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मंथन क्रमांक-112 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...
मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः 1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ; 2. धर्म शब्द के अनेक अ...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...
मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्र...
मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रका...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि
------------------------------------------------------------------- कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः- 1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी...

मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 25, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-
1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।
2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिना व्यक्ति की सहमति के उसकी सम्पत्ति न टैक्स के रुप में ली जा सकती है, न ही कोई सीमा बनाई जा सकती है।
3 गरीबी, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, अशिक्षा दूर करना राज्य का दायित्व नहीं है। राज्य को इनके बढाने में की जा रही अपनी भूमिका से दूर हो जाना ही पर्याप्त है।
4 किसी भी इकाई के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए एक बजट अवश्य बनावे और उसका पालन करे।
5 अर्थव्यवस्था में बाजार की स्वतंत्रता में सरकार का कोई भी हस्तक्षेप घातक होता है।
6 राजनीति से जुडा प्रत्येक व्यक्ति बाजारवाद का अधिक विरोध करता है।
7 महंगाई एक अस्तित्वहीन समस्या है। मंहगाई होती ही नहीं। सरकारें जानबूझकर मुद्रा स्फीति बढाते है और उसे मंहगाई कहकर प्रचारित करते है।
समाजवाद का अर्थ होता है समाज सर्वोच्च। जिस तरह सम्प्रदाय वाद ने धर्म शब्द का अर्थ विकृत करके उसे संगठनात्मक स्वरूप दे दिया उसी तरह साम्यवाद ने समाजवाद का अर्थ विकृत करके उसे अर्थ प्रधान कर दिया। आज समाज वाद शब्द पूरी तरह बदनाम हो गया है । यही कारण है कि हमलोगों ने समाजवाद शब्द को छोडकर समाजीकरण शब्द का उपयोग शुरू कर दिया। साम्यवाद मे कुव्यवस्था होती है और समाजवाद मे अव्यवस्था। वास्तविक समाजवाद अर्थात समाजीकरण मे व्यवस्था होती है। समाजीकरण मे राज्य किसी सामाजिक इकाई की आंतरिक स्वतंत्रता मे कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता बल्कि ऐसी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस गारंटी के परिपालन मे हो रहे खर्च तक ही राज्य आर्थिक व्यवस्था कर सकता है, इससे अधिक नहीं। आज तो स्थिति यह है कि राज्य पूरे समाज की अर्थ नीति का निर्माता बन गया है। राज्य गरीबी दूर कर रहा है तो रोजगार शिक्षा स्वास्थ भी अपने जिम्मे ले रहा है। न्याय और सुरक्षा तो वह सम्हाल नही पा रहा और भूख मिटाने के प्रयत्न कर रहा है। परिणाम यह है कि न उससे भूख मिट रही है न असुरक्षा।
भारतीय संविधान में सम्पत्ति को मौलिक अधिकार माना गया था जिसे बहुत बाद में कुछ राजनेताओं ने संविधान से निकालकर मनमाने तरीके से समाजवाद शब्द घुसा दिया। सम्पत्ति मौलिक अधिकार होता है और कोई भी व्यक्ति या सरकार उसकी सहमति के बिना कोई टैक्स नहीं ले सकती। दुनिया में जो टैक्स की परंपरा है वह एक प्रकार से व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा का टैक्स है और उस टैक्स को उसकी सहमति मान लिया जाता है। यदि कोई सरकार अनावश्यक टैक्स वसूल करती है तो विश्व व्यवस्था उसे इसलिए रोक सकती है क्योकि व्यक्ति विश्व व्यवस्था का सदस्य है, राष्ट्र का नहीं। राष्ट्र के लिए तो व्यक्ति सिर्फ नागरिक मात्र होता है। यह अलग बात है कि अभी दुनिया में ऐसी कोई सर्वस्वीकृत विश्व व्यवस्था नहीं बन पायी है जिससे व्यक्ति और नागरिक की अलग अलग पहचान बन सके, क्योंकि साम्यवाद और इस्लाम व्यक्ति के मूल अधिकारों को ही नहीं मानता। इसका अर्थ हुआ कि या तो साम्यवाद और इस्लाम अपने विचारों में संशोधन करें अथवा समाप्त हो जाये तभी कोई सर्वस्वीकृत विश्व व्यवस्था बन सकती है। यह हमारा सौभाग्य है कि भारत इस्लाम और साम्यवाद से मुक्त है। भारत में लोकतंत्र भी है और भारत विश्व व्यवस्था के साथ जुडा हुआ भी है।
भारत की सरकारे निरंतर प्रयास करती हैं कि गरीबी , बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, आर्थिक असमानता, श्रमशोषण जैसी आर्थिक समस्यायें लगातार बढती रहें। इसके लिए वे निरंतर प्रयत्न शील रहती है क्योंकि यदि गरीबी , बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, श्रमशोषण ही कम हो जायेंगे तो सरकारों के पास राजनीति का खेल खेलने के लिए कोई खुला मैदान ही नहीं मिलेगा। यदि सरकारें इनसे बाहर हो जाये तो ये समस्याये अपने आप सुलझ सकती हैं।
मैंने बजट पर बहुत विचार किया। टैक्स इस प्रकार से लगाया जाना चाहिए कि वह गरीब ग्रामीण श्रमजीवी को बिल्कुल प्रभावित न करें और सक्षम व्यक्तियों से ही पूरा कर लिया जाये। इसका अर्थ हुआ कि यदि उपभोक्ता वस्तुओं से कर लेना बिल्कुल मजबूरी हो तो सभी वस्तुओं की सुची बनाकर उसमें क्रमानुसार नीचे से टैक्स इस प्रकार लगे कि उपर जाते जाते वह शून्य हो जाये। रोटी, कपडा ,मकान, दवा क्रमानुसार उपर से शुरु होते है। उसके बाद आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य का नंबर आता है। उसके बाद ही मनोरंजन की वस्तुये होती है। सरकार को रोटी, कपडा, मकान, दवा को टैक्स फ्री रखना चाहिए था किन्तु सरकारें आमतौर पर इन पर टैक्स लगाती है और आवागमन ,मोबाईल जैसी वस्तुओं को आम उपयोग की वस्तु बताकर उन्हें सस्ता रखती है। इसी तरह राज्य का यह दायित्व नहीं कि वह आर्थिक विषमता दुर करे। राज्य तो आर्थिक विषमता दूर करने के नाम पर ऐसी नीति बनाता है जिससे आर्थिक विषमता बढती चली जाती है। कितने दुख की बात है कि भारत आर्थिक मामलों में इतनी तेजी से आगे आ रहा है इसके बाद भी भारत में 20 करोड ऐसे लोग है जो तीस रु से कम पर जीवन जीने के लिए मजबूर है। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकारें कृत्रिम उर्जा को इतना सस्ता बनाकर रखती है कि वे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी को प्रतिस्पर्धा से बिल्कुल बाहर कर देती है। राष्ट्रीय प्रगति का सर्वश्रेष्ठ मापदण्ड यह होता है कि देश में श्रम का मूल्य कितना बढा क्योंकि श्रम का मूल्य बढना ही गरीब ग्रामीण श्रमजीवी की प्रगति का एकमात्र मापदण्ड होता है। स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षो मे श्रम का मूल्य भारत में करीब दोगुना ही बढ पाया जबकि बुद्धिजीवियों का जीवन स्तर लगभग आठ गुना और पूॅजीपतियों का औसत 64 गुना बढा माना जाता है। यह हमारे लिए राजनैतिक षडयंत्र का स्पष्ट प्रमाण है। राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कभी बाधक नहीं बनना चाहिए किन्तु राज्य प्रतिस्पर्धा में बाधक बनता है। वह खुले बाजार में भी हस्तक्षेप करता है। वह किसानों के उत्पादन का मूल्य भी नहीं बढने देता। यहाॅ तक कि राज्य प्राकृतिक और जैविक खाद की तुलना में कृत्रिम खाद तक को सबसीडी देता रहता है क्योंकि राज्य की नीयत में खोट है। राज्य निजी स्कूलों से स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा न करके उन्हें हर तरह से कानून के जाल में फसा कर रखना चाहता है।
मैं समझता हॅू कि भारत नई अर्थव्यवस्था के माध्यम से सारी दुनिया के सामने आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। सारी दूनिया यह प्रयास करती है कि वह अपना सामान दूसरे देशो में भेजकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करे भले ही उससे आयातक देश के गरीब लोगों का शोषण ही क्यों न हो। इस निर्यात की बीमारी के कारण ही अपने देश में कृत्रिम उर्जा को इतना सस्ता रखा जाता है कि वहाॅ श्रम का मूल्य न बढे और निर्यातक वस्तुये दुनिया से प्रतिस्पर्धा कर सके। भारत को इस प्रकार की पहल करनी चाहिए कि भारत न निर्यात के लिए अपने देश का शोषण करेगा, न ही आयात की मजबूरी में फंसा रहेगा। इसके लिए पूरे आर्थिक ढांचे को बदलने की आवश्यकता है। सिर्फ दो प्रकार के टैक्स लगाये जाने चाहिए। 1 सुरक्षा कर 2 समानता कर। सुरक्षा कर के रुप में भारत के प्रत्येक व्यक्ति से उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति पर एक पर दो प्रतिश त वार्षिक टैक्स लेना ही पर्याप्त होगा। इस टैक्स के माध्यम से सरकार का सेना पुलिस वित विदेष न्याय जैसा आवश्यक खर्च पूरा हो जायेगा। अन्य सब प्रकार के इन कम टैक्स या अन्य टैक्स पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे। समानता कर के रुप में भारत में उपयोग की जाने वाली सम्पूण कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढाकर ढाई गुना कर दिया जायेगा और इससे प्राप्त सारा धन प्रत्येक व्यक्ति को बराबर बराबर इस प्रकार बांट दिया जायेगा जिससे उसकी आवश्यकताये पूरी हो सके। किसी को किसी भी प्रकार की अन्य सुविधाये समाप्त कर दी जायेगी। किसी अन्य सुविधा के लिए सरकार बाजार से प्रतिस्पर्धा करेगी और सुविधा के लिए फीस ले सकती है किन्तु कर नहीं।
मेरे आकलन के अनुसार दो प्रतिशत सम्पत्ति कर से पूरे देश में करीब 20 लाख करोड रुपया सरकार को मिल सकता है। इस बजट में सरकार का सारा खर्च अच्छी तरह चल सकता है। कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि से भी सरकार को वार्षिक 20 लाख करोड मिल सकता है। यह राषि भी प्रत्येक व्यक्ति को 15 हजार रु वार्षिक के हिसाब से आवष्यक उपयोग के लिए दी जा सकती है। इसका अर्थ हुआ कि पांच व्यक्तियों के परिवार को करीब 75 हजार रु वार्षिक मिल सकता है। इस कार्य को एकाएक करना कठिन है । सम्पत्ति कर तो तत्काल किया जा सकता है किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि एकसाथ करना अव्यवस्था का कारण बन सकती है। मेरे विचार से प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत मूल्यवृद्धि करके उससे प्राप्त सारा धन प्रत्येक व्यक्ति को समान स्तर पर दिया जा सकता है। यदि सबकी सहमति हो तो यह समानता कर से प्राप्त राशि सिर्फ आधी गरीब आबादी में भी बांटी जा सकती है जिससे उन्हें वर्ष में 30 हजार रु प्रति व्यक्ति भी मिल सकता है। मुझे तो लगता है कि भारत की जनता इस समानता कर और वितरण का पुरजोर समर्थन करेगी। वर्तमान समय में जनता कृत्रिम उर्जा मूल्यवृद्धि का इसलिए विरोध करती है कि वह सरकार के खजाने में जाता है उसके व्यक्तिगत खजाने में नहीं।
भारत जिस तरह भ्रष्टाचार, अपराध वृद्धि, अनैतिकता की दिशा में बढ रहा है उसके आर्थिक समाधान के रुप में नई अर्थनीति बहुत सहायक हो सकती है। सरकार को सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर देना चाहिए। मांग और पूर्ति के आधार पर वस्तु से अपना महत्व और मूल्य निर्धारित करने की स्वतंत्र हो। मांग और पूर्ति के आधार पर मजदूर और मालिक स्वतंत्रता से प्रतिस्पर्धा कर सकें। सरकार अपना अपराध नियंत्रण मे भी अधिक सफल हो सकेगी क्योंकि अन्य आलतू फालतू खर्चे बंद होकर सरकार को सेना पुलिस और न्याय पर अधिक खर्च करने की सुविधा प्राप्त हो जायेगी।
मैं व्यक्तिगत रुप से महसूस करता हॅू कि मैं वर्तमान समय में दुनिया का सबसे अधिक सुखी और संतुष्ट व्यक्ति हॅू। आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक धरातल पर मैंने क्षमता और कल्पना से अधिक उपलब्धि प्राप्त की है। मैंने हमेशा आर्थिक, सामाजिक मामलों में लिक से हटकर नये मार्ग तलाशे है। इन सबका श्रेय मैं नई आर्थिक सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को देता हॅू। इसलिए मैं इस नई अर्थव्यवस्था का पक्षधर हॅू।
मंथन का अगला विषय‘‘ भौतिक या नैतिक उन्नति’’ होगा।

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मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि

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कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-
(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा करते है तो कुछ समाधान करते है। संवैधानिक प्रयत्न सामाजिक विकृतियों का लाभ उठाते है।
(2) अधिकांश समस्याओं का प्राकृतिक समाधान मांग और पूर्ति पर निर्भर करता है। किसी वस्तु की मांग बढती है तो महत्व और मूल्य बढता है, महत्व और मूल्य बढता है तब मांग घटती है पूर्ति बढती है।
(3) व्यक्ति और समाज मूल इकाई होते है। परिवार से राष्ट्र तक व्यवस्था की ईकाइयां है। परिवार, गांव, जिला,प्रदेश , देश , व्यवस्था की आदर्श इकाईयां मानी जाती है। भारत में इस क्रम को बदल कर जाति,वर्ण, धर्म, राष्ट्र कर दिया गया।
(4) महिला या पुरुष या तो व्यक्ति होते है अथवा परिवार के सदस्य। इनका कभी महिला पुरुष के रुप में कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता।
(5) राज्य प्राकृतिक या सामाजिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान करता है जो पूरी तरह गलत होता है।
(6) सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत परिवार में पुरुष प्रधान होता है क्योंकि आमतौर पर महिला पति परिवार में जाकर शामिल होती है। आमतौर पर पुरुष बाहर काम अधिक देखते है और महिलाये घर का। प्राकृतिक रुप से भी पति पत्नी के संबंधों में पति आक्रामक और पत्नी का आकर्षक होना आवश्यक है।
(7) राजनेता दुनियां का सबसे बडा असामाजिक व्यक्ति बन गया है। वह सेना पुलिस संविधान, कानुन आदि के सहारे समाज को बांट कर उसे गुलाम बनाकर रखना चाहता है।
(8) भारतीय कानूनों ने परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के उद्देश्य से दहेज व्यवस्था पर तो प्रतिबंध लगा दिया दुसरी ओर विवाह के बाद भी महिलाओं को पिता की सम्पत्ति मे हिस्सेदार बना दिया।
एक शिक्षक , एक बालक को इस प्रकार चलने का अभ्यास करा रहे थे कि जब बालक का बाया पैर आगे बढे तो साथ में दाहिना हाथ आगे जाना चाहिए और दाहिने पैर के साथ बाया हाथ। महिनों प्रयास के बाद भी बालक सीख नहीं पा रहा था। एक सलाह के आधार पर जब बालक को स्वतंत्र रुप से चलने के लिए छूट दी गई तो बालक ठीक उसी प्रकार चलने लगा जैसा गुरु जी चाहते थे। इसका अर्थ हुआ कि प्राकृतिक और स्वाभाविक व्यवस्था में अनावश्यक छेडछाड और हस्तक्षेप करना लाभदायक नहीं होता। परिवार की आंतरिक व्यवस्था क्या हो, उसमें महिला सशक्त हो या पुरुष उसमें कौन बाहर का काम करे और कौन घर का, कौन कितने विवाह करें और कौन अविवाहित रह जाये यह अंतिम निर्णय परिवार का होना चाहिए। उसमें कभी भी समाज या सरकार को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक उनकी आपस में सहमति है। आश्चर्य है कि महिला सशक्तिकण का नारा लगाकर कानून द्वारा परिवार के आंतरिक मामलों में भी अनावश्यक हस्तक्षेप किया जाता है। दूसरी ओर यदि परिवार का सदस्य परिवार से अलग होना चाहे तो उसे भी अलग होने के पूर्व कानून से स्वीकृति लेनी पडती है। यह कैसा अंधा कानून है कि एक जीवित व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक परिवार से अलग भी नहीं हो सकता और जुड भी नहीं सकता। दुनिया जानती है कि यदि महिलाओं की कुल संख्या घटेगी तो उनका महत्व और सम्मान बढेगा, यदि उनकी संख्या बढेगी तो उनका महत्व और सम्मान घटेगा। प्राचीन समय में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या बहुत अधिक थी परिणामस्वरुप समाज में बहुविवाह, सतीप्रथा, कन्या भ्रूण हत्या,दहेज जैसी प्रथायें प्रचलित हुई। प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत महिला और पुरुष का जन्म लगभग बराबर होता है। सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत महिलायें अधिक हो जाती है और पुरुष कम। जब महिलाओं का महत्व घटता है तब स्वाभाविक रुप से महिलाओं की संख्या घटती है और उनका अनुपात कम होने के बाद धीरे धीरे उनका महत्व बढता है। कभी समाज में यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते का उदघोष किया जाता है तो कभी ढोल गवार शूद्र पशु नारी का । ये दोनों ही उदघोष परिस्थिति जन्य होते है, सैद्धांतिक नहीं । क्योंकि इस संबंध में सिद्धांत उनकी संख्या के अनुपात पर निर्भर करता है।
वर्तमान समय में दो विपरीत बाते एक साथ समाज में कहीं जा रही हैं-
(1) महिलाओं को परिवार और समाज में सशक्त होना चाहिए,उन्हें स्वालम्बी होना चाहिए।
(2) महिलाओं की संख्या निरंतर बढाने का प्रयास होना चाहिए।
स्वाभाविक है कि दोनों उद्देश्य एक साथ पूरे नहीं हो सकते क्योेंकि यदि महिलाओं की संख्या बढेगी तो उनका महत्व नहीं बढेगा। चूंकि राजनेता कभी किसी समस्या का समाधान नहीं करना चाहते इसलिए वे दोनों बातों को एक साथ जोडकर प्रचारित करते है। स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य महिला सशक्तिकरण नहीं है बल्कि परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के लिए महिला और पुरुष के बीच टकराव पैदा करना है।
मैं आज तक नहीं समझ सका कि कानूनी आधार पर जन्म के बाद मनुष्य का अस्तित्व माना जाता है अथवा जन्म के पूर्व । मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी जीवित व्यक्ति की किसी भी परिस्थिति में हत्या नहीं की जा सकती। यदि गर्भ से ही उसे जीवित मान लिया गया तब सिर्फ बालिका भ्रूण हत्या पर ही प्रतिबंध क्यों? बालक की भ्रूण हत्या पर क्यों नहीं? वैसे भी बालक की भ्रूण हत्या नगण्य ही होती होगी। तब भ्रूण हत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित न करके कन्या शब्द जोडना क्यों आवश्यक है। मेरे विचार में कन्या शब्द जोडने का एकमात्र उद्देश्य महिला और पुरुष के रुप में वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष फैलाना मात्र है जिससे परिवार व्यवस्था पूरी तरह छिन्न भिन्न हो जाये। इस शब्द से आभास होता है कि पुरुष हमेशा शोषक होता है और महिला शोषित। जबकि यह धारणा पूरी तरह असत्य है। यदि इसमें लेश मात्र भी सच्चाई होती तो महिलाये सब कुछ जानते हुये भी स्वेच्छा से पति केे घर में नहीं जाती। अनेक तो अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध भी पति के साथ चली जाती है। स्पष्ट है कि जानबुझकर महिला और पुरुष के बीच संदेह की दीवार खडी की जाती है। जब सर्वविदित है कि महिला और पुरुष का एकसाथ रहना अनिवार्य है तब महिला सशक्तिकरण की अपेक्षा परिवार सशक्तिकरण का प्रयास क्यों नहीं होना चाहिए। जब प्राकृतिक रुप से पति को आक्रामक और पत्नी को आकर्षक होना चाहिए तब महिला सशक्तिकरण का अभियान क्यों चलाया जा रहा है? मेरे विचार में महिलाए भी कभी नहीं चाहती कि उनके पति कमजोर रहे क्योंकि ऐसा होना स्वाभाविक रुप से उचित नहीं है।
समस्याओं का समाधान खोजते समय उस समाधान से पैदा होने वाली समस्या पर भी ध्यान दिया जाता है। यदि महिलाओं की संख्या कम होगी तो महिला पुरुष के बीच में अंतर अपने आप घटेगा। दहेज करीब करीब समाप्त हो गया है और कहीं कहीं लडकियों को भी दहेज मिलने लगा है भले ही उसका नाम कुछ भी रखा जाये या अभी गुप्त हो। महिलाओं में शिक्षा का विस्तार भी तेज गति से हो रहा है और महिलाए परिवार में रहते हुए भी बाहर का काम करने लगी है। यह भी संभव है कि वर्तमान समय में महिलाए पति के घर में जाना मजबूरी समझती है। इस मजबूरी में भी बदलाव आ सकता है। अब महिलाये पति की सहायक न होकर एक दूसरे की पूरक बन गई है। इन सब परिवर्तनों का आधार है महिलाओं की घटती संख्या किन्तु राज्य इन सब बदलावों का श्रेय अपने कानूनों पर देता रहता है। इसके बाद भी मैं समझ नहीं पा रहा कि महिलाओं की संख्या वृद्धि के लिए इतने सरकारी प्रयत्नों की क्या आवश्यकता है। ज्यों ही महिलाओं का महत्व बढेगा, उनकी आबादी अपने आप बढने लग जायेगी। प्राकृतिक और मांग पूर्ति के सिद्धांत से अलग हटकर राजनैतिक समाधान का कोई लाभ संभव ही नहीं है, तब यह प्रयत्न क्यों? वर्तमान में महिलाओं की जो संख्या है वह हो सकता है कि आधा प्रतिषत और भी घट जाये। यह असंभव है कि वह संख्या 55 , 45 हो जाये। तो आधा प्रतिषत और घटने की संभावना से कोई आसमान नहीं टूट पडेगा।
मेरे विचार से महिला पुरुष संबंधों के किसी भी मामले से कानून और राज्य को पूरी तरह दूर हो जाना चाहिए। कानून को चाहिए कि वह या तो जन्म के बाद जीवन माने अथवा यदि भ्रूण से जीवन मानना है तो बालक बालिका का फर्क समाप्त कर दे। कानून को यह भी चाहिए कि वह महिला पुरुष को अलग अलग वर्ग के रुप में न मानकर उन्हें या तो व्यक्ति माने या परिवार का सदस्य। उनके संबंध में कभी कोई विभेदकारी कानून न बनावे। राज्य को यह भी चाहिए कि वह परिवार व्यवस्था को एक संवैधानिक इकाई माने और उसे संप्रभुता सम्पन्न इकाई का दर्जा दे, उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें। साथ ही राज्य का यह भी कर्तव्य है कि वह महिला पुरुष अनुपात को कम ज्यादा करने में अपना हस्तक्षेप कभी न करे जब तक कोई अपातकालिन स्थिति न आ जाये। प्राकृतिक व्यवस्था को प्राकृतिक या सामाजिक आधार पर चलने देना चाहिए। अंत में मेरा यह मत है कि कन्या भ्रूण हत्या न कोई सामाजिक समस्या है, न कोई समाधान। इस समस्या को राज्य ने जानबूझकर उलझाया है और राज्य के अलग होते ही यह समस्या अपने आप समाप्त हो जायेगी।
मंथन का अगला विषय‘‘ नई अर्थ नीति ’’ होगा।

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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