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मंथन क्रमांक 128 ’’कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। आमतौर पर ऐसा संतुलन बन नहीं पाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संगठन से जुड जाता है और उसकी प्राथमिकताएं ...
मंथन क्रमांक 127 ’’सर्वोत्तम संभव का सिद्धान्त’’–बजरंग मुनि
आदर्शवाद और व्यावहारिकता बिल्कुल भिन्न-भिन्न होते है। आदर्श का अर्थ होता है क्या करना उचित है और व्यावहारिकता का अर्थ होता है कि क्या होना आसान है। उच्च आदर्श अव्यावहारिक हो सकता है और किसी ...
मंथन क्रमांक 126 ’’ सहजीवन और सतर्कता’’–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है और सहजीवन उसकी सामाजिक मजबूरी। स्वतंत्रता सबकी समान होती है। स्वतंत्रता की सीमा प्राकृतिक रूप से बनी हुयी है। कोई भी अन्य व्यक्ति ...
मंथन क्रमाॅक 125 ’’न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सीमाएं’’–बजरंग मुनि
दुनियां की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था आदर्श सामाजिक व्यवस्था से बहुत अलग है। आदर्श व्यवस्था में समाज सबसे उपर होता है और राष्ट्र या धर्म सहायक। वर्तमान में समाज से भी उपर राष्ट्र और धर्म बन ग...
मंथन क्रमांक-124 ’’मनरेगा कितना समाधान कितना धोखा’’–बजरंग मुनि
कुछ हजार वर्षों का विश्व इतिहास बताता है कि दुनियां में बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए नये-नये तरीकों का उपयोग किया। श्रम शोषण के लिए ही पश्चिम के देशों ने पूंजीवाद को महत्त्व दिया तो भार...
मंथन क्रमांक-123 ’’धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता कितना अपराध’’–बजरंग मुनि
धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड गया। धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भा...
मंथन क्रमांक-122 ’’गांधी, मार्क्स ओर अम्बेडकर’’–बजरंग मुनि
गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना कठिन होते हुये भी बहुत प्रासंगिक है क्योंकि तीनों के लक्ष्य और कार्यप्रणाली अलग-अलग होते हुये भी वर्तमान भारत की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर तीनों महाप...
मंथन क्रमांक-121 ’’राइट टू कंस्टीटयूशन’’–बजरंग मुनि
दुनियां की समाज व्यवस्था में व्यक्ति एक प्राकृतिक और प्राथमिक इकाई होता है तो समाज अमूर्त और अन्तिम। दुनियां के सभी व्यक्तियों के संयुक्त स्वरूप को समाज कहते हैं। समाज की एक व्यवस्था होती ...
मंथन क्रमांक-120 ’’संगठन कितनी आवश्यकता कितनी मजबूरी’’–बजरंग मुनि,
सामान्यतया संगठन और संस्था को एक सरीखा ही मान लिया जाता है किन्तु दोनो बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। संगठन को अंग्रजी में आर्गेनाईजेशन कहते है और संस्था को इंस्टीटयूशन, यद्यपि दोनो के अर्थ कभी-क...
मंथन क्रमांक 119 ’’व्यक्ति, परिवार और समाज’’–बजरंग मुनि,
पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में व्यक्ति और सरकार को मिलाकर व्यवस्था बनती है। सरकार को ही समाज मान लिया जाता है। इस्लामिक व्यवस्था में परिवार और धर्म को मिलाकर व्यवस्था बनती है। साम्यवाद रा...

बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 2, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न आये है जिनमे मेरे और सर्वोदय के आपसी संबंध, मेरा संघ और बी जे पी से एक पक्षीय झुकाव तथा मेरी पूर्व की सच हुई घोषणाओ पर प्रश्न उठाये गये है। विस्तृत उत्तर देन के लिये मैने अलग से यह पोस्ट लिखी है ।
मै न तो भविष्य वक्ता हूॅ न ही भविष्य वाणी करता हॅू। मै अनुभव के आधार पर तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए जो निष्कर्ष निकालता हॅू वह निष्कर्ष उसके आधार संहित ज्ञान तत्व के माध्यम से लिख देता हूॅ। ऐसे निष्कर्ष सही निकल जाते है । जिसका यह मतलब नही कि मैने भविष्यवाणी की है। यह सच है कि पिछले बीस तीस वर्षो मे लिखे गये मेरे निष्कर्ष लगभग सही निकले है। इसलिये पाठको की ऐसी धारणा बनी है।
सर्वोदय से मेरा जुडाव पचीस वर्षो का है। सर्वोदय के बंग साहब की टीम ने मुझे आपत्ति काल मे सहायता भी दी, और मार्ग दर्शन भी किये। किन्तु मै सर्वोदय मे साम्यवादियों के नियंत्रण को ठीक नही समझता था। 2002 मे गुजरात के आम चुनावो के पूर्व जब पटना अधिवेशन मे सर्वोदय ने प्रत्यक्ष होकर भाजपा का विरोध करने की घोषणा की तब मैने वहा विरोध किया था, और एक लेख ज्ञानतत्व क्रमांक 59 दिनांक 16 से 30 नवम्बर 2002 मे लिखा था कि सर्वोदय क्या और कैसे गलती कर रहा है और इसके क्या दुष्परिणाम होंगे। आप मित्र काश इंडिया डाट काम पर उक्त अंक मे देख सकते है।
आचार्य गुरू शरण जी सवौदय मे मेरे मित्र, सलाहकार तथा मार्ग दर्शक भी रहे है। उन्होने गुजरात चुनावो के बाद मुझसे एक प्रश्न किया था। जिसका मैे उन्हे जो उत्तर दिया। वह उत्तर भी ज्ञानतत्व अंक इक्सठ 1 से 15 जनवरी 2003 मे छपा है। वह उत्तर आपको अक्षरषः प्रेषित है। मैने उस समय सर्वोदय को गुजरात के लक्षणो के आधार पर जो सलाह दी थी उस सलाह पर आज भी मै कायम हॅू। आप देख सकते है कि मैने जो कुछ लिखा था वह कितना निष्पक्ष कितना धर्मनिरपेक्ष ओर कितना सही था। मैने उस समय जो यह लाईन लिखी थी कि गुजरात मे हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढे मनोबल को आम हिन्दूओ का विश्वास खो चुके तथा कथित धर्म निरपेक्ष कांग्रेसी या गांधीवादी तो रोक नही सकते, अब तक अपने संगठन के बल पर लाभ उठा रहे मुसलमान भी नही उठा सकेगे। देष भर मे खुनी दंगे होगे। हिन्दूओ का धू्रवीकरण संघ विचार धारा के साथ होगा और हम आप धर्म निरपेक्ष लोग परिणाम शुन्य विरोध दर्ज कराते रहेंगे। मैने यह बात सिर्फ मौखिक नही की बल्कि लिखी है। उसके बाद भी समय समय पर मै निरंतर अपनी बात को दुहराता रहा हॅू । अब यदि मुसलमान कांग्रेसी सर्वोदयी इस सूचना की भी अन्देखी करे दे तो प्रश्न उन सबसे किया जाना चाहिये, मुझसे नही।
मै अब भी मानता हॅू कि सर्वोदय पर साम्यवादियों का प्रभाव सर्वोदय को डुबाने मे पर्याप्त महत्व पूर्ण रहा है और अब भी है। नकली धर्म निरपेक्षता ने भारत के आम हिन्दूओ का धैर्य समाप्त कर दिया है। यही कारण है कि भारत का आम हिन्दू मोदी की ताना शाही का भी खतरा उठाने को तैयार है, किन्तु नकली धर्म निरपेक्षता के नाम पर दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहने के लिये तैयार नही है। हमारी सफल रणनीति यह होनी चाहिये कि जब धर्म निरपेक्षता साम्प्रदायिकता से न टकरा पाने मे सक्षम न हो तो उसे चाहिये कि साम्प्रदायिक शक्तियां आपस मे लडती रहे और धर्म निरपेक्ष उसमे से कमजोर को प्रोत्साहित करता रहे तब तक जब तक वह स्वयं सशक्त न हो जाये। भारत का संगठित इस्लाम विदेशियो की सहायता पाकर मजबूत बना हुआ है। और यदि उससे साम्प्रदायिक हिन्दुत्व अनैतिक तरीके से भी टकराता है तो हम धर्म निरपेक्षको को सत्य और न्याय की दुहाई देने की कोई आवश्यकता नही है।
ज्ञान तत्व अंक 61- 1 से 15 जनवरी 2003 डॉ॰ गुरूशरण ग्वालियर मध्यप्रदेश
प्रश्न -केन्द्र शासन में गठ बंधन सरकार किसी तरह ठेल ठाल कर चल रही है। इसका हल क्या है। ऐसा कब तक चलेगा गुजरात विधान सभा चुनाव में दो तिहाई बहुमत से सरकार बन रही है। इनके कट्टर हिन्दुत्व से पूरे देश में प्रतिक्रिया बढ़ने का खतरा है या नहीं।
उत्तर- केन्द्र की सरकार ढीली ढाली चल रही है यह सच है। भारतीय राजनीति में धर्म निरपेक्षता को यदि आधार बनाकर चले तो दो प्रकार के लोग हैं 1-कांग्रेस 2-भाजपा में अटल जी का ग्रुप । कांग्रेस स्वयं साम्प्रदायिक सोच नहीं रखती किन्तु राजनैतिक कारणों से वह मुस्लिम तुष्टिकरण के मार्ग पर चलती रही है और चल रही है। अटल जी मुस्लिम तुष्टिकरण हिन्दू तुष्टिकरण के घोर विरोधी हैं। वे वास्तव में धर्मनिरपेक्ष स्वभाव के हैं किन्तु उन्हें अपेक्षित समर्थन न मिलने से पूरी तरह मजबूर होकर कट्टरवादी हिन्दुओं से दब रहे हैं। छ माह पूर्व तक उन्होंने कट्टरवादी हिन्दुत्व का दृढ़ता से मुकाबला किया। उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि तो बनी किन्तु उनके वोट घटते चले गये। अब उन्हें संकट में राजनीति करनी पड़ रही है। पहले संघ परिवार उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारने के लिये मजबूर था और अब वे संघ परिवार से दबने के लिये मजबूर हैं। यदि वर्तमान समय में वे अपनी आत्मा की आवाज पर त्यागपत्र दे दे तो उनकी प्रतिष्ठा को चार चॉद लग जाएंगे किन्तु सत्ता में धर्मनिरपेक्षता का एक अंतिम पैरवीकार भी टूट जाएगा। उसके बाद भारत में साम्प्रदायिकता का जो नग्न नृत्य होगा वह बहुत ही पीड़ा दायक होगा। गुजरात में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़े हुए मनोबल को आम हिन्दुओं का विश्वास खो चुके तथा कथित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी या गॉधीवादी तो रोक ही नहीं सकते, अब तक अपने संगठन के बल पर लाभ उठा रहे मुसलमान भी नहीं रोक सकेगे। देश भर में खुले दंगे होंगे , हिन्दुओं का ध्रुवीकरण संघ विचार धारा के साथ होगा, और हम आप धर्मनिरपेक्ष लोग परिणाम शून्य विरोध दर्ज कराते रहेंगे । मैं पूरी तरह इस मत का हॅूं कि संघ परिवार के भावनात्मक हिन्दू एकीकरण का डटकर विरोध किया जाय और संघ परिवार के वैचारिक हिन्दुत्व के मुद्दें का नेतृत्व अपने हाथ में लेकर उसकी हवा निकाल दी जाये। अटल जी ने धर्म निरपेक्षता पर एक बहस छेड़ने का सुझाव दिया है। इसके लिये उनकी बहुत अधिक प्रशंसा की जाये। साथ ही बहस को वैचारिक स्वरूप देकर उसे साम्प्रदायिकता बनाम धर्म निरपेक्षता का रूप प्रदान किया जाय। मैं पुनः निवेदन करता हूॅ कि धर्मनिरपेक्षता संबंधी पुरानी यथा स्थिति वादी घिसी पिटी लाइन में आमूलचूल बदलाव लाकर परिवर्तन वादी धर्मनिरपेक्ष लाइन लेने की जरूरत है। जिस दिन संघ परिवार के साथ-साथ कट्टरवादी मुसलमान भी आपका कस कर विरोध करना शुरू कर दें तो आप मान लें कि अब खतरा टल रहा है।
अंत में मैं आपकी बात दुहराता हॅू कि भारत में संघ परिवार की सफलता को रोकने के निम्न उपायों पर काम किया जावेः-
1- एक धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बने। धु्रवीकरण संघ और संघ विरोधी के बीच न होकर साम्प्रदायिक और धर्म निरपेक्ष के बीच होना चाहिये।
2- एक धर्म सलाह समिति बने जिसमें सभी धर्मों के लोगों को इस प्रकार सम्मिलित करें कि उसमें अधिक जनसंख्या वालों का कुछ अधिक प्रतिनिधित्व हो।
3- किसी भी धर्म के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप करने वाला कानून तब तक न बने जब तक यह समिति सर्व सम्मति से उक्त कानून का समर्थन न करें ।
4- धर्म प्रचार के लिये यह समिति ही मार्ग दर्शक सिद्धान्त तय करे।
5- धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास करने वाले को इस समिति के दिशा निर्देशो के आधार पर ही प्रयास करना आवश्यक होगा। अन्यथा धर्म परिवर्तन कराने का कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रयास अपराध होगा।
6- किसी भी धर्म के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाले सभी कानून तत्काल समाप्त किये जाये।
7- भारत में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की धारणा को पूरी तरह समाप्त करके समान नागरिक संहिता लागू कर दी जावे।
भारत की वर्तमान स्थिति में सर्वोदय ही एकमात्र ऐसी जमात है जो इस आधार पर वैचारिक पहल कर सकती है। सर्वोदय की विश्वसनीयता हिन्दुओं में अभी समाप्त नहीं हुई है। अतः सर्वोदय को इस दिशा में पहल करनी चाहिये। इस पहल में यह सतर्कता, पूरी तरह रखने की आवश्यकता है कि जो संगठन कट्टरवाद को हिन्दू, मुसलमान या इसाई के रूप में विभाजित करते हैं ऐसे संगठनो से पूरी तरह दूरी बनाकर रखी जाय। साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा की जाने वाली आलोचना से बचने की अपेक्षा ऐसी आलोचना को अपने काम में सहायक समझा जाय।

मंथन क्रमांक 27 ، भारत में नक्सलवाद-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 1, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मै गढ़वा रोड मे स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन मे खडा था। मेरी लाइन आगे नही बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लडके ने भी मेरी सहमति से धक्का देकर आगे बढने की कोशिश की और टिकट ले आया। धक्का देने मे एक बुढ़िया गिर गई, उसने उठाया भी नही और मेरी आपत्ति पर उसने कहा कि लोकतंत्र मे तो कमजोर ही धक्का खाता है और खडा रह जाता है। जबकि धक्का देने वाला हमेशा आगे बढता रहता है। मै वर्षो तक विचार करता रहा, सोचता रहा कि धक्का खाकर खडे रह जाना उचित है या धक्का देकर आगे जाना। वर्षो बाद मैने अपने झारखंड के एक मित्र से दुविधा बताई तो उसने कहा कि दोनो ही मार्ग गलत है। मै तो धक्का देने वाले को पटक दूंगा और जरूरत पडी तो गोली भी मार दूंगा। मेरा वही मित्र बाद मे नक्सलवादियों का नेता बना। उसने हमारे शहर के आस पास कुछ लोगो को गोलियां भी मारी और खुद भी मारा गया। आज भी हमारे पूरे क्षेत्र मे वही तीनों स्थितियां विद्यमान है जैसी पहले थी। यदि ठीक से सर्वे किया जाय तो देश की सम्पूर्ण आबादी मे तीनो ही प्रकार के लोग मिलते है। तीनो के अपने अपने तर्क हैं और तर्क भी आकाट्य है । उन्ही तीनों मे कुछ लोगों को शरीफ कहते है तो कुछ लोगों को चालाक और कुछ को उग्रवादी।
आम तौर पर ऐसे उग्रवादी संगठित हो जाया करते है । भारत मे ऐसे तीन संगठन हैं जो उग्रवादी विचारों के आधार पर कार्य करते रहते है । उग्रवादियों मे से ही कुछ लेाग अतिवादी हो जाते है जो आतंकवादी कहे जाते है। संघ विचारो से ओत प्रोत आतंकवादी अभिनव भारत के नाम से आगे बढे तो इस्लाम की विचार धारा से प्रेरित आतंकवादी प्रत्यक्ष दुनियां भर मे दिख रहे है और साम्यवादी विचार धारा से प्रेरित आतंकवादियों को नक्सलवादी कहा जाता है। सभी उग्रवादी संगठन प्रारंभ मे आतंकवादियों का अप्रत्यक्ष समर्थन करते है। दूसरी ओर जब आतंकवादी मजबूत होते है तो सबसे पहले उसी संगठन को निशाना बनाते है जिसके सहारे वे आगे बढे है। नक्सलवादियों ने भी बंगाल मे साम्यवादियों को निषाना बनाने मे कोई कसर नहीं छोडी थी। यहां तक कि उन्होने ममता बनर्जी तक का साथ दिया था। मुझे देश भर के नक्सलवादियों से तो प्रत्यक्ष जानकारी नही है किन्तु मेरा अनुभव बताता है कि छत्तीसगढ मे नक्सलवाद के प्रोत्साहन मे दिग्विजय सिंह जी का अप्रत्यक्ष प्रयास रहा है। बाद मे जब गृहमंत्री चितम्बरम ने इमानदारी से नक्सलवाद को समाप्त करने की योजना बनाई तब भी दिग्विजय सिंह जी ने ही राहुल गांधी की शराफत का लाभ उठाकर नक्सलवादियों को बचाने की भूमिका अदा की थी। गांधी वादी भी ऐसे ही सीधे साधे होते है और वे भी ऐसे नक्सलवादियो को बचाने मे हमेशा ढाल का काम करते है। उग्रवाद और आतंकवाद से निपटने के तरीके अलग अलग होते है। उग्रवाद से कानून निपट सकता है किन्तु आतंकवाद से कानून की जगह राज्य को निपटना पडता है। नक्सलवाद की सुरक्षा मे अनेक लोग या संगठन कानून का सहारा लेकर राज्य का विरोध करते देखे जाते है। वामपंथी और जे एन यू संस्कृति से प्रभावित न्यायपालिका के लोग भी यही भूल करते रहे है। अनेक बडे बडे लेखक और साहित्यकार भी ऐसा करते देखे गये है। ऐसे लोग नक्सलवाद के लिये एक सुरक्षा कवच का काम करते है और साथ मे यह भी कहकर अपनी पीठ थपथपाते है कि उन्होने कानून और मानवाधिकार की रक्षा की है जबकि नक्सलवादियों द्वारा किये जा रहे अपराधो या अमानवीय कार्यो की रोकथाम के समय ऐसे न्यायाधीशो या अन्य लोगो की कोई भूमिका नही होती।
नक्सलवादियों से मेरी चर्चा रही है। वे सभी समस्याओ का कारण राजनैतिक, सामाजिक ,आर्थिक व्यवस्था को तथा समाधान अपनी सरकार को बताते रहे है। उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था का कोई स्वरुप नहीं था। उनके पास इस बात का कोई उत्तर नही था कि यदि उनकी सरकार गलत करेगी तो उसे हटाने का समाज के पास क्या तरीका होगा। हमारी संविधान मंथन सभा मे भी ऐसे कुछ लोग आते रहे है किन्तु उनके पास कोई ऐसा प्रारूप नही था कि वे कैसा संविधान प्रस्तुत करेंगे । उनका ये ही उत्तर था कि जब समय आयेगा तक देखा जायेगा। जब सरगुजा जिले मे नक्सलवाद आया और हमलोगो ने उन्हे सलाह दी कि वे गोली बंदूक छोडकर ग्राम सभाओ को स्वतंत्रता पूर्वक अपना कार्य करने दे तो उन्होने अस्वीकार कर दिया। इस तरह यह स्पष्ट हो गया कि नक्सलवाद किसी भी रूप मे व्यवस्था परिवर्तन नहीं है। बल्कि पूरी तरह सत्ता संघर्ष है। हमलोगो ने उनसे दूरी बना ली और सरकार का साथ दिया। परिणाम हुआ कि नक्सलवाद हमारे जिले से शून्य