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मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मनमोहन सिंह: एक सफल प्रधानमंत्री :-बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 7, 2014 in Uncategorized - Comments: No Comments »

1945971कहा जाता है कि मनमोहन सिंह के अंदर राजनीति की समझ नही है। मेरी समझ मे कोई गैर राजनीतिक व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाए तो, यह कोई बुराई नही है। मनमोहन सिंह अन्य राजनेताओं की तरह कलाकारी नही करते, नाटकबाज नही है। गरीब के बच्चे को गोद मे उठाकर उसके प्रति करूणा का नाटक करना, अलग- अलग प्रदेशों मे जाकर उन प्रादेशिक भाषाओं मे दो-चार शब्द बोलकर लोंगों का मन जीत लेना, शब्दाडम्बर युक्त भाषण देकर भीड को मोहित कर लेना अथवा प्रत्यक्ष छूट देकर परोक्ष रूप से ले लेना, यदि राजनीति का गुण है और मनमोहन सिंह ऐसा नही कर पाते, तो मै मनमोहन सिंह का प्रसंसक हॅूं। ऐसा व्यक्ति असफल सिद्ध किया जा सकता है किन्तु वास्तव मे असफल होता नही। मनमोहन सिंह सफल अर्थशास्त्री रहें हैं, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उनके मुकाबले मे भारत मे तो कोई अन्य सफल नही हो सका। 2009 के बाद अर्थव्यवस्था को राजनीति की कलाबाजियों ने असफल किया। मनमोहन सिंह ने भरसक कोशिस की कि अर्थव्यवस्था पटरी से ना उतरे किन्तु जब उन्हें महसूस हुआ कि अर्थव्यवस्था पटरी से उतर नही रही है, बल्कि जानबूझकर सोनिया जी द्वारा उतारी जा रही है, तब उन्होने हथियार डाल दिया। 2009 तक सोनिया जी की नीयत अर्थव्यवस्था के मामले मे ठीक-ठाक थी। 2009 के बाद ही उनकी नीयत मे खोट आया। चाहे कोई भगवान भी अर्थशास्त्री बनकर आ जाए, तो यह कैसे संभव है कि खर्चा बढता चला जाए और आमदानी घटती जाए। यह कैसे संभव है कि बजट घाटा बढते जाए, नये-नये नोट छपतें जाएं और मुद्रास्फीति ना बढे। यदि इतनी सामान्य सी बात भी हमारे मित्रों या पाठकों को समझ ना आवे तो मै क्या करूँ ? 2007 मे जब नरेगा चालू हुआ था, तो नरेगा की न्यूनतम मजदूरी 60 रूपये घोषित थी। 60 रूपये मे भी बेरोंजगारों की संख्या बहुत बडी थी और बडी मुस्किल से कुछ परिवारों के एक सदस्य को सौ दिन के रोजगार की गारंटी थी। आज सात वर्षों मे ही विभिन्न दबावों के अंतर्गत नरेगा की मजदूरी को बढाकर नरेगा की मजदूरी को ढाई से तीन गुणा कर दिया गया, और वह भी वर्ष भर के लिए करा दिया गया। क्या बिगड जाता यदि मनमोहन सिंह पर इतना दबाव डालने की अपेक्षा स्वाभाविक गति से बढने दिया जाता और बजट घाटा इतना नही बढता। संभव है कि नरेगा की मजदूरी जो आज है, इससे दस या पंन्द्रह प्रतिशत कम बढी होती। मनमोहन सिंह ने कई बार प्रयास किया, सोनिया जी को भी समझाया और देश को भी बताया कि ऐसा उचित नही किन्तु किसी ने एक ना सुनी और सोनिया ने जब अपना वीटो पावर लगा दिया तो मनमोहन सिंह ने सरेंडर कर दिया। गरीबी रेखा के विषय मे, मैने विभिन्न विद्वानों के लेख पढे। हरिभूमि 25 मार्च 2012 के पृष्ठ छः पर कुछ अलग-अलग विद्वानों के लेख संग्रहित हैं-तथाकथित विद्वान लेखक निरंकार सिंह, अवधेष कुमार, अलका आर्य, प्रभात कुमार राय आदि के अलग-अलग लेख संग्रहित हैं। सबने मोनटेक सिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह द्वारा घोषित गरीबी रेखा को 28 रूपये बताने पर या तो इनकी आलोचना की है अथवा मजाक उडाया है। विभिन्न टी.वी. चैनलों ने तो कितना नाटक किया वह सबने देखा। किसी ने किसी होटल मे जाकर एक कप चाय का दाम 15 रूपये बताया तो किसी ने किसी होटल मे जाकर 28 रूपये मे आधे पेट भोजन भी ना मिलना बताया। ऐसा लगा जैसे अनेक तथाकथित विद्वान लेखक अथवा टी.वी. चैनल कहीं से पैसे के बल पर संचालित हो रहें हैं, जो तथ्यों को तोड-मरोडकर उनके ऐसे भवार्थ प्रस्तुत कर रहें हैं। आज तक किसी लेखक या टी.वी. चैनल ने यह नही बताया कि आज से चार-पाँच वर्ष पूर्व गरीबी रेखा बारह रूपये के आसपास थी। किसी मोदी ने कभी यह नही बताया कि भाजपा के कार्यकाल मे गरीबी रेखा कितने रूपये घोषित थी। प्रश्न उठता है कि इस यथार्थ को छिपाने के पीछे उन तथा-कथित विद्वानों का क्या उद्देश्य रहा होगा? योजना आयोग ने जो आकड़ा प्रसारित किया उसके अनुसार गरीबों की संख्या घटी है, इसका भी देश भर के पेशेवर लोगों ने बहुत मजाक उडाया। उन्होनें कभी यह विचार नही किया कि मूल्यों को मुद्रास्फीति के साथ जोडने के बाद ही कोई आंकलन हुआ करता है। एक बिना आँख वाला भी देख सकता है, कि पिछले दस वर्षों मे जीवन स्तर मे सुधार आया है, फिर भी ये आँख वाले विद्वान पता नही क्यों जानबूझकर कहतें हैं कि गरीबी बढी है, या गरीबों की संख्या बढी है। स्पष्ट दिखता है कि मनमोहन सिंह को एक ओर तो आर्थिक मोर्चे पर असफल करने का प्रयास किया गया तो दूसरी ओर प्रचार के मुद्दे पर भी उन्हें असफल सिद्ध करने मे कोई कोर-कसर बाकी नही छोडी गई। मेरा स्पष्ट संकेत है कि दोनो मोर्चों पर एक साथ प्रयास करने का कार्य किसी साधारण हस्ती के बस की बात नही थी और वह हस्ती सोनिया जी के अलावा कोई्र नही।
सुप्रीमकोर्ट ने तो और भी कमाल का काम किया, जब उसने राजनेताओं के समान लोकप्रियता की प्रतियोगिता मे स्वयं को शामिल कर लिया। सुप्रीमकोर्ट ने बार बार यह कहकर अपनी विश्वसनीयता घटाई कि गोदामो मे सडता हुआ अनाज गरीबों मे मुफ्त बाँट दिया जाए। अनाज ना सडे यह सुप्रीमकोर्ट की चिंता का विषय हो सकता है। सरकार सडते हुए अनाज को चाहे विदेश भेजे अथवा बाजार मे बेच दे अथवा उपभोंक्ताओं को सस्ता दे दे अथवा गरीबों को मुफ्त मे दे दे, ऐसी सलाह तो संभव है किन्तु यह कैसे संभव है कि बजट से बाहर जाकर अनाज को मुफ्त मे दे दिया जाए। आप सोचिए कि सारी आलोचनाओं को झेलते हुए भी मनमोहन सिंह ने सुप्रीमकोर्ट की सलाह ना मानकर जितनी हिम्मत का काम किया, उसके बाद भी क्या वे प्रशंसा के पात्र नही है। यदि वे चाहते तो मुफ्त मे अनाज को बाँटकर प्रशंसा ले लेते, भले ही उसके लिए और नोट छापने पडते, भले ही मुद्रस्फीति और बढ जाती, भले ही डॉलर के मुकाबले रूपया और गिर जाता। मैने अनेक ऐसे मुद्दों मे से कुछ आर्थिक मुद्दें ही आपके सामने रखें हैं जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि मनमाहन सिंह के साथ अन्याय हुआ है, अत्याचार हुआ है और मैं ऐसे अन्याय, अत्याचार मे पाप का हिस्सेदार नही बन सकता। आप सब पाठक अपनी आलोचनाएं भेज सकते हैं।
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बजरंग मुनि:-मोबाइल नंबर :-09617079344

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