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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मंथन क्रमांक-13 विषय- लोेकसंसद प्रश्नोंत्तर व समीश्रा

Posted By: admin on December 25, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1 प्रश्नोंत्तर
कुछ साथियों ने लोकसंसद की और अधिक विस्तृत व्याख्या करने का सुझाव दिया है। कुछ ने यह भी समझना चाहा है कि वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन में लगे अन्य संगठनों की भूमिका क्या है, और इन संगठनों से व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी कैसे अलग है? मैं उचित समझता हॅू कि इन प्रश्नों के माध्यम से विषय की विस्तृत व्याख्या की जाये।
वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन में सक्रिय अनेक संगठनों के साथ मिलकर मैंने काम किया है। कुछ संगठनों से विचार विमर्ष भी चलता रहा है और वर्तमान में चल भी रहा है। व्यवस्था परिवर्तन में मोदी जी के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी, नीतिश कुमार, अरविन्द केजरीवाल, गोविंदाचार्य जी, रणवीर शर्मा, सर्वोदय, अमरनाथ भाई, कुमार प्रशांत , भरतगॉधी, रोशनलाल अग्रवाल, राहुल मेहता, बाबा रामदेव, मेधापाटकर आदि निरंतर सक्रिय हैं। अन्य अनेक संगठन या व्यक्ति भी सक्रिय है जिनसे मेरा प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्पर्क नहीं है। नरेन्द्र मोदी, नीतिश कुमार, अरविन्द केजरीवाल, निरंतर सुशासन को ही व्यवस्था परिवर्तन समझ रहे हैं। गोंविदाचार्य जी या तो राज्य सभा को अधिक महत्व देना चाहते हैं या भारतीय संस्कृति को। ये गाय गंगा मंदिर अथवा गांवो को सरकार से अधिक फंड दिलाने तक सीमित है। रोशनलाल अग्रवाल, भरतगॉधी आर्थिक सुधार से जरा भी आगे नहीं सोचते। जबकि सिर्फ आर्थिक सुधार राज्य की शक्ति को अधिक मजबूत करेंगे, कमजोर नही, और आर्थिक असमानता की तुलना मे राजनैतिक असमानता कई गुना अधिक घातक है। सर्वोदय से जुडे अमरनाथ भाई, कुमार प्रशांत , आदि सर्वोदय से जुडे लोग संघ परिवार विरोध, अमेरिका विरोध को ही व्यवस्था परिवर्तन तक सीमित रखते हैं। यहॉ तक कि ठाकुरदास बंग, सिद्धराज ढंढा ने लोक स्वराज्य की दिशा में कुछ सोचना शुरु किया तो सर्वोदय ने ही उन्हें ऐसा करने और सोचने से रोक दिया। बाबा रामदेव स्वदेशी और कालाधन को ही व्यवस्था परिवर्तन मान रहे हैं। मेधापाटकर अप्रत्यक्ष रुप से सत्ता परिवर्तन के प्रयास में लगी हैं। राहुल मेहता भी राईट टू रिकॉल और भ्रष्टाचार नियंत्रण तक सीमित हैं। इनमें से अनेक लोग गॉधी का नाम या पहचान जोडकर उसका उपयोग करते हैं। कुछ लोग तो अपने को गॉधी का छोटा बेटा भी प्रचारित करके उनका दुरुपयोग करते हैं। जबकि गांधी स्वप्न मे भी सत्ता की ओर आकार्षित नही थे, और नकली गांधी रात दिन राजनैतिक सत्ता के लिये स्वप्न मे भी छटपटाते रहते है। कुछ लोग सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन तो कुछ आर्थिक व्यवस्था परिवर्तन और कुछ अन्य राजनैतिक व्यवस्था परिवर्तन तक अपने को सीमित रखते है।
मेरे विचार में संसदीय लोकतंत्र को सहभागी लोकतंत्र के रुप में बदलना ही व्यवस्था परिवर्तन है। वस्तुस्थिति यह है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र की जगह लोकतांत्रिक संसद होनी चाहिये थी, जो नहीं है। सहभागी लोकतंत्र को ही लोकस्वराज्य भी कहा जाता है। व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ सुशासन नहीं ,स्वशासन है। भौतिक विकास नहीं, नैतिक उन्नति है। समानता का नारा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का नारा है। हमें सुराज्य नहीं,स्वराज्य चाहिये। इस विचार के साथ सहभागी लोकतंत्र को बढ़ना चाहिये। प्रश्न लोक और तंत्र के बीच सुविधाओं का नहीं है बल्कि विचारणीय प्रश्न यह है कि लोक और तंत्र के बीच अधिकारों के विभाजन का अनुपात क्या है और क्या होना चाहिये। भारत के किसी भी नागरिक को आज ऐसा कौन सा अधिकार प्राप्त है जिसमें भारतीय संविधान हस्तक्षेप न कर सके और भारतीय संविधान को ऐसा कौन सा संरक्षण प्राप्त है जिसमें तंत्र मनमाना संशोधन न कर सके। यहॉ तक कि भारतीय न्यायपालिका ने, जो तंत्र का ही एक हिस्सा है, उसने असंवैधानिक कदम उठाकर आदेश दिया कि संसद संविधान के मूल ढॉचे में कोई बदलाव नहीं कर सकती । आज तक न्यायपालिका ने इस मूल ढॉचे की भी कोई व्याख्या न करके वह अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा हुआ है। इस तरह संविधान संसद का पूरी तरह गुलाम हो गया है। संसदीय लोकतंत्र संविधान से मुक्ति चाहता है और सहभागी लोकतंत्र संविधान की मुक्ति चाहता है । कितना स्पष्ट अंतर है दोनों में।
कोई व्यक्ति यदि तंत्र और लोक के अधिकारों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयास को व्यवस्था परिवर्तन कहता है तो वह ईमानदार प्रयास नहीं। स्पष्ट पहचान है कि यदि कोई संसद के असीम अधिकारों को सीमित करने के प्रयास के साथ न हो तो स्पष्ट है कि उसका उद्देश्य कहीं न कहीं राजनैतिक सत्ता के प्रयासों के साथ जुडा हुआ हैं। यहॉ तक कि गोंविदाचार्य जी, अरविन्द केजरीवाल, तथा रणवीर शर्मा तक लोकसंसद की बात को छोडकर अन्य सभी प्रयास करने में सहमत हैं। जबकि मेरे विचार में लोकसंसद ही एकमात्र प्रयास है जो व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग खोल सकता है। नियंत्रण का तरीका क्या हो, नियंत्रण कैसे हो , नियंत्रण करने वाली इकाई का नाम लोकसंसद हो, जनसंसद हो या कोई और हो, यह विषय महत्वपूर्ण नहीं। इस पर बैठकर चर्चा हो सकती है। किन्तु संविधान को संसद की गुलामी से मुक्ति के अतिरिक्त किसी अन्य प्रयास को अंतिम प्रयास मानने पर कोई चर्चा संभव नहीं हैं।
किन्तु अंतिम रुप से निराश होना भी ठीक नहीं। ‘व्यवस्थापक’ एक ऐसी संस्था है जो इस दिशा में निरंतर जनजागरण में सक्रिय है। वैसे तो सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन अर्थात सामाजिक, राजनैतिक, संवैधानिक, आर्थिक, धार्मिक, आदि सब प्रकार के व्यवस्था परिवर्तन के लिए जनजागरण करने में यह संस्था सक्रिय हैं किन्तु वर्तमान में चार मुददों पर प्रमुख जोर दिया जा रहा हैं- 1 परिवार, गॉव ,जिले को संवैधानिक अधिकार 2 लोकसंसद 3 राईट टू रिकॉल 4 सुरक्षा पेंशन। इनमें भी पहले दो मुददों पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। यदि कभी भविष्य में ऐसी मजबूरी आयी कि दो में भी एक को ही चुनना होगा तो यह संस्था लोकसंसद को पहला महत्व देगी। इस तरह वर्तमान समय में मुझे व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी अकेली ऐसी संस्था दिखती है जो व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ और प्रयास की दृष्टि से ठीक ठाक हैं।
इसका यह अर्थ नहीं कि लोकसंसद ही व्यवस्था परिवर्तन है। लोकसंसद तो व्यवस्था परिवर्तन के बीच आने वाली सबसे बडी बाधा को दूर करने का प्रयास है। व्यवस्था परिवर्तन तो सम्पूर्ण व्यवस्था परिर्वतन है। मैं स्वयं को सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए स्वतंत्र रुप से जनजागरण में निरंतर सक्रिय हॅू और उस सक्रियता की एक कडी के रुप में यह मंथन का कार्यक्रम निरंतर तीन महिने से जारी है।

