Lets change India
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
3
परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
19

भारत की आर्थिक स्थिति और मनमोहन सिंह!

Posted By: admin on June 13, 2012 in Recent Topics - Comments: No Comments »


मनमोहन सिंह जी एक कुशल अर्थषास्त्री माने जाते हैं। सन साठ से इक्यानब्बे तक चली समाजवादी अर्थव्यवस्था जब भारत की आर्थिक स्थिति को मरणासन्न बना दिया तब मनमोहन सिंह जी ने वित्तमंत्री के रूप में उसे पुनर्जीवित किया। २००४ से २००९ तक उनके ही प्रधानमंत्री काल में अर्थव्यवस्था ठीक रही। किन्तु पिछले दो वर्षों से भारत की अर्थ व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। रूपया डालर से कमजोर हो रहा है। विकास दर गिर रही है। आयात निर्यात भी असंतुलित है। बेचारे मनमोहन सिंह कुछ नहीं कर पा रहे।
भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर हुर्इ नहीं बलिक की गर्इ। १९९१ से लेकर २०१० तक आर्थिक मामले राजनैतिक षड़यंत्र से मुक्त होते थे। सरकार में शामिल साम्यवादी निर्णायक रूकावट नहीं बन सके क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूकावट थे। किन्तु इन दो वर्षों में राहुल गांधी के लिये मनमोहन सिंह को कमजोर करने की जो योजना बनी वह मनमोहन सिंह को डुबाने की जगह भारतीय अर्थव्यवस्था को ही कमजोर करने का आधार बन गर्इ। मनमोहन सिंह के पैरों में राष्ट्रीय सलाहकार समिति का जो पत्थर सोनिया जी की चौकड़ी ने बांधा था उस पत्थर ने भारत की अर्थव्यवस्था की गति बहुत कम कर दी। रही सही कसर बंगाल की शेरनी ने पूरी कर दी। सत्ता की भूखी ममता को न देश से मतलब था न देश की अर्थव्यवस्था से। उसे तो मतलब था सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनैतिक ताकत बढ़ाने से। पिछली बार साम्यवादियों से मुक्त होने में मुलायम सिंह जी ने मदद की किन्तु इस बार ममता से पिण्ड छुड़ाने में मुलायम सिंह ज्यादा सतर्क हैं क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।
सोनिया जी को जल्द ही आभास हो गया कि मनमोहन सिंह जी को परेशान करने का दुष्प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है तथा वह प्रभाव मनमोहन सिंह जी की जगह कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है। अर्थात यदि मनमोहन सिंह कमजोर हुए तो न वे रहेंगे न राहुल। अब वो फिर से मनमोहन सिंह के पक्ष में दिख रही हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद गूंगी बहरी हो गर्इ है। ममता से भी मुकित के मार्ग तलाशे जा रहे हैं।
यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंच चुका है किन्तु अब भी यदि अर्थव्यवस्था को राजनीति से मुक्त करके स्वतंत्रता दे दी जाये तो गाड़ी फिर से पटरी पर आ सकती है। डीजल मूल्य नियंत्रण मुक्त करने, केरासिन एल.पी.जी सब्सीडी घटाने, बीमा कम्पनियों में विदेशी भागीदारी तथा मुक्त खुदरा व्यापार जैसी कुछ बाधाओं ने अर्थव्यवस्था को संकट मे डाला है। एक टब से दूध निकालने को बाल्टी ले लेकर हजारों लोग खड़े हों किन्तु दूध डालते समय दूध की जगह सब लोग पानी ही पानी डालें तो न मनमोहन सिंह पानी को दूध बना सकते हैं न ही कोर्इ अन्य। हमे दूध डालने और निकालने के बीच समन्वय तो करना ही होगा। मैं पिछले कुछ दिनों से आश्वस्त हूं कि सोनिया जी स्थिति का समझने लगी हैं और जल्दी ही स्थिति सुधर सकती है।

समान नागरिक संहिता।

Posted By: admin on in Uncategorized - Comments: 1 Comment »