हो गया। पूरे भारत मे हमारा जिला अकेला ऐसा है जहां नक्सलवाद बहुत तेजी से आया, छाया भी और उसी तेजी से हार थक कर समाप्त भी हो गया। दूसरी ओर हम छत्तीसगढ के उस दक्षिणी छोर को भी देख रहे है जहां नक्सलवादियों ने एक छोटे भूभाग पर अपनी स्वतंत्र सरकार बना रखी है और भारत सरकार निरंतर उसे मुक्त कराने का प्रयास कर रही है। देश भर मे यह प्रचारित किया जाता है कि नक्सलवादियों को स्थानीय लोगो का जन समर्थन प्राप्त है। यह बात पूरी तरह गलत है। हमारे जिले मे भी जब नक्सलवादी उस स्थिति मे थे तो उनसे भयभीत लोग उनका समर्थन करते थे और आज जब सरकार का शासन है तो उनकी प्रशंसा करने वाला एक भी व्यक्ति पुरे जिले मे नही मिलेगा। नक्सलवादियों के हितैषी इस तरह का दुष्प्रचार करते ही रहते है।
नक्सलवाद साम्यवाद का अतिवादी स्वरुप है। इसका अर्थ है कि साम्यवाद के सारे दुर्गुण नक्सलवाद में भी मौजूद रहते है। गुण तो कोई न साम्यवाद मे दिखता है न ही नक्सलवाद मे । वर्ग विद्वेष को आधार बनाकर असंतोष का विस्तार इन सबका एक मात्र मार्ग होता है। धीरे धीरे ये लोग अपने व्यक्तिगत जीवन मे भी असंतुष्ट हो जाते है। जो लोग भय या स्वार्थ के कारण नक्सलवादी नही होते। ऐसे लोग अपने बाद के जीवन मे असंतोष को महसूस करते है। नक्सलवाद के जन्म दाता कानू सान्याल वृद्धावस्था मे आत्महत्या करके मरे । क्योकि वे नक्सलवाद के सत्ता संघर्ष के मार्ग के विरूद्ध थे । दो चार दिन पहले ही प्रसिद्ध कवि गदर के भी हृदय परिवर्तन की खबरे आ रही है।
यदि हम नक्सलवाद के भविष्य की बात करंे तो पिछली सरकारो के समय पूरे प्रशासन मे बडी संख्या मे लोग नक्सलवादियों की ढ़ाल के रूप मे काम करते थे। मानवाधिकार संगठन या अन्य कई प्रकार के लोग भिन्न भिन्न बोर्ड लगाकर भिन्न भिन्न तरीको से नक्सलवाद का समर्थन करते दिखते रहते थे। अब वातावरण बदल गया है। जे एन यू उस विचार धारा का प्रमुख केन्द्र था। वह स्वयं अपने अस्तित्व की लडाई लड रहा है। साम्यवाद भी देश भर मे समाप्ति की ओर है । न्यायपालिका की भी सोच मे बदलाव आ रहा है। साहित्य और पत्रकारिता के लोग भी पुरस्कार वापसी के असफल प्रयास के बाद चुप हैं। अग्निवेश जी भी स्थितिया भाप रहे है। दिग्विजय सिंह जी का प्रभाव अपने आप घट रहा है। ब्रहमदेव शर्मा तो चले गये और सर्वोदय भी अब दो गुटो मे बंटकर कमजोर हो गया है। राज्य सभा मे धीरे धीरे वर्तमान सरकार मजबूत होती जा रही है और ऐसा लगता है कि नक्सलवाद का सम्पूर्ण समापन बहुत दूर नहीं है। अर्थात एक दो वर्षो की ही बात है। यदि कल्लूरी बस्तर मे रह गये होते तो यह काम बहुत जल्दी निपट गया होता किन्तु उनके जाने के बाद भी कोई बहुत ज्यादा अंतर नही आएगा। क्योकि अब सरकार मे आतंकवाद और नक्सलवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाले कोई नही है। एक बार बस्तर मुक्त होते ही पूरे देश मे नक्सलवाद की कमर टूट जायेगी । और इस तरह मै आश्वस्त्त हॅू कि नक्सलवाद देश के लोगो के लिये कोई गंभीर चिंता का विषय नही है। देश कीे वर्तमान सरकार उसे समाप्त कर ही लेगी। नक्सलवाद का जीवित रहना कश्मीर समस्या के अपेक्षा भी अधिक बडा कलंक था। किन्तु अब उस कलंक से हमे मुक्ति मिल जायेगी। ऐसा निश्चित दिखता है।

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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