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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मंथन क्रमांक-9 किसान आत्महत्या की समीक्षा

Posted By: admin on November 26, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »

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किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली गई अथवा किसी दुर्घटनावश परिणाम अप्रत्यशित हुए तभी व्यक्ति को असीमित दुख होता है। ऐसा व्यक्ति ही कभी कभी आत्महत्या कर लेता है। आत्महत्या करने वालों में सब प्रकार के लोग होते हैं। छात्र भी बडी संख्या में आत्महत्या करते हैं तो महिलाएॅ अथवा व्यापारी भी। कभी कभी तो राजा तक आत्महत्या करते पाये जाते हैं। यह अलग बात है कि किसानों की आत्महत्या कुछ अधिक प्रचारित हुई।
किसान तीन प्रकार हैं-
(1) जो अपनी भूमि में स्वयं खेती करते है।
(2) जो अपनी भूमि में मजदूरों से खेती कराते है।
(3)जो उन्नत तकनीक तथा कृत्रिम उर्जा के सहारे खेती करते है।
ऐसे उन्नत किसानों को ही फार्म हाउस वाला किसान कहा जाता है। जिन किसानों ने आत्महत्या की है उनमें फार्महाउस वाला उन्नत किसान लगभग नहीं है। जो किसान अपनी जमीन पर स्वयं खेती करता है और अपने उपयोग में लाता है,वह भी आत्महत्या नहीं करता। भारत में जिन लाखों किसानों ने आत्महत्या की है वे लगभग बीच वाले किसान थे जो छोटी जोत के मालिक थे और मजदूरों के माध्यम से खेती कराते रहे है । विचारणीय प्रश्न यह है कि किसी मजदूर ने आत्महत्या नहीं की। दूसरा विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि खेती घाटे का सौदा है तो देश में लगातार कृषि उत्पादन बढ रहा है। ये दोनों प्रश्न सही होते हुये भी यह प्रश्न सच है कि बडी मात्रा में बीच वाले किसान आत्महत्या कर रहे है। इसके कई कारण हैं -
(1) स्वतंत्रता के बाद श्रम का मूल्य बढा और कृषि उत्पादन का मूल्य घटा। भारत में स्वतंत्रता के बाद मुद्रा का अवमूल्यंन 91 गुना हुआ है। इसका अर्थ है कि यदि सन 47 में किसी वस्तु का मूल्य 1 रु था और आज 91 रु है तो वह समतुल्य है । यदि हम श्रममूल्य का आकलन करे तो वह वर्तमान में 91 की तुलना में लगभग 170 हो गया है। दूसरी ओर यदि हम अनाज के मूल्य का आकलन करें तो वह दालों को छोडकर लगभग 45 गुना ही बढा है। इसका अर्थ हुआ कि श्रम मूल्य की तुलना में कृषि उत्पादन का मूल्य एक चैथाई ही रह गया है। उपर से मंहगाई का झूठा हल्ला उस बेचारे उत्पादक को और भी अधिक परेशान किये रहता है। वैसे भी हम देख सकते है कि यदि स्वतंत्रता के समय एक मजदूर को एक दिन का डेढ़ किलो अनाज देते थे तो आज 8 किलो दे रहे है । इसमें कुछ बढ़ती हुई विकास दर का भी योगदान है किन्तु किसान पूर्व की तुलना में चार गुना अधिक अनाज श्रमिक को देता है। साधारण किसान किसी तरह सामान्य रुप से तो अपना खर्च चलाता है किन्तु आकस्मिक विपत्ति के समय उसका धैर्य टूट जाता है और वह भावनाओं में बहकर आत्महत्या कर लेता है।
(2) किसान के उत्पादन का मूल्य बढ नहीं पाता क्योंकि अपेक्षाकृत सस्ती कृत्रिम उर्जा और तकनीक से खेती करने वालो के साथ वह बीच वाला किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता। उन्नत तकनीक से उत्पादित कृषि उत्पादन सम्पूर्ण कृषि उत्पादन का मूल्य बढने ही नहीं देता। साथ ही राजनैतिक व्यवस्था पर उपभोक्ताओं का प्रभाव अधिक रहता है और वे बाजार तथा राजनीति पर पूरी तरह हावी रहते है तो उपभोक्ता किसी भी रुप में किसी उत्पादन का मूल्य संतुलित होने ही नहीं देते। भले ही उत्पादक आत्महत्या ही क्यों न कर ले।
(3) किसानों का भावनात्मक रुप से जमीन के साथ मोह पैदा कर दिया जाता है जिससे किसान अपनी जमीन बेचकर या खाली छोडकर किसी अन्य दिशा में नहीं जा पाता। सामाजिक तथा राजनैतिक वातावरण किसानों की झूठी प्रशंसा करके उन्हें जमीन के साथ जोडे रखना चाहता है। यदाकदा राजनैतिक व्यवस्था भीख के बतौर कुछ सुविधायें देकर भी ऐसे मजबूर किसानों को खेती के प्रति लगाव बनाये रखती है। इस तरह तीन ऐसे कारण है जो किसानों की आत्महत्या के कारण के लिए माने जाते है। स्पष्ट है कि अन्य लोगों की आत्महत्याएॅ भले ही भावनात्मक कारणों से होती हों किन्तु किसानों की आत्महत्या में कोई भावनात्मक कारण न होकर मजदूरी ही एकमात्र कारण होती है।
यदि हम समाधान पर विचार करें तो समाधान भी साधारण बात नहीं है। कृषि उत्पादन का मूल्य बढा दिया जाये तब बडे किसान ही बहुत ज्यादा लाभान्वित होंगे। यदि खाद, बीज, बिजली, पानी सस्ता कर दिया जाये तब भी बडे किसान ही लाभान्वित होंगे। इन आत्महत्या करने वालों के हिस्से में कुछ नहीं आयेगा। श्रम का मूल्य कम नहीे किया जा सकता क्योंकि श्रम बुद्धि और धन की तुलना में बहुत ज्यादा असमानता हो गई है और श्रम का मूल्य और अधिक बढना चाहिए। किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए श्रममूल्य वृद्धि को नहीं रोका जा सकता। मैं स्पष्ट कर दॅू कि वर्तमान समय में किसान आत्महत्या के नाम पर जो भी किसान आन्दोलन हो रहे है वे बडे किसानों के नेतृत्व में हो रहे है। ये किसान खाद, बिजली, पानी का मूल्य घटाने की बात करते है। ये किसान श्रममूल्य वृद्धि के भी विरुद्ध वातावरण बनाते है किन्तु ये बडे किसान खेती की दुर्दशा के मूल कारण को नहीं खोज पाते।
मैंने राष्ट्रीय और सामाजिक भावनाओं में बहकर व्यापार छोड दिया और जनहित में खेती का व्यापार करने लगा। 30 वर्षो तक पूरा पूरा परिश्रम करने के बाद भी मेरी स्थिति इतनी खराब हुई कि मेरे समक्ष आत्महत्या के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। मैंने सन 95 में हार मानकर खेती छोड दी। मैं स्पष्ट कर दॅॅू कि खेती छोडकर मेरे परिवार ने बहुत अच्छा किया। मुझे पूूरा अनुभव है कि खेती घाटे का व्यवसाय है यदि उन्नत तकनीक से न किया जाये तो। इसका अर्थ हुआ कि जिस तरह सम्पूर्ण भारत में लघु उद्योग मरणासन्न है,छोटे व्यापारी परेशान है, छोटे उद्योगपति परेशान है उसी तरह आज छोेटे किसान भी आत्महत्या कर रहे है क्योंकि सम्पूर्ण भारत में सब प्रकार के कार्यो का केन्द्रियकरण हो रहा है और इस केन्द्रियकरण की चपेट में छोटे किसान भी है। इसका अर्थ हुआ कि समस्या कही और है और समाधान कही और । किसानों की आत्महत्या रोकने का एक ही इमानदार समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा का मूल्य इतना अधिक बढा दिया जाये कि उन्नत किसान मध्यम किसान और छोटे किसान एक दूसरे के साथ खुली प्रतिस्पर्धा कर सके या कम से कम इतना अवश्य हो कि तकनीक तकनीक वंचित का तथा श्रम का शोषण न कर सके। मैं जानता हॅू कि इस मूल्यवृद्धि का आयात निर्यात पर दुष्प्रभाव हो सकता है किन्तु उसका समाधान कठिन नहीं । कितने दुख की बात है कि स्वतंत्रता के बाद से लेकर सन 2010 तक लगभग सभी कृषि उत्पादनों पर टैक्स वसूला जाता था और वह टैक्स वसूल कर उपभोक्ताओं को सस्ता अनाज बांटने में खर्च किया जाता था। कुछ कृषि उत्पादों पर तो आज तक टैक्स माफ नहीं हुआ है।
हमारी राजनैतिक व्यवस्था गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, छोटे किसान के विषय में भाषण तो बहुत देती है किन्तु इन चारों के उत्पादनों और उपभोग की वस्तुओं पर भारी कर लगाकर शिक्षा , स्वास्थ ,सस्ता आवागमन आदि पर खर्च करती है। यदि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में छोटा किसान आत्महत्या करता है तो विचार करिये कि दोष किसान का है या समाज का है या हमारी राजनैतिक व्यवस्था का?ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट करके शहरी अर्थव्यवस्था का प्रोत्साहन इससे अतिरिक्त अन्य कोई परिणाम नहीं दे सकता। मैं चाहता हॅू कि किसान आत्महत्या पर गंभीरता से विचार करके इसका समाधान खोजा जाना चाहिए।

मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान।

Posted By: admin on November 19, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »

भारत में कुल समस्याएॅ 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य।
1 वास्तविक समस्याएॅ वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याएॅ 5 प्रकार ही मानी जाती है- 1 चोरी, डकैती और लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट और कमतौलना 4 जालसाजी धोखाधडी 5 बलप्रयोग हिंसा आतंकवाद। ये 5 प्रकार की समस्याएॅ भारत में स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ रही हैं सरकारे चाहे किसी की भी बनी हो। क्योंकि राज्य इन समस्याओं के समाधान में आवश्यकता से बहुत कम सक्रिय है।

