Lets change India
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जु...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपाल...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है। 2 समाज को एक ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...

बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 29, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक-70 सती प्रथा-बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 27, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-
1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
2 आत्महत्या प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। राज्य सहित कोई भी अन्य को इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
3 राज्य का स्वभाव होता है कि जब वह किसी समस्या का स्वतः समाधान होते देखता है तब वह श्रेय लेने के लिए कोई कानून बनाकर उसके बीच कूद पडता है।
4 भारत में वर्तमान अनेक समस्यायें अंग्रेजो द्वारा बनाई गई राजनैतिक व्यवस्था की नकल के दुष्परिणाम है।
बहुत प्राचीन समय में एक व्यवस्था के अन्तर्गत युद्ध में भी महिलाओं पर आक्रमण या हत्या सामाजिक अपराध माना जाता था दूसरी ओर युद्ध में पुरुष बडी संख्या में मारे जाते थे। परिणाम होता था कि जनसंख्या का अनुपात असंतुलित होकर पुरुषों की संख्या बहुत कम हो जाया करती थी। ऐसी परिस्थिति में स्थानीय स्तर पर कुछ कुरीतियां प्रचलित हो जाती थी जिसे एक बुरा समाधान मान लिया जाता था। ऐसी ही कुरीतियों में बहुविवाह, कन्या भ्रुण हत्या, विधवा विवाह प्रतिबंध, देवदासी प्रथा तथा सती प्रथा को भी माना जाता है। ये प्रथायें सोच समझकर किसी मान्यता प्राप्त व्यवस्थाओं के अन्तर्गत शुरु नहीं की गई किन्तु शुरु हो गई अवश्य । राजपूतों में आमतौर पर सती प्रथा को जौहर के रुप में प्रचलित थी। वैष्य समुदाय मे विशेष रूप से राजस्थान और बंगाल में यह प्रथा कुछ अधिक प्रचलित थी। राजस्थान में इस प्रथा को सामाजिक मान्यता अधिक प्राप्त थी और जोर जबरदस्ती कम, जबकि बंगाल में इस प्रथा में जोर जबरदस्ती का अधिक उल्लेख पाया जाता है।
एक सामाजिक विचारक डाॅ राममोहन राय ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। राम माहन राय का संबंध बंगाल से अधिक था और बंगाल में ही सती प्रथा में जोर जबरदस्ती भी ज्यादा होती थी इसलिए डाॅ राय को सती प्रथा उन्मूलन के लिए देश भर में अधिक समर्थन मिला। ज्यों ज्यों सती प्रथा के पक्ष में खडे कटटरपंथियों ने डाॅ राय के साथ अत्याचार शुरु किये त्यों त्यों डाॅ राय का समर्थन भी बढता चला गया। अंग्रेज सरकार भारत की सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप के अवसर खोज रही थी और उसे सती प्रथा के नाम पर ऐसा सुअवसर प्राप्त हुआ कि उसने सती प्रथा उन्मूलन कानून बनाकर उसे लागू कर दिया। इस सफलता से प्रोत्साहित होकर डाॅ राममोहन राय ने ही बहुविवाह का भी विरोध करना शुरु किया जो बाद में भारतीय कानूनों में शामिल हुआ। मेरे विचार में सती प्रथा कानून अनावश्यक था और अनावश्यक है भी। आत्महत्या किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और आत्महत्या के लिए मजबूर करना हत्या के समान अपराध। मैं नहीं समझा कि जब आत्महत्या के लिए भी मजबूर करना गंभीर अपराध था ही तब अलग से कानून बनाने की आवष्यकता क्यों हैं। जो भी व्यक्ति सती प्रथा के समर्थन मे किसी प्रकार की जोर जबरजस्ती करते थे उन पर हत्या का मुकदमा संभव था।
