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ज्ञानोत्सव 2019–बजरंग मुनि
दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-19 "भारत विभाजन भूल या मजबूरी" ........................................................................ ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन क...
ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि
दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार ............................................................. 1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर ज...
मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि
धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्त...
मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि
दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्ल...
मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इका...
मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि
ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है...
मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्व...
मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि
आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्...
मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि
आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यव...
मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...

सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 27, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

विधायिका न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव चरम पर है। दिल्ली के मुख्य मंत्री की जानकारी मे मुख्य सचिव के साथ मारपीट ने इस विवाद को सडक पर लाकर खडा कर दिया है। विवाद तो पंडित नेहरू के ही कार्यकाल से शुरू हो गया था ! जब विधायिका ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकारो का अतिक्रमण शुरू किया । लोकतंत्र मे तीनो इकाइयां समकक्ष होती है तथा तीनो एक दूसरे की सहायक भी होती है और नियंत्रक भी। विधायिका ने दादागिरी करते हुए अन्य दो को कमजोर किया । न्यायपालिका ने तो पिछले कुछ वर्षो से अपनी भी दादागिरी दिखाई। किन्तु कार्यपालिका अब भी इन दोनो के दबाव मे है। साधारण सा न्यायाधीश अपने न्यायालय मे इनके साथ जैसी भाषा का प्रयोग करता है वह अपमान जनक होती है। एक गुण्डा भी विधायक या मंत्री बन जाता है तो गर्व से कहता है कि वह जनता का चुना हुआ है अर्थात वह मालिक है तो शेष सब उसके सहायक।
पहली बार दिल्ली मे कार्यपालिका के लोगो ने विधायिका की दादागिरी के विरूद्ध मोर्चा खोला है। मै जानता हॅू कि सरकारी कर्मचारियों की छवि आम जनता के बीच नेताओ और न्यायाधीशो की तुलना मे ज्यादा खराब होती है क्योकि दोनो अपने सारे अत्याचार इन कर्मचारियों के माध्यम से ही कराते है । इसलिये सारी लूट पाट मे प्रत्यक्ष भूमिका तो इन्ही कर्मचारियों की होती है। फिर भी सैद्धान्तिक रूप से यह शुभ संकेत है कि जनता को गुलाम बनाकर रखने वाली तीनो लोकतांत्रिक इकाईयों के बीच लूट के माल के बटवारे का विवाद अब सडक पर आ गया है। सत्तर वर्षो से दो इकाइयो ने कार्यपालिका के साथ जिस तरह बटवारे मे पक्षपात किया वह अरविन्द केजरीवाल के उन्मादी स्वभाव के कारण सडक पर आ गया। इस संबंध मे कार्यपालिका की मदद होनी चाहिये। क्योकि जब तक टकराव बराबरी का नही होगा तब तक लूट का माल उसके वास्तविक मालिक अर्थात लोक के पास आना संभव नहीं।

चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 24, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम दिया जाता है जिसमे पारिवारिक व्यवस्था भी शामिल होती है। बहुत प्राचीन समय मे व्यक्ति के गुण और स्वभाव के आधार पर परीक्षाए लेकर उनके वर्ण निर्धारित करने की प्रक्रिया बताई जाती है और वर्ण के आधार पर उनका कर्म के अनुसार विभाजन करके जातियां बनती थी। इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति महत्वपूर्ण न होकर चरित्र निर्माण मे व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी । बाद मे धीरे-धीरे व्यवस्था टूटने लगी और व्यक्ति महत्वपूर्ण होने लगे। राजा का बेटा ही राजा और विद्वान का बेटा ही विद्वान घोषित होगा, चाहे उसके संस्कार कैसे भी हो, चाहे उसकी योग्यता कुछ भी क्यो न हो। परिवार का मुखिया भी मां के गर्भ से बनने लगा । इस सामाजिक विकृति के कारण अनेक प्रकर की समस्याएं पैदा हुई ।