2 कृत्रिम समस्याएॅ मुख्य रुप से 6 प्रकार की मानी जाती हैं- 1 चरित्र पतन 2 भ्रष्टाचार 3 जातीय कटुता 4 साम्प्रदायिकता 5 आर्थिक असमानता वृद्धि 6 श्रम,बुद्धि और धन के बीच बढती दूरी अर्थात श्रम शोषण। इन 6 समस्याओं के अतिरिक्त महिला उत्पीडन, वन अपराध असमानता, विदेशी कम्पनियों का संकट, वेश्यावृत्ति ब्लैक, तस्करी, जुआ, शराब, अफीम आदि भी ऐसी समस्याएॅ है जो या तो कृत्रिम है अथवा राज्य ने अनावश्यक अपने हाथ में लेकर इनको बढावा दिया है। ये समस्याएॅ भी स्वतंत्रता के बाद लगातार इसलिए बढती गई है क्योंकि राज्य ने इन समस्याओं के समाधान में अनावश्यक अथवा आवश्यकता से अधिक सक्रियता दिखाई। अप्रत्यक्ष रुप से कहा जा सकता है कि ये समस्याएॅ राज्य अपनी गल्तियों को छिपाने के लिए योजनापूर्वक बढाता है।

3 प्राकृतिक इसमें बाढ, भूकम्प, बीमारियॉ, तूफान, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि शामिल हैं। ये समस्याएॅ स्वतंत्रता के बाद कुछ घटी हैं।

4 भूमण्डलीय इसमें पर्यावरण प्रदूषण, आबादी वृद्धि, जल संकट, मानव स्वभाव तापवृद्धि, मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि, उग्रराष्ट्रवाद आदि शामिल है। ये समस्याएॅ भी पूरे विश्व की तरह ही भारत में भी लगातार बढ रही हैं क्योंकि भारत में इनके समाधान के लिए कोई मौलिक चिन्तन का अभाव है तथा भारत इन मामलों में दुनिया के अन्य देशो की अंध नकल करता रहता है।

5 भ्रम या असत्य समस्याएॅ अनेक हैं जैसे मंहगाई, शिक्षत बेरोजगारी, बढती गरीबी दहेज, मुद्रास्फीति का दुष्प्रभाव, अशिक्षा , बालश्रम, वेश्यावृत्ति, तस्करी, ब्लैकमेल आदि शामिल हैं। इनमें से कुछ समस्याएॅ तो बिल्कुल ही अस्तित्वहीन है और उन्हें समाज में भ्रम फैलाने के लिए प्रचारित किया गया है। इन समस्याओं को राज्य इसलिए स्थापित करता है जिससे समाज का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटकर इन समस्याओं के समाधान में लग जाये।
वास्तविक समस्याओं का समाधान करना राज्य का दायित्व होता है और इसलिए प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार होना चाहिए था कि पहली प्राथमिकता वास्तविक तथा उसी क्रम से चौथी प्राथमिकता भुमण्डलीय समस्याओं के समाधान के लिए होनी चाहिए थी। भ्रमपूर्ण समस्याओं से तो राज्य को बिल्कूल विपरीत हो जाना चाहिए था किन्तु स्वतंत्रता के बाद लगातार देखा जा रहा है कि प्राथमिकताओं के क्रम में वास्तविक समस्याएॅ पाचवे नम्बर पर है और भ्रमपूर्ण समस्याएॅ पहले नम्बर पर। विचित्र बात है कि जिन समस्याओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है ऐसी समस्याओं के समाधान का प्रयत्न लगातार क्यों हो रहा है? महंगाई नाम की कोई समस्या सम्पूर्ण भारत में न कभी थी, न है। किन्तु पिछले 70 वर्षो से समाज में ऐसा असत्य प्रचार हुआ कि भारत का प्रत्येेक नागरिक महंगाई के भ्रम से परेशान है।
पिछले दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी जी की सरकार बनी है। उसके पूर्व की सरकारे लगातार साम्यवाद के पूर्णतः या आंशिक प्रभाव में थी। साम्यवाद का प्रभाव सभी समस्याओं के विस्तार का जनक माना जाता है। पश्चिम की अंध नकल भी समाधान में बाधक होती है। भारत ने या तो साम्यवाद की नकल की या पश्चिम की। दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे भारतीय विचारधारा तथा पश्चिम की विचारधारा के बीच सामंजस्य स्थापित करके सुधार का प्रयास कर रही है। चोरी, डकैती, लूट, जालसाजी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता पर कुछ नियंत्रण हुआ है। नक्सलवाद अथवा कश्मीर का आतंकवाद धीरे धीरे समाप्त हो रहा है। किन्तु बलात्कार, श्रम शोषण और मिलावट पर अभी कोई परिणाम नहीं दिखा है। इसी तरह साम्प्रदायिकता पर भी पर्याप्त सुधार हुआ है। मुस्लिम साम्प्रदायिकता तो रुकी ही है किन्तु संघ परिवार की साम्प्रदायिकता भी संकट के घेरे में आती जा रही है। जातिवाद,महिला उत्पीडन जैसी कृत्रिम समस्याओं पर अभी काम नहीं हुआ है अथवा मोदी सरकार अभी इस पर कुछ समझ नहीेें पा रही है।
सबसे बडी समस्या वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष को बढाकर वर्ग संघर्ष की दिशा में रही है। इसका वास्तविक समाधान तो वर्ग समन्वय से ही संभव था किन्तु इसके ठीक विपरीत पिछली सरकारों ने वर्ग समन्वय को कमजोर करके वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेश को लगातार बढाया। ये आधार है धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र, लिंग, गरीब अमीर, किसान मजदूर, शहर ग्रामीण आदि। इनमें मोदी जी ने भाषा के मामले में पहल करके करीब करीब ठीक दिशा पकड ली हैं। समान नागरिक संहिता की आवाज बुलंद करके साम्प्रदायिकता, जाति भेद, लिंग भेद, पर भी नकेल कसने की तैयारी है। अन्य मामलों में भी नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे कदम उठा रही है। जिस तरह 67 वर्षो तक समस्याएॅ बढी या बढायी गई और उनका जितना बडा भण्डार इक्कठा हो गया है। उन पर नियंत्रण करना कोई साधारण काम नहीं । उन परिस्थितियों में तो यह काम और भी कठिन हो जाता है जब जे एन यू से पढे हुये छात्र निकल कर न्यायपालिका और कार्यपालिका के महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हो तथा समाधानकर्ता की यह मजबूरी हो कि उसे इन सबको साथ लेकर ही आगे बढना होगा। आप कल्पना कर सकते हैं कि कार्य कितना कठिन है फिर भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की भारत सरकार धीरे धीरे एक एक समस्या को हल करने की दिशा में निरंतर बढ रही है।
फिर भी अभी मोदी जी के लिए अनेक काम करने बाकी है जिनकी अभी शुरुवात भी नहीं हुई है। कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि की दिशा में अब तक कोई कदम नहीं बढाया गया है जबकि श्रम शोषण, आर्थिक असमानता, पर्यावरण प्रदूषण सहित सब प्रकार की आर्थिक समस्याओं के समाधान में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
समान नागरिक संहिता और समान आचार संहिता के बीच का अंतर या तो मोदी जी अब तक स्वयं नहीं समझ पाये है अथवा वे प्रतिक्षा कर रहे हैं। इसी तरह अपराध गैरकानूनी और असामाजिक समस्याओं के वर्गीकरण की दिशा में भी कोई प्रयत्न नहीं दिख रहा है। मैं मानता हॅू कि भारत में विचार मंथन का अभाव इसके लिए सर्वाधिक दोषी है। हम सारा दोष सरकार पर ही नहीं डाल सकते। विचार मंथन ही सरकार को नई दिशा दे सकता है। हमें पूरा प्रयत्न करके अन्य उन मुददों पर सरकार को सलाह देनी चाहिए जिनके विषय में अब तक सरकार ठीक दिशा में नहीं सोच पा रही है।
मैं आश्वस्त हॅू कि नरेन्द्र मोदी के आने के बाद भारत की समस्याओं के समाधान की गति ठीक दिशा में और ठीक गति से आगे बढ रही है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस गति को और बढाने में सहायक हो । हम निरंतर विचार मंथन को प्रोत्साहित करें,जनमत जागृत करें,सरकार को उचित सलाह भी दें तथा सरकार के सही कार्यो का पूरा पूरा समर्थन भी करें तभी इतनी पुरानी जड पकड चुकी समस्याओं का समाधान संभव हैं।
नोट- मंथन क्रमांक 9 का विषय होगा-किसान आत्महत्या की एक समीक्षा

मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा

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स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक से बढकर एक त्यागी ,तपस्वी लोग शामिल रहे, किन्तु तीनों संगठनों का कुछ मामलों में तालमेल नहीं हो सका। आर्य समाज मुख्य रुप से सामाजिक समस्याओं पर अधिक केन्द्रित रहा। आर्य समाज भावनाओं की अपेक्षा विचारों पर अधिक बल देता था। आर्यसमाज परिस्थिति अनुसार अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन भी करता था। यही कारण था कि आर्य समाज ने स्वतंत्रता संघर्ष में सामाजिक कार्यो की अपेक्षा गुलामी से मुक्ति आन्दोलन में अधिक बढ़ चढकर हिस्सा लिया। आर्य समाज के बहुत से लोग गॉधी के मार्ग से भी जुडे रहे, तो दूसरी ओर बहुत से लोग गॉधी मार्ग से ठीक विपरीत क्रांतिकारियों के साथ भी जुडे रहे। मार्ग भले ही भिन्न भिन्न हो किन्तु लक्ष्य दोनों का स्वतंत्रता में सहयोग था। हेडगेवार जी तथा उनके द्वारा स्थापित संघ हिन्दू सुरक्षा तक सीमित था। संघ के लोग इस्लाम को हिन्दू धर्म के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानते थे और यह भी सच था कि मुसलमान राजाओं का इतिहास ऐसा ही कलंकित रहा है। मुसलमानों की अपेक्षा संघ परिवार अंग्रेजी शासन को कम खराब मानता था और इसलिए संघ परिवार की एकमात्र सम्पूर्ण शक्ति इस्लाम के विरुद्ध हिन्दू संगठन तक केन्द्रित रही। महात्मा गॉधी राष्ट्रीय गुलामी को सर्वाधिक खतरनाक मानते थे। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संघर्ष में महात्मा गॉधी अहिंसक मार्ग पर चलने के लिए दृढ थे, तो क्रांतिकारी अहिंसक मार्ग को असफल मानते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं था। महात्मा गॉधी तथा क्रातिकारी इस्लाम की अपेक्षा गुलामी को पहला शत्रु मानते थे , तो संघ परिवार इस्लाम को पहला शत्रु मानता था। आर्य समाज भी इस्लाम को पहला शत्रु मानना बंद करके गुलामी को पहला शत्रु मानने लगा था। यही कारण है कि आर्य समाज प्रारंभ में इस्लाम के पूरी तरह विरुद्ध होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष के समय उस विरोध को प्राथमिकता नहीं दे रहा था। यही कारण था कि गॉधी पूरी तरह हिन्दू धर्म के पक्षधर होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष में इस्लाम को साथ लेकर चलना चाहते थे और संघ परिवार स्वतंत्रता भले ही देर से मिले या न भी मिले किन्तु वह इस्लाम से किसी भी प्रकार के समझौते के विरुद्ध था। यही कारण है कि संघ के इक्कादुक्का लोगों को छोडकर अन्य किसी कार्यकर्ता की स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही। बल्कि कहीं कहीं इस संघर्ष को विवादास्पद बनाने में भी सक्रियता देखी जा सकती है।
स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने यह मान लिया कि उसका काम पूरा हो गया और उसे अब पुनः अपने समाज सुधार के कार्य में लग जाना चाहिए और उसने पूरी तरह राजनीति से किनारा कर लिया। इसके ठीक विपरीत स्वतंत्रता के पूर्व संघ एक सांस्कृतिक संगठन तक सीमित था, किन्तु स्वतंत्रता मिलते ही वह पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गया। स्वाभाविक था कि अधिकांश मुसलमान भारत के हिन्दुओं में अपना विश्वास खो चुके थे तथा संघ के लिए यह अच्छा अवसर था। यह अलग बात है कि संघ विचारों से प्रभावित कुछ अतिवादी हिन्दुओं ने गॉधी हत्या जैसा भावनात्मक और मूखर्तापूर्ण कृत्य करके उसका खेल बिगाड दिया। गॉधी हत्या के बाद सर्वोदय दो भागों में विभाजित हो गया। गॉधी को मानने वालो का एक भाग राजनीति के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन में लग गया जो बाद में अपनी अवस्था परिवर्तन में बदल गया, तो दूसरा सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन तक सीमित हो गया।
दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी माने जाते है, तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ और भावना प्रधान। सर्वोदय भी लगभग शरीफ नासमझ और भावनाप्रधान ही माना जाता है। किन्तु गॉधी हत्या ने सर्वोदय के मन में इतनी कटुता भर दी कि साम्यवादी और मुस्लिम संगठनों को सर्वोदय का साथ लेने में सुविधा हो गई। यदि हम सर्वोदय परिवार और संघ परिवार की तुलना करें तो दोनों में अनेक समानताओं के बाद भी दोनों में काफी असमानताएँ हैं। संघ एक संगठन का स्वरूप है जिसके नेता निर्णय करते हैं और कार्यकर्ता तदनुसार आचरण करते हैं। जबकि सर्वोदय का प्रत्येक कार्यकर्ता ही स्वयं में एक नेता है इसमें न तो एक नेतृत्व है, न ही प्रतिबद्ध अनुकरण कर्ता। संघ में पूरी तरह अनुशासन है तो संर्वोदय में पूरी तरह स्वशासन। संघ का एक स्पष्ट लक्ष्य है हिन्दू तुष्टीकरण के माध्यम से भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करना। सर्वोदय दिशाहीन है। उसका कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं। कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तो कभी स्वदेशी का नारा। कभी ग्राम स्वराज्य तो कभी साम्प्रदायिकता उन्मूलन। एक वर्ष के लिये भी इनके लक्ष्य टिकाऊ या स्पष्ट नहीं होते। संघ मुस्लिम संगठनों की क्रिया के विरूद्ध तीव्र योजनाबद्ध तथा परिणाम मूलक प्रतिक्रिया करता है। सर्वोदय संघ की प्रतिक्रिया के विरूद्ध लचर अविचारित तथा शक्ति प्रदर्शन के लिये प्रतिक्रिया करता हैं। संघ अन्य संगठनों का उपयोग करना जानता है जबकि सर्वोदय किसी संगठन का उपयोग नहीं कर सकता भले ही उसी का कोई उपयोग कर ले। संघ नेतृत्व पूरी तरह सतर्क सक्रिय और चालाक है। सर्वोदय नेतृत्व सक्रिय तो है किन्तु ढीला ढाला तथा शरीफ प्रवृति का है। संघ का उद्देश्य सत्ता प्रधान है, और परिणाम सफलता है जबकि सर्वोदय का उद्देश्य जनहित का है किन्तु परिणाम शून्य है।
मैंने दोनों संगठनों को निकट से देखा है। सर्वोदय की प्रत्येक चर्चा में गांधी हत्या की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सर्वोदय गांधी हत्या के लिए तो संघ को अक्षम्य दोषी मानता है किन्तु भारत विभाजन में मुसलमानों की भूमिका अथवा सम्पूर्ण विश्व में अन्य धर्मावलम्बियों से निरंतर टकराव में मुसलमानों की भूमिका को भूल जाने योग्य दोष से अधिक नहीं मानता। संघ प्रत्यक्ष रुप से बलप्रयोग का समर्थक है। उसकी कथनी करनी में फर्क नहीं। सर्वोदय प्रत्यक्ष रुप से अहिंसा की बात करता है किन्तु परोक्ष रुप से नक्सलवाद मुस्लिम आतंकवाद तक का समर्थन करता है। कथनी और करनी में आसमान जमीन का फर्क है।
मेरे विचार में सर्वोदय भटक रहा है। सन पचहत्तर में सर्वोदय ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरूद्ध एक निर्णायक पहल की। किन्तु सर्वोदय से भूल हुई कि उसने उक्त पहल करने में संघ तथा साम्यवादियों को मिलाकर एक मंच बना दिया। संघ और साम्यवादी उतने ही कटृर होते है जितने कि मुसलमान। ये व्यक्ति के रूप में तो कहीं भी रह सकते हैं किन्तु दल के रूप में ये पूरी तरह सतर्क और सक्रिय रहते हैं। सर्वोदय ने तानाशाही के विरूद्ध ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया किन्तु देश में कोई निर्णायक परिर्वतन नहीं आ सका। अब तो सर्वोदय लगभग चर्चा से भी बाहर हो रहा है। इस समापन काल मंे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि सर्वोदय में ही सम्पत्ति और सत्ता की छीनाझपटी शुरु हो गई है। साम्यवाद के लगभग पतन और कांग्रेस के कमजोर होने के बाद सर्वोदय के सामने कोई अन्य मार्ग नहीं दिख रहा है जबकि संघ परिवार लगातार सशक्त हो रहा है तथा मुसलमानों की बढती अविश्वसनीयता संघ परिवार को और शक्ति प्रदान कर रही है। आर्य समाज की एक स्पष्ट दिषा रही है किन्तु अग्निवेश द्वारा साम्यवाद के समर्थन से आर्य समाज को भी कमजोर करने में बहुत सफलता मिली। यहॉ तक कि साम्यवाद कांग्रेस तथा कुछ विश्व स्तरीय संगठनों के समर्थन से अग्निवेश जैसे चालाक व्यक्ति आर्य संस्कारों के विरुद्ध होते हुए भी आर्य समाज के प्रधान बन बैठे थे।
पिछले दो वर्षो से स्थितियॉ बदली है वर्तमान समय में अधिकांश भावना प्रधान लोगो से भारतीय राजनीति का पिण्ड छूट गया है। तीनों संगठन अर्थात् सर्वोदय, आर्य समाज और संघ, मोदी के सामने समझदारी में बौने सिद्ध हो रहे है। साम्यवाद तो स्वयं ही समाप्त हो रहा था । आर्य समाज का आंशिक स्वरुप परिवर्तन होकर कुछ गायत्री परिवार, कुछ बाबा रामदेव के रुप में बिखर गया। संघ परिवार लगातार शक्तिशाली हो रहा है। स्पष्ट दिखता है कि परिवारवाद मुस्लिम साम्प्रदायिकता तथा आर्थिक कमजोरी से निपटते ही नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिकता से निपटने की पहल करेंगे। हो सकता है कि इस पहल की शुरुवात 2019 के आम चुनाव के बाद ही हो। किन्तु मुझे साफ दिखता है कि यह कार्य होगा अवश्य और ऐसी पहल का मुख्य निशाना संघ परिवार के वे बडबोले लोग और वह ना समझ विचार होगा जिन्हें न हिन्दुत्व का ज्ञान है, न समाज की चिंता है, न विश्वसनीयता की चिंता है बल्कि उन्हें तो अपने मुर्खतापूर्ण विचारों को टी बी और अखबारों में प्रसारित होने देने की तक चिंता है। मैं भारत में संगठनात्मक हिन्दुत्व की तुलना में गुणात्मक हिन्दुत्व के होने का पक्षधर रहा हॅू। मैं उम्मीद करता हॅू कि आर्य समाज तथा सर्वोदय भी वैचारिक तथा गुणात्मक हिन्दुत्व के समर्थन में अपनी पुरानी गलतियों की समीक्षा करेंगे।

