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जालसाजी धोखाधडी–बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
सामयिकी–बजरंग मुनि
जो काम जान बूझकर बुरी नीयत से किये जाये वही अपराध होते है, अन्य नही । यदि पूरे भारत की कुल आबादी का आकलन करे तो अपराधियो की संख्या एक प्रतिशत से भी कम हो सकती है। इसमे भी हिंसा और मिलावट या जालसा...
सामयिकी– कसडोल छत्तीसगढ की एक घटना के अनुसार–बजरंग मुनि
पति की प्रताडना से परेशान होकर शादीशुदा बेटी घर बैठी है। उसे ससुराल मे जलाने की कोशिश हुई तो मामला पुलिस तक और फिर कोर्ट कचहरी तक जा पहॅुचा । इसी से नाराज होकर समाज ने विवाहिता के पूरे परिवार ...
सामयिकी–बजरंग मुनि
मै एक आस्थावान हिन्दू हॅू और गांधी को स्वामी दयानंद के बाद का सर्वश्रेष्ठ महापुरूष मानता हॅू। मेरा सर्वोदय और संघ परिवार से निकट का संबंध है यद्यपि दोनो एक दूसरे के शत्रुवत है। कुछ मुददो पर ...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट–बजरंग मुनि
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
सामयिकी-बजरंग मुनि
जब कोई भौतिक पहचान ही किसी की योग्यता और श्रद्धा का मापदंड बन जाती है तब धूर्त और अपराधी उस भौतिक पहचान का सहारा लेकर अपने को आगे बढाते है। यही स्थिति राजनीति मे खादी की हुई तो धर्म मे सन्यासी ...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
सामयिकी
मै न्यायिक सक्रियता के विरूद्ध रहा हॅू। साथ साथ मै विधायिका की अति सक्रियता के भी विरूद्ध रहा हॅू। विधायिका की अति सक्रियता से परेशान न्यायपालिका ने संवैधानिक तरीके से जनहित याचिकाओ की अनु...
सामयिकी-बजरंग मुनि
निर्भया कांड के समय संभवतः मै भारत का अकेला व्यक्ति था जिसने बलात्कार के लिये कडे कानून को और कडा करने का खुला विरोध किया था। यहां तक कि मैने जस्टिस वर्मा आयोग...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?-बजरंग मुनि
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...

क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है-बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 17, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुंचाई हो। समाज को भी ऐसा अंकुश लगाने का अधिकार नहीं। किन्तु जब कोई अन्य व्यक्ति या व्यक्ति समूह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक होता है तब उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करने का दायित्व समाज का है। समाज स्वयं में एक अमूर्त इकाई होने से वह प्रत्यक्ष रूप से ऐसी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता। इसलिये समाज ऐसी सुरक्षा की गारंटी के लिये एक तंत्र की नियुक्ति करता है जिसे सरकार कहते है। यह तंत्र बहुत शक्तिशाली होता है क्योंकि उसके पास सेना, पुलिस, वित्त सहित अनेक अधिकार होते है। तंत्र उच्श्रृंखल न हो जाये इसलिये तंत्र के अधिकारों की सीमाएं निर्धारित करने के लिये समाज एक संविधान का निर्माण करता है। तंत्र स्वेच्छा से उस संविधान में कोई फेर बदल नहीं कर सकता। तंत्र स्वयं ही व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक न बन जाये अथवा तानाशाह न हो जाये इसलिये समाज संवैधानिक रूप से तंत्र की शक्तियों को तीन भागों में बाॅटकर रखता है। इन तीन भागों को विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के नाम से जाना जाता है। संविधान के अंतर्गत तीनों के अधिकार दायित्व तथा सीमाएं बराबर होती है। तीनों ही एक दूसरे के सहायक भी होते है और नियंत्रक भी। यदि कोई एक अपनी सीमाएं तोडने लगे तब अन्य दो मिलकर उस पर अंकुश लगाते है । यदि तीनों मिलकर सीमाएं तोडने लगे तब संविधान उसमे हस्तक्षेप करता है, अन्यथा नहीं।
