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भारतीय लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा….!

Posted By: admin on July 25, 2012 in Recent Topics - Comments: No Comments »


बजरंग मुनि:
राहुल गांधी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो गये हैं। वे मान गए हैं कि बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लिए उनके कंधे तैयार हैं, तब इस बात की पूरी संभावना है कि 2014 में होने वाले आम चुनावों में उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। वर्तमान समय में अगर कोई चीज लोकतंत्र की सबसे बड़ी शत्रु है तो वह है देश के प्रधानमंत्री पद का किसी एक परिवार के लिए आरक्षित हो जाना। राहुल गांधी को जिस तरह से झाड़ पोंछकर प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया गया है उससे वे देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु बन गये हैं।

आज के राजनीतिक वातावरण को देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्री पद गांधी नेहरू परिवार की संपत्ति हो गई है जिस पर वे अपने ही परिवार के किसी सदस्य को देखना चाहते हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही चली आ रही परिवारवाद की यह समस्या आज देश की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। गांधी परिवार में ऐसी कोई विशेषता नहीं है कि जिसके बिना इस देश का काम न चल सके। एक विकार की तरह कांग्रेस में यह विचार हमेशा प्रभावी रहा है कि योग्यता का मतलब होता है प्रधानमंत्री का पद और प्रधानमंत्री के पद का मतलब होता है नेहरू गांधी वंश परंपरा। यह विकार कितना विकराल हो गया है इसका उदाहरण सत्यव्रत चतुर्वेदी के उस बयान से भी पता चलता है जिसमें वे बड़ी बेशर्मी से कहते हैं कि प्रधानमंत्री पद की योग्यता अब नेहरू गांधी परिवार के रक्तबीज में समा गया है।

कांग्रेस में परिवारवाद की यह समस्या आज से ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता के बाद से ही चली आ रही है। जब नेहरू प्रधानमंत्री पद पर आसीन थे तो उन्होंने किसी दूसरे व्यक्ति को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी बेटी इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाया जबकि इंदिरा में उस समय कोई असामान्य खासियत नहीं थी। इंदिरा के बाद राजीव गांधी आए और उनके बाद सोनिया गांधी एक तरह से कांग्रेस सरकार में देश चला रही हैं। सोनिया के बाद राहुल को भी उसी पथ पर आगे बढ़ाया जा रहा है। जिस पर उनके परिवार वाले चले हैं। उनको प्रधानमंत्री बनने की शिक्षा बहुत पहले से दी जा रही है। अब उसका परिणाम देखने का समय आया है।

कांग्रेंस नेतृत्व इस बात का भी पूरा ध्यान रखता है कि जब इस तरह का कोई निर्णय ले तो कोई विरोध का स्वर न उठे। इसके लिए वह पार्टी में ऐसे लोगों को संरक्षण देता हैं जो उनके फैसलों के पीछे हमेशा सिर हिलाये । कांग्रेस पार्टी उन्हें ऊंचा ओहदा देती है जिससे वे मुश्किल घड़ी में हमेशा उनका साथ देते हैं। नेहरू गांधी परिवार हमेशा अपने आसपास एक चौकड़ी निर्मित करके रखता है। समय समय पर यही चौकड़ी नेहरू गांधी परिवार की वंदना करके उनको प्रासंगिक बनाये रखती है। अब जिन पर कांग्रेस ने इतने एहसान किए हो वे उनके खिलाफ कैसे जा सकते हैं। नेहरु परिवार और ये उनके संरक्षण में पलनेवाले लोग एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन यह प्रवृति कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र के लिए भी घातक है। क्योंकि यदि राहुल प्रधानमंत्री बनते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी कौन संभालेगा। यह सवाल बरकरार है।वैसे तो सोनिया जी है ही या यदि ज्यादा ही लोकतंत्र का ढोंग करना हुआ तो अभी से दिग्विजय सिंह , सलमान खुशीर्द , सत्य व्रत चतुर्वेदी सरीखे लोग लाइन लगाने में खड़े हो चुके है

गांधी नेहरू परिवार ने महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल कर राजनीतिक सफलता तो अर्जित कर ली, लेकिन उन्होंने गांधी जी के विचारों को तिलांजलि दे दी। नेहरू परिवार ने समाज को रास्ता दिखाया, लेकिन उस रास्ते पर चलने से वे खुद कतराते रहे। उन्होंने गांधी के मरते ही उनके विचारों को भी त्याग दिया। जब गोडसे ने गांधी को मारा तो भले ही उसका कर्म भी गलत था, और निर्णय भी लेकिन यही बात उसकी नीयत के बारे में नहीं कही जा सकती। क्योंकि उसके विचार दोषी हो सकते हैं लेकिन उसकी नीयत नहीं। नेहरू के बारे में यही बात थोड़ी उलटी है। उनके कर्म और निर्णय भले ही सही हो परन्तु नीयत पर सवाल उठना लाजमी है।

सवाल यह भी उठता है कि अगर राहुल इतने योग्य व्यक्ति हैं तो उन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया जाए। यहां तक की महात्मा गांधी की जगह बैठा दिया जाए तो कोई लोकतंत्र बिरोधी बात नहीं होगी। लेकिन प्रधानमंत्री ही क्यो? क्या कांग्रेस की नजर में योग्यता का अर्थ प्रधानमंत्री की कुर्सी ही है। या गांधी नेहरू परिवार का अंतिम लक्ष्य ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना है। प्रधानमंत्री के पद पर अगर किसी एक ही परिवार के लोगों का कब्जा बना रहे तो लोकतंत्र का झुकाव राजशाही को ओर बढ़ता जाता है।