न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान

Posted By: admin on November 13, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्र प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक न्याय की सुरक्षा की गारण्टी देता है। इसलिये व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार की सुरक्षा तंत्र का दायित्व होता हैं। संवैधानिक न्याय तंत्र स्वेच्छा से व्यक्ति या व्यक्ति समूह को दे सकता है। संवैधानिक अधिकार देना तंत्र का कर्तव्य होता है,दायित्व नहीं। सामाजिक न्याय सिर्फ समाज का ही कर्तव्य होता है। सामाजिक मामलों में तंत्र की भूमिका शून्य होती है। न उसका दायित्व होता है न ही कर्तव्य। तंत्र सामाजिक मामलों में समाज की सहायता मात्र कर सकता है किन्तु हस्तक्षेप नहीं कर सकता। स्वतंत्रता के समय हमारे संविधान बनाने वालों को दायित्व, कर्तव्य, प्राकृतिक संवैधानिक सामाजिक न्याय आदि का पर्याप्त अनुभव नहीं रहा होगा इसलिये वे इन सबको साफ साफ अलग नहीं कर सके। दूसरी बात यह भी है कि उन लोगों ने भारतीय चिन्तन की मौलिक सोच को किनारे करके विदेशी संविधानों की नकल की। तीसरी बात यह भी रही है कि हमारे संविधान बनाने वालों की नीयत साफ नहीं थी। यही कारण रहा कि उन्होंने लोक को अवयस्क घोषित करके तंत्र को कस्टोडियन अर्थात् संरक्षक घोषित कर दिया। स्वाभाविक है कि वयस्क होने के लिये संरक्षित के सभी सामाजिक तथा संवैधानिक अधिकार संरक्षक के पास ही होते हैं जो वयस्क होने के बाद मिल जाते हैं।
लोकतंत्र में तंत्र तीन समकक्ष इकाइयों को मिलाकर बनता है। ये तीनों इकाईयाॅ किसी संविधान से संचालित होती हैं। वे इकाइयाॅ हैं- 1 विधायिका 2 न्यायपालिका 3 कार्यपालिका। तीनों इकाइयां अपने अपने दायित्व पूरे करने के लिये स्वतंत्र होती हैं। साथ ही वे दूसरी इकाइयों के लिये सहायक की भूमिका में भी होती हैं तथा नियंत्रक की भूमिका में भी। इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई इकाई कभी पिछड रही होती है तो अन्य दो इकाइयां उसकी पूरक का काम करती हैं तथा यदि कोई इकाई कभी अपनी सीमाएॅ तोडकर उच्श्रृंखलता की दिशा में बढती हैं तब अन्य दो इकाइयां उस पर लगाम लगाने का भी काम करती हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने भूलवश या जानबूझकर संविधान संशोधन तक के असीम अधिकार संसद को दे दिये। इस अधिकार के कारण तीनों इकाइयों में शक्ति संतुलन असंतुलित हो गया। इस अधिकार का अनैतिक दुरुपयोग करते हुए हमारी विधायिका ने संविधान बनने के एक वर्ष बाद ही लगातार न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के अधिकारों में कटौती करनी शुरु कर दी। यहाॅ तक कि अप्रत्यक्ष रुप से न्यायपालिका तथा कार्यपालिका विधायिका की गुलाम सरीखी हो गई। सन तिहत्तर में न्यायपालिका ने थोडी हिम्मत करके केशवानन्द भारती प्रकरण के माध्यम से विधायिका की तानाशाही पर रोक लगानी चाही। किन्तु उसे कार्यपालिका अर्थात राष्ट्रपति का पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। परिणाम स्वरुप सन पचहत्तर के आपातकाल न भारत में सम्पूर्ण तानाशाही ला दी। आपातकाल के बाद लोक ने हस्तक्षेप किया और तंत्र के तीनों अंगो को तानाशाही की कैद से मुक्त कराया।
आपातकाल के बाद मिली जुली सरकारों का युग आया। न्यायपालिका धीरे धीरे मजबूत होने लगी। अटल जी की सरकार आते तक न्यायपालिका लगभग विधायिका के बराबर ही एक दूसरे की पूरक और नियंत्रक के रुप में आ चुकी थी। यद्यपि दोनों ही सन पचास से ही कार्यपालिका को दबाकर रखे जो आज भी जारी है। आज भी न्यायपालिका के छोटे से छोटे जज तथा विधायिका के छोटे से छोटे सांसद विधायक और कभी कभी तो उनके चमचे तक बडे बडे सरकारी अधिकारी या पुलिस वाले की अपनी सीमा में जो दुर्गति करते हैं वह किसी से छिपा नहीं हैं। अटल जी के बाद जब मनमोहन सिंह सरीखे शरीफ और लोकतंत्र की दिशा में सर्वाधिक सक्रिय व्यक्ति प्रधानमंत्री बने तो न्यायपालिका अधिक सशक्त होने लगी। यह सक्रियता यदि न्यायिक प्रक्रिया की दिशा में होती तब तो वह सक्रियता तंत्र सहायक होती किन्तु न्यायपालिका की यह सक्रियता विधायिका की तुलना में न्यायिक सर्वोच्चता स्थापित करने की छीना झपटी की ओर बढी और ऐसी सक्रियता घातक सिद्ध हुई।
न्यायपालिका का दायित्व होता है प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा। यह सुरक्षा प्रत्येक व्यक्ति के लिये किसी अन्य व्यक्ति,व्यक्ति समूह,समाज या राज्य सहित सभी इकाईयो से आवश्यक होती है। किसी अन्य इकाई से तो सुरक्षा संविधान करता है किन्तु यदि संविधान ही अतिक्रमण करने लगे तब समस्या पैदा होती है। ऐसी स्थिति में संविधान की कोई धारा ऐसी स्वतंत्रता का अतिक्रमण करती है तो न्यायपालिका ऐसे संविधान संशोधन को रदद भी कर सकती है। इस दायित्व के साथ साथ न्यायपालिका को कुछ संवैधानिक अधिकार भी दिये गये हैं। न्यायपालिका संविधान विरुद्ध कानून, कानून विरुद्ध आदेश और आदेश विरुद्ध क्रिया को भी रदद कर सकती है। न्यायपालिका सीमा के बाहर किये गये ऐसे संविधान संशोधन,कानून,आदेश और क्रिया को रोक तो सकती है किन्तु कोई नई व्यवस्था नहीं दे सकती। न्यायपालिका को कहीं से यह अधिकार नहीं कि वह किसी संविधान, कानून, आदेश या क्रिया के लिये कोई आदेश दे सके या संशोधित कर सके। न्यायपालिका जब अति सक्रियता की ओर बढी तो वह अपनी सीमाएॅ भूल गई और वह न्यायिक आदेशो की अपेक्षा प्रशासनिक तथा विधायी आदेश देने लगी। न्यायपालिका ने जनहित याचिकाएॅ सुनने का असंवैधानिक आदेश देकर बदनाम और उच्श्रृंखल विधायिका के घोडे को जब लगाम लगाई तो लोक ने न्यायपालिका की भरपूर प्रशंसा और उत्साह वर्धन किया। न्यायपालिका ने जब कालेजियम सिस्टम बनाने,जैसा भी अधिकार विहीन आदेश दिया तब भी न्यायपालिका की कोई आलोचना नहीं हुई किन्तु धीरे धीरे न्यायपालिका को प्रशंसा में मजा आने लगा और विधायिका या कार्यपालिका को नीचा दिखाना उसकी आदत सी बन गई। मनमोहन सिंह के पूर्व तक हर राजनेता डंके की चोट पर संसद सर्वोच्च की बात कहता था और तर्क देता था कि तंत्र की तीन इकाइयों में एक मात्र वही अकेली इकाई है जो सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है तो मनमोहन सिंह के आने के बाद हर अधिवक्ता या न्यायिक प्रक्रिया से जुडा चपरासी भी डंके की चोट पर न्यायपालिका सवोच्च की बात इस तर्क के साथ कहता है कि न्यायपालिका को संविधान सहित हर मामले में समीक्षा का अंतिम अधिकार है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक न्यायपालिका का मनोबल लगातार बढता रहा। न्यायपलिका ने न कभी प्रधानमंत्री की परवाह की, न राष्ट्रपति की। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में न्यायपालिका ने बहुत अशोभनीय तरीके से प्रधानमंत्री के निर्णय के लिये तथा फांसी की सजा के लिये राष्ट्रपति के निर्णय के लिये भी एक समय सीमा तय कर दी। लेकिन न्यायपालिका यह भूल गई कि उसने अपने निर्णय के लिये आज तक कोई समय सीमा नहीं बनाई है। फांसी की सजा प्राप्त व्यक्ति यदि उस सीमा से अधिक समय तक राष्ट्रपति की दया याचिका के निर्णय के अभाव में जेल में बन्द रहा तो न्यायपालिका ने ऐसे कार्य को उस व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना किन्तु कोई व्यक्ति न्यायपालिका के निर्णय की प्रतीक्षा में दस दस वर्ष जेल में रहकर निर्दोष छूटता है तो कभी न्यायपालिका ने अपना दोष नहीं माना। बल्कि कभी कभी तो ऐसे न्यायिक विलम्ब के लिये भी न्यायपालिका कार्यपालिका पर ही दोष मढकर स्वयं को पाक साफ सिद्ध रखने की चेष्टा करती रही। मैं मानता हॅू कि सभी अधिवक्ता न्यायपालिका को भगवान की तरह प्रचारित करते रहते हैं। मीडिया या अन्य लोग भी न्यायिक अपमानना के डण्डे के भय से या तो उनकी प्रशंसा करते रहते हैं या चुप रहते हैं किन्तु स्पष्ट है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को आवश्यकता से एक दिन भी अधिक जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और ऐसा उल्लंघन करने में कहीं न्यायपालिका भी दोषी है तो उसे उत्तरदायी होना चाहिये। यह अलग बात है कि न्यायिक सक्रियता को ढाल बनाकर न्यायपलिका ने तो विधायिका और कार्यपालिका को उत्तरदायी बना दिया किन्तु न्यायिक गलतियों के लिये उसने न कभी अपनी समीक्षा की न ही कोई अन्य तंत्र विकसित किया जो ऐसे विलम्ब के लिये न्यायपालिका की समीक्षा कर सके।