नागरिक संहिता तथा आचार संहिता बिल्कुल अलग-अलग अर्थ और प्रभाव रखते हैं। नागरिक संहिता नागरिक की होती है, राजनैतिक व्यवस्था से जुड़ी होती है, सामूहिक होती है जबकि आचार संहिता व्यकित की होती है, व्यकितगत होती है, समाज या राज्य के दबाव से मुक्त होती है। नागरिक संहिता को हर हाल में समान होना ही चाहिये दूसरी ओर आचार संहिता को समान करने का प्रयत्न घातक होता है।
विवाह, खानपान, भाषा, पूजा-पद्धति, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आचार संहिता से जुड़े विषय हैं। कोर्इ सरकार इस संबंध में कोर्इ कानून नहीं बना सकती। सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में सरकारी सहायता व्यकितगत न होकर नागरिकता से जुड़े हैं। इस संबंध में सरकार कोर्इ कानून बना सकती है।
स्वतंत्रता के समय से ही आचार संहिता और नागरिक संहिता का अन्तर नहीं समझा गया और न आज तक समझा जा रहा है। आचार संहिता तथा नागरिक संहिता को एक करने के कारण समाज में अनेक समस्याएं बढ़ती गर्इं समाज टूटता गया तथा राजनेता मजबूत होते चले गये। राजनेता तो लगातार चाहता है कि समाज, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिंग, गरीब-अमीर, किसान, मजदूर के रूप में वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष की दिशा में बढ़ता रहे तथा राजनेता बिलिलयों के बीच बन्दर बनकर सुरक्षित रहें।
भारत की राजनैतिक व्यवस्था को व्यकित, परिवार, गांव, जिला, प्रदेश, देश और विश्व के क्रम में एक दूसरे के साथ जुड़ना चाहिये था, किन्तु उसे जोड़ा गया व्यकित, जाति, वर्ण, धर्म, समाज के क्रम में। स्वाभाविक था कि उपर वाला क्रम एक दूसरे का पूरक होता तथा नीचे वाला क्रम एक दूसरे के विरूद्ध। स्वतंत्रता के तत्काल बाद अम्बेडकर जी, नेहरू जी आदि ने तो सब समझ ते हुए भी यह राह पकड़ी जिससे समाज कभी एक जुट न हो जावे किन्तु अन्य अनेक लोग नासमझी में आचार संहिता और नागरिक संहिता को एक मानने लगे। आज भी संघ परिवार के लोग समान नागरिक संहिता के नाम पर आचार संहिता के प्रश्न उठाते रहते हैं। विवाह एक हो या चार यह नागरिक संहिता का विषय न होकर आचार संहिता से संबंधित है जिसे बहुत चालाकी से नागरिक संहिता में घुसाया गया है।
आज भारत में जो भी सामाजिक समस्याएं दिख रही हैं उनका सबसे अच्छा समाधान है समान नागरिक संहिता। भारत एक सौ इक्कीस करोड़ व्यकितयों का देश होगा, न कि धर्म, जाति, भाषाओं का संघ। भारत के प्रत्येक नागरिक को समान स्वतंत्रता होगी। संविधान के प्रीएम्बुल में समता शब्द को हटाकर स्वतंत्रता कर दिया जायेगा। प्रत्येक नागरिक के अधिकार समान होंगे। न्यायालय भी कर्इ बार समान नागरिक संहिता के पक्ष में आवाज उठा चुका है। अब समाज को मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिये।

आंदोलन अन्ना-रामदेव, एक समीक्षा…!

Posted By: admin on June 9, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »


यह स्पष्ट है कि भारत की वर्त्तमान राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह असफल है| व्यवस्थापक राजनेताओं की नीतियाँ तो गलत है ही, नियत भी गलत है| भ्रष्टाचार हमारे राजनेताओं की बुरी नियत का परिणाम है, कारण नहीं| “Power Corrupts a Man and Absolute Power Corrupts Absolutely” एक सर्वमान्य सिद्धांत है| हमारे राजनेता लगातार समाज के स्वाभाविक कार्यों में भी हस्तक्षेप बढाकर Absolute Power की दिशा लगातार बढ़ते हैं जिसका परिणाम होता है निरंतर भ्रष्टाचार वृद्धि|