2 प्रश्न – गॉधी जी ने ग्राम स्वराज्य की बात की,जयप्रकाश जी ने लोकस्वराज्य की और अन्ना हजारे ने ग्राम सभा सशक्तिकरण की या राईट टू रिकॉल की। आप इन सबसे हटकर लोकसंसद की बात कर रहे हैं। लोकसंसद अन्य अब से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर- एक कहानी सुनी है कि 5 विद्वान कहीं जाने के लिए रात भर नदी में नाव चलाते रहे और सुबह होते ही देखा कि नाव वहीं खडी है क्योंकि नाव जिस रस्सी के द्वारा पेड से बंधी थी वह रस्सी ही नहीं खोली गई थी। हमें लगता है कि 70वर्षो तक हमने अपने संविधान की रस्सी को संसद से बांधे रखा और बिना रस्सी खोले ग्राम गणराज्य ,राईट टू रिकॉल, लोकस्वराज्य के प्रयास करते रहे। जीवन भर जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, विनोबा भावे, अन्ना हजारे आदि पूरी ताकत से लगे रहे और कोई परिणाम नहीं निकला क्योंकि संविधान आज भी उसी तंत्र के नियंत्रण में है जिसे मुक्त नहीं कराया गया। क्या यह उचित नहीं होगा कि हम अन्य कार्यो के साथ साथ संविधान को संसद से मुक्त कराने का प्रयास भी लेकर चलें। कल्पना करिये कि हमने ग्राम गणराज्य या राईट टू रिकॉल प्राप्त भी कर लिया हो और कुछ वर्षो बाद उसे संसद ने संविधान संशोधन करके वापस ले लिया तो हम क्या कर सकते हैं।
विचारणीय प्रश्न यह है कि संसद के अधिकार क्या हों और उसकी अंतिम सीमा क्या हो यह एक सौ पचीस करोड नागरिक या दस लाख ग्राम सभायें तय करेगी अथवा एक सौ पचीस करोड नागरिक या दस लाख गॉव के अधिकारों की अंतिम सीमा क्या हो यह संसद तय करेगी? मैं तो इस मत का हॅू कि तंत्र के अधिकारों की अंतिम सीमा तय करने की लोक को स्वतंत्रता होनी चाहिए और यदि ऐसी स्वतंत्रता नहीं है तो वह गुलामी है। इसका अर्थ है कि हमें गुलामी से मुक्ति के लिए जनमत जागरण करना चाहिए। गॉधी जी की पहचान इस बात से नहीं बनी थी कि उन्होने चरखा खादी , शराब बंदी, अछूतोद्धार सरीखे अनेक काम किये थे। बल्कि उनकी पहचान का पहला आधार स्वतंत्रता संघर्ष था। गॉधी जीे के अनुसार भारत की स्वतंत्रता एक पडाव मात्र थी। लक्ष्य नहीं। हमारे नेताओं ने गॉधी ,जयप्रकाश, विनोबा लोहिया अन्ना को धोखा देकर स्वतंत्रता का अर्थ राष्ट्रीय स्वतंत्रता तक सीमित कर दिया जबकि उसका वास्तविक अर्थ होता है प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत मामलों में गलती करने तक के निर्णय की असीम स्वतंत्रता। यदि ऐसी स्वतंत्रता में किसी अन्य के द्वारा बाधा पहुचायी जाती है तो वह अपराध है भले ही वह अधिकार उसे संविधान ने ही क्यों न दिया हो। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि व्यवस्था परिर्वतन अभियान कमेटी को लोकसंसद के मुददे को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये। विचार करिये कि संविधान ने ग्राम स्वराज्य का आदेश 25 वर्ष पहले ही दे दिया था किन्तु उन 29 अधिकारों में से एक भी अधिकार आज तक गॉवों को नहीं मिल सका । क्या यह आदर्श स्थिति मानी जायेगी कि हम अपने अधिकारों के लिए अलग अलग जनमत जागरण करते रहें या संसद के सामने भिखारी के समान निवेदन करते रहे । मैं समझता हॅू कि यह स्थिति ठीक नहीं है। समय आ गया है कि व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी फिर से एक नये स्वतंत्रता आन्दोलन की भूख जाग्रत करने का अभियान चलावें। संभव है कि इससे प्रबल जनमत जाग्रत हो सकेगा।

3 पिछले एक सप्ताह से लोकसंसद विषय पर प्रतिदिन विचार मंथन चल रहा है। शनिवार दिनांक 31 से दहेज प्रथा पर विचार मंथन एक सप्ताह तक चलेगा। इसके बाद कृषि का विषय लेंगे।
लोक संसद पर विचार करते समय हमारे कई नये पुराने साथियों ने नेतृत्व का प्रश्न उठाया है। लोेक तंत्र और लोक संसंद विषय पर विचार मंथन और स्थानीय प्रयोग लगभग साठ वर्षो से चल रहा है। मै एक विचारक मात्र हॅू, संगठन कर्ता के कोई गुण मुझमें नही हैं। मै व्यवहार कुशल भी नही हॅू। इसलिये मैने अपन को हमेशा नेतृत्व से दूर रखा । नेतृत्व के विषय पर कई प्रयोग हुए। प्रसिद्ध गांधी वादी ठाकुर दास जी बंग को 1999 मे नेतृत्व दिया गया । बंग जी भी स्वास्थ और उम्र के कारण यह कार्य नहीं करना चाहते थे। उन्होने अमरनाथ भाई और महावीर त्यागी को तैयार किया। महावीर त्यागी ने असहमति व्यक्त कर दी और अमरनाथ भाई ने स्वीकार करने के कुछ माह बाद अन्य गांधीवादियों के दबाव मे दायित्व छोड दिया। मैने गोविन्दाचार्य जी को तैयार किया । किन्तु वे तीन चार वर्षो के बाद अन्य मुददो पर तो सहमत थे किन्तु लोक संसद से असहमत हुए। बंग साहब ने मृत्यु के पूर्व यह सारा दायित्व सिद्धार्थ शर्मा को सौपा और हमारी पूरी टीम ने उनके साथ मिलकर अरविन्द केजरीवाल को आगे बढाने का प्रयास किया। यहां तक कि कई वर्षो तक पूरी टीम उनका समर्थन और सहयोग करती रही। जून 14 मे अरविन्द जी ने लोक संसद के विचार से असहमति प्रकट कर दी ओर हमारा मोह भंग हो गया। अक्टूबर 15 मे नोयडा मे देश भर के साथी इकठ्ठा हुए और विचार मंथन हुआ। वहां तय हुआ कि भविष्य में किसी व्यक्ति के नेतृत्व की अपेक्षा सामूहिक नेतृत्व से कार्य शुरू हो। उसके बाद धीरे धीरे सिद्धार्थ शर्मा ने भी सम्पर्क छोड दिया। अब सामूहिक नेतृत्व के आधार पर एक अस्थाई टीम हर दिशा मे सक्रिय है।
कुछ बाते स्पष्ट हैं।
1 व्यवस्थापक चार मुद्दो पर ही जनमत जागरण करेगा। कोई पांचवा मुद्दा इसमे शामिल नही होगा। आवश्यकतानुसार तीसरे और चौथे मुददे को पीछे भी किया जा सकता है पहले ओर दूसरे मुद्दे में से भी लोक संसद का मुद्दा तो अनिवार्यतः रहेगा ही।
2 व्यवस्थापक का स्वरूप संस्थागत रहेगा, संगठनात्मक नहीं।
3 व्यवस्थापक अपने प्रयास जनमत जागरण तक सीमित रखेगा। आंदोलन की दिशा मे नहीं जायेगा ।
4 किसी भी रूप मे और किसी भी परिस्थिति मे कोई कानून नही तोडा जायेगा।
5 कोई भी कार्यकर्ता किसी भी अन्य राजनैतिक धार्मिक या अन्य संगठन का सदस्य हो सकता है किन्तु वह व्यवस्थापक का कार्य करते समय व्यवस्थापक के बैनर तले उस संगठन की सक्रियता नही दिखायेगा। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी कार्यकर्ता अन्य बैनर तले काम करने के लिये स्वतंत्र होगा।
पिछल एक वर्ष मे देश भर के चार सौ जिलों मे सक्रिय सम्पर्क हो चुका है। अन्य जिलो मे भी निरंतर जारी है। मार्च सत्रह अठारह उन्नीस को देश भर के प्रमुख कार्यकर्ता तथा समर्थक बैठकर आगे की चर्चा करेंगे। इस चर्चा में अक्टूबर 2017 या मार्च 2018 की कोई तारिख तय कर दी जायेगी। उस दस दिवसीय सम्मेलन मे देश भर के लोग बैठकर आगे की नीति बनायेगे। उसी मे बैठकर तय होगा कि नेतृत्व का तरीका क्या हो ओर आगे की दिशा क्या हो?
मै एक विचारक मात्र हॅू । मुझमे संगठन कर्ता के कोई गुण नही है। नैतिक रूप से भी किसी विचारक को कभी किसी संगठन का सदस्य नही होना चाहिये। क्योकि विचारक न तो किसी के अनुशासन से अपने को बांधकर रखता हे न ही किसी अन्य को अपने अनुशासन से बांधता है उम्र और स्वास्थ की दृष्टि से भी मैने लगभग यात्रा या अन्य सक्रियता छोड दी है। वानप्रस्थ के बाद तो मुझे किसी संस्था से भी जुडना उचित नही लगता। इसलिये मै पूरी तरह अलग रहकर अपने को स्वतंत्र विचारो तक सीमित रखता हूॅ। फिर भी यदि कोई आवश्यकता होती है तो हमारे साथी समय समय पर सलाह लेते रहते है। मार्च के तीन दिवसीय कार्यक्रम मे मै उपस्थित रहूॅगा ही। मुझे पूरा विश्वास है कि यह स्वतंत्रता संघर्ष सफल होगा। मै नही कह सकता कि सफलता मे कितना समय लगेगा और तब तक मै रहूंगा या नही। मेरे विचार मे इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नही है। इसलिये मेरी आप सबको सलाह है कि आप नोएडा के मार्च मे आयोजित सम्मेलन मे भाग लेकर इस दिशा मे अपनी सक्रियता स्पष्ट करें। यह खुली बैठक है और कोई भी इस बैठक मे शामिल हो सकता है।

