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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

मंथन क्रमांक-31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज

Posted By: admin on April 29, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक 31
कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं-
1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं।
2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात्र होता है अर्थात समाज मालिक होता है और राष्ट्र मैनेजर।
3 राष्ट्र कई प्रकार के होते है लोकतांत्रिक,तानाशाही,इस्लामिक,धर्मनिरपेक्ष आदि। राष्ट्र और देश लगभग समानार्थी होते है।
4 राष्ट्र की एक सरकार होती है,व्यवस्था नहीं। समाज की एक व्यवस्था होती है,सरकार नहीं।
कश्मीर की समस्या भारत की राष्ट्रीय समस्या है,सामाजिक नहीं। कश्मीर भारत में रहे या पाकिस्तान में या स्वतंत्र यह समाज का विषय नहीं है क्योंकि यह सामाजिक समस्या नहीं है किन्तु यह राष्ट्र और सरकार के लिए चिंता का विषय है।
इसलिए कश्मीर की बिगडती हुई स्थिति से सरकार अधिक चिंतित है,समाज कम। यदि हम सामान्य रुप से विचार करे तो यह बात न्याय संगत लगती है कि जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान के साथ जुडना चाहते है और उसके लिए मरने मारने को तैयार है तो हम उन्हे क्यों बलपूर्वक तकनीकी आधार पर अपने साथ रखने का प्रयास करें। स्पष्ट दिख रहा है कि कश्मीर को भारत में बनाये रखने में भारत के नागरिकों को बहुत अधिक खर्च करना पडता है। वह खर्च सैनिक भी होता है और उनकी व्यवस्था पर भी। विश्व स्तर पर भी कश्मीर को साथ रखने से देश का कोई बहुत अधिक सम्मान नहीं बढता । इसलिए क्यों न कश्मीर में जनमत संग्रह की बात मान ली जाये। सामान्यतया तो यह तर्क उचित दिखता है किन्तु यदि व्यावहारिक धरातल पर आकलन करें तो कश्मीर समस्या भावनात्मक नहीं बल्कि वास्तविक है। कश्मीर समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच की कोई भूभाग तक सीमित समस्या नहीं है, जैसा कि आमतौर पर लोग मानते है। मेरे विचार में तो पाकिस्तान इसमें कोई पक्षकार है ही नहीं बल्कि वह तोे इस्लामिक देश होने के नाते तथा इस विवाद में लाभ उठाने तक सीमित हैै। वास्तविक समस्या इस्लामिक विस्तारवाद से जुडी है। सारी दुनिया में जिस तरह दारुल इस्लाम के संगठित प्रयास हो रहे है उन प्रयासों में भारत का कश्मीर एक ऐसा क्षेत्र है जो वर्तमान में उस प्रयास को रोकने का युद्ध क्षेत्र है। कटटरपंथी इस्लाम में सारी दुनिया में युद्ध के अलग अलग फ्रंट खोल रखे है। कश्मीर उनमें ंसे मात्र एक है। ऐसी बात नहीं है कि कश्मीर छोड देने से इस्लामिक कटटरवाद से भारत को मुक्ति मिल जायेगी। बल्कि उससे ठीक आगे बढकर एक नया टकराव का क्षेत्र खुल जायेगा और हम कमजोर हो जायेंगे । यह भ्रम है कि कश्मीर विवाद तकनीकी कारणों से है। सच्चाई यह है कि कश्मीर विवाद इस्लामिक विस्तारवाद का एक युद्ध क्षेत्र है और वह भारत के लिए जीवन मरण का प्रश्न है । यही कारण है कि कश्मीर मुददे पर मैं भारत पाकिस्तान के बीच अथवा न्याय अन्याय के बीच कोई विचार नहीं करना चाहता। बल्कि मैं इस बात से सहमत हॅू कि किसी भी स्थिति में कश्मीर को भारत में बनाये रखना चाहये।
मैं जानता हॅू कि दुनिया में मुसलमान कभी किसी भी परिस्थिति में सहजीवन को स्वीकार नहीं करता । यदि वह कमजोर होता है तो दबकर मजबूत होने की प्रतिक्षा करता है और मजबूत होता है तो दबाकर दूसरे के समाप्त होने का प्रयत्न करता है।वह हर समय मरने मारने के लिए तैयार रहता है। वह अनंतकाल तक लडने में विश्वाश करता है क्योकि वह इसे धर्म युद्ध समझता है। इस तरह यह सोचना ही व्यर्थ है कि कश्मीर के मुस्लिम बहुमत को कभी समझाया जा सकता है। क्योंकि वह समाज से भी उपर और राष्ट्र से भी उपर अपने धार्मिक संगठन को मानता है जिसका बहुत बडा हिस्सा भारत के बाहर रहता है।
विचारणीय यह है कि भारत सरकार को क्या करना चाहिये और भारतीय समाज को क्या करना चाहिये। भारतीय सरकार के लिए तो यह स्पष्ट है कि उसे साम दाम दण्ड भेद किसी भी तरीके से कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखना चाहिये। किन्तु सामाजिक आधार पर कुछ स्थिति जटिल है। भारत में 95 प्रतिषत ऐसे लोग है जिन्हें अपनी रोजी रोटी की चिंता है और वे इन मुददों पर ध्यान नहीं दे पाते। पांच प्रतिषत ऐसे लोग है जो इन मुददों पर सोचते है । इनमें कुछ विचारक कुछ रिटायर्ड लोग तथा अधिकांश राजनेता या उनके कार्यकर्ता शामिल होते है। ये लोग दो विचारधाराओं में बटे हुये है। एक वे है जो अप्रत्यक्ष रुप से वामपंथी इस्लामिक संगठनों से सहानुभूति रखते है। ऐसे सभी लोग दिन रात बिना मांगे सरकार को कष्मीरियों से बातचीत की सलाह देते है। ये लोग इससे भी आगे बढकर पाकिस्तान से भी बातचीत के लिए निरंतर दबाव बनाये रखते है।ये अपने को धर्मनिरपेक्ष कहते है किन्तु होते है पूरी तरह अल्पसंख्यक समर्थक। दूसरा समूह उन लोगों का है जो अपने को राष्ट्रवादी कहते है। ऐसे लोग बिना मांगे सरकार को हिंसा करने की सलाह देते रहते है। इन्हे न विश्व समीकरण की चिंता है न ही जीत हार की। ये तो सिर्फ मार दो कुचल दो के अलावा कुछ अन्य बोलते ही नहीं। ऐसे लोग अपने शहर के किसी नामी गुण्डे के खिलाफ गवाही तक नहीं दे सकते किन्तु अपने शहर में पाकिस्तानी राष्ट्रपति का पुतला जलाने में बहुत उछलकूद करते दिखते हैं। यदि कश्मीर में या पाकिस्तान के बार्डर पर पांच सैनिक शहीद हो जाते हे तो इन नकली राष्ट्रवादियों की उछलकूद देखते ही बनती है। भले ही अगर डाकू हमारे जिले के पांच लोगों की हत्या कर दे तो इनकी सक्रियता नहीं दिखती। ये दोनों ही विचारधाराओ के लोग गलत है तथा वास्तविक समस्या से ध्यान हटाते है। यदि ये आपस में लडते रहे तो कोई बहुत बडा नुकसान नहीं होता किन्तु ये आपस में तो सिर्फ मौखिक लडाई लडते है और उसका नुकसान शांतिप्रिय लोगों को उठाना पडता है।
मैं मानता हॅू कि सैनिक भी हमारी सुरक्षा के लिए ही नियुक्त है और उनका भी बहुत महत्व है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि किसी सैनिक और किसी गांव के किसान या मजदूर के बीच में अन्ययापूर्ण अंतर होना चाहिये। एक सैनिक,एक प्रोफेसर,एक डाक्टर,एक वैज्ञानिक और एक गंभीर विचारक के बीच में सबका अलग अलग महत्व है। सिर्फ सैनिक का ही नहीं। एक सैनिक की मृत्यु पर यदि एक करोड रुपया दिया जाता है तो किसी ग्रामीण को हाथी या सरकारी भालू द्वारा मार दिये जाने पर दो लाख रु. इस तरह दिया जाता है जैसे कोई जूठन दी जा रही हो। जबकि वह सैनिक उस ग्रामीण के दिये हुए टैक्स से ही अपने दायित्व पूरे करता है। मैं नहीं समझता कि अंतर इतना क्यों होना चाहिये। जब सैनिक राष्ट्र के लिए प्राण न्यौछावर करते है तो फिर वे जंतर मंतर पर धरना क्यों देते है।क्या उन्हे प्राप्त सुविधायें भारत के औसत नागरिकों से कम है। यदि वे यह सोचते है कि जिस तरह राजनेता दोनों हाथों से देश को लूटते रहे है उसी तरह उन्हे भी उसका हिस्सा चाहिए तब तो उनके प्रदर्शन का कुछ औचित्य है अन्यथा मैं नहीं समझता कि सैनिकों को प्राप्त सम्मान कम है और अपनी सम्मान वृद्धि के लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए। जिस तरह एक सैनिक ने अपने कार्य की चिंता छोडकर खाने की थाली दिखाने का नाटक किया तथा उसे अनावश्यक महत्व मिला अथवा जिस तरह किसी सैनिक की लाश को जाते समय मुख्यमंत्री की गाडी को भी रोक देनी की सलाह दी गई अथवा जिस तरह किसी सैनिक की मृत्यु पर अलग अलग सहायता देने की सरकारों में होड मच जाती है यह मुझे लगता है कि राष्ट्रभक्ति का नकली नाटक मात्र हैं। उससे तो वास्तव में यह विचार बनता है कि इनमें कितनी राष्ट्र भक्ति है और कितनी नौकरी।
कश्मीर के लिए कुछ राजनेताओं के दलाल अथवा राष्ट्र भक्त लोग सारे देश भर में वातावरण बनाते है वह भी बहुत हानिकारक है। उससे हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक समस्या पर से ध्यान बट जाता है।हमने कश्मीर समस्या के सुलझाने के लिए एक सरकार को दायित्व दे दिया है। सरकार पर हमें विश्वास है कि उसकी नीयत ठीक है तो हमें उस मामले में क्योें बार बार चिंता व्यक्त करनी चाहिये। हमने एक गाडी चलाने के लिए ड्राईवर रखा हुआ है और ड्राईवर ठीक तरीके से बल्कि मालिक से भी अच्छा गाडी चलाने जानता है। तो हमें बार बार उस ड्राईवर को गाडी चलाते समय क्यों सलाह देनी चाहिये। ऐसी सलाह प्रायः नुकसान करती है। जब न तो सरकार सलाह मांग रही है न ही सेना सहायता मांग रही है तो हमें अनावश्यक देश भर में वातावरण खराब नहीं करना चाहिये। सरकार यदि बातचीत करना ठीक समझती है तब भी ठीक है और यदि वह टकराना चाहती है तब भी ठीक है । क्या करना है यह उसके उपर निर्भर है।
मैं समझता हॅू कि कश्मीर समस्या इस्लामिक कट्टरवाद से जुडी हुई है पाकिस्तान से नहीं। ऐसी स्थिति में यदि हम भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच आपसी संबंधों को शांतिपूर्ण बनाये रखने की मिसाल पेश कर सके तो वह मिसाल कश्मीर समस्या के मामले में भारत के लिए कवच का काम करेगी । क्या बिगड जायेगा अगर दो चार वर्ष गायों का आन्दोलन और विलंबित हो जाये। क्या बिगड जायेगा अगर मंदिर का आन्दोलन भी कुछ और बाद में हो जाये। अभी सरकार बनी है और हम भारत के लोग अपना सहजीवन का सिद्धांत छोडकर भारत के मुसलमानों से बदला देने की जल्दबाजी शुरु कर दे तो यह हिन्दुत्व की मूल अवधारणा के तो विरुद्ध है ही साथ ही इसका कश्मीर समस्या पर निश्चित ही बुरा असर पडेगा। क्या यह उचित नहीं होगा कि हम कश्मीर से बाहर की अपनी हिन्दू मुस्लिम समस्या को सरकारी स्तर पर स्वाभाविक रुप से निपटने दे। कोई ऐसा पहाड नहीं टुटने वाला है कि भाारत मुस्लिम राष्ट्र बन जायेगा। इतना ही तो होगा कि भारत हिन्दू राष्ट्र न बनकर धर्म निरपेक्ष रह जायेगा । अब वह स्थिति कभी नहीं आने वाली है जैसा 70 वर्षो तक हुआ और भारत सरकार ने भारत के मुसलमानों को अधिक महत्व देकर हिन्दुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा। जो लोग ऐसा समझते है कि हिन्दू मुस्लिम एकता हो ही नहीं सकती वे भ्रम में है। वे जाकर ऐसा प्रयोग रामानुजगंज में जाकर देख सकते है जहाॅ कटटरपंथी हिन्दू और मुसलमान सामाजिक एकता के समक्ष पूरी तरह दबे हुये है।
अंत में मेरी तो सही सलाह है कि भारत के लोगों में किसी भी प्रकार की धार्मिक उत्तेजना हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए भी गलत है, देश के लिए भी गलत है और समाज के लिए भी। साथ ही हमारी यह उत्तेजना कश्मीर समस्या पर भी बूरा प्रभाव डालती है। भले ही हम भारत के मुसलमानों के खिलाफ नारे लगावे या कश्मीरी आन्दोलन के खिलाफ। हम यदि अपनी स्थानीय सामाजिक व्यवस्था को ठीक से चला ले और सरकार को राष्ट्रीय या कश्मीर समस्या से निपटने के लिए खुली छूट दे दे तो भले ही हमारे अहम की तुष्टि न हो किन्तु हमारा भारत स्वर्ग बन सकता है ऐसा मुझे दिखता है।
मंथन 32 का अगला विषय होगा उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क।

मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण

Posted By: admin on April 22, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक 30
सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण

जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों के अपने अपने स्वतंत्र अस्तित्व भी होते है तथा एक दूसरे के सहभागी भी। समाज सर्वोच्च होता है तथा राष्ट्र सहित अन्य सभी इकाइयाॅ उसकी सहायक होती हैं। वैसे तो सम्पूर्ण विश्व की सामाजिक परिस्थितियाॅ आपातकाल के अनुरुप हैं किन्तु हम वर्तमान समय में पूरे विश्व की चर्चा न करके अपनी चर्चा को भारत तक ही सीमित रख रहे हैं।
आपातकाल कई प्रकार के होते हैं जिसमें आर्थिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय, सामाजिक, वौद्धिक, धार्मिक, आदि मुख्य माने जाते हैं। आपातकाल मुख्य रुप से उस परिस्थिति को कहते हैं जब कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह अन्य लोगों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें अपनी नीतियों पर काम करने के लिए बाध्य कर दे। यद्यपि भारत में आर्थिक धार्मिक तथा अन्य परिस्थितियाॅ भी खतरनाक मोड ले रही हैं तथा सब पर सोचने की आवश्यकता है किन्तु हम यहाॅ समाज पर राज्य के खतरे तक ही अपने को सीमित रख रहे हैं। राज्य की असफलता सिद्ध करने के लिए कुछ लक्षणों पर विचार करना होगा-
1) जब राज्य व्यवस्था सुरक्षा और न्याय की तुलना में जनकल्याण के कार्यो को प्राथमिकता देना शुरु कर दे लोकहित का स्थान लोकप्रियता ले ले। ग्यारह समस्याएॅ-1) चोरी, डकैती, लूट 2) बलात्कार 3) मिलावट कमतौलना 4) जालसाजी, धोखाधडी 5) हिंसा और आतंक 6) चरित्रपतन 7) भ्रष्टाचार 8) साम्प्रदायिकता 9) जातीय कटुता 10) आर्थिक असमानता 11) श्रमशोषण। स्वतंत्रता के बाद ये सभी समस्याए लगातार बढ रही हैं तथा भविष्य में भी किसी समस्या के नियंत्रण की स्पष्ट योजना नहीं दिख रही है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद कुछ समाधान की जो धुधली सी रुपरेखा दिख रही है वह भी व्यक्तिगत और तानाशाही तरीके से आ रही है,व्यवथागत और लोकतांत्रिक तरीके से नहीं।
2) समाज व्यवस्था पूरी तरह छिन्न भिन्न हो गई है। समाज का स्वरुप जानबूझकर इतना कमजोर कर दिया गया है कि या तो राज्य ही समाज का प्रतिनितिधत्व करता दिख रहा है अथवा छोटे छोटे समाज तोडक संगठन। राज्य योजनापूर्वक समाज को धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र,लिंग, गरीब अमीर, किसान मजदूर,शहरी ग्रामीण आदि वर्गो में बांटकर वर्ग विद्वेष,वर्ग संघर्ष बढाने का प्रयास कर रहा है। राज्य समाज का प्रबंधक न होकर कष्टोडियन बन बैठा है।
3) समाज का संस्थागत ढांचा कमजोर करके संगठनात्मक ढांचा मजबूत किया जा रहा है। सब जानते है कि संस्थाए समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। तो संगठन आवश्यकताओं को पैदा करते है। फिर भी इतना जानते हुए भी संगठनों को बढावा दिया जा रहा है।
4) चिंतन गौण हो गया है और प्रचार महत्वपूर्ण हो गया है। यहाॅ तक कि संसद में भी चिंतन का वातावरण कभी नहीं बनता। भारत संसदीय लोकतंत्र की आंख मूंदकर नकल कर रहा है जबकि उसे भारतीय परिवेश में नई व्यवस्था के प्रारुप पर चिंतन करना चाहिए था।
5) समाज में अहिंसा कायरता का पर्याय बन गई है। दो बातें भारतीय संस्कृति का आधार मानी जाने लगी है- 1) मजबूत से दबा जाये और कमजोर को दबाया जाये। 2) न्युनतम सक्रियता और अधिकार लाभ के मार्ग खोजे जाये। भारत दोनों दिशाओं में लगातार बढ रहा है।
6) समाज लगातार व्यक्ति केन्द्रित होता जा रहा है। विचार केन्द्रित नहीं,नीति केन्द्रित नहीं, सिद्धांत केन्द्रित भी नहीं। बिना विचारे व्यक्ति के पीछे चलने की प्रवृत्ति निरंतर बढाई जा रही है।
इस तरह से मैं इस निष्कर्ष पर पहुॅचा हॅू कि वर्तमान भारत की सामाजिक परिस्थितियाॅ सामाजिक आपातकाल के पूरी तरह उपयुक्त है।
स्वतंत्रता के बाद यदि हम इस गिरावट के कारणों की समीक्षा करे तो इसमें दो लोगों का विशेष योगदान दिखता है- 1) पंडित नेहरु 2) भीमराव अम्बेडकर। पंडित नेहरु ने समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिए समाजवाद को थोपने का प्रयास किया तो डाॅ अम्बेडकर ने अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए सामाजिक एकता को छिन्न भिन्न करने में अपनी पूरी शक्ति लगाई। यदि नेहरु और अम्बेडकर की आपस में तुलना करंे तो पंडित नेहरु की नीतियाॅ गलत थीं किन्तु नीयत पर अभी संदेह नहीं किया जा सकता तो भीमराव अम्बेडकर की नीतियाॅ भी गलत थी और नीयत भी। यदि हम वर्तमान समय में ठीक ठीक आकलन करे तो पंडित नेहरु का यथार्थ समाज के समक्ष स्पष्ट होने लगा है किन्तु भीमराव अम्बेडकर का कलंकित यथार्थ अभी सामने आना बाकी है भारत की वर्तमान परिस्थितियाॅ राजनैतिक सत्ता को मजबूर कर रही है कि वे अम्बेडकर जी को अल्पकाल के लिए महापुरुष ही बने रहने दें। मेरे विचार में गांधी और आर्यसमाज भारत की वर्तमान सामाजिक समस्याओं का समाधान चाहते थे तो भीमराव अम्बेडकर उन सामाजिक समस्याओं को उभार कर उससे अपना राजनैतिक हित पूरा करना चाहते थे। अम्बेडकर जी पर भविष्य में मंथन का नया विषय रखकर विस्तृत चर्चा होगी।
भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्तमान समय में तीन तरफ से आक्रमण झेल रही है। 1) साम्यवाद 2) दारुल इस्लाम 3)पाश्चात्य संस्कृति। भारत में साम्यवाद का पतन शुरु होते ही साम्यवाद और दारुल इस्लाम ने हाथ मिला लिया और वह सबसे बडा खतरा बन गया। यदि राजनैतिक तौर पर तीन श्रेणियां मान ले 1) शत्रु 2) विरोधी 3) प्रतिस्पर्धी। तो साम्यवाद शत्रु, दारुल इस्लाम विरोधी और पाश्चात्य संस्कृति को प्रतिस्पर्धी में रखा जा सकता है। शत्रु हमारे विरोधी की सहायता में आ गया है। ऐसी परिस्थितियों में भारत को यह रणनीति बनानी होगी कि हम आपातकाल समझकर अपने प्रतिस्पर्धी के साथ समझौता करके विरोधी से मुकाबला करें। मुझे लगता है कि भारत सरकार पूरी बुद्धिमानी के साथ इस दिशा में आगे बढ रही है। किसी भी मामले में या तो तटस्थ भूमिका अपनाई जा रही है अथवा अमेरिका की तरफ झुकी हुई। हमारे कुछ मित्र यदा कदा ना समझी में अमेरिका की अनावश्यक और ऐसी आलोचना कर देते है जो किसी न किसी रुप में साम्यवाद दारुल इस्लाम की सहायक हो जाती है। हमें रणनीति के अन्तर्गत ऐसी आलोचनाओं से यथार्थ होते हुए भी बचना चाहिये। इसी तरह यदि हम हिन्दुत्व को भारतीय समाज व्यवस्था के साथ जोडकर देखें तो संघ के कार्य हिन्दुत्व की सुरक्षा में तो सहायक है किन्तु विस्तार में बाधक। राष्ट्रवाद भारतीय समाज व्यवस्था के लिए बहुत घातक है किन्तु वर्तमान समय में साम्यवाद और दारुल इस्लाम के खतरे को देखते हुए हमें संघ और उसके राष्ट्रवाद को शक्ति देने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है।
सामाजिक आपातकाल है। इसका समाधान खोजना होगा । हमारी भारत की राजनैतिक व्यवस्था किस दिशा में करवट लेगी यह अभी स्पष्ट नहीं है। सकारात्मक चार दिशाये होती है- 1) प्रशंसा 2) समर्थन 3) सहयोग 4) सहभागिता। वर्तमान शासन व्यवस्था समस्याओं का समाधान कर पायेगी ऐसे लक्षण दिख रहे है किन्तु यह स्पष्ट नहीं दिखता कि समाज का अस्तित्व सदा सदा के लिए राज्य में विलीन हो जायेगा अथवा राज्य शासक की जगह प्रबंधक की ओर बढेगा। ऐसी परिस्थिति में हमें सतर्क दृष्टिकोण अपनाना होगा। जब तक यह साफ नही दिखे कि भारत विचार मंथन की दिशा में बढ रहा है, तानाशाही और लोकतंत्र की जगह लोकस्वराज्य की ओर जा सकता है, तब तक हमे राज्य से सहभागिता नहीं करनी चाहिये । प्रशंसा , समर्थन और कभी कभी सहयोग भी किया जा सकता है किन्तु सहभागिता नहीं। यदि साम्यवाद और दारुल इस्लाम का गठजोड कमजोर नहीं होता है तो हमें राज्य का सहयोग करना चाहिये, भले ही समाज की जगह राष्ट्र ही क्यों न मजबूत होता हो। किन्तु यदि खतरा कमजोर होता है तो हमें राष्ट्रवाद और तानाषाही प्रवृतियों से दूरी बनाकर एक सत्ता निरपेक्ष तथा सामाजिक शक्ति को मजबूत करना चाहिये। हमें पश्चिम की सांस्कृतिक आंधी का विरोध न करके प्रतिस्पर्धा तक स्वयं को सीमित करना चाहिये। हमें सतर्क रहना चाहिए कि हम भारतीय राज्य व्यवस्था के सहभागी नहीं है और हम उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे है जब समाज मालिक होगा और राज्य मैनेजर या प्रबंधक।
मैने सन 77 से ही यह आभास कर लिया था कि सामाजिक आपातकाल की परिस्थितियां हैं लेकिन ऐसी कोई टीम नहीं बन पा रही थी। सन 99 आते आते हम लोगों ने बैठकर भारत की वैकल्पिक संवैधानिक व्यवस्था का एक प्रारुप भी बना लिया जो आज भी मौजूद है। हम लोगों ने सन् 2000 से 2003 तक रामानुजगंज शहर में सर्वोदय के मार्ग दर्शन में नई राजनैतिक व्यवस्था का सफल प्रयोग भी किया। संविधान के प्रारुप और प्रयोग की सफलता के बाद हम सब लोगों ने 26 से 29 मार्च 2003 में सेवाग्राम में बैठकर ठाकुरदास जी बंग जी के नेतृत्व में सामाजिक आपातकाल की घोषणा की और समाधान की विस्तृत योजना बनाई। यह योजना ज्ञानतत्व क्रमांक 64 में विस्तारपूर्वक प्रकाशित है। उस योजना की सफलता इसलिए नहीं हो पायी कि सर्वोदय के सरकारी पदाधिकारियों ने इसका विरोध कर दिया। बाद में अन्ना जी के नेतृत्व में इस योजना पर काम शुरु हुआ और अरविंद केजरीवाल के धोखा देने के बाद वह काम रुक गया। अब 2015 के अक्टूबर माह से इस सामाजिक आपातकाल के समाधान की दिशा में निरंतर विस्तार हो रहा है। स्पष्ट है कि सामाजिक आपातकाल है और समाज सर्वोच्च की भूख आम लोगों में पैदा करनी होगी। परिस्थितिवष कुछ शक्तियों से समझौते भी करने पड सकते है किन्तु लक्ष्य स्पष्ट रखना होगा। जब तक हम राज्य को सारी दुनिया से और विशेष कर प्रारंभ में भारत से संरक्षक की जगह पर प्रबंधक नहीं बना लेते, तब तक हम शांति से नहीं बैठेंगे। इसके लिए हमें जो नीतियां बनानी होगी वो बैठकर बनायेंगे। क्योंकि लक्ष्य हमारा स्पष्ट है और उसे पूरा करके ही रहेंगे। अब तक की संभावित योजना अनुसार 2024 तक सफलता की संभावना दिखती है। भविष्य क्या होगा यह हम आप सबकी सूझबूझ और सक्रियता पर निर्भर करेगा।
मंथन 31 का अगला विषय‘‘ कश्मीर समस्या और हमारा समाज ’’ होगा।

मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’

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मंथन क्रमांक 29
‘‘समाज में बढते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं-
(1)महिला और पुरुष कभी अलग अलग वर्ग नहीं होते । राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं।
(2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान होते है। इनमें कोई भेद नहीं हो सकता। सामाजिक अधिकार अलग अलग होते है क्योंकि दोनों की प्राकृतिक संरचना स्वभाव तथा सक्रियता में फर्क होता है।
(3)सेक्स की इच्छा दोनों में समान होती है ,कम या अधिक नहीं।
(4)प्राकृतिक संरचना के आधार पर पति को आक्रामक और पत्नी को आकर्षक होना चाहिए।
(5)स्त्री और पुरुष के बीच एक दूसरे के प्रति आकर्षण श्रृष्टि की रचना के लिए अनिवार्य होता है विशेष परिस्थितियों में ही उसे नियंत्रित या संतुलित करने का प्रयास किया जा सकता है।
(6) किसी भी रुप में बलात्कार अपराध होता है। उसे रोकने का अधिकतम प्रयत्न होना चाहिये।
किसी पुरुष द्वारा किसी महिला के साथ बलपूर्वक किया गया सेक्स संबंध बलात्कार होता है। बलात्कार में शक्ति प्रयोग अनिवार्य शर्त होती है। भारत में बलात्कार की गलत परिभाषा प्रचलित की गई है। स्वतंत्रता के बाद बलात्कारों में धीरे धीरे वृद्धि हो रही थी। पिछले कुछ वर्षो से बहुत तीब्र गति से बलात्कार की घटनाएॅ भी बढ रही है और मुकदमे भी। समझ में नहीं आता कि एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के पुरुषो में सेक्स की क्षमता घट रही है दूसरी ओर बलात्कारों का बढना सिद्ध करता है कि पौरुषत्व लगातार बढ रहा है। मुझे लगता है कि हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था बलात्कार वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान कर रही है न कि पुरुषों का बढता पौरुषत्व । वर्तमान में जो बलात्कार की परिभाषा बनाई गई है वह परिभाषा ही बलात्कार की बढती घटनाओं का प्रमुख कारण है। बलात्कार की सबसे अच्छी परिभाषा डाॅ0 राममनोहर लोहिया ने दी थी जिसे कभी नहीं माना गया और वर्तमान समय तो उस परिभाषा के ठीक विपरीत दिशा में तेजी से बढता जा रहा है। हम इस परिभाषा परिवर्तन के परिणाम भी देख रहे हैं। बलात्कार के साथ साथ हत्याओं की भी बाढ सी आ गई है। जेलों में भीड बढती जा रही है। बलात्कार के मुकदमें भी बढते जा रहे हैं। पुलिस ओभर लोडेड हो गई है। कानून जितने कठोर हो रहे है उतनी ही अधिक बलात्कार और हत्या की घटनाएॅ बढ रही है । आवश्यक है कि बलात्कार वृद्धि के कारणों पर गंभीरता से विचार किया जाये।
सेक्स एक प्राकृतिक भूख है और उसे बलपूर्वक नहीं दबाया जा सकता । न प्राचीन समय में ऐसा संभव हो पाया न ही आज हो पा रहा है न भविष्य में हो पायेगा। भूख और पूर्ति के बीच दूरी जितनी बढेगी उतनी ही अपराध की स्थितियाॅ पैदा होती हैं। पुराने जमाने में भूख लगती थी सोलह वर्ष में और विवाह होता था चैदह वर्ष में। बलात्कार मजबूरी नहीं मानी जाती थी। वर्तमान ना समझ नेताओं के समय में इच्छाएॅ सोलह की जगह पन्द्रह में पैदा होने लगी तो विवाह की उम्र एक्कीस कर दी गई। पुराने जमाने में विवाह के बाद भी यदि किसी परिस्थिति में मजबूरी हो तो पुरुषों के लिए वैश्यालय थे। वर्तमान समय में विवाह की उम्र बढा दी गई तो दूसरी ओर वैश्यालयों, यहाॅ तक कि बार बालाओं तक को रोकने के प्रयास शुरु हो गये। प्राचीन समय में महिला और पुरुष के बीच दूरी घटनी चाहिए या बढनी चाहिए इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं था । यह व्यक्ति परिवार और समाज पर निर्भर करता था। अब सरकार इस पर पूरी ताकत लगाकर इस दूरी को घटाने का प्रयास कर रही है। बलात्कार बढ रहे है और स्त्री पुरुष के बीच दूरी निरंतर घटाई जा रही है। पुराने जमाने में परिवार और समाज का अनुशासन था। अब वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को जान बूझकर कमजोर किया गया। पुराने जमाने में छेडछाड की घटनाओं को विशेष परिस्थिति में ही कानून की शरण में लिया जाता था अन्यथा ऐसी बाते सामाजिक स्तर पर निपटा ली जाती थी या छिपा ली जाती थी। अब ऐसी घटनाओं को बढा चढा कर प्रचारित करना एक फैशन के रुप में बन गया है। महिला सशक्तिकरण का नारा तो इस अव्यवस्था में और अधिक सहायक हो रहा है। चरित्रहीन महिलाएॅ इसका ज्यादा दुरुपयोग करने लगी हैं। प्राकृतिक तौर पर पुराने जमाने में माना जाता था कि स्त्री और पुरुष में से किसी एक को स्वाभाविक रुप से दोशी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि दोनों के बीच इच्छाओं की मजबूरी समान होती है। वर्तमान समय में हर पुरुष को अपराधी सिद्ध करने की होड मची है। मेरा स्वयं का अनुभव है कि जो महिलाएॅ भारत की महिलाओं का संवैधानिक पदो पर प्रतिनिधित्व कर रही है उनमें से अनेक ऐसी है जिनका व्यक्तिगत जीवन कलंकित रहा है। उनमें से कई तो किसी बडे राजनेता के साथ जुडी भी रही है और उन्हें उंचे पद दिलाने में यह जुडाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। संदेह होता है कि यदि महिलाओं के विषय में निर्णय करने वाली महिलाओं में ऐसी भी महिलाए होंगी तो बलात्कार बढेंगे ही। ऐसे महिला और पुरुष अपने लिए तो चोर दरवाजे की व्यवस्था खोज लेते है और दूसरे परिवारों की पारिवारिक एकता को छिन्न भिन्न करने के लिए कानून बनाते रहने है। मैंने तो यहाॅ तक सुना है कि विवाहित पति पत्नी के बीच बिना अनुमति के शारीरिक संबंध बनाने को भी बलात्कार घोषित करने की चर्चाए चल रही हंै।
बलात्कार भी दो परिस्थितियों में होता है- 1 आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 2 इच्छाओं की पूर्ति के लिए। यदि कोई सेक्स की भूख से व्याकुल व्यक्ति बलात्कार करता है तो वह अपराध होते हुए भी उस अपराध से छोटा माना जाना चाहिए जो इच्छाओं की पूर्ति के लिए बलात्कार होता है। आवश्यकताएॅ सीमित होती है और इच्छाए असीमित होती है।वर्तमान कानून इन दोनों के बीच अंतर नहीं कर पाता। स्त्री और पुरुष के बीच प्राकृतिक स्थितियाॅ ऐसी है कि दोनों के बीच के आकर्षण को निरुत्साहित करना खतरनाक होगा । उसे विशेष परिस्थितियों में ही अनुशासित या शासित करना चाहिए। सरकार का कानून इतना ज्यादा संवेदनशील बना दिया गया है कि किसी प्रकार का निवेदन करना भी बडे अपराध में शामिल किया जा सकता है। मेरे विचार से इस प्रकार के कानून धूर्त महिलाओें को ब्लैकमेल करने के अवसर देते है। मैं मुलायम सिंह जी या शरद यादव के विचारों को सुनता रहा हॅू। भले ही और लोग उन्हें न सुने।
बढते बलात्कार समाज के लिए एक कलंक है। उन्हें रोकने के लिए चैतरफा प्रयत्न करने होंगे । हमें यह ध्यान रखना होगा कि बलात्कार रोकने के नाम पर स्त्री और पुरुष के बीच के आकर्षण पर विपरीत प्रभाव न पडे। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कोई व्यक्ति सेक्स की भूख के कारण मानसिक रोगी न हो जाये या कोई अन्य गंभीर अपराध न कर बैठे। बलात्कार रोकने के नाम पर आवश्यक कानूनी छेड छाड बहुत घातक है। विवाह की उम्र को युक्ति संगत किया जाये। वैश्यालयों को पूरी तरह खोल दिया जाये। बलात्कार के अतिरिक्त अन्य कानूनों में संशोधन किये जाये। परिवार और समाज को भी अनुशासन बनाने में सहयोगी माना जाये। जो महिलाए परम्परागत तरीको का पालन करती है उनके साथ छेड छाड को अधिक गंभीर माना जाये उनकी तुलना में जो आधुनिक तरीको से खतरे उठाती है। साथ ही यह भी प्रयत्न किया जाये कि बलात्कार के नाम पर धूर्त महिलाए समाज को ब्लैकमेल करने में सफल न हो सके। बलात्कार का रोका जाना जितना जरुरी है उतना ही जरुरी यह भी है कि बलात्कार के नाम पर जेलों में भीड बढाने की प्रवृत्ति प्रोत्साहित हो।
मंथन क्रमांक 30 का अगला विषय’’सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण ’’ होगा।

bajragmuni

Posted By: admin on April 14, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

bajrangmuni

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Posted By: admin on April 11, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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Posted By: admin on April 10, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 8, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा मजबूत का भी नहीं हो सकता।आवश्यक है कि शोषित कमजोर, हो मजबूर हो और शोषण से सहमत हो। शोषण कभी भी अपराध नहीं होता न ही समाज विरोधी कार्य होता है। शोषण किसी के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करता किन्तु शोषण अनैतिक और असामाजिक कार्य हो सकता है।
एक बुढिया किसी प्यास से छटपटा रहे राजा से एक गिलास पानी के लिये उसका आधा राजपाट मांग ले तो यह बुढिया द्वारा किया गया शोषण नहीं माना जाता। किन्तु कोई अमीर किसी प्यासी बुढिया से एक गिलास पानी के लिए उसकी मजबूरी का लाभ उठाकर उसकी जमीन ले ले तो यह उस अमीर द्वारा किया गया शोषण माना जायेगा । वर्तमान समय में मुख्यशोषण पांच प्रकार के माने जाते है- 1 अमीरों द्वारा गरीबों का 2 बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम का। 3 परिवार व्यवस्था में पुरुषों द्वारा महिलाओं का 4 राजनैतिक शक्ति प्राप्त तंत्र द्वारा लोक का। 5 सवर्णाे द्वारा अवर्णो का। 6 धूर्त व्यक्तियों द्वारा शरीफ लोगो का। ये छः प्रकार के शोषण समाज में लम्बे समय से चल रहे है और आज भी चल रहे है । वैसे तो शोषण शब्द का दुरूपयोग सभी राजनेता करते है किन्तु साम्यवादी और समाजवादी शोषण शब्द का दुरूपयोग करने मे सबसे आगे रहते है। ये लोग आर्थिक सामाजिक गैर बराबरी को तो शोषण मानकर बहुत हल्ला करते है किन्तु राजनैतिक गैर बराबरी को निरंतर बढाते चले जाते है। जबकि राजनैतिक असमानता शोषण का सबसे बडा हथियार है। राज्य जितना ही इस प्रकार के शोषण को रोकने में हस्तक्षेप करता है उतना ही शोषण अधिक बढता जाता है भले ही उसका स्वरुप क्यों न बदल जाये। क्योंकि सच्चाई यह है कि किसी प्रकार का शोषण रोकने के लिए राज्य किसी वर्ग को विशेष अधिकार देता है और उसका यह दुष्परिणाम होता है कि उस वर्ग के धूर्त लोग दुसरे वर्ग के शरीफ लोगों का शोषण शुरु कर देते हैं। इस तरह शोषण रोकने के नाम पर शोषण करने वाले धुर्त लोगों का एक नया वर्ग खडा हो जाता है जिसका समाधान राज्य नहीं कर पाता क्योंकि राज्य ही ऐसे वर्ग के धुर्तो को संरक्षण देता है। मकान मालिक के विरुद्ध किरायेदारों को संरक्षण दिया गया । दहेज के विरुद्ध महिलाओं को संरक्षण दिया गया। अथवा जाति प्रथा के विरुद्ध अवर्णो और आदिवासियों को संरक्षण दिया गया। इन सबका परिणाम एक ही है कि संरक्षित वर्ग के धुर्तो ने असंरक्षित वर्ग के शरीफों का शोषण किया। एक दूसरी स्थिति यह भी बनी कि राज्य समाज का सबसे बडा शोषक होता है। राज्य शोषण रोकने के नाम पर शक्ति अपने पास इक्टठी करते जाता है और उस शक्ति का दुरुपयोग शोषण के रुप में प्रकट हो जाता है। जनहित के नाम पर देश में ऐसे हजारों कानून बने है जो राज्याश्रित शोषण के हथियार का काम करते है।
मजबूत द्वारा कमजोर की कमजोरी का लाभ उठाना ही शोषण माना जाता है। शोषण अपराध नहीं होता किन्तु अनैतिक होता है। शोषण रोकने का सबसे अच्छा तरीका है कमजोर की मजबूरी को कम करने का प्रयास, किन्तु राजनेता ऐसा प्रयास न करके हमेषा मजबूत की मजबूती को कम करने का प्रयास करता है। परिणाम होता है वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष और लाभ होता बिचैलिये का अर्थात तंत्र को । एक व्यक्ति मजबूरी मे किसी संपन्न व्यक्ति के घर मे पचास रूपये मे काम कर रहा है जबकि उसकी उचित मजदूरी दो सौ रूपये और सरकार द्वारा घोषित ढाई सौ रूपया है। तंत्र से जुडे लोग उस काम कर रहे व्यक्ति को पचास रूपये मे भी काम देने की व्यवस्था न करके काम करने वाले और काम देने वाले के बीच टकराव पैदा करते है । मै समझता हॅू कि यह भी एक प्रकार का शोषण है । छत्तीसगढ के मजदूर अधिक मजदूरी के लिये बाहर काम करने जाते है । छत्तीसगढ सरकार उन्हे शोषण से बचाने के नाम पर या तो रोकती है या कई प्रकार के कानूनो से जकडती है। इससे उन जाने वालो का लाभ हुआ या नही यह अलग प्रश्न है किन्तु छत्तीसगढ के उद्योग पतियों का अवश्य लाभ होता है। जिससे उन्हे कम मजदूरी मे मजदूर मिलते रहते है। विचार करिये की शोषण बढा या घटा। भारत का हर पूंजीपति और बुद्धिजीवी पूरा प्रयत्न करते है कि कृत्रिम उर्जा सस्ती हो जिससे उन्हें अप्रत्यक्ष सस्ता श्रम मिलता रहे । विचार करिये कि यह प्रवृत्ति श्रम शोषण है या नहीं। महिलाओं का शोषण कभी नही होता या तो बलात्कार होता है या धोखा, किन्तु महिला शोषण रोकने के नाम पर महिला और पुरूष के बीच एक दीवार खडी की जाती है जिसका लाभ तंत्र उठाता है।एक रोटी के लिये भूखी महिला को रोटी देकर एक यौन भूखा पुरूष अपनी भूख मिटाता है तो नैतिक तरीके से दोनो की भूख मिटाने की व्यवस्था न करके दोनो के बीच बाधा उत्पन्न करने वालो को यदि शोषक न कहा जाय तो क्या कहा जाय? आज कल प्राइवेट स्कूलो की फीस के नाम पर बहुत नाटक हो रहा है। यू पी के मुख्य मंत्री भी इस बहती गंगा मे हाथ धो रहे है। वर्तमान मे मंहगी फीस लेकर पढा रहे प्राइवेट स्कूलो को रोकने की अपेक्षा क्यो न हम कम फीस वाले अच्छे स्कूल शुरू करते है । कौन रोकता है आपको स्वस्थ प्रतियोगिता से? किन्तु करना धरना तो कुछ है नही और जो कुछ हो रहा है उसे शोषण के नाम पर अव्यस्थित करना ही आज की राजनीति है। ऐसे लोगो के चमचे भी उनकी प्रषंसा करके उन्हे और मजबूत करते रहते है।
किसी कमजोर के साथ करने योग्य व्यवहार मजबूत का कर्तब्य होता है कमजोर का अधिकार नही। समानता का व्यवहार करना भी मजबूतों का कर्तव्य होता है,कमजोरों का अधिकार नहीं। राज्य हमेशा मजबूत के करने योग्य व्यवहार को कमजोर का अधिकार बताकर वर्ग संघर्ष की परिस्थितियां पैदा करता रहता है। इससे समाज मे टूटन तो आती है किन्तु लाभ किसी का नही होता । स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे की आप सहायता तो कर सकते है किन्तु आगे निकल रहे के निकलने में बाधा पहुचाना आपका आपराधिक कृत्य होगा।
शोषण रोकना परिवार व्यवस्था का काम है समाज व्यवस्था का काम है। सरकार का नही। शोषण रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार और गांव की होती है क्योंकि परिवार और गांव द्वारा आंतरिक व्यवस्था में सबकी सहमति समान होती है । मैं मानता हॅू कि वर्तमान समय में ऐसी समानता का अभाव है और इस अभाव का दुष्परिणाम शोषण के रुप में सामने आता है। किन्तु ऐसी व्यवस्था बनना बहुत कठिन नहीं क्योंकि परिवार व्यवस्था यदि लोकतांत्रिक है तो उसमें शोषण हो ही नहीं सकता। शोषण का अंतिम आधार समाज व्यवस्था है प्राचीन समय में समाज को यह अधिकार था कि वह किसी प्रकार के अनैतिक कार्य के विरुद्ध अपने बहिष्कार रुपी अधिकार का प्रयोग कर सके। जब से राज्य व्यवस्था मजबूत हुई और उसमें परिवार गांव और समाज के अनुशासन के यह बहिष्कार रूपी हथियार पर भी रोक लगाकर अपना हस्तक्षेप बढा दिया तब से सम्पूर्ण समाज का शोषण का ठेका राज्य रुपी एकमात्र इकाई के पास चला गया। अब समाज न तो शोषण को रोकने में कुछ कर सकता है न ही राज्य को नियंत्रित कर सकता है क्योंकि जनहित की परिभाषा राज्य करता है। शोषण की परिभाषा भी राज्य ही करता है तथा राज्य जब चाहे तब शोषण को अपराध या अपराधों को शोषण के रुप में बदल सकता है। मेरा अंत में सुझाव है कि शोषण मुक्ति के लिए सबसे पहले शोषण और अपराध को अलग अलग करे। शोषण मुक्ति से राज्य को अलग करें। तथा शोषण मुक्ति में परिवार गांव तथा समाज को अधिक सक्रिय करने का प्रयास करें।
मंथन का अगला विषय ‘‘समाज में बढते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’ होगा।

बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 3, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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