श्रम पर थी और निशाना बुद्धि को लाभ पहुंचाने का। मार्कस को मानने वाले चीन मे श्रमजीवियो की अमानवीय दषा का वर्णन भी रोगटे खडे करने वाला है। भारत जहां समाजवादी लोकतंत्र नामक आंशिक साम्यवाद ही आ पाया किन्तु यहां भी श्रम और बुद्धि के बीच लगातार बढता फर्क स्पष्ट है। यदि श्रम की मांग और महत्व बढ जाता तो जातीय आरक्षण की जरूरत  ही नही पडती। किन्तु भारत मे सत्ता लोलुप त्रिगुट श्रम  मूल्य वृद्धि के प्रयास से ही आतंकित थे। नेहरू के नेतृत्व का कांग्रेसी गुट बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को अधिकाधिक सुविधा देकर उनके वोट लेने का प्रयास करता रहा तो साम्यवादी श्रम प्रधान लोगों को बहकाकर उन्हे पूंजीवाद के विरूद्ध नारा लगवाने का औजार मानते रहे और अम्बेडकर वादियों की खास समस्या रही कि यदि श्रम और बुद्धि के बीच की दूरी घट गई तो जातीय आरक्षण महत्वहीन हो जायगा। तीनो के अलग अलग स्वार्थ थे और इस स्वार्थ का उजागर करने वाला कोई था नहीं।

गांधी कट्टर हिन्दू थे। वे मानते थे कि हिन्दू धर्म की वाह्य मान्यताएं अन्य सभी धर्मो की अपेक्षा अधिक मानवीय है। मार्कस अपना स्वयं का धर्म चलाना चाहते थे। उनके अनुसार धर्म समाज मे होता है। यदि राज्य ही समाज बनकर समाज के सभी काम करने लगे तो किसी धर्म की जरूरत ही क्या है। अम्बेडकर को हिन्दू धर्म से विशेष द्वेष था। वे बचपन से ही हिन्दू धर्म छोडकर उससे प्रत्यक्ष टकराव चाहते थे। किन्तु गांधी जी ने कडाई से उन्हे रोक दिया। अम्बेडकर बहुत चालाक थे। उन्होने समझा कि कुछ वर्ष हिन्दू ही रहकर उसकी जडो मे मट्ठा डालने का काम क्यो न करें? जहां लोहिया, जयप्रकाश, नेहरू, पटेल आर्थिक विषमता को दूर करना अपनी प्राथमिकता घोशित कर रहे थे वहीं अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के पीछे अपनी सारी शक्ति लगा दी। वे मुसलमान होना चाहते थे किन्तु मुस्लिम महिलाओं को उन्होंने अपने कोड बिल के सुधारवादी कदम से बाहर रखा। रोकने वाला कोई था नही। गांधी थे ही नही, नेहरू जी अंबेडकर से डरते थे। गांधी हत्या के बाद संघ अविश्वसनीय हो चुका था। अम्बेडकर के इस प्रयत्न को कौन रोकता? हिन्दू धर्म के तथाकथित अगुवा सवर्ण स्वयं अवर्ण  शोषण के कलंक से मुंह छिपा रहे थे। अम्बेडकर जी हिन्दू कोड बिल बनवाने मे सफल रहे। मुझे आश्चर्य होता है कि गांधी के कट्टर हिन्दू होते हुए भी किसी धूर्त हिन्दुत्व के स्वार्थ पूर्ण प्रचार से प्रभावित होकर किसी हिन्दू ने ही गांधी की हत्या कर दी। मै समझ नही पाता कि हिन्दुत्व का शत्रु कौन? अम्बेडकर, मार्कस अथवा वह स्वार्थ पूर्ण प्रचार जिसने सत्ता के फेर मे पडकर गांधी को उसमे बाधक मान लिया। कुछ ही वर्ष बाद बात उजागर हो गई जब ऐसे तत्वो ने हिन्दू संगठन के नाम पर अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया। मै अब भी मानता हॅू कि हिन्दू धर्म मे आंतरिक बुराइयां थी और अब भी है किन्तु अन्य धर्मो के साथ संबंध मे हिन्दू धर्म के मुकाबले कोई नही। गांधी हिन्दू धर्म की आंतरिक बुराइयों को दूर करना चाहते थे और अम्बेडकर उसका लाभ उठाना चाहते थे यही तो है इनका तुलनात्मक विश्लेषण।

गांधी के बाद गांधी को ठीक से समझने वालो मे दो नाम ही प्रमुख है। (1) राम मनोहर लोहिया (2) जय प्रकाश नारायण। लोहिया जी ने गांधी विचार और मार्कस  के बीच समाजवाद का मार्ग चुना और जे पी मार्कसवाद से अलग होकर गांधी विचार की लाइन पर आये। दोनो के साथ क्या हुआ यह इतिहास के पन्नो मे अंकित हैं। और कोई गांधीवादी था नही। संघ परिवार गांधी विरोध का प्रत्यक्ष झंडा उठाये घूम रहा था तो साम्यवादी परिवार सर्वोदय मे चुपचाप घुसकर उसका वे्न-वाश कर रहा था। ज्योही कोई संघ परिवार से निराश होकर गांधी को समझना चाहता था त्योही ये साम्यवादी उसके खिलाफ दुश्प्रचार शुरू कर देते थे। वेचारे नाना जी देशमुख का उदाहरण आपके सामने है। मेरे साथ भी यही कोशिश हुई किन्तु बंग साहब सिद्धराज जी को मेरे विरूद्ध समझाने मे यह गुट सफल नही सहो सका । अब  भी इस गुट ने हार नही मानी है। मैने तो सुना है कि वह गुट कुछ हद तक रामदेव जी के साथ भी तालमेल बिठाने मे सफल हो गया है जो इस लेख का विषय नहीं।

वर्तमान समय मे गांधी विचार को सबसे अधिक साफ साफ समझने वाला एक ही व्यक्ति दिखता है अन्ना हजारे । वैसे तो आर्य भूषण भारद्वाज कृष्ण कुमार खन्ना अविनाश भाई आदि भी हैं जो विचारो के साथ साथ प्रत्यक्ष जीवन मे भी पूर्ण गांधीवादी है किन्तु ऐसे लोग कम ही है। अन्य अनेक गांधीवादियों की तो जीवन स्तर तक ही गांधी की सीमा है। विचारो से कुछ लेना देना नही । एक अन्ना हजारे ऐसे व्यक्तित्व के रूप मे आये जिन्हे गांधी की समझ है। अनेक अम्बेडकर वादी तो बेचारे अन्ना के पीछे पिल पडे है। मार्कस  को मानने वाले अभी  अध्ययन  कर रहे है। संघ परिवार अन्ततः अन्ना का विरोध ही करेंगा   । क्योकि संघ परिवार का उद्देश्य सत्ता है जो अन्ना का नही फिर भी इतिहास साक्षी है कि सत्ता लोलुप कांग्रेसी साम्यवादी संध परिवार अंबेडकर वादियो के लाख दुश्प्रचार के बाद भी सामान्य भारतीय के मन मे आज भी गांधी के प्रति अगाध श्र्रद्धा है। अन्ना जी के लिये भी यह सामान्य जन मानस की श्रद्धा ही आधार बन सकती है। गांधी मार्कस और अम्बेडकर तो जा चुके है। अब तो आशा की किरण अन्ना हजारे पर ही टिकी है।

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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