जब कोई व्यक्ति व्यवस्था का निर्माता और संचालक साथ साथ होता है उसे तानाशाही कहते है । जब अलग अलग व्यक्ति व्यवस्था के निर्माता और संचालक होते है उसे लोकतंत्र कहते है। किन्तु जब किसी व्यवस्था से प्रभावित सभी लोग मिलकर व्यवस्था बनाते है और उस व्यवस्था के अनुसार सब लोग काम करते है, उस व्यवस्था को लोक स्वराज्य कहते है। पश्चिम के देशो मे लोक स्वराज्य और लोकतंत्र के बीच की राजनैतिक तथा पारिवारिक व्यवस्था काम करती है। भारत सहित दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की राजनैतिक व्यवस्था काम करती है। अधिकांश मुस्लिम और साम्यवादी देशों मे व्यवस्था लगभग पूरी तरह तानाशाही की ओर झुकी रहती है। भारत मे परिवारो की आंतरिक व्यवस्था मे भी तानाशाही का ही प्रभाव प्रमुख होता है। इसका अर्थ हुआ कि व्यवस्था से व्यक्ति नही चलता बल्कि व्यक्ति के अनुसार व्यवस्था चलती है। व्यक्ति के अनुसार व्यवस्था परिवारो मे भी है धार्मिक व्यवस्था मे भी है, राजनैतिक व्यवस्था मे भी है, तथा सामाजिक व्यवस्था भी इससे भिन्न नही है।
व्यक्ति दो प्रकार के होते है। 1 अच्छे 2 बुरे। आज तक दुनियां मे ऐसा कोई भौतिक मापदंड नही बना जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिम रूप से अच्छा या बुरा मान लिया जाये। इसका अर्थ हुआ कि यदि व्यक्ति ही व्यवस्था बनाने का काम करेगा तो व्यवस्था के अच्छे या बुरे होने की संभावनाए पचास पचास प्रतिशत ही होगी। क्योकि व्यवस्था बनाने वाला अच्छा आदमी होगा, इसका कोई पैमाना नही है। ऐसी अच्छी बुरी व्यवस्था मे जीने के लिये व्यक्ति समूह मजबूर होगा । इसलिये सारी दुनियां मे लगातार नैतिक पतन हो रहा है। धूर्त लोग व्यवस्था बनाने मे आगे आ जाते है। आप विचार करिये कि हजारो वर्षो से स्वामी विवेकानंद, दयानंद, चाणक्य आदि अनेक महापूरूष सामाजिक व्यवस्था बनाते रहे । आज भी अनेक महापूरूष निरंतर सामाजिक व्यवस्था बनाने मे संलग्न हैं। राजनेता भी लगातार व्यवस्था बनाते रहे है और बना रहे हैं। स्वतंत्रता के तत्काल बाद की राजनैतिक व्यवस्था मे आज की अपेक्षा कई गुना चरित्रवान लोग थे। इन सब प्रयत्नो के बाद भी व्यक्ति का चरित्र नीचे जा रहा है। यहां तक कि चरित्र निर्माण करने वाले महत्वपूर्ण लोगो का भी चरित्र का स्तर गिर रहा है। स्वाभाविक है कि यदि चरित्र निर्माण का कार्य व्यवस्था की अपेक्षा व्यक्ति करेगा तो चरित्र पतन का खतरा निरंतर बना ही रहेगा। यदि व्यक्ति चरित्र निर्माण की भूमिका मे रहेगा तो ऐसा क्या तरीका हो सकता है कि किसी अच्छे व्यक्ति को चुनकर यह दायित्व सौपा जाये? आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति को चुनने वाला व्यक्ति चुने जाने वाले से अधिक चरित्रवान होना चाहिये। किन्तु दुनियां मे ऐसा कोई तरीका न तो आज तक बन सका है न ही बन सकेगा कि सर्वोच्च चरित्रवान को चरित्र निर्माण तथा व्यवस्था बनाने के लिये किसी तरीके से चुना जाये । स्पष्ट है कि अन्ना हजारे , जय प्रकाश नारायण अथवा गांधी ने भी चरित्रवान व्यक्ति को व्यवस्था मे भेजने की वकालत की है किन्तु ये उनके व्यक्तिगत संस्कार हो सकते हैं, उचित मार्ग नही । किसी भी चुनाव द्वारा राजनैतिक प्रणाली मे अच्छे व्यक्ति को चुनकर भेजने की बात पूरी तरह गलत है। न तो कोई अच्छा व्यक्ति कभी चुना जा सकता है न ही उसका अच्छा रहना निश्चित है, तब इस अच्छे व्यक्ति को चुनने की सलाह को मृगतृष्णा से अधिक और कुछ कैसे समझा जाये । मै तो अच्छी तरह समझ चुका हॅू कि चुनाव प्रणाली मे सुधार और अच्छे लोगो को चुनने की बाते अनर्गल प्रलाप के अतिरिक्त कुछ नही है।
तंत्र से जुडे लोगो की संख्या भी सीमित होती है और शक्ति भी । यदि किसी देश मे बन चुके कानूनो की संख्या दो प्रतिशत से अधिक आबादी को प्रभावित करती है तो उक्त कानून को लागु करना कठिन होता है। ऐसे कानून समाज मे भ्रष्टाचार और चरित्र पतन के कारण बनते है। वर्तमान समय मे भारत मे निन्यानवे प्रतिशत लोग कानूनो से प्रभावित है । प्रत्येक व्यक्ति सैकडो कानूनो से प्रभावित होता है। भारत मे चरित्र पतन का मुख्य कारण कानूनो की
बेशुमार संख्या है।
कल्पना करिये की एक ट्रेन मे यात्रा के लिये आप टिकट के लिये लाइन मे खडे है। दुसरे लोग धक्का देकर या भ्रष्टाचार द्वारा टिकट पहले ले लेते है और आप वही के वही खडे है। मन मे तीन तरह के सवाल उठते है । 1 क्या मै वही खडा रहूं और अपनी बारी का इंतजार करता रहूं। 2 क्या मै भी अन्य लोगो की तरह धक्के देकर या भ्रष्टाचार से टिकट प्राप्त कर लूॅ। 3 क्या मै धक्का देने वालो को बल पूर्वक आगे बढने से रोकने का प्रयास करू। आज तक यह निर्णय नही हो सका कि कौन सा कार्य ठीक है। जो लोग चरित्र निर्माण को व्यवस्था से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते है उन्हे उत्तर देना चाहिये कि तीनो मे से कौन सा मार्ग उचित है। मेरे विचार से सिर्फ चौथा मार्ग उचित है और वह है व्यवस्था परिवर्तन । व्यवस्था व्यक्ति की नही होगी बल्कि सामूहिक होगी । सामूहिक व्यवस्था से ही व्यक्ति अपनी सीमाओ मे चलने के लिये मजबूर होगा और यदि नही होगा तो व्यवस्था द्वारा मजबूर कर दिया जायेगा।