मैंने पढा है कि एक राजा ने प्रतीज्ञा कर ली कि वह सुर्यास्त के पहले एक किले पर कब्जा कर लेगा उसने देखा कि वह कब्जा नहीं कर पा रहा है तब उसने अपने ही क्षेत्र में एक उसी नाम का नकली किला बनवाया और उस किले पर आक्रमण करके अपनी प्रतीज्ञा को पूरी हुआ मान लिया। अंग्रेजो ने सती प्रथा का कानून क्यों बनाया और डाॅ राय ने क्यों बनवाया यह मैं नहीं कह सकता। किन्तु स्वतंत्रता के बाद इस कानून का जिस तरह उपयोग किया गया उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट दिखती है । स्वतंत्रता के बाद महिला और पुरुष का अनुपात अपने आप संतुलित होता गया और विधवा विवाह महिला उत्पीडन सती प्रथा अथवा बहुविवाह की घटनाए प्राकृतिक रुप से कम होने लगी। शायद ही दस पांच वर्षो में सती प्रथा का कोई उदाहरण मिलता हो। ज्यो ज्यों सती प्रथा समाज से बाहर होती गई त्यों त्यों भारत के राजनेताओं ने सती प्रथा कानूनों को अधिक से अधिक कठोर बल्कि कठोरतम करना शुरु कर दिया क्योंकि उददेष्य सती प्रथा को रोकना नहीं था बल्कि एक समाप्त होती प्रथा को समाप्त करने का श्रेय अपने उपर लेना था। यदि किसी भी राजनेता से स्वतंत्रता के बाद उसकी बडी सफलताओं के दस उदाहरण मांगे जाये तो ऐसे 10 में सती प्रथा उन्मूलन तथा सिर पर मैला ढोने की प्रथा का उल्लेख जरुर करते मिलेंगे। अन्य अनेक गंभीर समस्याए भले ही समाज के समक्ष बढ गई हो। समाज में हिंसा के प्रति निरंतर विश्वास बढ रहा है। सत्य के प्रति निष्ठा निरंतर घट रही है। किन्तु हमारे नेता सती प्रथा उन्मूलन और सिर पर मैला ढोने वाली प्रथा के उन्मूलन का राग आज भी आलापते मिल जायेंगे।
मेरा यह स्पष्ट मत है कि सती प्रथा न कोई आपराधिक प्रथा थी न ही उसे आपराधिक हस्तक्षेप योग्य प्रथाओं में शामिल करने की आवश्यकता थी। आपराधिक कानून इस प्रथा को कमजोर करने के लिए पर्याप्त थे अर्थात यदि कोई व्यक्ति सती प्रथा के नाम पर भी किसी को बलपूर्वक मरने के लिए मजबूर करता है तो उस पर हत्या का अपराध स्पष्ट रुप से बनता है। यदि अंग्रेजों ने कोई कानून न बनाकर इस कानून का ही सहारा लिया होता तब भी सती प्रथा का दुरुपयोग रुक जाता और सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का कलंक भी नहीं लगता। मैं स्पष्ट कर दॅू कि सती प्रथा एक गलत प्रथा थी और ऐसी गलत प्रथा का दूरुपयोग करके उसे आपराधिक स्वरुप दे दिया गया। जिसके परिणामस्वरुप राजा राम मोहन राय, जो इस्ट इंडिया कम्पनी के लिए बहुत वर्षो तक काम करते रहे, उनके प्रयास से अंग्रेजो को सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर मिला। अब तो समय आ गया है कि सरकार ऐसे ऐसे अनावष्यक कानूनों को समाप्त कर दे जो सामाजिक कुरीति निवारण के रुप में बनाये गये थे और अब उनकी समाज में कोई आवश्यकता नहीं हैं।
मंथन का अगला विषय गरीबी रेखा होगा।

