Lets change India
मंथन क्रमांक-112 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...
मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः 1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ; 2. धर्म शब्द के अनेक अ...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...
मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्र...
मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रका...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि
------------------------------------------------------------------- कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः- 1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी...

मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल

Posted By: admin on December 30, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-
1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुलाम बना कर अव्यवस्था पैदा कर दी है।
2 प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है। कोई भी इकाई उसकी सहमति के बिना उसकी स्वतंत्रता की कोई सीमा नहीं बना सकती न ही उसकी स्वतंत्रता में कोई बाधा पैदा कर सकती है।
3व्यक्ति किसी संगठन के साथ जुड जाता है तब उसकी स्वतंत्रता पूरी तरह संगठन में विलीन हो जाती है अर्थात् संगठन छोडने की स्वतंत्रता के अतिरिक्त उसकी कोई स्वतंत्रता नहीं होती।
4 परिवार एक संगठनात्मक इकाई होती है, प्राकृतिक इकाई नहीं। परिवार के किसी सदस्य का परिवार में रहते हुये कोई पृथक अधिकार या अस्तित्व नहीं होता।
5 महिला,पुरुष, बालक, वृद्ध के आधार पर कोई वर्ग नहीं बन सकता क्योकि परिवार रुपी संगठन में सब समाहित होते है।
6 महिला और पुरुष को अलग अलग वर्गो में स्थापित करना राजनैतिक षडयंत्र होता है। भारत के सभी राजनैतिक दल इस षडयंत्र के विस्तार में पूरी तरह शामिल रहते है।
7 धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिंग, व्यवसाय आदि के आधार पर कोई राज्य कोई आचार संहिता नहीं बना सकता क्योकि ये सब व्यक्ति के व्यक्तिगत आचरण है या सामाजिक व्यवस्था।
जब से भारत में अंग्रेजो का आगमन हुआ तब से ही उन्होने भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को वर्गो में बांटकर वर्ग निर्माण के प्रयत्न शुरु कर दिये थे। आवश्यक था कि इसके लिए परिवारों की आपसी एकता को छिन्न भिन्न किया जाता। यही सोचकर अंग्रेजो ने भारत में महिला और पुरुष के नाम पर अलग अलग अधिकारों की कूटनीतिक संरचना शुरु कर दी । परिवार के अलग अलग अधिकारों की संवैधानिक मान्यता का कुचक्र रचा गया। इस कुचक्र का ही नाम हिन्दू समाज कुरीति निवारण प्रयत्न रखा गया।कुरीतियां मुसलमानों में अधिक थी हिन्दुओं में कम किन्तु अंग्रेजो को सिर्फ हिन्दुओं की कुरीति ही दिखी । इस उद्देश्य से हिन्दुओं की आंतरिक पारिवारिक व्यवस्था के अंदर कानूनी व्यवस्था को प्रवेश कराने का कुचक्र शुरु किया गया। कुछ सरकारी चापलूसों ने समाज सुधार की आवाजे उठाई और उन आवाजो को आधार बनाकर अंग्रेजो ने कानून बनाने शुरु कर दिये। ऐसी ही आवाज उठाने वाले चापलुसों में भीमराव अम्बेडकर का भी नाम आता है। भीमराव अम्बेडकर की स्वतंत्रता संग्राम में किसी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रही है। कुछ लोग तो ऐसा भी मानते है कि अम्बेडकर जी अप्रत्यक्ष रुप से अंग्रेजो की मदद कर रहे थे। यदि यह सच न भी हो ता इतना तो प्रत्यक्ष है कि अम्बेडकर जी हर मामले में गांधी के भी विरुद्ध रहते थे तथा सामाजिक एकता के भी। स्वतंत्रता संघर्ष के जिस कालखण्ड में सामाजिक एकता की बहुत जरुरत थी उस समय अम्बेडकर जी सामाजिक न्याय के नाम पर सामाजिक टकराव के प्रयत्न में लगे हुये थे। अम्बेडकर जी हिन्दू कुरीति निवारण की आवाज उठाते थे और अंग्रेज उस आवाज को आगे बढाते थे। वही अम्बेडकर जी जब भारत के कानून मंत्री बन गये तब उन्होने हिन्दू कोड बिल के नाम से उस आवाज को कानूनी स्वरुप देना शुरु किया। इस आवाज में उन्हें पं0 नेहरु का भरपूर सहयोग मिला। पं0 नेहरु इस तरह की तोडफोड क्यों चाहते थे यह पता नहीं है किन्तु अम्बेडकर जी के दो उद्देश्य हो सकते है या तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए आदिवासी, हरिजन, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं को मिलाकर बहुमत बनाना चाहते थे अथवा उनके अंदर हिन्दुत्व के विरुद्ध प्रतिशोध की कोई आग जल रही थी जिसके परिणामस्वरुप वे हिन्दूओं की सामाजिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न करना चाहते थे। कारण चाहे जो हो लेकिन नेहरु अम्बेडकर की जोडी अपने उद्देश्यों में हिन्दू कोड बिल के माध्यम से सफल हो गई। मैं नहीं कह सकता कि इस मामले में सरदार पटेल चुप क्यों रहे। जिस तरह करपात्री जी ने तथा संघ परिवार से जुडे समूहो ने हिन्दू कोड बिल का खुलकर विरोध किया उस विरोध में सरदार पटेल कहीं शामिल नहीं दिखे। यहाॅ तक कि राष्ट्रपति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद ने भी लीक से हटकर हिन्दू कोड बिल का विरोध किया किन्तु नेहरु अम्बेडकर के सामने वे अलग थलग कर दिये गये। मैं स्पष्ट कर दॅू कि हिन्दू कोड बिल बनाने की मांग नेहरु अम्बेडकर के द्वारा स्वतंत्रता के तत्काल बाद शुरु कर दी गई थी।
परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वाले कई कानून तो अंग्रेज धीरे धीरे लागू कर चुके थे। अंग्रेजो ने ही समाज सुधार के सारे प्रयत्न सिर्फ हिन्दुओं तक सीमित किये थे और मुसलमानों को उससे दूर रखा था। अंग्रेजो के पूर्व विवाह और विवाह विच्छेद एक सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें कानून का कोई दखल नहीं था। परिवार का आंतरिक अनुशासन परिवार के लोग मिलकर तय करते थे। पारिवारिक सम्पत्ति के मामले में भी कानून का हस्तक्षेप नहीं था। अंग्रेजो ने धीरे धीरे इन सब सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप किया और स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दू कोड बिल के माध्यम से उसको पूरा कर ही दिया गया। हिन्दू कोड बिल के नाम पर चार विशेष कानून बनाये गयेः-
1 बालक के बालिग होने की उम्र 18 वर्ष निश्चित कर दी गई। 18 वर्ष से कम उम्र का बालक परिवार का सदस्य नहीं होगा बल्कि परिवार उसका संरक्षक होगा।
2 विवाह की उम्र 18 से 21 तक की निश्चित कर दी गई। उससे कम उम्र में परिवार और समाज की सहमति से भी कोई विवाह अपराध बना दिया गया। सगोत्र विवाह को भी अपराध मान लिया गया। स्त्री और पुरुष के संबंध विच्छेद अर्थात तलाक को भी प्रतिबंधित कर दिया गया।
3 उत्तराधिकार की सामाजिक व्यवस्था को कानूनी बना दिया गया।
4 गोद लेने की प्रथा को भी कई कानूनों में जकड दिया गया। साथ ही तलाक शुदा महिलाओं के लिए अलग से गुजारा भत्ता का कानून लागू कर दिया गया।
यदि हम हिन्दू कोड बिल के इन प्रावधानों की समीक्षा करे तो सभी प्रयत्न अनावश्यक अनुचित और विघटनकारी दिखते है। कोई भी कानून समाज सुधार नहीं कर सकता क्योंकि समाज सुधार समाज का आंतरिक मामला है और वह विचार परिवर्तन से ही संभव है, कानून से नहीं। फिर भी चूॅकि अंग्रेजो की नीयत खराब थी और वे ऐसे सुधारो का श्रेय कानूनो के माध्यम से स्वयं लेना चाहते थे इसलिए उनके अप्रत्यक्ष शिष्य अम्बेडकर और नेहरु ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से उस कार्य को आगे बढाया। स्वाभाविक रुप से बालक और बालिका परिवार के सामूहिक सदस्य माने जाते थे जिनका पालन पोषण करना पूरे परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी थी। मैं नहीं समझता कि इस कार्य के लिए कानून की आवश्यकता क्यों पडी और कानून ने इसमें कितना सुधार किया। विवाह की उम्र 18 से 21 तक तय की गई। इस उम्र के बंधन ने भी अनेक समस्यायें पैदा की। बलात्कार बढे , हत्याये बढी, पारिवारिक जीवन में अविश्वास बढा । कानून ने समस्यायें बढाई अधिक और समाधान कुछ नहीं किया। हिन्दूओं पर एक पत्नी का तुगलकी फरमान लागू कर दिया गया। मैं आज तक नहीं समझ सका कि इस कानून की आवश्यकता क्या थी। कल्पना करिये कि लडकियों की संख्या 50 से अधिक होती तब ऐसी अविवाहित लडकियों के लिए इस अंधे कानून ने क्या प्रावधान रखा था। कोई महिला और पुरुष कितने लोगों से साथ आपसी संबंध बनाते है इसकी गिनती और चैकीदारी करना राज्य का काम नहीं है क्योंकि यह तो सामाजिक व्यवस्था का विषय है। सपिंड विवाह पर प्रतिबंध लगाना क्यों आवश्यक था ? जब सामाजिक मान्यता में ही सगोत्र विवाह वर्जित है इसके बाद भी यदि कोई व्यक्ति सगोत्र या सपिंड विवाह कर ले और परिवार या समाज को आपत्ति न हो तो कानून को इसमें क्यों दखल देना चाहिए। उत्तराधिकार के कानून तो कई गुना अधिक अस्पष्ट और अव्यावहारिक है। इन नासमझों ने समाज सुधार के नाम पर दहेज के लेन देन पर भी रोक लगा दी। पता नहीं इन्हें समाज की और पारिवारिक व्यवहार की इतनी भी जानकारी क्यों नहीं रही। सत्ता के नशे में चूर इन लोगों ने हिन्दू कोड बिल के नाम से ऐसे ऐसे कानून बना दिये जो आज तक समाज के लिए अव्यवस्था के आधार बने हुये है। वे नासमझ तो कन्या भ्रुण हत्या की रोकथाम के लिए भी कानून बना चुके है जबकि कन्या भ्रुण हत्या समस्या है या समाधान यह आज तक तय नहीं हो पाया है।
हम स्पष्ट देख रहे है कि महिला और पुरुष के अनुपात में महिलाओं की बढती हुई संख्या के परिणाम स्वरुप पुरुष प्रधान व्यवस्था मजबूत होती चली गई थी। पिछले 100 वर्षो से धीरे धीरे यह अनुपात बदलकर महिलाओं की घटती हुई संख्या के रुप में सामने आया है। स्पष्ट है कि इस बदलाव के कारण सभी समस्याओं का स्वरुप विपरीत हो रहा है महिलाए अपने आप सशक्त हो रही हैं। कानून इस महिला सशक्तिकरण में किसी प्रकार की कोई भूमिका अदा नहीं कर सका है। आधे से अधिक परिवारों में विवाह की कानूनी उम्र से भी बहुत अधिक की उम्र में विवाह होने लगे है। फिर भी ये कानून बनाने वाले निरंतर अपनी पीठ थपथपाते रहते है। कुत्ता किसी गांव में चलती हुई गाडी को दौडाता है और गाडी जाने के बाद पीठ थपथपाता है कि मैंने उस गाडी को दौडाकर एक खतरे से गांव को बचा लिया जबकि दुनिया जानती है कि गाडी के जाने में कुत्ते का कोई योगदान नहीं है। यदि कानून से ही सब कुछ हो सका है तो आज छोटी छोटी बच्चियों से भी बलात्कार बढने का दोष किसका? उत्तराधिकार के कानून तो और भी अधिक विवाद पैदा करने वाले है। सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक परिवर्तन का आधार है कानून नहीं । देश के सारे राजनेताओं ने एडी से लेकर चोटी तक का जोर लगा लिया कि भारत की विवाहित लडकियां अपने माता पिता से सम्पत्ति का हिस्सा लेने की आदत डालें और पिता के परिवार से विवाद पैदा करे । इन्होनें इस कुत्सित नीयत की असफलता के बाद और भी कई कडे कानून बनाये और अब भी बनाने की सोच रहे है। किन्तु धन्य है भारत की महिलाए जो आज भी लगभग इनके प्रयत्नों से मुक्त है । आज भी इक्का दुक्का महिलायें ही ऐसी मिलेंगी जो अपनी सोच में इतना पतित विचार शामिल करती हो।
जब किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरूद्ध एक मिनट भी किसी के साथ रहने के लिये बाध्य नही किया जा सकता । जब तक की उसने कोई अपराध न किया हो तब किसी को पति पत्नी के बीच सम्बंध के अनुबंध तोडने से कैसे रोका जा सकता है? किसी को किसी भी परिस्थिति मे किसी भी समझौते के अंतर्गत एक साथ रहने के लिये बाध्य नही किया जा सकता। फिर ये विवाह या तलाक छुआछुत निवारण जैसे अनावष्यक कानून क्यो बनाये जा रहे है। मेरे विचार से तो ये कानून न सिर्फ गलत है बल्कि इसके लिये कानून बनाने वाले अपराधी भी है। यदि दो व्यक्तियो के बीच कोई ऐसा समझौता होता है जो एक की स्वतंत्रता का उलंघन तब व्यवस्था ऐसे समझौते की समीक्षा कर सकती है और किसी पक्ष को दंडित कर सकती है किन्तु किसी भी परिस्थिति मे उसकी इच्छा के विरूद्ध किसी के साथ रहने या साथ रखने के लिये मजबूर नही कर सकती। यहां तक की यह अपवाद बच्चो पर भी लागु होता है। जन्म लेते ही व्यक्ति का एक स्वतंत्र अस्तित्व हो जाता है और उसके स्व निर्णय मे बाधक कोई कानुन किसी भी परिस्थिति मे नही बनाया जा सकता। स्पष्ट है कि हिन्दू कोड बिल सामाजिक सुधार के उददेश्य से ना लाकर हिन्दूओं की पारिवारिक व्यवस्था को तहस नहस करने के उददेश्य से लाया गया था। इतना अवश्य है कि परिवारों में कानून के हस्तक्षेप के कारण मुकदमें बाजी का जो अम्बार लग रहा है उसे ही यदि सफलता मान लिया जाये तो हिन्दू कोड बिल पूरी तरह सफल है। हिन्दू कोड बिल ने परिवारों के आपसी संबंधो को तोडा है। आप सोच सकते है कि यदि पति पत्नी के बीच न्याय के नाम पर अविश्वास की दीवार खडी होगी तो कैसे भविष्य में बच्चे पैदा होंगे और किस तरह उनके संस्कार होंगे। हिन्दू कोड बिल न्याय के नाम पर सिर्फ ऐसी अविश्वास की दीवार खडी करने मात्र में सक्रिय है।
इस उददेष्य में एक और गंध आती है कि यह कोड बिल हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी के अनुपात में भी बदलाव का एक प्रयत्न था। कौन नहीे जानता कि अम्बेडकर और नेहरु हिन्दूओं के लिए अधिक अच्छे भाव रखते थे या मुसलमानों के लिए। यह कोड बिल मुसलमानों पर लागू नहीं हुआ अर्थात मुसलमानों को चार शादी करने की और अपनी आबादी बढाने की पूरी स्वतंत्रता होगी किन्तु हिन्दू एक से अधिक शादी नहीं कर सकता। साफ साफ दिखता है कि ऐसा कानून बनाने वालो की नीयत में खोट था। यदि इन दोनों की महिलाओं के प्रति नीयत ठीक रहती तो ये महिला सुधार कार्यक्रम से मुस्लिम महिलाओं को बाहर नहीं करते। किन्तु इनकी निगाहे कही और थी और निषाना कही और। आज भी यह साफ दिखता है कि इस तरह के प्रयत्नों का परिणाम आबादी के अनुपात में असंतुलन के रुप में दिखा है। आदर्श स्थिति तो यह होती कि सरकार को पारिवारिक और सामाजिक मान्यताओं में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था किन्तु यदि हस्तक्षेप भी करना था तो कम से कम धर्म के नाम पर हिन्दूओं के साथ बूरा नहीं सोचना चाहिए था किन्तु इन लोगों ने किया और उसके दुष्परिणाम आज तक स्पष्ट दिख रहे है। हिन्दू कोड बिल भारत के हिन्दूओं की छाती में एक ऐसी कील की तरह चुभा हुआ है जो निरंतर दर्द पैदा कर रहा है किन्तु समाधान नहीं दिखता। अब हिन्दुओं का मात्र इतनी ही राहत दिख रही है कि अब मुसलमान भी ऐसी कील के प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा। अब सत्ता बदली है। हिन्दू कोड बिल के सरीखे ही अब मुस्लिम कोड बिल बनाने की शुरुवात हुई है। मैं समझ रहा हॅू कि अब मुस्लिम समुदाय को तीन तलाक या ऐसे ही अन्य समाज सुधार के उठाये गये कदमों से बहुत कष्ट होगा। अंधेर नगरी चैपट राजा की 70 वर्षो की कानूनी व्यवस्था में आपने बहुत माल मलाई खाई है। अब फांसी चढने की बारी है तो चिल्लाने से समाधान क्या है।
फिर भी मैं तीन तलाक या अन्य मुस्लिम कोड बिल को एक आदर्श स्थिति नहीं मानता। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि हिन्दू कोड बिल सरीखे परिवार तोडक समाज तोडक कानूनों को समाप्त कर दिया जाये। व्यक्ति एक इकाई होगा उसमें कानून के द्वारा महिला पुरुष का भेद नहीं होना चाहिए । सबके सम्पत्ति के अधिकार तथा संवैधानिक अधिकार बराबर होने चाहिए किसी के साथ कोई भेद भाव न हो । किसी की स्वतंत्रता में कानून तब तक हस्तक्षेप न करे जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। समाज एक स्वतंत्र इकाई है और उसे सबकी सहमति से सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने और करने की स्वतंत्रता हो। चाहे कोई किसी भी उम्र में विवाह करे, चाहे कोई कितना भी दहेज का लेन देन करे, चाहे कोई कितने भी विवाह करें या चाहे परिवार में पुरुष प्रधान हो या महिला। यह कानून का विषय नहीं है। इस विषय को परिवार और समाज पर छोड देना चाहिए। इस आधार पर भारत के हिन्दूओं को हिन्दू कोड बिल का विरोध करना चाहिए। मुस्लिम कोड बिल का समर्थन नहीं। मुसलमानों ने हिन्दू कोड बिल का विरोध न करके जो मूर्खता की है वह मूर्खता हिन्दूओं को नहीं करनी चाहिए और हिन्दू मुसलमान सबको मिलकर एक स्वर से धार्मिक आधार पर बनने वाले या बन चुके कानूनों को समाप्त करने की मांग करनी चाहिए।
समय आ गया है कि हम सब हिन्दू मुसलमान राजनेताओ के प्रभाव मे आकर आपस मे टकराने के अपेक्षा एक जुट होकर हिन्दूकोड बिल तथा मुस्लिम कोड बिल का विरोध करे और इस विरोध की शुरूआत मुसलमानो की ओर से होनी चाहिये। क्योकि पहली भूल भारत के मुसलमानो ने ही की है कि उन्होने हिन्दू कोड बिल का विरोध नही किया। साथ ही हिन्दुओ को भी चाहिये कि वे पूरी ताकत से हिन्दू कोड बिल सरीखे परिवार तोडक समाज तोडक कानूनो का भरपूर विरोध करे और ऐसे कानूनो से समाज को मुक्ति दिलावे।

मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 23, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-
(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार कर लिया है, जो ठीक नहीं।
(2) लोकतंत्र तानाशाही और लोकस्वराज्य अलग अलग संवैधानिक व्यवस्था होती हैं। तानाशाही में तंत्र नियंत्रित संविधान होता है तो लोकतंत्र में संविधान नियंत्रित तंत्र। लोकस्वराज्य में सभी इकाईयों के अपने अपने संविधान और अपने अपने तंत्र होते है।
(3) आदर्श स्थिति में लोक के अनुसार संविधान कार्य करता है, संविधान के अनुसार लोक नहीं। भारत में संविधान लोक को निर्देशित करता है जो गलत है।
(4) लोकतंत्र मे व्यक्ति व्यवस्था के अनुसार कार्य करता है। व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, व्यवस्था नहीं बनाता। व्यवस्था तो लोक बनाता हैं जिसके अनुसार व्यक्ति संचालित होता है। व्यक्ति किसी भी स्थिति में संचालक नहीं हो सकता।
वैसे तो पूरी दुनिया में लोकतंत्र असफल हो रहा है। भले ही किसी नये विकल्प के अभाव में उसे चलाये रखने की मजबूरी हो किन्तु भारत में तो दुनिया के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा लोकतंत्र अपना स्वरुप ही खो बैठा है। पता नहीं चलता कि भारत में संसदीय लोकतंत्र है अथवा संसदीय तानाशाही। जिस देश का संविधान तंत्र का गुलाम हो उसे लोकतंत्र कहना पूरी तरह गलत है। भारतीय संविधान पूरी तरह तंत्र का गुलाम है। यही कारण है कि भारत में व्यक्ति शक्तिशाली हो जाता है और व्यक्ति व्यवस्था का सुत्रधार भी हो जाता है। यह कैसी संवैधानिक व्यवस्था हैं। जिस देष का संविधान समाज को निर्देष देता हो उसे किसी भी रुप में लोकतंत्र नहीं कह सकते क्योकि लोक तो संविधान के माध्यम से तंत्र को निर्देष देता है और तंत्र व्यक्ति को। व्यक्ति और लोक एक दूसरे के पूरक है किन्तु एक नहीं। दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है। इसलिए आवष्यकता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में आयी कमियों को दूर करके एक नई संवैधानिक व्यवस्था का प्रारुप बने।
लम्बे समय तक चिंतन के बाद वर्षो तक प्रयत्न करके देश भर के कई सौ बुद्धिजीवियों ने रामानुजगंज में पहाडी के नीचे बैठकर नई व्यवस्था का एक प्रारुप बनाया और 4 नवंबर 1999 को राष्ट्र को समर्पित किया । इस संवैधानिक व्यवस्था के मुख्य सुझाव इस प्रकार हैं-
(1) संविधान के प्रियंबुल में सेे समानता शब्द को निकालकर स्वतंत्रता शब्द डाल दिया जाये। जब दुनियां के कोई भी दो व्यक्ति कार्य क्षमता और उपलब्धि मे एक समान नही हो सकते तब समानता शब्द भ्रामक है। संविधान मे प्रयुक्त समानता शब्द ही असमानता का मुख्य कारण है। यह शब्द ही वर्ग विद्वेष बढाता है तथा यही शब्द अधिकांश समस्याए पैदा करता है। निठल्ले लोग शब्द के कारण अपना अधिकार समझने लगते है। जबकि कमजोरो की सहायता करना मजबूतो का कर्तब्य होता है। कमजोरो का अधिकार नही।
(2) भारतीय संविधान पांच प्राथमिकताओं पर केन्द्रित हो (1) लोकस्वराज्य (2) अपराध नियंत्रण की गारंटी (3) आर्थिक असमानता में कमी (4) श्रम सम्मान वृद्धि (5) समान नागरिक संहिता। स्पष्ट है कि इन पांच प्राथमिकताओं का क्रम भी इसी तरह का होना चाहिये। किन्तु वर्तमान समय मे भारत मे सबकुछ बदला हुआ है। पांचो आधारो पर तंत्र पूरी तरह असफल है बल्कि कहा जा सकता है कि तंत्र इन समस्याओ को बढाने मे सहायक हो रहा है।
(3) भारत परिवारों का संघ होगा सिर्फ राज्यों का नहीं। इसका अर्थ हुआ कि परिवार एक रजिस्टर्ड इकाई होगी। प्रत्येक व्यक्ति को किसी परिवार का सदस्य होना अनिवार्य होगा। तभी उसे नागरिकता दी जायेगी अन्यथा वह व्यक्ति के रुप में रह सकता है और राष्ट्रीय व्यवस्था के संचालन में उसका कोई योगदान नहीं होगा। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य के साथ नही रह सकता तब उसे किसी अन्य की संवैधानिक व्यवस्था मे शामिल होने का क्यो अधिकार होना चाहिये।
(4) व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार समाप्त हो जायेगा। सम्पूर्ण सम्पत्ति परिवार की सामूहिक होगी, न कि व्यक्तिगत।
(5) व्यवस्था की इकाईयां व्यक्ति, परिवार, गांव, जिला, प्रदेष, केन्द्र के आधार पर होगी। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र, लिंग, गरीब, अमीर के आधार पर व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा। भारत सवा सौ करोड व्यक्तियों का देश होगा, परिवारों गांवो का संघ होगा, न कि धर्माे जातियों या अन्य वर्गो का। वर्ग मान्यता संवैधानिक रुप से अमान्य होगी। कानून के समक्ष प्रत्येक व्यक्ति समान होगा ।
(6) व्यवस्था दो प्रकार की होगी (1) उपर से नीचे की ओर (2) नीचे से उपर की ओर। केन्द्र सरकार के पास सिर्फ पांच विभाग होगे। सेना पुलिस वित विदेश न्याय। अन्य सारे विभाग केन्द्र सभा के पास जा सकते है। केन्द्र सरकार पांच विभागों के आधार पर उपर से नीचे तक नियंत्रित करेगी। अन्य सारे अधिकार केन्द्र सभा को नीचे की इकाईयां कभी भी दे सकती है और वापस ले सकती है।
(7) प्रत्येक इकाई को अपने इकाईगत निर्णय की असीम स्वतंत्रता होगी किन्तु कोई भी इकाई किसी अन्य इकाई्र की स्वतंत्रता में बाधा नहीं पहुंचा सकती। ऐसी बाधा अपराध माना जायेगा और केन्द्र सरकार प्रत्येक इकाई को ऐसे अपराध से सुरक्षा के लिए गारंटी देगी किन्तु केन्द्र सरकार भी किसी इकाई की इकाईगत स्वतंत्रता का उलंघन तब तक नहीं कर सकती जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। केन्द्र सरकार दो सभाओं को मिलाकर बनेगी (1) लोकसभा (2) परिवार सभा। लोकसभा का चुनाव सीधा होगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अथवा सुविधानुसार परिवार का मुखिया वोट देकर गठन करेगा। परिवार सभा परिवार से गांव जिला प्रदेश होते हुए केन्द्र सभा का निर्माण करेगी । लोकसभा स्थायी होगी और प्रतिवर्ष उसके एक बटा पांच सदस्यों का चुनाव होगा। लोकसभा कभी भंग नहीं होगी। परिवार सभा पांच वर्ष मे एक बार चुनी जायेगी।
(8) न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका का स्वरुप एक दूसरे पर सहयोग और नियंत्रण का मिला जुला होगा जैसा वर्तमान में है।
(9) केन्द्र सरकार सिर्फ सुरक्षा कर के नाम से एक टैक्स लगा सकेगी। वह टैक्स प्रत्येक परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर वार्षिक दो प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकेगा। यदि आवश्यक होगा तो न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी बनाई जा सकती है। केन्द्र सभा या केन्द्र सरकार आर्थिक असमानता और श्रम शोषण को नियंत्रित करने के लिए सम्पूर्ण कृत्रिम उर्जा का मुल्य ढाई गुना बढाकर उससे प्राप्त सम्पूर्ण धन राशि प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के हिसाब से परिवारों में बांट देगी। अन्य कोई टैक्स न केन्द्र सरकार लगा सकेगी न ही कोई अन्य। कोई भी इकाई अपने आंतरिक खर्च के लिए आपस में धन संग्रह का कोई भी तरीका लागू कर सकती है।
(10) शिक्षा स्वास्थ्य विज्ञान रेलवे पर्यावरण आदि सभी विभाग आवश्यकता नुसार नीचे की इकाईयां केन्द्र सभा को दे सकती है केन्द्र सरकार को नहीं। केन्द्र सरकार के पास सिर्फ पांच ही विभाग होंगे।
(11) प्रत्येक इकाई को अपनी इकाईगत भाषा की स्वतंत्रता होगी। केन्द्र सरकार की भाषा सिर्फ हिन्दी होगी।
(12) यदि संविधान की कोई धारा व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है तो न्यायालय उसे अवैध घोषित कर सकता है। जनहित की कोई परिभाषा न्यायालय नही कर सकता। उसकी परिभाषा या तो विधायिका कर सकती है अथवा जन स्वयं। न्यायालय किसी भी इकाई की इकाईगत स्वतंत्रता मे किसी अन्य इकाई के हस्तक्षेप को रोकने की कानून के अनुसार व्यवस्था करेगा।
(13) विदेशो से किसी प्रकार का कोई टकराव होने की स्थिति में विश्व बन्धुत्व को राष्ट्रीय अस्मिता की तुलना में अधिक महत्व दिया जायेगा।
(14) तंत्र संविधान द्वारा निर्देषित होगा। संविधान संशोधन के लिए एक अलग संविधान सभा बनायी जायेगी जिसके किसी सदस्य का तंत्र के किसी भाग से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं होगा। इस संबंध में एक सुझाव दिया गया है कि पूरे देश के 111 ऐसे लोग चुने जायेंगे जिनमें 100 डिग्री काॅलेज या उसके उपर के प्राचार्य होंगे तथा 11 ऐसे लोग होंगे जो पूर्व राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हो। इन सबका चुनाव डिग्री काॅलेज के प्रोफेसर ही कर सकेंगे। एक दुसरा सुझाव भी है कि लोक सभा के चुनाव के समय ही पांच सौ तैतालिस अन्य सदस्यो का चुनाव करके एक लोक संसद बना ली जाय जो संविधान सभा का काम करे।
मैंने बहुत संक्षेप मं प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था का प्रारुप लिखा है इसका विस्तार प्रस्तावित संविधान की पुस्तिका से मिल सकता है जिसमें पूरे संविधान को 165 अनुच्छेदों में समेटा गया है। 99 के बाद अब तक उस प्रारुप में किसी संशोधन की आवष्यकता महसूस नहीं की गई है और यह माना गया है कि उक्त संविधान के अधिकांश प्रस्ताव संवैधानिक व्यवस्था का विकल्प बनने की क्षमता रखते हैं। हम आगे भी वर्तमान संविधान और वैकल्पिक संवैधानिक व्यवस्था पर निरंतर चर्चा करते रहेंगे।
मंथन का अगला विषय ‘‘ हिन्दू कोड बिल’’ होगा।

राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी की राजनैतिक समीक्षा-बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 19, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Rahul-Gandhi-Narendra-Modi
बचपन से ही मैं राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर कांग्रेस विरोधी रहा। यह धारणा अब तक मेरी बनी हुई है। मेरे मन में यह बात भी हमेशा बनी रही कि भारत में सामाजिक चिंतन करने वालो का अभाव हो गया है और राजनैतिक दिशा में चिंतन और सक्रिय लोगों की बाढ आ गई है। सामाजिक चिंतन करने वाले तो खोजने से भी नहीं मिलते। इसलिए मैं निरंतर प्रयास करता हॅू कि सामाजिक दिशा में काम करने वाले व्यक्ति को प्राथमिकता दॅू।
गुजरात और हिमाचल के वर्तमान चुनाव संपन्न हुए । मेरी यह धारणा रही है कि नरेन्द्र मोदी वर्तमान समय में बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। इस आधार पर मैं मानता रहा कि कुछ प्रतिबद्ध भाजपा विरोधी, कुछ अल्पसंख्यक समुदाय के लोग तथा कुछ कालेधन की अर्थव्यवस्था से प्रभावित लोगों को छोडकर कोई भी तटस्थ व्यक्ति नरेन्द्र मोदी की नीतियों के विरुद्ध वोट नहीं दे सकता। इस आकलन के आधार पर मैं कह सकता हॅू कि गुजरात में कांग्रेस पार्टी को बहुत अधिक वोट मिले जो मेरी व्यक्तिगत इच्दा के विपरीत रहे। एक बार तो जब 9 बजे करीब गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस की बढत हुयी तो मैं दुखी हो गया था।
5 वर्ष पहले जब लोकसभा चुनाव शुरु भी नहीं हुए थे तभी मैंने लिखा था कि राहुल गांधी एक बहुत ही भले आदमी है। मुझे उनमें गांधी के गुण अधिक दिखे,नेहरु के कम। राहुल गांधी प्रायः झुठ नहीं बोल पाते। उनमें कुटनीतिक समझ का भी अभाव है। वे जनहित को जनप्रिय की अपेक्षा अधिक महत्व देते है। मेरी हार्दिक इच्छा थी कि राहुल गांधी राजनीति में न जाकर गांधी की दिशा में बढें मैंने इस संबंध में कई बार लेख भी लिखे और कई बार अपनी इच्छा भी व्यक्त की। यहाॅ तक कि मैंने सोनिया जी को भी अपने संदेश दिये किन्तु सोनिया जी ने राहुल की इच्छा के विरुद्ध उन्हें राजनीति में डाल दिया। अब मैं नहीं कह सकता कि राहुल गांधी राजनीति का कीचड साफ करने में सफल होंगे अथवा अरविंद केजरीवाल की तरह कीचड में ही रहने लायक स्वयं को बना लेंगे। क्या होगा यह भविष्य बतायेगा। गुजरात चुनाव से यह आभाश होता है कि राहुल गांधी अब तक अपनी शराफत पर कायम है।
कुल मिलाकर भारतीय राजनीति ठीक दिशा में जा रही है। नरेन्द्र मोदी एक सफल राजनेता के रुप में निरंतर आगे बढ रहे है। नीतिश कुमार बिल्कुल ठीक जगह पर है। राहुल गांधी भी अपनी दिशा टटोल रहे है। जिस तरह राहुल गांधी ने गुजरात में अल्पसंख्यक राजनीति को झटका दिया उससे आशा की किरण जगी है। मुझे तो लगता है कि दुखी होकर ही मणिशंकर अय्यर अथवा कपिल सिब्बल ने कुछ भिन्न सोचा होगा। कांग्रेस के एक प्रमुख कार्यकर्ता ने तो नाराज होकर राहुल गांधी के खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। इन सबसे पता चलता है कि राहुल गांधी ठीक दिशा में भी जा सकते है किन्तु उनकी राजनैतिक योग्यता कितनी विकसित होगी यह अभी पता नहीं है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी सरीखा राजनीति का सफल खिलाडी तो दूसरी तरफ राहुल गांधी सरीखा राजनीति का असफल अनाडी। दोनों मैदान में आमने सामने उतर चुके है। कांग्रेस पार्टी के खूंखार लोग राहुल गांधी के पक्ष में स्वयं को कितना बदल पायेंगे यह पता नहीं किन्तु लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, करुणा निधि सरीखे चालाक राजनेता अवष्य ही परेशान होंगे क्योंकि उन्हें न इस धडे से कोई विषेष प्रोत्साहन मिलेगा न ही उस धडे से। मैं इतना और सलाह देना चाहॅूगा कि हार्दिक ,जिग्नेश सरीखे उच्च श्रृंखल युवकों से राहुल गांधी को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि ये किसी भी दृष्टि से गंभीर लोग नहीं है। न इन्हें नैतिकता की चिंता है न इसकी कोई सामाजिक सोच है। जो लोग वर्तमान समय में इ भी एम पर सवाल उठा रहे है ऐसे लोगों से तो मुझे घृणा सी हो गई है चाहे वे अरविंद केजरीवाल सरीखे मेरे प्रिय ही क्यों न हो। इसलिए राहुल जी को ऐसे लोगों का उपयोग करने और प्रभावित न होने की कला सीखनी होगी।
अंत में मेरी इच्छा है कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी एक दूसरे के राजनीतिक विरोधी न होकर संतुलित प्रतिद्वंदिता तक सीमित हो जाये तो देश के लिए बहुत अच्छा होगा और यदि राहुल गांधी असफल होकर समाज सशक्तिकरण की दिशा में बढ जाये तब तो और भी अच्छा होगा।

Posted By: admin on December 17, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 16, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का संस्कार बन जाती है। ऐसे संस्कार जब किसी बडी इकाई की सामूहिक आदत बन जाते है तब उसे उस इकाई की संस्कृति कह दिया जाता है। धर्म और संस्कृति बिल्कुल अलग अलग विषय हैं। धर्म विज्ञान विचार मस्तिष्क नियंत्रित होता तो संस्कृति परम्परा भावना और हदय प्रधान होती है। धर्म हमेशा गुण प्रधान होता है तथा समाज के हित मेे कार्य करता है। संस्कृति किसी भी प्रकार की हो सकती है । संस्कृति पहचान प्रधान भी हो सकती है और समाज के लिए लाभदायक या हानिकारक भी हो सकती है। धर्म हमेशा सकारात्मक प्रभाव छोडता है और संस्कृति नकारात्मक भी हो सकती है।
जब समाज में कोई शब्द बहुत अधिक सम्मानजनक अर्थ ग्रहण कर लेता है तब कुछ अन्य शब्द उस शब्द के साथ घालमेल करके उसका अर्थ विकृत कर देते हैं । धर्म शब्द बहुत अधिक सम्मानजनक था तो धर्म के साथ संस्कृति का घालमेल हुआ । ये दोनों बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी समानार्थी होते चले गये। अब तो धीेरे धीरे स्थिति यहाॅ तक आ गई है कि अनेक सम्प्रदाय और संगठन भी स्वयं को धर्म कहने लग गये है और संस्कृति के साथ भी स्वयं को जोड रहे है। धर्म किसी भी परिस्थिति में संगठन नहीं हो सकता, कभी अधिकार की मांग नहीं कर सकता, मुख्य रुप से व्यक्तिगत आचरण तक सीमित होता है, अपनी कोई पृथक पहचान नहीं बनाता, धर्म किसी अन्य के साथ भेदभाव भी नहीं करता किन्तु तथाकथित धर्म सम्प्रदाय स्वयं को धर्म कहकर इन सब दुर्गुणो का धर्म में समावेश कर देता है।
कुछ हजार वर्ष पूर्व दुनिया में दो संस्कृतियां प्रमुख थी – 1 भारतीय संस्कृति 2 यहूदी संस्कृति। भारतीय संस्कृति में चार वर्ण और चार आश्रम को मुख्य आधार बनाया गया था तो यहूदी संस्कृति में धन सम्पत्ति मुख्य आधार थे। आज भी दोनों के अलग अलग लक्षण देखे जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में आई विकृतियों के सुधार स्वरुप बौद्ध और जैन संगठन अस्तित्व में आये। दूसरी ओर यहूदी संस्कृति में सुधार के लिए इसाईयत और इस्लाम आगे आये। स्वाभाविक है कि दोनों संस्कृतियों के आगे आने वाले संगठनों के भी गुण और प्रभाव अलग अलग रहे। इन सबने संगठन बनाये, विस्तार करने का प्रयास किया और धीरे धीरे स्वयं को धर्म कहना शुरु कर दिया। यहीं से संस्कृति धर्म सम्प्रदाय और संगठन का आपस में घालमेल शुरु हो गया। धर्म का वास्तविक अर्थ भी विकृत हुआ और धर्म कर्तव्य से दूर होकर अन्य अर्थो में प्रयुक्त होने लगा किन्तु यदि हम भारतीय संस्कृति से निकले बौद्ध जैन तथा यहूदी संस्कृति से निकले ईसाइयत इस्लाम की तुलना करे तो दोनों के बीच आसमान जमीन का फर्क दिखता है। भारतीय संस्कृति नुकसान सह सकती है, कर नहीं सकती है। आज भी दूुनिया में हिन्दू संस्कृति ही अकेली ऐसी संस्कृति है जिसने अपनी संगठन शक्ति में संख्यात्मक विस्तार के दरवाजे पूरी तरह बंद कर रखे है। हिन्दू संगठन, धर्म या संस्कृति में किसी अन्य को प्रवेश कराने का प्रयास वर्जित है। गुण प्रधान धर्म में कोई भी शामिल हो सकता है। दूसरी ओर इस्लाम और इसाईयत अपनी संख्यात्मक वृद्धि के लिए सभी प्रकार उचित अनुचित साधनों का प्रयोग करते है। भारतीय संस्कृति के लिए यह एकपक्षीय घोषणा उसकी मूर्खता कहीं जा सकती है किन्तु धूर्तता नहीं। यह उसके लिए गर्व करने का विषय हो सकता है शर्म करने का नहीं। इस प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्षो तक गुलामी सही है किन्तु किसी को गुलाम नहीं बनाया। इस गलती के कारण हिन्दूओं की संख्या लगातार घटती गई है किन्तु कभी कलंक का आरोप नहीं लगा । सारी दुनियां मे कोई ऐसा देश नही जहां मुसलमान दुसरो को शान्ति से रहने देते हो । इन्होने कभी सहजीवन सीखा ही नही। दूसरी ओर हिन्दू जहां भी है वहां कोई अशान्ति पैदा नही करते। यहूदी संस्कृति से निकले इस्लाम और इसाईयत को इस बात का संतोष हो सकता है कि उसने पूरी दुनिया में अपना विस्तार बढाया है। किन्तु सम्मान की दृष्टि से ये संस्कृतियाॅ भारतीय संस्कृति का मुकाबला नहीं कर सकती।
ऐसे ही संक्रमणकाल में एक साम्यवादी संस्कृति का उदय हुआ जिसने भारतीय और यहूदी संस्कृति से भी अलग जाकर अपनी भिन्न पहचान बना ली। उसका भी बहुत तेज गति से विस्तार हुआ और उतनी ही तेज गति से उसका समापन भी शुरु हो गया है। जिस गति से इस्लामिक संस्कृति ने अपना विस्तार किया है उस पर भी धीरे धीरे संकट के बादल मंडराने लगे है।
भारतीय संस्कृति मुख्य रुप से गुण प्रधान थी। लोग जिस तरह का धार्मिक आचरण करते थे, वैसी ही शिक्षा प्रारंभ से ही बच्चों को दी जाती थी। उस शिक्षा के परिणाम स्वरुप वह उन बच्चों के संस्कार बन जाती थी। वह संस्कार बढते बढते भारतीय संस्कृति के रुप में विकसित हुए जिनमें वसुदैव कुटुम्बकम कर्तव्य प्रधानता सहनशक्ति सर्वधर्म सम्भाव संतोष आदि गुण प्रमुख रहे। इसके ठीक विपरीत इस्लाम अपने बच्चो पर मदरसो के माध्यम से जिस शिक्षा का विस्तार किया वह भविष्य मे इस्लामिक संस्कृति बनकर दुनियां को अशान्त किये हुए है।
इस्लामिक संस्कृति तथा इसाई संस्कृति ने भारतीय संस्कृति पर कुछ प्रभाव डाला । भारतीय संस्कृति में भी अपनी सुरक्षा की चिंता घर करने लगी। ऐसी चिंता के परिणाम स्वरुप ही सिख समुदाय का भारत में विस्तार हुआ और वह भी धीरे धीरे सम्प्रदाय संगठन और अब अपने को धर्म कहने लग गया है। पिछले कुछ वर्षो से इसी सुरक्षा की चिंता के परिणाम स्वरुप संघ नामक संगठन का विस्तार हुआ । उसने अभी स्वयं को अलग सम्प्रदाय या धर्म तो नहीं कहा है किन्तु पूरी ताकत से भारतीय संस्कृति के मूल स्वरुप को बदलने का प्रयास कर रहा है। जो दुर्गुण विदेशी संस्कृतियों में थे उन्हीं दुगुर्णो का भारतीय संस्कृति में भी लगातार प्रवेष हो रहा है। अब धर्म का अर्थ पूजा पद्धति और पहचान तक सीमित हो रहा है। अब धर्म कर्तव्य प्रधान की जगह अधिकार प्रधान बन रहा है। अब भारतीय संस्कृति भी अपनी सख्यात्मक विस्तार की छीनाझपटी में शामिल हो रही है। अब भारतीय संस्कृति भी सहजीवन की अपेक्षा प्रतिस्पर्धा की ओर बढ रही है।
यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीय संस्कृति ठीक दिशा में जा रही है या गलत। जो भारतीय संस्कृति सहजीवन वसुधैव कुटुम्बकम सर्वधर्म समभाव के आधार पर चल रही थी अब उसमें दो स्पष्ट दुर्गुण प्रवेष कर गये है। 1 न्युनतम श्रम अधिकतम लाभ के प्रयत्न। 2 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना।
मैं मानता हॅू कि ये दोनों दुगुर्ण विदेशी संस्कृति के प्रभाव से आये या कुछ परिस्थितिवश मजबूरी से आये किन्तु आये अवश्य है।अब हिन्दू जनमानस स्वयं को इस बात के लिए तैयार करने में लगा है कि मुसलमानों को येनकेन प्रकारेण हिन्दू बनाने का प्रयास किया जाये। धार्मिक आधार पर संगठित होकर राजनैतिक शक्ति संग्रह करने की इच्छा भी बलवती होती जा रही है। धर्म तो अपना अर्थ और स्वरुप खोता ही जा रहा किन्तु संस्कृति भी धीरे धीरे विकारग्रस्त होती जा रही है। दिखता है कि हिन्दू संस्कृति अपना प्राचीन गौरवशाली इतिहास खो देगी और इस्लामिक संस्कृति को अपनी वास्तविक शक्ति का परिचय करा देगी। परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता किन्तु ऐसा होता हुआ स्पष्ट दिख रहा है।
परिस्थितियां जटिल है। किसी एक तरफ निष्कर्ष निकालना कठिन है । ऐसी परिस्थिति में गुण प्रधान धर्म का विस्तार कैसे हो? मैं तो यही सोचता हॅू कि परिस्थितियां इस्लाम को इस बात के लिए मजबूर करें कि वह विस्तारवादी संस्कृति को छोडकर सहजीवन के मार्ग पर आ जाये । साथ ही हम भारतीय संस्कृति के लोग मुसलमानों को इस बात के लिए आश्वस्त करें कि भारतीय संस्कृति अपनी मूल पहचान सहजीवन से जरा भी अलग नही होगी। जो लोग शान्ति से रहना चाहेंगे उन्हे पूरा सम्मान जनक वातावरण उपलब्ध होगा।
मंथन का अगला विषय ‘‘ नई संवैधानिक व्यवस्था का स्वरुप’’ होगा।

भारत की आर्थिक समस्या और समाधान-बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 11, 2017 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है
1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।
2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से भी सम्पन्न था। दो तीन हजार वर्षो से भारत सभी मामलो मे पीछे चला गया है।
3 राजनीति धर्म समाज सेवा आदि सभी क्षेत्रो का व्यवसायी करण हुआ है । साथ सम्पूर्ण व्यवसाय का भी राजनीतिकरण हो गया है।
4 सामाजिक समस्याओ का समाधान समाज को, आर्थिक समस्याओ का समाधान स्वतंत्र बाजार को तथा प्रशासनिक समस्याए का समाधान राज्य को करना चाहिये। राज्य को हर मामले मे हस्तक्षेप नही करना चाहिये।
दुनिया के हर क्षेत्र मे हर व्यवस्था का व्यवसायीकरण हो गया है। साथ ही हर व्यवसाय का राजनीति करण भी हुआ है। राजनीति और व्यवसाय एक दूसरे के पूरक बन गये है। राजनीति हर मामलेमे व्यवसाय को दोषी मानती है तो व्यवसाय राजनीति को । उचित होता कि दोनो अपनी अपनी सीमाओ मे रहते और किसी का उलंधन नही करते किन्तु उलंधन सारी दुनिया मे जारी है । भारत मे तो विशेष रूप से दोनो एक साथ एक दूसरे को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि लगातार समस्याए बढती जा रही हैं। भारत मे कुल मिलाकर 11 समस्याएं लगातार बढती जा रही है। उनमे पांच समस्या आपराधिक, दो अनैतिक, दो सांगठनिक और सिर्फ दो आर्थिक समस्याएं है । पांच प्रकार की आपराधिक समस्याए है 1 चोरी डकैती लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट कमतौल 4 जालसाजी धोखाधडी 5 हिंसा बल प्रयोग । ये सभी समस्याए राज्य की कम सक्रियता के कारण बढ रही है। दो नैतिक समस्याए भ्रष्टाचार और चरित्र पतन तथा दो संगठनात्मक समस्याए साम्प्रदायिकता और जातीय कटुता राज्य की अधिक संक्रियता के कारण लगातार बढ रही है। यदि राज्य नैतिक और संगठनात्मक समस्याओं से दूर होकर आपराधिक समस्याओं के समाधान मे अधिक सक्रिय हो जाये तो भारत मे समस्याए अपने आप सुलझ जायेंगी । आर्थिक समस्या भारत मे दो ही है। 1 आर्थिक असमानता 2 श्रम शोषण । तीसरी कोई आर्थिक समस्याए भारत मे नहीं है। ये दो समस्याये भी राज्य की अति सक्रियता के कारण बढी हैं। यदि राज्य इनके समाधान से स्वयं को दूर कर दे तो ये समस्या बहुत कम हो जायेंगी । राज्य इन दो समस्याओ को अप्रत्यक्ष रूप से बढाता रहता है और दूसरी ओर समाधान का नाटक भी करते रहता है।
वर्तमान राज्य की भूमिका विल्लियो के बीच बंदर के समान होती है जो हमेशा चाहता है कि बिल्लियो की रोटी कभी बराबर न हो । बंदर हमेशा रोटी को बराबर करने का प्रयास करता हुआ दिखे किन्तु होने न दे तथा छोटी रोटी वाली बिल्ली के मन मे असंतोष की ज्वाला हमेशा जलती रहे। यदि ये तीनो काम एक साथ नही होंगे तो लोकतंत्र मे बंदर भूखा ही मर जायेगा। राज्य भी ये तीनो काम हमेशा जारी रखता है। राज्य की अर्थ नीति हमेशा आर्थिक विषमता तथा श्रम शोषण को बढाते रहती है। दूसरी ओर राज्य हमेशा मंहगाई गरीबी बेरोजगारी जैसी अस्तित्वहीन समस्याओे का समाधान करते रहता है। इसके साथ ही राज्य हमेशा गरीब और अमीर के बीच असंतोष की ज्वाला को जलाकर रखना चाहता है जिससे वर्ग विद्वेष बढता रहे और राज्य उसका समाधान करता रहे। दुनियां जानती है कि भारत मे मंहगाई घट रही है, गरीबी भी घट रही है, आम लोगो का जीवन स्तर सुधर रहा है। किन्तु राज्य दोनो को जिंदा रखे हुए है। दुनियां जानती है कि श्रम और बुद्धि के बीच लगातार दूरी बढती जा रही है किन्तु भारत सरकार गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन पर भारी से भारी टैक्स लगाकर शिक्षा स्वास्थ जैसे अनेक कार्यो पर खर्च करती है। राज्य की गलत अर्थनीति के कारण पांच समस्याए वर्तमान मे दिख रही है । 1 ग्रामीण और छोटे उधोगो का बंद होकर शहरी और बडे उधोगो मे बदलना। 2 किसान आत्महत्या। 3 पर्यावरण का प्रदूषित होना । 4 आयात निर्यात का असंतुलन 5 विदेशी कर्ज का बढना। इन पांचो समस्याओ से भारत परेशान है। भारत सरकार इन समस्याओ के समाधान के लिये भी प्रयत्न कर रही है किन्तु उसके अच्छे परिणाम नही आ रहे है। दूसरी ओर आर्थिक असमानता और श्रम शोषण भी बढता जा रहा है। 70 वर्षो मे गरीब ग्रामीण श्रम जीवी छोटे किसान का जीवन स्तर दो गुना सुधरा है तो बुद्धिजीवी शहरी बडे किसान का आठ गुना और पूंजीपतियो का 64 गुना। देश की आर्थिक उन्नति का लाभ कमजोर लोगो को 1 प्रतिशत तो सम्पन्न लोगो को पंद्रह प्रतिशत तक हो रहा है। आज भी भारत मे अनेक लोग अथाह सम्पत्ति के मालिक बन गये है। तथा वे लगातार हवाई जहाज की रफतार से आगे बढ रहे है तो दूसरी ओर भारत मे बीस करोड ऐसे भी लोग है जो सरकारी आकडो के अनुसार बत्तीस रूपया प्रतिदिन से भी कम पर जीवन यापन कर रहे है। मुझे तो लगता है कि सरकार पूरी अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह स्वतंत्र कर देती तो ये 32 रूपया वाले बहुत जल्दी 100 रूपये तक पहुच जाते। हो सकता है इस आर्थिक स्वतंत्रता के परिणाम स्वरूप कुछ बुद्धि जीवियो और सम्पन्नो की वृद्धि की रफतार कुछ कम हो जाती । गरीब ग्रामीण श्रमजीवी पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना यदि बुद्धिजीवियो का षणयंत्र नही है तो और क्या है। रोटी कपडा मकान दवा जैसी मूलभूत आवश्यक वस्तुओ पर टैक्स लगाकर आवागमन को सस्ता करना सुविधाजनक बनाना यदि पूंजीपतियों का षणयंत्र नही है तो और क्या है। गांवो के पर्यावरण से मुक्त वातावरण से निकलकर शहरो के गंदे वातावरण की ओर आमलोगो को आकर्षित करना और फिर उस गंदगी को साफ करने का ढोंग करना षणयंत्र नही तो क्या है। हमारे प्रधानमंत्री मन की बात मे लोगो से माग करते है कि आप पानी बचाइये बिजली बचाईये इस बचे हुए पानी से दिल्ली और बम्बई मे कृत्रिम वर्षा कराई जायेगी । इस बची हुई बिजली से शहरो की रोषनी जगमग की जायेगी। यह प्रधान मंत्री का आहवान नाटक नही है तो क्या है। भारत मे आर्थिक समस्याए बढ नही रही है बल्कि निरंतर बढाई जा रही हैं और उसका उद्देश्य है कि बंदर रूपी राज्य भूखा न मर जाये । इसका अर्थ है कि राज्य निरंतर शक्तिशाली बना रहे और भारत की जनता राज्य आश्रित रहे। कभी समझदार नही हो जाये । राज्य लोकतांत्रिक तरीके से आर्थिक असमानता और श्रम शोषण को बढाने के लिये चार काम जोर देकर करता है। । 1 कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि न हो । 70 वर्षो मे कोई ऐसा वर्ष नही आया जब डीजल पेट्रोल बिजली केरोशिन कोयला गैस आदि की आंशिक भी मूल्य वृद्धि हुई हो। सारा देश मूल्य वृद्धि को महसूस करता है किन्तु सच्चाई यह है कि आज तक मूल्य वृद्धि हुई ही नही है। जिसे मूल्य वृद्धि कहा जाता है वह तो मूद्रा स्फीति है । जान बूझकर प्रति वर्ष घाटे का बजट बनाया जाता है जिससे प्रति वर्ष मुद्रा स्फीति बढती रहे और लोग मंहगाई मूल्य वृद्धि से अपने को परेशान समझते रहें।
2 कृत्रिम श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयत्न । राज्य प्रतिवर्ष श्रम मूल्य मे वृद्धि की घोषणा करता है। यह श्रम मूल्य वास्तविक नही होता बल्कि नकली होता है। राज्य द्वारा घोषित श्रम मूल्य जितना अधिक होता है उतनी ही वास्तव मे श्रम की मांग बाजार मे घट जाती है और वास्तविक श्रम मूल्य कम हो जाता है। राज्य इसे ही अपनी उपलब्धि मानता है। यदि राज्य श्रम मूल्य वृद्धि बंद कर दे और न्यूनतम श्रम मूल्य को इस प्रकार घोषित करे जिस तरह उसने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना घोषित की है तब तो बाजार पर अच्छा प्रभाव पडेगा । अन्यथा श्रम मूल्य वृद्धि की सरकारी योजना श्रम मूल्य वृद्धि पर हमेशा बुरा असर डालती है। राज्य निरंतर ऐसा कर रहा है।
3 शिक्षित बेरोजागर शब्द की उत्पत्ति। एक तरफ तो राज्य गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पाद पर भारी टैक्स लगाकर शिक्षा और आवागमन पर खर्च करता है तो दूसरी ओर शिक्षित बेरोजगारी को दूर करने का भी निरंतर प्रयास करता है। जबकि सच्चाई यह है कि शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार होता ही नही। श्रम जीवी के पास रोजगार का एक ही माध्यम होता है और शिक्षित व्यक्ति के पास रोजगार के लिये श्रम तो होता ही है विकल्प के रूप मे उसके पास शिक्षा का अतिरिक्त माध्यम भी होता है। इसका अर्थ हुआ कि जिसके पास शिक्षा नहीं है वही बेरोजगार हो सकता हे। जिसके पास श्रम भी है और शिक्षा भी हे वह बेरोजगार हो ही नही सकता। बुद्धिजीवियो ने बेरोजगारी की परिभाषा बदल दी। बेरोजगारी हमेशा श्रम के साथ जुडी होनी चाहिये। रोजगार की परिभाषा इस प्रकार होनी चाहिये कि न्युनतम श्रममुल्य पर योग्यता अनुसार कार्य का अभाव। एक व्यक्ति भूखा और मजबूर होने के कारण सौ रूपये मे काम कर रहा है तो सरकार उसे रोजगार प्राप्त मान लेती है। दूसरी ओर एक पढा लिखा व्यक्ति पाच सौ रूपये या 1000 रूप्ये प्रतिदिन पर भी काम करने को तैयार नही है उसे बेरोजगार माना जाता है। यह बेरोजगारी की गलत परिभाषा का परिणाम है।
4 जातीय आरक्षण। स्वतंत्रता के पूर्व बुद्धिजीवियो ने सम्पूर्ण समाज मे जन्म के आधार पर अपनी श्र्रेष्ठता को आरक्षित कर लिया था ब्राम्हण का लडका ब्राम्हण और शुद्र का लडका श्रमिक ही बनेगा। यह बाध्यकारी कर दिया गया था । इस आरक्षण ने भारी विषंगतियां पैदा की थी । स्वतंत्रता के बाद इस आरक्षण का भरपूर लाभ भी भीम राव अम्बेडकर ने उठाया । उन्होने बुद्धिजीवियो का पक्ष लेकर सवर्ण बुद्धिजीवियो और अवर्ण बुद्धिजीवियो के बीच एक समझौता करा दिया जिसका परिणाम हुआ कि श्रम बेचारा अलग थलग पड गया। आज भी 90 प्रतिशत आदिवासी हरिजन उसी प्रकार गरीब ग्रामीण श्रमजीवी का जीवन जीने के लिये मजबूर है। और बदले मे चार पांच प्रतिषत अवर्ण बुद्धिजीवी भारी उन्नती करके इन बेचारो का शोषण कर रहे है। पूरी विडम्बना है कि भारत का हर सवर्ण और अवर्ण बुद्धिजीवी भीम राव अम्बेडकर की भूरि भूरि प्रषंसा करता है क्योकि भीम राव अम्बेडकर ही अकेले ऐसे व्यक्ति हुए है जिन्होने हजारो वर्षो से चले आ रहे श्रम शोषण को संवैधानिक स्वरूप दे दिया।
मेरे विचार मे भारत की सभी आर्थिक समस्याए राज्य निर्मित है । राज्य अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह बाजार आश्रित कर दे तो ये समस्याए बहुत कम हो जायेगी। इसके साथ साथ यदि कृत्रिम उर्जा का वर्तमान मूल्य ढाई गुना बढाकर पूरी धन राशि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिमाह उर्जा सब्सीडी के रूप मे बराबर बराबर बांट दिया जाये तो दो वास्तविक समस्याए श्रम शोषण और आर्थिक असमानता भी अपने आप सुलझ जायेगी। मेरे विचार से एक अनुमान के आधार पर पांच व्यक्तियो के एक परिवार को करीब सवा लाख रूपया उर्जा सब्सीडी के रूप मे प्रतिवर्ष मिलता रहेगा । इससे श्रम मूल्य भी बढ जायेगा आर्थिक असमानता भी कम हो जायेगी तथा अन्य अनेक आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी।
मै जानता हॅू कि भारत मे सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था पर पूंजीपति और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार है। इस एकाधिकार के लिये ये दोनो राज्य का सहारा लेते है। भारत के ये बुद्धिजीवी और पूंजीपति कभी नही चाहेगे कि कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि हो क्योकि ऐसा होते ही उन्हे मंहगा श्रम खरीदना होगा। आवागमन मंहगा हो जायेगा। उन्हे शहर मे रहने मे अधिक खर्च करना पडेगा। उनकी सुविधाएं घटेंगी और उन्हे कुछ अन्य परेषानियां भी होगी। यदि बिल्लियां मजबूत होंगी तो बंदर को परेशानी होगी ही । इसलिये ये दोनो ऐसा नहीं होने देंगे यह निश्चित है और इसके अलावा इस समस्या का कोई भी अलग समाधान है भी नहीं। मै चाहता हॅू कि भारत मे आर्थिक समस्या के आर्थिक समाधाान पर एक स्वतंत्र विचार मंथन की शुरूआत हो जिससे भारत के आम जन जीवन पर बुद्धिजीवी पूंजीपति षणयंत्र के विपरीत प्रभाव से मुक्ति मिल सके।

भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 10, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है
1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।
2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से भी सम्पन्न था। दो तीन हजार वर्षो से भारत सभी मामलो मे पीछे चला गया है।
3 राजनीति धर्म समाज सेवा आदि सभी क्षेत्रो का व्यवसायी करण हुआ है । साथ सम्पूर्ण व्यवसाय का भी राजनीतिकरण हो गया है।
4 सामाजिक समस्याओ का समाधान समाज को, आर्थिक समस्याओ का समाधान स्वतंत्र बाजार को तथा प्रशासनिक समस्याए का समाधान राज्य को करना चाहिये। राज्य को हर मामले मे हस्तक्षेप नही करना चाहिये।
दुनिया के हर क्षेत्र मे हर व्यवस्था का व्यवसायीकरण हो गया है। साथ ही हर व्यवसाय का राजनीति करण भी हुआ है। राजनीति और व्यवसाय एक दूसरे के पूरक बन गये है। राजनीति हर मामलेमे व्यवसाय को दोषी मानती है तो व्यवसाय राजनीति को । उचित होता कि दोनो अपनी अपनी सीमाओ मे रहते और किसी का उलंधन नही करते किन्तु उलंधन सारी दुनिया मे जारी है । भारत मे तो विशेष रूप से दोनो एक साथ एक दूसरे को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि लगातार समस्याए बढती जा रही हैं। भारत मे कुल मिलाकर 11 समस्याएं लगातार बढती जा रही है। उनमे पांच समस्या आपराधिक, दो अनैतिक, दो सांगठनिक और सिर्फ दो आर्थिक समस्याएं है । पांच प्रकार की आपराधिक समस्याए है 1 चोरी डकैती लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट कमतौल 4 जालसाजी धोखाधडी 5 हिंसा बल प्रयोग । ये सभी समस्याए राज्य की कम सक्रियता के कारण बढ रही है। दो नैतिक समस्याए भ्रष्टाचार और चरित्र पतन तथा दो संगठनात्मक समस्याए साम्प्रदायिकता और जातीय कटुता राज्य की अधिक संक्रियता के कारण लगातार बढ रही है। यदि राज्य नैतिक और संगठनात्मक समस्याओं से दूर होकर आपराधिक समस्याओं के समाधान मे अधिक सक्रिय हो जाये तो भारत मे समस्याए अपने आप सुलझ जायेंगी । आर्थिक समस्या भारत मे दो ही है। 1 आर्थिक असमानता 2 श्रम शोषण । तीसरी कोई आर्थिक समस्याए भारत मे नहीं है। ये दो समस्याये भी राज्य की अति सक्रियता के कारण बढी हैं। यदि राज्य इनके समाधान से स्वयं को दूर कर दे तो ये समस्या बहुत कम हो जायेंगी । राज्य इन दो समस्याओ को अप्रत्यक्ष रूप से बढाता रहता है और दूसरी ओर समाधान का नाटक भी करते रहता है।
वर्तमान राज्य की भूमिका विल्लियो के बीच बंदर के समान होती है जो हमेशा चाहता है कि बिल्लियो की रोटी कभी बराबर न हो । बंदर हमेशा रोटी को बराबर करने का प्रयास करता हुआ दिखे किन्तु होने न दे तथा छोटी रोटी वाली बिल्ली के मन मे असंतोष की ज्वाला हमेशा जलती रहे। यदि ये तीनो काम एक साथ नही होंगे तो लोकतंत्र मे बंदर भूखा ही मर जायेगा। राज्य भी ये तीनो काम हमेशा जारी रखता है। राज्य की अर्थ नीति हमेशा आर्थिक विषमता तथा श्रम शोषण को बढाते रहती है। दूसरी ओर राज्य हमेशा मंहगाई गरीबी बेरोजगारी जैसी अस्तित्वहीन समस्याओे का समाधान करते रहता है। इसके साथ ही राज्य हमेशा गरीब और अमीर के बीच असंतोष की ज्वाला को जलाकर रखना चाहता है जिससे वर्ग विद्वेष बढता रहे और राज्य उसका समाधान करता रहे। दुनियां जानती है कि भारत मे मंहगाई घट रही है, गरीबी भी घट रही है, आम लोगो का जीवन स्तर सुधर रहा है। किन्तु राज्य दोनो को जिंदा रखे हुए है। दुनियां जानती है कि श्रम और बुद्धि के बीच लगातार दूरी बढती जा रही है किन्तु भारत सरकार गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन पर भारी से भारी टैक्स लगाकर शिक्षा स्वास्थ जैसे अनेक कार्यो पर खर्च करती है। राज्य की गलत अर्थनीति के कारण पांच समस्याए वर्तमान मे दिख रही है । 1 ग्रामीण और छोटे उधोगो का बंद होकर शहरी और बडे उधोगो मे बदलना। 2 किसान आत्महत्या। 3 पर्यावरण का प्रदूषित होना । 4 आयात निर्यात का असंतुलन 5 विदेशी कर्ज का बढना। इन पांचो समस्याओ से भारत परेशान है। भारत सरकार इन समस्याओ के समाधान के लिये भी प्रयत्न कर रही है किन्तु उसके अच्छे परिणाम नही आ रहे है। दूसरी ओर आर्थिक असमानता और श्रम शोषण भी बढता जा रहा है। 70 वर्षो मे गरीब ग्रामीण श्रम जीवी छोटे किसान का जीवन स्तर दो गुना सुधरा है तो बुद्धिजीवी शहरी बडे किसान का आठ गुना और पूंजीपतियो का 64 गुना। देश की आर्थिक उन्नति का लाभ कमजोर लोगो को 1 प्रतिशत तो सम्पन्न लोगो को पंद्रह प्रतिशत तक हो रहा है। आज भी भारत मे अनेक लोग अथाह सम्पत्ति के मालिक बन गये है। तथा वे लगातार हवाई जहाज की रफतार से आगे बढ रहे है तो दूसरी ओर भारत मे बीस करोड ऐसे भी लोग है जो सरकारी आकडो के अनुसार बत्तीस रूपया प्रतिदिन से भी कम पर जीवन यापन कर रहे है। मुझे तो लगता है कि सरकार पूरी अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह स्वतंत्र कर देती तो ये 32 रूपया वाले बहुत जल्दी 100 रूपये तक पहुच जाते। हो सकता है इस आर्थिक स्वतंत्रता के परिणाम स्वरूप कुछ बुद्धि जीवियो और सम्पन्नो की वृद्धि की रफतार कुछ कम हो जाती । गरीब ग्रामीण श्रमजीवी पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना यदि बुद्धिजीवियो का षणयंत्र नही है तो और क्या है। रोटी कपडा मकान दवा जैसी मूलभूत आवश्यक वस्तुओ पर टैक्स लगाकर आवागमन को सस्ता करना सुविधाजनक बनाना यदि पूंजीपतियों का षणयंत्र नही है तो और क्या है। गांवो के पर्यावरण से मुक्त वातावरण से निकलकर शहरो के गंदे वातावरण की ओर आमलोगो को आकर्षित करना और फिर उस गंदगी को साफ करने का ढोंग करना षणयंत्र नही तो क्या है। हमारे प्रधानमंत्री मन की बात मे लोगो से माग करते है कि आप पानी बचाइये बिजली बचाईये इस बचे हुए पानी से दिल्ली और बम्बई मे कृत्रिम वर्षा कराई जायेगी । इस बची हुई बिजली से शहरो की रोषनी जगमग की जायेगी। यह प्रधान मंत्री का आहवान नाटक नही है तो क्या है। भारत मे आर्थिक समस्याए बढ नही रही है बल्कि निरंतर बढाई जा रही हैं और उसका उद्देश्य है कि बंदर रूपी राज्य भूखा न मर जाये । इसका अर्थ है कि राज्य निरंतर शक्तिशाली बना रहे और भारत की जनता राज्य आश्रित रहे। कभी समझदार नही हो जाये । राज्य लोकतांत्रिक तरीके से आर्थिक असमानता और श्रम शोषण को बढाने के लिये चार काम जोर देकर करता है। । 1 कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि न हो । 70 वर्षो मे कोई ऐसा वर्ष नही आया जब डीजल पेट्रोल बिजली केरोशिन कोयला गैस आदि की आंशिक भी मूल्य वृद्धि हुई हो। सारा देश मूल्य वृद्धि को महसूस करता है किन्तु सच्चाई यह है कि आज तक मूल्य वृद्धि हुई ही नही है। जिसे मूल्य वृद्धि कहा जाता है वह तो मूद्रा स्फीति है । जान बूझकर प्रति वर्ष घाटे का बजट बनाया जाता है जिससे प्रति वर्ष मुद्रा स्फीति बढती रहे और लोग मंहगाई मूल्य वृद्धि से अपने को परेशान समझते रहें।
2 कृत्रिम श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयत्न । राज्य प्रतिवर्ष श्रम मूल्य मे वृद्धि की घोषणा करता है। यह श्रम मूल्य वास्तविक नही होता बल्कि नकली होता है। राज्य द्वारा घोषित श्रम मूल्य जितना अधिक होता है उतनी ही वास्तव मे श्रम की मांग बाजार मे घट जाती है और वास्तविक श्रम मूल्य कम हो जाता है। राज्य इसे ही अपनी उपलब्धि मानता है। यदि राज्य श्रम मूल्य वृद्धि बंद कर दे और न्यूनतम श्रम मूल्य को इस प्रकार घोषित करे जिस तरह उसने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना घोषित की है तब तो बाजार पर अच्छा प्रभाव पडेगा । अन्यथा श्रम मूल्य वृद्धि की सरकारी योजना श्रम मूल्य वृद्धि पर हमेशा बुरा असर डालती है। राज्य निरंतर ऐसा कर रहा है।
3 शिक्षित बेरोजागर शब्द की उत्पत्ति। एक तरफ तो राज्य गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पाद पर भारी टैक्स लगाकर शिक्षा और आवागमन पर खर्च करता है तो दूसरी ओर शिक्षित बेरोजगारी को दूर करने का भी निरंतर प्रयास करता है। जबकि सच्चाई यह है कि शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार होता ही नही। श्रम जीवी के पास रोजगार का एक ही माध्यम होता है और शिक्षित व्यक्ति के पास रोजगार के लिये श्रम तो होता ही है विकल्प के रूप मे उसके पास शिक्षा का अतिरिक्त माध्यम भी होता है। इसका अर्थ हुआ कि जिसके पास शिक्षा नहीं है वही बेरोजगार हो सकता हे। जिसके पास श्रम भी है और शिक्षा भी हे वह बेरोजगार हो ही नही सकता। बुद्धिजीवियो ने बेरोजगारी की परिभाषा बदल दी। बेरोजगारी हमेशा श्रम के साथ जुडी होनी चाहिये। रोजगार की परिभाषा इस प्रकार होनी चाहिये कि न्युनतम श्रममुल्य पर योग्यता अनुसार कार्य का अभाव। एक व्यक्ति भूखा और मजबूर होने के कारण सौ रूपये मे काम कर रहा है तो सरकार उसे रोजगार प्राप्त मान लेती है। दूसरी ओर एक पढा लिखा व्यक्ति पाच सौ रूपये या 1000 रूप्ये प्रतिदिन पर भी काम करने को तैयार नही है उसे बेरोजगार माना जाता है। यह बेरोजगारी की गलत परिभाषा का परिणाम है।
4 जातीय आरक्षण। स्वतंत्रता के पूर्व बुद्धिजीवियो ने सम्पूर्ण समाज मे जन्म के आधार पर अपनी श्र्रेष्ठता को आरक्षित कर लिया था ब्राम्हण का लडका ब्राम्हण और शुद्र का लडका श्रमिक ही बनेगा। यह बाध्यकारी कर दिया गया था । इस आरक्षण ने भारी विषंगतियां पैदा की थी । स्वतंत्रता के बाद इस आरक्षण का भरपूर लाभ भी भीम राव अम्बेडकर ने उठाया । उन्होने बुद्धिजीवियो का पक्ष लेकर सवर्ण बुद्धिजीवियो और अवर्ण बुद्धिजीवियो के बीच एक समझौता करा दिया जिसका परिणाम हुआ कि श्रम बेचारा अलग थलग पड गया। आज भी 90 प्रतिशत आदिवासी हरिजन उसी प्रकार गरीब ग्रामीण श्रमजीवी का जीवन जीने के लिये मजबूर है। और बदले मे चार पांच प्रतिषत अवर्ण बुद्धिजीवी भारी उन्नती करके इन बेचारो का शोषण कर रहे है। पूरी विडम्बना है कि भारत का हर सवर्ण और अवर्ण बुद्धिजीवी भीम राव अम्बेडकर की भूरि भूरि प्रषंसा करता है क्योकि भीम राव अम्बेडकर ही अकेले ऐसे व्यक्ति हुए है जिन्होने हजारो वर्षो से चले आ रहे श्रम शोषण को संवैधानिक स्वरूप दे दिया।
मेरे विचार मे भारत की सभी आर्थिक समस्याए राज्य निर्मित है । राज्य अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह बाजार आश्रित कर दे तो ये समस्याए बहुत कम हो जायेगी। इसके साथ साथ यदि कृत्रिम उर्जा का वर्तमान मूल्य ढाई गुना बढाकर पूरी धन राशि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिमाह उर्जा सब्सीडी के रूप मे बराबर बराबर बांट दिया जाये तो दो वास्तविक समस्याए श्रम शोषण और आर्थिक असमानता भी अपने आप सुलझ जायेगी। मेरे विचार से एक अनुमान के आधार पर पांच व्यक्तियो के एक परिवार को करीब सवा लाख रूपया उर्जा सब्सीडी के रूप मे प्रतिवर्ष मिलता रहेगा । इससे श्रम मूल्य भी बढ जायेगा आर्थिक असमानता भी कम हो जायेगी तथा अन्य अनेक आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी।
मै जानता हॅू कि भारत मे सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था पर पूंजीपति और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार है। इस एकाधिकार के लिये ये दोनो राज्य का सहारा लेते है। भारत के ये बुद्धिजीवी और पूंजीपति कभी नही चाहेगे कि कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि हो क्योकि ऐसा होते ही उन्हे मंहगा श्रम खरीदना होगा। आवागमन मंहगा हो जायेगा। उन्हे शहर मे रहने मे अधिक खर्च करना पडेगा। उनकी सुविधाएं घटेंगी और उन्हे कुछ अन्य परेषानियां भी होगी। यदि बिल्लियां मजबूत होंगी तो बंदर को परेशानी होगी ही । इसलिये ये दोनो ऐसा नहीं होने देंगे यह निश्चित है और इसके अलावा इस समस्या का कोई भी अलग समाधान है भी नहीं। मै चाहता हॅू कि भारत मे आर्थिक समस्या के आर्थिक समाधाान पर एक स्वतंत्र विचार मंथन की शुरूआत हो जिससे भारत के आम जन जीवन पर बुद्धिजीवी पूंजीपति षणयंत्र के विपरीत प्रभाव से मुक्ति मिल सके।

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