वर्त्तमान समय में जो भी राजनैतिक संघर्ष में सक्रिय संगठन भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे हैं उनके आंदोलन अन्ततोगत्व सत्ता संघर्ष तक सीमित है| भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर जनमत जागरण करके स्वयं सत्ता में आना उनका लक्ष्य है| बाबा रामदेव जी के पुरे आंदोलन में तो दिशा पूरी तरह स्पष्ट ही है की वह सत्ता संघर्ष है| टीम अन्ना का अभी स्पष्ट होना बाकी है| टीम अन्ना कभी तो संसदीय प्रणाली पर प्रश्न खड़े करती है तो कभी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर लोकपाल पर आ जाती है| जब तक संसद और समाज के अधिकारों का पुनः विभाजन नहीं होता तब तक यह साफ़ नहीं कि टीम अन्ना सत्ता संघर्ष कि दिशा में है या व्यवस्था परिवर्तन कि दिशा में| लोकपाल का आंदोलन सांसदों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता है किन्तु संसद के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगता| संसद को संविधान कि सीमाओं के अंतर्गत ही कार्य करने कि बाध्यता है| फिर वही संसद संविधान में संशोधन कैसे कर सकती है? यह साधारण सा प्रश्न टीम अन्ना समझना नहीं चाहती या समझने कि हिम्मत नहीं कर रही| बाबा रामदेव से तो व्यवस्था परिवर्तन कि उम्मीद ही व्यर्थ है किन्तु टीम अन्ना से अब भी बहुत उम्मीद है की वह जुलाई कि २५ तारीख से अपने आंदोलन कि लाइन भ्रष्टाचार से हटा कर लोक्स्वराज्य कि दिशा में मोडेंगे| भारत को संसदीय लोकतंत्र नहीं, सहभागी लोकतंत्र चाहिए यह स्पष्ट आवाज़ उठाने का समय आ गया है|

मेरे विचार में अन्नाजी सहभागी लोकतंत्र कि दिशा में बढ़ना चाहते हैं किन्तु उनकी टीम अभी दुविधा में है| यदि दुविधा छोड़ कर स्पष्ट मार्ग लेलें तो समाज अवश्य साथ देगा| लोकपाल राजनैतिक भ्रष्टाचार का हो सकता है किन्तु भ्रष्टाचार मुक्ति व्यवस्था परिवर्तन नहीं है और व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक है सहभागी लोकतंत्र|

परिवार व्यवस्था कितनी आवश्यक ?

Posted By: admin on in Uncategorized - Comments: 6 Comments »

व्यवस्था तथा संस्कृति एक दूसरे के पूरक होते हैं। व्यवस्था का प्रभाव संस्कृति पर पड़ता है तथा संस्कृति का व्यवस्था पर।

दुनिया में वर्तमान समय में चार संस्कृतियां प्रमुख हैं जिनका व्यवस्थाओं पर दूरगामी प्रभाव है। (1) इस्लामिक (2) पाश्चात्य (3) भारतीय (4) साम्यवादी। साम्यवाद ने संस्कृति को रौंदकर बुलडोजर प्रणाली से व्यवस्था बनाने की कोशिश की। इस्लाम, इसाइयत तथा हिन्दुत्व ने व्यक्ति, परिवार तथा समाज और धर्म के बीच कुछ तालमेल बिठाकर व्यवस्था की रूपरेखा बनार्इ तो, साम्यवाद ने व्यक्ति, परिवार, समाज, धर्म आदि को एकसाथ समाप्त करके सिर्फ बन्दूक के बल पर अपनी व्यवस्था बनाने की कोशिश की। साम्यवाद कुछ वर्षों तक सफल भी रहा किन्तु शीघ्र ही उसकी पोल खुल गर्इ तथा अब वह धीरे धीरे इतिहास के पन्नों तक सिमटता जा रहा है। अन्य तीन संस्कृतियां और उनसे प्रभावित व्यवस्था अब भी स्वस्थ प्रतियोगिता में सक्रिय है।