Posted By: admin on January 12, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Posted By: admin on January 11, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना-बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 7, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ मान्य सिद्धान्त है।
1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।
2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पूरी तरह असत्य है ऐसी आधुनिकता भी ठीक नही। सत्य और असत्य का निर्णय विद्वानो को विचार मंथन के द्वारा करना चाहिये।

3 किसी भी यथार्थ को अंतिम सत्य कभी नही मानना और कहना चाहिये। प्रकृति मे अंतिम सत्य होता ही नही। किसी विचार को अंतिम सत्य कहकर प्रचारित करने वाले बुरी नीयत के लोग होते है।

4 प्रकृति के रहस्य असीम हैं । पुराने रहस्यो पर विज्ञान पर्दा उठाता है तो नये रहस्य उसके सामने आ जाते है।

5 भारतीय मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति जितना गंभीर विचारक होता है वह उतना ही बडा नास्तिक होता है। विचारक पूजा पाठ अथवा भक्ति और उपासना की अपेक्षा चिंतन पर अधिक जोर देते है।

6 श्रद्धा और विचार बिल्कुल अलग अलग होते है। ब्राम्हण प्रवृत्ति के लोग विचार प्रधान होते है तो अन्य तीन प्रवृत्तियो के लोग श्रद्धा प्रधान। दोनो व्यवस्था के लिये एक दूसरे के पूरक होने चाहिये।

7 विचार विहीन श्रद्धा व्यक्ति को मुर्खता की ओर बढा सकती है तो श्रद्धा विहीन विचार धूर्तता की ओर।

मै बचपन से ही आर्य समाज से जुडा रहा । प्रारंभ से ही मुझे स्वामी दयानंद के दो विचार याद रहे। 1 भूत प्रेत तंत्र मंत्र जादू टोना अस्तित्व हीन समस्याएं है। 2 प्रत्येक व्यक्ति को सत्य को ग्रहण करने तथा असत्य को छोडने के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये । इन दो बातो पर मैने बचपन से ही बहुत विचार किया कि यदि कभी मुझे स्वामी दयानंद का कोई कथन सत्य से दूर प्रतीत हो तो मै स्वामी जी के कथन को मानू अथवा अपने निष्कर्ष को । मैने इस संबंध मे बीच का मार्ग निकाला कि यदि ऐसी कोई स्थिति आती है तो मै स्वामी जी के कथन को असत्य नही कहूंगा किन्तु उसे सत्य भी न मानकर अपने निष्कर्ष को सत्य मानूगा। मै स्पष्ट कर दू कि मैने बचपन मे ही अष्टांग योग के माध्यम से बहुत आगे तक जाकर चिंतन मंथन मे क्षमता प्राप्त की थी। यदि मै 17 वर्ष की उम्र मे ही राजनीति के कीचड मे नही फंसा होता तो संभव है कि मेरी दिशा कुछ भिन्न होती।

बचपन मे ही मुझे परिवार ने यह बताया कि भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना का अस्तित्व भी है और उसका प्रभाव भी होता है। आर्य समाज ने मुझे यह बताया कि ये सब अस्तित्वहीन है और इनका कोई प्रभाव नही होता । मैने इस विषय मे अनुुसंधान शुरू किया १ मै कई माह तक श्मसान मे सोकर अनुभव करता रहा । अन्य भी कई प्रकार से मैने सत्य को खोजने के प्रयास किये। 2004 तक के पचास वर्षो तक मेरे प्रयत्न जारी रहे। इस संबंध मे मैने कई घटनाओं को प्रत्यक्ष से देखा और स्वयं अनुभव भी किये । जब भी मुझे कही भूत-प्रेत होने की सूचना मिली तो मै उस स्थान पर जाकर पूरी खोज करता रहा। न तो मुझे कभी श्मसान मे भूत-प्रेत दिखा या अनुभव हुआ न ही किसी अन्य जगह पर । अधिकांश घटनाए किसी भ्रम या जालसाजी का परिणाम सिद्ध हुई। मैने सबके सामने ऐसी जालसाजियां सिद्ध भी करके बता दिया । मै जब आपात काल मे जेल मे था तो मुझे एक जादूगर द्वारा कुछ जादू देखने को मिला । जेल मे ही मैने रिसर्च करके अपने साथियों को वे सारे खेल दिखा दिये। कई बार ऐसे भी अवसर आये, जब भूत-प्रेत पीडित व्यक्ति को मैेने मंत्र पढने का बहाना बनाकर उस पर फूक दिया तो वह व्यकित ठीक हो गया। मैने एक बार भूत-प्रेत का प्रभाव सिद्ध करने वालो को एक बहुत बडी राशि का इनाम देने की घोषणा की चुनौती दी। कई लोग आये। हजारों दर्षक एकत्रित हुए । झाड-फूक वालो ने पूरा प्रयत्न किया। किन्तु सफल नही हुए। मैने अपने शहर ही नही बल्कि आस पास के क्षेत्र तक भी किसी ऐसी जालसाजी ठगी को सफल नही होने दिया जो भूत-प्रेत जादू-टोना तंत्र मंत्र के नाम पर फैलायी जा रही हो। सिर्फ हिन्दुओ तक ही नही बल्कि मुसलमानों आदिवासियों तक मे मेरा विलक्षण प्रभाव था। आम तौर पर लोग ऐसे मामलो मे मुझसे सम्पर्क करते रहे।

इन सबके बाद भी कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिन्हे मै न तो जालसाजी ही कह सका न अप्राकृतिक ही। मैने कई बार उपर से बडे बडे पत्थर गिरते देखे। सारा दिमाग लगाने के बाद भी मुझे मानना पडा कि यह मामला भिन्न है। एक परिवार के सभी सदस्य जब घर मे प्रवेश करते थे तो चाहे बालक हो अथवा वृद्ध, वे असामान्य हो जाते थे। उनके इलाज के लिये भी मुझे असमान्य प्रयत्न करने पडे। एक दो ऐसे भी जादू मैने देखे जिन्हे मै नही समझ सका। मैने जब भूत दिखाने की चुनौती दी और ओझा लोग भूत चढाने का मंत्र पढने लगे तब जिस पर भूत चढ रहा था वह भी उसका षणयंत्र नही था। मै आज तक नही समझा कि उस पर क्या प्रभाव था, और मेरे डाटते ही वह प्रभाव कैसे समाप्त हुआ । किन्तु यह सच है कि प्रभाव था और खत्म भी हुआ। एक भूत प्रभावित व्यक्ति के दोनो कानो मे पीपल की लकडी सटाकर तथा उसके दोनो हाथो की उंगलियों के बीच लकडी लगाकर दबाते ही भूत उतारने का प्रयोग मैने किया है। वह क्या था और कैसे उतर गया यह कारण और परिणाम मै आज तक नही समझ सका । असामान्य गतिविधि के बच्चो को झाड-फूक से भी ठीक होते मैने देखा है, और उन्ही बच्चो को डाक्टर से भी ठीक होते देखा है। यदि बीमारी थी तो दूर से फूक देने से कई माह के लिये ठीक कैसे हुई यह रहस्य मै अब तक नही सुलझा सका।

