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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है 1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है। 2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं। 2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है ब...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

मंथन क्रमांक-15 विषय- कृषि और पर्यावरण का संतुलन कैसे

Posted By: admin on January 7, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

यदि हम सम्पूर्ण भारत का आकलन करें तो पूरे देश में पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। समाधान के लिए अन्य अनेक उपायो में से वन विस्तार को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। भारत की न्यायपालिका तक वन विस्तार को बहुत अधिक महत्वपूर्ण मानकर निरंतर हस्तक्षेप करती रहती है। जंगल का क्षेत्रफल किसी भी परिस्थिति में न घटे, बल्कि बढता रहे, इसकी चिंता सभी करते रहते हैं। वन विस्तार के लिए जंगलों में हिसंक जानवर भी बढाये जा रहे हैं। पर्यावरणविद भी बहुत चिंता करते हैं। यदि कोई व्यक्ति एक भी पेड काट ले तो पर्यावरणविद ऐसा महसूस करते हैं जैसे कि उनकी जान चली गई हो। किसी व्यक्ति को अपनी भूमि पर लगाये गये अपने पेड काटने पर भी न्यायालय हस्तक्षेप करता है। स्पष्ट है कि वन विस्तार हमारे देश की एक मुख्य आवश्यकता है और उस पर सारी दुनिया अपनी नजर रखती है।
सिंचाई भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। पानी का स्तर निरंतर घटता जा रहा है क्योंकि जल संग्रह क्षेत्र सिकुड रहे हैं। तालाब पाटे जा रहे हैं। देश भर में कुएं और तालाब के विस्तार को बहुत महत्व दिया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह जी ने तो इस समस्या को इतना महत्व दिया है कि वे पानी के अभाव को ही युद्ध का कारण तक बताते हैं। खेती के लिए भी सिंचाई महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जगह जगह छोटे से लेकर बडे बडे बांध बनाये जा रहे है जिनमे हजारो एकड जमीन और जंगल डुब जाते है। फिर भी सिचाई की महत्ता को देखते हुए यह कार्य किया जा रहा है।
देश की आबादी लगातार बढ़ रही है। स्वतंत्रता के 70 वर्ष बीतते बीतते आबादी चार गुनी बढ़ गई है। स्वाभाविक है कि आबादी की वृद्धि के हिसाब से सुविधाओं की भी जरुरत बढी है। रहने के लिए घर, आवागमन के लिए रेल सडक, पढने के लिए स्कूल और स्वास्थ के लिए अस्पताल बढे भी हैं और निरंतर बढने भी चाहिये। व्यवस्था के लिए अलग अलग कार्यालय भी खोलने आवश्यक हैं। इस संबंध में भी सारे देश में कोई न कोई आन्दोलन होते ही रहते हैं।
देश के विकास के लिए कल कारखाने और उद्योग धंधो का विस्तार भी बहुत आवश्यक है। यदि उद्योगों का विस्तार नहीं होगा तो देश का विकास रुक जायेगा। हमारे निर्यात पर दुष्प्रभाव पडेगा। वर्तमान सरकार तो विकास को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। देश के विकास के लिए खदानों को भी बहुत उपयोगी माना जा रहा है। कोयला सहित अनेक प्रकार की खदानों का निरंतर विस्तार जारी है।
आबादी की वृद्धि और अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए कृषि उत्पादन का बढना भी सर्वोच्च प्राथमिकता मानी जा रही है। यदि कृषि उत्पादन नहीं बढा तो लोग हवा पानी उद्योग और अस्पताल स्कूल के सहारे जीवित नहीं रह सकते। स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन तेजी से बढना चाहिये।
उपर में सभी पॉच बातें इस बात पर निर्भर करती हैं कि हमारे पास भूमि का क्षेत्रफल क्या है और उसका आपस मे समायोजन कैसे हो? स्पष्ट है कि भूमि का क्षेत्रफल निश्चित है और आवश्यकताओं का बढना अनन्त है । वन विस्तार भी हो, सिचाई भी बढे, खेती भी बढे, और उधोग धंधे भी बढे तो भूमि का बटवारा किस प्रकार होगा यह कौन तय करेगा । मेधा पाटकर नारा लगाती है कि किसी की जमीन घर डूब में नहीं आनी चाहिये तो प्रो0 राजेन्द्र सिंह निरंतर आन्दोलन करते हैं कि पानी की समस्या सबसे पहले सुलझना चाहिये। राजगोपाल जी भी जल जंगल जमीन के लिए देश भर में आन्दोलन करते रहे हैं। अभी दो चार दिन पहले भी ऐसे आन्दोलनकारियों का जमघट हजारों की संख्या में दिल्ली में देखा गया है। उद्योगों पर तो मोदी जी सबसे अधिक ध्यान दे रहे है। आदिवासियों की जमीन उनके पास रहे इसके लिए ब्रम्हदेव शर्मा सहित