न्यायपालिका जानती है कि लंबित मुकदमो के अंबार लगे हैं। न्यायपालिका इसके लिये जजों की कमी का रोना रोती है। विधायिका के भी अपने तर्क हैं। भारत में जितने प्रतिषत न्यायाधीशो के स्वीकृत पद खाली हैं उससे अधिक प्रतिषत के स्वीकृत पद पुलिस,स्कूल, अस्पताल जैसे अनेक आवश्यक स्थानों पर भी खाली हैं। यदि कोई न्यायिक पदाधिकारी भावुक होकर अपने न्यायिक पदों की पूर्ति प्राथमिकता के आधार पर कराने में सफल हो जावे तो पुलिस, शिक्षक और अस्पतालों का क्या होगा? उनकी चिंता कौन करेगा? क्या न्यायिक प्रक्रिया देश की अन्य समस्याओं से अधिक प्राथमिकता रखती है कि चाहे अन्य पद भले ही न भरे किन्तु न्यायिक पद अवश्य भरे जावें। अरुण जेटली ने जब हिम्मत करके टिप्पणी की थी कि अब न्यायपालिका ही देश का बजट भी बनाना शुरु कर दे तब न्यायपालिका निरुत्तर थी । बात भी सच है । न्यायपालिका आपराधिक मुकदमों के निर्णय में विलम्ब की कीमत पर दिन रात पर्यावरण प्रदूषण के लिये कभी दिल्ली सरकार तो कभी किसी अन्य को फटकार लगाने की वाहवाही लूटने में व्यस्त रहेगी तो आपराधिक मुकदमो में विलम्ब स्वाभाविक है। हमारी न्यायपालिका सरकार को बिना मांगे सलाह देती है कि वह नक्सलवाद के समाधान के लिये बातचीत का मार्ग अपनावे। मैं नहीं समझता कि यह सलाह किसी भी रुप में न्यायिक प्रक्रिया का भाग है। न्यायपालिका उत्तराखंड में आई बाढ के लिये कार्यपालिका से प्रश्न करती है तो कभी दिल्ली की गाडियों में काले शीशे बन्द करने का फर्मान सुनाती है। न्यायपालिका रोज ही बैठे ठाले पेशेवर जनहित याचिका दाखिल करने वालों को भी न्यायिक प्रक्रिया में शामिल करके स्वयं को ओवर लोडेड करती रहती है तो दोष किसका? यदि हम अस्पताल के डाकघरों की भर्ती रोक कर जज बढा भी दें और न्यायपालिका जनहित याचिकाओं में स्वयं को और ज्यादा सक्रिय कर ले तो क्या समाधान हुआ? क्यों नहीं न्यायपालिका अन्य सब काम छोडकर अपनी सारी शक्ति आपराधिक मुकदमों के निर्णय पर केन्द्रित कर लेती? जब लोक समस्या महसूस करेगा तब अपने आप सब लोग मिलकर समाधान सोचेंगे। किन्तु न्यायपालिका अनावष्यक पहल करके पूरी तंत्र व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने की भूल कर रही है। बार बार प्रष्न उठता है कि यदि विधायिका या कार्यपालिका अपना काम न करे तो क्या न्यायपालिका भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें? ऐसे प्रश्न एकपक्षीय उठाये जाते हैं। स्पष्ट है कि यदि न्यायपालिका गलत करें तो प्रश्न कौन और किससे किया जा सकता है? क्या न्यायपालिका मालिक है जिससे कोई प्रश्न नहीं हो सकता ? क्या न्यायपालिका भगवान है जिससे गलती नहीं हो सकती? कम से कम विधायिका से पांच वर्ष में एक बार चुनाव के समय तो प्रश्न हो सकता है किन्तु न्यायपालिका से तो वह भी व्यवस्था नहीं।
न्यायपालिका समय समय पर अपनी सीमाएॅ भी खुद ही बदल लेती है। सिद्धान्त रुप से तो न्यायपालिका संविधान संशोधन की समीक्षा के अतिरिक्त हर मामले में कानून के अनुसार न्याय करने को बाध्य है। स्पष्ट है कि न्यायपालिका को स्वतंत्र न्याय का कभी कोई अधिकार नहीं। किन्तु न्यायपालिका अपनी सुविधा अनुसार जब चाहे तब स्वयं को न्यायकर्ता भी मानना शुरु कर देती है और जब चाहे तब कानून से बंधा हुआ मान लेती है। वस्तु स्थिति यह है कि तंत्र के दो भाग न्यायपालिका और कार्यपालिका अर्थात पुलिस मिलकर विधायिका द्वारा बनाई गई प्रक्रिया अनुसार न्याय और सुरक्षा देते हैं। पुलिस भी न्याय का एक अहम हिस्सा होती है। पुलिस द्वारा आरोपित अपराधी निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी होता है। पता नहीं क्यों और कब से न्यायपालिका पुलिस को एक पक्षकार के रुप में मानकर अपराधी और पुलिस के बीच ही निष्पक्ष न्याय करने लगती है। संदिग्ध अपराधी भले ही घोषित अपराधी न हो किन्तु वह परीक्षण काल तक निर्दोष भी नहीं कहा जा सकता। न्यायपालिका सौ अपराधी भले ही छूट जायें किन्तु कोई निरपराध दडिण्त न हो मानकर न्यायालय में ऐसी बाल की खाल निकालती है कि एक अनुमान के अनुसार लगभग सत्तर प्रतिषत तक वास्तविक अपराधी निर्दोष छूट जाते हैं या जमानत पर छूटकर पुनः पुनः अपराध करते हैं । यदि कोई खंूखार अपराधी दर्जनों अपराध करने के बाद भी न्यायिक प्रक्रिया के अन्तर्गत जमानत पर छूटकर पुनः अपराध करें तो दोष किसका? यदि न्यायपालिका अनन्त काल तक या तो अपराधी का फैसला ही न करें या करे भी तो ऐसे अपराधी को सबूत के अभाव में मुक्त कर दे और पुलिस अति सक्रिय होकर उसे गैर कानूनी तरीके से सजा दे दे तो पुलिस द्वारा दी गई गैर कानूनी सजा अन्याय होगी या न्यायालय द्वारा कानूनी तरीके से अनन्तकाल तक लटकाये रखने का कार्य अन्याय है? न्यायपालिका ऐसी पुलिस की अति सक्रियता के मामलों में अधिक रुचि क्यों लेती है। यदि न्याय और कानून विपरीत दिशा में चलते हैं तो या तो कानून को न्याय की दिशा में सुधरना चाहिये अन्यथा कानून की तुलना में न्याय का पक्ष लिया जाना चाहिए। किसी अपराधी का निर्दोष छूटना पीडित पक्ष के प्रति अन्याय है। यदि ऐसा अन्याय बडी मात्रा में हो रहा है तो या तो कानून को सुधरना होगा अन्यथा समाज में स्वयं दण्ड देने की इच्छा जाग्रत होगी। आज यदि समाज में प्रत्यक्ष हिंसा का प्रभाव बढ रहा है तो उसका महत्वपूर्ण कारण है विलम्बित न्याय, अपराधियों का निर्दोष छूटना और पुलिस की गैर कानूनी सक्रियता के मामलो में न्यायपालिका की अतिसक्रियता । किसी पुलिस वाले ने जनहित की भावना से गैर कानूनी तरीके से किसी की हत्या कर दी तो यह कार्य अपराध न होकर गैर कानूनी मात्र ही होगा। तब तक जब तक उस पुलिस वाले ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये वह कार्य न किया हो। अपराध और गैरकानूनी का अंतर करने में कर्ता की नीयत महत्वपूर्ण होती है जो न्यायपालिका नहीं समझती या समझना नहीं चाहती। न्यायपालिका कानून की रक्षा के लिये न्याय की अन्देखी करे और पुलिस वाला न्याय के निमित्त कानून की अन्देखी करे तो हम न्यायलय की प्रशंसा करें या पुलिस की। अभी तो हम मानहानि के डर से पुलिस की प्रशंसा नहीं कर पाते किन्तु क्या लम्बे समय तक हम चुप रह सकते हैं? स्वाभाविक है नहीं।
अब सरकार बदली है । पुनः एक दलीय सरकार बनी है। अब तक न्यायपालिका सर्वोच्च के एकपक्षीय नारे को चुनौती मिलनी शु रु हुई है। किन्तु मेरे विचार में सर्वोच्च कौन का यह विवाद पहले भी गलत था और अब भी गलत है। यह सच है कि केशवानन्द भारती केस के माध्यम से न्यायपालिका ने विधायिका पर आंशिक नकेल डालकर भारत में लोकतंत्र को बचा लिया अन्यथा भारत का लोकतंत्र खतरे में था। तत्कालीन न्यायपालिका अपनी इस हिम्मत के लिये बधाई की पात्र है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि न्यायपालिका भी सर्वोच्चतम की छीना झपटी में लग जावे। लोकतंत्र में सर्वोच्च तो सिर्फ लोक ही होता है। तंत्र तो प्रवंधक मात्र होता है। तंत्र के तीनों भाग समकक्ष होते है, उपर नीचे नहीं। यह टकराव अनावश्यक है । फिर भी इसलिये हो रहा है कि तंत्र ने लोक को गुलाम या संरक्षित मानकर स्वयं को मालिक मान लिया है। तंत्र के दोनों भाग न्यायपालिका और विधायिका अपनी सर्वोच्चता की लडाई इस तरह लड रहे हैं जैसे दो लुटेरे मिलकर माल लूट लें और बाद में बंटवारे के लिये आपस में ही छीना झपटी करें। क्या यह अच्छा नहीें होगा कि दोनों स्वयं किनारे होकर लूट का माल वास्तविक मालिक लोक को वापस कर दें? मेरी सलाह है कि अब तंत्र को चाहिये कि वह लोक को अवयस्क की जगह वयस्क मानकर स्वयं को शासन की जगह प्रबंधक मान ले तो भारत का लोकतंत्र इस सर्वोच्चता के अनावश्यक विवाद से बच जायेगा।

महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 6, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं -
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरुषांे की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिषत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिषत । ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिषत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिषत की तुलना में इन दो प्रतिषत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिषत इन दो प्रतिषत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिषत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सषक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।
नोटः- मंथन क्रमांक 7 का अगला विषय न्यायिक सक्रियता कितनी उचित कितनी घातक होगा।

मंथन क्रमांक- 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान

Posted By: admin on November 5, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं -
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरुषांे की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिषत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिषत । ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिषत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिषत की तुलना में इन दो प्रतिषत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिषत इन दो प्रतिषत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिषत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सषक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।

संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 4, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ज्यादा है। पिछले कुछ दिनो से विपक्ष की गलत नीतियां संघ परिवार के इस उद्देश्य को पूरा करती दिखाई दे रही हैं।
अभी अभी मायावती जी ने यह कहा है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान एक जुट रहेगा । वह किसी भी अन्य दल के पास नही जायेगा । ऐसी ही कुछ सोच अन्य विपक्षी दलो की भी रही है। सबका यह मानना है कि हिन्दू तो आपस मे बंटेगा ही यदि मुसलमान का एक जुट वोट उसे मिल जाये तो वह हिन्दूओ के जाति के आधार पर किसी वर्ग को तोडकर शासन मे आ सकता है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद धीरे धीरे हिन्दुओ का ध्रुवीकरण भी बढ रहा है तथा विपक्षी दलो की मुस्लिम एकत्रीकरण की नीति हिन्दुओ को और अधिक इकठठा होने मे सहायता कर रही है। मुस्लिम एकत्रीकरण उस समय तक तो लाभदायक रहता है, जब तक हिन्दू एक जुट न हो । किन्तु इसका यह अर्थ नही कि आप पूरी वेशर्मी के साथ मुसलमानो को एक जुट करने की आवाज लगाये और यह मान ले कि हिन्दुओ पर कभी भी किसी भी परिस्थिति मे इसकी प्रतिक्रिया होगी ही नही । मेरे विचार मे विपक्षी दलो का ऐसा मानना गलत है।
अभी अभी भोपाल मे सिमी के आठ आतंकवादी जेल से फरार होने के बाद मुठभेड मे मारे गये। दिग्विजय सिंह जी ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्या कारण है कि सिर्फ मुसलमान ही जेलो से भागते हैं। इसके पूर्व भी दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेता यह प्रश्न उठा चुके है कि आवादी के अनुपात मे मुसलमान ही जेलो मे अधिक बंद क्यो है? मै नही समझता कि मै इस मूर्खता या धूर्तता पूर्ण प्रश्न का क्या उत्तर दॅू। स्पष्ट है कि यह प्रष्न भी हिन्दुओ के ध्रुवीकरण मे सहायक होता है।
मै देख रहा हॅू कि आतंकवादियो के मारे जाने पर जो बहस छिडी है उसमे अधिंकांश विपक्षी नेता या मुसलमान प्रवक्ता एक स्वर से इस प्रश्न को अधिक महत्व दे रहे है कि मुठभेड फर्जी थी और बिना न्यायिक प्रक्रिया के उन्हे मार दिया गया, जो गलत था । मै भी ऐसा सोचता हॅू कि इन आठ लोगो को मार देना फर्जी हो सकता है और बिना न्यायिक प्रकृया के पूरी हुए किसी को पुलिस द्वारा मार देना गैर कानुनी है। फिर भी मै ऐसा सोचता हॅू कि जिन लोगो की हत्या हुई वे भले ही कानून के द्वारा अपराध सिद्ध न हो किन्तु मेरे विश्वास के अनुसार वे अपराधी थे और यदि न्यायालय अनंत काल तक ऐसे अपराधियो को अपराधी घोषित करके दंडित न कर सके तो क्या ऐसे लेागो से समाज को मुक्ति दिलाने मे अन्य इकाइयों को पहल नही करनी चाहिये? यदि वे अपराधी थे, जैसा कि मुझे भी विश्वास है, और न्यायालय उन्हे दंडित नही कर पा रहा है तो पुलिस ने ऐसे लोगो को मारकर अपनी नौकरी जोखिम मे डाली है। इसके लिये भले ही वे कानून से दंडित हो जाये किन्तु सामाजिक दृष्टि से ऐसे पुलिसकर्मी बधाई के पात्र हैं। न्यायपालिका प्रतिदिन जजो की कमी का रोना रोती है, किन्तु यह कभी नही सोचती कि उसकी प्राथमिकताए क्या है? न्यायालय को सेशन कोर्ट के योग्य गंभीर आपराधिक मामलो को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिये था। किन्तु न्यायपालिका अन्य कम महत्वपूर्ण कार्यो को अपने हाथ मे लेकर ओभर लोडेड हो जाती है। परिणाम स्वरूप गंभीर अपराधी जेलो मे लम्बे समय तक निर्णय के अभाव मे पडे रहते है, तथा कभी कभी पुलिस ऐसे खतरनाक अपराधियो को फर्जी मुठभेड मे मारकर अपनी नौकरी खतरे मे डालती है। भोपाल के फर्जी मुठभेड का वास्तविक कारण न्यायिक प्रक्रिया मे भी खोजा जाना चाहिये। किन्तु यह मामला या तो सत्ता या विपक्ष के बीच खोजा जा रहा है, अथवा हिन्दू और मुसलमान के बीच। मैं समझता हॅू कि यदि मारे गये आठो लोग मुसलमान नही होते तो यह हल्ला निश्चित रूप से कम होता । मेरे विचार मे यह भोपाल कांड भी संघ परिवार के हिन्दू एकत्रीकरण मे सहायक हो रहा है।

मंथन क्रमांक-5 की समीक्षा

Posted By: admin on November 3, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

(1)आचार्य पंकज
प्रश्न -परिवार व्यवस्था परम्परा रुप से प्राचीन है। परिवार की एकता के लिए आप द्वारा स्थापित व्यवस्था आदर्श है। यह अपवाद भी है। आपसे हम सहमत होते हुए भी अपने परिवार में यह आदर्श व्यवस्था कायम नहीं कर सकते क्योंकि हम सब एक साथ बैठने के लिए तैयार नहीं । लगभग देश में हर परिवार की यह स्थति है । सिद्धांत और व्यवहार में बडा अंतर है। इसलिए आप द्वारा स्थापित परिवार व्यवस्था लागू करने में बडी कठिनाई है। इसका कोई दूसरा उपाय हो तो बताये ।
उत्तरः- यह सच है कि परंम्पराएॅ जब रुढ हो जाती है तो उनमें संशोधन करना बहुत कठिन होता है किन्तु यदि परिवार व्यवस्था के अस्तित्व पर ही संकट दिखता हो तब उस कठिन को भी सहजता से करना ही होगा। वर्तमान में आपके परिवार में छः या सात सदस्य हैं किन्तु मिलकर नहीं बैठ पाते। यदि दो तीन भी सहमत हो तो आप उतने ही लोग व्यवस्था बना सकते हैं। आवष्यक नहीं कि सब एक साथ बैठे । प्रारंभिक निर्णय यह करिये कि जो दो तीन लोग सहमत हैं वे लिखित में घोषित करें कि उन तीनों की सम्पत्ति सामूहिक होगी तथा साथ ही वे तीनों सामूहिक अनुशासन से बंधे रहेंगे। यदि दो या तीन लोग ऐसा निर्णय कर लेंगे तो अन्य लोग जल्दी ही जुड जायेंगे। सबको एक साथ सहमत करना कठिन होगा।

