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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मंथन क्यों? बजरंग मुनि

Posted By: admin on October 31, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भावना और बुद्धि का संतुलन आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये भी यह संतुलन आवश्यक है तथा समाज के लिये भी। भावना त्याग प्रधान होती है तो बुद्धि ज्ञान प्रधान। भावना की अधिकता मूर्खता की दिशा मे ले जाती है तो बुद्धि की अधिकता धूर्तता की ओर। भावना की अधिकता असफलता की ओर ले जाती है तो बुद्धि की अधिकता सफलता की ओर। वर्तमान समय मे यह संतुलन गडबड हो गया है । भावना प्रधान व्यक्तियों की संख्या बढती जा रही है जिसका दुरूपयोग मुठठी भर धूर्त कर रहे हैं । भारत मे तो यह असंतुलन बहुत ही अधिक हो गया है । पुराने जमाने मे भारत विचारो का निर्यात करता था। दुर्भाग्य है कि आज भारत पष्चिम के विचारो की नकल करने को वाध्य है । भारत मे भी हर धूर्त प्रयत्न शील है कि आम लोगो मे भावनाएं बढती रहें जिससे धूर्तो की दुकानदारी चलती रहे । परिस्थिति चिन्ताजनक है।
बाबा रामदेव ने योग के माध्यम से दुनिया को शारीरिक व्यायाम की प्रेरणा दी । स्पष्ट है कि बाबा रामदेव के प्रयत्नो ने स्वास्थ की दिशा मे पर्याप्त सुधार किया है। दुनिया धीरे धीरे योग का आयात कर रही है। किन्तु पूरे विश्व मे वर्तमान समय मे बौद्धिक व्यायाम का कोई व्यवस्थित प्रयास नही हो रहा । भावनात्मक विकास की दुकाने तो आपको भारत मे भी गली गली मे खुली मिल जायेगी किन्तु बौद्धिक व्यायाम के लिये आपके पास कोई विकल्प नही है जबकि बौद्धिक व्यायाम के अभाव मे आमलोग इसी तरह ठगे जाते रहेगे जैसे आज।
मैने स्वयं करीब साठ वर्ष पूर्व सन पचपन मे मंथन नाम से बौद्धिक व्यायाम शुरू किया था। साठ वर्षो के प्रयत्नो से प्राप्त परिणामो से मै पूरी तरह संतुष्ट हॅू। मै यह दावा करने की स्थिति मे हॅू कि मै अपने जीवन मे सामान्यतया कभी आसानी से ठगा नही गया। मेरे परिवार के सदस्यों तथा निकट के मित्रो पर भी ऐसे बौद्धिक व्यायाम का आंषिक परिणाम देखा जा सकता है। मुझे महसूस होता है कि बौद्धिक व्यायाम प्रणाली का विस्तार भी समाज के लिये उतना ही लाभदायक है जितना बाबा रामदेव का शारीरिक व्यायाम। मै अपने सीमित संसाधनो द्वारा ज्ञानतत्व पाक्षिक के माध्यम से इस व्यायाम को विस्तार देने मे सक्रिय रहा। किन्तु अब जिस तरह आधुनिक संचार माध्यमों ने सुविधा प्रदान की है, उस आधार पर मै समझता हॅू कि सोशल मीडिया का लाभ उठाकर बौद्धिक व्यायाम की गति इतनी बढाई जा सकती है कि हम इस व्यायाम की पद्धति का भारत से भी आगे निर्यात कर सके। मै सन पचपन मे आर्य समाज से जुडा । मैने देखा कि आर्य समाज भी धीरे धीरे विचार मंथन की दिशा छोडकर विचार प्रचार की दिषा मे बढ रहा है जो अप्रत्यक्ष रूप से भावनाओं का ही विस्तार है। मै आर्य समाज के उपेक्षित स्वरूप ‘‘विचार मंथन‘‘ की दिशा मे बढा। प्रत्येक माह की तीस तारीख को अपने शहर के प्रबुद्ध लोगो की एक खुली बैठक होती थी । इस बैठक का एक पूर्व निश्चित विषय होता था तथा उस विषय पर सब लोग स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचार रखते थे। प्रयत्न किया जाता था कि विपरीत विचारो के लोग उस मंच पर आकर विपरीत विचार प्रस्तुत करें। गलत बात बोलने की सबको स्वतंत्रता थी किन्तु भाषा गलत नही होनी चाहिये। मंथन का प्रारंभ किसी आधे घंटे के धार्मिक आयोजन से होता था जिसमे आमतौर पर तो यज्ञ होता था किन्तु किसी मुसलमान या अन्य धर्मावलम्बी के घर मे कार्यक्रम हुआ तो कुरान पाठ या अन्य धार्मिक रूप भी होता था। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह था कि उस कार्यक्रम मे कोई निष्कर्ष निकालने पर पूरी तरह रोक थी। कोई प्रस्ताव पारित नही हो सकता था न ही प्रस्ताव पर चर्चा संभव थी। श्र्रोता अलग अलग विचार सुनकर स्वतंत्र धारणा बना सकते थे । विषय सब तरह के होते थे, किसी एक तरह के नही। मै स्वयं बाद मे जनसंध से जुड गया किन्तु यह मंथन कार्यक्रम धर्म जाति राजनीति अमीर गरीब महिला पुरूष का कोई भेद नही करता था। कांग्रेसी जनसंघी साम्यवादी हिन्दू मुसलमान बडे अफसर व्यापारी मजदूर यहां तक हिंसक प्रवृत्ति के नक्सलवादी भी वहां स्वतंत्रता पूर्वक आते थे तथा अपना विचार रखते थे । इस तरह यह कार्यक्रम निरंतर चलता रहा। आज भी मेरे न रहने के बाद भी यह कार्यक्रम चल रहा है।
नोट- कल का विषय होगा- आप बौद्धिक व्यायाम कैसे कर सकते है? आप इसमे मेरी क्या सहायता कर सकते है ? मै आपकी क्या सहायता कर सकता हॅू। सोशल मीडिया का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है । इसी तरह पुूरी योजना पर कल परसो तक व्यापक विचार मंथन आपको जाता रहेगा । आप अपनी प्रतिक्रिया सुझाव प्रश्न भेज सकते है।

मंथन क्रमांक-5 परिवार व्यवस्था

Posted By: admin on October 30, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »

Family-1
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं-

(1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक। परिवार एक से अधिक व्यक्तियों को मिलाकर बनता है। इसलिए परिवार को संगठनात्मक अथवा संस्थागत इकाई माना जा सकता है,प्राकृतिक नहीं।
(2) प्रत्येक व्यक्ति को एक प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होता है,और वह है उसकी स्वतंत्रता।
(3) प्रत्येक व्यक्ति का एक सामाजिक दायित्व होता है और वह होता है उसका सहजीवन।
(4) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है, उस सीमा तक जब तक किसी अन्य व्यक्ति की सीमा प्रारंभ न हो जाये।
(5) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा राज्य का दायित्व होता है तथा व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग देना समाज का दायित्व होता है।
(6) परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था की एक पहली इकाई होती है, जो अपनी सीमा में स्वतंत्र होते हुए भी उपर की इकाईयों की पूरक होती है।

उपरोक्त धारणाओं के आधार पर हम कह सकते है कि परिवार व्यवस्था सहजीवन की पहली पाठशाला है और प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था के साथ अवश्य ही जुडना चाहिए। किन्तु पिछले कुछ सौ वर्षो से हम देख रहे है कि परिवार व्यवस्था टूट रही है। किसी भी व्यवस्था में यदि रुढिवाद आता है तो उसके दुष्परिणाम भी स्वाभाविक है । भारत की परिवार व्यवस्था कई हजार वर्षो से अनेक समस्याओं के बाद भी सफलतापूर्वक चल रही है। यहाॅ तक कि लम्बी गुलामी के बाद भी चलती रही। इसके लिए वह बधाई की पात्र है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद परिवार व्यवस्था में विकृतियों का लाभ उठाने के लिए अनेक समूह सक्रिय रहे। इन समूहों में धर्मगुरु, राजनेता, पश्चिमी संस्कृति तथा वामपंथी विचार धारा विशेष रुप से सक्रिय रहे। परम्परागत परिवारों के बुजुर्ग भी किसी तरह के सुधार के विरुद्ध रहे। परिणाम हुआ कि परिवारांे में आंतरिक घुटन बढती रही और परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वालो को इसका लाभ मिला।

वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था के पक्ष और विपक्ष में दो विपरीत धारणाएॅ सक्रिय है-
(1) रुढिवादी धारणा जो परिवार व्यवस्था को एक प्राकृतिक इकाई मानती है तथा उसमें किसी तरह के संशोधन के विरुद्ध है।
(2) आधुनिक धारणा जो किसी न किसी तरह इस व्यवस्था को नुकसान पहुचाने के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु उसके पास परिवार व्यवस्था का कोई नया विकल्प या सुझाव नहीं है। रुढिवाद का यह परिणाम स्वाभाविक होता हैं, यदि उसमें देशकाल परिस्थिति के अनुसार संशोधन न किया जाये। संशोधन का अभाव ही अव्यवस्था का कारण बनता है और यही परिवार व्यवस्था के साथ भी हो रहा है।
मैं जिन मुददो पर गंभीरतापूर्वक सोचता हॅू किन्तु साथ ही यह भी महसूस करता हॅू कि मेरी सोच वर्तमान प्रचलित धारणाओं के विपरीत है उन्हें समाज के बीच प्रस्तुत करने के पूर्व मैें लम्बा प्रयोग भी अवश्य करता हॅू। मैं बचपन से ही महसूस करता था कि परिवार व्यवस्था बहुत अच्छी व्यवस्था है किन्तु उसमें विकृति आ गई है और उसे टूटने से बचाने के लिए कुछ सुधार करने होंगे। मैंने ऐसे सुधार के लिए करीब 50 वर्ष पूर्व ही अपने परिवार को चुना। उस समय मेरे परिवार में कुल 10 सदस्य थे और हम सबने बैठकर चार महत्वपूर्ण निर्णय लिये-
(1) परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर दसो सदस्यों का सामूहिक अधिकार होगा, जो उसके अलग होते समय ही उसे समान रुप से प्राप्त हो सकेगा।
(2) परिवार का प्रत्येक सदस्य सामूहिक अनुशासन में रहने के लिए बाध्य होगा।
(3) परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड सकता है अथवा कभी भी बिना कारण बताये परिवार से हटाया जा सकता है।
(4) परिवार में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर हमारे कुटुम्ब प्रमुख के समक्ष अपील हो सकती है जिनका निर्णय सबके लिए बाध्यकारी होगा।
हमारे परिवार में 50 वर्षो से लगातार संख्या घटती बढती रही। अब हमारा एक परिवार विभाजित होकर तीन परिवार बन गये है तथा हमारे कुटुम्ब में कुल 6 परिवार है। हमारे पूरे परिवार में उपरोक्त व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यहाॅ तक कि कुटुम्ब अर्थात 6 परिवारों के पूरे 50 सदस्य हर चार महिने में कहीं एक साथ बैठकर विचार मंथन किया करते है। यह प्रक्रिया भी 50 वर्षो से निरंतर चल रही है। परिवार की आंतरिक बैठक तो समय समय पर होती ही रहती है। हमारे कुटुम्ब का प्रमुख भी सभी सदस्य मिलकर ही चुनते है। वर्तमान में हमारे कुटुम्ब के प्रमुख हमारे सबसे छोटे भाई है जबकि तीन बडे भाई अभी भी सक्रिय है। कुछ महिने पूर्व हमारे परिवार ने यह महसूस किया कि अब इस प्रणाली को सार्वजनिक तथा कानूनी स्वरुप दिया जाये । हम लोगो ने परिवार का एक सार्वजनिक और कानूनी स्वरुप इस प्रकार बनाया -
समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.)
यह समझौता ज्ञापन आज दिनांक 23.10.2016 को नीचे लिखे तेरह सदस्यों की आपसी सहमति से तैयार तथा कार्यान्वित हो रहा है। सबने आपसी सहमति से स्वयं को भौतिक तथा कानूनी रुप से ज्ञापन में लिखे नियमों से एक सूत्र मंे बांधा है।
नियम-
(1)समूह का नाम कांवटिया परिवार क्रमांक एक होगा।
(2)परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार के सभी सदस्यों की चल, अचल, नगद, ज्वेलरी, बान्ड, लेनदारी, देनदारी या अन्य किसी भी प्रकार की वर्तमान तथा भविष्य में अर्जित सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार होगा। अर्थात् वर्तमान में प्रत्येक सदस्य का हिस्सा तब तक तेरहवा हिस्सा होगा जब तक सदस्य संख्या कम या अधिक न हो।
(3)परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने व्यापार, आय, व्यय, संग्रह, कर्ज, अलग रखने के लिये उस सीमा तक स्वतंत्र होगा जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(4)परिवार का कोई भी सदस्य पूरी तरह परिवार के अनुशासन से बंधा होगा। उसकी राजनैतिक ,धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधि उस सीमा तक ही स्वतंत्र होगी जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(5)परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड़ सकता है अथवा परिवार द्वारा परिवार से हटाया जा सकता है किन्तु हटने वाला सदस्य परिवार से हटते समय की सम्पूर्ण सम्पत्ति में से सदस्य संख्या के आधार पर अपना हिस्सा ले सकता है।
(6) परिवार में रहते हुये परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर प्रत्येक सदस्य का सामूहिक अधिकार होगा, व्यक्तिगत नहीं। कोई सदस्य किसी अन्य को भविष्य के लिये कोई विल, दानपत्र अथवा अधिकार पत्र या घोषणा नहीं कर सकेगा क्योंकि परिवार में रहते हुए उसकी किसी सम्पत्ति पर उसका परिवार की सहमति तक ही व्यक्तिगत अधिकार है।
(7) परिवार के किसी सदस्य का नवजात बालक तत्काल ही परिवार का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त सदस्य प्राकृतिक रुप से ही मान लिया जायेगा। तत्काल ही सम्पूर्ण सम्पत्ति में उसका बराबर हिस्सा हो जायगा। परिवार में रहते हुए किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो प्राकृतिक रुप से उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
(8)परिवार के बाहर के कोई भी व्यक्ति (स्त्री,पुरुष,या बालक,बालिका) परिवार की सहमति से परिवार के सदस्य बन सकते हैं। सदस्य बनते ही उन पर ज्ञापन की सभी कंडिकाओं के अधिकार और कर्तव्य लागू हो जायेंगे।
(9)परिवार का कोई बालक बारह वर्ष की उम्र तक ना बालिग माना जायगा। उम्र पूरी होते तक बालक के परिवार से निकलने अथवा निकालने की स्थिति में उस क्षेत्र की स्थानीय इकाई अर्थात् ग्राम सभा या नगरीय निकाय को सूचना दी जायगी। उसके हिस्से की सम्पत्ति भी उक्त स्थानीय निकाय की सहमति से बनाई गई व्यवस्था के अन्तर्गत ही स्थानान्तरित हो सकेगी।
(10) परिवार के सदस्य आपसी सहमति से परिवार के संचालन के लिये आंतरिक उपनियम बना सकेंगे तथा आवश्यकतानुसार उनमें फेर बदल भी कर सकेंगे। ऐसे सभी नियम या फेर बदल सभी सदस्यों के हस्ताक्षर से ही लागू होंगे।
(11) यदि परिवार का कोई सदस्य परिवार की सहमति के बिना कोई कर्ज लेता है, नुकसान करता है, सरकारी कानून का उल्लंघन करता है तो उक्त सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति तक ही सीमित होगी। परिवार के किसी अन्य सदस्य की सम्पत्ति उससे प्रभावित नही होगी। किन्तु परिवार मे रहते तक उस सदस्य का सामुहिक सम्पत्ति मे बराबर का हिस्सा बना रहेगा जो उसे परिवार छोडने की स्थिति मे प्राप्त हो सकता है।
(12 ) परिवार का कोई सदस्य परिवार के निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह उच्चसमिति के समक्ष अपनी बात रख सकता है। उच्चसमिति में तीन सदस्य होंगे-1. राजेन्द्र कुमार ,आत्मज-धुरामल जी, 2. कन्हैयालाल,आत्मज-धुरामल जी, 3. सुशील कुमार, आत्मज-राधेश्याम जी । उच्चसमिति का निर्णय अंतिम होगा।
(13) यदि इस ज्ञापन की कोई कन्डिका किसी कानून के विरुद्ध जाती है तो न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा। किसी तरह के विवाद की स्थिति में भी विवाद के समय प्रचलित कानून के नियमों के अनुसार लिये गये न्यायालयीन निर्णय मान्य होंगे।
(14) ज्ञापन की किसी कंडिका में कुछ जोड़ना,घटाना या सुधार करना हो तो उसी प्रक्रिया से हो सकता है जिस प्रक्रिया से यह समझौता ज्ञापन बना है।
इस कानूनी स्वरुप को हम लोगो ने नोटरी के द्वारा रजिस्टर्ड भी कराया जिससे कि भविष्य में कोई समस्या पैदा हो तो कानूनी समाधान निकल सके। मैं समझता हॅू कि उपरोक्त पारिवारिक ढाॅचा से अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। परिवारों में महिला अधिकार अथवा महिलाओं को सम्पत्ति और संचालन व्यवस्था में समानता के अधिकार की मांग अपने आप समाप्त हो जायेगी और मेरे विचार से ऐसा होना न्याय संगत भी है। परिवार में रहते हुये कोई कानूनी रुप से अपने को माता-पिता,पति-पत्नी जैसी अन्य कोई विशेष मान्यता नहीं रख सकेगा और न ही देश का कोई कानून परिवार के आंतरिक मामलो मे कोई हस्तक्षेप कर सकेगा। विवाह तलाक बालक बालिका आदि के झगडे या कोड बिल अपने आप समाप्त हो जायेगे। सारे संबंध पारिवारिक या सामाजिक तक ही सीमित होंगे। इस व्यवस्था में यह बात भी विशेष महत्व रखती है कि अब तक सारी दुनिया में प्रचारित व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार संशोधित हो जायेगा और परिवार की सम्पत्ति सभी सदस्यों की सामूहिक होगी,व्यक्तिगत नहीं। इस व्यवस्था से अनेक प्रकार के सम्पत्ति अथवा अन्य कानूनी मुकदमें समाप्त हो जायेंगे। मैं तो अपने अनुभव से तथा कल्पना के आधार पर यह घोषित करने की स्थिति में हॅॅू कि उपरोक्त पारिवारिक व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का आधार बन सकती है। मैं मानता हॅू कि अन्य परिवारों को परिस्थिति अनुसार उपरोक्त प्रारुप में कई जगह बदलाव भी करने पड सकते है और उन्हें करने चाहिए किन्तु मेरा एक सुझाव अवश्य है कि सम्पत्ति की समानता के अधिकार में कोई संशोधन करना उचित नहीं है।

यदि हम देश में तानाशाही की जगह लोकतंत्र को सफल होता हुआ देखना चाहते है तो हमें इसकी शुरुवात परिवार से करनी चाहिए। परिवार व्यवस्था में तानाशाही और राज्य व्यवस्था मे लोकतंत्र एक अव्यावहारिक कल्पना है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने कुछ ऐसी विचित्र कल्पना की कि उन्होने परिवार व्यवस्था में तो लोकतंत्र को शून्य हो जाने दिया और राज्य व्यवस्था में लोकतंत्र की बात करते रहे। परिणाम हुआ कि परिवार व्यवस्था लोकतंत्र के अभाव में टूटती रही और राज्य व्यवस्था निरंतर तानाशाही की तरफ अर्थात पारिवारिक केन्द्रीयकरण की तरफ बढती गई। मेरा सुझाव है कि देश के लोगों को संशोधित परिवार व्यवस्था पर विचार करना चाहिए और अपने-अपने परिवारों में लागू करना चाहिए।

मंथन क्रमांक- 4 की समीक्षा

Posted By: admin on October 26, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

आचार्य पंकज,वाराणसी,उ0प्र0
प्रश्न -मंथन क्रमांक 4 में विश्व की प्रमुख समस्याओं की विस्तृत चर्चा करते समय आपने आतंकवाद को शामिल नहीं किया,जबकि आतंकवाद भी एक बहुत बडी समस्या हंै। आप इस संबंध में स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः-आतंकवाद पूरे विश्व की सबसे बडी समस्या के रुप में दिखता है किन्तु आतंकवाद उपर लिखी नौ समस्याओं का परिणाम है,कारण नहीं। यदि कोई बीमारी किसी कारण विशेष से होती है तो बीमारी को तत्काल रोकना उस बीमारी का समाधान न होकर, एक अल्पकालिक प्रयास होता है। यदि आतंकवाद को रोक भी लिया गया तो उपरोक्त नौ समस्याएॅ नहीं सुलझ जायेगी। किन्तु यदि नौ समस्याओं का समाधान हो जाये तो आतंकवाद पैदा ही नहीं होगा या अपने आप समाप्त हो जायेगा। दूसरी बात यह भी है कि इन नौ समस्याओं का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पडता है। जबकि आतंकवाद का प्रभाव उस देश तक सीमित व्यक्तियों तक पडता है जो उस आतंकवाद की चपेट में रहते हैं। इसलिए मैंने आतंकवाद को प्रमुख समस्या न मानकर आतंकवाद सरीखी अनेक समस्याओं की जड को खोजने का प्रयास किया है। आप विचार करिये कि यदि-
(1) विचार प्रचार के स्थान पर विचार मंथन प्रभावी हो जाये ।
(2) लोक और तंत्र के बीच दूरी घट जाये तथा लोक नियुक्त तंत्र की जगह लोक नियंत्रित तंत्र हो जाये।
(3)राजनीति,धर्म और समाज सेवा का व्यापार बंद हो जाये।
(4)किसी व्यक्ति की योग्यता के आधार पर उसका टेस्ट लेकर उसे भौतिक पहचान देने की व्यवस्था हो।
(5) वर्ग विद्वेष, वर्ग समन्वय में बदल जाये।
(6)तंत्र सुरक्षा और न्याय को अपना दायित्व समझे तथा जनकल्याणकारी कार्यो में हस्तक्षेप बंद कर दे।
(7)लोक अपने को सुरक्षित महसूस करें तथा उसे कभी बल प्रयोग की आवश्यकता ही न पडे।
(8)व्यक्ति अपनी सीमायें समझे,और स्वार्थ भाव से मुक्त हो।
(9) धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो जाये।
यदि इन नौ दिशाओं में बढना शुरु कर दिया जाये तो आतंकवाद रहेगा ही नहीं और यदि कहीं पर रहेगा भी तो नियंत्रित हो जायेगा। मेरा तो यह भी मानना है कि यदि दुनिया की शासन व्यवस्था में एक विश्व सरकार बनने की भी पहल हो जाये तो आतंकवाद रुक सकता है।