कल्पना करिये कि मुझे प्रतिबंधित सडक से सौ फुट चलकर किसी जगह जाना है। यदि स्वीकृत सडक से जायेगे तो एक किलो मीटर की दूरी है और प्रतिबंधित सडक से बहुत नजदीक है । मै देख रहा हॅू कि अनेक लोग मेरे सामने प्रतिबंधित सडक से जाने मे पांच पांच रूपया सिपाही को घूस देकर जा रहे है। मेरे सामने संकट है कि मै क्या करू। मै देखता हॅू कि अनेक लोग गर्व से कहते है कि वे घूस नही देते जबकि मै अपने को तौलता हॅू तो पाता हॅू कि बिना घूस दिये मेरा कोई काम नही होता । गर्व करने वाले मुझे दो नम्बर का व्यक्ति कहकर आत्म संतोष कर लेते है और मै उन लोगो को अव्यावहारिक मानकर अपने उपर गर्व करता हॅू । प्रश्न उठता है कि व्यवस्था मुझे दो नम्बर का कार्य करने के लिये मजबूर कर रही है या मै स्वयं गलत हॅू। मै लम्बे समय तक राजनीति मे रहा। तीस चालीस वर्ष पूर्व राजनीति मे इमानदार लोगो का जो प्रतिशत था वह आज घट कर लगभग शून्य हो गया है। इस पतन का कारण व्यक्ति का गिरता चरित्र नही है बल्कि व्यवस्था की कमजोरियो के कारण मजबूरी है। इक्के दुक्के उच्च चरित्रवान लोग अपने चरित्र के घमंड मे ऐसे व्यावहारिक लोगो का मजाक उडाते है । यदि मुझे कोई यह कहे कि आप जैसे अच्छे चरित्रवान व्यक्ति को ऐसा दो नम्बर का काम नही करना चाहिये था तो आप सोचिये कि मै उस मुर्ख को क्या कहॅू। इसलिये मै इस नतीजे पर पहुॅचां कि व्यक्ति के चरित्र पर व्यवस्था का प्रभाव अधिक पडता है और शिक्षा प्रवचन उपदेश का कम । ये प्रवचन और उपदेश चरित्र वान लोगो को अधिक चरित्र की ओर प्रेरित कर सकते है किन्तु किसी चालाक या धूर्त को किसी तरह चरित्रवान नही बना सकते हैं बल्कि ऐसे दुश्चरित लोगो का ऐसा चरित्र वालो के उपदेश और प्रवचन मार्ग प्रशस्त करते है । यही कारण है कि आज सम्पूर्ण समाज मे चरित्र पतन की गति अधिक से अधिक तेज होती जा रही है । यदि अच्छे लोगो को व्यवस्था मे बिठाने या चुनने की अब्यावहारिक सलाह को पूरी तरह ठुकराकर व्यवस्था को ही ठीक करने का प्रयास किया जाता है तो बहुत कम समय मे चरित्र पतन को रोका जा सकता है। व्यवस्था का प्रभाव चरित्र पर पडता है चरित्र का व्यवस्था पर नही पडता । यह बात स्वीकार करनी चाहिये यह आदर्श वाक्य पूरी तरह भूल जाने की जरूरत है कि यदि अच्छा व्यक्ति सत्ता मे आयेगा तो सब ठीक कर देगा। यह सोच ही अव्यावहारिक है। इसलिये मेरे विचार से चरित्र निर्माण की अपेक्षा व्यवस्था परिवर्तन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिये ।
कुछ निष्कर्ष निकले है-
1 व्यक्ति कितना भी महत्वपूर्ण क्यो न हो किन्तु व्यवस्था से नियंत्रित ही होना चाहिये। व्यवस्था कितनी भी महत्वपूर्ण क्यो न हो किन्तु समाज से नियंत्रित ही होनी चाहिये। वर्तमान समय मे व्यवस्था समाज पर और व्यक्ति व्यवस्था पर हावी होता जा रहा है।
2 संसदीय लोकतंत्र असफल है। इसे सहभागी लोकतंत्र के रूप मे बदलना चाहिये । भारत को इस दिशा मे पहल करनी चाहिये।
3 व्यवस्था समाज के नीचे होती है। व्यवस्था व्यक्ति को नियंत्रित या निर्देषित कर सकती है किन्तु व्यक्ति समूह अर्थात समाज को नही कर सकती।
4 व्यक्ति की तीन अलग अलग भूमिकाएं होती है। जब व्यक्ति होता है तब वह स्वतंत्र होता है। जब वह नागरिक होता है तब व्यवस्था का गुलाम होता है और जब वह समूह मे होता है तब व्यवस्था का मालिक होता है। व्यक्ति को अपनी सीमाएं समझनी चाहिये।
5 संविधान तंत्र को लोक के प्रतिनिधि के रूप मे नियंत्रित करता है। संविधान संशोधन मे तंत्र का हस्तक्षेप शून्य तथा लोक का सम्पूर्ण होना चाहिये।
6 तंत्र से जुडे किसी भी व्यक्ति या समूह को स्वयं प्रबंधक ही मानना और कहना चाहिये, सरकार नहीं। सरकार तो सिर्फ समाज ही हो सकता है, समाज का प्रतिनिधि नहीं। सरकार शब्द अहंकार भरा है मालिक का बोध कराता है तथा घातक है।

7 कानूनो की मात्रा जितनी अधिक होती है चरित्र पतन भी उतना ही अधिक होता है। कानून का पालन करने वाले कानून तोडने के लिये मजबूर हो जाते है और कानून के रक्षक भ्रष्ट । बहुत थोडे से कानून रखकर अन्य सारे कानून हटा लेने चाहिये ।

मंथन क्रमांक 73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 18, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है कि बुद्धि प्रधान लोगो मे हमेशा ही श्रम का शोषण किया । वर्ण व्यवस्था को कर्म के आधार से हटाकर जन्म के आधार पर कर दिया गया और सारे सम्मान जनक कार्य अपने लिये आरक्षित कर लिये गये, चाहे योग्यता हो या न हो। विदेशो मे भी सस्ती कृत्रिम उर्जा का अविस्कार करके श्रम शोषण के अवसर खोज लिये गये । स्वतंत्रता के बाद भारत के बुद्धिजीवियो ने भी उसी का अनुसरण किया और कभी कृत्रिम उर्जा के मूल्य को नही बढने दिया। उसी तरह विदेशो की नकल करते हुए भारत मे एक शिक्षित बेरोजगारी शब्द प्रचलित कर दिया गया जिसके माध्यम से रोजगार के अवसरो मे भी बुद्धिजीवी अच्छे अवसर प्राप्त करने लग गये । इन लोगो ने शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित करने का भी पूरा प्रयत्न किया तथा गरीब ग्रामीण श्रमजीवियों के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओ पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना शुरू कर दिया। आज भी भारत का हर बुद्धिजीवी सस्ती कृत्रिम उर्जा षिक्षा पर बजट शिक्षित बेरोजगारी जैसे शब्दो का धडल्ले से प्रयोग करता है। आज भी भारत मे ऐसा कोई बुद्धिजीवी नही दिखता जो शिक्षा का बजट बढाने की बात न करता हो।
कोई भी शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार नही हो सकता। वह तो उचित रोजगार की प्रतीक्षा मे रहता है। श्रमजीवियों के पास रोजगार का एक ही माध्यम होता है शारीरिक श्रम जबकी शिक्षित व्यक्तियो के पास शारीरिक श्रम तो होता ही है साथ साथ शिक्षा उनके पास अतिरिक्त साधन के रूप मे होती है। मै आज तक नही समझा कि कोई भी व्यक्ति शिक्षित होने के बाद भी बेरोजागर कैसे हो सकता है। इन लोगो ने बेरोजगारी शब्द की भी एक नकली परिभाषा बना दी। एक भूखा व्यक्ति दो सौ रूपये मे काम करने को मजबूर है, किन्तु उसका नाम बेरोजगारो की सूची मे नही है। दूसरी ओर एक पढा लिखा व्यक्ति 200 रूपये मे काम करने को तैयार नही है। कुछ लोग तो हजार रूपये प्रतिदिन पर भी नौकरी न करके अच्छी नौकरी की खोज मे लगे रहते हैं किन्तु वे बेरोजगार की सूची मे है। विचार करिये कि ऐसे शोषक बुद्धिजीवियों को श्रमजीवी षिक्षा प्राप्त करने मे भी टैक्स दे ओर शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनके रोजगार की व्यवस्था करे किन्तु इन तथाकथित शिक्षित बेरोजगारो को कभी शर्म नही आती। और वे हमेशा समाज से और सरकार से कुछ न कुछ मांग करते रहते है।
यदि हम बेरोजगारी का सर्वेक्षण करे तो खेतो मे काम करने के लिये आदमी नही मिलते और सरकारी नौकरी के लिये इतनी भीड उमडती है क्योकि दोनो के बीच मे सुविधा और सम्मान का बहुत ज्यादा फर्क है। यही कारण है कि आज शिक्षा प्राप्त करने के लिये एंव षिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिये भाग दौड दिखाई देती है।
दुनियां मे पहली बार वर्तमान सरकारो ने इस विषय पर कुछ करने की हिम्मत दिखाई है । विहार मे नीतिश कुमार और उत्तर प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ ने परीक्षाओ मे नकल रोकने की पहल की। मै जानता हॅू कि इस पहल के विरूद्ध इन दोनो पर कितना दबाव पडा किन्तु ये अव तक अडिग है । इसी तरह पहली बार केन्द्र सरकार ने छोटे छोटे स्वतंत्र रोजगार को भी रोजगार कहने का खतरा उठाया। देश भर के बुद्धिजीवियो ने पकौडा पोलिटिक्स कहकर इस अच्छे प्रयास का मजाक भी उडाया और विरोध भी किया । ऐसा सिद्ध किया गया जैसे शिक्षित बेरोजगारो का अपमान किया जा रहा है। सच्चाई यह है कि आज तक जिस तरह लधु उद्योग और श्रम का अपमान किया जाता रहा उस अपमान पर मरहम लगाने की आवश्यकता थी। टीवी पर बहस सुनकर ऐसा लगा जैसे पकौडा बेचना बहुत नीचे स्तर का कार्य है और पकौडा बेचने वालो से टैक्स लेकर शिक्षा प्राप्त करना तथा शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिये भाग दौड करना बहुत अच्छा कार्य है। मेहनत करने वाला नीचे स्तर का आदमी है और कुर्सी पर बैठकर मेहनत करने वालो का रस चूसने वाला सम्मानित । शिक्षित बेरोजगारी के नाम पर ऐसे लोगो ने जिस तरह श्रम के साथ अन्याय किया वह बहुत ही कष्ट दायक रहा है। अब इस विषय पर कुछ सोचने की आवश्यकता है। मै तो धन्यवाद दूंगा मोदी जी को जिन्होने सारे खतरे और विरोध झेलकर भी पकौडा पोल्टिक्स का मूहतोड जबाब दिय। शिक्षित बेरोजगारी का हल्ला करने वालो का मुंह बंद हो गया।
आदर्श स्थिति यह होगी कि अब सम्पूूर्ण नीति मे बदलाव किया जाये और श्रम शोषण के सभी बुद्धिजीवी षणयंत्रो से श्रम को बचाया जाय । देश के विकास की गणना श्रम मूल्य वृद्धि के आधार पर होनी चाहिये। शिक्षा का पूरा बजट रोककर श्रमिको के साथ न्याय पर खर्च होना चाहिये। गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन, वन उत्पादन, पर से सारे टैक्स हटाकर कृत्रिम उर्जा पर लगा देनी चाहिये। जो शिक्षा प्राप्त लोग श्रमजीवियो की तुलना मे अधिक लाभ के पद पर है उन्हे अधिक टैक्स देना ही चाहिये। इसी तरह बेरोजगार की परिभाषा भी बदल देनी चाहिये। किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित न्यूनतम श्रम मूल्य पर योग्यतानुसार काम का अभाव बेरोजगारी की सही परिभाषा होती है। जो व्यक्ति न्यूनतम श्रममूल्य पर योग्यतानुसार काम नही करना चाहता वह उचित रोजगार की प्रतिक्षा मे है बेरोजगार नही। उसे प्रतिस्पर्धा के माध्यम से रोजगार की पूरी स्वतंत्रता है किन्तु उसे समाज और सरकार की दया की पात्रता नही है। श्रम के साथ अन्याय करने मे सबसे अधिक भूमिका साम्यवादियो की रही है। वे कभी कृत्रिम उर्जा का मूल्य नही बढने देते । वे कभी शिक्षित बेरोजगारी की परिभाषा नही बदलने देगे। वे कभी नही चाहते कि श्रम का मूल्य बढे । वे तो श्रम का का मूल्य इस प्रकार बढवाना चाहते है जिससे समाज मे श्रम की मांग घटे और श्रम जीवियो के हाथ से रोजगार निकल कर मषीनो के पक्षमे चला जाये। अब साम्यवाद से मुक्ति मिल रही है और साथ ही षिक्षित बेरोजगारी के बुद्धिजीवियो के षणयंत्र से भी मुक्ति मिलनी चाहिये।
मै मानता हॅू कि षिक्षा श्रम के अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु दोनो के बीच इतना असंतुलन नही होना चाहिये। शिक्षा को ज्ञान का माध्यम मानना चाहिये रोजगार का नही। शिक्षा को श्रम शोषण का आधार नही बनाया जा सकता जैसा कि आज हो रहा है। जिस तरह नौकरी की चाहत वालो ने श्रमिक रोजगार का मजाक उडाया और उसे कुछ राजनैतिक समर्थन मिला वह चिंता का विषय है। नौकर मालिक की गरीबी का पकौडा बेचने वाला कहकर मजाक उडावे यह गलत संदेष है। इस बात पर सोचा जाना चाहिये। मेरे विचार मे निम्नलिखित निष्कर्षो पर मंथन होना चाहिये।
1 प्राचीन समय से ही दुनियां मे श्रम के साथ बुद्धिजीवियो का षणयंत्र चलता रहा है । भारत मे भी निरंतर यही होता रहा है और आज भी हो रहा है। इसे बदलना चाहिये।
2 कोई भी शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार नही हो सकता क्योकि बेरोजगारी का संबंध शारीरिक श्रम से है और शिक्षित व्यक्ति के पास शारीरिक श्रम के अतिरिक्तशिक्षा भी एक अतिरिक्त माध्यम होता है।
3 गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर खर्च करना और फिर ऐसे शिक्षित लोगो को रोजगार देने का प्रयास श्रमजीवियों के साथ अन्याय है।
4 शिक्षित बेरोजगार शब्द श्रम शोषण का षणयंत्र है क्योकि इस षणयंत्र के अंतर्गत बुद्धिजीवियो ने बेरोजगारी की परिभाषा बदल दी है।
5 बेरोजगारी के अच्छी परिभाषा यह है कि किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित न्यूनतम श्रम मूल्य पर योग्यता नुसार काम का अभाव
6 शिक्षा या तो ज्ञान के लिये हे या रोजगार के लिये । यदि नौकरी के लिये होने लगे तो वह निकृष्ट प्रयत्न है।
7 दुसरो के टुकडो पर पलने वाले शिक्षार्थी तथा नौकरी मांगने वाले भिखारी स्वतंत्र श्रमिक की अवहेलना करने यह विदेशी मानसिकता है, भारतीय नही। इसे निरूत्साहित करने की आवश्यता है।
8 योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश मे कडाई से नकल रोकने तथा नरेन्द्र मोदी ने शिक्षित बेरोजगारी शब्द पर आक्रमण करके बहुत हिम्मत का काम किया है। इनका पूरा पूरा समर्थन करना चाहिये।
9 गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कृषि उत्पादन वन उत्पादन आदि से सभी टैक्स हटाकर कृत्रिम उर्जा पर लगा देनी चाहिये। साथ ही शिक्षा का बजट पूरी तरह बंद करके उसे कृषि पर खर्च करना चाहिये।

विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 10, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है
1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अनुशासन का नाम विवाह है।
2 प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है। उसकी सहमति के बिना उसकी कोई सीमा नही बनाई जा सकती। विवाह ऐसी सीमा बनाने का एक सहमत प्रयास है।
3 जब तक किसी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो पर आक्रमण न हो तब तक राज्य को उसमे कोई हस्तक्षेप नही करना चाहिये।
4 यदि किसी व्यक्ति की कोई स्वतंत्रता समाज पर दुष्प्रभाव डालती है तब समाज उसे अनुशासित कर सकता है, किन्तु बाधित नही।
5 रक्त संबंधो के शारीरिक संबंधो से संतानोत्पत्ति पूरी तरह वर्जित है। फिर भी इसे अनुशासित ही कर सकते है प्रतिबंधित नही ।
6 चार उद्देश्य के संयुक्त लाभ के लिये विवाह व्यवस्था बनाई गई है 1 इच्छा पूर्ति 2 संतानोत्पत्ति 3 सहजीवन की ट्रेनिंग 4 वृद्ध माता पिता की कर्ज मुक्ति।
7 स्वतंत्रता, उच्चश्रृखलता तथा अपराध अलग अलग होते है । स्वतंत्रता असीम होती है, उच्चश्रृखलता को समाज अनुषासित कर सकता है, तथा अपराध रोकना राज्य का दायित्व है।
रक्त संबंधो के अंतर्गत संतानेत्पत्ति को सम्पूर्ण मानव समाज मे वर्जित किया गया है। मै नही कह सकता कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक है अथवा परम्परागत । किन्तु यह प्रतिबंध सारी दुनियां मे मान्यता प्राप्त है। प्राचीन समय मे शरीर विज्ञान जितना विकसित था उस आधार पर इस मान्यता को अस्वीकार करने का कोई आधार भी नही दिखता । इसलिये आवश्यक है कि भिन्न परिवारो के लडके और लडकियां के एक साथ रहने की सामाजिक व्यवस्था की जाये । भिन्न परिवारो के स्त्री पूरूषो को एक साथ जीने की व्यवस्था ही विवाह पद्धति है। विवाह के चार लक्ष्य निर्धारित है। शारीरिक इच्छा पूर्ति 2 संतानोत्पत्ति 3 सहजीवन की ट्रेनिग 4 माता पिता से ऋण मुक्त होना। प्राचीन समय मे शारीरिक इच्छा पूर्ति की तुलना मे अन्य तीन को अधिक प्राथमिकता प्राप्त थी। किन्तु पिछले कुछ वर्षो से शारीरिक इच्छा पूर्ति को अन्य तीन की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इस बदलाव के कारण परिवार व्यवस्था भी टूट रही है तथा अनेक सामाजिक विकृतियां पैदा हो रही है। इस अव्यवस्था पूर्ण बदलाव मे साम्यवादी विचार की सबसे अधिक भूमिका पाई जाती है। जे एन यू संस्कृति उच्श्रृखलता को हमेशा प्रोत्साहित करती है। क्योकि वर्ग संघर्ष का विस्तार साम्यवाद का प्रमुख आधार है और जे एन यू संस्कृति उसकी प्रमुख संवाहक ।