तीनो संस्कृतियों में व्यक्ति, परिवार, समाज और धर्म का तालमेल है। हिन्दू संस्कृति प्रभावित व्यवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज का पूरा पूरा समन्वय होता है। तीनो के अपने-अपने विशेषाधिकार भी होते हैं तथा सीमाएं भी। इस्लाम में परिवार व्यवस्था का स्वतंत्र असितत्व है तथा धर्म का भी। इस्लाम में व्यक्ति के मूल अधिकारों को मान्यता लगभग नहीं के बराबर है। इसाइयत में व्यक्ति और समाज को महत्व प्राप्त है। इसमें धर्म और परिवार को व्यवस्था में विशेष स्थान प्राप्त नहीं। हिन्दू संस्कृति में धर्म व्यवस्था का अंग नहीं है। हिन्दू संस्कृति में धर्म किसी भी रूप में संगठन नहीं होता। इसलिये यह व्यवस्था का सहायक मात्र तक सीमित होता है।

हिन्दू संस्कृति दुनिया की एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो बहुत पुराने तथा लम्बे समय से अपनी व्यवस्था को बचाये हुए है। प्राचीन समय में हमारी संस्कृति तथा व्यवस्था बहुत ज्यादा विकसित थी या पिछड़ी हुर्इ यह निष्कर्ष अभी भी विवादास्पद ही है, किन्तु यह बात विवाद रहित है कि यह व्यवस्था बहुत पुरानी है। उल्लेखनीय यह भी है कि हमारी व्यवस्था पिछले कर्इ सौ वर्षो तक एक एक करके दोनों व्यवस्थाओं की गुलाम रहीं। सामान्यतया गुलामी व्यवस्थाओं पर गहरा परिवर्तनकारी प्रभाव डालती है। किन्तु इतनी लम्बी गुलामी के बाद भी तथा विशेष कर इस्लामिक आक्रमणों को झेलते हुए भी हमारी संस्कृति और व्यवस्था लगभग बची रही। इससे सिद्ध होता है कि व्यक्ति, परिवार और समाज को मिलाकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा विपरीत परिसिथतियों में भी अपने संरक्षण की विशेष शक्ति है, अन्यथा इस्लाम के आधिपत्य के बाद तो कोर्इ बच सकता ही नहीं किन्तु हम बचे रह गये।

मेरे विचार में हमारे बच जाने का कारण हमारी व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। इन तीनों का तालमेल इतना मजबूत हो जाता है कि बड़ी से बड़ी ताकत भी इसे तोड़ नहीं पाती। व्यक्ति और समाज के बीच परिवार का स्वतंत्र अस्तित्व है और परिवार एक अभेद्य दीवार होती है जिसे तोड़े बिना समाज व्यवस्था पर कोर्इ बड़ा प्रभाव डालना संभव ही नहीं होता।