मंथन क्रमांक- 4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान

Posted By: admin on October 23, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच की दूरी बहुत तेजी से बढ़ रही है किन्तु समुचे विश्व में भी दूरी बढती ही जा रही है, भले ही इसकी गति कम ही क्यों न हो। सारे विश्व में जितनी हत्याएॅ या अन्य अपराध अपराधियों के द्वारा हो रहे हंै,उससे कई गुना अधिक धर्म अथवा राज्य व्यवस्थाओं के आपसी टकराव से हो रहे हंै। मानवता की सुरक्षा के नाम पर जितनी सुरक्षा हो रही है उससे कई गुना ज्यादा मानवता का हनन हो रहा है। वैसे तो सम्पूर्ण विश्व में अनेक प्राकृतिक सामाजिक राजनैतिक समस्याएॅ व्याप्त हैं किन्तु उन सब में भी कुछ महत्वपूर्ण समस्याएॅ चिन्हित की गई हंै जिनके समाधान का कोई मार्ग खोजना आवश्यक है। मैं स्पष्ट कर दॅू कि पिछले कई दशकों से ये समस्याएॅ सम्पूर्ण विश्व में बढी ही है तथा लगातार बढती जा रही है-
(1)निष्कर्ष निकालने में विचार मंथन की जगह प्रचार का अधिक प्रभावकारी होना।
(2)संचालक और संचालित के बीच बढती दूरी ।
(3)राजनीति, धर्म और समाज सेवा का व्यवसायीकरण।
(4)भौतिक पहचान का संकट।
(5)समाज का टूटकर वर्गो में बदलना।
(6)राज्य द्वारा दायित्व और कर्तव्य की परिभाषाओं को विकृत करना।
(7)मानव स्वभाव तापवृद्धि।
(8) मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच बढती दूरी।
1)आज सम्पूर्ण विश्व मंे प्रचार करने की होड़ मची हुई है। अनेक असत्य सत्य के समान स्थापित हो गये है, तथा लगातार होते जा रहे है। भावनाओं का विस्तार किया जा रहा है तथा विचार मंथन को कमजोर या किनारे किया जा रहा है। विचार मंथन तथा विचारकों का अभाव हो गया है और प्रचार के माध्यम से तर्क को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। संसद तक मंे विचार मंथन का वातावरण नहीं दिखता। कभी कभी तो संसद में भी बल प्रयोग की स्थिति पैदा होने लगी है। इसके समाधान के लिए उचित होगा कि विचार, शक्ति, व्यवसाय और श्रम के आधार पर योग्यता रखने वालो को बचपन से ही अलग अलग प्रशिक्षण देने की व्यवस्था हो। प्रवृत्ति और क्षमता का अलग अलग टेस्ट हो। विधायिका, अनुसंधान आदि के क्षेत्र विचारको के लिए आरक्षित कर दिया जाये।
(2)सारी दुनिया मंे राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन बिगडता जा रहा है। समाज के आंतरिक मामलों में भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। परिवार, गाॅव की आतंरिक व्यवस्था में भी राज्य निरंतर हस्तक्षेप करने का अधिकार अपने पास समेट रहा है। लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित की जा रही है। संविधान तंत्र और लोक के बीच पुल का काम करता है किन्तु संविधान संशोधन में भी तंत्र निरंतर लोक को बाहर करता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में मेरा सुझाव है कि लोकतंत्र की जगह सम्पूर्ण विश्व में लोक स्वराज्य की दिशा में बढा जाये। लोक स्वराज्य लोक और तंत्र के बीच बढती दूरी को कम करने में बहुत सहायक हो सकता है। इस कार्य के लिए सबसे पहला कदम यह उठना चाहिए कि किसी भी देश का संविधान तंत्र अकेले ही संशोधित न कर सके। या तो लोक द्वारा बनाई गई किसी अलग व्यवस्था से संशोधित हो अथवा दोनो की सहमति अनिवार्य हो। उसके साथ साथ परिवार तथा स्थानीय इकाईयों को भी सम्प्रभुता सम्पन्न मानने के बाद कुुछ थोडे से महत्वपूर्ण अधिकार तंत्र के पास रहने चाहिए।
(3)सारी दुनिया में समाज व्यवस्था की जगह पॅूजीवाद का विस्तार हो रहा है। प्राचीन समय में विचारकों और समाज सेवियों को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था,राजनेताओं से भी उपर। किन्तु वर्तमान समय में विचारको और समाज सेवियों का अभाव हो गया है। यहाॅ तक कि धर्मगुरु,समाज सेवी राजनेता सभी किसी न किसी रुप में धन बटोरने में लग गये है। समाज सेवा के नाम पर एन जी ओ के बोर्ड लगाकर धन इकटठा किया जा रहा है। सारी दुनिया के राजनेताओं मंे धन संग्रह की प्रवृत्ति बढती जा रही है। इस बढती जा रही समस्या के समाधान के लिए हमें यह प्र्रयत्न करना चाहिए कि सम्मान,शक्ति,सुविधा कही भी एक जगह किसी भी रुप में इक्टठी न हो जाये। जो व्यक्ति इच्छा और क्षमता रखता है, वह सम्मान शक्ति और सुविधा मंे से किसी एक का चयन कर ले किन्तु यह आवश्यक है कि उसे अन्य दो की इच्छा त्यागनी होगी।इन तीनों के बीच खुली और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा हो सकती है। किन्तु श्रमजीवियों को मूलभूत आवश्यकताओं की गारण्टी व्यवस्था दे। यह व्यवस्था कुछ कठिन अवश्य है किन्तु इसके अतिरिक्त कोई अन्य समाधान नहीं है।
(4)प्राचीन समय में गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वर्ण व्यवस्था बनाकर व्यक्तियों की अलग अलग पहचान बनाई गई थी। यह पहचान यज्ञोपवीत के माध्यम से अलग अलग होती थी। संन्यासियों के लिए भी अलग वेशभूषा का प्रावधान था। विवाहित,अविवाहित की भी पहचान अलग थी। यहाॅ तक कि समाज बहिष्कृत लोगों को भी अलग से पहचाना जा सकता था। दुनिया के अनेक देशो में अधिवक्ता,पुलिस,न्यायाधीश आदि की भी ऐसी अलग अलग पहचान होती थी कि कोई अन्य भ्रम में न पड़ सके। यदि बिना किसी व्यवस्था के इस प्रकार की नकली पहचान सुविधाजनक हो जाये तो अव्यवस्था फैलना स्वाभाविक है। वर्तमान समय में धीरे धीरे ये ही हो रहा है। अब विद्वान, संन्यासी ,फकीर, समाज सेवी बिना किसी योग्यता और परीक्षा के नकली पहचान बनाने में सफल हो जा रहे है। एन जी ओ का बोर्ड लगाकर कोई मानवाधिकारी हो जा रहा है, तो कोई पर्यावरणवादी जिनका दूर दूर तक न मानवाधिकार से कोई संबंध है, न ही पर्यावरण से। ऐसे लोग व्यवस्था को ब्लैकमेल भी करने लगे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए ऐसी पहचान को तब तक प्रतिबंधित कर देना चाहिए जब तक कि उसने किसी स्थापित व्यवस्था से प्रमाण पत्र प्राप्त न किया हो,साथ ही नकली प्रमाण पत्रों पर भी कठोर दण्ड की व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
(5)पूरे विश्व में वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष,वर्ग संघर्ष की आंधी चल रही है। वर्ग समन्वय लगातार टूट रहा है तथा वर्ग विद्वेष बढ़ रहा है। प्रवृत्ति कि आधार पर दो ही वर्ग हो सकते है-(1) शरीफ (2) बदमाश । इस सामाजिक वर्ग निर्माण की जगह धर्म-जाति, भाषा, राष्ट्र, उम्र,लिंग, गरीब-अमीर,किसान-मजदूर ,गाॅव-शहर जैसे अन्य अनेक वर्ग बन रहे है तथा बनाये जा रहे है। बिल्लयों के बीच बंदर के समान हमारी शासन व्यवस्था वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष के माध्यम से समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके अपने को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। यह प्रयास बहुत घातक है। समाज को चाहिए कि वह प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार के वर्ग निर्माण को तत्काल अवांछित घोषित कर दे। साथ ही वर्तमान समय में बन चुके वर्गो में भी वर्ग समन्वय की भावना विकसित की जाये।
(6)प्राकृतिक रुप से दो ही कार्य करने आवश्यक होते है-(1) व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा तथा (2) व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग। राज्य का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति की न्याय और सुरक्षा के माध्यम से स्वतंत्रता को सुरक्षित करे। समाज का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग दे। पूरी दुनिया में राज्य दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अंतर या तो भूल गया अथवा जानबूझकर भूलने का नाटक कर रहा है। जनकल्याणकारी कार्य राज्य के स्वैच्छिक कर्तव्य होते है,दायित्व नहीं। राज्य समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से जनकल्याणकारी कार्यो को अपने दायित्व घोषित करता है। इस भ्रम निर्माण से सुरक्षा और न्याय पर भी विपरीत प्रभाव पडता है। सुरक्षा और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार होता है जबकि राज्य द्वारा दी गई अन्य सुविधायें व्यक्ति का अधिकार नहीं होता किन्तु राज्य द्वारा जनकल्याणकारी कार्यो को अपना दायित्व मान लेने से आम नागरिक इन सुविधाआंे को अपना अधिकार समझने लगते है। इस भ्रम के कारण ही समाज में अनेक टकराव उत्पन्न हो रहे है। आम लोग राज्य के मुखापेक्षी हो गये है। क्योंकि सुविधा लेना प्रत्येक व्यक्ति ने अपना अधिकार मान लिया है।
समाधान के लिए राज्य को सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो जाना चाहिए। जनकल्याण के अन्य कार्य राज्य अतिरिक्त कर्तव्य के रुप में चाहे तो कर सकता है किन्तु यह उसका दायित्व नहीं होगा और न ही राज्य उसके लिए समाज पर कोई बाध्यकारी टैक्स लगा सकता है।
(7) लगातार मानव स्वभाव आवेश,हिंसा,प्रति हिंसा की दिशा में बढ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का वास्तविक आशय मानवस्वभाव तापवृद्धि होता है जो पूरी दुनिया में बढ रहा है। किन्तु हम मानव स्वभाव तापवृद्धि के स्थान पर पर्यावरणीय तापवृद्धि को अधिक महत्व दे रहे है। पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए किन्तु मानव स्वभाव को तापवृद्धि की तुलना में पर्यावरण को अधिक महत्वपूर्ण मानना गलत है। इस तापवृद्धि के कारण सारी दुनिया में हिंसक टकराव बढ रहे है। पश्चिमी जगत ऐसे टकरावों से अपने आर्थिक लाभ उठाकर संतुष्ट हो जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए हमें चाहिए कि सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त अन्य सारी व्यवस्था राज्य से लेकर परिवार,गाॅव,जिला,प्रदेश तथा केन्द्रिय समाज तक बांट दी जावें। इससे राज्य सफलतापूर्वक न्याय और सुरक्षा को संचालित कर सकेगा, तथा अन्य कार्य भी सामाजिक ईकाइयाॅ राज्य मुक्त अवस्था में ठीक से कर पायेंगी।
(8)सम्पूर्ण विश्व में मानव स्वभाव में स्वार्थ बढ रहा है। स्वार्थ के कारण अनेक प्रकार के टकराव बढ रहे है। स्वार्थ के दुष्प्रभाव से ही परिवार व्यवस्था भी छिन्न भिन्न हो रही है तथा समाज व्यवस्था में भी लगातार टूटन आ रही है। स्वार्थ लगातार मानव स्वभाव में बढता जा रहा है। कमजोरों का शोषण आम बात हो गई है। आमतौर पर व्यक्ति अपने मानवीय कर्तव्यों को भी भूल रहा है। स्वार्थ के कारण ही सम्पत्ति के झगडे पैदा हो रहे है।
मानव स्वभाव में स्वार्थ के बढने का महत्वपूर्ण कारण है पश्चिम का सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार। अभी तक सम्पत्ति की तीन व्यवस्थाएॅ मानी गई है-(1) व्यक्तिगत सम्पत्ति (2) सार्वजनिक सम्पत्ति जो साम्यवाद का सिद्धांत है तथा असफल हो चुका है। (3) गाॅधी जी का ट्रस्टीशिप जो अभी तक अस्पष्ट है। यही कारण है कि व्यक्तिगत सम्पत्ति का सिद्धांत लगातार बढ रहा है। इस समस्या का समाधान संभव है। व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा ट्रस्टीशिप को मिलाकर एक नया सिद्धांत बना है जिसमें सम्पत्ति परिवार की मानी जायेगी तथा परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ट्रस्टी मात्र होगा,मालिक नहीं। इस संशोधन से स्वार्थ वृद्धि पर अंकुश लगना संभव है।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच भी दूरी लगातार बढती जा रही है। जब से धर्म ने गुणात्मक स्वरुप छोडकर संगठनात्मक स्वरुप ग्रहण किया है तब से उसमें लगातार रुढिवाद बढता जा रहा है। रुढिवाद धर्म को विज्ञान से बहुत दूर ले जाता है। रुढिवाद के कारण ही भावनाओं का विस्तार होता है तथा विचार शक्ति घटती है। जबकि विज्ञान विचार के माध्यम से निष्कर्ष निकालता है तथा गलत को सुधारने की प्रक्रिया मेें लगा रहता है। इसके कारण भी पूरे विश्व में अनेक समस्याएॅ पैदा हो रही है। पहले तो इस्लाम ही रुढिवाद का एकमात्र पोषक था किन्तु अब तो धीरे धीरे यह बीमारी हिन्दुओं में भी बढती जा रही है।
इसके समाधान के लिए रुढिवाद की जगह यथार्थवाद को प्रोत्साहित करना होगा। यथार्थवाद और विज्ञान के बीच तालमेल होने से इस समस्या का समाधान संभव है।
उपरोक्त नौ समस्याओं के अतिरिक्त भी समाज में अनेक समस्याएॅ व्याप्त है जो परिवार से लेकर सारे विश्व तक को प्रभावित करती है किन्तु मैंने उनमें से कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं को इंगित करके समाधान का प्रयास किया है। समाधान में से भी कई बाते एक दूसरे से जुडी हुई है। लोकतंत्र की जगह लोकस्वराज्य ,व्यक्तिगत सम्पत्ति की जगह पारिवारिक सम्पत्ति,परम्परागत परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था,जन्मना वर्ण व्यवस्था की जगह प्रवृत्ति अनुसार वर्ण व्यवस्था तथा संविधान संशोधन के असीम अधिकारों को संसद से निकालना जैसे कुछ महत्वपूर्ण सुधार विश्व समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकते है।