(2)दिलीप मृदुल
प्रश्न -(1)परिवार को समाजिक इकाई के बजाय संगठनात्मक या संस्थागत कहना किस दृष्टि से ठीक है?
(2) व्यक्ति का मूल प्राकृतिक अधिकार जीने, सुखी होने, जानने, का होना चाहिए। तब स्वतंत्रता का अधिकार लेकर एक शिशु किस तरह अपना जीवन स्वतंत्रतापूर्वक जी सकता है? क्यांेकि स्वतंत्रता के अधिकार से ही माता पिता को यह अधिकार भी मिल जाता है कि वह चाहे तो शिशु की देखभाल करें या न करें। क्या शिशु पालन करने की बाध्यता व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है? परिवार में एक शिशु को संपत्ति का समान अधिकार कितना उचित है? जबकि उस शिशु का परिवार में कोई आर्थिक योगदान नहीं है।
उत्तरः- संगठन और संस्था बिल्कुल अलग अलग अर्थ रखते हैं। संगठन भी दो प्रकार के होते है-(1) समाज पूरक(2)समाज तोडक। परिवार, गाॅव, जिला, प्रदेश , देश , समाज पूरक संगठन होते हैं। दूसरी ओर धर्म, जाति, भाषा, राष्ट्र, उम्र, लिंग, गरीब, अमीर, किसान, मजदूर आदि के नाम पर बने संगठन समाज तोडक माने जाते है। ये विष्व व्यवस्था को कमजोर करते हैं। इन आधारो पर संस्था बने तो ठीक है किन्तु संगठन घातक हैं। परिवार व्यवस्था एक सामाजिक संगठन है।
बालक जब तक नाबालिक हैं तब तक वह तंैतीस प्रतिषत परिवार, तैंतीस प्रतिषत राष्ट्र और तैंतीस प्रतिषत सामाजिक सम्पत्ति माना जाता है। यदि कोई एक इकाई उसकी ठीक से देखभाल न करे तो अन्य दो का दायित्व है कि वह उसकी देखभाल करें। आज सरकार ने पश्चिम की कुछ ऐसी नकल की है कि बालक को पूरी तरह राष्ट्रीय सम्पत्ति मान लिया है। यह सोच गलत है। यदि माता पिता या परिवार के अन्य सदस्य बालक की देखभाल नहीं कर पाते तो वे या तो बालक को समाज या सरकार को सुपुर्द कर सकते है या समाज और सरकार उनसे ले सकते है।
बालक को जन्म से ही यदि सम्पत्ति में अधिकार न दिया जाय तो आप बताइये कि उसका कौन सा तरीका अधिक अच्छा होगा। आप विकल्प बताने की कृपा करें।
अन्य प्रश्न
(1)परिवार अब तक प्राकृतिक इकाई माना जाता है। आप उसे प्राकृतिक क्यों नहीं मानते?
(2)प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था से अवश्य ही जुडना चाहिए। किन्तु कोई यदि न जुडना चाहे तब क्या होगा?
(3)यदि परिवारों में परिवार छोडने की स्वतंत्रता दे दी गई तो परिवार टूट जायेंगे?
(4)आपके परिवार का नाम कांवटिया परिवार क्रमांक एक होगा। यह कांवटिया क्रमांक एक का क्या अर्थ है?
(5)यदि परिवार की कोई लडकी शादी के बाद जायेगी या बहू आयेगी तब क्या होगा? यदि बहू आज आई और कल चली गई तब क्या होगा?
(6)बारह वर्ष की उम्र तक नाबालिग मानना कितना उचित है?
(7) क्या इस व्यवस्था से परिवार में लोकतंत्र आ जायेगा?
उत्तरः-
(1)जो इकाई कई इकाइयों को मिलाकर बनती है तथा असानी से अलग अलग हो सकती है वह कभी प्राकृतिक इकाई नहीं हो सकती। परिवार व्यक्ति समूह है तथा व्यक्ति कभी भी अलग अलग हो सकते है। इसलिये उसे संस्था या संगठन ही कह सकते हैं, प्राकृतिक नहीं। संविधान बनाने वालों ने कुछ नासमझी और कुछ स्वार्थवश परिवार गांव को तो संविधान से अलग कर दिया और धर्म, जाति, लिंग, भेद को संविधान में घुसा दिया। दूसरी ओर उन्होने कानूनी रुप से परिवार को प्राकृतिक इकाई मान लिया। ये गलतियाॅ परिवारों को तोडने के आधार बने।
(2)यदि कोई व्यक्ति किसी परिवार से न जुडना चाहे तो वह अकेला रह सकता है किन्तु उसे वोट देने का अधिकार नहीं होगा जब तक वह किसी परिवार से या ग्राम परिवार से न जुड जाये। यह कैसे उचित होगा कि समाज आपको किसी व्यवस्था के अन्तर्गत सुरक्षा दे और आप उस व्यवस्था से ही दूर रहना चाहें। न्यूनतम दो लोग मिलकर भी परिवार बना सकते है। या तो व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति ही रहेगा अथवा व्यवस्था का अंग रहेगा।
(3) अपने सभी सामाजिक तथा संवैधानिक अधिकारों का सम्पूर्ण समर्पण परिवार की पहली आवश्यकता मानी जाती है। यहाॅ तक कि स्वतंत्रता के प्राकृतिक अधिकार के साथ भी आंशिक समझौता करना पडता है। घुटन टूटन की अपेक्षा अधिक नुकसानदायक है। परिवारों के टूटने का मुख्य कारण परिवारों में घुटन है। यहाॅ तक कि परिवारों में आपसी कलह, हिंसा, या आत्महत्या तक का प्रचलन बढ रहा है क्योंकि हमने घुटनकी अपेक्षा टूटन को अधिक नुकसान दायक माना। मेरे अपने कुटुम्ब में टूटन की छूट है और आज तक न कोई विवाद हुआ है न ही कोई अन्य समस्या आई। इसलिए परिवारों में अलग होने की पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। हो सकता है कि प्रारंभ में कुछ परिवार टूट जाये किन्तु यदि व्यवस्था लोकतांत्रिक होगी तो भविष्य में परिवार जुडने लगेंगे। जीवित व्यक्तियों को किसी कानून या बंधन से बंधक बनाकर अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता। या तो सहमति होगी, या स्वतंत्रता और यदि दोनों नहीं हुआ तो टकराव होना निश्चित है।
(4)कांवटिया शब्द हमारे कुटुम्ब से जुडा है। हमारे कुटुम्ब में वर्तमान में छः परिवार हैं। जब हमारे कुटुम्ब का कोई अन्य परिवार पंजीकृत होगा तो वह क्रमांक दो लिखेगा। इस तरह कुटुम्ब और क्रमांक रखा गया है।
(5)परिवार की लडकी यदि शादी के बाद जायेगी तो वह अपना हिस्सा लेकर तथा त्यागपत्र देकर जा सकती है। त्यागपत्र के बाद उस लडकी का हमारे परिवार की सम्पत्ति में तथा अनुशासन में कोई संबंध नहीं रहेगा। कोई बहू जब आयेगी तब वह उस तारिख से परिवार की सदस्य मानी जायेगी, जिस तारिख को वह हस्ताक्षर करके परिवार व्यवस्था में शामिल की गई। हस्ताक्षर के पूर्व वह नई व्यवस्था के ढाॅचे का सदस्य नहीं मानी जायेगी। संभव है कि बहू के आने के बाद यदि परिस्थिति वैसी लगे तो कुछ दिनों के लिए उसे सम्पत्ति में जोडने में प्रतिक्षा भी की जा सकती है। किन्तु एक बार सदस्य बन जाने के बाद उसके सभी पारिवारिक अधिकार उसे प्राप्त हो जाते है।
(6)यह बारह वर्ष की उम्र हमारे अपने परिवार की आंतरिक संरचना तक सीमित होगी। कानूनी आधार पर बालिग होने की उम्र वहीे होगी जो सरकार तय करेगी। यह उम्र की व्यवस्था हमने सिर्फ अपने परिवार के लिए की है। बाकी लोग यदि अपने परिवार का ढाॅचा बनायेंगे तो वे इसे घटा बढा भी सकते है।
(7) परिवार व्यवस्था को घुटन और टूटन से बचाने के लिए लोकतंत्र का एकमात्र मार्ग अपनाना ही होगा और यही एकमात्र तरीका है जिससे परिवार में लोकतंत्र आयेगा। लोकतंत्र का अर्थ होता है लोक नियंत्रित तंत्र। परिवार में परिवार के सभी सदस्य मिलकर लोक होते है तथा परिवार के चुने हुये मुखिया या प्रमुख उसके तंत्र। वर्तमान परम्परागत परिवार व्यवस्था में मुखिया जन्म से बन जाता है और उसे आसानी से बदला नहीं जा सकता भले ही उसमें योग्यता हो या न हो, भले ही उसे परिवार की सहमति हो या न हो। प्रस्तावित परिवार व्यवस्था में मुखिया और प्रमुख चुने जाते है। साथ ही मुखिया या प्रमुख के निर्णय भी अंतिम नहीं होते। बल्कि पूरा परिवार मिलकर उस निर्णय को बदल सकता है। नई व्यवस्था में महिलाओ को भी सम्पत्ति तथा व्यवस्था में समान अधिकार दिया गया है। महिलाओं को दिया जाने वाला समान अधिकार भी एक अच्छा कदम है।

संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर

Posted By: admin on November 2, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ज्यादा है। पिछले कुछ दिनो से विपक्ष की गलत नीतियां संघ परिवार के इस उद्देश्य को पूरा करती दिखाई दे रही हैं।
अभी अभी मायावती जी ने यह कहा है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान एक जुट रहेगा । वह किसी भी अन्य दल के पास नही जायेगा । ऐसी ही कुछ सोच अन्य विपक्षी दलो की भी रही है। सबका यह मानना है कि हिन्दू तो आपस मे बंटेगा ही यदि मुसलमान का एक जुट वोट उसे मिल जाये तो वह हिन्दूओ के जाति के आधार पर किसी वर्ग को तोडकर शासन मे आ सकता है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद धीरे धीरे हिन्दुओ का ध्रुवीकरण भी बढ रहा है तथा विपक्षी दलो की मुस्लिम एकत्रीकरण की नीति हिन्दुओ को और अधिक इकठठा होने मे सहायता कर रही है। मुस्लिम एकत्रीकरण उस समय तक तो लाभदायक रहता है, जब तक हिन्दू एक जुट न हो । किन्तु इसका यह अर्थ नही कि आप पूरी वेशर्मी के साथ मुसलमानो को एक जुट करने की आवाज लगाये और यह मान ले कि हिन्दुओ पर कभी भी किसी भी परिस्थिति मे इसकी प्रतिक्रिया होगी ही नही । मेरे विचार मे विपक्षी दलो का ऐसा मानना गलत है।
अभी अभी भोपाल मे सिमी के आठ आतंकवादी जेल से फरार होने के बाद मुठभेड मे मारे गये। दिग्विजय सिंह जी ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्या कारण है कि सिर्फ मुसलमान ही जेलो से भागते हैं। इसके पूर्व भी दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेता यह प्रश्न उठा चुके है कि आवादी के अनुपात मे मुसलमान ही जेलो मे अधिक बंद क्यो है? मै नही समझता कि मै इस मूर्खता या धूर्तता पूर्ण प्रश्न का क्या उत्तर दॅू। स्पष्ट है कि यह प्रष्न भी हिन्दुओ के ध्रुवीकरण मे सहायक होता है।
मै देख रहा हॅू कि आतंकवादियो के मारे जाने पर जो बहस छिडी है उसमे अधिंकांश विपक्षी नेता या मुसलमान प्रवक्ता एक स्वर से इस प्रश्न को अधिक महत्व दे रहे है कि मुठभेड फर्जी थी और बिना न्यायिक प्रक्रिया के उन्हे मार दिया गया, जो गलत था । मै भी ऐसा सोचता हॅू कि इन आठ लोगो को मार देना फर्जी हो सकता है और बिना न्यायिक प्रकृया के पूरी हुए किसी को पुलिस द्वारा मार देना गैर कानुनी है। फिर भी मै ऐसा सोचता हॅू कि जिन लोगो की हत्या हुई वे भले ही कानून के द्वारा अपराध सिद्ध न हो किन्तु मेरे विश्वास के अनुसार वे अपराधी थे और यदि न्यायालय अनंत काल तक ऐसे अपराधियो को अपराधी घोषित करके दंडित न कर सके तो क्या ऐसे लेागो से समाज को मुक्ति दिलाने मे अन्य इकाइयों को पहल नही करनी चाहिये? यदि वे अपराधी थे, जैसा कि मुझे भी विश्वास है, और न्यायालय उन्हे दंडित नही कर पा रहा है तो पुलिस ने ऐसे लोगो को मारकर अपनी नौकरी जोखिम मे डाली है। इसके लिये भले ही वे कानून से दंडित हो जाये किन्तु सामाजिक दृष्टि से ऐसे पुलिसकर्मी बधाई के पात्र हैं। न्यायपालिका प्रतिदिन जजो की कमी का रोना रोती है, किन्तु यह कभी नही सोचती कि उसकी प्राथमिकताए क्या है? न्यायालय को सेशन कोर्ट के योग्य गंभीर आपराधिक मामलो को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिये था। किन्तु न्यायपालिका अन्य कम महत्वपूर्ण कार्यो को अपने हाथ मे लेकर ओभर लोडेड हो जाती है। परिणाम स्वरूप गंभीर अपराधी जेलो मे लम्बे समय तक निर्णय के अभाव मे पडे रहते है, तथा कभी कभी पुलिस ऐसे खतरनाक अपराधियो को फर्जी मुठभेड मे मारकर अपनी नौकरी खतरे मे डालती है। भोपाल के फर्जी मुठभेड का वास्तविक कारण न्यायिक प्रक्रिया मे भी खोजा जाना चाहिये। किन्तु यह मामला या तो सत्ता या विपक्ष के बीच खोजा जा रहा है, अथवा हिन्दू और मुसलमान के बीच। मैं समझता हॅू कि यदि मारे गये आठो लोग मुसलमान नही होते तो यह हल्ला निश्चित रूप से कम होता । मेरे विचार मे यह भोपाल कांड भी संघ परिवार के हिन्दू एकत्रीकरण मे सहायक हो रहा है।

मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि

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मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ही बौद्धिक व्यायाम के साथ भी संभव है। मैं चाहता हॅू कि मेरा व्यायाम भी बंद न हो। जो लोग मंथन में बहुत कमजोर होते है वे मुझसे प्रश्न करने में हिचकिचाते है । जो लोग बहुत मजबूत होते है वे मंथन में मेरे साथ शामिल होने में अपना अपमान समझते है। मुझे व्यायाम की जरुरत है। मैं चाहता हॅू कि आप चाहे मजबूत हो या कमजोर आपको इस व्यायाम के साथ जुडना चाहिए। जो विषय घोषित होता है उस पर आप अपने विस्तृत विचार एक सप्ताह तक भेज सकते है मैं भी उस विषय पर अपने विचार भेजॅूगा। एक सप्ताह तक आये हुये विचारों पर अगले एक सप्ताह तक प्रश्नोंत्तर होगा और उसके बाद विषय बंद हो जायेगा। अब तक विचार मंथन के लिए हमारे साथियों की सलाह पर विषयों की सूची बनी है जो नीचे लिखी गई है। आप लोगों के और सुझाव आने के बाद अन्य विषय भी जोडे जा सकते है।
मैं स्पष्ट कर दूॅ कि इस विचार मंथन का उद्देश्य कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना नहीं है। वह तो अपने आप निकलता रहेगा। साथ ही आपसे यह भी निवेदन है कि आपको बहुत महत्वपूर्ण उपयोगी साथी मानकर इस मंथन में जोडा गया है। इसमें आप अनावश्यक कुछ लिखकर अपनी क्षमता का तथा मंथन प्रक्रिया का नुकसान न करें। दिवाली की शुभकामनाएॅ या अन्य संदेश या सुचनाएॅ आपकी प्रतिष्ठा को कम करेगा क्योंकि यह एकमात्र मंथन कार्यक्रम है। इसका किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग ठीक नहीं। इस कार्यक्रम का किसी भी प्रकार के विचार प्रचार या कोई निष्कर्ष निकालने से कोई संबंध नहीं है। विपरीत विचारों के लोग खुलकर और स्वतंत्रतापूर्वक किसी मंच पर अपने विचार रख सके इतना ही इसका उद्देश्य है। आपसे मेरी यह अपेक्षा है कि आप कुछ अन्य उपयोगी साथियों के नाम और फोन नंम्बर भी भेजे, जो इस दिशा में उपयोगी हो सकते है। उन्हें भी इस योजना से जोडा जायेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरे इस प्रयत्न में सहभागी होंगे।
अब तक सम्पन्न विषयों की सूची-
मंथन क्रमांक-1 समाज और राज्य मे अहिंसा और सत्य की समीक्षा
मंथन क्रमांक-2 बेरोजगारी
मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
मंथन क्रमांक-4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
मंथन क्रमांक-5 परिवार व्यवस्था
मंथन क्रमांक -6 जो वर्तमान में चल रहा है- महिला सशक्तिकरण कितना उचित?
प्रस्तावित विषयांे की सूची
आपराधिक
(1)चोरी,डकैती,लूट
(2)आतंकवाद और समाधान (क) नक्सलवाद (ख) मुस्लिम आतंकवाद (ग) आपराधिक आतंकवाद
(3) अपराध गैर कानूनी और अनैतिक का फर्क
(4)अपराध वृद्धि कारण और निवारण
(5)शोषण अपराध या अनैतिक
(6)मृत्युदण्ड समीक्षा-
(7)मिलावट कमतौल कितना अपराध कितना अनैतिक
(8)जालसाजी धोखाधडी
(9)पुलिस की अति सक्रियता
महिलाओं से जुड़ी
(1)बलात्कार
(2)महिला आरक्षण समस्या या समाधान
(3)कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना नाटक
(4)दहेज प्रथा
(5)महिला उत्पीडन समीक्षा
(6)महिला वर्ग या परिवार का अंग
(7)पर्दा प्रथा
(8)सती प्रथा
(9)परम्परागत या आधुनिक महिलाएॅ
(10) लिब-इन रिलेशनशीप
आर्थिक
(1)आर्थिक असमानता
(2) नई अर्थ नीति
(3)श्रम शोषण
(4)गरीबी रेखा
(5)मंहगाई भ्रम या यथार्थ
(6) सभी आर्थिक समस्याओं का एक आर्थिक समाधान
(7) स्वतंत्र अर्थपालिका
(8)ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
(9) प्राकृतिक उर्जा और कृत्रिम उर्जा
(10) हमारी आदर्श कर प्रणाली
(11 ) राजनैतिक व्यवस्था पर सम्पन्नों और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार
(12) किसान आत्महत्या
(13) नरेगा
(14) आर्थिक मंदी
(15) सरकारीकरण निजीकरण समाजीकरण
(16) कर्मचारी आन्दोलन
चारित्रिक
(1)भ्रष्टाचार
(2)चरित्र पतन व्यक्तिगत या व्यवस्थागत
(3) चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन
(4) भावना या विचार
(5)ज्ञान यज्ञ का महत्व और तरीका
(6) भौतिक या नैतिक उन्नति
धार्मिक
(1)धर्म और सम्प्रदाय
(2)जाति और वर्ण व्यवस्था
(3)जातीय आरक्षण
(4)धार्मिक आरक्षण
(5) इस्लाम अब तक और आगे
(6)धर्म और संस्कृति
(7)साम्प्रदायिकता और धर्म
(8)गाय,गंगा,मंदिर,मुददे समस्या और समाधान
(9)संगठन कितना उचित कितना अनुचित
(10)भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति का फर्क
(11)आर्य समाज सर्वोदय संघ समीक्षा
(12)संघ इस्लाम और साम्यवाद की समीक्षा
(13)बाबरी मस्जिद राम मंदिर के मुददे और समाधान
(14) धर्मान्तरण
(15) हिन्दू धर्म और इस्लाम ,शाहरुक की पीडा
(16) आश्रमों में बलात्कार
(17) साम्प्रदायिक दंगे समस्या या मजबूरी
संवैधानिक
(1)भारतीय संविधान समीक्षा
(2)मूल अधिकार
(3)ग्राम सभा सशक्तिकरण
(4)राइट टू रिकाल
(5)व्यक्ति और नागरिक का फर्क
(6)नई संवैधानिक व्यवस्था का स्वरुप
(7)लोक ससद
(8)राज्य के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का फर्क
(9) स्वतंत्रता महत्वपूर्ण या समानता
(10) संविधान संशोधन
सामाजिक
(1)समाज तब और अब
(2)व्यक्ति,परिवार ,समाज
(3)संयुक्त परिवार व्यवस्था में बाधाएॅ और समाधान
(4)वर्ग विद्वेश या वर्ग समन्वय
(5)साहित्य और विचार का अंतर
(6)विवाह पद्धति ,प्रेम विवाह,समलैंगिकता
(7)व्यक्ति, धर्म,समाज और राज्य,
(8)समाज निर्माण और समाज सुरक्षा
(9) पर्यावरण और मानवाधिकारवादी
(10) क्षेत्रियता
(11) सामाजिक अव्यवस्था और समाधान
(12) भय का व्यापार
राजनैतिक
(1)तानाशाही, लोकतंत्र ,लोक स्वराज्य
(2)संसदीय लोकतंत्र या सहभागी लोकतंत्र
(3)पॅूजीवाद,समाजवाद,साम्यवाद
(4)व्यवस्था परिवर्तन क्यों,क्या,कैसे
(5) समान नागरिक संहिता
(6) ग्राम स्वराज्य
(7) नरेन्द्र मोदी
(8) हिन्दू कोड बिल
(9) ग्लोबल वार्मिंग
(10) भारतीय राजनीति और लोकतंत्र
(11) राजनीति में अच्छे लोग
(12) मतदान
(13) गाय की रोटी कुत्ता खाये
न्यायिक
(1)न्यायिक प्रक्रिया कितनी उचित कितनी अनुचित
(2) पुलिस और न्यायालय के संबंधो की समीक्षा
(3) न्यायिक सक्रियता
(4) न्याय और व्यवस्था
अन्य
(1)हिंसा या अहिंसा
(2)गॉधी मार्क्स,अम्बेडकर
(3)गॉधी,भगतसिंह,सुभाष चंद्रबोस
(4)गॉधी और गोड्से
(5)नेहरु पटेल अम्बेडकर
(6)भारत का विभाजन भूल या मजबूरी
(7) कश्मीर समस्या
(8) चिंतन महत्वपूर्ण या क्रिया
(9)ज्ञान, शिक्षा और श्रम का महत्व
(10)भाषा कितनी वैचारिक कितनी भावनात्मक
(11)समीक्षा,आलोचना,विरोध,और संघर्ष का अंतर
(12)अमेरिका हमारा प्रतिद्वंदी, विरोधी या शत्रु
(13)दान चंदा और भीख का फर्क
(14)उपदेश , प्रवचन,भाषण और शिक्षा का फर्क
(15)स्वदेशी का प्रचार कितना आवश्यक
(16)सुख और दुख की उत्पत्ति
(17)भूत,प्रेत,तंत्र,मंत्र कितना भ्रम कितना वास्तविक
(18)निष्कर्ष निकालने में परिभाषाओं का महत्व
(19)समस्याओं के समाधान में हमारी प्राथमिकताएॅ
(20)शराफत,समझदारी, और धूर्तता में फर्क
(21)प्रशंसा , समर्थन, सहयोग, सहभागिता में अंतर
(22) आरक्षण
(23)शिक्षा सरकारी या शासन मुक्त
(24) बाबा रामदेव
(25) विकेन्द्रीयकरण या अकेन्द्रीयकरण
(26) कर्तव्य और अधिकार
(27) बालश्रम कानून
(28) विश्वस्तरीय समस्यायें
(29) गुटनिरपेक्षता
(30) मीडिया
(31) एन जी ओ

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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