अनेक लोग निरंतर संघर्ष करते रहे हैं। कृषि भूमि किसी भी परिस्थिति में न घटे इसकी मांग तो होती ही रहती है तो प्रश्न उठता है कि भूमि का क्षेत्रफल कैसे बढे और यदि क्षेत्र बढाना असंभव है तो कृषि को नुकसान पहॅुचाये बिना शेष चार जगह भूमि वितरण को संतुलित कैसे किया जाये। हर आदमी को घर बनाने के लिये तथा खेती के लिये थोडी थोडी जमीन मिलनी चाहिये यह मांग सही है किन्तु कहां से जमीन निकले और कहां कटौती हो इसका उत्तर किसी मांग कर्ता के पास नही है। पांच प्रकार की अलग अलग मांग करने वाले कभी एक साथ बैठकर समाधान नही खोजते। यहां तक कि ये लोग एक दूसरे की मांग मे शामिल तक हो जाते है। समस्या जटिल है और समाधान मिल बैठकर ही संभव है। हमारी मांगे पूरी हों चाहे जो मजबूरी हो के समान नारे लगाने वाले समाधान नहीं खोजना चाहते क्योंकि ऐसे नारे लगाना तो उनकी दुकानदारी है। यह दुकानदारी उस समय बहुत घातक हो जाती है जब ऐसे पेशेवर लोग विदेशो से धन और सम्मान लेकर ऐसे किसी संतुलन में बाधा पहुॅचाते हैं। मैं जानता हैू कि ये पर्यावरण, जल और वन विस्तार, सबको घर मकान और सबको भूमि का नारा लगाने वाले न स्वयं पेड लगाते है न ही छोटे घर में रहते है और कभी स्वयं खेती भी नहीं करते क्योंकि नारा लगाना उनका व्यवसाय है।
किन्तु हम सबको मिलकर तो इस समस्या का समाधान करना ही चाहिये । खेती से जुडी एक महत्वपूर्ण समस्या यह भी है कि प्रतिवर्ष हजारों किसान आत्महत्या करते हैं और यह सिलसिला रुक नहीं रहा। कृषि उत्पादन बढे और कृषि का क्षेत्रफल घटे ये दोनों एक साथ अस्वाभाविक है और इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग भी नहीं है। हमें कृषि की भूमि में कटौती करके अन्य चार को मजबूत करना होगा तथा साथ में कृषि उत्पादन भी बढाना ही होगा। प्राचीन समय में भारत कृषि पर निर्भर था। यह भावनात्मक निर्भरता ही हमारी समस्याओं का प्रमुख कारण है। कृषि को उद्योगमाना जाये और किसान को श्रमिक एवं उद्योगपति के बीच से पूरी तरह निकाल दिया जाये तो ये दोनों काम एक साथ संभव हैं। छोटी छोटी जमीने बडे उद्योगपतियों के द्वारा खरीद ली जा सकती हैं। तकनीक के सहारे कृषि उत्पादन कम भूमि में बढाया जा सकता है। अभाव में मर रहे छोटे किसान श्रम करके आराम से रह सकते हैं। मेरे विचार से हमें किसान शब्द का परम्परागत मोह वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर छोड देना चाहिये। सरकार छोटे किसानों को व्याज मुक्ति या कुछ सब्सीडी देकर उन्हें जिंदा रखने का प्रयास करती है। और ऐसे ही प्रयास में से कुछ लोग आत्महत्या करते हैं। इसे तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक कि उन्हें मजदूर या बडे किसान में से एक दिशा में बढने की छूट न दी जाये।खेती के नाम पर दी जा रही अनेक प्रकार की सुविधाए उन्नत खेती के विकास मे बाधक बन रही है। न्याय के नाम पर व्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है। मैं जानता हॅू कि आदिवासी के नाम से लाखो एकड ऐसी जमीन फंसी हुई है जो बहुत कम उत्पादन कर पा रही है। यदि हम आदिवासी को भारत का सामान्य नागरिक मानना शुरु कर दें तो आदिवासी भी अपने को छोटे किसान से मुक्ति पा लेगा और भूमि उन्नत तकनीक की दिशा में बढ जायेगी।
मैं जानता हॅू कि कुछ लोग यह प्रश्न उठायेंगे कि किसानों को एकाएक छूट बंद कर देने से उनकी आत्महत्या बढ सकती है । मैं समझता हॅू कि जल्दी ही आत्महत्याए पूरी तरह बंद हो जायेगी क्योंकि आमतौर पर मजदूर आत्महत्या नहीं कर रहे और छोटे किसान कर रहे हैं। न तो छोटे किसान रहेंगे न ही आत्महत्या होगी। मैं यह भी जानता हॅू कि विदेशो से पैसा लेकर हमारी सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वाले अनेक परजीवी इसमें बहुत बाधा पैदा करेंगे। वे आन्दोलन करेगे जल जगंल जमीन का, डूब का, सबको भूमि वितरण का और साथ ही आदिवासी के लिए। इस जमात को विदेशो से भी बहुत प्रोत्साहित किया जायेगा। इस परजीवी जमात से तो हमें निपटना ही पडेगा। मैं चाहता हॅू कि भूमि का अच्छे से अच्छा उपयोग हो और भूमि के क्षेत्रफल में सब बैठकर समन्वय स्थापित करें कि कम से कम भूमि में अधिक से अधिक उत्पादन कैसे लिया जा सकता है। सभी समस्याओ के एक मुश्त समाधान के लिये कुछ न कुछ तो करना ही होगा और मुझे यह मार्ग अधिक उपयुक्त तथा सुविधा जनक लगता है।
नोट-मंथन 16 का अगला विषय होगा- जे एन यू संस्कृति कितनी घातक?