मंथन क्रमांक-3 की समीक्षा

Posted By: admin on October 21, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

ओम प्रकाश दुबे, नोएडा

1 प्रश्न- गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व मे क्या फर्क है?
उत्तर-गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व का आशय एक ही है किन्तु गुणात्मक हिन्दुत्व और संगठनात्मक हिन्दुत्व अलग अलग होते हैं। दुनिया मे हिन्दू एक मात्र समूह है जो मूलतः किसी भी रूप मे संगठन पर विश्वास नही करता। दूसरी ओर इस्लाम अकेला समूह है जो सिर्फ संगठन पर ही विश्वास करता है। गांधी, आर्य समाज, गायत्री परिवार आदि की सोच धार्मिक कही जा सकती है। इनकी धर्म की व्याख्या गुण प्रधान है। संघ परिवार इस्लाम साम्यवाद की सोच संगठनात्मक है, धार्मिक नहीं। इनकी व्याख्या पहचान प्रधान होती है। गांधी ,आर्य समाज, गायत्री परिवार आदि हिन्दुत्व की पहचान जीवन पद्धति से मानते हंै जिसमे सहजीवन, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम का भाव महत्वपूर्ण रहता है; अहिंसा और सत्य को महत्वपूर्ण माना जाता है; दूसरी ओर संगठनात्मक हिन्दुत्व मे चोटी धोती गाय गंगा मंदिर को अन्य गुणो की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। गुणात्मक हिन्दुत्व का नेतृत्व ब्राम्हण प्रवृत्ति प्रधान विचारको के हाथ मे होता है तो संगठनात्मक हिन्दुत्व का नेतृत्व क्षत्रिय प्रवृत्ति प्रधान राजनेताओ के हाथ मे। गुणात्मक हिन्दुत्व संख्या विस्तार को महत्वहीन मानता है, तो संगठनात्मक हिन्दुत्व संख्या विस्तार को पहली प्राथमिकता मानता है।

2 प्रश्न आजादी के बाद संघ का राजनीति मे आने का उद्देश्य मुसलमानो को रोकना मात्र था या कुछ और?
उत्तर- संस्था हमेशा समाज के साथ जुडकर रहना चाहती है और संगठन हमेशा सत्ता के साथ जुडकर। संघ एक संगठन है संस्था नही। संघ उग्रवादी विचारो का रहा है आतंकवादी नहीं । किन्तु उग्रवादी विचारो मे से आतंकवाद पैदा होता है । प्रारंभ मे यदि आतंकवाद को उग्रवाद ने नही रोका तो वही उग्रवाद का काल बन जाता है । ऐसा ही साम्यवाद के साथ हुआ है, ऐसा ही इस्लाम के साथ हो रहा है तथा ऐसा ही संध के साथ भी होना संभव है। स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान बंट चुका था तब कोई कारण नही था कि स्वतंत्र भारत मे गांधी का इतना विरोध हो किन्तु संघ परिवार, जिसकी सदस्य हिन्दू महा सभा भी थी, इन सबने मिलकर स्वतंत्रता पूर्व गांधी की ऐसी विपरीत छवि बना दी थी की वे इतने कम समय मे उन धारणा को बदल नही सके। मेरे विचार से संघ और हिन्दू महासभा की कार्य प्रणाली अलग अलग थी । संभव है कि गांधी हत्या मे हिन्दू महासभा की कार्य प्रणाली का समावेष हो। आज भी दोनो की कार्यप्रणाली मे फर्क देखा जा सकता है।
स्वतंत्रता के बाद भी यदि संघ ने गांधी का विरोध जारी रखा होगा तो वह विरोध राजनैतिक कारणो से हो सकता है, इस्लाम समर्थन के कारण नही क्योकि पाकिस्तान बंट चुका था। इस्लाम उस समय भारत की प्रमुख समस्या नही था। गांधी संघ के राजनैतिक प्रतिद्वंदी कभी नहीं थे किन्तु नेहरू संघ के प्रतिद्वदी रहे और नेहरू जी गांधी जी की छत्र छाया मे ही थे । मै नही कह सकता कि संध नेतृत्व की वास्तविक सोच क्या रही होगी।

राहुल शर्मा मुरैना म0प्र0
2 प्रश्न- यदि मोदी जी दो हजार उन्नीस के पूर्व संघ परिवार को नाराज कर दंे तो चुनावों पर क्या प्रभाव पड सकता है?
उत्तर-संघ परिवार और इस्लाम की कार्य प्रणाली लगभग एक समान है। ये कभी भी किसी मजबूत शक्ति के विरूद्ध एक जुट हो सकते है। वर्तमान समय मे नरेन्द्र मोदी को कई अलग अलग ताकतो से लडना है। मोदी विरोधी मुहबाये खडे हंै कि कोई उनके साथ आ जाये, भले ही वह राष्ट विरोधी या समाज विरोधी ही क्यो न हो । इनमे से कई लोग तो पाकिस्तान तक की वफादारी करते देखे जा सकते हैं, साम्प्रदायिक मुसलमानो की चापलूसी मे तो सभी एक दूसरे को पछाडने में लगे ही है। ऐसे अवसर पर न तो नरेन्द्र मोदी संघ को नाराज करना चाहेंगे न ही ऐसा करना उचित है। इसलिए नरेन्द्र मोदी जी के लिए यही उचित होगा कि पहले अपराध वाद, परिवारवाद, साम्यवाद और मुस्लिम आतंकवाद को निपटा ले उसके बाद जैसी परिस्थिति होगी वैसा कदम उठाना चाहिए।

डी सी सरण शिमला
3 प्रश्न-संघ परिवार की सबसे बडी कमी है कि भारत की तीन जातियों को छोडकर लगभग 95 प्रतिशत लोगो को संध यह विश्वास कभी नही दिला पाया कि यह संगठन आपका है। आप कही भी सर्वे कर ले तो आपको यह सच्चाई मिल जाएगी।
उत्तरः- मेरे विचार में संघ एक साम्प्रदायिक संगठन है, जातिवादी नहीं। संघ हिन्दु परिवार की जातियों के टकराव के विरुद्ध है। यह अलग बात है कि वह हिन्दू समाज के अंदर व्याप्त उच नीच छूआ छूत गरीब अमीर के भेद भाव दूर करने जैसे सामाजिक कार्य को कम महत्व देकर इस्लाम से टकराव को अधिक महत्व देता है। इस्लाम और साम्यवाद हिन्दू धर्म के अंतर्गत भेद भाव उच नीच को अधिक हाइलाइट करके इसे मुख्य मुददा बनाते है। भाजपा को छोडकर अन्य राजनैजिक दलो को यह अंदर तक विश्वास हो गया कि हिन्दू कभी संगठित नही हो सकता जबकि मुसलमान तो जन्म से मृत्यु तक संगठित ही रहता है। यही कारण है कि सभी राजनैतिक दलो ने मुसलमानो और साम्यवादियो को इतना सिर पर चढा लिया कि आज संघ परिवार के समर्थन से मोदी सरकार चल रही है। यह सही है कि कभी भी संघ को हिन्दूओ का व्यापक समर्थन नही मिला किन्तु वह भी सही है कि लाचारी मे हिन्दूओ को संध समर्थन का जहर का घूट पीना पडा और आज यह समर्थन निरंतर बढता ही जा रहा है।

सोनू देवरानी दिल्ली
4 प्रश्न-संघ परिवार ,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार अंततः समाज सशक्तिकरण मे ही लगे हुए है और भविष्य में भी लगे रहेंगे। क्या तीनो एक साथ आ सकते है।
उत्तर- शरीफ लोग कभी स्वयं संचालित नहीं होते। शराफत के कंधे पर ही चढकर धूर्तता आगे बढती है। ये तीनों शरीफ प्रवृत्ति के है जिसके परिणाम स्वरुप तीनों ही कुछ चालाक लोगो के हाथों में खेलते रहते है। संघ परिवार तो किसी अन्य के हाथों में न खेलकर स्वयं ही राजनैतिक मोह जाल में फसा हुआ है । आर्य समाज स्वामी अग्निवेश के चक्रव्यूह से नही निकल पा रहा। सर्वोदय परिवार भी साम्यवाद और इस्लामिक कटटरवाद के चंगुल में अंदर तक फसा हुआ है। ऐसी स्थिति में तीनो के एक साथ आने की संभावना न के बराबर है। मैंने कुछ प्रयत्न किया था किन्तु संघ परिवार और सर्वोदय के लोगो ने अस्वीकार कर दिया।
संघ परिवार युद्ध उन्मादी प्रवृत्ति का माना जाता है तो सर्वोदय परिवार कायरों की जमात। न हेडगेवार कभी युद्ध उन्मादी रहे न ही गाॅधी कभी कायर प्रवृत्ति के। लेकिन दोनों के जाने के बाद दोनों की दिशा बदल गयी।

