Lets change India
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान- बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 25, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दवा और टाॅनिक के अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। टाॅनिक के दुष्परिणाम नहीं होते जबकि दवा के दुष्परिणाम भी संभव हैं। दवा किसी अनुभवी डाॅक्टर की सलाह से ही ली जाती है जबकि टाॅनिक कभी भी उपयोग किया जा सकता है। यदि दवा निश्चित बीमारी पर नियंत्रण के बाद भी उपयोग की जाये तो गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। बताया जाता है कि सीमित मात्रा में शराब दवा का काम भी करती है किन्तु आदत पडने के बाद बहुत गंभीर नुकसान पहुंचाती है । इसलिए टाॅनिक को दवा और दवा को टाॅनिक के समान उपयोग करना हानिकारक होता है।
भारतीय संस्कृति विचारप्रधान, इस्लामिक संस्कृति संगठन प्रधान,पाश्चात्य संस्कृति धन प्रधान और साम्यवादी संस्कृति उच्श्रंृखलता प्रधान मानी जाती है। संगठन में शक्ति होती है और धन में आकर्षण होता है। इसलिए भारतीय संस्कृति लम्बे समय तक इस्लामिक संस्कृति और पाश्चात्य विचारधारा की गुलाम रही। स्वतंत्रता के बाद जब स्वतंत्र भी हुई तो साम्यवादी संस्कृति ने उसको जकडना शुरु कर दिया। ऐसे संकटकाल में संघ परिवार ने अपनी हिन्दुत्व की मूल विचारधारा से हटकर इन तीनों संस्कृतियों का उनके ही तरीकों से मुकाबला किया। उनमें भी इस्लामिक संस्कृति ज्यादा संगठित थी और संघ परिवार ने उसे ही अपना प्रथम शत्रु घोषित किया। स्पष्ट है कि संघ ने इस्लामिक विस्तारवाद का भरपूर विरोध किया जो आज भी जारी है। संघ ने हिन्दुओं की घटती संख्या की निरंतर चिंता की। सांस्कृतिक आधार पर भी संघ परम्परागत मान्यताओं के साथ लगातार दृढ़ रहा जबकि पाश्चात्य जगत और साम्यवाद परम्पराओं को किसी भी परिस्थिति में तोडकर उसे आधुनिक वातावरण में बदलने का प्रयास करते रहे। परिवार व्यवस्था में भी संघ परम्पराओ के साथ मजबूती से डटा रहा जबकि स्वतंत्रता के बाद अन्य सबने मिलकर परिवारों को छिन्न भिन्न करने के लिए आधुनिकता का कुचक्र रचा। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भी संघ पूरी ताकत से सक्रिय रहा जबकि इस्लाम और साम्यवाद पूरी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करने का प्रयास करते रहे। नैतिकता और चरित्र के मामले में भी संघ की अपनी एक अलग पहचान बनी हुई है। आज भी हम देख रहे है कि लव जेहाद,धर्म परिवर्तन या जनसंख्या वृद्धि को आधार बनाकर मुस्लिम साम्यवादी गठजोड़ का मुकाबला करने में संघ निरंतर सक्रिय है। जे एन यू संस्कृति से संघ निरंतर टकरा रहा है। यहाॅ तक कि कई प्रदेशो में संघ के कार्यकर्ता प्रताडित भी किये जाते है किन्तु संघ अपने हिन्दुओं की सुरक्षा के कार्य में कोई कमजोरी नहीं दिखाता। अपने विस्तार के लिए संघ प्रेम,सेवा, सद्भाव का भी सहारा लेता रहा है। यदि कोई अकास्मिक दुर्घटना हो जाती है तो संघ बिना भेदभाव के भी सेवा करने को आगे आ जाता है। इस तरह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व को गंभीर रुप से प्रभावित करने वाली बीमारियों से टकराने में संघ अकेला सबसे आगे रहा है।
पिछले कुछ समय से ऐसा दिख रहा है कि संघ हिन्दु समाज में दवा को टाॅनिक के रुप में उपयोग करने की आदत डाल रहा है। मोदी के पूर्व भारत में हिन्दुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया। स्पष्ट है कि भारत में यदि मुसलमानों की संख्या एक तिहाई भी हो जाती तो भारत में हिन्दुओं की स्थिति पाकिस्तान या कष्मीर सरीखे कर दी जाती। किन्तु हिन्दुत्व गुण प्रधान संस्कृति है,संगठन प्रधान नहीं। मजबूत होने की शुरुवात होते ही मोदी से हटकर हिन्दू राष्ट्र का नारा देना हिन्दुत्व के विरुद्ध है। हिन्दुत्व की सुरक्षा के लिए तो विशेष अभियान चलाया जा सकता है किन्तु इस्लामिक तरीके से अपने विस्तार के विषय में सोचना हिन्दुत्व के विरुद्ध है। परिवार व्यवस्था को परम्परागत या आधुनिक की अपेक्षा लोकतांत्रिक दिशा में ले जाना चाहिए। राष्ट्र भावना को भी कभी राष्ट्रवाद की दिशा में नहीं बढना चाहिये क्योकि हिन्दू समाज को राष्ट्र या धर्म से उपर मानता है जो अन्य लोग नहीं मानते। अन्य धर्मावलम्बियों को अपने साथ जोडने की घर वापसी भी उचित नहीं है। इससे अच्छा तो यह होता कि धर्म परिवर्तन कराने पर कानून के द्वारा रोक लगाने की मांग की जाती। मुस्लिम आक्रामकता को कमजोर करने के नाम पर मंदिर,गाय,गंगा जैसे भावनात्मक मुद्दो को किनारे करके समान नागरिक संहिता को अधिक महत्व दिया जाता। संघ भी समान नागरिक संहिता पर जोर देता है और चाहता है समान आचार संहिता जो बहुत घातक है। भारत सवा सौ करोड व्यक्तियों का देश हो और सबको समान अधिकार हो यह समान नागरिक संहिता होती है लेकिन संघ इसके विपरीत चाहता है। संघ धर्म और विज्ञान के बीच भी दूरी बढाना चाहता है, जो ठीक नहीं। धर्म और विज्ञान के बीच समन्वय होना चाहिये। संघ वामपंथ के मुकाबले दक्षिणपंथ की दिषा में चलना चाहता है जबकि उसे अब उत्तरपंथ की दिशा में चलना चाहिए अर्थात् संघ को परम्परा और आधुनिक के बीच यथार्थ का सहारा लेना चाहिये। संघ को भावनाओं की अपेक्षा विचारों को अधिक महत्व देना चाहिए। संघ के प्रारंभ के बाद के सौ वर्षो में भारत वैचारिक धरातल पर निरंतर पिछड रहा है। विवेकानंद के बाद भारत में कोई गंभीर विचारक आगे नहीं आ सका और इस संबंध में संघ ने कभी कुछ नहीं सोचा। संख्या विस्तार की अपेक्षा गुण प्रधानता अधिक महत्वपूर्ण होती है। साम्यवाद ने गुण प्रधानता को छोड दिया जिसके कारण वह समाप्ति की कगार पर है। इस्लाम ने भी संख्या विस्तार और संगठन को एकमात्र लक्ष्य बना लिया। स्पष्ट दिख रहा है कि यदि उसने बदलाव नहीं किया तो उसकी दुर्गति निश्चित है। उचित होगा कि हिन्दुत्व उस प्रकार की भूल न करें। लेकिन संघ इस संबंध में सतर्क नहीं है। हम अब भी यदि सुरक्षात्मक मार्ग पर चलते रहे तो विश्व व्यवस्था में हमारी लाखों वर्षो की पहचान खतरे में पड जायेगी।
हिन्दुत्व की सुरक्षा के लिए हमने दवा के रुप में संघ का सहारा लिया, इसके लिए संघ बधाई का पात्र है। वर्तमान समय में भी भारत में इस्लाम की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है कि उन्होने हार मान ली हो। मोदी जी के नेतृत्व में उन्हें सुधार सा समापन में से एक को चुनना होगा और भारत का मुसलमान गंभीरतापूर्वक इस विषय पर विचार भी कर रहा है। किन्तु यह उचित नहीं होगा कि हम भविष्य में भी दवा को टाॅनिक के रुप में उपयोग करने की आदत डाल ले। संघ परिस्थिति अनुसार दवा है और स्वस्थ होने के बाद भी उसका उपयोग स्वास्थ के लिए नुकसान देह है। हिन्दुओं को इतनी सतर्कता अवश्य रखनी चाहिए।
मेरी अपने मित्रों को सलाह है कि वे हिन्दुत्व की सुरक्षा के प्रयत्न में संघ का निरंतर समर्थन सहयोग करें। किन्तु यदि संघ इससे आगे बढकर अन्य संस्कृतियों से बदला लेना चाहता है तो हम ऐसे प्रयत्नों का भरपूर विरोध करें। अब तक नरेन्द्र मोदी की दिशा ठीक दिख रही है और नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व विरोधी अथवा हिन्दुत्व के नाम पर अपना एजेंडा थोपने वाले संघ परिवार के बीच यथार्थवाद की लाईन पर चलते दिख रहे है और किसी भी पक्ष के दबाव में नहीं आ रहे है। हमारा कर्तव्य है कि हम भावनाओं से उपर उठकर हर मामले में हर संगठन के कार्यो की समीक्षा करके ही अपनी सहभागिता की आदत डालें।
मंथन क्रमांक 27 का अगला विषय ‘भारत में नक्सलवाद’ होगा।

सम्मेलन संम्पन्न-बजरंग मुनि

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सत्रह मार्च से उन्नीस मार्च तक का तीन दिनों का ग्राम संसद अभियान तथा विचार मंथन का संयुक्त सम्मेलन सम्पन्न हुआ। ग्राम संसद अभियान की विस्तृत विवरण की रिपोर्ट वे अलग से देंगे किन्तु मोटी मोटी यह बात तय हुई जिसके अनुसार ग्राम संसद की भूमिका इस प्रकार बने कि ग्राम संसद अपना गांव संबंधी आंतरिक संविधान स्वतंत्रतापूर्वक बना सके तथा राष्ट्रीय संविधान संशोधन में भी ग्राम संसद की महत्वपूर्ण भूमिका हो। इसके लिये दो समय बद्ध कार्यक्रम भी तय किये गये। 1 पूरे भारत को सौ लोक प्रदेशो में बांटकर एक वर्ष की समय सीमा में सौ सम्मेलन आयोजित किये जायें। 2 डेढ वर्ष की समय सीमा में जंतर मंतर पर दस दिवसीय ग्राम संसद संदेश कार्यक्रम रखा जाये। दोनों कार्यक्रमों के लिए एक टीम का गठन किया गया जिसमें मुख्य रुप से ओमप्रकाश दुबे, प्रमोद केशरी, रामवीर श्रेष्ठ सहित बीस लोग शामिल हैं।
विचार मंथन का पूरा जिम्मा मेरे पास है। यदि व्यवस्थापक के प्रयत्नों से संविधान सभा बन भी गई तो संविधान सभा फिर से वैसी ही भूल न कर दे जैसी सत्तर वर्ष पूर्व हुई थी इसके लिये अलग से सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के आधार पर जन जागरण करना होगा। गांवों को संविधान संशोधन का अधिकार मिले इसके साथ साथ गांव के नागरिको में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, वैश्विक , पारिवारिक सहित अन्य सब प्रकार के मामलों में ठीक ठीक निष्कर्ष निकालने की सूझ बूझ पैदा करनी होगी। कहीं ऐसा न हो कि देश के आम नागरिक कुछ महत्वपूर्ण लोगों से प्रभावित होकर फिर से भूल कर बैठें। आम नागरिकों को फेसबुक, वाटसअप, टिवटर, बेवसाइट, ज्ञानतत्व तथा प्रत्यक्ष चर्चा के माध्यम से एक वैचारिक मंथन में सक्रिय रखना होगा। यह कार्य मेरे जिम्मे है तथा मेरे मार्ग दर्शन में वही बीस लोगों की टीम इस कार्य में भी सहयोग करेगी। इस निमित्त दो कार्यक्रम घोषित हुए। 1 अगले दो वर्ष की समय सीमा में एक माह तक के लिये एक संविधान मंथन का कार्य सम्पन्न हो। इसमें भारतीय संविधान के पच्चीस मुख्य विषय छांटकर प्रत्येक विषय पर एक एक दिन बारह बारह घंटे की चर्चा हो जिसमें देश भर के विद्वान भाग लें। इस बैठक में ही एक छाया संविधान मंथन सभा के गठन पर भी चर्चा हो। इस कार्य का पूरा संचालन आचार्य पंकज जी तथा प्रमोद केशरी जी को दिया गया।2 प्रति माह दिल्ली में एक तीन दिनों का स्वतंत्र विचार मंथन तथा प्रशिक्षण का मिला जुला कार्यक्रम होगा। यह कार्यक्रम प्रतिदिन छः घंटे का होगा जिसमें उन सब विषयों पर विस्तृत और स्वतंत्र चर्चा होगी जिन पर मैं कार्यक्रम के पूर्व फेसबुक,वाटस अप ज्ञानतत्व काश इंडिया पर व्यापक मंथन करा चुका हॅू। इस स्वतंत्र मंथन में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकेगा न ही कोई प्रस्ताव पारित हो सकेगा। इस योजना का संचालन प्रवीण शर्मा जी तथा रामवीर श्रेष्ठ जी को दिया गया।