मंथन क्रमांक-14 विषय- दहेज प्रथा समीक्षा

Posted By: admin on January 6, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

हम एक सप्ताह से दहेज प्रथा विषय पर विचार मंथन कर रहे है । आज शुक्रवार है और कल से कृषि और पर्यावरण विषय की समीक्षा शुरु होगी। दहेज विषय पर कुछ निष्कर्ष निकाले गये है -
1 दहेज नहीं लेना एक आदर्श स्थिति है और बहुत ही अच्छी बात है। इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना चाहिये और ऐसे परिवार की प्रशंसा होनी चाहिये। यदि स्वैच्छिक दहेज का लेन देन होता है तो वह भी इसी श्रेणी में माना जाना चाहिये।
2 सौदेबाजी करके दहेज का लेन देन करना न तो अच्छी बात है, न ही आदर्श। किन्तु यह बात न ही कोई बुराई है, न ही अपराध। इसे एक व्यवहारिक दृष्टिकोण कह सकते हैं, जो न सामाजिक कार्य है, न ही आपराधिक। ऐसा कार्य असमाजिक कहा जा सकता है जिसके लिए न प्रशंसा उचित है न ही आलोचना।
3 विवाह के बाद किसी भी प्रकार से दहेज के लिए दबाव डालना या प्रताडित करना समाज विरोधी कार्य माना जाना चाहिये। ऐसे कार्य को निरुत्साहित भी करना चाहिये तथा आलोचना भी होनी चाहिये। किन्तु यदि ऐसा कार्य किसी के प्राकृतिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो ऐसे कार्य के लिए उक्त अपराधी को दण्डित भी करना चाहिये।
4 जब तक कोई अपराध न हो तब तक दहेज को निरुत्साहित ही कर सकते है, दण्डित नहीं। अपराध गलत है चाहे दहेज के नाम पर हो या किसी अन्य नाम पर। इसका अर्थ हुआ कि दहेज अथवा किसी अन्य पारिवारिक मामले में कानून का हस्तक्षेप शुन्यवत होना चाहिये। ऐसा कार्य परिवार या समाज पर छोड देना चाहिये। पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था में यदि कोई बुराई प्रवेश करती है तो उसे रोकना सरकार का काम नहीं। ऐसे सभी कानून समाप्त हो जाने चाहिये।
5 महिला और पुरुष की तुलना आग और बारुद से होती है। दूरी घटना,विध्वंश का कारण बन सकता है और दूरी बढना श्रृजन में बाधा पैदा करेगा। दूरी घटने या बढने का निर्णय व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक हो सकता है। विशेष परिस्थितियों में समाज भी ऐसे निर्णय को अनुशासित कर सकता है किन्तु सरकार को इस संबंध में तब तक कोई कानून नहीं बनाना चाहिये जब तक कोई अपराध न हो।

मंथन क्रमांक-14 विषय- दहेज प्रथा प्रश्नोत्तर

Posted By: admin on January 5, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1- प्रश्न -आपने दहेज प्रथा का एकपक्षीय विरोध किया हैं जबकि मैं देखता हॅू कि अनेक परिवारों में विवाह के बाद भी दहेज के लिए दबाव डाला जाता है और कभी कभी तो हत्या या आत्महत्या भी हो जाती है। विवाह के पूर्व भी लडका पक्ष इस तरह का मोल भाव करता है जैसे कि लडकी कोई वस्तु हो या गाय हो। इस संबंध में आपने क्यों नहीं सोचा।

उत्तरः- सभी वर्गो में सब प्रकार के लोग पाये जाते हैं। किसी एक वर्ग में अच्छे या बुरे लोगों की संख्या अधिक नहीं होती। इसका अर्थ है कि जितनी संख्या में अच्छे बुरे पुरुष होते हैं उतनी ही संख्या में महिलाओं में भी अच्छे बुरे होते हैं। अनेक परिवारों में यदि पति या सास ससुर से बहू परेशान रहती है तो लगभग उतने ही परिवारों में बहू भी ब्लौकमेल करते देखी जाती है। फिर भी लडकी अधिक आत्महत्या करती है क्योंकि उसे परिवार छोडने की कानूनी या सामाजिक स्वतंत्रता नहीं। भारत में एक गलत अवधारणा प्रचलित है कि परिवार एक प्राकृतिक इकाई है जबकि वास्तविकता यह है कि परिवार एक संगठनात्मक इकाई है जो आपसी अनुशासन और सहमति के आधार पर चलता है। कानून के आधार पर नहीं। परिवार के किसी भी सदस्य को कभी भी परिवार से हटने या हटाने की स्वतंत्रता होनी चाहिये। आप देखेंगे कि भविष्य में न तो कोई लडकी ब्लैकमेल होगी और न ही किसी को कर सकेगी। दहेज के संबंध में बने कानूनों ने अनेक परिवारों में बहुओं को ब्लैकमेल करने का जो अधिकार दिया है उसके दुष्परिणाम निरंतर दिख रहे हैं। मेरा स्पष्ट मत है कि अब परम्परागत परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित करना चाहिए और परिवार के मामले में सरकार के कानूनी हस्तक्षेप को समाप्त कर देना चाहिये। महिला सशक्तिकरण एक घातक प्रचार है। शराफत सशक्तिकरण, परिवार सशक्तिकरण या समाज सशक्तिकरण का नारा दिया जा सकता है। मैंने राजघाट दिल्ली में भारत सरकार द्वारा प्रदर्शित एक बोर्ड पढा, जिसमें लिखा हुआ था कि महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है। विचार करिये कि क्या भारत में अन्य किसी पर अत्याचार अपराध नहीं हैं? हर अत्याचार अपराध होता है सिर्फ महिलाओं पर नहीं। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए।

2-मैं अपने विचार पर अबभी कायम हूं। एक व्यवस्था बनी हुई है कि अधिक योग्य लड़का और अपेक्षाकृत समान या कम योग्यता की लड़की का विवाह होता है और लड़की पति परिवार के घर में जाती है उसी समय पुरुष प्रधान व्यवस्था स्वीकार कर ली जाती है।
महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले परिवार भी अपनी लड़कियों का विवाह कम योग्य गरीब लड़कों से नही करते वे कभी नही सोचते की गरीब लड़के को ही घर में लाकर रखा जाये। मुझे कल एक दहेज विरोधी परेशान मित्र मिले जो अपनी इंजीनियर लड़की के लिए समान योग्यता का लड़का खोज रहे थे। वे भी कम योग्य लड़के से विवाह करने को तैयार नही थे। मैने सर्वे किया है तो पांच दस प्रतिशत अति योग्य पढ़े-लिखे लड़के भी कम पढ़ी लिखी गरीब, ग्रामीण लड़कियों के साथ सहमत होकर जीवन गुजार रहे हैं। लेकिन एक भी ऐसी लड़की नही मिली जो अपने परिवार की सहमति से अपढ़ गरीब लड़के के साथ जीवन गुजार रही हो।
यदि आप बासमती चावल खाना चाहते हैं तो महंगाई का रोना क्यों? यदि आप अधिक योग्य लड़के की खोज कर रहे हैं तो दहेज का रोना क्यों? आगे आईये अपनी पढ़ी-लिखी योग्य लड़की का विवाह कम योग्य गरीब लड़के से करके सामाजिक व्यवस्था को बदल दीजिये। जरूरत हो लड़के को घर लेआइये दहेज देने की जरूरत ही नही पड़ेगी।
मै आश्वस्त हूँ की पारिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का क़ानूनी हस्तक्षेप नही होना चाहिये। महिला शशक्त हो या पुरुष यह परिवार को तय करने दीजिये परिवार दो पैर की दौड़ नही बल्कि तीन पैर की दौड़ है जिसमे दो लोग सहमत होकर दौड़ रहे हैं उन्हें निर्णय करने दीजिये कि किसे तेज और किसे धीरे दौड़ना है। बाहर के लोगों का हस्तक्षेप घातक होगा जैसा अभी हो रहा है और जिसके परिणाम स्वरुप परिवार टूट रहे हैं।

3-प्रश्न – आपने लिखा है कि दहेज समाप्त हो गया है किन्तु मेरे विचार में यह बात पूरी तरह गलत है। आज भी बिना दहेज के शादियां हो ही नहीं पा रही हैं। आप भारत के किस क्षेत्र की बात कर रहे हैं जहॉ दहेज खत्म हो गया हों?
उत्तरः- सम्पूर्ण भारत में ग्रामीण और गरीब परिवारों के लडके बडी मात्रा में अविवाहित हैं। अनेक तो 30-35 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं किन्तु कोई शादी के लिए आ ही नहीं रहा। अनेक उच्च जाति के लडके निम्म जाति तक में विवाह करने के लिए तैयार हैं और वह भी बिना किसी दहेज के । मैं मानता हॅू कि अधिकांश शादियों में अब भी दहेज का लेन देन प्रचलित है क्योंकि गरीब और ग्रामीण की लडकियां सम्पन्न और शहरी वातावरण में जा रही हैं तो उन्हें तो दहेज देना ही पडेगा। आप बासमती चावल खाना चाहते हैं तो महंगाई का रोना क्यों? मैं तो प्रत्यक्ष देख रहा हॅू कि सामान्यतया लडकी के माता पिता को औसत परिवार का लडका पसंद ही नहीं आ रहा। यह स्थिति किसी एक क्षेत्र की नहीं है बल्कि सम्पूर्ण भारत की हैं। आप किसी एक मोहल्ले के 21 परिवारों के 18 से अधिक की लडकियों और लडकों की गिनती कर के देखिये जो अविवाहित हों। मैं आशवस्त हॅू कि 40 और 60 का अनुपात मिलेगा। स्पष्ट है कि मेरी बात सही होगी।