लम्बे समय तक पूरे प्रयत्न के बाद भी मै निश्चित रूप से यह नही कह सका कि भूत-प्रेत शारीरिक बीमारी है या मानसिक अथवा कोई प्राकृतिक प्रकोप भी है। अन्त मे हार थक कर मैने रामानुजगंज छोडते समय यह निष्कर्ष लिखा कि प्रकृति के अनसुलझे रहस्यो को भूत और सुलझ गये रहस्य विज्ञान कहे जाते है। जब तक हसने वाली गैस का शोध नही हुआ तब तक वह चमत्कार था और बाद मे विज्ञान बन गया। हिस्टीरिया की बीमारी का भी कुछ ऐसा ही इतिहास रहा है। संभव है कि आज हम जिन घटनाओ को असमान्य मान रहे है वे भविष्य मे विज्ञान द्वारा सामान्य प्रमाणित कर दी जावे और हम उन्हे भूत-प्रेत, जादू-टोना, तंत्र-मत्र की जगह विज्ञान सम्मत घटनाए मानने लग जावे किन्तु जब तक विज्ञान प्रमाणित नही करता तब तक उन्हे किसी तर्क से असत्य सिद्ध करने का कोई औचित्य नही है। मैने रामानुजगंज मे जो प्रयोग किया उसके कारण वहां के आस पास के लोग भूत प्रेत के नाम पर होने वाले छल कपट और जालसाजी से बच गये। कुछ लोग तो यहां तक कहने लग गये कि आपका नाम बजरंग होने के कारण ही हो सकता है कि भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र आपसे डर कर दूर भागता है किन्तू मै जानता हॅू कि इस कहानी मे कोई दम नही है। फिर भी इस कथन मे कुछ सच्चाई दिखती है कि मेरे द्वारा भूत-प्रेत के अस्तित्व को अस्वीकार करने के कारण मेरा मानसिक मनोबल उंचा हैं इसलिये मै इन सबसे प्रभावित नही होता । बल्कि टकराकर इनकी पोल खोल देता हॅू। मुझे, मेरे परिवार को तथा मेरे निकट वर्ती मित्रो को यदि भूत प्रेत तंत्र मंत्र न मानने के कारण कोई सुरक्षा मिली हुई है तो फिर क्यो न अन्य लोग भी ऐसा ही प्रयास करे। न मानने वाले मानने वालो की तुलना मे अधिक संतुष्ट है। इसलिय मै समझता हूॅ कि इनके अस्तित्व के होने न होने की बहस से दूर रहते हुए इन्हे अस्वीकार कर दिया जाये।

मै पिछले साठ वर्षो के अनुभव से यह बताने की स्थिति मे हॅू कि धीरे धीरे स्वाभाविक रूप से भूत-प्रेत की घटनाएं कम हो रही है। फिछले दस पंद्रह वर्षो से मैने रामानुजगंज शहर मे पत्थर गिरने की कोई भी घटना नही देखी। किसी व्यक्ति को भूत लगे ऐसी घटनाए भी बहुत ही कम हो गयी है। क्या प्रभाव है और क्यो भूत-प्रेत कम हो रहे है। यह समझ पाना मेरे बस की बात नही। किन्तु भूत प्रेत के नाम पर आज भी धूर्तो और ठगो का बाजार बंद नही हुआ है।

मै अब तक नही कह पा रहा हॅू कि भूत प्रेत का अस्तित्व है या नही । किन्तु मेरी एक सलाह अवश्य है कि हम अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन मे भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र के अस्तित्व को बिल्कुल स्वीकार न करे। किन्तु यदि कोई अन्य ऐसा मानता है तो हम उसके समक्ष ऐसा कोई दावा भी न करे कि वह झुठ बोल रहा है अथवा ऐसी घटनाए असत्य है। क्योकि असत्य कह देने मात्र से कोई बात असत्य नही हो जाती । यदि किसी व्यक्ति को किसी बीमारी का भूत प्रेत से इलाज कराने पर विश्वास हो तो उसे हम समझा सकते है कि वह ऐसा न करे और डा0 से इलाज करावे। किन्तु हम उसे जोर देकर न कहे अथवा कानून द्वारा उसे रोकने का प्रयास न करे तो अच्छा होगा। कई लोग अंध श्र्रद्धा उन्मूलन का अच्छा कार्य कर रहे है इस तरह वैचारिक धरातल पर इन घटनाओ को चुनौती दी जा सकती है। और दी जानी चाहियें किन्तु तोड मरोड कर या कुतर्क के माध्यम से मै भूत प्रेत तंत्र मंत्र को भ्रम सिद्ध करने पर अधिक जोर देने के पक्ष मे नही हूॅ । मै चाहता हॅू कि विज्ञान निरंतर आगे बढकर ऐसे अंघ विष्वास की पोल खोलता जाए जिससे हम प्रकृति के अनसुलझे रहस्यो को वैज्ञानिक घरातल पर सुलझाने मे सफल हो सके।

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal