Lets change India
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जु...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपाल...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है। 2 समाज को एक ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...

खबरें इस सप्ताह की 16-12-2012 से 22-12-2012

Posted By: admin on December 23, 2012 in Recent Topics - Comments: No Comments »

इस सप्ताह एक महत्वपूर्ण घटना क्रम में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का चुनाव सफलता पूर्वक जीत लिया तथा भारतीय जनता पार्टी हार गई। जिस दिन गड़करी जी की पोल खुली उसके बाद पूरे देश में भाजपा के पैर ही उखड़ गये। सर्वविदित है कि कांग्रेस पार्टी राजनीति में भ्रष्टाचार की खान है किन्तु वह स्वयं को इमानदार घोषित भी तो नहीं करती। कांग्रेस ने कभी कोई चुनाव चरित्र के आधार पर नहीं लड़ा। उसने हमेशा ही नीतियों तथा कार्यक्रमों को सामने रखकर चुनाव लड़ा। भाजपा के पास न कोई नीति है न कार्यक्रम। उसने हमेशा चरित्र को आगे करके चुनाव लड़ा। वहां  भी कभी भाजपा का चरित्र आगे नहीं रहा। संघ का चरित्र हमेशा कसौटी पर रहा। पहली बार संघ चरित्र के साथ समझौता करने को मजबूर दिखा है। हिमाचल के परिणाम तो दिख ही गये। यदि गुजरात में भी नरेन्द्र मोदी भाजपा को किनारे करके चुनाव लड़ते तो वर्तमान की अपेक्षा कुछ ज्यादा सीटें मिलती। भाजपा के कारण सीटों का नुकसान ही हुआ है, लाभ नहीं।

आज गुजरात सहित पूरे देश में नरेन्द्र मोदी की जो छवि बनी है उसमें सर्वाधिक विवाद रहित छवि यह है कि उन्होंने सारे संवैधानिक कानूनी संकटों का मुकाबला करते हुए अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता से गुजरात को मुक्त किया। पूरे भारत का हिन्दू समाज मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विस्तार से आहत है। हिन्दू समाज के सामने अल्पसंख्यक संख्या विस्तार की छीना झपटी में लगा हुआ है। हिन्दू समाज अपने पुराने संस्कारों के कारण ऐसी छीना झपटी में शामिल नहीं हो सकता किन्तु उसका स्वाभिमान आहत तो होता है। वह संघ परिवार की बात मानकर इस छीना झपटी में शामिल तो नहीं होता किन्तु यदि कोई इकाई ऐसी छीना झपटी में बाधक हो तो उसे राहत मिलती है। अल्पसंख्यकों और खासकर गुजरात के मुसलमानों का यह घमण्ड टूटा कि भारतीय संविधान ने उन्हें कुछ विशेष सुविधाएं दे रखी हैं। मोदी ने प्रमाणित किया कि संविधान से भी न्याय उपर होता है। भारत के मुसलमानों का यह घमण्ड कि उनकी एकजुटता राजनैतिक लाभ के लिये पर्याप्त है, गुजरात में टूट गया। पिछले दस वर्षों में एक भी दंगा न होना यह सिद्ध करता है कि हिन्दुओं का आत्म संतोष और मुसलमानों की संख्या बल विस्तार की तिकड़म पर रोक पूरे देश के साम्प्रदायिक टकराव को रोकने का एक अच्छा समाधान हो सकता है। पूरे भारत के मुसलमान जितना ही मोदी के इस पक्ष की आलोचना करते हैं उतना ही पूरे भारत में मोदी की मांग बढ़ती जाती है। यदि गुजरात में दो तीन और तीस्ता सीतलवाड हो जातीं तो मोदी की राह और ज्यादा आसान हो गई होती।

साम्प्रदायिकता से सफलता पूर्वक निपटने के बाद मोदी ने अपराध नियंत्रण की ओर रूख किया। गुजरात में मोदी के कार्यकाल में कई नामी अपराधी फर्जी मुठभेड़ में मारे गये। भारत की न्यायपालिका न्याय की अपेक्षा कानूनों पर ज्यादा महत्व देती है। मोदी जी ने कानून की अपेक्षा न्याय को ज्यादा महत्व दिया। उन्होंने ऐसा इशारा किया या मात्र आंखें बन्द कीं यह तो स्पष्ट नहीं है किन्तु कुछ प्रमुख अपराधियों को गुजरात की कार्यपालिका ने बिना न्यायपालिका की मदद के ही निपटा दिया। यह कार्य उचित था या नहीं यह अलग विषय है और उसका निर्णय न्यायपालिका कर रही है, किन्तु गुजरात की जनता को बहुत राहत मिली और इस राहत में मुसलमान भी शामिल थे जो मोदी के पहले चरण के अभियान से दुखी थे। संघ परिवार चाहता था कि मोदी अपने पहले साम्प्रदायिक एजेन्डे पर ही चलते रहें किन्तु मोदी ने इन्कार कर दिया। जब गुजरात का मुसलमान संख्या बल विस्तार से अलग शान्ति से रहना चाहता है तो उनसे अनावश्यक छेड़छाड़ की संघ प्रवृत्ति मोदी को पसन्द नहीं। अशोक सिंहल, प्रवीण तोगडि़या जैसे कट्टर लोगों की भी मोदी ने कभी परवाह नहीं की।

साम्प्रदायिक मुसलमानों और नामी अपराधियों से निपटने के बाद मोदी ने प्रशासनिक सुधार की राह पकड़ी और इसमें भी वे सफल रहे। आज मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। यदि शेष भारत का मुसलमान ज्यादा जोर शोर से मोदी के विरूद्ध खड़ा हो जावे और कांग्रेस पार्टी ज्यादा जोर शोर से ऐसे मुसलमानों के पक्ष में खड़ी हो जावे तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने का मार्ग आसान हो सकता है। मोदी जी को चाहिये कि वे अब तक जिस यथार्थ वाद की नीति पर चलते रहे उससे पीछे न हटें।

इस सप्ताह संसद में आरक्षण मुद्दे पर भी खूब तमाशा हुआ। स्वतंत्रता के बाद पहली बार मुलायम सिंह जी ने आरक्षण की वर्तमान नीति  को चुनौती दी। राज्य सभा में मुलायम अकेले पड़े किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। मुलायम सिंह आरक्षण विरोध में ही अपना राजनैतिक भविष्य देख रहे थे। स्वतंत्रता के समय सवर्णों ने अपनी भूल सुधारने के लिये कर्तव्य समझ कर आरक्षण का समर्थन किया था उस आरक्षण को उन लोगों ने अपना अधिकार मान लिया। सम्पूर्ण भारत में आरक्षण का दुरूपयोग हो रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व जिन हरिजन आदिवासियों को जातिवाद के दुष्प्रभाव झेलने पड़े उनमें से अधिकांश आज भी उसी तरह हैं। यदि गाय को मिलने वाली रोटी पशु होने के नाम पर कुत्ता खाता रहेगा तो हजार वर्ष बीतने के बाद भी गाय तो भूखी ही रहेगी। मुलायम सिंह जी ने ठीक समय पर ठीक कदम उठाया। भारतीय जनता पार्टी लम्बे समय से नीतियों के आधार पर आरक्षण के विरूद्ध रही है किन्तु रणनीति के अन्तर्गत चूक गई और पहल मुलायम सिंह जी ने ले ली। राज्यसभा के मतदान के एक दिन बाद ही भाजपा को होश आया और उसने कुछ नया सोचना शुरू किया। वैसे तो कांग्रेस के भी बहुत लोग आरक्षण के खिलाफ हैं किन्तु कांग्रेस में तो एक परिवार की गुलामी है। उन्हें तो वही कहना होगा जो सोनिया जी कहेंगी। सोनिया ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने बेटे को कांग्रेस पर थोप दिया। कौन बोलेगा? इसलिये आरक्षण मुद्दे पर भी कोई स्वतंत्र राय आ नहीं सकती। किन्तु कम से कम भाजपा में तो वैसी हालत नहीं। आगे चाहे यह बिल पास हो या फेल किन्तु मुलायम सिंह ने यह कदम उठाकर बहादुरी का काम किया है।

इस सप्ताह एक और घटना क्रम में जी न्यूज के मालिकों से पूछताछ और उसके दो सम्पादकों की गिरफ्तारी एवं जमानत का मुद्दा छाया रहा।

प्रसिद्ध उद्योगपति नवीन जिन्दल के एक बड़े घपले की जानकारी जी न्यूज के सम्पादकों को थी। जी न्यूज के सम्पादकों से नवीन जिन्दल ने समाचार रोकने का कोई सौदा किया जो सम्भवतः पच्चीस करोड़ का था। सम्पादकों और जिन्दल के बीच यह राशि बढ़ाने की चर्चा हुई। यह पहल जी न्यूज ने की या जिन्दल ने उन्हें प्रेरित किया यह स्पष्ट नहीं है किन्तु यह सौदा बढ़ते बढ़ाते सौ करोड़ तक चला गया। पूरी बातचीत को जिन्दल ने गुप्त रूप से रेकार्ड कर लिया जिस आधार पर जी न्यूज के दोनों सम्पादकों की गिरफ्तारी और जमानत हुई तथा जी न्यूज के मालिकों से भी पूछताछ शुरू हुई जो अब तक जारी है।

स्पष्ट दिखता है कि जिन्दल कम्पनी के किसी बहुत बड़े घपले को छिपाने के लिये मीडिया कर्मी जी न्यूज ने सौ करोड़ का ब्लैकमेल किया। यह ब्लैकमेल किस सीमा तक गैर कानूनी कार्य है यह तो न्यायालय तय करेगा किन्तु यदि यह पूरी घटना सच है तो वह किस सीमा तक अनैतिक या अपराध है यह विचारणीय है। स्पष्ट है कि हर अपराध तो गैर कानूनी भी होता है और अनैतिक भी किन्तु हर अनैतिक या गैर कानूनी अपराध नहीं होता। मेरी जानकारी के अनुसार तो सिर्फ चार पांच प्रतिशत ही गैरकानूनी कार्य अपराध होते हैं और अनैतिक होना तो बिल्कुल ही भिन्न बात है।

किसी मीडिया कर्मी ने किसी भी व्यक्ति को इस तरह ब्लैकमेल किया कि यदि उसने बात नहीं मानी तो वह झूठ बोलकर फंसा देगा तो ऐसा ब्लैकमेल निश्चित रूप से अपराध भी है और गैर कानूनी भी और अनैतिक भी। किन्तु यदि कोई व्यक्ति चुप रहने के लिये कोई सौदेबाजी करता है तो वह तब तक अपराध नही जब तक वह व्यक्ति उस काम के लिये नियुक्त न हो। यदि कोई पुलिस वाला अपराधी को छोडने के बदले पैसा ले या जज अपराधी को छोड़ने के नाम पर ब्लैकमेल करे तो यह कार्य अपराध होगा क्योंकि वह व्यक्ति उस कार्य के लिये नियुक्त था। किन्तु यदि कोई सामान्य व्यक्ति कोई अपराध होता हुआ देख ले और वह हल्ला न करने के निमित्त कोई सौदा कर ले तो यह कार्य सिर्फ अनैतिक और गैर कानूनी तक ही सीमित होगा न कि अपराध। मीडिया कर्मी इस भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिये नियुक्त नहीं थे। उन्हें अपराध की जानकारी मात्र थी जिसे उजागर न करने के नाम पर उन्होंने जिन्दल कम्पनी से सौदेबाजी की तो इसमें अपराध क्या है? यदि आप अपराध, गैर कानूनी और अनैतिक का अन्तर नहीं समझते तो किसी विवेचना के पूर्व आपको यह अन्तर समझना चाहिये।

मीडिया कोई सामाजिक संस्था न होकर एक व्यवसाय है। ऐसी स्थिति में किसी व्यवसायी से अति उच्च सामाजिक दायित्व की कल्पना करना ठीक नहीं। वैसे भी मीडिया यदि पूरी तरह इमानदार रहे तो उसका सारा व्यवसाय ही बिक जायेगा। इतने सस्ते में अखबार देने वाला यदि विज्ञापन के लिये दबाव डालता है तो गलत क्या है? यदि विज्ञापन के न मिलने से वह कोई गलत समाचार प्रसारित करे तो वह कार्य अनैतिक गैरकानूनी के साथ साथ अपराध भी होगा किन्तु विज्ञापन के बदले चुप हो जाना कोई अपराध नहीं। वैसे भी अब मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बन गया है। लोकतंत्र के तीन स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का वर्तमान में जैसा नैतिक स्तर है उसका प्रभाव यदि चौथे स्तंभ पर भी दिखे तो गलत क्या है? क्या आप चाहते हैं कि लोकतंत्र के तीन स्तंभ आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहें और चौथा स्तंभ बिल्कुल पाक साफ बना रहे। ऐसा संभव ही नहीं है। अतः जो लोग जी न्यूज जिन्दल की घटना से विचलित हैं उन्हें फिर से स्थिति की समीक्षा करनी चाहिये।

 

 

 

 

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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