भारत जैसे लोकतंत्र के लिए यह बात भी खतरनाक है कि संविधान संशोधन का अधिकार संसद के पास है। जिससे सरकार की तानाशाह बनने की आशंका हमेशा बनी रहती है। अगर सरकार कोई ऐसा संशोधन कर दे जिससे उसकी अवधि ज्यादा लंबी हो जाए तो लोकतंत्र को राजतन्त्र बनने से रोक पाना मुश्किल होगा। इसकी थोड़ी सी झलक आपातकाल के दौरान जनता देख चुकी है। संविधान संशोधन के लिए एक अलग ईकाई का होना अनिवार्य है। जिससे जनता की स्वतंत्रता को कोई खतरा न हो।

जो लोग मनमोहन सिंह की आलोचना करते हैं और उन्हें सिर्फ नेहरूगांधी परिवार के लिए उन्हीं की पसंद का प्रधानमंत्री बताते हैं वे लोकतंत्र से मजाक कर रहे हैं। मनमोहन सिंह की प्रशंसा की जानी चाहिए। इसलिए भी क्योंकि उन्होंने नेहरू गांधी परिवार की परिधि से प्रधानमंत्री पद को बाहर रखा और कांग्रेस का शासन होने के बाद भी गैर नेहरू गांधी परिवार का होने के बावजूद प्रधानमंत्री के पद पर दो बार आसीन हुए. लेकिन इसके साथ ही मनमोहन सिंह की इस लिए भी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने नेहरू के उस समाजवादी आर्थिक ढांचे को भी ध्वस्त करने का काम किया जिसके सहारे नेहरू गांधी परिवार आर्थिक तरक्की का दंभ भरता रहा। नेहरू के इसी आर्थिक मॉडल के सहारे समाजवाद लाने और गरीबी हटाने की अनेक कोशिश की गईं लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हुए।

ऐसा लगता है कि कल के परिपेक्ष्य को देखते हुए किसी षड़यंत्र के अर्न्तग़त जिसमे सुषमा स्वराज सहित भाजपा का बड़ा वर्ग भी शामिल है, उन्हें आज बदनाम कर रहा है। अगर वास्तव में नेतृत्व में कमी है तो सोनिया गांधी की भी आलोचना होनी चाहिए। केवल मनमोहन सिंह की नहीं। भ्रष्टाचार को रोकने का सबसे सही तरीका है निजीकरण जिसका हमेशा मनमोहन सिंह ने पक्ष लिया है। वे ही 1991 के उदारीकरण के जनक भी माने जाते हैं। लेकिन लगता है उन्हें रास्ते से हटाने के लिए उनकी बदनामी की जा रही है। हो सकता है राहुल गांधी में बहुत सारे ऐसे गुण हो जिसका लाभ उनकी पार्टी को मिल सकता हो लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए उनको प्रस्तावित करना देश के लोकतंत्र के लिया खतरा पैदा करना है। अगर इस तरह प्रायोजित तरीके से राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद पर आसीन कर दिये जाएंगे तो वे लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु बन जाएंगे।

प्रश्न उठता है कि हम भारतीय मतदाता इस खतरे को टालने के लिये क्या कर सकते हैं? कांग्रेस पार्टी तो एक चौकडी की गुलामी है जिसे नेहरू गांधी परिवार हमेशा बनाता बिगाडता रहता है। भारतीय जनता पार्टी की संघ परिवार से मुक्ति हो नही सकती । विदित हो कि संघ परिवार की तो जन्मघुट्टी ही केन्द्रित शासन प्रणाली से शुरू होती है। दलो के रूप मे कोई दिखता नहीं। व्यक्तियों के रूप मे चार व्यक्ति दिखते है जिनमे से कोई एक यदि आगे बढाया जा सके तो इस खतरे से बचा जा सकता है। 1 मनमोहन सिंह 2 अरविन्द केजरीवाल 3 नीतिश कुमार 4 नरेन्द्र मोदी। यदि मनमोहन सिंह को दस प्रतिशत भी समर्थन बढ जावे तो सोनिया जी ऐसा खतरा न उठाकर मनमोहन सिंह पर ही दांव लगाने को मजबूर हो सकती हैं। यदि अरविन्द जी और नीतिश जी पर विचार करे तो अभी समय बाकी है। यदि नरेन्द्र मोदी पर विचार करे तो सर्वाधिक आसान और खतरनाक मार्ग है। नरेन्द्र मोदी देश की सभी समस्याओ के समाधान के लिये तो सर्वाधिक उपयुक्त है किन्तु तानाशाही का भी उतना ही खतरा है। समस्याओ के त्वरित समाधान और तानाशाही का चोली दामन का संबंध होता है। यह तो अन्तिम विकल्प होना चाहिये । राहुल के मार्ग मे कांटे बिछाने मे मनमोहन सिंह, नीतिश कुमार और अरविन्द केजरीवाल के बीच तो कुछ सहमती भी बन सकती है किन्तु नरेन्द्र मोदी से इतनी सूझबूझ पर संदेह ही है। अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव मे अमेठी और रायबरेली ने जिस तरह राहुल और उनके पारिवारिक घमंड को चकनाचूर किया वैसा ही चमत्कार पूरे भारत की जनता को चुनावों मे कर के दिखाना चाहिये तभी भारतीय लोकतंत्र पर दिख रहे राहुल खतरे से मुक्ति संभव है।

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