गुलामी के लम्बे काल में भी हमारी त्रिस्तरीय व्यवस्था सुरक्षित रही। यधपि इस व्यवस्था में कुछ विकृतियाँ आर्इ। समाज व्यवस्था ने व्यक्ति और परिवार की सीमाओं का उल्लंघन करके अपना हस्तक्षेप बढ़ाया। परिणाम हुआ जातिवादी शोषण, धार्मिक कट्टरवाद, अन्धविश्वास, पुरूष प्रधानता आदि। ये सभी विकृतियां परिवार व्यवस्था की देन न होकर समाज सशक्तिकरण की देन रही। स्वतंत्रता के बाद भारत की राजनैतिक व्यवस्था इस त्रिस्तरीय व्यवस्था के विकल्प के रूप में सामने आर्इ। इस्लाम, पश्चिमी संस्कृति तथा साम्यवाद के बीच प्रतिस्पर्धा हुर्इ कि भारत की नर्इ राजनैतिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित करें। गांधी के जीवित रहते हुए भी तीनो शक्तियां समझ चुकी थीं कि नेहरू और अम्बेडकर राजनैतिक दौड़ में आगे निकल जायेंगे। तीनों ने ही इन दोनों को अपने साथ जोड़ने की जी तोड़ कोशिश की। गांधी को ये तीनो ही शक्तियां बाधक मानती थीं और नेहरू अम्बेडकर को साधक। गांधी के बाद तो इन्हें और भी सुविधा हो गर्इ। नेहरू और अम्बेडकर दोनों ही पाश्चात्य व्यक्ति और समाज व्यवस्था को मानते थे। दोनों ही परिवार व्यवस्था को अनावष्यक मानते थे। नेहरू जी के मन में हिन्दू समाज व्यवस्था के प्रति नफरत का भाव था और अम्बेडकर के मन में हिन्दुत्व के प्रति आक्रोष। अम्बेडकर इस्लाम को हिन्दुत्व की अपेक्षा ज्यादा अच्छा समझते थे तो नेहरू जी साम्यवाद को। पश्चिम को तो दोनो ही ठीक मानते थे। यही कारण रहा कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से परिवार व्यवस्था को बिल्कुल गायब कर दिया गया। यदि ये प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र इकार्इ भी मान लेते तब भी कोर्इ कठिनार्इ नहीं थी। किन्तु एक ओर तो इन्होंने परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता से अलग कर दिया तो दूसरी ओर इन्होंने समाज सुधार के नाम पर परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के भी लगातार प्रयत्न किये। हिन्दू कोड बिल, अनेक प्रकार के विवाह कानून, संपत्ति कानूनों में मनमाना बदलाव आदि ने हिन्दू परिवार समाज व्यवस्था को लगातार कमजोर किया तथा आज भी कर रहे हैं। आज भी भारत के सभी राजनैतिक दल भारत की त्रिस्तरीय व्यवस्था को द्विस्तरीय करने का लगातार प्रयत्न करते रहते हैं। अन्य राजनैतिक दल तो इस व्यवस्था को व्यक्ति, परिवार और समाज से बदलकर व्यक्ति और समाज तक ही ले जाना चाहते हैं किन्तु भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार तो इससे भी आगे जाकर इसे धर्म के अन्तर्गत करने की दिशा में अग्रसर है जो पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के विरूद्ध इस्लामिक संस्कृति है। हमारी हिन्दू संस्कृति में धर्म हमेशा ही आचरण का भाग रहा है, व्यवस्था का नहीं। व्यवस्था में तो परिवार और समाज ही आगे रहे हैं। ये तथाकथित धर्म के ठेकेदार, धर्म और समाज का कभी अन्तर ही नहीं समझते तो भूल तो होगी ही।

व्यवस्था को ठीक रखने के लिये व्यक्ति परिवार समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था बहुत सफल भी है और आवश्यक भी। स्वतंत्रता के बाद परिवार व्यवस्था अलग करने के दुष्परिणाम हमारे सामने स्पष्ट हैं। अपराध लगातार बढ़े हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ भावना बढ़ी है और सहअसितत्व का विचार घटा है। घूर्तता को सफलता का मापदण्ड माना जा रहा है। संपत्ति के विवाद बढ़ रहे हैं। अव्यवस्था का वातावरण है। समाधान स्पष्ट नहीं दिख रहा। किन्तु करना तो होगा ही। परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना सबसे अच्छा समाधान है। व्यक्ति, परिवार और समाज के अलग अधिकार, उनकी स्वतंत्रताएं तथा सीमाएं तय करके उन्हें संवैधानिक मान्यता दे दी जाये। धर्म को व्यक्तिगत आचरण तक सीमित कर दें तथा सरकार का व्यक्ति, परिवार, समाज के आपसी सम्बन्धों की सुरक्षा के अतिरिक्त उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बिल्कुल रोक दें। परिवार व्यवस्था हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था की मेरूदण्ड है। परिवार व्यवस्था को मजबूत करना ही चाहिये। पश्चिम की परिवार विहीन प्रणाली तथा इस्लाम की समाज विहीन प्रणाली के परिणाम हम देख चुके हैं। अब हम अपनी भारतीय व्यवस्था को मजबूत करें तो अच्छा होगा।