तीनो के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। विधायिका न्याय अन्याय को परिभाषित करती है किन्तु वह किसी इकाई के न्याय अन्याय का विश्लेषण नहीं कर सकती। न्यायपालिका किसी इकाई के न्याय-अन्याय के मामले मेंविश्लेषण करके घोषित करती है, किन्तु क्रियान्वित नहीं कर सकती। विधायिका द्वारा परिभाषित और न्यायपालिका द्वारा घोशित न्याय अन्याय का क्रियान्वयन कार्यपालिका करती है। इस तरह तीनों के बीच स्पष्ट कार्य विभाजन है। साथ ही न्यायपालिका को एक विशेष अधिकार प्राप्त है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संविधान अथवा तंत्र द्वारा भी बनायी गई किसी बाधा से व्यक्ति को सुरक्षा दे सकता है। इस तरह न्यायपालिका संविधान से व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा का भी दायित्व पूरी करती है। यदि संविधान का कोई संशोधन समाज या तंत्र के द्वारा इस प्रकार किया जाता है कि वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो का उल्लंघन करता है तो न्यायपालिका पूरे विश्व समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए उक्त संशोधन को रद्द कर सकती है। इसके अतिरिक्त न्यायपालिका व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान के विरूद्ध हो तो न्यायालय उस कानून को रद्द कर सकता है। यदि कार्यपालिका किसी कानून के विरूद्ध कोई आदेश देती है तो न्यायपालिका ऐसे आदेश को भी रद्द कर सकती है। यदि कार्यपालिका का कोई व्यक्ति किसी कार्यपालिक आदेश के विरूद्ध क्रिया करता है तो न्यायपालिका ऐसी क्रिया को भी रोक सकती है । इस तरह न्यायपालिका को कुछ विशेष अधिकार दिखते है किन्तु वास्तविकता में विशेष अधिकार है नहीं, क्योंकि न्यायपालिका कोइ्र्र विधायी या कार्यपालिक आदेश नहीं दे सकती । वह तो किसी अधिकार के अतिक्रमण को रोक देने तक सीमित रहती है। अप्रत्यक्ष रूप से भी उसे वीटों पावर अर्थात निशेषाधिकार तो प्राप्त है किन्तु विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है।
स्वतंत्रता के बाद विधायिका तत्काल ही उच्श्रृंखल हो गई, क्योंकि उसने संविधान संशोधन का विशेषाधिकार अपने पास सुरक्षित कर लिया था। भारतीय लोकतंत्र में यह विशेषाधिकार समाज के पास होता है और विदेशी लोकतंत्र में आंशिक रूप से समाज की भूमिका होती है तथा साथ ही तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वतंत्रता के समय संविधान बनाने वालो ने भारतीय संविधान बनाते समय बुरी नीयत से संविधान संशोधन के अधिकार से समाज को पूरी तरह अलग कर दिया और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका को भी किनारे करते हुए सारे अधिकार अपने पास समेट लिये। अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका तानाशाह बन गई और उसने स्वतंत्रता के प्रारंभ से ही इस अधिकार का खुला दुरूपयोग किया। पंडित नेहरू तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जो लोकतंत्र का मुखौटा पहने हुए थे। उन्होंने सन् 50 में ही न्यायपालिका के पंख कतरने शुरू कर दिये जिसे बाद मे उनकी तानाशाह बेटी इंन्दिरा ने राष्ट्रपति अर्थात कार्यपालिका के पंख कतरकर पूरा किया। इस तरह सारी शक्ति विधायिका के पास आ गई। इस शक्ति के एकत्रीकरण के विरूद्ध कार्यपालिका आज तक उसी स्थिति में है किन्तु न्यायपालिका ने संविधान के विरूद्ध जाकर केशवानंद भारती प्रकरण में अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने की शुरूआत की । जब इंदिरा गांधी के बाद विधायिका का एक क्षत्र शासन कमजोर होने लगा तब न्यायपाकिा और मजबूत होने लगी। धीरे-धीरे विधायिका इतनी कमजोर हो गई कि न्यायपालिका के मन मे भी सर्वोच्चता की भूख पैदा हुई और 1995 के आस पास उसने संविधान की मनमानी व्याख्या करके अपनी तानाशाही की शुरूआत कर दी। काॅलेजियम सिस्टम एक ऐसी ही शुरूआत थी। बदनाम विधायिका और कमजोर कार्यपालिका मुकाबला नहीं कर सकी और न्यायपालिका अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करती रही । स्थिति यहां तक आई कि विधायिका की तुलना मे न्यायपालिका के भ्रष्टाचार की अधिक चर्चा होने लगी । किन्तु स्वाभाविक है कि भ्रष्ट दुकानदार किसी भी संभावित बदनाम से नहीं डरता। न्यायपालिका भी ऐसे ही दुकानदार के समान सारी बदनामी झेलते हुए भी ढीठ बनी हुई है। अब परिस्थितियां बदली और नरेन्द्र मोदी ने आने के बाद न्यायपालिका को अपनी औकात में रहने का सबक सिखाना शुरू कर दिया। अब फिर विधायिका अपना रंग दिखा सकती है
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विधायिका और न्यायपालिका मे से क्या कोई सर्वोच्च है और क्या कोई सर्वोच्च हो सकता है लोकतंत्र मे लोक सर्वोच्च होता है, तंत्र नहीं क्योंकि लोक नियुक्त करता है और तंत्र नियुक्त होता है । सिद्धान्त रूप से इन सब में किसी को सर्वोच्च नहीं होना चाहिये और यदि तीनो एक साथ जुट जाये तब भी वे सर्वोच्च नही हो सकते क्योकि संविधान इन सबसे उपर होता है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर इन तीनों नें एकजुट होकर भारतीय संविधान पर अपना नियंत्रण कर लिया और उस आधार पर इन नकली समूहों ने अपने को सरकार कह दिया। संविधान पर नियंत्रण जिसका होगा वही सर्वोच्च होगा । क्योकि लोकतंत्र और तानाशाही मे सिर्फ एक ही फर्क होता है कि लोकतंत्र मे संविधान का शासन होता है तो तानाशाही मे शासन का संविधान । स्पष्ट है कि वर्तमान समय मे लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही चल रही है। क्योकि संविधान तंत्र के नियंत्रण मे है । यदि संविधान पर ही तंत्र का नियंत्रण समाप्त होकर लोक का नियंत्रण हो जाये तो सर्वोच्चता का विवाद सदा के लिये समाप्त हो सकता है। सिद्धान्त रूप से तो यही घोषित है कि लोक ही सर्वोच्च है किन्तु व्यवहारिक धरातल पर न्यायपालिका और विधायिका ने व्यक्ति को अक्षम अयोग्य घोषित करके स्वयं को संरक्षक बता दिया है और संविधान पर अपना नियंत्रण कर लिया है। अच्छा होगा कि इस विवाद को सदा के लिये समाप्त कर दे। इस उद्देश्य से संविधान संशोधन का पूरा अधिकार इनके हाथ से बाहर कर दिया जाना चाहिये। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी ।

सामयिकी

Posted By: admin on March 15, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

उत्तर प्रदेश के उपचुनावो मे गोरखपुर और फुलपुर मे स पा की जीत अप्रत्याशित थी। उतनी ही अप्रत्याशित जितनी विधानसभा चुनावों मे सपा की करारी हार थी। उस समय उनकी हार का वैसा अनुमान नही था और इस समय उनकी जीत का ऐसा अनुमान किसी को नही था। संभवतः चुनाव लडने वालों को भी नही।
यह स्पष्ट है कि इन चुनावों मे सपा की जीत नही हुई बल्कि भाजपा की हार हुई है।यह हार मोदी जी की हार है या योगी जी की अथवा जीत के प्रति अति आत्मविष्वास की यह अभी नही कहा जा सकता। चुनावों मे कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ सक्रियता का बहुत महत्व होता है। लोकसभा से लेकर विधान सभा तक संघ परिवार ने जी जान से सक्रियता दिखाई थी। इन उप चुनावो मे संघ परिवार की सक्रियता लगभग नही के बराबर थी। यह निष्क्रियता क्यो थी यह शोध का विषय है। यह निष्क्रियता मोदी सरकार के विरूद्ध संध परिवार की नाराजगी भी संभव है या योगी सरकार के प्रति भी कोइ्र बात हो सकती है। यह निष्क्रियता अति आत्म विश्वास के कारण भी संभव है। मेरी जानकारी के अनुसार योगी जी मोदी जी तथा संध परिवार ने अपने अपने आधार पर इस तरह के आकलन कर लिये थे कि विपक्ष अब समाप्त हो रहा है और अब अलग अलग शक्ति संतुलन बनाने का समय आ गया है। इन सबकी गुप्त चर्चाए भी शुरू हो गई थी। इन गुप्त चर्चाओ के कारण भी कुछ समीकरण गडबड हो सकते है। जो भी हो किन्तु मुझे लगता है कि यह हार मोदी योगी और संघ परिवार के बीच किसी गडबड तालमेल का परिणाम अधिक दिखती है और बढे आत्म विश्वास की कम। इतना अवश्य है कि यह हार दो हजार उन्नीस मे मोदी जी को जीतने मे मददगार भी हो सकती है क्योकि यह एक अदृष्य भय के रूप मे बदल कर आपसी तालमेल और ठीक भी कर सकती है।

भय का व्यापार-बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 10, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रेजो ने भारत पर इतने लम्बे समय तक शासन किया । व्यापार अनेक राजनैतिक तथा सामाजिक प्रणालियो मे शीर्ष स्थान रख रहा है।
पूराने समय से ही व्यापार के अनेक तरीके प्रचलित रहे है । इन तरीको मे ही एक भय का व्यापार भी शामिल रहा है। ईश्वर या सत्ता का भय दिखाकर हजारो वर्षो से कुछ लोग अपनी दुकानदारी चलाते रहे है। आज भी ईश्वर के भय के नाम पर आशा राम, राम रहीम जैसे चालाक लोग करोडो अरबो का धन इकठठा करते रहे है। भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र भी ऐसा ही भय का व्यापार माना जाता है। अस्तित्वहीन धारणाओ को प्रचारित करके इन तंत्र मंत्रो के आधार पर अनेक लोग फलते फूलते रहे है। आजकल तो एक वास्तुशास्त्र भी बहुत प्रभावी होता जा रहा है। इस तरह भय के व्यापार का पुराना इतिहास रहा है जो वर्तमान मे वैज्ञानिक काल खंड मे भी लगभग उसी तरह प्रभावी है ।
वर्तमान समय मे एक नये प्रकार के भय का व्यापार शुरू हो गया है। पर्यावरण के नाम पर सम्पूर्ण भारत मे एक अदृष्य भय का वातावरण बना दिय गया हैं। बंदना शिवा सरीखे सैकडो लोग इसी व्यापार के माध्यम से अपना जीवन यापन कर रहे है। जिन्होने जीवन मे कभी एक भी पेड नही लगाया वे भी सडक चौडी करते समय कुछ हरे भरे पेडो की कटाई के विरोध मे खडे दिखते है। स्वाभाविक है कि यही उनका रोजगार है। मै देखता हॅू कि हमारे शहर के पास तातापानी सडक किनारे एक छोटा सा पेड आवागमन मे बहुत बाधक बना हुआ है । उस पेड के कारण कई एक्सीडेन्ट भी हो चुके है। किन्तु वह पेड कानूनी प्रक्रिया लम्बी होने के कारण कट नही सकता और यदि कट गया तो अनेक पेशेवर पर्यावरण वादी छाती पीटना शुरू कर देगे। आजकल तो बडे बडे शहरो मे पर्यावरण के नाम पर बीच सडक मे पेड-पौधे लगाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कुछ जगहो पर तो लगे हुए पेड हटाने के नाम पर इतना बडा नाटक खडा किया जाता है कि हंसी आती है। पेड को जड से उखाडकर मशीनो के द्वारा कही दुसरी जगह ले जाकर इस तरह लगाया जाता है जैसे कि कोई जीवित प्राणी हो। पर्यावरण के नाम पर पूरे देष मे कुछ निकम्मो का एक ऐसा गिरोह बना हुआ है, जिनकी रोजी रोटा का यही मुख्य आधार है।
जल अभाव भी एक ऐसा ही माध्यम बना हुआ है। राजेन्द्र सिंह सहित अनेक लोग ऐसा हौवा खडा करते है जिनके आधार पर जल अभाव ही विश्व युद्ध का कारण बनेगा। यह बात लगातार फैलाई जाती है । इसी तरह की काल्पनिक बात इतनी तेजी से फैलाई जाती है कि बहुत लोग इस बात को दूहराना शूरू कर देते है। कितनी बचकाना बात है कि जल अभाव को दुनियां की सबसे बडी समस्या प्रचारित किया जाये, जबकि ऐसी कोई समस्या आंशिक हो सकती है व्यापक नही। एक तरफ ऐसे लोग जल अभाव की बात करते है तथा पानी बचाव आंदोलन चलाते है तो इन्ही लोगो मे से दूसरी टीम पर्यावरण सूरक्षा के नाम पर हवाई जल सिचन अथवा बडे शहरो मे सडको पर पानी छीटने की भी मांग करते है। बडे बडे शहरो मे बीच सडक पर पौधा रोपण करके उनकी सिचाई करना भी कुछ लोगो के लिये आवश्यक कार्य है तो जल अभाव का वातावरण बनाकर पानी बचाव आंदोलन भी कुछ लोगो का रोजगार बन गया है।
हम देखते है कि आमतौर पर कभी वातावरण गरम होने के कारण भयंकर गर्मी के खतरे का समाज मे भय फैलाया जाता है तो कभी हिमयुग आने की कल्पना से समाज को भयभीत किया जाता है। दोनो ही बाते प्रतिवर्ष किसी न किसी रूप मे बहुत वीभत्स स्वरूप देकर समाज मे प्रचलित की जाती है। कभी समझ मे नही आया कि दोनो मे से क्या सही है, और यह खतरा तात्कालिक स्वरूप मे कितना बडा है। यह भी समझ मे नही आया कि इस प्रकार के खतरो को सामान्य समाज मे प्रचारित करना कितना आवष्यक है और क्या समाधान करेगा। स्पष्ट दिखता है कि इस प्रकार के मौसमी वातावरण के काल्पनिक भय विस्तार मे भी कुछ लोगो का रोजगार निहित होता है।
कुछ लोग ग्रीन हाउस गैस का खतरा भी तिल का ताड बना कर प्रस्तुत करते रहते है तो कुछ लोग डीजल पेट्रोल समाप्त होने का खतरा भी लगातार बताते रहते है। कुछ लोग बढती आबादी को भी बहुत बडा संकट बताकर प्रचारित करते रहते है। वे हर मामले मे बढती आबादी को दोष देते है । सामान्य व्यक्ति इस प्रकार के भय से प्रभावित तो होता रहता है किन्तु कुछ समाधान नही कर पाता । मानवाधिकार के नाम पर भी ऐसे अनेक कार्यक्रम चलते रहते है । तीस्ता शीतलवाड का नाम आपने सुना होगा । गुजरात की बडी प्रमुख मानवाधिकार वादी की पोल खुली तो पता चला कि ये सबलोग भय के व्यापार के अतिरिक्त और कोई धंधा नही करते । ऐसे लोगो की संख्या भारत मे हजारो के रूप मे है जो किसी न किसी नाम पर समाज मे काल्पनिक भय का वातावरण बनाकर स्वयं को उसका मुखिया बना लेते है और जीवन भर उनकी दुकानदारी आराम से चलती रहती है।
मै मानता हॅू कि ऐसी समस्याए आंशिक रूप से होती भी है किन्तु ऐसी समस्याओ का तात्कालिक प्रभाव बहुत नाम मात्र का होता है और हजारो वर्षो के बाद ही उनका व्यापक प्रभाव संभावित है । दूसरी बात यह भी है कि उन समस्याओ के समाधान मे आंम लोग कोई भूमिका अदा नही कर सकते क्योकि ये बहुत उचे लेबल का मामला होता है । यहां तक कि इन समस्याओ के विस्तार देने वाले विकसित राष्ट्र ही भारत जैसे देश मे अपने एजेन्डो को सक्रिय करके इन समस्याओ को बढा चढाकर प्रचारित कराते है । यदि ठीक से खोजबीन किया जाय तो पर्यावरण, मानवाधिकार, जल अभाव, गर्मी सर्दी, मौसम, ग्रीन हाउस जैसी अनेक समस्याए विकसित राष्ट्र पैदा करते है। साथ ही इन विकसित राष्ट्रो का एजेन्डा इन्ही विकसित राष्टो के एजेन्ट गुप्त रूप से समाज सेवी संस्थाओ का बोर्ड लगाकर सामाजिक वातावरण मे भय का जहर घोलते है। ऐसे निकम्मे लोगो की फौज छोटे छोटे शहरो तक स्थापित हो चुकी है। आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार के अनावश्यक भय के वातावरण से समाज को मुक्त कराया जाय। साथ ही ऐसे पेशेवर लोगो की भी पोल खोली जाय जो अनावश्यक भय का वातावरण बनाकर अपनी रोजी रोटी चलाते रहते है।

मंथन क्रमांक-75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क-बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 3, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्तियो की सहमति से तथा समाज की स्वीकृति से बनती है। राष्ट्र की कोई भौगौलिक सीमा अवश्य होती है जबकि समाज की कोई भौगोलिक सीमा नहीं हुआ करती।
प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 सामाजिक 2 राष्ट्रीय । व्यक्ति हमेशा समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का। प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार भी अलग अलग होते है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्ति के रूप मे जो प्राकृतिक अधिकार मिलते है उन्हे मौलिक अधिकार कहते है । इन प्राकृतिक अधिकारो के आधार पर व्यक्ति समाज का अंग होता है। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त होते है जो उन्हे राष्ट्र या राज्य के द्वारा दिये जाते है । इन्हे नागरिक अधिकार कहा जाता है। मै स्पष्ट कर दू कि समाज के सुचारू संचालन के लिये राज्य एक अनिवार्य आवश्यकता होती है। प्राकृतिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है । उनमे कभी कोई भेद नही होता न ही वे अधिकार उसकी सहमति के बिना किसी भी तरह कम ज्यादा किये जा सकते है। नागरिक अधिकार संविधान प्रदत होते है और वे अलग अलग हो सकते है। साथ ही कम ज्यादा भी किये जा सकते है। इस तरह हम कह सकते है कि व्यक्ति समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का । भले ही प्रत्येक व्यक्ति की दोनो भूमिकाए अलग अलग होते हुए भी उसी व्यक्ति मे निहित होती है।
किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसे समाज का अंग नही बनाया जा सकता। न ही उसकी सहमति के बिना उसके उपर कोई कानून थोपा जा सकता है। इसका अर्थ हुआ कि सिद्धान्त रूप से कोई भी व्यक्ति अकेला रह सकता है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक व्यक्ति को समाज के साथ संबंद्धता उसकी मजबूरी होती है। क्योकि उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी समाज ही देता है। समाज भी उसकी सुरक्षा की गारंटी राज्य के माध्यम से ही देता है। इस तरह दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राष्ट्र की नागरिकता के लिये मजबूर होता है और यह मजबूरी ही उसकी स्वीकृति है। अर्थात कोई भी व्यक्ति अकेला रहने के लिये स्वतंत्र है किन्तु वह अकेला रह नही सकता और उसे व्यक्ति और नागरिक की दोहरी भूमिका निभानी ही होती है।
कोई भी व्यक्ति यदि किसी अन्य देश मे जाता है और रहता है तो उसे भले ही उस देश के नागरिक अधिकार प्राप्त न हो किन्तु उसके सामाजिक अधिकार सुरक्षित रहते है । दुनिया का कोई भी कानून उस व्यक्ति की सहमति के बिना उसके प्राकृतिक अधिकारो मे किसी प्रकार की कोई कटौती नही कर सकता। साथ ही जब कोई व्यक्ति किसी देश का नागरिक बन जाता है तब उसके सारे प्राकृतिक अधिकार तब तक उस देश के संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहमत मान लिये जाते है जब तक वह सहमत है । इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी देश की नागरिकता कभी भी छोड सकता है और वह नागरिक कानूनो से मुक्त हो सकता है। किन्तु जब तक वह नागरिकता नही छोडता तब तक वह उस देश की कानूनो को मानने के लिये बाध्य है। इस तरह आदर्श राजनैतिक व्यवस्था मे किसी भी व्यक्ति को कभी भी देश छोडने से नही रोका जा सकता जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। वर्तमान स्थिति यह है कि अनेक देश तो अपने नागरिको को देश छोडने के प्रयत्नो मे गोली तक मार देते है जबकि यह उसकी स्वतंत्रता है क्योकि उक्त व्यक्ति समाज का सदस्य पहले है और राष्ट्र का नागरिक बाद मे । इतना अवश्य है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी देश मे प्रवेश करने के पूर्व अनुमति स्वीकृति आवश्यक है ।
किसी भी देश का कानून उसकी सहमति के बिना व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बना सकता न ही उसे दंड दे सकता है। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बनाने मे भी उस व्यक्ति की अप्रत्यक्ष सहमति है। इतना अवश्य है कि जिस व्यक्ति ने किसी देश की नागरिकता स्वीकार की है उस देश के सारे कानूनो मे उस व्यक्ति की सहमति मान ली जाती है। इस तरह कानून के अनुसार व्यक्ति को दंडित करना उसकी अप्रत्यक्ष सहमति है।
आज सबसे बडी कठिनाई यह खडी हो गई है कि राष्ट्र और समाज के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। आम तौर पर पढे लिखे लोग भी व्यक्ति और नागरिक के बीच का अंतर नही समझते। यह भी जानकारी नही हो पाती है कि मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार के बीच क्या फर्क होता है। अधिकांश लोग तो राष्ट्र को ही अंतिम इकाई मान लेते है और समाज को राष्ट्र के अंतर्गत कहने लग जाते है। अथवा कुछ लोग समाज के भी कई भाग कर देते है। ये सारा भ्रम जानकारी के अभाव मे फैल जाता है अथवा फैला दिया जाता है। व्यक्ति एक सर्व सम्प्रभुता सम्पन्न प्राकृतिक इकाई के रूप मे होता है और उसकी सहमति के बिना उसी स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बनाई जा सकती । इस तरह यदि किसी राष्ट्र मे कोई कानून बनता है तो उस कानून के बनाने मे उस राष्ट्र के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सहमति आवश्यक है। इसका अर्थ हुआ कि जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र से भी उपर समाज का अंग है तब सम्पूर्ण विश्व की भी कोई एक ऐसी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिये जिसकी सहमति या स्वीकृति से ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारो को छीना जा सके। अब तक दुनियां मे ऐसी कोई व्यवस्था बन नही सकी है भले ही आंशिक रूप से इस दिशा मे कुछ प्रयत्न हुए भी और धीरे धीरे आगे बढ भी रहे है।
इस तरह व्यक्ति और नागरिक अधिकारो के मामले मे अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के साथ जुडे हुए होते है। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति के लिये दोनो भूमिकाओ मे रहना उसकी मजबूरी है और उसकी सहमति के बिना कोई भी अन्य उसकी स्वतंत्रता मे कटौती नही कर सकता। आदर्श व्यवस्था यह होगी कि चरित्र निर्माण मे मुख्य भूमिका परिवार और समाज की होनी चाहिये तथा राज्य को विशेष परिस्थिति मे ही हस्तक्षेप करना चाहिये । वर्तमान समय मे व्यवस्था का अर्थ समाज और परिवार से हटकर राज्य तक सीमित हो गया है। परिवार और समाज को किनारे करके राज्य ने सारी व्यवस्था स्वयं तक सीमित कर ली है। दुनियां के राष्ट्रो के बीच आपसी टकराव भी इसी शक्ति संग्रह के परिणाम होते है। उचित होगा कि राज्य परिवार और समाज अपनी अपनी अलग अलग भूमिकाओ को समझे । राज्य इन भूमिकाओ को अलग अलग सक्रिय होने दे और यदि राज्य ऐसा न करे तो व्यक्तियो को चाहिये कि वे राज्य को इस दिशा मे मजबूर करे। व्यक्ति और नागरिक की अलग अलग पहचान और भूमिका स्पष्ट होनी चाहिये जिसका अभाव वर्तमान अव्यवस्था का मुख्य कारण है।
नोट-मंथन का अगला विषय भय का व्यापार होगा।

Posted By: admin on March 2, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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