सुरेश कुमार नोएडा
5 प्रश्न-क्या संध के अतिरिक्त विश्व पर इस्लामिक खतरे को लेकर कोई अन्य संगठन भी चिंतित है? इस्लाम के मानव विरोधी चरित्र को रोकने का उपाय क्या है? हम संध का आंख मुदकर समर्थन क्यो न करे।
उत्तर- जिस समय संघ की स्थापना हुई थी उस समय भारत मे इस्लाम सर्वाधिक खतरनाक माना जाता था। संध का निर्णय समयोचित था। यदि मै भी होता तो हो सकता है कि मै उस निर्णय का समर्थन करता। किन्तु बहुत बाद मे जब स्वतंत्रता संघर्ष चरम पर था तब संध को अल्प काल के लिये अपनी योजना को स्थगित करना चाहिये था। संध की कार्य प्रणाली अस्पष्ट है, नीयत नही । संध को चार पांच प्रश्नों पर विचार करना चाहिये। 1 संघ राष्ट और हिन्दुत्व का घालमेल क्यो करता है? धर्म प्रमुख है या राष्ट यह बात साफ होनी चाहिये। 2 मनुष्य के प्राकृतिक अर्थात मौलिक अधिकारो के विषय मे संघ की नीति क्या है? 3 संघ इस्लाम को भारत तक के लिये खतरनाक मानता है या विश्व स्तर के लिये? 4 सारी दुनियां मे इस्लाम एक बडा शक्ति शाली संगठन है। संघ सिर्फ शक्ति प्रयोग तक ही उसका समाधान सोचता है अथवा साम दाम और भेद का उपयोग भी आवश्यक मानता है। 5 संघ हिन्दूत्व के मूल तत्व सहजीवन धर्म निरपेक्षता वसुधैव कुटुम्बकम सर्व धर्म समभाव तथा गाय गंगा मंदिर आदि मे से किसे अधिक महत्वपूर्ण मानता है।
मैरे विचार से संघ यदि मिल बैठकर इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर खोज ले तो संघ इस्लाम का एक उपयुक्त समाधान हो सकता है।

अन्य प्रश्न
1 प्रश्न- क्या मुस्लिम राजाओ का इतिहास इतना कलंकित रहा है कि उन्हे राष्ट्रीय गुलामी की तुलना मे अधिक महत्वपूर्ण खतरा माना जाय?
उत्तर- अधिकंाश मुस्लिम राजाओ का इतिहास उससे भी अधिक कलंकित रहा है जो सीमा हम समझते है। पुराना इतिहास क्या रहा उसे तो भूल जाइये किन्तु वर्तमान मे भी पाकिस्तान मे इश निंदा के लिये पत्थर मारने का रिवाज और फांसी देने का कानूनी प्रावधान यह प्रमाणित करता है कि जब मुसलमान भारत के शाासक थे तो वे किस सीमा तक मुल्ला मौलवीयो से डरते होगे। आज भी मुस्लिम महिलाओं मे इतनी हिम्मत नही आयी है, कि वे इन मुल्ला मौलवीयों का खुलकर विरोध कर सकंे । इसलिये मुस्लिम राजाओ के अत्याचार की कहानियां अतिरंजित होते हुए भी सत्य जैसी महसूस होने लगती है।
2 प्रश्न– आप कैसे कह सकते है कि संघ अंग्रेजी शासन के पक्ष मे था?
उत्तर – स्वामी दयानंद और विवेकानंद लगभग समकालीन रहे होगे । स्वामी दयानंद ने अंगे्जी शासन का आंशिक विरोध करते हुए स्वराज्य की बात कही किन्तु स्वामी विवेकानंद ने नहीं कही। स्वामी दयानंद के षिष्यो ने समाज सुधार का तथा मुस्लिम विरोध का काम रोककर स्वतंत्रता संघर्ष मे भाग लिया। किन्तु संघ परिवार ने स्वतंत्रता संघर्ष से दूरी बनाकर इसके ठीक विपरीत हिन्दु मुसलमान मे टकराव बढाने का ही काम किया। आज तक 70 वर्ष बीतने के बाद भी ंसंघ के लोग स्वतंत्रता को उतना महत्व नही देते जितना विभाजन को गाली देते है। संघ परिवार विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता का पक्षधर कभी नही रहा बल्कि यदि गृह युद्ध होता तो संघ परिवार उसमे भी सहमत हो जाता और गृह युद्ध के माध्यम से अंग्रेजो की इच्छा पूरी कर देता। अर्थात स्वतंत्रता और कुछ वर्षो के लिये टल जाती।
3 प्रश्न- आपने लिखा है कि गांधीवादियो का एक भाग सुधार मे लग गया और दूसरा अवस्था परिवर्तन मे। अवस्था परिवर्तन शब्द को अधिक स्पष्ट करे । क्या समाज सुधार मे लगे लोगो का मार्ग ठीक था?
उत्तर भारत के स्वतंत्र होते ही तथा गांधी हत्या के तत्काल बाद सत्ता लोलुप गांधी वादियों और सामाजिक गांधी वादियों की संयुक्त बैठक सेवाग्राम मे हुई। बैठक मे समाज सेवियो को सत्ता लोलुप लोगो के समझा दिया कि आप समाज सुधार कीजिये और हम व्यवस्था परिवर्तन करेंगे । ये विचारे अपना झोला डंडा उठाकर ग्राम सुधार मे लग गये और राजनेताओ को खुला छोड दिया कि वे चाहे जितना भ्रष्टाचार करे, चाहे जिस सीमा तक समाज को गुलाम बनालंे । किसी गांधी वादी ने कभी यह नही सोचा कि गाय की रोटी कुत्ता खा रहा है और हम गांधीवादी पूरी इमानदारी से गाय के लिये आटा पीसने मे आंख पर पटटी बांधकर निरंतर सक्रिय है। यहा तक कि जय प्रकाश जी ने जब प्रयत्न भी किया तो गांधी वादी दो फाड हो गये । वाद मे ठाकुर दास जी बंग सिद्ध राज ढढ्ढा ने प्रयत्न किया तो अधिकांश गांधीवादियों ने एक जुट होकर उनका विरोध किया । क्योकि उन्हे कुत्ते और गांय से कुछ लेना देना नही था। उन्हे तो गाय के लिये इमानदारी के आटा पीसना था। भले ही कुत्ता खाता रहे।
4 प्रश्न– संघ नेतृत्व पूरी तरह चालाक सक्रिय सतर्क और सफल है जबकि सर्वोदय का ढीला ढाला शरीफ असफल दूसरी ओर आपने ही पहले भाग मे संध के लोगो को शरीफ और भावना प्रधान लिखा है । बाद मे विपरीत क्यो?
उत्तर- मैने संघ के लोगो को शरीफ भावना प्रधान लिखा है और नेतृत्व को चालाक। मेरी दोनों ही बाते सही है। सर्वोदय मे नेत्त्व नही होता, जबकि संध मे नेतृत्व होता है। संघ एक पूरी तरह अनुशासित संगठन है जबकि सर्वोदय मे उपर से नीचे तक अनुशासन कही देखने को भी नही मिलेगा। इसलिये मेरा यह मानना है कि संध मे शासक और शासित की कार्य प्रणाली है जो सर्वोदय मे नही है। शासक यदि चालाक नही हो तो वह न तो कभी अनुशासन कायम कर सकता है न ही वह सफलता की ओर बढ सकता है। संध पूरी तरह अनुशासित है और सफलता की ओर बढ रहा है। इसलिये मेरे विचार मे शरीफ और चालाक लिखना उपयुक्त प्रतीत होता है।

सोनू देवरानी
5 प्रश्न-आपने मंथन क्रमांक 3 में लिखा है कि दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी और सफल माने जाते है,तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ ,भावना प्रधान और असफल है तो क्या कारण है कि साम्यवाद का पतन हो रहा है और संघ परिवार सशक्त बन रहा है। कृपया विस्तार में बताइये।
उत्तरः-साम्यवाद एक विचारधारा है और साम्यवादी उस पर चलने वाले व्यक्ति। साम्यवाद विचारधारा के रुप में असफल हुआ है लेकिन साम्यवादी अभी भी असफल नहीं हुये हैं। आज भी अधिकांश गाॅधीवादी अहिंसा के पुजारी होते हुए भी नक्सलवाद का समर्थन करते हैं। आर्य समाज के प्रमुख स्वामी अग्निवेश सब काम छोडकर नक्सलवाद के समर्थन में खडे दिखाई देते हैं। साम्यवादियों ने बडी चालाकी से इस्लाम को अपनी ढाल बना लिया हैै और भारत के मुसलमान हर जगह साम्यवादियों का बचाव करते दिखते है।संघ परिवार भी साम्यवादियों की तुलना में मुसलमानों का अधिक विरोध करता है। मेरे एक साम्यवादी मित्र राकेश रफीक को मैने इतना चालाक पाया कि वे सर्वोदय की बैठकों में भी निर्णायक प्रमुख के रुप में उपस्थित रहते है तो बाबा रामदेव के बगल में भी निर्णायक सलाहकार के रुप में बैठे देखे जा सकते है । मैंने उन्हे अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे के अलग अलग होने के बाद भी दोनों की महत्वपूर्ण सलाहकार समितियों में बैठते देखा है। यहाॅ तक कि आचार्य पंकज के सतर्क करने के बाद भी और उन्हें साम्यवादी जानते हुये भी मैंने उन्हें अपना प्रमुख सलाहकार बनाकर रखने की भूल कर दी थी। मैं अब भी मानता हॅू कि साम्यवादी सबसे अधिक चालाक होते है भले ही साम्यवाद के असफल होने के कारण उनकी स्थिति कुछ कमजोर हो रही हो।
यह सच है कि वर्तमान समय में संघ सफल हो रहा है। ऐसी ही सफलता चैदह सौ वर्षो तक इस्लाम को भी मिल चुकी है और अब सारे विश्व में उसकी दुर्दशा की शुरुवात भी स्पष्ट है। प्रतीक्षा कीजिए और देखिए कि इस्लाम के बाद भारत में संघ परिवार का ही नम्बर आयेगा।

मंथन क्रमांक -2 बेरोजगारी

Posted By: admin on October 9, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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व्यक्ति को रोजगार प्राप्त कराना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है, दायित्व नहीं। क्योंकि रोजगार व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं होता,बल्कि संवैधानिक अधिकार मात्र होता है। रोजगार की स्वतंत्रता व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है। हमारे संविधान विशेषज्ञों की नासमझी के कारण कभी कभी रोजगार को मौलिक अधिकार कह कर संविधान में शामिल कर लिया जाता है।

रोजगार देना राज्य का दायित्व न होते हुए भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जाती है। क्योंकि मूलभूत आवश्यक्तओ की पूर्ति के अभाव में व्यक्ति कभी कभी अपराध करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे अपराध राज्य के लिए समस्या पैदा करते है। इसलिए राज्य का महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अभावग्रस्त लोगों की मजबूरी को दूर करे। ऐसी मजबूरी यदि मुफ्त में बांटकर दूर की जायेगी तो वह एक नई समस्या पैदा करेगी। इसलिए राज्य बेरोजगारी को एक समस्या मानकर उसे दूर करने का प्रयास करता है।

पिछले कई सौ वर्षो से समाज व्यवस्था पर बुद्धिजीवियों का विशेष हस्तक्षेप रहा है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद तो भारत की सम्पूर्ण संवैधानिक व्यवस्था में बुद्धिजीवियों तथा पॅूजीपतियों का एकाधिकार हो गया है। वैसे तो दुनिया के अन्य अनेक देशों में भी ऐसा है किन्तु भारत में तो यह स्थिति विशेष रुप से दिखती है। बुद्धिजीवियों ने सबसे पहले बेरोजगारी शब्द की परिभाषा बदल दी। आज बेरोजगारी की क्या परिभाषा है, यही अब तब स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि योग्यतानुसार कार्य का अभाव बेरोजगारी है। प्रश्न उठता है कि एक श्रमिक भूख की मजबूरी में 100 रु में कहीं दिनभर काम कर रहा है,और एक इन्जीनियर 500 रु प्रतिदिन में भी काम न करके बेरोजगार बैठा है क्योकि 500 रु प्रतिदिन उसकी योग्यता की तुलना में बहुत कम है। सच्चाई तो यह है कि एक सीमा से नीचे श्रम मुल्य पर काम करने वाले मजबूर श्रमिक को बेरोजगार माना जाये तथा उससे उपर प्राप्त करने की प्रतिक्षा में बेरोजगार बैठे इन्जीनियर को बेरोजगार न मानकर उचित रोजगार की प्रतिक्षा में माना जाये। किन्तु बुद्धिजीवियों ने धुर्ततापूर्वक रोजगार की ऐसी परिभाषा बना दी कि मजबूरी में काम कर रहे को रोजगार प्राप्त तथा उचित रोजगार की प्रतिक्षा मैं बैठे को बेरोजगार घोशीत कर दिया। बेरोजगारी की वर्तमान भ्रमपूर्ण परिभाषा को बदलने की जरुरत है। किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोशित न्युनतम श्रम मुल्य पर योग्यतानुसार कार्य का अभाव ही बेरोजगारी की ठीक परिभाषा हो सकती है। किन्तु मैं जानता हॅू कि इस परिभाषा को न बुद्धिजीवी स्वीकार करेंगे, न ही सरकार।

व्यक्ति के भरण पोषण के लिए तीन माध्यम होते है- 1 शारीरिक श्रम 2 बुद्धि 3 धन। श्रम तो सबके पास होता है किन्तु बुद्धि प्रधानता कुछ लोगो के पास होती है तथा धन प्रधानता तो और भी कम लोगों के पास होती है। एक व्यक्ति के पास जीवनयापन के लिए सिर्फ श्रम है। दूसरे के पास श्रम और बुद्धि भी है। तीसरे के पास श्रम बुद्धि और धन भी है । मैं आज तक नहीं समझा कि शिक्षित बेरोजगार कैसे माना जा सकता है क्योंकि उसके पास तो श्रम और बुद्धि दोनों रहना प्रमाणित है। सच्चाई यह है कि बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए चार सिद्धांत बनाये है-1 कृत्रिम उर्जा मुल्य नियंत्रण 2 शिक्षित बेरोजगारी को मान्यता 3 श्रम मुल्य वृद्धि की सरकारी घोषणाएॅ 4 जातीय आरक्षण। स्पष्ट है कि भारत की बुद्धि प्रधान अर्थव्यवस्था श्रम शोषण के लिए चारों सिद्धांतो पर पूरी इमानदारी से अमल करती है। यह स्पष्ट है कि न्यायपूर्ण तरीके से बेरोजगारी दूर करने का एकमात्र माध्यम है, श्रम की मांग बढे किन्तु हमारे देश के आर्थिक विशेषज्ञ सारी शक्ति लगाकर श्रम की मांग नहीं बढने से रोकने का प्रयत्न करते रहते है। 70 वर्ष की स्वतंत्रता के बाद भारत दुनिया के देशो से आर्थिक प्रतिस्पर्धा की चुनौती दे रहा है। तो दूसरी ओर भारत में आज भी ऐसे बेरोजगारों की संख्या करीब 15 प्रतिशत है, जो 30रु प्रतिदिन से कम पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर है। आज भी भारत सरकार ने 5 व्यक्ति को परिवार मानकर 160 रु प्रतिदिन का न्यूनतम श्रममूल्य घोशित किया है। किन्तु इस श्रम मूल्य पर भी सरकार सबको रोजगार की गारण्टी नहीं दे पा रही। मुझे जानकारी है कि सरकारी बेरोजगारों की सूची में ऐसे वास्तविक बेरोजगारों का नाम शामिल नहीं है। दूसरी ओर इस सूची में उन सब लोगों के नाम शामिल है जो उचित रोजगार की प्रतिक्षा में काम करने के अभाव में घर बैठे है।

श्रम की मांग बढे बिना न तो बेरोजगारी दूर हो सकती है, न ही न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था कही जा सकती है। यदि भारत सरकार वास्तव में वास्तविक बेरोजगारी को दूर करना चाहती है तो उसे कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्यवृद्धि कर देनी चाहिए। साथ ही उसे शिक्षा पर लगने वाला पूरा खर्च बंद करके कृषि की ओर स्थानान्तरित कर देना चाहिए। तीसरी बात यह भी है कि उसे श्रम के वास्तविक मूल्य से अधिक बढाकर घोषणा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि एक मान्य सिद्धांत है कि किसी वस्तु का मूल्य बढता है तो मांग घटती है और मांग घटती है तो मूल्य घटता है। जब श्रम मूल्य वृद्धि की घोषणा होती है तथा उस वृद्धि के अनुसार रोजगार की गारण्टी नहीं होती, तब दो प्रकार के श्रम मूल्य प्रचलित हो जाते है। ऐसी स्थिति में श्रम की मांग घटती है और बेरोजगारी बढती है।
मेरे विचार से बेरोजगारी की परिभाषा बदल देनी चाहिए। कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि कर देनी चाहिए तथा भारत की अर्थव्यवस्था पर बुद्धिजीवियों के एकाधिकार को समाप्त कर देना चाहिए। तब भारत बहुत कम समय में ही बेरोजगारी से मुक्त होने का दावा कर सकेगा। जब तक भारत में वास्तविक बेरोजगारी है, तब तक हमारी कितनी भी आर्थिक उन्नति,हमारी सर गर्व से उंचा करने में बाधक बनी रहेगी।

दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा

Posted By: admin on October 8, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »


दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा में एक लेख लिखा है। उस लेख की समीक्षा में मैने एक उत्तर लिखा है
जो इस प्रकार है-

उत्तरः- आप सब जानते है कि मैं प्रतिदिन समसामयिक घटनाओं पर कुछ न कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता हॅू। किन्तु पिछले एक दो माह से मैंने पाकिस्तान और कश्मीर के संबंध में कुछ भी नहीं लिखा। यहॉ तक कि मैंने उडी घटना के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तथा सर्जिकल स्ट्राइक के
बाद भी नहीं। क्योंकि यह विषय ऐसा है जिसके सत्य तक पहॅुचना मेरे लिए संभव नहीं था। कौन सच बोल रहा है,कौन झूठ यह कैसे लिखा जाये। दूसरी बात यह भी है कि वर्तमान स्थितियों में पाकिस्तान को शत्रु माना जाये या विरोधी तक सीमित रखा जाये। जिस तरह पाकिस्तान का व्यवहार है उस
अनुसार तो वह सिर्फ भारत सरकार के शत्रु तक सीमित न होकर सम्पूर्ण भारत के लिए शत्रु माने जाने योग्य है क्योंकि उसके आतंकी भारत में कहीं भी किसी की भी हत्या करे और पाकिस्तान की सरकार उसको संरक्षण दे तथा पाकिस्तान के नागरिक ऐसी सरकार का समर्थन करे यह शत्रुता पूर्ण कार्य है। फिर भी मुझे विश्वास था कि उचित परिस्थितियों में भारत सरकार उचित निर्णय लेगी और इसलिए मुझे अनावश्यक कोई सलाह नहीं देनी चाहिए। मैं एक विचारक हॅू कोई साहित्यकार ,किसी का चारण या प्रशंसक नहीं। न तो मुझे किसी प्रकार वातावरण को गरम करने में कोई भूमिका अदा करनी चाहिए, न ही ठंडा करने में। इसलिए मैं चुप रहा और चुप हॅू।

आपने पाकिस्तान के नागरिको की चर्चा की । पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है जहॉ इस्लामिक कानून चलता है। हम पाकिस्तान के नागरिको के व्यवहार की बात तो बाद मंे करेंगे किन्तु पहले हम कश्मीर के मुस्लिम बहुमत के विचारों का परीक्षण तो कर ले। कश्मीरी मुसलमानों का व्यवहार पाकिस्तान के लोगों के लिए एक नमुना बन सकता है। अभी तो यहॉ तक स्थिति है कि भारत का मुसलमान भी अभी दुविधा में है। बहुत से लोग अब
भी चुप है और प्रतिक्षा कर रहे है कि उन्हें खुलकर क्या कहना चाहिए। भारत के बहुत से मुसलमान पाकिस्तान के मामले में तो भारत की सरकार को सलाह देने के लिए आगे आ जाते है किन्तु वे कभी पाकिस्तान की सरकार की आलोचना में उतने आगे नहीं दिखते। मेरे विचार में इस समय भारत
सरकार को नरम या गरम मामलों में कोई विशेष सलाह न देकर या तो समर्थन करना चाहिए या चुप रहना चाहिए। तब तक जब तक कोई विशेष और स्पष्ट घटना न हो जाये।

मैं मनमोहन सिंह अथवा अटल जी की आलोचना को भी अप्रासंगिक मानता हॅू। उस समय तक न तो विश्व में पाकिस्तान इतना बदनाम हुआ था न ही मुस्लिम आतंकवाद इतना अलग थलग पडा था। उस समय पश्चिमी देशों का भी रुख इतना साफ नहीं था। मुझे लगता है कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए उस समय की सरकारों ने ठीक ही निर्णय लिये होंगे।

अंत में मैं भारत और कश्मीर के मुसलमानों से विशेष आग्रह करता हॅू कि वे वर्तमान परिस्थितियों का लाभ उठाकर यह हिम्मत करें कि अब धर्म के आधार पर संगठित होने का अवसर समाप्त हो चुका है तथा हम जहॉ भी है उन सबके साथ सहजीवन जीने की आदत डाल ले। धर्म सर्वोच्च नहीं, राष्ट्र भी सर्वोच्च नहीं, सर्वोच्च तो समाज होता है और समाज में सर्वोच्च आवश्यकता है सहजीवन की अवधारणा जिसमे निश्चित ही औसत हिन्दुओं की तुलना में औसत मुसलमान कमजोर दिख रहा है।

समाचार है कि भारतीय कलाकार सलमान खान ने एक बयान देकर पाकिस्तान के कलाकारों के भारत में किये जा रहे प्रदर्शन के विरोध की आलोचना की है तथा यह तर्क दिया है कि कला को राजनीति से दूर रखना चाहिए।