परिवार प्रणाली की विकृतियां भी सुधार करना प्रासंगिक होगा। मेरे विचार में निम्न सुधार हो सकते हैं।

(1) परिवार की वर्तमान रक्त संबंधो वाली बाध्यता को समाप्त करके कम्यून प्रणाली के साथ सामंजस्य बिठाया जाये।

(2) प्रत्येक व्यक्ति की पारिवारिक सदस्यता अनिवार्य हो। अकेला व्यक्ति समाज का अंग तो हो, उसे मूल अधिकार भी प्राप्त हों किन्तु समाज व्यवस्था में उसकी भागीदारी तब तक रोक दी जाये जब तक वह किसी परिवार का सदस्य न हो या किसी को जोड़कर नया परिवार न बना ले। कम से कम एक व्यक्ति के साथ जुड़ना या जोड़ना आवश्यक है अन्यथा मतदान तथा संपत्ति का अधिकार तब तक निलमिबत रहेगा जब तक परिवार न बने।

(3) प्रत्येक परिवार ग्राम सभा में रजिस्टर्ड होगा। व्यक्तिगत संपत्ति पर रोक होगी। सम्पूर्ण संपत्ति पारिवारिक होगी जिसमें परिवार छोड़ते समय उसे परिवार की सदस्य संख्या के आधार पर बराबर हिस्सा मिलेगा। लड़की भी अपने माता पिता को छोड़ते समय अपना हिस्सा लेकर नये परिवार में शामिल कर देगी।

(4) परिवार के प्रत्येक सदस्य का सामूहिक उत्तरदायित्व होगा। किसी सदस्य के अपराध करने पर परिसिथति अनुसार उस पूरे परिवार को दण्ड संभव है जिस परिवार का दण्ड देते समय वह व्यक्ति सदस्य हो।

(5) माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे आदि के संबंध परिवार तथा समाज तक सीमित होंगे। कानून में इन शब्दों का कोर्इ महत्व नहीं होगा। विवाह, तलाक, संतानोत्पत्ति आदि की व्यवस्था आंतरिक रहेगी। कोर्इ अन्य तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक किसी के मूल अधिकारों का उल्लंघन न हो।

(6) किसी अन्य परिवार के किसी सदस्य के विरूद्ध अपने परिवार के मुखिया की सहमति से ही थाने या कोर्ट में शिकायत हो सकती है अन्यथा नहीं। अपने परिवार के किसी सदस्य के विरूद्ध भी थाने में शिकायत के पूर्व परिवार छोड़ना आवश्यक है।

(7) परिवार की सम्पूर्ण संपत्ति का विवरण और मूल्यांकन ग्राम सभा में प्रति वर्ष या प्रति दो वर्ष में घोषित करना अनिवार्य होगा। घोषित संपत्ति के अतिरिक्त छिपार्इ गर्इ संपत्ति सरकार की या ग्राम सभा की हो जायेगी।

(8) परिवार का एक प्रमुख होगा जो सबसे अधिक उम्र का होगा। उसकी भूमिका राष्ट्रपति या परिवार देवता के रूप में रहेगी। एक मुखिया होगा जो परिवार के लोग मिलकर चुनेंगे। मुखिया परिवार का संचालक होगा।

इस नर्इ व्यवस्था से कुछ समस्याएं सुलझेंगी और कुछ नये प्रष्न भी उठेंगे। यधपि इस प्रणाली पर देष भर के लोगों ने उन्नीस सौ निन्यानब्बे में बैठकर विचार करके निर्णय किया किन्तु अब भी इस प्रणाली में संशोधन होना संभव है।

यह आवश्यक है कि परिवार प्रणाली को किसी न किसी स्वरूप में संवैधानिक मान्यता मिले। परिवार, व्यक्ति के सहजीवन की पहली पाठशाला है। इस व्यवस्था के टूटने के कारण सहजीवन प्रणाली के अभाव के बुरे परिणाम दिख रहे हैं। परिवार प्रणाली को सशक्त करने के लिये समाज में बहस छिड़े तथा राजनेताओं पर दबाव बने कि वे परिवार प्रणाली को संवैधानिक मान्यता प्रदान करें।

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal