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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है 1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है। 2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं। 2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है ब...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

Posted By: admin on May 31, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कोई व्यक्ति श्रम शोषक है या शोषणमुक्त इसकी पहचान के 5 सूत्र हैं । एक व्यक्ति महंगाई दूर करने या कराने का प्रयास करता है । 2व्यक्ति कृत्रिम ऊर्जा के महंगी होने के विरुद्ध है । तीन व्यक्ति श्रम मूल्य वृद्धि का विरोध और श्रमिकों को सरकारी सहायता देने का समर्थक है।चार व्यक्ति आवागमन मंहगा होने के विरुद्ध है ।पाच व््यक्ति सरकार से श्रम मूल्य वृद्धि की मांग करता है। यदि कोई व्यक्ति 5 में से एक भी मांग पर जोर देता है तो स्पष्ट मानिए कि वह व्यक्ति श्रम शोषक है।

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वर्तमान समय में मौलिक अधिकार संबंधी दो धारणाएं अस्तित्व में है एक साम्यवादी इस्लामिक जो मौलिक अधिकार मानते ही नहीं दूसरी पूंजीवादी लोकतांत्रिक जो मौलिक अधिकार संविधान या समाज द्वारा घोषित मानते हैं । मेरी धारणा दोनों से हटकर है । मैं मौलिक अधिकार की तीसरी परिभाषा मानता हूं जिसके अनुसार व्यक्ति के प्रकृति प्रदत्त अधिकार जिन्हें कोई भी अन्य उसकी सहमति के बिना तब तक कोई कटौती ना कर सके जब तक उसने किसी अन्य के वैसे ही अधिकारों का उल्लंघन न किया हो । संविधान मौलिक अधिकार देता नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा की गारंटी देता है । मौलिक अधिकार सिर्फ एक ही होता है और वह है स्वतंत्रता । परिभाषा भिन्नता के कारण भ्रम हो रहा है यदि यह परिभाषा मान ली गई तो भ्रम दूर हो जाएगा । स्वतंत्रता की कोई सीमा कोई अन्य नहीं बना सकता क्योंकि सबको समान स्वतंत्रता है और उसका उल्लंघन होने पर ही न्याय की आवश्यकता है अन्यथा सामाजिक राजनीतिक या आर्थिक न्याय न्याय न्याय की रट लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

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Posted By: admin on May 30, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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मेरे विचार स्पष्ट हैं। मैं आर्थिक और सामाजिक असमानता की तुलना में राजनीतिक असमानता को अधिक घातक मानता हूं । मैं सुविधा और स्वतंत्रता के बीच स्वतंत्रता को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूं। मैं परिवार और गांव को आर्थिक तथा राजनीतिक दोनों प्रकार के अधिकार दिए जाने का पक्षधर हूं । मैं नहीं चाहता कि संविधान संशोधन के असीम अधिकार सिर्फ संसद के पास हो बल्कि मैं यह चाहता हूं कि संविधान संशोधन में परिवार या ग्राम सभाओं की भी सहमति ली जानी चाहिए । मैं साम्यवाद को मीठी चाशनी मे लपेट कर परोसने मे सहयोगी नहीं । मैं समझता हूं कि मैं इन मुद्दों पर स्पष्ट हूं । मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा हूं मैं तो केवल विचार मंथन कर रहा हूं विचार प्रस्तुत कर रहा हूं और इन विचारों को आधार बनाकर जो लोग काम कर रहे हैं उन लोगों से बात की जानी चाहिए

Posted By: admin on May 29, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Posted By: admin on May 28, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान

Posted By: admin on May 27, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक -35
आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति का अनुशरण करते हुये संकटो से घिरे व्यक्तियों को सहायता करे। राज्य का यह दायित्व होता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में आने वाली बाधाओं को दूर करे। साथ ही राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है कि वह कमजोर लोगों को समाज द्वारा की जाने वाली सहायता में मदद करे।
राज्य समाज के लिए एक आवश्यक बुराई के समान माना जाता है। राजनेता पूरी दुनिया और विशेषकर भारत के लिए सबसे अधिक खतरनाक जीव के रुप में स्थापित हो गया है। वह बिल्लियों के बीच बंदर के समान स्वयं समस्याओं का समाधान भी नहीं करता,समस्याओं का समाधान होने भी नहीं देता और उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप करके समस्याओं के प्रयत्न का नाटक भी करता रहता है । आर्थिक असमानता भी ऐसी ही आर्थिक समस्या है जिसे राजनेता सुलझाना नहीं चाहते, समाज को सुलझाने भी नहीं देते और 70 वर्षो से आज तक सुलझाने का नाटक करते रहे है। 70 वर्षो से गरीबी दूर करने की कोशिश हो रही है और अब तक दूर नहीं हो पायी, न कभी भविष्य में दूर होने के लक्षण दिखते है।
स्पष्ट है कि स्वतंत्रता के बाद आज तक आर्थिक असमानता तेज गति से बढती जा रही है। गरीब ग्रामीण श्रमजीवी बैलगाडी की रफ्तार से आगे बढ रहा है तो बुद्धिजीवी ट्रेन तथा पूॅजीपति हवाई जहाज की रफ्तार से। गरीब और अमीर के बीच खाई लगातार बढ रही है। भारत लगातार विकास कर रहा है किन्तु 33 प्रतिशत निचली आबादी का 70 वर्षो में जीवन स्तर सिर्फ दोगना बढा है तो 33 प्रतिशत मिडिल क्लास अर्थात बुद्धिजीवियों का 8 गुना तथा 33 प्रतिशत उपर क्लास का 64 गुना। इसका अर्थ हुआ कि आर्थिक असमानता स्वतंत्रता के बाद 32 गुना और अधिक बढ गई है। यदि विकास दर 7 के जगह 10 हो जाये तब यह आर्थिक असमानता और अधिक तेज गति से बढ जायेगी। जिस गरीबी रेखा की बात की जा रही है वह रेखा प्रतिव्यक्ति 30 रु. प्रति दिन के आसपास है। इसका अर्थ हुआ कि भारत के 20 करोड व्यक्ति आज भी 30 रु. से कम में गुजर बसर करने को मजबूर है । इसे किस तरह न्याय संगत ठहराया जाये यह समझ में नहीं आता। जो भारत राज्य के माध्यम से दुनिया से विकसित राष्ट्र बनने की होड कर रहा है उस भारत के 20 करोड लोगों की यह स्थिति दयनीय दिखती है। दूसरी ओर इतनी खराब दयनीय स्थिति होते हुए भी हमारा समाज मंदिरो,धर्मगुरुओं, खेल प्रतिस्पर्धाओं,पूजा और त्यौहारों पर अरबों खरबों रु. स्वैच्छा से खर्च कर रहा है, किन्तु अपने काफीले के साथ चल रहे भाइयों पर उसे दया नहीं आती। आश्चर्य है कि भगवान पर सर्वस्व न्यौछावर और इन्सान की कोई चिंता नहीं। स्पष्ट है कि आर्थिक असमानता के परिणाम स्वरुप समाज में द्वेष का भाव बढ रहा है। अमीर और गरीब के बीच प्रेम सदभाव ईर्ष्या और विद्वेष में बदल रहा है। लगातार बढती जा रही आर्थिक असमानता कमजोर वर्गो में यह विश्वास पैदा कर रही है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। कमजोर वर्गो को यह पता नहीं चल रहा कि समाज और राज्य उनका सहायक है,या शोषक। मैं स्पष्ट हॅू कि आर्थिक असमानता का लगातार बढते जाना समाज में अशांति का एक प्रमुख आधार बन रहा है। ऐसी परिस्थिति में तात्कालिक रुप से राज्य का यह कर्तव्य होता है कि वह एक आर्थिक सीमा बनाकर उसके उपर के लोगों से अपनी शासकीय आवश्यकताओं की पूर्ति टैक्स के रुप में करे। उस सीमा से नीचे वालो को पूरी तरह टैक्स फ्री कर दे। साथ साथ उसे यह भी चाहिये कि वह आर्थिक असमानता के कम होते तक के अल्पकाल के लिए उस सीमा रेखा से नीचे वालो की आर्थिक सहायता करे। मैं स्पष्ट कर दॅू कि वर्तमान समय में राज्य की नीतियां इसके ठीक विपरीत हैं अर्थात राज्य गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों को सुविधा की तुलना में कई गुना अधिक अप्रत्यक्ष कर वसूलता है तथा शहरी बुद्धिजीवी ,पूॅजीपतियों को टैक्स की तुलना में कई गुना अधिक सहायता देता है। मैंने इस मुददे पर पूरा पूरा शोध करके यह निष्कर्ष निकाला है और तब मैं इतना बडा गंभीर आरोप लगा रहा हॅू। मेरे विचार में राज्य की सम्पूर्ण अर्थनीति में तत्काल आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है।
फिर भी मैं राज्य के अर्थ नीति मे बदलाव लाकर गरीबो को आर्थिक सहायता देने को एक अस्थायी समाधान मानता हॅू,वास्तविक और दीर्घकालिक नहीं। आर्थिक असमानता लगातार बढने का कारण श्रमशोषण में निहित है। भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर बुद्धिजीवियों और पॅूजीपतियों का एकछत्र अधिकार है। वे गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों को धोखा देने के लिए उनके नाम पर ऐसी नीतियां बनाते है जिससे गरीब और श्रमजीवी कभी उपर न आ सके और बुद्धिजीवी पॅूजीपति दिन दूने रात चौगुने बढते रहें। सारी अर्थनीतियां उपभोक्ताओं के पक्ष में तथा उत्पादको के विरुद्ध बनाई जाती हैं। इसी तरह श्रम शोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कृत्रिम उर्जा को सस्ता करके रखा जाता है। बुद्धिजीवियों के हित में श्रमजीवियों से टैक्स लेकर शिक्षा पर अनाप सनाप खर्च किया जाता है। एक षडयंत्र के अन्तर्गत श्रम का मूल्य अनावश्यक रुप से बढाकर रखा जाता है । इन तीनो प्रयत्नों का परिणाम होता है कि श्रम की मांग घटती चली जाती है और जब मांग घटती है तब मूल्य घटना स्वाभाविक प्रक्रिया है। शिक्षित बेरोजगार के नाम पर श्रम शोषण का एक नया अध्याय खोल दिया जाता है। दुनिया जानती है कि शिक्षित व्यक्ति उचित रोजगार की प्रतिक्षा में रहता है,बेरोजगार नहीं। किन्तु बेरोजगारी की एक झूठी परिभाषा बनाकर श्रमशोषण का मार्ग प्रशस्त कर दिया जाता है। यह भी स्पष्ट है कि श्रम ही नये रोजगार का श्रृजन कर सकता है। शिक्षा तो रोजगार का स्थान परिवर्तन मात्र करती है। उद्योग धंधे भी रोजगार बढाते नहीं बल्कि जितना रोजगार देते है उससे कई गुना अधिक रोजगार छीनते है। फिर भी हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था शिक्षा और उद्योग धंधो को श्रम की तुलना में अधिक महत्व देती रहती है।
स्वतंत्रता के पूर्व भी हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों ने सामाजिक आधार पर श्रमशोषण की नीतियां बनाई थी। स्वतंत्रता के बाद श्रमशोषण की उन नीतियों में आर्थिक आधार भी जुड गया। गरीबी हटाओं और आर्थिक न्याय भारत के सत्तालोलुप लोगो का एक सफल हथियार बना हुआ है। हर सत्ता लोलुप आर्थिक असमानता दूर करने के नाम पर राज्य को प्रशासनिक आधार पर अधिक शक्तिशाली बनाने की मांग करता है किन्तु कभी यह मांग नहीं करता कि समाज में स्वाभाविक रुप से श्रम की मांग बढे और गरीब ग्रामीण श्रमजीवी को सरकार या किसी अन्य के समक्ष हाथ फैलाने की आवश्यकता न पडे। श्रममूल्य इतना अधिक हो कि आर्थिक असमानता अपने आप घट जाये। जो लोग टैक्स बढाकर गरीबों में बांटने की बात करते है उनका हिडेन एजेंडा सत्ता के प्रति आकर्षण होता है, समाधान नहीं। क्योंकि समाधान श्रम मूल्य वृद्धि में निहित है और ये सत्ता लोलुप धन लेकर बांटने को समाधान बताते है । मैं समझता हॅू कि सब्सिडी की भीख अल्पकालिक समाधान हो सकती है न्यायोचित और दीर्घकालिक समाधान नहीं।
तकनीक का विकास एक ओर तो विकास में सहायक होता है तो दूसरी ओर श्रमशोषण भी बहुत तीब्र गति से करता है। इसलिए तकनीक का तेज विकास इस तरह योजना बनाकर किया जाना चाहिये कि वह विकास तो करे किन्तु श्रमशोषण न कर सके। हमें आर्थिक असमानता दूर करने के लिए श्रमशोषण मुक्ति के साथ तालमेल बिठाकर प्रयत्न करना होगा। श्रम की मांग बढे और उसका मूल्य बढे यह सबसे अच्छा समाधान दिखता है किन्तु बुद्धिजीवियों, पूॅजीपतियों और राजनेताओं ने मिलकर श्रम शोषण का ऐसा तानाबाना बुन रखा है कि बेचारा ग्रामीण श्रमजीवी कुए के बाहर की दुनिया देख ही नहीं पाता। मैं जानता हॅू कि श्रमशोषण में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका साम्यवादियों की रही है। उनका यह मानना रहा है कि यदि श्रमशोषण बंद हो गया तो उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाए अधूरी रह जायेंगी। अब तो ऐसी स्थिति हो गई है कि आर्थिक असमानता दूर करने के नाम पर अनेक और भी ऐसी दुकाने खुल गई है। मैंने इस आधार पर खूब विचार किया कि श्रम की मांग बढे जिससे श्रम का मूल्य बढे और आर्थिक असमानता अपने आप समाप्त हो जाये। इसके लिए तत्काल चार कदम उठाने की आवश्यकता हैं-
1)कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि करके अन्य सारे टैक्स समाप्त कर दिये जायें। यदि आवश्यक हो तो इनकम टैक्स भी समाप्त किया जा सकता है।
2)शिक्षा को पूरी तरह राज्य से मुक्त कर दिया जाये और उस पर सरकार कोई बजट खर्च न करें।
3)श्रममूल्य वृद्धि की घोषणा बंद कर दी जाये और श्रम मूल्य को सरकार वहीं तक घोशित करने को बाध्य हो जिसके नीचे रहने वालो को वह अनिवार्य रुप से रोजगार देने में सक्षम है, अन्यथा नहीं।
4)सभी प्रकार के जातीय धार्मिक या अन्य आरक्षण समाप्त कर दिये जाये। यहॉ तक कि आर्थिक आधार पर भी किसी को कोई आरक्षण न दिया जाये।
मै यह स्पष्ट कर दूं कि आर्थिक असमानता पर नियंत्रण किये बिना समाज मे अशान्ति दूर नही हो सकेगी तथा श्रम की मांग वृद्धि ही इसका एक मात्र समाधान है। मैं समझता हॅू कि इस प्रयत्न का सब प्रकार के सत्तालोलुप लोग विरोध करेंगे क्योंकि इससे तो उनका सत्ता संघर्ष का महत्वपूर्ण हथियार ही छिन जायेगा। लेकिन मेरे विचार से यह एक महत्वपूर्ण समाधान है जो भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का निराकरण कर सकता है।
मंथन ٣٦ का अगला विषय ‘‘वर्ग संघर्ष’’ होगा।

Posted By: admin on May 26, 2017 in rajnitik - Comments: No Comments »

Posted By: admin on May 25, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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