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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं। 2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है ब...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 9, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं-
1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है।
2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की सिर्फ क्षमता का ही विकास करती है, चरित्र का नहीं।
3 शिक्षा देना राज्य का दायित्व नही है सुरक्षा और न्याय मात्र राज्य का दायित्व होता है।
4 शिक्षा किसी भी रूप मे रोजगार का सृजन नही करती वह तो रोजगार का रूपांतरण मात्र कर सकती है।
5 सरकार को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मे किसी की भी सहायता या विरोध नही करना चाहिये। इससे पक्षपात होता है।
6 श्रम की अवहेलना करके बुद्धिजीवियो की मदद करना समानता के सिद्धान्त के भी विरूद्ध है।
सिद्धान्त रूप से किसी भी प्रकार की शिक्षा राजकीय हस्तक्षेप से मुक्त होनी चाहिये। विदेशो की नकल करके मैकाले शिक्षा पद्धति ने भारत मे इस बुराई को विस्तार दिया । इस शिक्षा पद्धति के कारण श्रम के साथ अन्याय हुआ । हमारे रामानुजगंज विकास खंड मे नब्बे प्रतिषत लोग शराब पीने वाले है, गरीब है, अल्प शिक्षित है, ईमानदार है, सच बोलने वाले है, मानवता का व्यवहार करते है । बाहर से आये हुए शिक्षित और सम्पन्न लोग हर तरह से उनका शोषण करते हैं। प्रश्न उठता है कि शिक्षा शोषण और अत्याचार का हथियार है या चरित्र निर्माण का साधन। भारत मे स्वतंत्रता के बाद लगातार तेजी से शिक्षा का भी विस्तार हुआ तथा भ्रष्टाचार चरित्रपतन साम्प्रदायिकता हिंसा आदि का भी उतनी ही तेजी से विस्तार होता गया। मै नही कह सकता कि इन दोनो का क्या संबंध है किन्तु इतना अवश्य है कि ज्ञान लगातार घट रहा है और शिक्षा बढ रही है।
शिक्षा श्रम शोषण का माध्यम बन गई है । बुद्धिजीवियों ने आर्थिक व्यवस्था पर पूरा नियंत्रण कर लिया है । होना तो यह चाहिये था कि स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जाता या राज्य प्रतिस्पर्धा मे बुद्धि की तुलना मे श्रम की कुछ सहायता करता किन्तु इसके ठीक विपरीत राज्य व्यवस्था ने शिक्षा पर भारी बजट खर्च करना शुरू कर दिया । इतना ही नही इन लोगो ने तो गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसानो के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगाकर शिक्षा पर खुला खर्च करने भी पाप किया । भारत के सम्पूर्ण बजट से पुलिस और न्यायालय पर कुल एक प्रतिषत ही खर्च किया जाता है तो शिक्षा पर कुल बजट का करीब छ प्रतिषत । अनेक बुद्धिजीवी ठेकेदार शिक्षा पर और अधिक बजट बढाने की मांग करते रहते हैं।
शिक्षा को राज्य के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त होना चाहिये। लार्ड मेकाले ने गुलाम मानसिकता बढाने के लिये जो शिक्षा पद्धति लागू की उसी की स्वतंत्र भारत में भी अक्षरशः नकल की जा रही है। राज्य को क्यो शिक्षा की स्वतंत्रता मे हस्तक्षेप करना चाहिये?शिक्षा समाज का विषय है राज्य का नही । जो राज्य सुरक्षा और न्याय नही दे पा रहा है वह यदि शिक्षा के प्रति इतना संवेदनशील है तो उसकी नीयत खराब है।
गांधी जी ने तथा विनोबा जी ने भी सुझाव दिया था कि विशेष परिस्थिति मे दो वर्षो के लिये स्कूल कालेज बंद कर दिये जाये । मै इस सुझाव का तो पक्षधर नही। किन्तु मै इस का पक्षधर अवश्य हॅू कि सरकार को गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों से टैक्स वसूल करके शिक्षा पर खर्च पूरी तरह रोक देना चाहिये।
श्रम रोजगार के नये अवसर पैदा करता है और शिक्षा इस तरह के रोजगार की छीनाझपटी करती है । शिक्षा रोजगार के सुविधाजनक अवसर पैदा करके श्रम और शिक्षा की तुलना मे असमानता का विस्तार करती है। एक श्रमजीवी को ढाई सौ रूपया मे भी कई जगह काम उपलब्ध नही है। दूसरी ओर शिक्षित लेागो की सरकार बहुत चिंता कर रही है । चपरासी का वेतन पांच सौ रूपया रोज और किसान आत्म हत्या करे यह असमानता न्याय संगत नही है। फिर भी शिक्षा के नाम पर की जा रही है श्रमजीवी के पास आय का एक मात्र माध्यम श्रम ही होता है। जबकी शिक्षित व्यक्ति के पास श्रम के अतिरिक्त शिक्षा भी है। फिर भी शिक्षित व्यक्ति बेरोजगार कैसे होता है? जब सिद्धांत रुप से शिक्षित व्यक्ति बेरोजगार न होकर उचित रोजगार की प्रतीक्षा में है तो शिक्षित बेरोजगारी शब्द भी बुद्धिजीवियों का षडयंत्र मात्र है। शिक्षा के साथ सम्मान और एक प्रकार की सुविधा जुड जाने के कारण श्रमजीवी लगातार प्रयत्न करता है कि उसकी आने वाली पीढी श्रम प्रधान काम छोडकर शिक्षा की दिशा में बढे । आमतौर पर शिक्षित लोग स्वयं काम न करके श्रम खरीदने का अभ्यस्त हो जाता है यह शिक्षा के बढते मूल्य का दुष्प्रभाव है। गरीब और अमीर के बीच भी लगातार खाई बढते जा रही है। उसमें शिक्षा के विस्तार का महत्वपूर्ण योगदान है। यदि सरकार शिक्षा पर खर्चा करना चाहती है तो वह शिक्षा पर समान रुप से खर्च क्यों नहीं करती। अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को सरकार की ओर से समान शिक्षा दी जायेगी जो सबके लिए संभव हो। उसके आगे की पढाई आप अपनी क्षमतानुसार करने के लिए स्वतंत्र है। सौ गरीब में से गरीब कहकर एक दो लोगो को सरकारी खर्च पर शिक्षा देना 98 गरीबो के साथ अन्याय है। आप जो भी शिक्षा दे वह सबके लिए समान होनी चाहिये। टैक्स वसूल करेगे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान से जबकि शिक्षा का लाभ देगें बुद्धिजीवियों को । यदि हम भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों का अकलन करें तो वहाॅ शिक्षा के नाम पर या तो राजनीति हो रही है अथवा टकराव की ट्रेनिंग । संस्थाओ की जगह संगठन बनाये जा रहे है और सारी बुराई की ट्रेनिंग ही रही है। प्रारंभ मे साम्यवादियों ने उच्च शिक्षण संस्थाओ को इन बुराइयों का आधार बनाया। अब संध परिवार भी उसी दिशा मे आगे बढ रहा है। ये देश की सुव्यवस्था के लिये बहुत बुरे लक्षण है।
मेरा तो स्पष्ट मत है कि सरकार को शिक्षा व्यवस्था और उस पर किये जाने वाले खर्च से अलग हो जाना चाहिये। कोई आवश्यकता नही है कि हम सरकारी स्कूल चलावें । यह काम समाज अपने आप कर लेगा। शिक्षा पर होने वाला खर्च या तो शिक्षा प्राप्त करने वाले विधार्थी को देना चाहिये अथवा शिक्षा का लाभ उठा चुके लोगो को देना चाहिये। शिक्षा का खर्च हल जोतने वाले अशिक्षित श्रमजीवी पर क्यो लादा जाय ? इसलिये बुद्धिजीवियों द्वारा शिक्षा के नाम पर अशेक्षितो के साथ होने वाला षणयंत्र रोका जाना चाहिये। तर्क दिया जाता है कि अशिक्षित व्यक्ति शोषण का अधिक शिकार होता हे । यह बात सच है कि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति शोषण और अत्याचार मे अधिक पारंगत होता है इस तर्क के आधार पर यदि शिक्षा का विस्तार होता है तो यह पूरी तरह गलत है । या तो शिक्षा को पूरी तरह समान होना चाहिये या स्वतंत्र । मै तो स्वतंत्रता के अधिक पक्ष मे हॅू किन्तु यदि समान शिक्षा भी होती है तो कोई विशेष गलत नही है । किन्तु वर्तमान शिक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह गलत है और इसे बंद किया जाना चाहिये।

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