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Salman-31
मैंने इस पर विचार किया। मैं भी इस बात से सहमत हॅू कि कला और राजनीति अलग अलग विषय होने चाहिए। किन्तु मैं वर्तमान परिस्थिति और उस परिस्थिति में भी किसी मुस्लिम कलाकार के द्वारा की गई, इस तरह की टिप्पणी को अनाश्यक और अनुचित मानता हॅू । मैं प्रायः कश्मीर समस्या को इस्लामिक आतंकवाद की समस्या मानता रहा हॅू तथा पाकिस्तान के प्रति मेरी सहानुभूति भी रही है किन्तु पिछले कुछ महिनों से जिस तरह पाकिस्तान ने कश्मीर को अशांत किया, उससे मेरी रही सही सहानुभूति भी खत्म हो गई, और मैं यु़द्ध उन्माद के पूरी तरह विरुद्ध होते हुए भी पाकिस्तान को कोई कडा संदेश देने का पक्षधर बन गया। ऐसी परिस्थिति में किसी भारतीय मुसलमान की ऐसी टिप्पणी उचित नहीं कहीं जा सकती।
यह सच है कि इस्लाम कोई धर्म न होकर एक संगठन मात्र बन गया है। अपने संगठन की ताकत पर भारतीय मुसलमानों ने भी 67 वर्षो तक भारतीय शासन व्यवस्था को ब्लैकमेल किया किन्तु अब परिस्थितियॉ बदल गई हैं। सलमान खान को यह सोचना चाहिए कि सारी दुनियॉ में मुसलमान संदेह के घेरे में हैं। दुनिया के मुसलमानों में भी पाकिस्तान सर्वाधिक आतंक समर्थक माना जा रहा है। पाकिस्तान के भी सुन्नी मुसलमान विशेष रुप में संदेह के घेरे में है। सलमान खान कोई बोहरा,सूफी अथवा अन्य ऐसे मुसलमानों की श्रेणी में नहीं है जिन्हें घोशित रुप से शांतिपूर्ण माना जाये। ऐसे कट्टरवादी समूह का मुसलमान होते हुए भी सलमान खान ने कोई ऐसी विशेष छवि नहीं बनाई थी जिसके कारण उन्हें अपवाद स्वरुप माना जाये। ऐसी परिस्थिति में सलमान खान ने यह बयान देकर एक गंभीर गलती की है। इस गलती ने ही शिवसेना सरीखे साम्प्रदायिक हिन्दूवादी संगठन को कुछ बोलने का मौका दिया अन्यथा साम्प्रदायिक हिन्दुओं का धीरे -धीरे मॅूह बंद हो रहा था।
मैं फेसबुक में देखता रहा हॅू कि आमतौर पर मुसलमान ऐसे संवेदन शील मुद्दों पर क्या टिप्पणी करते है। मुझे कभी कभी अपवाद स्वरुप ही किसी मुसलमान की ऐसी टिप्पणी मिलती होगी जो इस्लामिक कट्टरवाद के विरुद्ध हो।मुसलमान नाम आते ही आभास हो जाता है कि उसने क्या लिखा होगा। वर्तमान वातावरण में इन टिप्पणी कर्ता मुसलमानों को चुप क्यों नहीं रहना चाहिए। समय बदल चुका है। अब आप संगठन की ताकत पर सारी दुनिया को ब्लैकमेल नहीं कर पायेंगे। रोते हुए बच्चे को कई बार मॉ अन्य बच्चों की अपेक्षा दूध अधिक पिला दिया करती है किन्तु यदि ऐसा रोना उसकी आदत बन जाये तो मॉ उसे जोरदार झापड़ भी मार देती है। दुनिया के मुसलमानों को और विशेषकर भारतीय मुसलमानों को इस उदाहरण से सबक लेना चाहिए। कश्मीर तो भारत से कभी अलग नहीं हो सकेगा। कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान ही कश्मीर में मिलकर भारत का अंग बन जावे।
भारत के मुसलमानों को यह तय करना होगा कि वे 125 करोड़ की आबादी में एक व्यक्ति के समान समान अधिकार चाहते है,अथवा अल्पसंख्यक समूह के समान विशेष अधिकार। यदि आप अपने को अल्पसंख्यक मानते है तो आपके लिए आवश्यक है कि आप बहुसंख्यकों के भी विशेष अधिकार स्वीकार करे। यह आपको तय करना है कि आप क्या चाहते है। बहुसंख्यक दोनों परिस्थितियों में जीने के लिए तैयार है और आप एक साथ दोंनो परिस्थितियों का लाभ उठाना चाहते है जो अब संभव नहीं।

मंथन क्रमांक-1 की समीक्षा

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अभ्युदय द्विवेदी जी
प्रश्न-1 क्या राज्य संगठन एवं शक्ति के बिना भी न्याय और सुरक्षा दे सकता है। अधिकार व शक्ति में क्या अंतर है?
2 यदि राज्य न्याय और अधिकार का अपना दायित्व न पूरा करें तो समाज क्या कर सकता है?

भूपत शूट
3 समाज से आपका अभिप्राय क्या है?

अन्य प्रश्न
4 क्या प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार समान होते है या कम ज्यादा?
5 राज्य कभी सम्प्रभुता सम्पन्न नहीं हो सकता। क्या यह कहना उचित है?
6 क्या यह कहना उचित है कि राज्य न्याय और सुरक्षा के लिए सत्य और अहिंसा की बलि चढा सकता है? गॉधी जी ने राज्य को न्यूनतम बलप्रयोग की सलाह दी थी?
7 क्या समाज किसी परिस्थिति में असत्य और हिंसा का सहारा नहीं ले सकता? स्वतंत्रता संघर्ष में अनेक लोगों ने हिंसा का सहारा लिया और हम उन्हें पूजते है?
8 राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नहीं बना सकता। तो बताइये कि ऐसी सीमा कौन बना सकता है? यदि कोई सीमा नहीं रही तो उच्श्रृंखलता तथा अराजकता का खतरा है।

उत्तरः-1 अधिकार शब्द स्वयं में भ्रम मूलक है। अंग्रेजी में राईट शब्द के लिए भी अधिकार शब्द का प्रयोग होता है तथा पावर के लिए भी। मेरे विचार से हिन्दी में भी अधिकार और शक्ति को अलग अलग होना चाहिए। व्यक्ति या समाज राज्य को शक्ति देता है क्योंकि दायित्व के पूरा करने के लिए शक्ति अनिवार्य है। आज तक कोई ऐसा मार्ग नही खोजा जा सका जिसमें शक्ति भी स्थानांतरित न हो तथा दायित्व पूरे किये जा सकें।
2 जब राज्य अपना दायित्व पूरा न कर सके अथवा न करना चाहे तो ऐसी परिस्थिति में समाज ऐसे राज्य में परिवर्तन कर सकता है। यदि राज्य उच्श्रृंखल हो जाये अर्थात तानाशाह हो जाये तब समाज आपातकाल समझकर अराजक भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में समाज अहिंसा और सत्य की भी बलि चढा सकता है।
3 समाज का एक ही अर्थ होता है मानव समाज या विश्व् समाज। परिवार ,गांव,राष्ट्र, महादेश आदि समाज के टुकडे होते है, प्रकार नहीं। समाज कई प्रकार का नहीं हो सकता । यदि समाज शब्द के आगे हिन्दू, मुसलमान, व्यापारी भारतीय आदि शब्द लगे हो तो ये समाज के अंग हो सकते है,समाज नहीं।
4 व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है- 1 प्राकृतिक 2 संवैधानिक 3 सामाजिक। प्राकृतिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है। प्राकृतिक अधिकारों में किसी भी परिस्थिति में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं किया जा सकता। संवैधानिक अधिकार कम ज्यादा भी हो सकता है। सामाजिक अधिकार तो कम ज्यादा होते ही है।
5 राज्य व्यवस्था की कोई प्रारंभिक इकाई नहीं है और न ही राज्य व्यवस्था की अंतिम इकाई है। व्यवस्था की इकाईयां परिवार,गॉव,जिला राष्ट, प्रदेश से आगे बढती बढती विश्व् व्यवस्था तक जाती है। प्रत्येक इकाई अपनी सीमा में सम्प्रभुता सम्पन्न होती हैं किन्तु प्रत्येक इकाई अपनी सीमा से बाहर उपर की इकाई की पूरक होती है। राज्य के साथ भी यही परिभाषा लागू होती है। राज्य भी अपने अधिकारों की सीमा में सम्प्रभुता सम्पन्न हो सकता है किन्तु अपनी सीमा से बाहर वह अधिकार विहीन होता है।
6 गॉधी जी ने जो कुछ कहा उस समय की परिस्थितियॉ भिन्न थी। यह भी संभव है कि गॉधी जी ने ऐसा कहकर गलती की हो तथा यदि वे जीवित रहते तो गलती सुधार लेते। राज्य को न्यूनतम हिंसा का मार्ग छोड़कर समुचित हिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए। भारत में समाज में बढती हिंसा की प्रवृत्ति का यह मुख्य कारण है कि राज्य ने समुचित हिंसा के स्थान पर न्यूनतम हिंसा का मार्ग अपनाया, यह मार्ग गलत था। गाधी जी की सलाह के बाद भी गलत था।
7 सन् 47 के पहले भारत गुलाम था। गुलामी के काल में असत्य और हिंसा का सहारा लिया जा सकता है किन्तु स्वतंत्रता के काल में नहीं। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने जो कुछ असत्य और हिंसा का मार्ग अपनाया वह गुलामी काल का होने से सम्मान जविश्व्नक है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद यदि वे जीवित होते तो या तो ऐसा नही करते या यदि करते तो गलत करते।
8 स्वतंत्रता की सीमा व्यक्ति स्वयं बनाता है। यह सीमा उस सीमा तक बनाई जा सकती है जहॉ से किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा न शुरु होती हो। यदि ऐसी सीमाओं में किसी तरह का टकराव होता है तो राज्य की भूमिका शुरु हो जाती है तथा वह दोनों की सीमाओं की सुरक्षा करता है। इन दोनों इकाईयों की सीमाओं की सुरक्षा ही वास्तव में न्याय है।

