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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर किस वर्ग के नायक और किसके खलनायक

Posted By: admin on April 19, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Dr-Bhim-Rao-Ambedkarडाॅ0 भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जा रहा है। लगभग सर्वसम्मति बनी हुई है और कहीं कोई समीक्षा या आलोचना के स्वर नहीं सुनाई दे रहे।प्रश्न उठता है कि अम्बेडकर जी किस वर्ग के नायक के रुप में माने जा सकते है, और किस वर्ग के खलनायक के रुप में?
भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न वर्ग होते हैं। प्रवृत्ति के आधार पर दो वर्ग होते है-1. दैवीय प्रवृत्ति वाले 2. आसुरी प्रवृत्ति वाले। धर्म के आधार पर भी दो वर्ग होते है – 1. गुण प्रधान 2. पहचान प्रधान। सामाजिक कार्यो में संलग्न लोगों में भी दो वर्ग होते है- 1. संस्थागत कार्य करने वाले 2. संगठनात्मक स्वरुप वाले। आर्थिक आधार पर भी दो वर्ग होते है- 1. बुद्धिप्रधान 2. श्रम प्रधान। राजनैतिक आधार पर भी दो वर्ग होते है- 1. संचालक या शासक 2. शासित या संचालित। चूॅकि अम्बेडकर जी जीवन भर राजनीतिज्ञ के रुप में कार्य करते रहे इसलिए हम अन्य वर्गो के आधार पर उनकी समीक्षा न करके राजनैतिक वर्ग विश्लेषण तक सीमित रहेंगे।
राजनीति में दो वर्ग होते है-1 शासक और 2 शासित। तानाशाही में शासक व्यक्ति होता है और मालिक के रुप में होता है। जबकि लोकस्वराज्य में शासक प्रतिनिधि होता है और प्रबंधक होता है, मैंनेजर होता है। जहाॅ लोकतंत्र होता है वहाॅ और विशेष कर भारतीय लोकतंत्र में शासक शासितों द्वारा चुने हुए व्यक्तियो का गुट होता है। यह गुट संरक्षक की भूमिका में होता है जबकि समाज इस गुट के अन्तर्गत संरक्षित होता है। शासक समाज को अयोग्य,नाबालिग मानकर अप्रत्यक्ष रुप से अपनी मालिक की भूमिका बनाता है। स्वतंत्रता के पूर्व भीमराव अम्बेडकर शासन की राजनीति करने वालों में सबसे प्रमुख व्यक्ति थे। भीमराव अम्बेडकर मे शासक के सारे गुण मौजूद थे। विलक्षण प्रतिभा थी,धूर्तता के चरण तक की कूटनीति थी तथा परिश्रम के मामले में भी अन्य सबसे आगे थे। स्वतंत्रता के पूर्व शीर्ष पर जो दो विचारधाराएॅ थी, उनमें एक का नेतृत्व गाॅधी के हाथ में था तो दूसरी का भीमराव अम्बेडकर के हाथ में। अन्य सब लोग तो बीच में इधर उधर होते रहते थे।
सफल राजनेता के आवश्यक गुणों में यह माना जाता है कि वह समाज को हमेशा विभिन्न वर्गो में बांटकर रखे,तथा उन्हें कभी एकजुट न होने दें। यहाॅ तक कि सफलता के चर्मोत्कर्ष के लिए परिवार तक को बांटकर रखना आवश्यक माना जाता है। साथ ही लोकतंत्र में शासितों को धोखा देने के लिए अनेक प्रकार के नाटक भी करने पडते है। अम्बेडकर जी धोखा देने और नाटक करने में सिद्धहस्थ रहे। भीमराव अम्बेडकर जी ने प्रांरभ से ही अपने वर्ग की प्रसन्नता और सुविधा के लिए वह सब कुछ किया जो समाज को लम्बे समय तक गुलाम बनाकर रखने के लिए किसी नेता को करना चाहिए। यहाॅ तक कि उन्होने अपने वर्ग की सुविधा के लिए गाॅधी तक का विरोध किया। राजनैतिक वर्ग के मार्ग में गाॅधी सबसे बडी बाधा थे। स्वतंत्रता मिलते ही राजनेताओं के लिए गाॅधी एक बोझ बन गये थे। वह बोझ हटते ही राजनेताओं के वर्ग को पूरी छूट मिल गई और उस छूट का लाभ उठाकर भीमराव अम्बेडकर जी ने अपने वर्ग के लिए स्वतंत्रता पूर्वक सब कुछ करते हुए ऐसा मार्ग बना दिया कि वह वर्ग कई पीढि़यों तक उसका लाभ उठा सकता है।
माना जाता है कि वर्तमान संविधान भीमराव अम्बेडकर जी के द्वारा ही बनाया हुआ है। इस संविधान में वह सब कुछ है तो राजनेताओं द्वारा समाज को अनंत काल तक गुलाम बनाकर रखने के लिए होना चाहिए।समाज को समझाया जाता है कि संविधान तो भगवान का स्वरुप है। साथ ही संविधान में किसी भी प्रकार के फेरबदल का अंतिम अधिकार भी राजनेताओं ने अपने पास ही सुरक्षित रखा है। जो संविधान आज भारत में है, या धीरे धीरे उसको राजनेताओं ने फेरबदल करके जैसा बना दिया है, उसके अनुसार तो तंत्र पूरी तरह मालिक और लोक गुलाम से अधिक कोई हैसियत नहीं रखता। वोट देने के अतिरिक्त लोक के पास ऐसा कौन सा अधिकार है जिसमें तंत्र हस्तक्षेप न कर सके। हमारे अधिकार क्या हो यह तंत्र तय करेगा किन्तु उनके अपने अधिकार क्या हो यह वे स्वयं तय करेंगे। हमारा वेतन क्या हो यह वे तय करेंगे किन्तु उनका वेतन क्या हो यह भी वे ही तय कर लेंगे। वे हमसे कितना टैक्स वसूल सकते है इसकी कोई सीमा नहीं है दूसरी ओर वे अपनी सुविधाएॅ कितनी बढा सकते है इसकी भी कोई सीमा नहीं है। स्पष्ट है कि वे संवैधानिक रुप से हमारे भाग्य विधाता है और हम उनके गुलाम प्रजा। संविधान ने परिवार व्यवस्था, गाॅव व्यवस्था, को तो अपने मे से बाहर कर दिया। दूसरी ओर समाज तोडक जाति,धर्म,भाषा आदि को अपने अंदर समेट लिया। यह सारी योजना भीमराव अम्बेडकर जैसे चालाक मस्तिष्क की ही उपज थी, अन्यथा अन्य किसी के बस की बात नहीं थी। भीमराव अम्बेडकर जी प्रारंभ से ही महिला और पुरुष को दो वर्गो में विभाजित देखना चाहते थे और जीवन भर तथा मृत्यु तक उन्होने इस दिशा में सक्रियता दिखाई। हिन्दू कोड बिल भीमराव अम्बेडकर की एक ऐसी पहचान बन चुका है जो भारत के हिन्दुओं की छाती में तीर के समान लगातार घाव कर रहा है। भीमराव अम्बेडकर जी बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधित्व करते थे और इसलिए उन्होने जीवन भर श्रम के साथ भी धोखा किया। श्रम और बुद्धि के बीच इतना बडा फर्क अम्बेडकर जी की ही देन है। भाषा के मामले में भी भीमराव अम्बेडकर जी अंग्रेजी प्रिय थे। यहाॅ तक कि जब हिन्दी पर ज्यादा जोर दिया गया तो भीमराव अम्बेडकर जी ने संस्कृत की आवाज उठा कर हिन्दी भाषियों में फूट डालने का काम किया। इतनी चालाकी तो कोई शातिर दिमाग व्यक्ति ही कर सकता है।
कहाॅ जाता है कि भीमराव अम्बेडकर जी और नेहरु में नहीं पटती थी। मैं स्पष्ट कर दॅू कि भीमराव अम्बेडकर जी प्रधानमंत्री बनने की प्रतिद्वंदिता में नेहरु और जिन्ना के खिलाफ थे। किन्तु समाज को गुलाम बनाकर और समाज को आपस में तोडफोड कर रखने में तीनों एक साथ रहे । मैंने तो यहाॅ तक सुना है कि प्रारंभ में भीमराव अम्बेडकर जी राजनैतिक नेतृत्व के लिए मुसलमान भी बनना चाहते थे। किन्तु जब वे नहीं बन सके और मुस्लिम नेतृत्व जिन्ना ने ले लिया तब भीमराव अम्बेडकर जी ने पिछडों का नेतृत्व करना शुरु किया। यहाॅ तक कि पहला चुनाव भीमराव अम्बेडकर जी ने मुस्लिम लीग की सहायता से ही लडा था। बाद में वे कांग्रेस से चुनाव लडे और बाद में कांग्रेस के विरुद्ध भी चुनाव लडे और अंत में फिर बौद्ध भी बने। उन्होने सारे नाटक किये किन्तु प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा अंत तक अधूरी ही रह गई। वे महिलाओं के प्रमुख पक्ष धर माने जाते है किन्तु उनका अपनी पत्नि के साथ व्यवहार शोध का विषय है।
यह सही है कि भीमराव अम्बेडकर जी में विलक्षण प्रतिभा थी। परिस्थितियों को अपने पक्ष में करना वे अच्छी तरह जानते थे। उनके पिता राज कार्य में किसी पद पर थे। भीमराव अम्बेडकर जी में प्रारंभ से ही प्रतिभा थी। अब यह प्रतिभा उनके जन्म पूर्व के संस्कारों से आयी या पूर्व जन्म की संचित प्रतिभा थी या राज परिवार के संस्कारों से प्राप्त वातावरण की थी यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं। किन्तु उनमें प्रतिभा थी और उस प्रतिभा को तत्कालीन राज परिवार का अंध समर्थन मिला। यह बात सच है कि उन्होने इन सब परिस्थितियो का पूरा पूरा लाभ उठाया। सवर्ण ब्राहमण ने उन्हे पढाया, सवर्ण राजा ने उनकी सब प्रकार से सहायता की सवर्ण पत्नि ने जीवन भर उनका साथ दिया और भीमराव अम्बेडकर जी ने भी सवर्णो के हित में वह सब किया जो उन्हे नहीं करना चाहिए था। स्पष्ट दिख रहा था कि स्वतंत्रता के बाद सवर्ण और अवर्ण के बीच वह भेदभाव पूर्ण स्थिति नहीं रह सकती जो स्वतंत्रता के पूर्व थी। भीमराव अम्बेडकर जी ने बहुत चतुराई से मुट्ठी भर अवर्ण बुद्धिजीवियों को बहुसंख्यक सवर्ण बुद्धिजीवियों से समझौता करा दिया और उसका परिणाम हुआ कि 67 वर्षो बाद भी सवर्ण बहुमत सब प्रकार के लाभ उठा रहे है और अवर्ण बहुमत आज भी मट्टी खोदने से आगे बढने की स्थिति में नही है।
हम देख रहे है कि आज पूरे हिन्दुस्तान के सभी राजनेता, सभी धर्मगुरु चाहे सवर्ण हो या अवर्ण तथा सभी बुद्धिजीवी चाहे छोटे पद पर हो या बडे पद पर, एक स्वर से भीमराव अम्बेडकर जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे है कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए सभी राजनेताओं तथा बुद्धिजीवियों में एक होड सी मची है कि कौन इस मामले में आगे निकल पाता है। चाहे मोदी हो या सोनिया राहुल, चाहे कम्युनिष्ट हो या नीतिश अरविंद , चाहे संघ प्रमुख हों या आजम खान हो, सभी एक स्वर से प्रशंसा में लगे है। मेरे विचार से उन्हे लगना भी चाहिए। क्योकि समाज को गुलाम बनाकर पीढियों तक रखने का जो मार्ग भीमराव अम्बेडकर जी ने दिया और जिस पर चलकर आज भी ये लोग अपने को स्थापित किये है उस मार्ग दृष्टा को सम्मानित न करना तो कृतघ्नता ही मानी जाएगी। सभी संविधान की दुहाई दे रहे है क्योकि संविधान ही तो वह दस्तावेज है जो समाज को गुलाम बनाकर रखने में तंत्र की ढाल बना हुआ है।
विचारणीय है कि आज समाज का प्रतिनिधत्व करने वाला कोई गाॅधी दिख नहीं रहा और ऐसे प्रतिनिधित्व के अभाव में राजनेता मैदान में एक तरफा गोल मारे जा रहे है। यह अलग बात है कि इस एक तरफा गोल करने में उनके आपसी हित भी टकराते हो किन्तु कोई और गाॅधी पैदा न हो जाये जो समाज को सशक्त करने का मार्ग प्रस्तुत कर दे , इस मामले में तंत्र से जुडे सब लोग एकजुट है। भीमराव अम्बेडकर जयन्ती के बहाने ये सब लोग मिलकर अम्बेडकर जी को अपना नायक सिद्ध करने का पूरा प्रयास कर रहे है। मुझे विश्वाश है कि भविष्य में परिस्थितियाॅ बदलेंगी और जब दूसरा पक्ष मालिक की भूमिका में आयेगा तब शायद भीमराव अम्बेडकर जी एक खलनायक के रुप में स्थापित हो सकेंगे।

केरल मंदिर दुर्घटना और राजनेताओं का नाटक

Posted By: admin on April 13, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

108922-kerala-ttraedyएक सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार सुरक्षा और न्याय राज्य का दायित्व होता है तथा अन्य जनकल्याण के कार्य उसका कर्तव्य। सुरक्षा और न्याय तंत्र के लिए बाध्यकारी होता है जबकि जनकल्याणकारी कार्य उसके स्वैच्छिक कर्तव्य। पश्चिम के देशो में सुरक्षा और न्याय की आवश्यकता सीमा के अंदर थी इसलिए उन देशो ने जनकल्याणकारी कार्यो को आंशिक रुप से अपने दायित्वों के साथ जोड़ लिया। किन्तु इसके ठीक विपरीत दक्षिण एशिया के देशो में, जिनमें भारत भी शामिल है, सुरक्षा और न्याय खतरनाक स्थिति तक संकट में पडा हुआ है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा और न्याय राज्य का एकमात्र या पहला दायित्व होना चाहिए था। किन्तु भारत सरकार ने पता नही क्यों पश्चिम की नकल करते हुए सुरक्षा और न्याय की अपेक्षा जनकल्याणकारी कार्यों को अपने दायित्वों में शामिल कर लिया। मैं नहीं कह सकता कि यह कार्य जानबूझकर किया गया या भूलवष,किन्तु किया गया अवश्य ।
केरल के एक शहर के मंदिर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के अंतर्गत हो रही आतिशबाजी से आग लग गई। भयंकर दुर्घटना के अतर्गत 110 के करीब लोग झुलसकर मर गये, तथा 3-4 सौ घायल स्थिति में कराह रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी मनुष्य का दिल पसीजना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और यदि ऐसा न हो तो उसे पत्थर दिल या निर्दयी व्यक्ति ही माना जायेगा। यहाॅ तक कि दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों ने भी इस भयानक दुर्घटना के प्रति अपना शोक व्यक्त किया है। मैं भी ऐसी दुर्घटना से द्रवित हुए बिना नहीं रह सका। जिनके परिवारों के लोग मरे है या घायल हैं, उनकी करुण स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है।
इन सब के बाद भी राज्य रुपी संवैधानिक इकाई इतनी स्वतंत्र नहीं है जो अपनी प्राथमिकताएॅ व्यक्तिगत भावनाओं के आधार पर बदल सके। भारत में राज्य एक व्यवस्था है न कि व्यक्ति समूह का शासन। हत्या और मृत्यु में आसमान जमीन का फर्क होता है। हत्या एक अपराध है। इसका अर्थ हुआ कि हत्याओं को रोकना राज्य का दायित्व है किन्तु मृत्यु चाहे किसी भी कारण से हो, कितनी भी वीभत्स हो, वह दुर्घटना हो सकती है किन्तु अपराध नहीं। इसका अर्थ हुआ कि इसमें सहायता करना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य मात्र हो सकता है, दायित्व नहीं। यदि राज्य हत्या और दुर्घटनामृत्यु के बीच दुर्घटना को ज्यादा महत्व देता है तो कहीं न कहीं राज्य अपने दायित्व से पीछे हट रहा है अर्थात् राज्य गलत कर रहा है।
मैंने पिछले 2-3 दिनों में देखा कि केरल मंदिर की दुर्घटना में राजनेताओं के बीच नाटक करने की होड़ मची हुई है। ऐसी प्रतिस्पर्धा जैसी किसी हत्या के मामले में कभी नहीं दिखती। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राहुल गाॅधी, ए के एन्टनी आदि नेता तत्काल घटना स्थल पर पहॅुच गये। घटना स्थल पर पहुचने में घायलों की सहायता का उद्देश्य न के बराबर था और सहानुभूति या सहायता करने का नाटक करना मुख्य। ऐसा लगा कि जैसे हत्या से प्रभावित व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति होता है तथा दुर्घटना से प्रभावित व्यक्ति मतदाता होता है। इसका अर्थ हुआ कि मतदाताओं की संख्या जहाॅ अधिक होगी तथा उस घटना के समय किये गये नाटक का प्रभाव अन्य मतदाताओं पर जितना अधिक होगा नेता उसी को अधिक महत्व देगा, उसी को अधिक सहायता भी देगा जबकि हत्या या अपराध के मामले में सहायता या सहानुभूति सिर्फ औपचारिक या मामूली होगी। हमारे छ0ग0 में राज्य संरक्षित हाथियों या बाघों ने कई लोगों की हत्या कर दी। यदि दस लोग ऐसी हत्या के शिकार हुये तो उन्हें आर्थिक सहायता में कुल मिलाकर 20-25 लाख रुपये प्राप्त हुये। मैं देखता हॅू कि यदि डकैत या अपराधी दस निर्दोष लोगो की आपराधिक हत्या कर दे तो उन्हें बडी मुश्किल से 20-25 लाख रुपया मुवाजा मिलेगा। ऐसे लोगों के आंसू पोंछने कोई विधायक या पटवारी भी नहीं जायेगा क्योकि यह तो केवल पुलिस का रुटिन वर्क है। किन्तु यदि दस लोग किसी दुर्घटना में या गाडी एक्सीडेंट में सामूहिक रुप से मर जायें तो प्रशासन के मुख्यमंत्री तक उसके परिवार में आंसू पोंछने अवश्य आयेंगे और उन्हें दस लोगों की आर्थिक सहायता के रुप में एक करोड़ रुपया भी दे सकते है। स्पष्ट है कि हत्या और मृत्यु में बहुत अंतर है। किन्तु हमारे देश के नेता इस अंतर को जब चाहे तब विपरीत रुप से परिभाषित कर सकते है। मुख्य रुप से ऐसा तब होता है जब मीडिया ऐसी दुर्घटना को बढा चढाकर हाथ में ले ले।
मैंने 2-3 दिनों में हर चैनल के मीडिया कर्मी को अनेक प्रकार के प्रश्न पूछते देखा। अनेक ने तो इस घटना को हत्या तक प्रचारित करने का प्रयास किया। हो सकता है यही चैनल इसे नरसंहार भी कहना शुरु कर दे। चैनल वाले प्रश्न बहुत कर रहे है किन्तु इस बात का उत्तर नहीं दे रहे कि घटना के ठीक पूर्व उनके प्रतिनिधि इस विषय में क्या कर रहे थे। ऐसी घटनाएॅ पहले भी घट चुकी है और राज्य शासन ने इससे कोई सबक नहीं लिया। यह सच है किन्तु यह भी सच है कि उस मंदिर में इस दुर्घटना के पहले भी प्रतिवर्ष इसी तरह का खतरनाक आयोजन होता रहा है, जिसको रोकने में मीडिया ने कभी कोई पहल नहीं की। मैं मानता हॅू कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी मामले में दया करने का व्यक्तिगत रुप से पूरा अधिकार है किन्तु किसी भी व्यक्ति को किसी संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से किसी भी रुप में किसी के साथ विशेष दया करने का अधिकार नहीं है। मैंने देखा कि मोदी जी अथवा राहुल गाॅधी इस प्रकार का चेहरा बनाये हुए थे जैसे कि वे बस रोने ही वाले है। किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि हमारे देश के ये नेता रोज ही किसी न किसी मामले में ऐसा चेहरा बनाये रहते है।
राजनैतिक व्यवस्था से जुडी हर इकाई अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए ऐसी दुर्घटना के मामलों में तत्काल कठोर कार्यवाही करना शुरु कर देती है। मीडिया भी तत्काल प्रश्नों की झडी लगा देता है। प्रशासनिक अफसर भी तुरंत ही अनेक तरह के नोटिस मंदिर प्रशासन को थमा चुके है। तुरन्त ही सरकार ने भी अनेक तरह की जाॅचों का आदेश दे दिया है। ऐसा लगा जैसे इस दुर्घटना के बाद ऐसी दुर्घटनाओं का द्वार बंद ही हो जायेगा। किन्तु मैं आश्वस्त हॅू कि भविष्य में भी ऐसी कार्यवाही से दुघटनाओं की बाढ़ रुकेगी नहीं। क्योंकि ऐसी दुर्घटनाएॅ रोकने का यह कोई उचित मार्ग नहीं है। इसका उचित मार्ग तो यह होता कि वहाॅ इक्ट्ठे होने वाले नागरिक स्वयं ऐसे खतरों के प्रति सतर्क रहते और इसके बाद भी कोई वहाॅ जाता है तो वहाॅ जाने वाले की भी उतनी ही बडी गलती है जितनी आयोजक की और सरकार की। जाने वाले को परिवार ने नहीं रोका, स्थानीय समाज ने नहीं रोका, क्योंकि सरकार ने ऐसी घटनाओं को रोकने का सारा दायित्व अपने उपर ले लिया है और लोग निश्चित है कि सरकार की चुस्त दुरुस्त व्यवस्था के अंतर्गत दुर्घटना होना संभंव ही नही है। अर्थात् जब कलेक्टर की अनुमति के बिना वहाॅ बारुद इक्ट्ठा ही नहीं होगा तो दुर्घटना होगी कैसे। सरकार की कार्यवाही कितनी लुंजपुंज है यह सरकार भी जानती है फिर भी ऐसे मामलों का दायित्व अपने उपर ले लेती है और इसके बाद भी दुर्घटना होने पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की अपेक्षा आयोजकों को दण्डित करके अपने को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयास करती हैं।
मैं स्पष्ट कर दॅू कि यदि 10 लोगों की हत्याएॅ होती है और 100 लोगों की मृत्यु होती है तो समाज के लिए 100 लोगों की मृत्यु अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु प्रशासन के लिए 10 लोगों की हत्या। 100 लोगों की मृत्यु की अपेक्षा 10 लोगो की हत्या अधिक महत्वपूर्ण है। क्योकि हत्याएॅ रोकना राज्य का दायित्व है तथा मृत्यु रोकना स्वैच्छिक कर्तव्य। राज्य सत्ता से जुडे लोग इस प्रकार का नाटक करके खजाना लुटाकर या नोटिस थमा कर यदि अपने दायित्व से भागने का प्रयास करते है तो यह अच्छी बात नहीं है। मैं चाहता हॅू कि इस विषय पर समाज में एक सार्थक विचार मंथन होना चाहिए।

Posted By: admin on April 8, 2016 in Uncategorized - Comments: Comments Off

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Posted By: admin on April 7, 2016 in Uncategorized - Comments: Comments Off

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