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मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव

Posted By: admin on June 24, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श्रृंखलता का प्रतीक साम्यवाद तो पीछे छूट रहा है और साम्प्रदायिकता अर्थात इस्लाम ने धन शक्ति से टकराव में कमजोरी पाकर कुछ समझौते करने शुरू कर दिये हैं। स्पष्ट दिखने लगा है कि पूंजीवाद अर्थात धन शक्ति आगे निकल रही है। किन्तु एक बात निर्णायक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि आगे तीनों में से चाहे जो भी निकले किन्तु उसे राज्य का सहारा लेना ही होगा। चाहे धन राज्य का सहारा ले या राज्य धन का किन्तु कोई अकेला निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सकता।
धन की शक्ति कितनी है यह यहूदी सबसे ज्यादा समझते रहे हैं। पष्चिम के देषों में भी यहूदी प्रभावित अर्थ व्यवस्था चल रही है। कुछ लोग तो पूरी दुनियां के अर्थ प्रभावित होने की अपुष्ट बातें करते दिखते हैं। भारत के एक स्थापित नेता दिलीप सिंह जूदेव ने कभी चर्चा में कहा था कि पैसा खुदा तो नहीं है किन्तु वह खुदा से कम भी नहीं है। यह बात लगभग सच ही है। धन सम्पूर्ण विष्व व्यवस्था पर निर्णायक प्रभाव डालने की क्षमता रखता है।
दूसरी ओर अर्थ एक आवष्यक मजबूरी भी है। व्यक्ति अपनी बौद्धिक या श्रम शक्ति से प्राप्त लाभ को धन के अतिरिक्त किसी अन्य स्वरूप से न संचित कर सकता है न रूपांतरित। धन ही उसका एक मात्र संग्रह का आधार है अन्यथा व्यक्ति का विषेष प्रयत्न स्वतः नष्ट हो जायेगा। साथ ही धन समाज मंे स्वस्थ प्रतियोगिता में भी सहायक होता है। भारतीय समाज व्यवस्था ने धन के दोनों स्वरूपों का अच्छी तरह विष्लेषण करके ही संतुलित मार्ग निकाला था जिसे वर्ण व्यवस्था कहते हैं। इस वर्ण व्यवस्था में व्यक्ति अपनी क्षमता और इच्छा के आधार पर ज्ञान सुरक्षा सुविधा और सेवा में से एक को चुन सकता है। व्यक्ति एक से अधिक दूसरे की न तो इच्छा कर सकता है न ही एक दूसरे में हस्तक्षेप । एक व्यक्ति एक मार्ग पर चलकर सिर्फ एक ही लाभ का परिणाम प्राप्त कर सकता है। ज्ञान को सर्वोच्च सम्मान सुरक्षा को अधिकतम शक्ति सुविधा को अधिकतम धन तथा सेवा को अधिकतम सुख की सुविधा प्राप्त थी। वैष्य अकेला ही धन संग्रह का अधिकार रखता था। शेष तीन धन अधिकार से पूरी तरह वंचित थे। किन्तु धनवान को सम्मान शक्ति और सुख के मामले में अन्य तीन से पीछे ही रहना पड़ता था। मैं मानता हॅू कि यह भारतीय व्यवस्था बाद में विकृत हुई। उपर वाले तीन ने मिलकर श्रम का शोषण शुरू किया जिसके दुष्परिणाम आज तक भारत भुगत रहा है। किन्तु यह चर्चा आज का विषय नहीं। फिर भी इतना अवष्य है कि यह व्यवस्था ही विष्व अव्यवस्था का अच्छा समाधान थी।
अर्थ की शक्ति नियंत्रित करने के बीसवीं सदी में कई प्रयास हुए। सबसे बड़ा प्रयास साम्यवाद के रूप में हुआ। उसने सारी अर्थ व्यवस्था से समाज को बाहर कर दिया। प्रारंभ में साम्यवाद बढ़ा किन्तु धीरे-धीरे नीचे जाने लगा क्योंकि खुली प्रतिस्पर्धा ही विकास का महत्वपूर्ण आधार होती है और प्रतिस्पर्धा से अर्जित लाभ को धन के अतिरिक्त इकटठा करना संभव नहीं। साम्यवाद में प्रतिस्पर्धा न होने के कारण उत्पादन और विकास पर दुष्प्रभाव पड़ा। एक छोटा प्रयास विनोबा जी ने किया कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को कांचन मुक्ति के अति उच्च आदर्ष के साथ जोड़ दिया। मुझे याद है कि विनोबा जी के इस उच्च आदर्ष ने सर्वोदय समाज में अनेक व्यावहारिक कठिनाइंया पैदा की। वैसे अर्थ व्यवस्था के मामले में इस्लामिक व्यवस्था भी बहुत आदर्ष मानी जाती है। उसमे जकात को मुसलमान के लिय आवष्यक माना गया है। जकात का तरीका भी बहुत व्यावहारिक है। ब्याज के मामले में भी इस्लाम बहुत आदर्षवादी माना जाता है। यह अलग बात है कि बाद में यह जकात ही साम्प्रदायिकता के विस्तार का एक मजबूत आधार बनकर समाज के लिये समाधान की जगह समस्या बन गया।
धर्म अर्थ काम और मोक्ष की भारतीय चर्चा में धन एक ऐसे मजबूत घोडे़ के रूप मे स्थापित हुआ है। जिसमें यदि व्यक्ति ने धर्म के माध्यम से अर्थ पर सवारी की तो वह घोड़ा उसे मोक्ष तक पहुंॅचा सकता है। और यदि धन ने ही धर्म पर सवारी कर दी तो व्यक्ति नर्क तक नीचे गिर सकता है। अर्थ एक निर्णायक शक्तिषाली हो किन्तु उसकी शक्ति का प्रभाव तभी होता है जब वह राज्य के साथ जुडे़। इसका अर्थ यह हुआ कि सारी निर्णायक ताकत तो राज्य के पास ही है चाहे वह साम्प्रदायिकता के साथ जुडे़ या धन के साथ। यही कारण है कि सभी शक्तियां अपनी पूरी ताकत राज्य को साधने में लगाती रहती है और उसमें धन अभी सबसे आगे है। इसका सीधा-सीधा मतलब है कि अर्थ और राज्यसत्ता का इकठ्ठा होना सबसे अधिक घातक है। साथ ही दोनो एक साथ जुड़ने के लिये लगातार कोषिष करते रहते है।
हम अब सिर्फ भारत तक अपने को सीमित करंे। भारत में भी सत्ता और सम्पत्ति का अधिकतम एकीकरण हो रहा है। राज्य स्वतंत्रता पूर्वक कितना भी टैक्स लगाता है और उसका एक छोटा सा हिस्सा जन कल्याण के नाम पर खर्च करके शेष पूरा का पूरा अपनी ताकत और लोकप्रियता बढ़ाने में खर्च करता है। यहां तक कि धन की ताकत पर राज्य बुद्धिजीवियों, कलाकारो, मिडिया कर्मियों, बल्कि कभी-कभी तो धर्म गुरूओं तक को खरीदकर अपने पक्ष मे करता रहता है। सत्ता लोलुप अथवा सता लाभ प्राप्त लोग समाज मंे यह भ्रम फैलाते रहते है कि राज्य ही गरीबी अथवा आर्थिक असमानता मिटा सकता है। सत्तर वर्षो से भारत देख रहा है कि कभी गरीबी दूर हुई ही नहीं है। और आर्थिक असमानता तो बढ़ती ही चली जा रही है। फिर भी अनेक लोग समाज मे गरीबी-अमीरी के नाम पर ऐसा भ्रम फैलाकर रखते हैं जिसमे राज्य और अर्थ के बीच की कड़ी कमजोर न हो सके। साम्यवादी इस आधार पर अमीरी रेखा का प्रचार करके वर्ग विद्वेष फैलाते रहते हैं। जबकि ऐसी कोई रेखा व्यक्ति बना सकता है या समाज बना सकता है किन्तु सत्ता के द्वारा बनाये जाने की मांग करना अपनी गुलामी को आमंत्रण देने के समान है। यह तो संभव है कि राज्य अपनी सहूलियत के लिये कोई मध्यरेखा बनाकर उससे उपर के लोगो को टैक्स के दायरे में ले आवे और नीचे वालों को राहत दे दें। किन्तु ऐसी रेखा को अमीरी गरीबी रेखा कहना राज्य की दलाली के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जो साम्यवादी लगातार करते रहे है। राज्य भी ऐसी मांग को अपने लिये सुविधा जनक समझकर प्रोत्साहित करता रहता है। मैं मानता हॅू कि धन की शक्ति बहुत बड़ी है। धन दुनियां की और विषेषकर भारत की राजनैतिक शक्ति पर निर्णायक प्रभाव डालता है। किन्तु यह सब होने के बाद भी धन राज्य से अधिक शक्तिषाली नहीं है। स्पष्ट है कि मायावती ने सत्ता के बाद धन प्राप्त किया धन के बाद सत्ता नहीं। आज दो सत्ता केन्द्र प्रमुख चाहे तो पूरी दुनियां को विष्व युद्ध की आग में ढकेल सकते है किन्तु दुनियां के पूंजीपति मिलकर भी ऐसे युद्ध को कराने या रोकने की सामर्थ नहीं रखते। फिर भी धन एक निर्णायक शक्ति है, जो राज्य के निर्णयों को प्रभावित करने की शक्ति रखता है।