सर्जिकल स्ट्राइक की एक समीक्षा

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आज कल भारत और पाकिस्तान के बीच का टकराव वैसे तो सम्पूर्ण विश्व के लिये चर्चा का विषय बना हुआ है किन्तु भारत और पाकिस्तान के लिये तो सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बन गया है । एक भारतीय होने की स्थिति मे हमे वर्तमान स्थिति की सूक्ष्म विवेचना करनी चाहिये। यही सोचकर मै इस विषय पर अपना मत व्यक्त कर रहा हॅॅू। पांच प्रश्न विचारणीय है-
1 क्या सर्जिकल स्ट्राइट हुई?
2 क्या विपक्ष के कुछ राजनेता गलत कर रहे है?
3 क्या भाजपा के लोगो द्वारा इस घटना का लाभ उठाने का प्रयत्न गलत है?
4 मुझे इस मामले मे सत्य और न्याय का पक्ष लेना चाहिये या राष्ट्र भावना का।
5 कश्मीर प्रकरण मे यदि पाकिस्तान गलत है तो किस तरह?
1. मै इस संबंध मे कुछ कहने की स्थिति मे नही हॅू क्योकि इस संबंध मे मै स्वयं तो कुछ जानता नही तथा बताने मे दोनांे ही देशो की सरकारे या जनता राष्ट्रवाद की भावना मे उबलने के कारण विश्वसनीय नहीं हैं। आजकल असत्य को सत्य के समान स्थापित करने के इतने साधन और झूठे साक्ष्य उपलब्ध है कि विश्वास पूर्वक कुछ कहना कठिन है। फिर भी मै एक भारतीय होने के नाते इस घटना को सत्य मानकर चल रहा हॅू।
2 भारतीय राजनीति का स्तर बहुत गिरा हुआ होने से विपक्ष के ऐसे रवैये को गलत नही कह सकते थे किन्तु सर्जिकल स्ट्राइक का मुददा राजनीति से उपर उठकर राष्ट्रीय स्तर ग्रहण कर लेने के कारण विपक्ष के कुछ लोगो का आचरण गलत दिखता है। यह प्रश्न सर्जिकल स्ट्राइक को सत्य या असत्य होने का न होकर भारत को होने वाले संभावित लाभ हानि से जुडा था। यदि सर्जिकल स्ट्राइक हुई तब भी कोई प्रश्न नही उठता और नही होने के बाद भी ऐसा गलत नही क्योंकि इस स्ट्राइक का बहुत आंदोलन बद्ध प्रचार किया गया और इसके लाभ संभव है। यदि भारत सरकार ने कश्मीर आंदोलन को कमजोर करने के उद्देश्य से यह प्रचार किया और सफलता मिली तो यह कदम प्रशँसनीय कहा जायेगा। यदि सरकार ने भविष्य मे कभी सीमा प्रशँसनीय उल्लंघन करने का मार्ग प्रशस्त करने तथा विश्व की प्रतिक्रिया जानने के उद्देश्य से ऐसा असत्य प्रचार किया तब भी यह कदम ठीक है। कुल मिलाकर सरकार ने राष्ट्रहित मे जो कुछ किया उसका आंख मूंदकर सम्पूर्ण विपक्ष को समर्थन करना चाहिये था और प्रारंभ मे तो सबने वैसा किया भी किन्तु दो तीन दिन बाद ही अरविन्द केजरीवाल संजय निरूपम दिग्विजय सिंह राहुल गांधी बनी बनाई खीर मे मक्खी के समान कूद पडे।
दिग्विजय सिंह का एक पक्षीय आतंकवाद प्रेम जगजाहिर है। उन्होने हमेशा ही नक्सलवाद का भी खुलकर समर्थन किया और मुस्लिम आतंकवाद का भी। दिग्विजय सिंह भारतीय आतंकवाद का समर्थन करते करते ओसामा जी तक आगे बढ गये थे। यह सब जानते है। संजय निरूपम कितने कांग्रेसी है और कितने कांग्रेस की जडो मे मठा डालने वाले यह भी कभी तय नही हो सका। निरूपम जी ने पिछले वर्ष ही कांग्रेस और पंडित नेहरू के विरूद्ध अपनी ही प्रत्रिका मे छपे लेख के कारण जो फजीहत कराई थी वह छिपी नही है। कांग्रेस पार्टी अपने गिरते ग्राफ के कारण ऐसी गंदी मंछलियो को भी बाहर करने से बचती रही है। जहां तक राहुल गांधी का प्रश्न है तो वे अब तक ट्रेनिंग काल मे ही है।वैसे तो राहुल गांधी ने कोई बहुत गलत नही कहा था। भाषा और शब्द चयन गलत था। समय भी उपयुक्त नही था। उनका कथन तो ऐसा था कि किसी सामूहिक यज्ञ की आग से कोई व्यक्ति अपने भोजन पकाना शुरू कर दे । किन्तु शब्द चयन गलत होने से भाजपा ने बात का बतंगड बना लिया और राहुल बदनाम हो गये। वैसे भी राहुल गांधी को राजनीति का प्रशिक्षण देना कांगं्रेस पार्टी और विशेष कर सोनिया जी के लिये घाटे का सौदा है। प्रवृत्ति से राहुल एक भला आदमी है । कूटनीति की समझ शून्य है। झूठ सफाई से बोलने की क्षमता नही है। राजनैतिक भाषण देते देते जोश का नाटक करने लगते है जो उनके लिये उल्टा पड जाता है। उनमे गांधी बनने की दिशा तो थी किन्तु उन्हे जबरदस्ती सिखा पढा कर नेहरू के समान चालाक बनाया जा रहा है, जो असंभव है। न तो राहुल चरित्रवान विचारक ही बन पायेंगे न ही चालाक राजनेता । उनका जीवन भी बर्बाद और कांग्रेस पाटी भी समाप्त
अरविन्द केजरीवाल की प्रतिक्रिया बहुत संतुलित और चालाकी भरी भाषा की थी। प्रारंभ मे तो उन्हे प्रशंसा मिली थी किन्तु दो बातो ने उनकी पोल खोल दी। पहली बात तो यह थी कि उन्होने सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा के तीन चार घंटे पूर्व ही लिखा था कि पाकिस्तान नीति के मामले मे सारे विश्व मे पाकिस्तान की तुलना मे भारत ज्यादा अलग थलग हो गया है। उनके बयान के कुछ घंटो बाद ही सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा ने अरविन्द के इस असत्य बयान को ढक दिया किन्तु उनके इस बयान से उनकी नीयत तो स्पष्ट होती ही है । दूसरी बात यह हुई कि पाकिस्तान ने अरविन्द केजरीवाल के इस बयान की इतनी अधिक प्रशंसा कर दी कि अरविन्द की पूरी पोल ही खुल गई। टीम अरविन्द ने बहुत ज्यादा कोशिश की किन्तु पाकिस्तान को तो डूबते को तिनके के सहारे के समान यह बयान मिल गया था। अतः पाकिस्तान ने अरविन्द का साथ छोडा नही और अरविन्द की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई।
वैसे तो उपरोक्त सभी नेता राजनीतिज्ञ है कोई विचारक नही । यदि विचारक होते तब बात अलग हो सकती थी किन्तु राजनीतिज्ञ होने के कारण उनके लिये राष्ट्र हित सर्वोच्च होता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रहित से हटकर कोई अन्य प्रतिक्रिया हमेशा नुकसान करती है और यही आज हो रहा है।
3 आदर्श राजनीति के अनुसार ऐसे मामले दलगत न होकर सर्वदलीय होने चाहिए किन्तु भारतीय राजनीति आदर्श रही ही कब है? सम्पूर्ण विपक्ष पाकिस्तान के मामले मे मोदी सरकार को कायर सिद्ध कर रहा था। छप्पन इंच का सीना सहित अनेक जुमलो को आधार बनाकर मोदी की आलोचना हो रही थी। यदि मोदी नवाज शरीफ से बात भी किये तो अधिकांश विपक्ष ने आलोचना की। मैने कभी नही सुना कि किसी ने भी कभी कठोर कदम न उठ पाने के लिये सेना की कोई आलोचना की हो। कही भी यदि कोई आतंकवादी हमला हुआ तो गालिया या तो मोदी सरकार को मिलती थी या भाजपा को । हर कोई तत्काल टकराव के लिये उतावला था। अब यदि सर्जिकल स्ट्राइक हुई तो उसका श्रेय मोदी सरकार और भाजपा क्यो नही ले सकती? जब सरकार कमजोरी दिखा रही थी तब यदि सेना की जगह सरकार को गालिया दी जा रही थी तो अब मजबूती दिखाने मे वह प्रशंसित हो तो आपके पेट मे दर्द क्यो ? क्या विपक्ष उस समय आदर्श राजनीति के मार्ग पर था जो आज वह सत्ता पक्ष से उम्मीद कर रहा है।
4.मैं एक विचारक हूूॅ, राजनेता नहीं। राजनेता राष्ट्र को सर्वोच्च मानता है और विचारक समाज को। स्वाभाविक है कि मैं राष्ट्र की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देता हॅू। निरुपम और अरविन्द केजरीवाल ने जो बात कहीं वे अनुचित थीं क्योंकि वे राष्ट्र सर्वोच्च की भावना के प्रति वचनबद्ध हैं। ऐसी ही बातें यदि अन्ना हजारें,प्रशान्तभूषण, मैं अथवा कोई अन्य तटस्थ व्यक्ति बोलता तो गुण दोष के आधार पर समीक्षा होती, गलत नहीं कही जाती क्योंकि ये अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही न्याय के लिये प्रतिबद्ध माने जा सकते हैं।
फिर भी मैं पाकिस्तान की तुलना में भारत का पक्ष बिना विचारे ठीक मानता हॅू भले ही किसी घटना विशेष में भारत गलत भी क्यों न हो। इसके कुछ कारण हैं- 1.पाकिस्तान की आबादी का बहुमत मुसलमानों का है जो संगठन को न्याय की तुलना में अधिक महत्व देते हैं दूसरी ओर भारत का बहुमत हिन्दुओं का है जो संगठन की तुलना में न्याय को ज्यादा महत्व देते हैं। 2. पाकिस्तान एक घोषित इस्लामिक राष्ट्र है जबकि भारत घोषित धर्मनिरपेक्ष । 3. पाकिस्तान अनिश्चित लोकतंत्र है। सेना का हस्तक्षेप और भय प्रशासन पर ज्यादा है जबकि भारत निश्चित लोकतंत्र है। यहॉ नागरिक प्रशासन पर सेना हावी नहीं रहती। 4. पाकिस्तान की नीतियॉ आतंकवादियों के दबाव में बनती है जबकि भारत उग्रवादियों तक से नहीं दबता,आतंकवादियों का तो कोई प्रश्न ही नही।
यह तो विचारणीय है कि कश्मीर पर जिस तरह भारत का दावा है, उस तरह पाकिस्तान का दावा नहीं हो सकता। क्योंकि न तो कश्मीर कभी पाकिस्तान का अंग रहा है, न कभी किसी रुप में कश्मीर का पाकिस्तान में विवादास्पद विलय भी हुआ है। सच्चाई यह है कि विवाद तो कश्मीर और भारत के बीच में हो सकता था जिसमें पाकिस्तान कोई पक्ष नहीं हो सकता। पता नहीं यु एन ओ ने पाकिस्तान को किस आधार पर पक्षकार बना लिया।
विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि यह निश्चित दिखता हो कि कोई व्यक्ति मजबूत होता है तो कभी न्याय की बात नहीं करता तो ऐसा व्यक्ति यदि कभी अन्याय मंे भी फंस जावे तो तटस्थों को ऐसे मामले में न्याय अन्याय की बात क्यों करनी चाहिये? न्याय अन्याय की बात दो समान प्रवृति वालों के बीच ही संभव है। गुंडे और शरीफ के बीच या तो शरीफ की सहायता की जायेगी या चुप रहा जायगा। चॅूकि मुसलमान और विशेष कर पाकिस्तान अपना विश्वास खो चुके हैं इसलिए मैं इस संबंध में स्पष्ट हॅू तथा मेरे विचार में अन्य लोगों की भी राय ऐसी ही है।
5. पाकिस्तान ने पूरे देश से अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भगा दिया। पाकिस्तान समर्थक कश्मीरी मुसलमानों ने कश्मीर से भी अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भगा दिया। कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमान ऐसे अमानवीय अत्याचार के समय भी चुप रहे। कश्मीर समस्या के न सुलझने का एक महत्वपूर्ण कारण पाकिस्तान की अस्पष्ट नीति है। एक ओर तो पाकिस्तान विश्व बिरादरी से कश्मीर के न्यायपूर्ण समाधान की भी बात करता है तो दूसरी ओर कश्मीर सहित पूरे भारत में आतंकवादी गतिविधियां भी चलाता रहता है। जब आप स्वयं ही लडकर कश्मीर लेने के लिये लगातार सत्तर वर्षांे से सक्रिय हैं तो विश्व विरादरी इस मामले में पहल क्यों करे। या तो आप विश्व बिरादरी पर ही पूरी तरह निर्भर हो जावें अथवा आप सब कुछ छोडकर टकराव का ही मार्ग पकड लें। तोड लें भारत से तब तक सारे संबंध जब तक कश्मीर का निपटारा न हो। कल्पना करिये कि शक्ति संतुलन यदि विपरीत होता अर्थात पाकिस्तान भारत के समान शक्तिशाली होता और भारत कमजोर तब क्या हाल रहता भारत का? इसलिए पाकिस्तान को कश्मीर में टकराव से पहले अपनी विश्वश्नियता बढानी होगी। पाकिस्तान की यह धमकी कितनी मूर्खतापूर्ण है कि यदि पश्चिम ने पाकिस्तान की अन्देखी की तो पाकिस्तान रुस,चीन की तरफ झुक जायगा।
मेरे विचार से पाकिस्तान को यह बात मान लेनी चाहिये थी कि नियंत्रण रेखा ही सीमा रेखा है। पाकिस्तान कभी भी भारत से इस कश्मीर को नही ले सकता। इसके विपरीत धीरे धीरे ऐसे लक्षण दिखने लगे हैं कि पी ओ के भी उसके हाथ से निकल सकता है। कहीं बलूचिस्तान पर भी आंच न आ जावे। पाकिस्तान को यह पता होना चाहिए कि अब भारत की नीतियॉ भारतीय मुसलमानों को प्रसन्न रखने की मजबूरी से प्रभावित न होकर राष्ट्रहित से प्रभावित होती है।

शक्ति प्रयोग के तीन सिद्धांत माने जाते हैं 1- जब आपके मौलिक अधिकार का उलंघन होता हो। 2- आपको न्याय मिलने का कोई अन्य मार्ग उपलब्ध न हो। 3- जब जीतने की पूरी संभावना दिखती हो। कश्मीर कभी पाकिस्तान का निर्णायक भाग नहीं रहा। वह एक स्वतंत्र देश था जिसने अपना विलय भारत के साथ किया। दूसरी बात यह है कि अब भी उसका मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में लंबित है किन्तु पाकिस्तान ने कभी संयुक्त राष्ट्र पर पूरा विश्वास नहीं किया। तीसरा यह कि वह युद्ध में भारत से कभी जीत नहीं सकता। शक्ति प्रयोग की तीनों शर्तो के पूरी होने के बाद ही शक्ति प्रयोग की बात सोचना उचित होता है किन्तु पाकिस्तान तीन में एक भी शर्त पूरी न करते हुए भी युद्ध के लिये मचलता है तो यह उसकी मूर्खता ही मानी जायेगी।

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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