4-प्रश्नोत्तर-
मै एक विचारक मात्र हूँ, कोई भविष्य वक्ता नही। किन्तु वर्तमान समय में महिला सशक्तिकरण सहित परिवार व्यवस्था के आंतरिक मामलों में जिस प्रकार कानूनी और सामाजिक हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है उसके दुष्परिणाम निश्चित दिखते हैं। पति-पत्नि के बीच अविश्वास की दिवार यदि मजबूत हुई तो उससे लाभ कम और नुकसान अधिक होंगे। कैसे तो बच्चे पैदा होंगे और कैसे उनका लालन-पालन या संस्कार ठीक होगा इसका उत्तर किसी के पास नही है। हो सकता है कि विवाहरूपि व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाये। यदि विवाह व्यवस्था टूट कर नियुक्ति या कॉन्ट्रेक्ट में बदल जाये तो परिणाम भयंकर होंगे।
कोई पुरुष किसी शर्तों के आधार पर किसी महिला को वेतनभोगी नौकार रख ले और शर्तों में यह शर्त भी शामिल हो की वह स्त्री रात में उसके साथ सोएगी भी और उससे होने वाले बच्चे पुरुष के होंगे। वह महिला या पुरुष जब चाहें एक महीने का अतिरिक्त वेतन देकर समझौता भंग कर सकते हैं तो आप बताइये की क़ानून या समाज क्या कर लेगा?
मै तो चाहता हूँ कि ये दहेज विरोधी महिला सशक्तिकरण सरीखे नारा लगाने वालों को उत्तर देने के लिए ऐसी एक व्यवस्था शुरू हो जाए तो अपने आप आदर्श के नाम पर परिवारों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाले कानून समर्थक आदर्शवादियों की आँख खुल जायेगी। अच्छा हो कि हम इन खतरों पर समय रहते विचार कर लें और पश्चिम से आ रही समाज तोड़क, परिवार तोड़क आंधी के दुष्प्रभाव से भारतीय व्यवस्था को सुरक्षित कर लें।
मै यह भी स्पष्ट कर दूँ की महिला या पुरुष कभी भी अलग-अलग वर्ग नही हो। या तो ये व्यक्ति होते हैं या परिवार। परिवाररूपि संगठन का सदस्य बनने के बाद वे महिला या पुरुष नही रहते। महिला, माँ, बहन, बेटी, या पत्नि हो तो सकती है किन्तु महिला महिला नही हो सकती, क्योंकि परिवाररूपि संगठन का सदस्य होते ही वह संगठन के अनुशासन में सामूहिक भागीदारी बन जाती है और उसका पृथक अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
मेरी लड़की परिवार के इच्छा के विरुद्ध मोबाइल लेकर तभी चल सकती है जब या तो परिवार सहमत हो या वह परिवार छोड़ दे। यदि परिवार से बहार की कोई व्यवस्था उस लड़की को सशक्तिकरण के नाम पर बहकाती है या समर्थन करती है तो वह इकाई परिवार तोड़क, समाज तोड़क कार्य करती है। और ऐसी इकाई को दण्डित किया जाना चाहिये। दुर्भाग्य से समाज तोड़क पश्चिमी संस्कृति ऐसी परिवार तोड़क धारणा को प्रोत्साहित कर रही है।

5-प्रश्नोत्तर
सपा नेता अबुआजमी ने कहा कि महिलाओं द्वारा कम कपडे पहनना तथा असुरक्षित घूमना खतरनाक है। इससे छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएॅ बढती हैं। ऐसे ही मिलते जुलते बयान देश भर से आते रहते है तथा ऐसे बयानों के विरोध में भी बयान देनेे वालो की लम्बी श्रृंखला जारी रहती है। यहाॅ तक कि महिला आयोग भी हमेशा ही सक्रिय हो जाता है। न अबुआजमी सरीखे बयान बंद होते है न ही विरोध करने वालों के बयान। वस्तुस्थिति की समीक्षा आवश्यक हैं।
अबुआजमी ने महिला और पुरुष की तुलना आग और पेट्रोल से की और कहा कि इनकी दूरी घटने से विस्फोट होगा ही। किन्तु इस तर्क के आधार पर बलात्कार या छेडछाड को स्वाभाविक परिणाम नहीं माना जा सकता। बलात्कार चाहे किसी भी परिस्थिति में हो किन्तु अपराध रहेगा ही और ऐसे अपराध करने वालों का विरोध होना ही चाहिये। कोई महिला किस प्रकार के कपडे पहनती है यह उसकी स्वतंत्रता है। उस पर आप कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकते। प्रतिबंध तो अपराध पर ही लगाया जा सकता है। फिर भी अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क न रहने वालो को समझाना भी गलत नहीं है।
यह सही है कि बलात्कार अपराध है किन्तु अपराध भी कई प्रकार के होते हैं और सबके लिए समान दण्ड नहीं होना चाहिए। यदि कोई महिला अपना कीमती हीरे का हार तिजोरी में सुरक्षित रखे और लूट या चोरी हो तो वह बहुत गंभीर अपराध माना जायेगा किन्तु कोई महिला अपना कीमती हीरे का हार सडक पर लेकर घूमे, हाथ पर रखकर दिखावे, तो उससे होने वाली लूट उतनी गंभीर अपराध नहीं मानी जायेगी, जितनी तिजोरी से निकालकर होने वाली लूट। अपराध और दण्ड की स्थिति भिन्न हो सकती है और उसी तरह सुरक्षा के प्रयत्न भी भिन्न भिन्न हो सकते हैं। हम अपने परिवार के सदस्यों या अन्य मित्रों को सुरक्षा की सलाह दें तो इसमें गलत क्या है? किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि कम कपडे पहनने वालो की आलोचना करने का आपको अधिकार प्राप्त है। अबुआजमी ने अपने विचार व्यक्त किये यह उनकी स्वतंत्रता है। दूसरी ओर उनके विचारों के विरुद्ध विचार व्यक्त किये गये यह उनकी स्वतंत्रता है। यह दाल, भात में मुसलचंद महिला आयोग क्यों और कहा से घुस गया यह पता नहीं। ऐसा लगता है कि जे एन यू संस्कृति के विस्तारक आयोग हर बात में अपनी टांग फंसाते रहते हैं।
यदि महिला और पुरुष के बीच की दूरी घटेगी तो खतरे बढने स्वाभाविक है और यदि दूरी बढेगी तो श्रृजन भी रुकेगा और कुंठा भी बढेगी। इसके लिए समाज या सरकार कोई कठोर कानून नहीं बना सकती। दूरी घटना या बढना यह प्रत्येक व्यक्ति और परिवार पर निर्भर है। समाज सिर्फ सलाह दे सकता है और कानून को तो कभी इसमें दखल देना ही नहीं चाहिये। इसके ठीक विपरीत भारत का कानून दूरी बढाने वालो को दूरी घटाने की सलाह देता है। जिसमें सह-शिक्षा , साथ-साथ नौकरी आदि शामिल है। इसके साथ ही कानून दूरी घटाने वालों को बढाने की सलाह देता है जिसमें बार बाला कानून वेश्यावृत्ति निवारण प्रयत्न भी शामिल है। सरकार को दोनों ही काम नहीं करने चाहिये क्योंकि दोनों एक दूसरे के विपरीत है और समाज के काम है, सरकार के नहीं। किन्तु सरकार दोनों विपरीत काम एक साथ कर रही है इसीलिए उसकी नीयत पर संदेह होता है।

मंथन क्रमांक-14 विषय- दहेज प्रथा

Posted By: admin on January 1, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दहेज प्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार समान हैं।

फिर भी महिला और पुरुष के बीच कुछ प्राकृतिक और सामाजिक असमानताएॅ हैं। दोनों की शारीरिक संरचना भिन्न-भिन्न है। सामाजिक संरचना में भी कुछ भिन्नताएॅ हैं। अर्थात एक महिला और पुरुष को संतान उत्पत्ति के लिए किसी अन्य परिवार के साथ जुड़ना अनिवार्य है। यह वैज्ञानिक कारण से है या परम्परागत किन्तु पूरे विष्व में इसकी मान्यता अवष्य है। इसी तरह पति-पत्नी के बीच यह भी आवष्यक है कि पति को सामान्यतया आक्रामक और पत्नी को आकर्षक स्वरुप में रहना चाहिये। इन सब स्थितियों को देखते हुए ही संयुक्त परिवार को समाज की पहली व्यवस्थागत इकाई माना गया। यह व्यवस्था की गई कि परिवार के सदस्य मिलकर यह तय करेंगे कि किस सदस्य को किस प्रकार का कार्य प्रमुखता से करना है। इस कार्य विभाजन में भी महिला और पुरुष का भेद स्वाभाविक होता है। इस तरह यह व्यवस्था आवष्यक हो जाती है कि महिला और पुरुष में से कोई एक दूसरे के परिवार में जाकर रहे और इस परिवार परिवर्तन में महिलाओं को अधिक महत्व दिया जाता है।
समाज व्यवस्था में स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक हस्तक्षेप बढा। हर राजनेता को पारिवारिक और सामाजिक एकता से हमेषा भय बना रहता है इसलिए हर राजनैतिक दल किसी न किसी रुप में इस एकता को छिन्न-भिन्न करता रहता है। वह चाहता है कि धर्म जाति की तरह ही महिला और पुरुष का लिंग भेद भी उसकी परिवार तोडक, समाज तोडक भूमिका में सहायक हो। पारिवारिक संरचना एक बहुत जटिल प्रक्रिया है किसी एक परिवार का पला बड़ा सदस्य परिवार छोड़कर किसी दूसरे परिवार में शामिल होने के लिए मजबूर होता है तो इस परिस्थिति की कल्पना करना भी कठिन होता है किन्तु इसके अलावा कोई मार्ग नहीं होता। इस जटिलता की कमजोरियों का राजनेता लाभ उठाते हैं। महिला और पुरुष के बीच एक दूसरे के प्रति कुछ स्वाभाविक आकर्षण होता है। इस आधार पर महिला और पुरुष के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये इसका निर्णय उन महिला और पुरुष अथवा उनके परिवार पर छोड़ा जाना चाहिये था किन्तु हमारे राजनेताओं ने जबरदस्ती इस दूरी घटाने और बढाने में अपना कानूनी पैर फसाया। सामान्यतया व्यवस्था है कि लड़की और लड़के के परिवार यह अवष्य देखते हैं कि परिवार बदलते समय लड़की की तुलना में लड़के की योग्यता अधिक हो। इसमें भी राजनेता महिला सषक्तिकरण के नाम पर हस्तक्षेप करता है। परिवार में जन्म लिया बालक परिवार समाज और राष्ट्र के सम्मिलित अधिकार का माना जाता है किन्तु इसमें भी कानून बालक को राष्ट्रीय सम्पत्ति मानने की तिकडम करता रहता है।
मैंने अपने अनुभव से देखा कि सम्पूर्ण भारत में लगभग 99 प्रतिशत लोग दहेज का विरोध करते हैं और लगभग सबके सब अपने लड़के के विवाह में अधिक से अधिक दहेज लेने का प्रयास करते हैं। एक ओर तो ऐसे दहेज विरोधी लड़की के पिता के प्रति बहुत दया भाव प्रकट करते हैं दूसरी ओर वही लोग विवाहित लड़की को पिता से सम्पत्ति लेने के लिए मुकदमा लडने तक की प्रेरणा देते देखे जाते हैं। कानून तो पूरी तरह ऐसे पिता पुत्री टकराव का तानाबाना हमेषा बुनता ही रहता है। किन्तु कभी-कभी तो धर्मगुरु तक इस प्रचार में शामिल हो जाते हैं। परिवार का अर्थ सम्पूर्ण समपर्ण और सहजीवन होता है। इस सहजीवन में बाहर का हस्तक्षेप विषेष परिस्थिति में ही होना चाहिए किन्तु हमारे कानून हर मामले में हस्तक्षेप भी करते हैं और यदि दो लोग अलग होना चाहंे तो उन्हे अलग होने की स्वतंत्रता में भी बाधा उत्पन्न करते हैं।
मैं भी बचपन में दहेज विरोधी रहा। मेरे लड़के के विवाह के लिए एक परिचित गरीब व्यक्ति ने इच्छा व्यक्त की। मैंने उन्हें एक अन्य बहुत योग्य लडका सुझाया तो उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि वे तो मेरे ही घर में लडकी देना चाहते हंै। मुझे लगा कि उन्हें लडका या परिवार की अपेक्षा मेरी जमीन और आर्थिक सम्पन्नता से अधिक मोह है। मैंने इन्कार कर दिया और दहेज विरोध के प्रति मेरा मोह भंग हो गया। मैंने महसूस किया कि दहेज कोई बुराई न होकर एक सामाजिक व्यवस्था रहा है। विवाह के समय एक लडकी अपने पिता के घर से अपना अनुमानित हिस्सा लेकर जाती है और पति परिवार अपने लडके के हिस्से के अनुपात में जेवर के रुप में बहू को देता है। यह जेवर अंत तक उस लडकी की व्यक्तिगत सम्पत्ति मानी जाती है। अपवाद स्वरुप ही माता पिता इसमें कोई गड़बड़ी करते रहे हैं। मैं नहीं समझता कि इस दहेज प्रथा को क्यों तोड़कर लड़की को पिता की सम्पत्ति में कानूनी अधिकार को मान्यता दी