आदर्ष स्थिति तो यह होगी कि राज्य पूरी तरह अर्थ व्यवस्था से बाहर हो जाये और अपने सुरक्षा और न्याय तक के लिये आवष्यक खर्च की व्यवस्था समाज से करा ले। स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मंे राज्य को तबतक कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जब तक कोई प्रतिस्पर्धी दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा न पैदा करें। राज्य यदि प्रतिस्पर्धारत अनेक पक्षकारो में से किसी को गरीब या अपंग कहकर उसे विषेष सहायता देता है तो यह अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र प्रति स्पर्धा में बाधक होता है जो अन्यायपूर्ण है। राज्य को षिक्षा स्वास्थ जैसे जन कल्याणकारी कार्यो से भी स्वयं को दूर कर लेना चाहिये। राज्य सिर्फ इतना ही कर सकता है कि जो लोग किसी कारण वष प्रतिस्पर्धा से बाहर है उनकी काफिला पद्धति अनुसार मौलिक आवष्यकताओं की पूर्ति करे किन्तु वह पूर्ति किसी प्रतिस्पर्धा में शामिल व्यक्ति को नहीं करनी चाहिये। फिर भी भारत की वर्तमान राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था को देखते हुए हमारे लिये किसी व्यावहारिक मार्ग को ही चुनना ठीक रहेगा। वर्तमान समय में राज्य ने संवैधानिक तरीके से संपूर्ण अर्थ व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है। राज्य जितना चाहे टैक्स लगा सकता है और जब चाहे जहां चाहे मनमाना खर्च भी कर सकता है। राज्य जब चाहे तब युद्ध भी कर सकता है और हम उसकी इच्छानुसार उसे धन देने के लिये बाध्य है। भले ही हम युद्ध न भी चाहें। ऐसी स्थिति में राज्य की स्वतंत्रता पर एक संवैधानिक अंकुष होना आवष्यक है और उसके लिये मेरा यह सुझाव है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह राज्य न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका को मिलाकर चलता है उसी तरह एक चैथी नियंत्रक इकाई के रूप में अर्थपालिका को भी होना चाहिये। अर्थपालिका कैसे बनेगी यह तो बाद का विषय है। किन्तु अर्थपालिका होनी चाहिये यह तात्कालिक चर्चा का विषय है। एक ऐसी अर्थपालिका हो जो भारत का संपूर्ण बजट स्वतंत्रा पूर्वक बना सके और राज्य की अन्य तीन इकाईया आर्थिक मामले में उस बजट के आधार पर ही कार्य करने को बाध्य हों। देष में टैक्स कितना लगे और कहाॅं-कहाॅ किस तरह खर्च हो इसका निर्णय अर्थपालिका ही कर सकती है। विधायिका नहीं। राज्य को पूरी तरह आर्थिक स्वतंत्रता देना बहुत खतरनाक है और अर्थपालिका उस स्वतंत्रता में लोक नियंत्रित तरीके से अंकुष लगा सकती है।
कार्य कठिन है किन्तु धन और राज्य के एकीकरण से मुक्ति पाने का प्रयास करना ही चाहिये। इस संबंध में हमें चार सूत्रिय कार्य प्रारंभ करना चाहिये।
1. हम अधिकतम निजीकरण को प्रोत्साहित करें। हम राज्य द्वारा समाज में दी जाने वाली सुविधाओं की मांग करने से अपने को दूर रखें। हम सुविधा की अपेक्षा स्वतंत्रता को अधिक महत्व दे। हम प्रयास करंे कि राज्य और अर्थ के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती रहे।
2. हम यथा संभव अर्थपालिका की मांग पर बल देते रहें कि संवैधानिक आधार पर एक अर्थपालिका बननी चाहिये।
3. हम प्रयास करें कि जो लोग राजनैतिक असमानता की तुलना में आर्थिक और सामाजिक असमानता को आगे बढ़ाकर प्रचारित करते है उन्हें राज्य शक्ति का एजेन्ट समझने की आदत डालें। हम स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने की आदत डाले। गरीबी रेखा या अमीरी रेखा समाज का ध्यान भटकाने वाली है।
4. हम इस बात को समाज में स्थापित करने का प्रयास करें कि समाज सर्वोच्च है, राष्ट्र नही, धर्म नही, अर्थ नहीं।
मैं समझता हॅू कि यहां से यदि हम प्रारंभ करेंगे तो घोडा हम पर सवार नहीं हो सकेगा बल्कि हम ही घोडे पर सवार होने में सफल हो जायेंगे।
मंथन क्रमांक 40 का अगला विशय भ्रश्टाचार होगा।..

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