मंथन क्रमांक-13 विषय- लोेकसंसद

Posted By: admin on December 24, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दहेज प्रथा सामाजिक व्यवस्था है, कुरीति नहीं
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीमाएं निर्धारित करता है। लोकतंत्र मे संविधान का शासन होता है और संसद सहित तीनो अंग संविधान के नियन्त्रण मे कार्य करते हैं। संविधान के नीचे संसद , संसद के नीचे कानून, कानून के अंतर्गत नागरिक होता है। कोई भी नागरिक, चाहे कितने भी बडे पद पर हो, किन्तु कानून से उपर नही हो सकता। तंत्र ही कानून बनाता है और उसका पालन भी कराता है। किन्तु यदि कानून बनाने वाला और पालन कराने वाला तंत्र ही संविधान भी संशोधित परिवर्तित करने लगे तो कानून और संविधान की अलग-अलग स्थिति ढोंग बन जाती है, जैसा भारत मे हो रहा है। तंत्र के पास जो शक्ति अर्थात ताकत होती है वह लोक की अमानत होती है, तंत्र का अधिकार नही। दुर्भाग्य से भारत मे तंत्र से जुडी तीनो इकाईयां संविधान से प्राप्त इस शक्ति को लोक की अमानत न समझकर अपना अधिकार समझने लगती है।
मैने कई जगह देखा है कि कुछ लोग अपने व्यावसायिक या अन्य कुत्सित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये धर्म का सहारा लेते हैं। ये एक मंदिर बनाते हैं, उस मंदिर मे किसी भगवान या साई बाबा की मूर्ति स्थापित करते हैं, और स्वयं उसके पुजारी बन जाते है। यह मंदिर और भगवान उस पुजारी के सारे गलत कार्यो मे अप्रत्यक्ष सहायक होता है। मेरा एक मित्र साधु बनकर, मंदिर बनाकर, भगवान को स्थापित करके राजनेताओं को महिलाएं सप्लाई करने का धंधा करता था। मैने उससे किनारा किया। यह कोई एक घटना नहीं हो सकती। ठीक इसी तरह राजनीति भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये मंदिर और भगवान बनाकर स्वयं पुजारी के रूप मे उसकी संचालन बन जाती है। आप विचार करिये कि भारत में राजनीति के नाम पर ऐसा कौन सा अपराध बचा है जो नहीं किया जा रहा । यहां तक कि नरेन्द्र मोदी जी भी संसद मे जाने के पहले उसकी सीढियों को प्रणाम करने का नाटक कर के लोक के समक्ष यह प्रमाणित करते है कि संसद एक मंदिर है और संविधान भगवान। वहां जाने वाला हर नेता संविधान की शपथ लेता है और जब मर्जी उस संविधान मे फेर बदल भी कर देता है। मैं नही समझता कि इतना ढोंग करने का उद्देश्य क्या है।
कुछ बाते स्वयं सिद्ध दिख रही है। 1. किसी भी संविधान का मुख्य उद्देश्य स्वतः कानून का पालन कर रहे नागरिको को भयमुक्त तथा कानून का उल्लंघन करने वालो को पालन करने के लिये मजबूर करना होता है। भारत में संविधान के सक्रिय हुए लगभग सत्तर वर्ष हो गये और इतनी अवधि में कानून का पालन करने वाले कानून से भयभीत हैं और उल्लंघन करने वाले लगभग भयमुक्त।
2. संविधान का कार्य तंत्र से जुडे तीनो अंगो के बीच समन्वय स्थापित करना होता है । भारत मे तंत्र से जुडे दो अंग न्यायपालिका और विधायिका आपस मे इतना नीचे उतर कर अधिकारों की छीना झपटी मे लगे हैं, जैसे दो लुटेरे लूट का माल बंटवारा करने मे झगडा करते हैं। स्पष्ट है कि लोक अर्थात समाज को वोट देने के अतिरिक्त सभी मामलो मे अधिकार विहीन करने का यह परिणाम है। आज हर प्रकार के अपराधियों का राजनीति के तरफ अधिक से अधिक बढता आकर्षण इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कही न कही लोक और तंत्र के बीच मालिक और गुलाम की स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है। लोकतंत्र लोक नियंत्रित तंत्र की जगह तंत्र नियंत्रित लोक के समान बन गया है। स्थिति यहां तक खराब हो गई है कि अब तो जनहित की परिभाषा भी तंत्र ही करने लगा है। हमारे क्या अधिकार हों, यह तंत्र ही तय करेगा और तंत्र के क्या अधिकार हों वह स्वयं तय कर लेगा। हमारा वेतन कितना हो इसका अंतिम निर्णय तंत्र करेगा और तंत्र से जुडे लोगो का वेतन तंत्र स्वयं तय कर लेगा। उसमे कोई लोक से पूछने की आवष्यकता नहीं ।
हरियाणा मे जनहित मे शराब बंद हुई और कुछ वर्ष बाद जनहित मे ही शराब चालू हो गई। क्योकि जनहित की परिभाषा करने का अंतिम अधिकार शराब बंद और चालू करने वाले के पास ही था। उसने जब चाहा तब जनहित की मनमानी परिभाषा बना दी और यदि कही संविधान उसमे बाधक बना तो जनहित मे संविधान की ही व्याख्या बदल दी। इस प्रकार भारत का संविधान संसद का गुलाम है । गुलाम संविधान को माध्यम बनाकर भारत का तंत्र सत्तर वर्षो से समाज को गुलाम बनाकर रखे हुए है।
समस्या क्या है, यह बताने वाले तो आपको गली गली मिल जायेगे, किन्तु हमारा उद्देष्य सिर्फ समस्याओं का रोना नहीं है, बल्कि समाधान की चर्चा करना हैं। अनेक गुलाम यह कहते हुए भी दिख जाते है कि यदि हम सुधर जायेगे तो सब कुछ सुधर जायेगा। मै ऐसी गुलाम मानसिकता वालों मे शामिल नहीं हॅू । मैं तो समस्या के समाधान और उस समाधान मे अपनी प्रत्यक्ष भूमिका की चर्चा करना चाहता हॅू।
संविधान मे व्यापक संशोधन की आवष्यकता है, यह मैं भी समझता हॅू। किन्तु यदि हमने अपनी सुरक्षा के लिये किसी पहरेदार को बंदूक देकर सुरक्षा कर्मी नियुक्त किया और वह पहरेदार ही उस बंदूक से मुझे समाप्त करके सब कुछ ले लेने की नीयत कर ले तो यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रारंभ कहां से किया जाये और उसका तरीका क्या हो? स्पष्ट है कि वह बंदूक उसके हाथ से लेना सबसे पहली प्राथमिकता है। आज हमारा संविधान ससंद के कब्जे में है और उस संविधान को संसद से मुक्त कराने के बाद ही हम कुछ अन्य व्यापक संषोधनो की बात सोच सकते हैं । इसलिये हमारी सबसे पहली प्राथमिकता यह है कि संविधान संषोधन के संसद के असीम अधिकारो की स्थिति मे कुछ फेर बदल हो। इस संबंध मे कई प्रस्ताव हैं जिनमे एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि एक लोक संसद भी बने और यह लोक संसद वर्तमान संसद के समकक्ष होे । इसका चुनाव और चुनाव प्रणाली संसद के ही समान हो और साथ साथ हो। किन्तु लोक संसद और वर्तमान संसद के अधिकार और दायित्व बिल्कुल अलग अलग हों। अर्थात लोक संसद वर्तमान संसद के संविधान संषोधन के एक मात्र अधिकार को छोडकर किसी भी कार्य मे कोई भूमिका अदा नहीं कर सकेगी। यदि कोई संविधान संषोधन का प्रस्ताव लोक संसद अथवा वर्तमान संसद के समक्ष आता है तो लोक संसद और वर्तमान संसद अलग अलग बैठकर सहमति के द्वारा ही संविधान संषोधन कर सकते हैं। यदि दोनो के बीच किसी विषय पर पूरी सहमति नही बनी और अंत तक टकराव कायम रहा तो उक्त संविधान संषोधन के लिये जनमत संग्रह अनिवार्य होगा। लोक संसद का कार्य सिर्फ संविधान संषोधन तक होगा । इसलिये उसकी सक्रियता बहुत कम होगी। इससे जुडे लोगो का कोई वेतन नही होगा, कोई अलग से आॅफिस भी नही होगा। लोक संसद का चुनाव निर्दलीय होगा यदि आवष्यक समझा जाये तो लोक संसद को चार कार्य और भी दिये जा सकते है। 1 राईट टू रिकाल का प्रावधान बनाना। 2 लोकपाल की नियुक्ति और नियंत्रण 3 संसद सदस्यो के वेतन भत्ते का निर्धारण। 4 किन्ही दो संवैधानिक इकाइयों के बीच टकराव की स्थिति मे निपटारा करना। इसके अतिरिक्त लोक संसद की कोई भूमिका नही होगी।
प्रष्न उठता है कि यह कार्य होगा कैसे। संविधान संषोधन के अतिरिक्त कोई और मार्ग नही है। संविधान संषोधन के अब तक दुनिया मे चार मार्ग दिखते हैं। 1. जय प्रकाश जी का अर्थात संसद मे जाकर संविधान संषोधन । 2. अन्ना हजारे का मार्ग जिसमे प्रबल जनमत खडा करके संविधान संषोधन करने हेतु संसद को सहमत करना । 3. ट्यूनीषिया और मिश्र का मार्ग । 4. लीबिया का मार्ग । अंतिम दो मार्ग भारत मे अनावष्यक और अनुपयुक्त हैं। प्रथम दो मार्गो का प्रयोग किया जा सकता है। इन दोनो पर निरंतर सक्रियता बनी हुई है। राजनीति मे जाकर संविधान संषोधन के प्रयास मे कुछ संगठन निरंतर सक्रिय है। हरियाणा मे रणवीर शर्मा भी लगातार इस कार्य मे लगे हुए है। दूसरी ओर व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी अन्ना मार्ग से चलकर लगातार जनमत जागरण का प्रयास कर रही है। मुख्य रूप से दो प्रस्तावो पर अधिक जोर दिया जा रहा है। 1. परिवार, गांव, जिले को संवैधानिक अधिकार। 2. लोक संसद की स्थापना। इन दोनो विषयो पर पिछले एक वर्ष से निरंतर संपूर्ण भारत मे एक साथ जनमत जागरण किया जा रहा है। इन दोनो प्रयासों से कौन सा सफल होगा, यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु दोनो प्रयास अलग अलग निरंतर जारी हैं और लोग अपनी अपनी रूचि अनुसार जुडते जा रहे हैं। यहां तक कि व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी की ओर से सत्रह, अठारह, उन्नीस मार्च को नोएडा मे एक राष्ट्रीय सम्मेलन की भी योजना बनी है। कमेटी ने आम लोगो से शामिल होने का भी निवेदन किया है।
मै एक विचारक हॅू। उम्र और स्वास्थ के हिसाब से आवागमन या सक्रियता कठिन है। फिर भी मै एक विचारक के रूप मे इन प्रयासो का सहयोग और समर्थन करता हॅू। साथ ही मै एक आस्थावान हिन्दू होने के आधार पर ईष्वर से भी निवेदन करता हॅू कि समाज व्यवस्था को गंदी राजनीति की गुलामी से मुक्त होने मे सहायता करे।
नोट- मंथन का अगला विषय दहेज प्रथा होगा।

मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा व प्रश्नोत्तर

Posted By: admin on December 18, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1 प्रश्न -आपने अधिकारों की बात की है किन्तु कर्तव्य के बिना अधिकार का कभी उपयोग नहीं हो पाता। संविधान में नागरिक के कर्तव्यों का भी समावेश है। साथ ही राज्य के कर्तव्य भी धारा 34 से 51 तक वर्णित है । इस संबंध में आपका क्या कहना है?
उत्तर- संविधान बनाने वालो की नासमझी या बुरी नीयत के कारण संविधान में कर्तव्यों का समावेश किया गया। वास्तविकता यह है कि संविधान समाज के द्वारा बनाया जाता है तथा राज्य के लिए बाध्यकारी होता है। संविधान का पालन करना राज्य का दायित्व होता है कर्तव्य नहीं। क्योंकि राज्य को समाज शक्ति देता है, अधिकार नहीं और यह शक्ति राज्य के पास समाज की अमानत होती है। दुर्भाग्य है कि राज्य ने उस शक्ति को अपना अधिकार मान लिया और उस अधिकार का दुरुपयोग करके उसने संविधान में समाज के उपर कर्तव्यों का बोझ डाल दिया। राज्य का जो दायित्व होता है वही समाज का और व्यक्ति का अधिकार बन जाता है। उस अधिकार की पूर्ति के लिए राज्य समाज के समक्ष उत्तरदायी होता है। स्वैच्छिक कर्तव्य के लिए कोई किसी के समक्ष उत्तरदायी नहीं होता। नासमझी के कारण संविधान ने मजबूतों के स्वैच्छिक कर्तव्यों को कमजोरो का अधिकार घोषित कर दिया। यह घोषणा पूरी तरह गलत है। समाज का दायित्व नहीं है कि वह किसी कमजोर की मदद करे। मदद करने के लिए कोई किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता बल्कि वह तो उसका कर्तव्य होता है। यदि कही आग लगी है तो आग बुझाना सबका कर्तव्य है और आग बुझाने वालों को धन्यवाद देना आग पीडित का कर्तव्य। यदि समाज का व्यक्ति आग नहीं बुझाता तो ऐसा कार्य उसका असामाजिक कार्य माना जायेगा किन्तु समाज विरोधी नहीं। ऐसे व्यक्ति को समाज बहिष्कृत कर सकता है किन्तु दण्डित नहीं। दुर्भाग्य से कर्तव्य और दायित्व, असामाजिक और समाज विरोधी तथा बहिष्कार और दण्ड का भेद न समझने के कारण ये भ्रांतियाॅ फैली हुई हैं।

2 प्रश्न -आपने इस्लाम और हिन्दुत्व की चर्चा करते समय लिखा है कि इस्लाम भविष्य में अंतिम सत्य खोजने की छूट नहीं देता जबकि हिन्दुत्व में यह छूट है। आप बताइये कि क्या हिन्दुत्व के आधार पर वेद अंतिम सत्य नहीं है? क्या वेद से हटकर भी कुछ सोचा जा सकता है?
उत्तरः- मेरे विचार में इस्लाम में कुरान अंतिम सत्य है और मोहम्मद साहब अंतिम पैगंम्बर। हिन्दुत्व में कोई भी पुस्तक अंतिम सत्य नहीं मानी जाती, न ही किसी को अंतिम पैगम्बर माना जाता है। हिन्दुत्व में मृत महापुरुष मार्ग दर्शक माने जाते हैं और किसी महापुरुष की कही कोई बात बाध्यकारी नहीं होती, क्योंकि हिन्दुत्व में प्रत्येक व्यक्ति को निरंतर नये अनुसंधान करने की स्वतंत्रता है। स्वामी दयानंद ने वेदो को सभी विद्याओं की पुस्तक माना है, साथ ही यह भी लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति को सत्य का ग्रहण करने और असत्य को छोडने के लिए निरंतर तैयार रहना चाहिये। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति को सत्य और असत्य के बीच की सीमा रेखा निर्धारित करने की स्वतंत्रता है और वेद ऐसे सत्य तक पहुचने में सहायक होता है, बाध्यकारी नहीं, अंतिम सत्य नहीं । मेरे विचार में प्रत्येक व्यक्ति को निर्णय करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और कोई भी विचार उसकी स्वतंत्रता में बाधक नहीं बन सकता। यहॉ तक कि ईश्वर भी नहीं। स्वामी जी ने स्पष्ट लिखा है कि ईश्वर न्याय करता है । साथ ही ईश्वर अपने संदेश किसी व्यक्ति के अंतः करण के माध्यम से ही समाज को देता है। खुदा ने भी मोहम्मद साहब के माध्यम से संदेश दिया और इस्लाम में कोई अन्य संदेशवाहक पैदा ही नहीं हो सकता। कल्पना करिये कि वर्तमान समय में यदि खुदा को भी समाज के समक्ष कोई संदेश देना होगा तो उनकी मजबूरी है कि वह किसी गैर इस्लामी विद्वान को ही माध्यम बनायेंगे।

3 प्रश्नोत्तर
संविधान समीक्षा विषय पर बहुत विस्तृत चर्चा हो रही है। मुख्य रूप से दो प्रश्न उठे है । 1 आपने कई बार भारतीय संविधान को समुद्र मे डालने जैसा कहा है। आज उसे भगवान कह रहे है यह परिवर्तन कैसे? 2 क्या संविधान की तुलना भगवान से करना उचित है?
उत्तर- मैने कभी नहीं कहा कि संविधान को समुद्र मे डाल दिया जाय। बल्कि मैने हमेशा यह कहा कि संवैधानिक तरीके से संविधान मे व्यापक और मौलिक संशोधन करके वर्तमान संविधान को समुद्र मे डाल देना चाहिये । क्योकि यह संविधान समु्रद मे जाने लायक ही है। मेरे विचार से कोई न कोई संविधान तो रहेगा ही। मैने भारतीय संविधान को भगवान नही कहा है बल्कि संविधान को भगवान कहा है। स्पष्ट है कि प्रत्येक इकाई अपने ठीक ठीक संचालन के लिये जो व्यवस्था बनाती है। उस व्यवस्था पर किसी संविधान के द्वारा ही उस इकाई का नियंत्रण होता है। इसका अर्थ हुआ कि उस इकाई के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक नागरिक के लिये वह संविधान भगवान स्वरूप होगा। किन्तु यदि उस संविधान को उस इकाई की सहमति या इच्छा के विरूद्ध उपर से थोप दिया जाये तो वह थोपा हुआ संविधान भगवान नही माना जायेगा। भारतीय संविधान गुलाभ भारत मे बनना शुरू हुआ तथा संविधान सभा का गठन भी अंग्रेजो ने ही किया था। स्वतंत्र भारत के नागरिको की राय नही ली गई थी। स्वतंत्रता के बाद भी कभी संविधान सभा का गठन नागरिको के द्वारा नही किया गया। बल्कि निर्वाचित संसद को ही संविधान सभा मान लिया गया। इसलिये ऐसे गुलामी के संविधान को अनंत काल तक स्वीकार नही किया जा सकता। विशेषकर तब, जब उसका परिणाम भी बिल्कुल विपरीत आ रहा हो।
पूरी दुनियां मे समाज की मान्यता भ्रम पूर्ण बना दी गई है । समाज सर्वोच्च होता है और धर्म, राष्ट, संविधान, यहां तक कि भगवान भी समाज से उपर नहीं हो सकते। किन्तु यह गलत धारणा प्रचारित की गई है कि समाज से उपर भगवान या धर्म राष्ट आदि होते हैं । समाज ही भगवान को मान्यता देता है, और समाज ही संविधान को भी मान्यता देता है। इसका अर्थ हुआ कि समाज सबसे उपर है। भगवान से भी उपर।
व्यक्ति भगवान को मानता है और नागरिक संविधान को । इस तरह संविधान और भगवान को समकक्ष भी कहा जा सकता है। क्योकि किसी भी नागरिक के लिये तो संविधान ही सर्वोच्च होता है। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है ओर इस पर आगे और चर्चा संभव है। क्योकि मै व्यक्ति और नागरिक को अलग अलग देखता हॅू तथा भगवान को समाज से नीचे ।
नोट-संविधान समीक्षा विषय पर बहुत विस्तृत चर्चा को देखते हुए मंथन का अगला विषय लोक संसद रखा जा रहा है। दहेज प्रथा पर उसके अगले सप्ताह मंथन होगा।

मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा

Posted By: admin on December 17, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दहेज प्रथा सामाजिक व्यवस्था है, कुरीति नहीं
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख मे भारतीय संविधान तक समीक्षा करने तक सीमित है।
तानाशाही और लोकतंत्र बिल्कुल विपरीत प्रणालिया हैं। तानाशाही में शासन का संविधान होता है और लोकतंत्र मे संविधान का शासन । भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसलिये हम कह सकते है कि यहां संविधान का शासन है भी और होना भी चाहिये। दुनियां के अधिकांश लोकतांत्रिक देशो संविधान का शासन माना जाता है। स्वाभाविक है कि लम्बे समय के बाद संविधान मे कुछ बदलाव की आवश्यक होती है। यदि हम पूरी दुनियां का आकलन करे तो अन्य लोकतांत्रिक देशो मे भी वर्तमान संविधान अपेक्षित परिणाम नही दे पा रहे किन्तु यदि हम भारत का आकलन करे तो भारतीय संविधान सत्तर वर्षो मे ही विपरीत परिणाम देता रहा है और यह गति आज तक बढ रही है। दुनियां के संविधान बनाने वालों की यदि समीक्षा करें तो हो सकता है कि उनसे कुछ भुले ही हुई हो अथवा लम्बा समय बीतने के बाद कुछ परिस्थितियां बदली हों । किन्तु भारतीय संविधान बनाने वालो से अनेक भूले तो हुई ही किन्तु उनकी नीयत पर भी संदेह होता है।
यदि हम लोकतंत्र को ठीक ठीक परिभाषित करे तो लोकतंत्र का अर्थ होना चाहिये लोक नियंत्रित तंत्र । भारतीय संविधान निर्माताओ ने इसे बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दिया। वेसे तो पूरी दुनियां मे कही भी लोकतंत्र की आदर्श परिभाषा स्पष्ट नही है किन्तु भारत में तो दुनियां से अलग लोकतंत्र की अपनी अलग परिभाषा बना ली। ऐसा लगता है कि हमारे संविधान निर्माताओ मे सत्ता प्राप्त करने की बहुत ज्यादा जल्दी थी। आदर्श स्थिति मे तंत्र प्रबंधक होता है और लोक मालिक किन्तु भारतीय संविधान निर्माताओ ने तंत्र को प्रबंधक की जगह शासक कहना शुरू कर दिया, जिसका अर्थ हुआ कि लोक मालिक नही बल्कि शासित है। तंत्र के अधिकार लोक की अमानत होते है किन्तु हमारे तंत्र से जुडे लोगो ने उन्हे अमानत न समझ कर अपना अधिकार मान लिया।
पुरी दुनियां मे न तो संविधान की कोई स्पष्ट परिभाषा बनी न ही मूल अधिकार की। यहां तक कि अपराध, गैर कानुनी, अनैतिक की भी अलग अलग व्याख्या दुनियां मे नही हो पाई। राज्य का दायित्व क्या हो और स्वैच्छिक कर्तब्य क्या हो, यह भी नही हो पाया। दुर्भाग्य से हमारे संविधान निर्माताओ ने जल्दवाजी मे या ना समझी मे इस प्रकार की परिभाषाओ पर चिंतन मंथन करने की अपेक्षा विदेशी संविधानों की नकल करना उचित समझा। परिणाम आपके सामने है कि आज तक ऐसे गहन मौलिक विषयो को कभी परिभाशि त नही किया गया। न ही भारत मे और न ही दुनियां मे। संविधान की परिभाषा यह होती है कि तंत्र के अधिकतम और लोक के न्युनतम अधिकारो की सीमाए निश्चित करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते है और व्यक्ति के अधिकतम तथा तंत्र के न्यूनतम अधिकारो की सीमाएं निश्चित करने का कार्य कानून कहा जाता है। कानून तो तंत्र के द्वारा बनना स्वाभाविक है किन्तु संविधान या तो लोक के द्वारा बनाया जायेगा अथवा लोक और तंत्र की समान भुमिका होगी। किन्तु हमारे संविधान निर्माताओ ने तंत्र को ही संविधान संषोधन के असीम अधिकार दे दिये जिसका अप्रत्यक्ष अर्थ हुआ कि भारत मे संविधान तंत्र नियंत्रित हो गया अर्थात तंत्र की तानाशाही हो गई । संविधान के मौलिक सूत्रो का निर्माण समाज शास्त्र का विषय है और व्यावहारिक स्वरूप या भाषा राजनीति शास्त्र का । भारत का संविधान बनाने मे मौलिक सोच भी राजनेताओ की रही और भाषा देने मे भी लगभग अधिवक्ताओ का ही अधिक योगदान रहा। परिणाम हुआ कि भारत की संवैधानिक संरचना वकीलो के लिये स्वर्ग के समान बन गई।
भारतीय संविधान मे कुछ कमियां प्रारंभ से ही दिखती हैं। 1 संविधान को हमेशा स्पष्ट अर्थ प्रदाता होना चाहिये, द्विअर्थी नही। आज स्थिति यह है कि न्यायालय तक संविधान की विपरीत व्याख्या करते देखे जाते है। ऐसा महसूस हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच के उपर भी कोई और बेंच होती तो फुल बेंच के अनेक निष्कर्ष बदल सकते थे।
2 परन्तु के बाद मूल अर्थ न बदलकर अपवाद ही आना चाहिये किन्तु भारत के संविधान मे परन्तु के बाद उसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया जाता है। भारत मे धर्म जाति, लिंग, का भेद नही होगा। सबको समान अधिकार होगे। किन्तु महिलाओ, अल्प संख्यको, आदिवासियों, पिछडों के लिये विशेष कानून बनाये जा सकते है। स्पष्ट है कि भारत की 90 प्रतिशत आबादी समानता के अधिकारो से वंचित हो जाती है।
3 धर्म जाति भाषा लिंग आदि के भेद समाज के आंतरिक मामले है जबकि परिवार गांव जिले व्यवस्था की इकाइया है। भारतीय संविधान ने परिवार, गांव जिले को तो संविधान से बाहर कर दिया और धर्म जाति भाषा लिंग भेद को संविधान मे घुसा दिया। परिणाम हुआ कि वर्ग समन्वय टूटा और वर्ग विद्वेष वर्ग संधर्ष बढ गया।
4 संविधान बनाने वालो ने तंत्र के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तब्य का अंतर नही समझा । तंत्र का दायित्व होता है सुरक्षा और न्याय और स्वैच्छिक कर्तब्य होता है अन्य जन कल्याणकारी कार्यो मे सहायता। संविधान निर्माताओ ने सुरक्षा और न्याय की तुलना मे जन कल्याण को अधिक महत्व दिया। यहां तक कि संविधान मे व्यावहारिकता का भी पूर्णतः अभाव रहा । ऐसी ऐसी आदर्श वादी घोषणाए कर दी गई जो संभव नही थी। उसका परिणाम हुआ अव्यवस्था ।
5 संविधान निर्माताओ उद्देशिका मे नासमझी मे समानता शब्द शामिल कर दिया जबकि समानता की जगह स्वतंत्रता शब्द होना चाहिये था। उन्होने समानता का अर्थ भी ठीक ठीक नही समझा। आर्थिक असमानता की तुलना मे राजनैतिक असमानता अधिक घातक होती है। हमारा संविधान आर्थिक सामाजिक असमानता को अधिक महत्व देता है और उसके कारण राजनैतिक असमानता बढती चली जाती है।
6 सिद्धान्त रूप से कमजोरो की सहायता मजबूतो का कर्तब्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही। हमारे संविधान निर्माताओ ने इस सहायता को कमजोरो का अधिकार बना दिया। इसके कारण अक्षम और सक्षम के बीच वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष बढा । मजबूतो को कमजोरो ने सहायक न मानकर शोषक मान लिया।
किसी संविधान मे यदि एक मौलिक कमी हो तो वह अकेली कमजोरी भी दूरगामी प्रभाव डालती है । किन्तु भारतीय संविधान मे तो सारी कमियां ही विद्यमान हैं और हर साख पर उल्लू बैठा है के अन्जाम के आधार पर परिणाम स्पष्ट दिख रहा है । आज यदि भारत की जनता बढती हुई अव्यवस्था के समाधान के लिये किसी तानाशाह का भी सम्मान करने को तैयार है तो यह दोष जनता का न होकर हमारे संविधान निर्माताओ का ही माना जाना चाहिये। इसलिये मै समझता हॅू कि कही न कही संविधान निर्माताओ की नीयत मे भी खराबी थी तभी उन्हेाने संविधान संशोधन तक के अधिकार लोक से छीनकर तंत्र को दे दिये तथा लोकतंत्र की परिभाषा पूरी तरह बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दी।
हम भारतीय संविधान के कुछ परिणामो की व्याख्या करें। 1 भारतीय संविधान का पहला परिणाम यह दिख रहा है कि तंत्र शरीफो, गरीबो, ग्रामीणो, श्रमजीवियों के विरूद्ध धूर्तो, अमीरों, शहरीयों, बुद्धिजीवियों का मिला जुला षणयंत्र दिखने लगा है। 2 स्पष्ट दिख रहा है कि संसद एक जेल खाना है जिसमे हमारा भगवान रूपी संविधान कैद है। संविधान एक ओर तो संसद की ढाल बन जाता है तो दूसरी ओर संविधान संसद की मुठ्ठी मे कैद भी है। 3 न्यायपालिका और विधायिका के बीच ऐसी अधिकारो की छीना झपटी दिख रही है जैसे लूट के माल के बटवारे मे दिखती है। 4 लोक और तंत्र के बीच दूरी लगातार बढती जा रही है । लोक हर क्षेत्र मे तंत्र का मुखापेक्षी हो गया है । यहा तक कि तंत्र और लोक के बीच शासक और शासित भावना तक घर कर गई है। 5 समाज के हर क्षेत्र मे वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग विद्वेष बढ रहा है। 6 तंत्र का प्रत्येक अंग हर कार्य मे समाज को दोष देने का अभ्यस्त हो गया है। तंत्र का काम सुरक्षा और न्याय है । किन्तु तंत्र इसके लिये भी लोक को ही दोषी कहता हे। यहा तक कि कुछ वर्ष पूर्व भारत के प्रधान मंत्री राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता तक ने कहा या कि संविधान दोषी नही है बल्कि उसका ठीक ठीक पालन नही होता। पालन न करने वाले दोषी है। दोषी संविधान है, व्यवस्था है, तंत्र है, और समाज मे हम सुधरेगें जग सुधरेगा जैसा गलत विचार प्रसारित किया जा रहा है। 7 भारत मे लगातार अब्यवस्था बढती जा रही है । भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और उससे भी अधिक तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।
समस्याओ पर हमने विचार किया किन्तु समाधान भी सोचना होगा। समस्या विश्व व्यापी है किन्तु समाधान की शुरूआत भारत कर सकता है और भारत की शुरूआत हम आप कर सकते है। 1 परिवार और गांव को तत्काल संवैधानिक अधिकार दिये जाने चाहिये। इससे तंत्र का बोझ घटेगा और तंत्र सुरक्षा और न्याय की ओर अधिक सक्रिय हो सकेगा। 2 संविधान को संसद के जेलखाने के से मुक्त कराने की पहल होनी चाहिये। संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्रमुक्त किसी इकाई को दिये जाने चाहियें। 3 लोक तंत्र, मूल अधिकार अपराध, समानता आदि की वर्तमान भ्रम पूर्ण मान्यताओ को चुनौती देकर वास्तविक अर्थ स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये। 4 संविधान कानून आदि शब्दो की भी स्पष्ट परिभाषा बननी चाहिये। भले ही अब तक दुनियां मे न बनी हो। संसदीय लोकतंत्र को बदल कर सहभागी लोकतंत्र की दिशा मे बढना चाहिये। 5 सांसद को दल प्रतिनिधि की जगह जन प्रतिनिधि होना चाहिये। संसदीय लोकतंत्र को बदलकर निर्दलीय व्यवस्था की ओर जाना चाहिये। जिस तरह आज संसद असंसदीय दृष्य प्रस्तुत करती है वह हमारे लिये शर्म और चिन्ता का विषय है। भारतीय संविधान मे कुछ मौलिक सुधार की आवश्यकता है। ऐसे सुधार भी होने चाहिये।
मुझे विश्वास है कि भारतीय संविधान की कमजोरियां को दूर करने की हमारी कोशिष विश्व व्यापी परिवर्तन की दिशा मे ले जा सकती है हमे इस दिशा मे विचार मंथन करना चाहिये।
मंथन का अलगा विषय- दहेज प्रथा, कितनी व्यवस्था कितनी कुरीति?

मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।

Posted By: admin on December 10, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

15222भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 विचार प्रधान (2) शक्ति प्रधान (3) अर्थ प्रधान (4) उन्मुक्त प्रधान। इन्हे ही भारत में क्रमशः ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र संस्कृति माना जाता है। पहली संस्कृति हिन्दुत्व के साथ जोड़कर देखी जाती है तो दूसरी इस्लाम तीसरी इसाईयत और चैथी साम्यवाद। वर्तमान समय में हम चारों का अनुभव कर चुके है। यह कहना गलत है कि श्रृष्टि के प्रांरभ से लेकर अब तक संस्कृतियों का प्रभाव घटते घटते पहली बार कलयुग के रुप में आया है। बल्कि यथार्थ यह है कि देवासुर संग्राम कई बार हुआ है और पृथ्वी पर कई बार संस्कृतियों का उतार चढाव होता रहा है।
बहुत प्राचीन समय में क्या व्यवस्था थी यह ठीक ठीक नहीं बताया जा सकता क्योंकि किंवदंती के अनुसार ही हम रामकृष्ण, रावण, कंस, का अस्तित्व स्वीकार करके अपनी धारणा को पुष्ट करते है किन्तु बुद्ध महावीर के काल से लेकर स्वतंत्रता तक का इतिहास उपलब्ध है जिस आधार पर कुछ पुष्ट धारणा बनाई जा सकती है। यद्यपि इस इतिहास मे भी कितनी मिलावट है कितना यथार्थ यह नहीं कहा जा सकता किन्तु कुछ बाते यथार्थ के रुप में कहीं जा सकती है क्योंकि उनका प्रभाव आज तक दिखाई दे रहा है। स्वतंत्रता के बाद का सारा घटनाक्रम प्रत्यक्ष दिख रहा है और उसकी वास्तविक समीक्षा विश्वासपूर्वक की जा सकती है।
यदि हम स्वतंत्रता के बाद का इतिहास और वर्तमान स्थिति की तुलना करें तो कुछ बाते विश्व से लेकर भारत तक में साफ देखी जा सकती हंै। भारत ने राजतंत्र, इस्लाम, अंग्रेज तथा साम्यवाद का पर्याप्त अनुभव किया है। स्वतंत्रता के बाद यद्यपि भारत में लोकतंत्र था किन्तु वह लोकतंत्र पूरी तरह वामपंथ के प्रभाव में था जो 91 के बाद बदलना शुरु हुआ। वर्तमान समय में साम्यवाद वामपंथ अथवा समाजवाद इतिहास की वस्तु बन चुके हैं। अब यह विचारधारा लगभग समापन की ओर है।स्वतंत्रता के बाद भारत में इस्लाम भी लगातार विस्तार पाता रहा। यहाॅ तक कि भारत में हिन्दुओं का तीन चैथाई बहुमत होते हुये भी हिन्दू मुसलमानों की तुलना में दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहे। जनसंख्या और मनोबल के आधार पर भारत में मुसलमान सर्वाधिक शक्तिशाली रहे। भारत में अव्यवस्था भी चरम तक बढी और भ्रष्टाचार भी। नक्सलवाद और आतंकवाद भी लगातार बढता गया। ऐसा लगा कि वास्तव में कलयुग अपने चरम पर है। हिन्दुत्व और इस्लाम की मान्यताओं में एक विशेष अंतर यह होता है कि इस्लाम धर्म को ही मानवता मानकर चलता है जबकि हिन्दुत्व मानवता को ही धर्म मानता है। इस्लाम धर्म नहीं होता बल्कि सिर्फ संगठन मात्र होता है जबकि हिन्दुत्व संगठन बिल्कुल नहीं होता सिर्फ धर्म होता है। इस्लाम में अंतिम सत्य खोजने पर पूरी तरह प्रतिबंध होता है जबकि हिन्दुत्व अंतिम सत्य खोजने की पूरी स्वतंत्रता देता है। इस्लाम संगठन शक्ति को सहजीवन से अधिक महत्व देता है। इस्लाम न्याय की तुलना में अपनत्व को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जबकि हिन्दुत्व संगठन की तुलना में संस्था को अधिक महत्व देता है तथा अपनत्व की जगह भी न्याय महत्वपूर्ण मानता है। आज दुनिया इतनी आगे चली गई है फिर भी यदि संगठित इस्लाम धार्मिक इस्लाम में आज तक नहीं बदला जा सका तो यह कलियुग का प्रभाव ही माना जा सकता है।
पिछले कुछ वर्षो से ऐसा लग रहा है कि युग बदलने लगा है। चार लक्षण बिल्कुल स्पष्ट दिख रहे हैं-
1 साम्यवादी विचारधारा लगभग समाप्त हो गई है इसलिए उस पर किसी प्रकार की चर्चा उचित नहीं।
2 संघे शक्ति कलौयुगे अर्थात संगठन में ही शक्ति है की विचारधारा राडार पर है। सबसे पहले बुद्ध ने इस विचारधारा का प्रतिपादन किया था किन्तु संगठन में ही शक्ति है, इस विचारधारा का सबसे अधिक लाभ इस्लाम ने उठाया। 1400 वर्षो तक इस्लाम इस विचारधारा को माध्यम बनाकर सारी दुनिया में छा गया। यहाॅ तक कि स्वतंत्रता के पूर्व संघ परिवार ने भी हार थक कर इस्लाम की नकल की और संगठन बनाकर भारत में बडी सफलता प्राप्त की। किन्तु पिछले कुछ वर्षो से यह विचारधारा संकट में आ गई है। सारी दुनिया में इस्लाम अविश्वसनीय हो गया है। भारत में नरेन्द्र मोदी और अमेरिका में ट्रम्प की विजय में इस नफरत का बहुत बडा योगदान रहा है। इस्लाम सारी दुनिया को दारुल इस्लाम में बदलने के लिए प्रयत्नशील रहा है। किन्तु अब तो ऐसा दिखने लगा है कि या तो उसे दारुल अमन की ओर लौटना होगा अन्यथा वह चैदहवी सदी की कहावत के अनुसार समापन की ओर चला जायेगा। इजराइल या वर्मा हो अथवा कश्मीर ही क्यों न हो कहीं भी इस्लामिक कटटरवाद को अब समर्थन नहीं मिल रहा है। यहाॅ तक कि अनेक मुस्लिम देश भी अब ऐसे आतंकवाद का विरोध करने लगे हैं। पाकिस्तान अलग थलग पडता जा रहा है। कश्मीर की स्थिति यह है कि कहीं लेने के देने न पड जाये। दुनिया के मुसलमानों को सहजीवन अपनाना ही होगा । यदि थोडे दिनों के लिए भी संघ परिवार चुप हो जाये तो इस्लाम की अकल ठीकाने आने में देर नहीं लगेगी और मोदी के आने के बाद यह संभव भी दिखता है। आज कल सुब्रमन्यम स्वामी योगी आदित्यनाथ आदि भी कम बोलने लगे है। यह शुभ लक्षण है।
3 भारत में राजनीति का स्तर ठीक होने लगा है। सत्ता पक्ष में नरेन्द्र मोदी एक ध्रुव के रुप में स्थापित हो रहे है , तो विपक्ष में भी नीतिश कुमार और अखिलेश यादव लगातार लोकप्रियता की ओर बढ रहे है । अरविन्द केजरीवाल भी नीचे जा रहे है और भविष्य में ममता बनर्जी की भी यही संभावना दिखती है। इससे स्पष्ट है कि अब राजनीति में नैतिकता का ग्राफ उपर होगा। वर्तमान नोटबंदी कार्यक्रम ने भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने की शुरुवात कर दी है। मैं स्पष्ट हॅू कि भारत की राजनीति ठीक दिशा में जा रही है।
4 दुनिया में फेसबुक, वाटसअप आदि का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। यह प्रचलन विचार मंथन में सहायक हो रहा है। अब विचार प्रचार की संभावनाएॅ घटनी शुरु हो गई है। यहाॅ तक कि मीडिया का भी महत्व घट रहा है और फेसबुक आदि के माध्यम से प्रत्यक्ष विचार मंथन हो रहा है । यह भी एक शुभ लक्षण है।
युग परिवर्तन अपने आप नहीं होता है बल्कि उसमें परिस्थिति अनुसार स्वयं को भी सक्रिय होना पडता है। साम्यवाद की चर्चा बंद कर देनी चाहिए। इस्लाम पर विचार करते समय ध्यान रखना होगा कि दस प्रतिशत कटटरवादी मुल्लामौलवी 80 प्रतिशत सामान्य मुसलमानों को अपने साथ जोडे रखते है। जो दस प्रतिशत आधुनिक सोच के मुसलमान है उन्हें ये 90 प्रतिशत एक जुट होकर अलग थलग कर देते है। इन बीच वाले 80 प्रतिशत मुसलमानों के विचार परिवर्तन की जरुरत है जिससे वे कटटरपंथी मूल्लामौलवीयों के नियंत्रण से बाहर आ सके । यह कार्य संबंधो के आधार पर भी हो सकता है और विचारों के आधार पर भी। सभी मुसलमानों को गाली देने की प्रवृत्ति बहुत घातक है। जहाॅ तक भारतीय राजनीति का संबंध है तो नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, अखिलेश यादव की राजनीति बीच का पडाव मात्र है। आदर्श स्थिति नहीं नहीं। आदर्श स्थिति के लिए एक निष्पक्ष दल विहीन तीसरे पक्ष को सामने आना चाहिए जो दलगत राजनीति से दूर रहकर जनमत पर मजबूत प्रभाव बना सके। सौभाग्य से व्यवस्थापक इस दिशा में निरंतर सफलतापूर्वक बढ रहा है। वाटसअप फेसबुक बेबसाइट आदि को माध्यम बनाकर स्वस्थ विचार मंथन को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। इस दिशा में भी निरंतर प्रयास जारी है। मैं पूरी तरह आश्वस्त हॅू कि अब कलयुग का अंतिम चरण समाप्त होने तथा युग परिवर्तन के लक्षण सारी दुनिया में दिखने शुरु हो गये है। आवश्यकता यह है कि हम इस यज्ञ में अपनी आहुति कितनी और किस प्रकार दे सकते हैं, इसकी तैयारी करें।
सारी दुनिया में इस्लाम को उसके वास्तविक स्वरुप में पहचानने की शुरुवात हो गई है। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प का अप्रत्याशित जीतना अथवा भारत में नरेन्द्र मोदी की अप्रत्याशित बढती लोकप्रियता में इस्लाम के प्रति बढते संदेह का बहुत बडा योगदान है। जिस तरह पाकिस्तान अलग थलग होता जा रहा है। जिस तरह वर्मा में रोहिंग्या मुसलमान अकेले दिखने लगे हैं तथा उन्हे मानवता के नाम पर भी शरण नहीं मिल पा रही , जिस तरह सारी दुनिया में मानवता के नाम पर होने वाला मुसलमानों के साथ अच्छे व्यवहार का दृष्टिकोण बदलता जा रहा है वह वास्तव में युग परिवर्तन का संकेत है। चैदह वर्षो तक इस्लाम अपनी संगठन शक्ति के बल पर ही अपना विस्तार करता रहा। अब ऐसे लक्षण दिखने लगे हैं कि इस्लाम को या तो अपनी संगठनात्मक विचारधारा छोडनी होगी अथवा अपने समापन की प्रतिक्षा करनी होगी। जिस तरह इस्लाम बढता रहा उस तरह अब दुनिया स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। ये लक्षण सारी दुनिया में भी दिख रहे है और भारत में भी। भारत में भी कश्मीरी आतंकवाद आज कल कुछ शराफत की भाषा बोलना शुरु कर दिया है।
यदि भारत की समीक्षा करें तो सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य मामलों में भी युग परिवर्तन के संकेत दिखने लगे है। राजनीति में तीन अलग अलग समूह स्पष्ट है । सत्ता पक्ष के रुप में नरेन्द्र मोदी का एक छत्र प्रभाव बढ रहा है दूसरी ओर विपक्ष में भी अब नीतिश कुमार और अखिलेश यादव ही स्पष्ट आगे बढ रहे है तथा अन्य अनेक विपक्षी कहे जाने वाले नेताओं का प्रभाव घट रहा है। अरविंद केजरीवाल भी लगातार नीचे जा रहे है। ममता बनर्जी को भी दो चार वर्षो में चुनौती मिलेगी ही। इस तरह राजनीति में साफ सुथरी नीयत और नीति वालो का बढता प्रभाव साफ दिख रहा है। व्यवस्था परिवर्तन अभियान के नाम से पक्ष विपक्ष के बीच एक निष्पक्ष प्रयत्न का निरंतर मजबूत होना भी युग परिवर्तन का संकेत दे रहा है।
आर्थिक नीतियाॅ भी सारी दुनिया में बदल रही हैं। भारत में तो नोटबंदी प्रकरण ने आर्थिक नीतियों में सकारात्मक बदलाव की गति बहुत तेज कर दी है। समाज व्यवस्था भी ठीक दिषा में जाती दिख रही है। वर्ग संघर्ष घटकर आंशिक रुप से वर्ग समन्वय की तरफ बढने के संकेत दिखने लगे है।
फिर भी अभी कुछ कार्य भारत में युग परिवर्तन में बाधक है। भारत की न्यायपालिका अभी भी अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने पर अडी हुई है। अभी न्यायपालिका में जे एन यू संस्कृति का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। इसी तरह इस्लाम के संदेह के घेरे में आने से तथा नरेन्द्र मोदी के बढते प्रभाव से साम्प्रदायिक हिन्दुत्व तथा संगठनवादी विचारधारा का मनोबल बढने लगा है। युग परिवर्तन में इनका बढता प्रभाव भी बाधक होगा क्योंकि संगठन शक्ति हमेशा सहजीवन में असंतुलन पैदा करती है। जिस तरह साम्यवाद अपने आप गया इस्लाम अपने आप कटटरवाद को छोडेगा, उसी तरह भारत की न्यायपालिका तथा संगठनप्रिय हिन्दुत्व को भी बदलना ही होगा।
मेरी अपने मित्रों को सलाह है कि वे किसी पक्ष विपक्ष में झुकने की अपेक्षा निष्पक्ष रहने दिखने की आदत डाले। वे यदि सक्रिय होना चाहते है तो व्यवस्था परिवर्तन के प्रयत्नों से भी सम्पर्क करें। वे क्रिया के पूर्व विचार मंथन को अधिक महत्व दें। साथ ही उन्हें यह भी ध्यान देना है कि वे मुसलमानों से किसी प्रकार की घृणा या भेदभाव न करें। क्योंकि मुसलमानों में भी दस प्रतिषत ही कटटरवादी है और इन कटटरवादियों के प्रभाव में शामिल 80 प्रतिषत मुसलमान समझाये जा सकते है।हमारा कर्तव्य है कि हम इन 80 प्रतिशत को 10 प्रतिशत उग्रवादियों से अलग थलग करने का प्रयास करें। दोष इस्लाम में नहीं बल्कि दोष उसके संगठनवादी चरित्र में है। युग परिवर्तन के लिए उस संगठनवादी चरित्र में बदलाव करना होगा।
अंत में मैं पूरी तरह आश्वस्त हॅू कि अब विश्व कलियुग से धीरे धीरे सदयुग की ओर जाने की शुरुवात कर रहा है और हमारा कर्तव्य है कि हम इन प्रयत्नों में सहयोग और समर्थन करें।

राष्ट्रगान आदेश कितना न्यायिक कार्य?

Posted By: admin on December 5, 2016 in rajnitik - Comments: No Comments »

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उच्चत्तम न्यायालय ने आदेश दिया है कि भारत के सिनेमा घरों में फिल्म के प्रारंभ में राष्ट्रगीत अनिवार्य होगा। मैं नहीं समझ सका कि न्यायपालिका का यह आदेश कार्यपालिक है या विधायी। क्योंकि इस आदेश को न्यायिक आदेश तो नहीं कहा जा सकता। प्रश्न यह भी उठता है कि क्या न्यायपालिका के पास इतना खाली समय बचने लगा है कि वह अपना आवश्यक न्यायिक कार्य पूरा करते हुए यह कार्य कर सकती है? अभी कुछ माह पूर्व ही तो न्यायपालिका ने देश के समक्ष यह समस्या रखी थी कि जजों की कमी के कारण अनेक न्यायिक कार्य पिछड़ रहे हैं तो एकाएक न्यायपालिका के पास इतनी सुलभता कहां से आ गई? क्या राष्ट्रगान का यह मामला इतना प्राथमिक था कि न्यायालय के लिये अपने सभी न्यायिक काम छोड़कर इस पर पहले निर्णय करना पड़ा? मैं इस आदेश के पक्ष विपक्ष की कोई समीक्षा नहीं कर रहा। मैं तो सिर्फ इतनी सी चिन्ता कर रहा हॅू कि ओवर लोडेड न्यायपालिका को अपना पिछड़ा हुआ न्यायिक काम छोड़़कर यह निर्णय लेने की पहल क्यों आवश्यक महसूस हुई?

मंथन क्रमांक -10 प्रश्नोत्तर- राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?

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आचार्य पंकज,वाराणसी
प्रश्न – मैं जानता हॅू कि आप अनेक गंभीर तथा विश्वस्तरीय विषयों पर लीक से हटकर मौलिक विचार रखते हैं। मैं यह भी जानता हॅू कि आपकी कही कई बातें प्रारंभ में गलत दिखती हैं किन्तु बाद में सत्य सिद्ध होती हैं। किन्तु आपने पंडित नेहरु जैसे देशभक्त की तुलना में नाथूराम गोडसे जैसे हत्यारे को देशभक्त लिखकर पूरी तरह सत्य की अन्देखी की है। पंडित नेहरु ने गाॅधी जी के कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया। कई बार जेल भी काटी। सम्पन्न परिवार की सभी संभव सुख सुविधाएॅ छोडकर दर दर भटकते रहे। दूसरी ओर रहा गोडसे जिसका स्वतंत्रता संग्राम में कभी कोई योगदान नहीं था। उसने अपने पूरे जीवन में यदि कोई काम किया तो वह था गाॅधी हत्या का। गोडसे ने यह एक काम छोडकर देश या समाज के लिये कुछ और किया हो तो आप बताइये। ऐसे व्यक्ति को महिमा मंडित करनेे में आपसे कुछ भूल हुई है। कृपया मार्ग दर्शन करें।
उत्तरः- मैं आपसे पूरी तरह सहमत हॅू कि स्वतंत्रता के पूर्व पंडित नेहरु का त्याग बहुत ही उल्लेखनीय रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व नाथूराम गोडसे का कोई योगदान नहीं रहा और यदि रहा भी होगा तो वह स्वतंत्रता के प्रयासों के विपरीत ही होगा किन्तु स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरु के सारे प्रयास गाॅधी विचारधारा तथा समाज सशक्तिकरण के विपरीत रहे। जबकि गोडसे का तो गाॅधी हत्या के बाद इतिहास ही समाप्त हो गया । मैं मानता हॅू कि गोडसे का कार्य इतिहास के लिए लम्बे समय तक कलंक बना रहेगा क्योकि गोडसे ने जो अपराध किया वह कभी माफ करने लायक नहीं है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि पंडित नेहरु ने देश को जो विपरीत दिशा दी उसके लिए पंडित नेहरु मांफ करने योग्य है। यदि कोई शराबी शराब के नशे में अपने पिता की हत्या कर दे तो कानून उस हत्यारे पुत्र को दण्डित करेगा और समाज उस पुत्र को माफ करके शराब के विरुद्ध अभियान चलायेगा जिससे कोई भविष्य में शराब के नशे में ऐसी गलती न करे। कानून ने गोडसे को सजा दे दी गोडसे को ऐसा विपरीत कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाली विचारधारा 70 वर्षाे बाद भी तेजी से फल फूल रही हैं और समाज आज सिर्फ गोडसे से घृणा मात्र कर रहा है । निश्चित ही इस विचारधारा के निरंतर विस्तार में न कोई गाॅधी की भूमिका है और न ही गोडसे की। यदि इसके विस्तार में किसी की गलत भूमिका रही तो वह पंडित नेहरु ,अम्बेडकर आदि की ही मानी जा सकती है जिन्होने स्वतंत्रता संघर्ष के लिए गाॅधी का भरपूर उपयोग किया और स्वतंत्रता के प्रांरभ से ही गाॅधी विचारधारा को बिल्कूल छोड दिया। मैं स्पष्ट कर दॅू कि गाॅधी के जीवित रहते ही नेहरु,अम्बेडकर आदि गाॅधी की स्वतंत्रता पश्चात की किसी योजना से सहमत नही थे। मैं कह सकता हॅू कि वर्तमान में जो दो विपरीत विचारधाराएॅ भारत में दिख रही है उनमें एक गाॅधी का स्पष्ट विरोध करके आगे बढ रही है तो दूसरी गाॅधी को माला पहनाकर, अपने नाम के साथ गाॅधी शब्द जोडकर, खादी और चरखा का ढोंग करके,तथा गाॅधी विचारधारा के विपरीत चलकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही है। क्या यह हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय नहीं है कि दोनों विचारधाराएॅ एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हुए भी तथा गाॅधी विचार विरोधी होते हुए भी निरंतर आगे बढती जा रही हैं और हम किसी तीसरी दिशा में आगे नहीं सोच पा रहे। आप सोचिये कि वर्तमान स्थिति में इन दोनों विचारधाराओं में से मैं किसकी प्रशंसा करु और क्यों करुं?
प्रश्न – वर्तमान समय में पूरा भारत अनिश्चय के दौर से गुजर रहा है। आप भी स्पष्ट नहीं कर रहे कि नोट बंदी भारत के हित में है या नहीं । कृपया और स्पष्ट करें।
उत्तरः- मेरा काम किसी समाधान के गुण दोष की व्याख्या करना मात्र है। किस दिशा मे बढना है यह निर्णय करना आप सब का काम है, मेरा नहीं।
समाज के समक्ष तीन स्थितियाॅ होती हैं- 1 तंत्र आश्रित समाज व्यवस्था 2 तंत्र मुक्त समाज व्यवस्था 3 तंत्र रहित समाज व्यवस्था। तंत्र रहित की कल्पना युटोपिया है अतः तंत्र मुक्त या तंत्र निर्भर पर सोचा जा सकता है। अर्थव्यवस्था भी सम्पूर्ण व्यवस्था का एक छोटा सा भाग है। अर्थव्यवस्था में दो मार्ग संभव है – तंत्र मुक्त व्यवस्था की दिशा में बढना हो तो टैक्स सिस्टम में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। वस्तु विनिमय को पूरी तरह कर मुक्त करना होगा तथा इनकम टैक्स आदि भी समाप्त होंगे। सरकार के खर्च के लिए सम्पत्ति कर लगाकर तथा खर्च घटाकर व्यवस्था करनी होगी। राज्य मुक्त वस्तु विनिमय की स्वतंत्रता होगी तथा सरकारी करेंसी में एक लाख रु का नोट भी मान्य करना होगा। यदि हम तंत्र निर्भर व्यवस्था की ओर बढना चाहते है तो पूरी तरह करेंसी को विभिन्न चरणों में समाप्त करना होगा जिससे वस्तु विनिमय में टैक्स की किसी तरह की कोई हेरा फेरी न हो सके।सारा वस्तु विनिमय तथा आय व्यय बैंक के माध्यम से ही करना होगा। दोनों व्यवस्थाएॅ एक साथ नहीं चल सकतीं क्योंकि दोनों के अलग अलग गुण दोष हैं। वर्तमान भारत तंत्र निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ रहा है जिस दिशा में नरेन्द्र मोदी का साहसपूर्ण कदम बिल्कुल उचित है। होना तो यह चाहिए की सरकार साथ ही यह भी घोषित कर देती कि सन 2018 के प्रारंभ के बाद 50 रु से अधिक के नोट भी बंद कर दिये जायेंगे। इस घोषणा के बाद भारत में अनिश्चय का वातावरण नहीं होता और हर आदमी यह समझ जाता कि अब उसे किस दिशा में बढना है। सम्भवतः इस घोषणा के बाद बैंको में लम्बी लाईने लगनी बंद हो जाती क्योंकि करेंसी के प्रति मोह टूट जाता। अब भी सरकार ऐसा कर दे तो बहुत कुछ सुधर सकता है।
मैं स्पष्ट हॅू कि मैं राज्य आश्रित व्यवस्था को आदर्श नहीं मानता किन्तु मैं यह जानता हूॅ कि राज्य आश्रित व्यवस्था का यही एक मात्र मार्ग है। आदर्श स्थिति अर्थात राज्य मुक्त समाज व्यवस्था की ओर बढने के लिए विश्वस्तरीय प्रयत्न करने होंगे जिसकी पहल भारत से शुरु हो चुकी है। मैं जानता हॅू कि ‘व्यवस्थापक’ भारत की एक मात्र ऐसी संस्था है जो राज्य मुक्त व्यवस्था की ओर बढने के लिए जनमत जागरण कर रही है। किन्तु मैं संतुष्ट हॅू कि इस संबंध में निरंतर प्रयास बढ़ रहे है तथा मुझे भविष्य में स्पष्ट दिखता है कि या तो जागृत जनमत के समक्ष वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था झुकेगी या प्रबल जनमत उसे झुकाने में सफल होगा। मैं चाहता हॅू कि वर्तमान आर्थिक परिवर्तन का समर्थन करने की आवश्यकता है तथा साथ ही राज्य मुक्त व्यवस्था की ओर तेजी से जनमत जागरण में भी लगने की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि समाधान के प्रयत्न टुकडें न करके समग्र समाधान की ओर बढना होगा।

मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे ?

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व्यवस्था परिवर्तन 001
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की किन्तु उपरोक्त दोनो अवधारणाओ का गांधी को समर्थन नही मिला। गोडसे कटटरवादी हिन्दूत्व की धारणाओ से ओत प्रोत था तो पंडित नेहरू हिन्दुत्व विरोधी अवधारणाओ के प्रतीक रहे।
व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। 1 संचालक 2 संचालित। संचालक को अंग्रेजी मे मोटिवेटर कहते है और संचालित को मोटिवेटेड। जो विचारधारा संचालक की मृत्यु के पश्चात भी बढती जाती है वह विचार धारा वाद बन जाती है और जो संचालित होते है वे ऐसी विचार धारा के भक्त हो जाते है। स्वामी दयानंद हेडगेवार गांधी संचालक की श्र्रेणी मे माने जा सकते है। इसी तरह पंडित नेहरू को भी हम संचालक मान सकते है और गोडसे को संचालित । स्पष्ट है कि संचालक बुद्धि प्रधान होता है संचालित भावना प्रधान। गोडसे किसी विचार धारा से प्रभावित था, नेहरू की अपनी स्वयं की विचार धारा थी। नेहरू ने गांधी के साथ स्वतंत्रता संघर्ष मे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया किन्तु नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन को छोडकर किसी भी मामले मे कभी गांधी विचारो से सहमत नही रहे । गोडसे कटटर वादी हिन्दुत्व की विचार धारा के प्रति पूर्ण समर्पित था तो नेहरू किसी के प्रति कभी समर्पित नही रहे।
स्वतंत्रता के शीघ्र बाद गोडसे ने गांधी के शरीर की हत्या कर दी और पंडित नेहरू ने विचारो की । गांधी हत्या के साथ गांधी युग भी समाप्त हो गया और गांधी विचार भी । क्योकि एक पक्ष गांधी के नाम का विरोधी था तो दूसरा गांधी विचार का। मै यह कह सकता हॅू कि गांधी की हत्या गोडसे के मूर्खता पूर्ण कार्य का परिणाम थी। गोडसे की इस मूर्खता ने पंडित नेहरू का काम और आसान कर दिया क्योकि यदि गांधी जीवित रहते तो पंडित नेहरू को परेशानी हो सकती थी। गोडसे की मूर्खता ने संध को भी अल्पकाल के लिये प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। जिससे नेहरू जी को और आसानी हो गई।
पंडित नेहरू का कार्य ठीक था और नीयत पर हमेशा संदेह रहा। उनका व्यक्ति गत जीवन भी गांधी के विपरीत था तथा सामाजिक जीवन भी । गांधी अकेन्दित और न्यूनतम शासन के पक्षधर थे तो नेहरू केन्द्रित ओर अधिकतम शासन के । गांधी किसी की नकल न करके देश काल परिस्थिति अनुसार स्वतंत्र कार्य प्रणाली के पक्षधर थे तो नेहरू पश्चिम या साम्यवाद की नकल करते थे। दूसरी ओर गोडसे का कार्य गलत था किन्तु नीयत ठीक थी । गोडसे की नीयत मे अंध राष्ट भक्ति थी तो नेहरू की नीयत मे व्यक्तिगत और परिवारिक स्वार्थ भी छिपा हुआ था। नेहरू ने लम्बी जेल काटी । इस उम्मीद के साथ कि स्वतंत्र भारत मे उन्हे कुछ न कुछ सत्ता का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर गोडसे यह जानता था कि गांधी हत्या के बाद उसे फांसी ही होगी, और जीवित रहने का कोई व्यक्गित या पारिवारिक लाभ नही मिलेगा । प्रश्न उठता है कि दोनो की तुलना मे ठीक कौन? यह स्पष्ट है कि गोडसे के कार्य और नेहरू की सोच ने मिलकर देश को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई और आज तक उसका परिणाम भारत भुगत रहा है। प्रश्न उठता है कि यदि एक पिता ने अपने परिवार के कष्ट दूर करने के लिये किसी ज्योतिशी के समझाने से अपने पूत्र की बलि चढा दी तो उस पिता ने किस सीमा तक गलत किया । एक मूर्ख्र ने अपने पिता द्वारा बहुत मेहनत से इकठठा की गर्इ्र चंदन की लकडी को चाय बनाने मे जला दिया तो पूत्र कितना अपराधी? यदि किसी मूर्ख पुत्र ने अपने पिता की गर्दन मे लिपटा जहरीला साप देखकर साप सहित गर्दन काट दी तो पुत्र कितना अपराधी ? यदि गोडसे ने किसी विचार धारा से प्रभावित होकर गांधी हत्या को ही राष्ट की समस्याओ का उचित समाधान मानकर उनकी हत्या कर दी तो गोडसे का कार्य कितना गलत माना जाय और कितनी गलत? यदि किसी व्यक्ति का कार्य गलत होता है तो कानून उसे दंडित करता है। इस तरह गोडसे को कानून के द्वारा फॉसी दिया जाना उचित कदम है। किन्तु भारत मे अभिव्यक्ति की आजादी है। ऐसी आजादी का दुरूपयोग करके कोई संगठन सामान्य युवको को गलत दिशा मे जाने का उत्प्रेरित करे तो ऐसे संगठन की विचार धारा को समाज ही चुनौती दे सकता है कानून नही, सरकार नही। दुर्भाग्य है कि भारत मे ऐसी विचार धारा भी आजतक विस्तार पा रही है क्योकि उसे चुनौती देने की अपेक्षा उसकी गलतियो का लाभ उठाने का प्रयास हो रहा है।
भारत के लिये आदर्श स्थिति होती कि गोडसे सरीखा देश भक्त बालक गांधी के सम्पर्क मे आया होता तो आज नेहरू की विचार धारा की तुलना मे गांधी की विचार धारा गोडसे के माध्यम से अधिक अच्छी तरह स्थापित हो पाती परन्तु ऐसा नही हुआ और गोडसे एक गलत विचार धारा के प्रभाव मे चला गया और उसके दुष्परिणाम आज तक हम देख रहे है।
वर्तमान स्थिति मे अब पुनः भारत को तीस जनवरी 1947 से अपनी विचार यात्रा प्रारंभ करनी चाहिये। दोनो ही विचार धाराए भारत के लिये धातक है। चाहे वह गोडसे की हो या नेहरू की । गोडसे से घृणा और नेहरू का महिमामंडन भारत के लिये घातक है। क्योकि गोडसे की क्रिया गलत थी नीयत राष्ट भक्ति की और नेहरू की क्रिया ठीक थी नीयत अपने व्यक्तिगत उत्थान की। दोनो की उचित समीक्षा करके भारत को नये मार्ग पर चलना चाहिये । मेरा स्पष्ट मत है कि भारत को कटटर वादी हिन्दूत्व और विदेशो की अन्धाधुंध नकल का मार्ग छोडकर अपने भारतीय यथार्थ को देश काल परिस्थिति की कसौटी पर कसकर नया मार्ग तलाशना चाहिये । गांधी हमारे आदर्श थे, हैं और भविष्य मे भी मार्ग दर्शक बने रहेंगे।
नोट- अगला विषय होगा ‘‘सावधान, युग बदल रहा है‘‘।

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