पारंपरिक विवाह मे तीन का समिश्रण आवश्यक था 1 वर वधु की स्वीकृति 2 परिवार की सहमति 3 समाज की अनुमति । जब विवाह पद्धति मे कुछ विकृतियां आई और बाल विवाह को अधिक प्रोत्साहन दिया जाने लगा तब वर वधु की स्वीकृति की प्रथा बंद हो गई। यहां तक कि कई बार तो ब्राम्हण और ठाकुर ही मिलकर विवाह तय कर देते थे जिसे परिवार समाज तथा वर वधु को मानना पडता था। जब विवाह प्रणाली मे भ्रष्टाचार होने लगा तब परिवार के सदस्यो ने कमान संभाली और जब परिवार के सदस्य भी दहेज के लालच मे बेमेल विवाह कराने लगे तब यह कार्य वर वधु ने अपने हाथ मे ले लिया। किन्तु इस बदलाव के भी दुष्परिणाम देखने मे आये क्योकि अनेक मामलो मे वर वधुओ ने शारीरिक इच्छा पूर्ति को एक मात्र प्राथमिकता देनी शुरू कर दी । यह भी एक विकृति है जो बहुत जोर पकड रही है और इसके परिणाम स्वरूप समाज मे समस्याएं पैदा हो रही है। इस विकृति के कारण परिवार टूट रहे है बच्चो के संस्कार बिगड रहे है तथा वृद्ध माता पिता के साथ भी संबंध खराब हो रहे है।
यह स्पष्ट है कि वर्तमान विवाह प्रणाली बहुत दोष पूर्ण है क्योकि विवाह मे सिर्फ वर वधु ही एक साथ नही होते बल्कि दो परिवारो का मिलन होता है, तथा कुछ सामाजिक प्रभाव भी होता है । परिवार और समाज का अनुशासन पूरी तरह हट जाने से समाधान कम और समस्याए अधिक बढ रही है। फिर भी यह उचित नही होगा कि विवाह की पारंपरिक प्रणाली को ही आवश्यक कर दिया जाय। दोनो ही प्रणालियों मे अपने अपने गुण दोष है, इसलिये एक तीसरी प्रणाली को विकसित किया जाना चाहिये जिसके अनुसार वर वधु कोे विवाह मे स्वीकृति आवश्यक हो किन्तु परिवार की सहमति और सामाजिक अनुमति को भी किसी न किसी स्वरूप मे शामिल किया जाय। इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई व्यक्ति इस अनुशासन को तोडकर विवाह करता है तो ऐसे विवाह को परिवार अस्वीेकृत कर सकता है और समाज भी बहिस्कृत कर सकता है। फिर भी परिवार और समाज को किसी भी रूप मे यह अधिकार नही होगा कि वह दोनो के संबंधो मे कोई बाधा उत्पन्न कर सके। हर प्रकार को प्रेम विवाह को स्वीकृति तो देनी ही होगी । भले ही आप उसे बहिस्कृत कर सकते है। वर वधु को पति पत्नी के रूप मे रहने की स्वतंत्रता है किन्तु यह बाध्यता नही हो सकती कि माता पिता बिना सहमति के सास ससुर मान लिये जाये। इस तरह समाज का और परिवार को यह कर्तब्य होगा कि वह प्रेम विवाह को निरूत्साहित करे, प्रोत्साहित नहीं जैसा कि वर्तमान मे हो रहा है। संपिड विवाह प्रत्येक व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता है किन्तु समाज द्वारा निषिद्ध है। इसका अर्थ हुआ कि रक्त संबंधो के अंतर्गत किसी भी विवाह को पूरी तरह अमान्य का देना चाहिये, किन्तु ऐसे संबंधो केा भी आप बल पूर्वक नही रोक सकते। उन्हे आप प्राथमिकता के आधार पर बहिस्कृत ही कर सकते है। वर्तमान परम्परागत परिवार व्यवस्था संपिड संबंधो पर नियंत्रण का एक बहुत ही अच्छा तरीका है जहां भाई बहन के बीच यौन आकर्षण को भावनात्मक रूप से विकर्षण के रूप मे बदल दिया जाता है । अर्थात बचपन से ही परंपरागत रूप से व्यक्ति के स्वभाव मे ऐसी भावना शामिल हो जाती है कि वह परिवार के सदस्यो के प्रति आमतौर पर आकर्षित नही होती। बल्कि आम तौर पर विकसित होती है।
विवाह प्रणाली कैसी हो और कैसे हो यह या तो वर वधु का विषय है अथवा परिवार का या विशेष स्थिति मे समाज का । इस मामले मे किसी भी रूप मे सरकारी कानून का कोई हस्तक्षेप नही होना चाहिये।
परम्परागत विवाहो की तीन मान्यताए है। 1 हिन्दूओ मे विवाह को जन्म जन्मांतर का संबंध माना गया है, तो इसाइयों मे स्त्री पूरूष के बीच आपसी समझौता और मुसलमानो मे पूरूष द्वारा महिलाओ का उपयोग। वर्तमान दुनियां मे भारतीय परम्पराये कमजोर पड रही है तथा इस्लामिक विवाह पद्धति को अमानवीय समझा जा रहा है। परस्पर समझौता की प्रणाली की ओर सारी दुनियां बढ रही है । मेरे विचार से यह व्यवस्था कोई गलत भी नही है। जिस प्रणाली के आधार पर परिवार व्यवस्था का सुचारू संचालन हो सके उस व्यवस्था को चलने देना चाहिये चाहे वह कोई भी व्यवस्था क्यो न हो। इसके बाद भी इस्लाम की व्यवस्था पूरी तरह गलत है क्योकि उस व्यवस्था मे स्वतंत्रता और समानता को पूरी तरह एक पक्षीय तरीके से बाधित किया गया है । पद्धति चाहे कोई भी हो, किसी भी प्रकार से चले किन्तु वह व्यक्ति परिवार और समाज तक ही सीमित हो सकती है। राज्य की उसमे किसी प्रकार की कोई भूमिका नही हो सकती । भारत की परंपरागत प्रणाली मे राज्य की किसी प्रकार की कोई भूमिका थी भी नही। यह तो अंग्रेजो के आने के वाद राज्य अपनी दादागीरी करने लगा। राज्य ने इस प्रणाली मे अनावष्यक छेडछाड की, प्रतिबंध लगाये और तोडफोड पैदा की। वाल विवाह, दहेज प्रथा, वैश्यावृति नियंत्रण, बारबाला प्रतिबंध, बहु विवाह प्रतिबंध, महिला सशक्तिकरण, युवा वृद्ध सशक्तिकरण सहित ऐसे कानून बना दिये गये जिन्होने इस सामाजिक व्यवस्था को विकृत कर दिया। जब प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक स्वतंत्रता है तब पति पत्नी को अलग अलग होने से राज्य कैसे रोक सकता है। कोई भी किन्ही दो व्यक्तियो को अलग अलग होने से किसी भी कानूुन के अंतर्गत नही रोक सकता किन्तु भारत मे तलाक के लिये भी सरकार की अनुमति लेनी पडती है । दो लोग आपसी सहमति से शारिरीक संबंध बनाते है तो इसमे सरकार का हस्तक्षेप क्यो? दो लोग विवाह करने के लिये आपस मे सहमति से पैसे का लेन देन करते है तो इसमे सरकर का दखल क्यो? निकम्मी सरकारे बलात्कार तो नही रोक सकती किन्तु वेष्या जैसे घृणित कार्य को रोकने के लिये पहरा करती है। हम किस उम्र मे विवाह करते है कितने विवाह करते है, कब संबंध विच्छेद करते है अथवा हम अपने परिवार मे महिला को सशक्त रखना चाहते है या पूरूष को ये सब परिवार के आंतरिक मामले है, कानून के नही । कानून अपने दायित्व पूरे नही कर पाता और महिला पूरूष के बीच सहमत और आंतरिक संबंधो मे हस्तक्षेप करता है । किसी भी प्रकार का कोई भी सरकारी हस्तक्षेप गलत है । आज कल की सरकारे तो प्रेम विवाह तक को प्रोत्साहित कर रही हैं जो पूरी तरह गलत है। प्रेम विवाह किसी भी स्थिति मे न तो प्रोत्साहित किया जा सकता है न ही उसे कानून से रोका जा सकता है। समाज इसे बल पूर्वक रोकना चाहता है और सरकार प्रोत्साहित करती है।
मेरे विचार से विवाह प्रणाली को परिवार और समाज के साथ अनुशसित होना चाहिये । प्रेम विवाह का प्रोत्साहिन बंद होना चाहिये। विवाह तलाक दहेज जैसे किसी भी मामले मे सरकार का हस्तक्षेप बंद होना चाहिये। सहमत सेक्स प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसे किसी भी परिस्थिति मे किसी कानून अथवा बल प्रयोग द्वारा नही रोका जा सकता ऐसी सामाजिक धारणा बननी चाहिये। साथ ही यह विचार भी आना चाहिये कि परिवार व्यवस्था सहजीवन की पहली पाठशाला है। उस पाठषाला मे प्रवेश करने के लिये विवाह व्यवस्था एक अच्छा समाधान है। यह बात भी आम लोगो को समझाई जानी चाहिये । परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के प्रति जो विरोध का वातावरण राजनेताओ तथा विषेष कर वाम पंथियो द्वारा समाज मे बनाया जा रहा है इसे भी पूरी तरह रोका जाना चाहिये और हर तरह का ऐसा प्रयत्न होना चाहिये जिसमे विवाह की पवित्रता बनी रहे।
आजकल न्यायालय भी इन मामलो मे बिना सोचे समझे निर्णय कर रहे है । लिव इन रिलेशन शिप व्यक्ति की स्वतंत्रता तो है किन्तु उसे सामाजिक मान्यता नही दी जा सकती। यदि न्यायालय लिव इन रिलेशन शिप को सामाजिक मान्यता दे देते है और विवाह प्रणाली पर कानूनी प्रावधान लागु करते है तो स्वाभाविक है कि विवाह प्रणाली निरूत्साहित होगी और लिव इन रिलेशनशिप प्रोत्साहित। स्वाभाविक है कि ऐसे प्रयत्नो से प्रेम विवाह प्रोत्साहित होगे और परिवार सहमति के विवाह निरूत्साहित। खाप पंचायत के आपराधिक आदेशो को रोका जा सकता है किन्तु गिने चुने आपराधिक हस्तक्षेप को माध्यम बनाकर खाप पंचायतो के सामाजिक प्रयत्नो को नही रोका जा सकता। आज कल देखने मे आ रहा है कि भारत के न्यायालय जब मन मे आता है तब कानून का सहारा ले लेते है और जब मन मे आता तब जनहित को परिभा शित करने लग जाते है। न्यायालयो को भी इस मामलो मे और अधिक गंभीर होना चाहिये विवाह संबंध दो व्यक्तियो के संबंध है, दो परिवारो के संबंध है और समाज व्यवस्था को ठीक ढंग से विकसित करने का एक बडा माध्यम है। उससे खिलवाड करना ठीक नही।

मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 3, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।
1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तुलना मे अमीर।
2 राज्य का दायित्व सुरक्षा और न्याय तक सीमित होता है। अन्य जनकल्याणकारी कार्य राज्य के स्वैच्छिक कर्तब्य होते है, दायित्व नहीं
3 गरीबी और अमीरी शब्द का प्रचार वर्ग विद्वेश के उददेश्य से अधिक होता है, समाधान के लिये कम।
4 हर राजनेता आर्थिक समस्याओ को बहुत बढा चढाकर प्रस्तुत करता है जिससे समाज राजनैतिक असमानता के विषय मे कुछ न सोचे।
5 गरीबो की मदद करना समाज तथा राज्य का कर्तव्य होता है, गरीबो का अधिकार नही।
6. गरीब अमीर शब्द भ्रम मूलक हैं। सन्यासी या विद्वान आर्थिक मापदण्ड पर गरीब होता है और सुविधा सम्मान में अमीर।
राज्य का दायित्व होता है कि प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मे किसी को भी किसी भी परिस्थिति मे किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करने दे। किन्तु जो लोग बिल्कुल अक्षम है और किसी भी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा नही कर सकते उनकी जीवन सुरक्षा के लिये राज्य का कर्तव्य है कि वह उचित प्रबंध करे। मै स्पष्ट कर दूं कि कमजोरो की मदद करना राज्य का कर्तब्य होता है दायित्व नही । राज्य द्वारा किये गये ऐसे प्रबंध को ही गरीबी उन्मूलन कहते है। यह राज्य का स्वैच्छिक कर्तब्य होता है किन्तु राज्य इस कर्तब्य को दायित्व के समान पूरे करता है।
पूरी दुनियां मे प्रत्येक व्यक्ति के लिये गरीबी रेखा का एक निष्चित मापदंड बना हुआ है । उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम इतना भोजन अवश्य मिलना चाहिये जिससे उसे 2100 कैलोरी उर्जा मिल सके। भारत मे इस आधार पर गरीबी रेखा का न्यूनतम मापदंड 30 रूपया प्रति व्यक्ति प्रतिदिन निर्धारित किया गया है । इसका अर्थ हुआ कि यदि किसी व्यक्ति को पूरे प्रयत्न करने के बाद भी प्रतिदिन 30 रूपया से कम का भोजन प्राप्त होता है तो वह मानवीय आधार पर कम है और उसे गरीबी रेखा के नीचे मानना चाहिये। इस आधार पर यदि पूरे भारत का आकलन किया जाये तो करीब पंद्रह करोड लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है, जिन्हे सरकारी सहायता से पूरा किया जाता है। इसका आकलन इस प्रकार किया गया है कि पांच व्यक्ति के एक परिवार की आय प्रतिदिन 150 रूपया से कम है तो वह गरीबी रेखा के नीचे है क्योकि परिवार मे औसत एक व्यक्ति कमाने वाला माना जाता है।
जिस तरह किसी जीवन स्तर से नीचे वाले के लिये गरीबी रेखा बनाई गई है उसी तरह कुछ लोग अमीरी रेखा की भी मांग करते है जो पूरी तरह गलत है। अमीरी रेखा का अर्थ यदि रेखा से उपर वालो से टैक्स वसूलने तक सीमित हो तो इस तरह की कोई रेखा मानी जा सकती हेै जिसके नीचे वाले कर मुक्त और उपर वाले करदाता होगे। किन्तु ऐसी कोई अमीरी रेखा नही बनाई जा सकती है जो किसी सीमा से उपर सम्पत्ति पर रोक लगा सके। क्योकि सम्पत्ति संग्रह प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है और कोई भी अन्य उसकी स्वतंत्रता मे बाधा नही पहुंचा सकता।
समाज मे अनेक लोग ऐसे है जो निरंतर गरीबी रेखा को 30 रूपये से आगे बढाने की मांग करते है। सुनने मे तो यह मांग बहुत आकर्षक दिखती है किन्तु है बहुत घातक । सरकार के पास गरीबी रेखा के नीचे वालो की मदद के लिये कुल मिलाकर जितना धन होता है उक्त धन की मात्रा बढाये बिना गरीबी रेखा का स्तर नही बढाया जा सकता है। यदि गरीबी रेखा का स्तर 30 रूपये से अधिक कर दिया गया तो जो वास्तविक गरीब है उन्हे प्राप्त सहायता मे कटौती करनी होगी। इसलिये ऐसी मांग बिल्कुल भी उचित नही है। आज भारत मे 30 रूपये से भी कम मे जीवन यापन करने वालो की संख्या जब करोडो मे है तब बिना साधनो के जुटाए इसे 30 रूपये से आगे बढाना बिल्कुल उचित नही है। पूरे देश मे यह बात भी प्रचारित कर दी गई है कि गरीबी रेखा के नीचे वालो का अधिकार है कि वे अपने भरण पोषण के लिये सरकार से सहायता ले सके । इस प्रचार ने बहुत नुकसान किया है । एक प्रकार से छीना झपटी की स्थिति पैदा हो जाती है। न्यायालय भी हस्तक्षेप करना शुरू कर देता है। राजनीति भी सक्रिय हो जाती है । जबकि स्पष्ट है कि कमजोरो की सहायता करना मजबूतो का कर्तब्य होता है कमजोरो का अधिकार नही। फिर भी इसे कमजोरो के अधिकार के रूप मे स्थापित कर दिया गया है। एक बात और विचारणीय है कि गरीबी रेखा का अधिक उचा मापदंड बना देने के बाद उसका श्रम पर भी दुष्प्रभाव पड सकता है। इसलिये संतुलन बनाना आवश्यक होगा।
मैने गरीबी रेखा पर बहुत विचार किया। 70 वर्षो के शासन काल मे हम भारत के गरीब लोगो को इतना भी आस्वस्त नही कर सके कि उन्हे भरपेट भोजन तो मिलेगा ही । जब भारत चांद पर जा सकता है बडे बडे उद्योग लगाये जा सकते है, तकनीकी आधार पर दुनियां से प्रतिस्पर्धा की जा सकती है, तो कुछ लोगो को गरीबी रेखा से बाहर करना कोई कठिन कार्य नही है। मेरे विचार मे बुद्धिजीवी और पूंजीपति राजनेताओ के साथ मिलकर गरीबी रेखा को इसलिये समाप्त नही करना चाहते कि इसी बहाने दुनियां से भारत को भीख मिलती रहेगी तथा उनकी राजनीति भी हमेशा चलती रहेगी । गरीबी रेखा एक दिन मे समाप्त की जा सकती है। यदि गरीबी रेखा से नीचे वालो को उतनी नगद राशि की प्रतिमाह सहायता कर दी जाय जितनी उन्हे कम हो रही है और पूरा पैसा कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढाकर ले लिया जाय तो यह काम कठिन नही। यदि हम गरीबी रेखा को वर्तमान मे 50 रूपया प्रति दिन प्रतिव्यक्ति निर्धारित कर दे और उक्त सारा धन कृत्रिम उर्जा से टैक्स रूप मे ले ले तो सारी समस्या अपने आप सुलझ सकती है। एक ही दिन मे भारत गरीबी रेखा के कलंक से मुक्त हो सकता है बल्कि गरीबी रेखा अर्थात 30 रूपया की तुलना मे हम 50 रूपया प्रतिदिन उपलब्ध करा सकते है। मै आज तक नही समझा कि भारत के योजना कार ऐसा करने मे क्यो हिचकते हे। अंत मे मेरा यही सुझाव है कि गरीबी किसी भी रूप मे भारत की समस्या नही है। बल्कि उसे समस्या बनाकर देश के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
आज भारत में गरीबी अमीरी शब्द का वर्ग संघर्श के उद्देश्य से हथियार के रूप में प्रयोग हो रहा है। हर सत्ता लोलुप कभी गरीबी हटाओं का नारा लगाता है तो कोई अमीरी हटाओं का जबकि दोनों शब्द महत्व हीन हैं। कोई व्यक्ति जन्म के समय भी गरीब नहीं होता क्योंकि यदि वह अपने अतिरिक्त अंग भी बेच दे तो उसे कई लाख रूपये मिल सकते है । इसी तरह कोई व्यक्ति मरते समय भी अमीर नहीं रहता क्योकि वह कुछ भी लेकर नही जा पाता । गरीबी और अमीरी आभाशी शब्द है, यथार्थ नही । इसलिये हमारा कर्तब्य है कि हम ऐसे वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष बढाने वाले विवादित शब्दो को अनावश्यक सिद्व कर दे तथा प्रयत्न करे कि न किसी के समक्ष ऐसी मजबूरी हो न ही उसका कोई दुरूपयोग कर सके।

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