व्यवस्थापक तथा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन एक दूसरे के सहयोगी बनकर जो कार्य प्रारंभ किये हैं यह एक प्रकार का द्वितीय स्वतंत्रता संघर्ष के समान है। भारत की स्वतंत्रता राष्ट्रीय स्तर तक आकर संसद तक सीमित हो गई है। हर नागरिक तक वह स्वतंत्रता पहुँचे इस दिशा में आगे बढने का प्रयास हैै। इसे द्वितीय स्वतंत्रता संघर्ष मानकर इससे लोकतंत्र रक्षक सेनानियों का भी मार्ग दर्शन और सहयोग लिया जायेगा। यह जिम्मेदारी रमेश राघव जी को दी गई है।
मैं तो सिर्फ विचार मंथन कार्यक्रम तक सीमित था। अन्य चर्चाओं में तो मेरी भूमिका सिर्फ आमंत्रित की थी किन्तु आप सबने पूरे तीन दिवसीय कार्यक्रम का संचालन मुझे सौंप दिया। यह एक कठिन कार्य था किन्तु यथा संभव मैंने पूरा किया। मेरे कठोर अनुशासन के कारण कुछ साथियों को कष्ट हुआ। कुछ साथी या तो बोल ही नहीं पाये या बीच में ही रोक दिये गये। आशा है कि हमारे साथी मेरी मजबूरी कोे भी समझने का प्रयास करेंगे।

बजरंग मुनि

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मंथन क्रमांक 25 निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण- बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 23, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता होती है। समाज और राज्य एक दूसरे के लिए सहयोग और नियंत्रण का कार्य करते रहते है। व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा समाज का कर्तव्य होता है और राज्य का दायित्व। व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में सम्पत्ति का भी समावेश होता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की सहमति के बिना राज्य उसकी सम्पत्ति में भी कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
पश्चिम की लोकतांत्रिक और पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है तो साम्यवादी व्यवस्था में राज्य। भारत की प्राचीन व्यवस्था में समाज और व्यक्ति के अधिकारों का संतुलन बिल्कुल ठीक था जो भारत की गुलामी के काल में बिगड गया। मुस्लिम शासन काल में व्यक्ति कमजोर हुआ तो अंग्रेजो के शासनकाल में समाज कमजोर हुआ। स्वतंत्रता के बाद तो यह एक तरह का खिचडी सरीखा बन गया जिसमें पता ही नहीं है कि व्यक्ति समाज और राज्य की क्या स्थिति है। भारतीय व्यवस्था में साम्यवाद का कितना प्रभाव है और पॅूजीवाद का कितना यह स्पष्ट नहीं है। सन् 91 के पहले तो भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर साम्यवाद का विशेष प्रभाव था किन्तु उसके बाद धीरे धीरे पूंजीवाद की घुसपैठ हुई और वर्तमान में दोनों की खिचडी बनी हुई है।
जिन भी देशो में राष्ट्र शब्द का उपयोग होता है उसका वास्तविक आशय सरकार से ही होता है चाहे राष्ट्र शब्द का उपयोग संघ परिवार के लोग करें या साम्यवादी, नीयत दोनों की एक ही होती है। इसका अर्थ हुआ कि सरकारीकरण को ही मीठी चाशनी में लपेट कर राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है ,जबकि राष्ट्रीयकरण जैसा कुछ नहीं होता है।
यदि किसी देश में तानाशाही होती है तो राष्ट्रीयकरण से देश या राज्य तरक्की करता है,और समाज गुलाम हो जाता है किन्तु यदि किसी देश में लोकतंत्र है तो राष्ट्रीयकरण भ्रष्टाचार का केन्द्र बन जाता है। भारत ऐसे ही भ्रष्टाचार का केन्द्र बना है जहाॅ की आर्थिक व्यवस्था में पूरी तरह सरकार का नियंत्रण है। यदि राष्ट्रीयकरण किसी मामले में नहीं भी है तो भी सरकार का नियंत्रण इतना अधिक है कि भ्रष्टाचार होना ही है। किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए सम्पूर्ण निजीकरण ही एकमात्र समाधान है। निजीकरण से गरीब और अमीर के बीच की दूरी बढती है क्योंकि स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में गरीब और श्रमजीवी पिछडेगा ही। किन्तु सरकारीकरण इस आर्थिक असमानता का समाधान न होकर विस्तार देने वाला होता है क्योंकि प्रतिस्पर्धा कार्यक्षमता को बढाती है तथा उत्पादन में भी वृद्धि करती है। राष्ट्रीयकरण से नुकसान ही नुकसान होता है। मेरा अनुमान है कि कोई भी सरकार किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता देना नहीं चाहती। वर्तमान सरकार दो वर्षो से पूंजीवाद की तरफ बढ रही है जिसका अर्थ हुआ कि धीरे धीरे निजीकरण आ रहा है किन्तु यह स्पष्ट नहीं है कि राजनेताओं की नीयत साफ है। भ्रष्टाचार और असफलताओं को देखते हुये ये लोग निजीकरण स्वीकार कर रहे है किन्तु यह भय बना हुआ है कि थोडी सी समस्या सुलझते हीे फिर से इंस्पेक्टर राज और राष्ट्रीयकरण का नारा बुलंद कर सकते हैं। वैसे भी सैद्धांतिक रुप से संघ परिवार राष्ट्रीयकरण अर्थात सरकारीकरण का पक्षधर रहा है यद्यपि वर्तमान में वह निजीकरण का समर्थन कर रहा है। भारत की वर्तमान समस्याओं का तात्कालिक समाधान तो अधिकतम निजीकरण ही है। सरकार को चाहिये कि वह अपने सुरक्षा और न्याय की आवश्यकताओ के अनुरुप टैक्स लगाकर बाकी सभी आर्थिक मामलों में सम्पूर्ण स्वतंत्रता दे दे, पश्चिमी देशो से भी अधिक।
यद्यपि सरकारीकरण का समाधान निजीकरण है किन्तु निजीकरण आदर्श व्यवस्था नहीं है। आदर्श व्यवस्था तो समाजीकरण है जिसका अर्थ होता है कि समाज की प्रत्येक इकाई को अपनी आर्थिक नीतियों के संबंध में निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता हो। परिवार की पारिवारिक मामलों में गांव को गाॅव संबंधी मामलों में और उपर की इकाईयों को अपने अपने अन्य मामलों में। एक स्कूल चलाना है। गांव के लोग बैठकर यह निर्णय कर सकते है कि स्कूल की पूरे गांव के द्वारा व्यवस्था होनी चाहिये अथवा किसी व्यक्ति को करने दिया जाये। मैं नहीं समझता कि इस स्कूल के मामले में सरकार का हस्तक्षेप क्यों हो। कोई परिवार अपने बालक को नहीं पढाना चाहता तो समाज उसे पढाने के लिए बाध्य कर सकता है किन्तु सरकार कौन होती है बीच में दखल देने वाली। सरकार ने तो ऐसा वातावरण बना दिया है कि जैसे सरकार ही समाज हो और उसे सारे अधिकार प्राप्त हो।
मेरा स्पष्ट मत है कि सबसे अच्छी व्यवस्था और आदर्श स्थिति तो समाजीकरण है और सबसे बुरी स्थिति राष्ट्रीयकरण है। बीच में निजीकरण है। वर्तमान में राष्ट्रीयकरण से छुटकारा के लिए अल्पकाल में निजीकरण को भले ही प्रोत्साहित किया जाये किन्तु दीर्घकालीन नीति तो समाजीकरण ही है। सभी समस्याओं का यही समाधान है।
मंथन क्रमांक 26 का अगला विषय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समस्या या समाधान होगा।

मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख-बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 11, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्ति की स्वयं की भूमिका न हो। यदि ऐसी कोई भूमिका भी हो तो भूमिका के बाद संभावित परिणाम के आकलन और यथार्थ के बीच ही सुख और दुख होता है।
इस विषय को मैं कुछ वास्तविक घटनाओं से समझाता हॅू। मेरे एक मित्र अपने लडके के विवाह के लिए लडकी तय करने गये। तय करके जब वापस लौट रहे थे तो बस एक्सीडेंट हो गई जिसमें दो तीन अन्य यात्री मर गये और मेरे मित्र को मामूली चोट आई। उन्होने वह रिस्ता यह कहकर तोड दिया कि आने वाली बहू के लक्षण ठीक नहीं हैं। रामानुजगंज वापस आने के बाद मैंने उस घटना को सुनकर उन्हें धन्यवाद दिया कि आपकी आने वाली बहु बहुत सुलक्षण है जिससे आप इतने गंभीर एक्सीडेंट में भी मामूली चोट से बच गये। उनकी भावना तुरन्त बदल गई और उन्होने खबर भेजकर वह रिस्ता फिर से स्वीकार कर लिया। इसी तरह मेरे कई रिश्तेदार है जिनके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि मेरे जाने पर किसका व्यवहार कैसा होगा। जिसके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि वे खडे होकर हाथ जोडकर स्वागत करेंगे। वे अगर बैठे रहे तो मुझे दुख होता है । दूसरी ओर जिनके विषय में मैं अनुमान करता हॅू कि वे बैठे बैठे ही इशारे से ही सम्मान करेंगे वे यदि बैठे बैठे भी हाथ जोडकर मेरा सम्मान करें तो मैं प्रसन्न हो जाता हॅू। मेरे परिवार में कई लोग है। एक सदस्य किसी स्टाफ को बहुत डाटकर बोलता है और उसे दुख नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि उनकी ऐसी ही आदत है। दूसरी ओर मैं किसी को कभी नहीं डाटता । यदि उसी व्यक्ति को मैंने सिर्फ यह कह दिया कि उसने गम्भीर गलती की है तो वह दिन भर खाना नहीं खायेगा। स्पष्ट है कि किसी घटना से होने वाले परिणाम का संभावित आकलन ही सुख और दुख का आधार होता है। मेरे उस स्टाफ का अलग अलग आकलन उसके अलग अलग सुख दुख का आधार बना।
मेरे एक मित्र बरियों में रहते है । जब मिलते है तो इस बात से दुखी रहते है कि सब कुछ बिगड गया है। उनके लडके भी अलग रास्ते पर चलने लगे है और उनकी नहीं सुनते। वे सम्पूर्ण समाज व्यवस्था को भी बहुत गिरी हुई मानते हैं। मेरे परिवार के एक बडे बुजुर्ग भी लगभग इसी तरह अपने बच्चों को गलत मानते है। मैं फेसबुक में शरद कुमार जी की पीडा पढता रहता हॅू। वे अपने बच्चो,पत्नी तथा अन्य कुछ रिश्तेदारो के व्यवहार से भी बहुत दुखी रहते है। दूसरी ओर मैं स्वयं को देखता हॅू तो पाता हॅू कि मैं दुनिया का सबसे अधिक सुखी व्यक्ति हॅू। मेरे परिवार के लोग रिश्तेदार ,मित्र और यहाॅ तक कि स्टाफ के लोग भी कभी ऐसा काम नहीं करते जिससे मुझे कभी कोई दुख हो। इन दोनों बातों से होने वाले सुख और दुख में सामने वाला व्यक्ति कम और व्यक्ति स्वयं अधिक दोशी है क्योंकि व्यक्ति सामने वाले की सोच परिस्थितियाॅ और नीयत का आकलन किये बिना उससे कुछ उम्मीदे करने लगता है जो पूरी नहीं होती अथवा विपरीत होती हैं तब उसे दुख होता है। वास्तविकता यह है कि दुख होने का कारण व्यक्ति का स्वयं का गलत अनुमान है। यदि आप किसी बैठक में जा रहे है और आपने अनुमान किया है कि इस बैठक में 15 लोग आ सकते है। यदि 20 लोग आते है तो आप प्रसन्न और 10 आते है तो दुखी होंगे। कल्पना करिये कि आपने 25 का अनुमान किया है तब 20 आये तो आप दुखी और 10 आये तो नाराज हो जायेंगे। आपकी प्रसन्नता और नाराजगी का संबंध आने वालो की संख्या से नहीं है और आप प्रसन्न या दुखी होकर संख्या को घटा बढा भी नहीं सकते। स्पष्ट है कि आपका गलत आकलन ही आपके सुख और दुख का कारण बना। आप किसी यात्रा में अनुमान किये कि यह ट्रेन 2 घंटे लेट पहुचेगी और वह 1 घंटे ही लेट पहुची तो आप प्रसन्न हो गये और जब वह 3 घंटे लेट पहुंची तो आप दुखी हो गये। स्पष्ट है कि आपका अनुमान ही सुख दुख का कारण था ट्रेन नहीं।
अनेक लोग दूसरों से बहुत अपेक्षाए करते है और उन अपेक्षाओं के आधार पर परिणाम का आकलन कर लेते है। अपेक्षाए भी यथार्थ नहीं होती और परिणाम भी वैसे नहीं होते। अतीत का अनुभव लिये बिना यदि आप काल्पनिक अपेक्षाए करते है तो गलत आप है, सामने वाला नहीं। हमेशा दिमाग में सर्वश्रेष्ठ संभव का सिद्धांत बनाकर रखना चाहिये। जो लोग सर्वश्रेष्ठ का सिद्धांत मानकर चलते है वे अपने जीवन में अंत तक स्वयं भी दुखी रहते है तथा अपने अन्य सम्पर्को को भी निरंतर दुखी रखते है। जो कुछ हो रहा है और उपलब्ध है उसमें सर्वश्रेष्ठ क्या है उसी से संतुष्ट रहना चाहिये और उसी संतुष्टी में सुख का अनुभव करना चाहिये। भगवान बुद्ध के समान संसार दुखो का समुद्र है इस धारणा को मैं गलत मानता हॅू क्योंकि बुद्ध के समय हो सकता है कि ऐसा हो किन्तु वर्तमान समय में तो मैं बिल्कुल ऐसा नहीे देखता।
मेरे विचार से सुख और दुख के प्रभाव से बचने के लिए संभावित परिणाम का अनुमान सही होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। कोई भी व्यक्ति खुश रहने के लिए जानबुझकर अपने अनुमान को घटा बढा नहीं सकता। अनुमान बौद्धिक आकलन से होता है और सुख दुख भावनात्मक। भावना प्रधान लोग जल्दी सुख दुख से प्रभावित हो जाते है क्योंकि उनका अनुमान ही गलत होता है। जबकि बुद्धि प्रधान लोग सुख और दुख से कम प्रभावित होते है क्योंकि उनका अनुमान यथार्थ के नजदीक होता है। भावना प्रधान लोगों के लिए सुख और दुख से बचने का एक और मार्ग है कि वे किसी भी अप्रत्याषित परिणाम के लिए अपना सुख और दुख ईश्वर पर छोड दे अर्थात जो भी हुआ वह स्वाभाविक था,ईश्वर की मर्जी थी और उसमें किसी का कोई दोष नहीं है। इस तरह ईश्वर को शामिल कर लेने से भी सुख और दुख में कुछ कमी की जा सकती है। मैं चाहता हॅू कि हम सुख और दुख के मामले में अपने सोचने के तरीके में कुछ बदलाव करने का प्रयास करें।
मंथन क्रमांक 25 का अगला विषय निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण होगा।

बजरंग मुनि

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बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 10, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

बजरंग मुनि

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बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 9, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

बजरंग मुनि

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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