गई। यदि ऐसा करने वाले की नीयत पर संदेह किया जाये तो क्या गलत है? पुराने समय में तो वैसे भी सम्पत्ति का बटवारा न के बराबर होता था। यह तो कानूनी बटवारा भारत में अंग्रेजो की देन है जो न समाज व्यवस्था मानते हैं न ही परिवार व्यवस्था को। वे तो केवल व्यक्ति को ही समाज की एक मात्र इकाई मानते हैं। वैसे भी भारत में आधी आबादी दहेज से संबंध नहीं रखती। शेष आधी आबादी भी ऐसी है जो सम्पन्न माने जाते हंै। पता नहीं हमारे नेताओं को इन सम्पन्नों की दहेज प्रथा के बारे में सोचने की जरुरत क्यों पड़ी। इन्होंने दहेज के नाम पर व्यवस्था को तोड़ा। जबकि यदि इनमें कोई कमी थी तो उसे सुधारना चाहिये था। मैं सोचता हॅू कि दहेज का विरोध करना बिल्कुल ही अव्यावहारिक है। कोई अच्छी लडकी बिना दहेज के सम्पन्न कमजोर लड़के के साथ स्वेच्छा से जाती है या कोई सम्पन्न कमजोर लडकी धन देकर किसी गरीब के साथ चली जाती है तो यह उनका आंतरिक मामला है और यदि सहमति है तो इसमें समाज या कानून का हस्तक्षेप क्यांे? भारत में जितने प्रतिषत गरीब हैं, उतने ही प्रतिषत गरीब लड़को की भी संख्या है और गरीब लड़कियों की भी। यदि कोई सामाजिक क्रांति करके या कानून बनाकर बड़े घर के लड़कों के साथ बिना दहेज के गरीब लड़कियों का विवाह कराने की पहल की गई तो मेरे विचार से तो यह प्रयास बहुत ही हानिकारक होगा क्योंकि क्या यह भी प्रयास होगा कि फिर बडे़ घर की लड़कियों को गरीब लड़कों के साथ जोड़ने की मुहिम शुरु की जाये। मैं तो सोच भी नहीं सकता कि दहेज का विरोध करने वाले इतनी साधारण सी बात भी क्यों नहीं समझ पाते।
यदि हम वर्तमान स्थिति की समीक्षा करें तो देख रहे हैं कि स्वाभाविक रूप सेे दहेज पूरी तरह समाप्त हो गया है। विवाह योग्य लड़कियों की संख्या बहुत कम हो गई है। कहीं कहीं तो लड़के वाले दहेज देने लगे हैं। जाति प्रथा भी टूट रही है। इसके बाद भी कुछ पेषेवर नेता और सामाजिक कार्यकर्ता दहेज को समस्या के रूप मे बताते रहते हैं। उनकी आदत हो गई है। एक विचारणीय सिद्धान्त यह भी है कि किसी वर्ग मे सभी व्यक्ति अच्छे या बुरे नहीं होते। यदि किसी वर्ग विषेष को विषेष अधिकार दिये जाते है तो उस अधिकार प्राप्त वर्ग के धूर्त अपराधी प्रवृत्ति के लोग उस विषेषाधिकार का लाभ उठाते हैं और उस वर्ग से बाहर के शरीफ लोगों का शोषण होता है। दहेज के कानून का कितना दुरूपयोग हुआ यह पूरा देष जानता है। फिर भी पता नहीं क्यो ऐसे ऐसे धूर्त सषक्तिकरण के विषेषाधिकार कानून बनाये भी जाते है और रखे भी जाते है।
मैं जानता हॅू कि दहेज के मामले में ऐसी सोच रखने वाला मैं अकेला ही हो सकता हॅू किन्तु मैं आष्वस्त हॅू कि परिवार के पारिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का कोई कानूनी हस्तक्षेप बहुत घातक होगा। हिन्दू कोड बिल तो पूरा का पूरा समाज व्यवस्था के लिए एक कलंक है ही। यह परिवार को तोड़ता है, समाज को तोड़ता है, और किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं देता। फिर भी मैं यह महसूस करता हॅू कि पुरानी व्यवस्था पर न तो अब लौटना संभव है, न ही उचित। इसलिए मैं एक संषोधित व्यवस्था का सुझाव देता हॅू। इसके अनुसार सरकार को पारिवारिक मामलों मंे सारे कानून हटा लेने चाहिये। साथ ही एक नई व्यवस्था बनानी चाहिये कि परिवार की सम्पत्ति मंे परिवार के प्रत्येक सदस्य का जन्म से मृत्यु तक समान अधिकार होगा। इसमें उम्र, लिंग आदि का कोई भेद नहीं किया जायेगा। परिवार की आंतरिक व्यवस्था परिवार के लोग बिना बाहरी हस्तक्षेप के आपसी सहमति से स्वतंत्रतापूर्वक कर सकेंगे। यदि परिवार का कोई सदस्य कभी भी परिवार छोड़ना चाहे तो वह अपना हिस्सा लेकर परिवार छोड़ सकता हैं।
मैं यह भी जानता हॅू कि कोई भी राजनेता ऐसे सुझाव को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि इससे तो उसका समाज तोड़क उद्देष्य ही खत्म हो जायेगा किन्तु मैं समझता हॅू कि हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मैं देखता हॅू कि मेरे कई साथी समाज सेवा के नाम पर दहेज प्रथा के विरोध में कुछ न कुछ करते बोलते रहते है। मेरा उन साथियों से भी निवेदन है कि वे राजनेताओं के दहेज विरोधी प्रचार से अपने को मुक्त करें और महसूस करें कि दहेज कोई सामाजिक समस्या या अन्याय अत्याचार नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है जो आपसी सहमति से चलती हैं।
नोट- मंथन का अगला विषय होगा- कृषि भूमि और कृषि का संतुलन

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