Lets change India
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जु...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपाल...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है। 2 समाज को एक ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...

सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 25, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

जब कोई भौतिक पहचान ही किसी की योग्यता और श्रद्धा का मापदंड बन जाती है तब धूर्त और अपराधी उस भौतिक पहचान का सहारा लेकर अपने को आगे बढाते है। यही स्थिति राजनीति मे खादी की हुई तो धर्म मे सन्यासी शब्द और उसकी वेश भूषा की। आशाराम रामरहीम सरीखे सैकडो अपराधी सन्यासी वेश भूषा मे अपना गुजर बसर और शाही सम्मान सुख सुविधा का भोग करते रहे है। कुछ समय पहले तक मुझे भी ऐसा लगता था कि वास्तव मे ईश्वर यहां न्याय नही है तभी तो ईश्वर के नाम पर भोले भाले भक्तो को धोखा देने मे ये लोग सफल है । ऐसे नकली साधु संत धर्म की आड मे अनेक गंभीर अपराध तक करते रहे है। यहां तक कि हिंसा और षणयंत्र मे भी पीछे नही रहे। वर्तमान घटना क्रम से विश्वास हो चला है कि ईश्वर है। ऐसे साधु संत बडे बडे अपराध करके साफ बचते रहे है किन्तु छोटे अपराध मे भी वे आजीवन कारावास का दंड भोगने को मजबूर हो रहे है। स्पष्ट है कि अपराधियो को उचित दंड तो मिल रहा है भले ही हत्या हिंसा षणयंत्र धोखा के बदले महिला उत्पीडन के नाम पर ही क्यो न मिले। मै इस प्रकार गलत तरीके से हो रहे सही कार्य का समर्थन करता हॅू। अन्य आपराधिक प्रवृत्ति के साधु संतो को सबक सीखना चाहिये कि वे बडे बडे षणयंत्र करके भले ही बच रहे हो किन्तु पाप का घडा कभी भी भरकर फूट जायेगा और उन्हे आभाष भी नही होगा यह किसी को पता नही है। ईश्वर का उपयोग करना ही पर्याप्त नही है उसकी शक्ति से डरना भी चाहिये।

मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता

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भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाजिक कर्तब्य बन जाता है । प्राचीन समय से यही परिपाटी चलती आ रही है। भारतीय जीवन पद्धति विज्ञान और धर्म के संतुलन के रूप मे विख्यात है। गाय गंगा मंदिर पीपल के पेड या तुलसी को पौधो को समाज मे यथोचित सम्मान मिलना इसी प्रणाली का प्ररिणाम है। गाय एक ऐसा उपयोगी पशु है जिसकी उपयोगिता पर अब भी नये नये शोध हो रहे है। गाय को माता के समान स्थान दिया गया। गो हत्या को निशिद्ध कार्य मे सम्मिलित किया गया। गंगा नदी की वैज्ञानिक उपयोगिता देखकर ही उसे अधिकतम पवित्र और साफ रखने की धार्मिक व्यवस्था हुई। गंगा नदी को पार करते समय उसमे तांबे का पैसा फेकना भी एक वैसा ही प्रयत्न माना जाना चाहिये। मंदिरो को आस्था का केन्द्र माना गया। गाय गंगा मंदिर जैसे वैज्ञानिक प्रतीको को आम लोगो के जन मानस मे इस तरह शामिल किया गया, जैसे वह उनके जीवन मरण का प्रश्न हो । विचारवान लोग तर्क के आधार पर रिसर्च करते थे और उस रिसर्च के परिणाम भावना प्रधान समाज तक श्रद्धा के माध्यम से पहुचाते थे। विचार और श्रद्धा के बीच एक अदभूत तालमेल था।

चाहे गाय गंगा मंदिर हो या पीपल का पेड सभी एक बेहतर सामजिक व्यवस्था के लिये उपयोगी थे। मनुष्य एक मात्र ऐसा जीव था जिसे मौलिक अधिकार प्राप्त हुए । गाय की सम्पूर्ण उपयोगिता और श्रद्धा होते हुए भी गाय को पशु माना गया क्योकि उसे मौलिक अधिकार प्राप्त नही थे। इसी तरह गंगा को पवित्र नदी तथा मंदिर को एक पवित्र उपासना केन्द्र के रूप मे स्वीकार किया गया। मै स्पष्ट कर दू कि सिर्फ मनुष्य को ही मौलिक अधिकार प्राप्त होते है क्योकि मनुष्य सम्पूर्ण विश्व समाज के साथ जुडा हुआ है और गाय गंगा या मंदिर का अब तक वैसा स्थान प्राप्त नही है । इसका अर्थ हुआ कि गाय हमारे लिये आस्था का केन्द्र हो सकती है और किसी दूसरे के लिये नही भी हो सकती है । भारतीय जीवन पद्धति मे अपनी आस्था को किसी दूसरे पर बल पूर्वक नही थोपा जा सकता । जिस तरह गाय के नाम पर व्यक्तियो की हत्याए हो रही है अथवा गंगा के नाम पर जल के अन्य उपयोग मे रूकावट के आंदोलन हो रहे है वे भारतीय संस्कृति के हिस्से नही है क्योकि ये सुविचारित नही है, तर्क संगत नही है, विज्ञान विरूद्ध है तथा पूरी तरह भावनाओ पर आधारित है। बल्कि कभी कभी तो ऐसा लगता है कि गाय गंगा मंदिर का मुददा सुविचारित तरीके से राजनैतिक हथकंडे के रूप मे उपयोग करने का प्रयत्न हो रहा है।

स्पष्ट तथ्य है कि भारत मे भारतीय संस्कृति मे निरंतर गिरावट आ रही है । हिन्दुओ की संख्या लगातार घट रही है और गाय गंगा मंदिर विरोधियो की बढ रही है। यदि हिन्दूओ की संख्या घटती गई तो गाय गंगा मंदिर भी नही बचेगा । किन्तु यदि हिन्दू और हिन्दुत्व बच गया तो गाय गंगा मंदिर खत्म होने के बाद भी फिर से विस्तार पा सकते है। इसका अर्थ हुआ कि गाय गंगा और मंदिर की सुरक्षा की तुलना मे हिन्दुत्व की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु हमारे रणनीति कार गाय गंगा मंदिर को हिन्दुत्व की तुलना मे अधिक महत्वपूर्ण मानने का प्रयत्न कर रहे है। वास्तविक स्थिति यह है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति मे गाय गंगा मंदिर की तुलना मे समान नागरिक संहिता की अधिक उपयोगिता है, क्योकि भारतीय जीवन पद्धति इतनी अधिक सुविचारित और वैज्ञानिक आधार पर स्थापित है कि कोई अलग उसका मुकाबला नही कर सकेगा। समान नागरिक संहिता की तुलना मे हिन्दू राष्ट्र शब्द पूरी तरह घातक और अनुपयुक्त है क्योकि विचार धाराए वैज्ञानिक तथ्यो पर विस्तार पाती है। भावनात्मक प्रचार पर नही। पिछले तीन वर्षो से मै देख रहा हॅू कि हमारे समान नागरिक संहिता के पक्षधर अनेक मित्र भी हिन्दू राष्ट अथवा गाय गंगा मंदिर को अधिक प्राथमिक मानने लगे है। कुछ लोगो ने समान नागरिक संहिता शब्द का अर्थ भी बदलने का प्रयास किया। उन्होने समान नागरिक संहिता को समान आचार संहिता बना दिया जबकि दोनो एक दूसरे के विपरीत है। यदि भारत मे समान नागरिक संहिता लागु हो जाये तो भारत की अधिकांश समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी तथा भारत दूनिया मे मानवाधिकार के नाम पर अग्रणी देशो मे गिना जाने लगेगा । जबकि गाय गंगा और मंदिर आंदोलन कुछ लोगो के अहम की तुष्टि भले ही कर दे लेकिन दुनियां मे भारतीय जीवन पद्धति अथवा हिन्दू धर्म का सिर उंचा नही हो सकेगा।

जो मित्र गाय गंगा मंदिर के नाम पर कटटर पंथी इस्लाम से टकराने के पक्षधर है वे भूल रहे है कि भावनात्मक मुददो पर टकराव टिकाउ नही हो सकता। ऐसे मुद्दो पर विश्व समर्थन भी नही मिल सकेगा। भारत की राजनैतिक सत्ता के लिये भले ही ऐसे मुद्दे उपयोगी हो किन्तु विश्व व्यवस्था मे इनका उपयोग नही हो सकता। दूसरी ओर समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है जिसपर भारत के मुसलमान सहमत भी नही होंगे और विरोध भी नही कर सकेगे। विश्व जनमत भी समर्थन कर सकता है। यदि जल छिटने से साप मर जाये तो लाठी डंडे गोली बंदूक की आवश्यकता क्या है। गाय गंगा मंदिर जैसे मामलो मे सरकार को किसी प्रकार का कोई कानूनी हस्तक्षेप नही करना चाहिये। जिस तरह सत्तर वर्ष बीत गये उस तरह दो चार वर्ष और बीत सकते है।

मै फिर से निवेदन करता हॅू कि हमे भावनाओ मे बहकर तथा जोश मे आकर कुछ करने की मूर्खता छोड देनी चाहिये और वैचारिक तथा होश मे आकर एक मात्र समान नागरिक संहिता के पक्ष मे वातावरण बनाना शुरू करना चाहिये।

सामयिकी

Posted By: admin on April 19, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मै न्यायिक सक्रियता के विरूद्ध रहा हॅू। साथ साथ मै विधायिका की अति सक्रियता के भी विरूद्ध रहा हॅू। विधायिका की अति सक्रियता से परेशान न्यायपालिका ने संवैधानिक तरीके से जनहित याचिकाओ की अनुमति दी थी और पूरे भारत ने उसकी प्रशंसा की थी, भले ही वह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का आदेश नही था। स्वाभाविक है कि जनहित याचिकाओ का जमकर दूरूपयोग हुआ। पेशेवर मानवाधिकारवादी पर्यावरण वादी या एन जी ओ ने जनहित याचिकाओ को अपने व्यवसाय का एक माध्यम बना लिया। आज सुप्रीम कोर्ट ने अपनी उस भूल को सुधारते हुए यह टिप्पणी की है कि जनहित याचिकाओ का खुलेआम दूरूपयोग हो रहा है । वैसे तो यह बात लम्बे समय से अनुभव की जा रही थी किन्तु पिछले कुछ वर्षो से तो यह एक फैशन सरीखे बन गई थी। जनहित की परिभाषा न्यायालय नही कर सकता । जनहित की परिभाषा तो एकमात्र विधायिका ही कर सकती है और यदि विधायिका जनहित की गलत परिभाषा करती है तो विधायिका पर नियंत्रण जन का ही हो सकता है, न्यायपालिका का नही। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो की संरक्षक होती है इससे अधिक न्यायपालिका की भूमिका तभी होती है जब संविधान के विरूद्ध कोई कार्य हो रहा हो। अभी भी न्यायपालिका ने अपनी भूल मे आंषिक संशोधन ही किया है । वास्तविक सुधार तो तब माना जायेगा जब न्यायपालिका जनहित को परिभाषित करना बंद करके यह कार्य विधायिका पर छोड देगी और जनहित याचिकाओ पर पूरा प्रतिबंध लगा देगी।
जबसे न्यायपालिका सर्वोच्च का अलोकतांत्रिक विचार न्यायाधीशो तथा अधिवक्ताओ के मन मे आया तब से ही ये संभावना दिखने लगी थी कि न्यायपालिका मे भ्रष्टाचारा भी बढेगा और गुटबंदी भी होगी। धीेरे धीरे दोनो बाते साफ होती गई । न्यायपालिका मे सर्वोच्च स्तर पर दो गुट बने जिसमे एक गुट का नेतृत्व वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण ने संभाला तो दूसरे गुट का नेतृत्व कुछ छोटे वकीलो के पास रहा। सर्वोच्च न्यायाधीश भी दो गुटो मे बट गये। राजनीति भी इस न्यायिक विवाद मे शामिल हो गई। गुटबंदी स्वाभाविक थी क्योकि प्रशान्त भूषण एक ऐसे वकील माने जाते है जिनकी सोच वामपंथ की तरफ अधिक झुकी हुई है। वे इमानदार है हिम्मती है किन्तु न्याय और व्यवस्था के संतुलन के विरूद्ध न्याय के पक्ष मे अधिक झुक जाते है। परिणाम होता है अव्यवस्था और अन्याय । न्यायपालिका के बीच टकराव तो जनहित मे है क्योकि लोकतंत्र मे किसी को सर्वोच्चता का घमंड नही पालना चाहिये। साथ ही प्रशांत जी से मेरी अपेक्षा है कि न्याय और व्यवस्था का संतुलन न बिगडे उस दिशा मे भी उन्हे सोचना चाहिये।

सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 16, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

निर्भया कांड के समय संभवतः मै भारत का अकेला व्यक्ति था जिसने बलात्कार के लिये कडे कानून को और कडा करने का खुला विरोध किया था। यहां तक कि मैने जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशो को भी घातक माना था। मैने स्पष्ट लिखा था कि यदि इस प्रकार कानून कडे किये गये तो भारत मे बलात्कार तो बढेंगे ही साथ साथ हत्याओ की भी बाढ आ जायेगी। आप दिसम्बर 2013 के ज्ञानतत्व 260 और 262 के लेख पढ सकते है। उसके बाद भी मैने कई बार इस संबंध मे लिखा । दबे छुपे मुलायम सिंह और शरद यादव भी इस मत के थे किन्तु नेतागिरी के कारण बोल नही सकते थे। पांच वर्ष बाद परिणाम वही हुए। बलात्कार तो बढे ही जिनके लिये यह कहा जा सकता है कि उस समय अनेक घटनाएं प्रकाश मे नही आती होगी किन्तु बलात्कार के साथ हत्याओ की बाढ का एकमात्र कारण निर्भया कांड के बाद बनाये गये कठोर कानून के अतिरिक्त कुछ और नही। तंत्र अपनी भूल न सुधार कर कानून अधिक कठोर करेगा और उसी अनुपात मे बलात्कार एंव हत्याओ का विस्तार होता रहेगा।
प्राचीन समय मे गंभीर बलात्कार को छोडकर साधारण छेडछाड की घटनाए प्रकाश मे नही आती थी। अधिकांश सामाजिक स्तर से निपटती थी। अब उसके ठीक विपरीत ऐसी घटनाओ को बढा चढाकर प्रचारित करना एक फैशन बनता जा रहा है। कितनी विचित्र हालत है कि उन्नाव के एक ऐसे अपराधी दादा जिनसे सारा इलाका डरता था उन पर अंकुश के सारे प्रयत्न असफल होने के बाद अन्त मे बलात्कार के एक अस्पष्ट आरोप का सहारा लेना पड रहा है। बलात्कार की यह घटना बिल्कुल विलक्षण नही। आम तौर पर ऐसे रसूखदार लोग अपने आस पास की लडकियो के साथ ऐसे अनुचित संबंध बनाते रहे है। इस लडकी ने हिम्मत करके रिपोर्ट की तो रिपोर्ट दबा दी गई। विधायक ने लडकी के माता पिता को समझाने और दबाने का प्रयास किया तब भी परिवार नही दबा। विधायक के भाई ने अपने पूर्व स्वभाव के अनुसार लडकी के पिता को इतना पीटा की पिता मर गया । मै नही मानता कि इस घटना मे महिलाओ पर अत्याचार की कोई विशेष घटना है।
कठुआ की घटना कुछ विशेष स्थान रखती है । मुझे स्वयं समझ मे नही आया कि संभावित घटना क्रम क्या हो सकता है। मैने कई गंभीर लोगो से संभावनाओ की चर्चा की, किन्तु सब मेरे समान ही भ्रम मे मिले । हम सब मानते रहे कि घटना जैसी प्रचारित है वैसी असंभव है किन्तु यदि भिन्न भी है तो क्या हो सकती है यह किसी के समझ मे नही आया। साफ स्थिति तो कुछ दिन बाद ही पता चलेगी किन्तु एक धुंधली तस्वीर स्पष्ट हो रही है कि एक हिन्दू नाबालिग ने एक मुस्लिम आठ वर्ष की छोटी बच्ची का अपहरण करके बलात्कार किया। लडकी चिल्लाना चाहती थी तो उसे नशा देकर चुप किया गया। लडकी द्वारा विरोध के कारण उसे रोक कर रखा गया। लडके का चचेरा भाई आता है तो वह भी लडकी से बलात्कार करता है। घटना के सामने आने के डर से उसे मंदिर मे छिपाया जाता है जहां उसके साथ अन्य लोग भी बलात्कार करते है। लडके के पिता घटना को छिपाने के लिये पुलिस वालो को पैसा देता है । पुलिस वालो मे से भी कुछ लोग बलात्कार करते है। लडकी चुप रहने को तैयार नही और बात सामने आना बहुत खतरनाक है इसलिये लडकी की हत्या का मार्ग चुना गया। हत्या के बाद पुलिस जांच शुरू होती है। जिसमे कोइ्र ईमानदार पुलिस वाला बिना प्रभावित हुए जांच करता है। मामले मे एक नाबालिग की गिरफतारी के बाद मुसलमानाो की ओर से जुलुस और नारे लगते है। लडके के जिस पिता ने बेटे को बचाने का प्रयास किया वह हिन्दू संगठनो से जुडा होगा । हिन्दू संगठनो ने उसके पक्ष मे जुलुस निकाला। वकीलो ने भी उसके पक्ष मे प्रभाव डाला । पूरा मामला एक स्वाभाविक घटना का विस्तार है। कही महिला उत्पीडन नही है, कही हिन्दू मुस्लिम का भाव नही है। समाज के अतिवादी हिन्दू मुस्लिम संगठन बिना सच्चाई जाने ऐसे आंदोलनो के लिये रात दिन तैयार मिलते है। फिर भी कठुआ मामले की जिस तरह आम हिन्दुओ ने एक स्वर से निन्दा की वह आम हिन्दू और आम मुसलमान के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खीच देती है। ऐसे ऐसे संवेदन शील मामलो मे भी देखा जाता है कि आम मुसलमान या तो चुप रहता है या किन्तु परन्तु लगाकर बोलता है जबकि आम हिन्दू ने इस घटना की एक स्वर से बिना किन्तु परन्तु के निंदा की।
उन्नाव का सच तो स्पष्ट है किन्तु कठुआ का सच आगे पता चलेगा। मेरा उद्देश्य भी किसी घटना विशेष की चर्चा मे न जाकर बढते बलात्कारो तक सीमित रहना है। मेरे विचार मे राजनेताओ द्वारा बनाये गये अप्राकृतिक अस्वाभाविक कानून ही बलात्कार और हत्याओ की बाढ के प्रमुख कारण है । जिन लोगो को समाज शास्त्र का रत्ती भर ज्ञान नही वे ऐसे ऐसे विषयो पर वर्ग विद्वेष बढाने की बुरी नीयत से कानून की समीक्षा करेंगे तो परिणाम ऐसे आने ही है। यदि दंडित करना ही आवश्यक हो तो पहले ऐेसे ऐसे अव्यावहारिक कानून बनाने वालो को सामाजिक दंड की शुरूआत करनी चाहिये जिनकी नीयत भी गलत है और नीतियां भी। अभी तो इक्का दुक्का नाबालिग शिकार हो रही है भविष्य मे कही ये घटनाए आम न हो जावे । यदि कानून को और अधिक कठोर किया गया तो तीन परिणाम संभावित है -1 बडी संख्या मे निर्दोष लडकियों की हत्या हो जायेगी । 2 बडी संख्या मे भावना प्रधान लडके फांसी चढ जायेंगे । 3 बडी संख्या मे धूर्त महिलाएं शरीफ लोगो को ब्लैकमेल करने लगेंगी।

मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 15, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।

यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोजगार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।

तंत्र की नीतियां गलत नही है बल्कि नीयत गलत है। तंत्र समाज को गुलाम बनाकर रखने की नीयत से सारे अधिकार अपने पास समेट रहा है। तंत्र ने संविधान रूपी एक पुस्तक लिखकर उसे समाज मे धर्म ग्रन्थ या भगवान के रूप मे स्थापित कर दिया है और तंत्र जब चाहे उसमे मनमाने संशोधन करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है। हमारे लिये भगवान और तंत्र के लिये गुलाम । लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र कर दी गई है। तंत्र को लोक का प्रबंधक या मैनेजर होना चाहिये था किन्तु वह अपने को शासक अर्थात सरकार मानता भी है और कहता भी है। कैसी विडंबना है कि लोक शासित है और तंत्र शासक। इसलिय यह निष्कर्ष निकलता है कि सम्पूर्ण विष्व की राजनैतिक व्यवस्था मे आमूल परिवर्तन होना चाहिये जिसकी शुरूआत भारत से हो।

हमे भारत मे दो दिशाओ मे एक साथ काम करना चाहिये । 1 समाज सषक्तिकरण 2 राज्य कमजोरीकरण। राज्य और समाज के बीच जो असीमित दूरी राज्य के पक्ष मे बढ गई हैं उस दूरी को समाज के पक्ष मे करना ही व्यवस्था परिवर्तन है। समाज सषक्तिकरण का कार्य ज्ञान यज्ञ परिवार राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पूर्वक कर रहा है। राज्य कमजोरीकरण का कार्य ग्राम संसद अभियान ने अपने उपर लिया है।

स्वराज्य का अर्थ है सम्पूर्ण विश्व के संविधान के निर्माण और संशोधन मे प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता। इसे ही हम लोक स्वराज्य कहते हैं। भारत मे भी लोक स्वराज्य का अर्थ वही है अर्थात भारतीय संविधान के निर्माण तथा संषोधन मे भारत के प्रत्येक व्यक्ति की सम्पूर्ण भूमिका । सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ हैं भारत की अव्यवस्थित राजनैतिक, सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक, पारिवारिक, आर्थिक, तथा अन्य सभी प्रकार की व्यवस्थाओ मे अब तक आये पतन से मुक्ति। लोक स्वराज्य ही सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का आधार बन सकता है। चूकि यह कार्य बहुत अधिक कठिन है इसलिये संशोधित रूप मे व्यवस्था परिवर्तन को आधार बनाया जा सकता है। व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ है संविधान के निर्माण और संशोधन मे भारत के प्रत्येक नागरिक की महत्वपूर्ण भूमिका। कई वर्षो तक प्रयत्न के बाद महसूस हुआ कि व्यवस्था परिवर्तन की तुलना मे कुछ और लचीला मार्ग अपनाया जाये। यह सोचकर ग्राम संसद अभियान को आधार बनाकर जन जागरण शुरू किया गया। ग्राम संसद अभियान का अर्थ है, प्रत्येक ग्राम या वार्ड सभा को राष्ट्रीय संविधान संशोधन मे महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने आंतरिक कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता । इसका अर्थ हुआ कि वर्तमान तंत्र यदि संविधान मे कोई संषोधन करता है तो उसे ग्राम सभाओ की स्वीकृति अनिवार्य होगी । यदि ग्राम सभाएं अस्वीकृत कर दें तब या तो संविधान संशोधन नही होगा अथवा जनमत संग्रह कराना होगा।

मै मानता हॅू कि ग्राम संसद अभियान समस्याओ का समाधान नही है बल्कि वर्तमान अव्यवस्था से एक समझौता मात्र है। आदर्श स्थिति यह है कि संविधान निर्माण और संशोधन मे लोक की ही एक मात्र भूमिका होनी चाहिये, किन्तु ग्राम संसद अभियान इस मामूली से प्रयत्न के आधार पर जन जागरण कर रहा है कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र तक सीमित न हो और उसमे लोक की भी कोई भूमिका हो।

यदि कोई अन्य समूह व्यवस्था परिवर्तन अथवा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की दिशा मे काम करता है तो हम उसका पूरा समर्थन या सहयोग करेंगे। यदि संविधान संशोधन के लिये जनमत संग्रह अथवा परिवारों को भी कोई भूमिका दी जाती है तो हम उसका पूरा समर्थन सहयोग के लिये तैयार हैं। यदि तंत्र जनता द्वारा निर्वाचित किसी लोक संसद को भी संविधान निर्माण और संशोधन मे कोई भूमिका के लिये तैयार हो तो हमारा समर्थन और सहयोग होगा । ऐसी स्थिति न देखकर ग्राम संसद अभियान अपनी एक सूत्रीय मांग पर जन जागरण कर रहा है। मै इतना और स्पष्ट कर दूं कि यदि चर्चा के माध्यम से तंत्र ने आंशिक सहमति की इच्छा जताई तो आवष्यकतानुसार ग्राम संसद अभियान गांवो को अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की मांग को अल्प काल के लिये स्थगित भी कर सकता है, किन्तु संविधान संशोधन मे ग्राम और वार्ड सभाओ की भूमिका की मांग स्थिर है । हमारे भगवान रूपी संविधान को तंत्र के जेलखाने से मुक्त कराना हमारा पहला लक्ष्य है

ग्राम संसद अभियान का कार्यालय दिल्ली से संचालित होता है। पूरे देश को 99 लोक प्रदेशो मे बांटकर प्रत्येक लोक प्रदेेश मे ग्राम संसद अभियान की कमेटियां बन रही है। सभी लोक प्रेदशो मे बैठको का क्रम एक साथ चल रहा है। 20 अगस्त से नवम्बर तक सभी लोक प्रदेशो मे ऐसी बैठकें हो जायेगी, जो लोक प्रदेश सम्मेलनो की योजना बनायेगी। अक्टूबर से मार्च तक के छ महिनो मे सभी लोक प्रदेशो मे ग्राम संसद अभियान के सम्मेलन पूरे करने की योजना है। इन सम्मेलनो मे कुछ लोगो का चयन करके एक राष्ट्र स्तरीय सम्मेलन रखा जायेगा जिसमे आगे की योजना पर विचार किया जायेगा। मुझे विश्वास है कि ग्राम संसद अभियान वर्ष 2024 तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे सफल हो सकेगा। मै जानता हॅू कि यह कार्य भी संविधान संशोधन से ही संभव है और ग्राम संसद अभियान का निश्चय है कि हम कोई कानून नही तोडेेगे बल्कि संवैधानिक तरीके से ही तंत्र की गुलामी से संविधान को मुक्त कराने का जन जागरण जारी रखेंगे । इसके लिये दो मार्ग दिखते हैं या तो इन विचारो के लोग संसद मे 2 तिहाई बहुमत बनाकर संविधान संशोधन कर दें और नई व्यवस्थानुसार नये चुनाव करा दे अथवा इतना प्रबल जनमत खडा हो कि वर्तमान तंत्र इस छोटे से संषोधन के लिये सहमत हो जाये । क्या होगा यह पता नही। दोनो ही प्रयत्नो मे जन जागण की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिये ग्राम संसद अभियान संगठित रूप से अपने को जन जागरण तक सीमित रख रहा है। जन जागरण के बाद कौन सा मार्ग आगे आयेगा वह लोक तय करेगा ग्राम संसद अभियान नही। आम नागरिको से अपेक्षा है कि वे इस संगठन के साथ जुडकर जनजागरण मे सक्रिय होंगे।

मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार तथा ग्राम संसद अभियान के संयुक्त प्रयासों से सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग खुल सकता है।

सामयिकी- बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 11, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भारत मे स्वतंत्रता के पूर्व श्रम शोषण के उद्देश्य से सवर्ण आरक्षण था। भीम राव अम्बेडकर एक बडे बुद्धिजीवी थे जो जन्म से तो अवर्ण थे किन्तु श्रम शोषण के लिये अन्य सवर्णो की तुलना मे बहुत आगे थे। उस समय भारत की सम्पूर्ण अवर्ण आबादी मे एक प्रतिशत आबादी ही बुद्विजीवी थी अन्यथा शेष निन्यानवे प्रतिशत श्रमजीवी थी। अम्बेडकर जी ने गुप्त रूप से सवर्ण बुद्धिजीवियो और अवर्ण बुद्धिजीवियो के बीच एक समझौता करा दिया। यह गुप्त समझौता ही जातीय आरक्षण नाम से विख्यात है।

हर सवर्ण से लेकर अवर्ण बुद्धिजीवी श्रम शोषण के उद्देश्य से किये गये इस समझौते के लिये अम्बेडकर जी की प्रशंसा करता है क्योकि अम्बेडकर जी नही होते तो श्रम और बुद्धि के बीच इतना फर्क नही रहता । ग्रामीण उद्योग धंधे खतम नही होते। श्रम की मांग और मूल्य बढता । निन्यान्नवे प्रतिशत श्रमजीवी अवर्णो को लाभ होता और दो तीन प्रतिशत अवर्ण सवर्ण अम्बेडकर जी की आलोचना करते । आज श्रम का मूल्य एक सौ अस्सी से अधिकतम तीन सौ पचास रूपये प्रतिदिन है तो एक चपरासी से लेकर प्रायमरी स्कूल का मास्टर आधी मेहनत करके भी हजार से पंद्रह सौ रूपये तक प्राप्त करता है। कुछ अवर्ण नेता बनकर जो आनंद कर रहे है वह आनंद सिर्फ अम्बेडकर जी की ही कृपा का परिणाम है अन्यथा संभव है कि श्रम और बुद्धि के बीच इतना अमानवीय फर्क नही होता और इनका वेतन भी हजार पंद्रह सौ की तुलना मे आधे से भी कम ही होता।

आरक्षण के समर्थन विरोध की लडाई बुद्धि और श्रम के बीच बेमेल समीकरण की नही है। लडाई तो लूट के माल के बंटवारे की है। श्रम शोषण से प्राप्त साशत अवर्ण उस हिस्सेदारी को छोडने को तैयार नही है। मैने पूरे भारत मे एक भी बुद्धिजीवी नही देखा जो श्रम और बुद्धि के बीच की दूरी घटाने की बात करता हो। कई बुद्धिजीवी तो नौकरी के घमंड मे पकौडा बेचने को नीच काम तक कहने लगते है और श्रमजीवियो का अपमान करने मे सवर्ण अवर्ण का कोई भेद नही करते।

आरक्षण के पक्ष विपक्ष मे टकराव को खतम करने का सिर्फ एक ही आधार है कि सरकारी नौकरी और प्रायवेट वेतन की असमानता खतम कर दीजिये। नौकरी को या तो बाजार मूल्य आधारित कर दे या टेंडर शुरू कर दे। सारी मारामारी खतम । अम्बेडकर की पूजा बंद। आरक्षण के पक्ष विपक्ष की लडाई बंद। न रहेगा लूट का माल न बंटवारे का झगडा।

मंथन क्रमांक 80- ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे? बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 7, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।
यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोगजार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।
इन सब परिस्थितियों का आकलन करके ही बासठ वर्ष पूर्व हम कुछ मित्रो ने रामानुजगंज शहर मे ज्ञान यज्ञ की शुुरूआत की । रामानुजगंज मे बासठ वर्षो से प्रतिमाह की एक निश्चित तारीख को आधे घंटे की धार्मिक प्रक्रिया से प्रारंभ करके दो घंटे की एक पूर्व निश्चित विषय पर चर्चा होती है जो अबतक सफलता पूर्वक जारी है। अबतक करीब तीन सौ अलग अलग विषयो पर स्वतंत्र चर्चा हो चुकी है । अन्य नये विषय भी शामिल होते है। सोचा गया था कि एक शहर यदि समस्याओ के समाधान मे आगे बढकर आदर्श प्रस्तुत करेगा तो अपने आप देश पर उसका प्रभाव पडेगा । रामानुुजगंज शहर मे इस प्रयत्न को अच्छी सफलता भी मिली किन्तु धीरे धीरे वे सफलताए रामानुजगंज से बाहर विस्तार नही कर सकीं क्योकि बाहर के लोगो को शराफत से आगे निकालकर समझदारी की ओर ले जाने का हमने कोई प्रयास नही किया। बल्कि उसका दुष्परिणाम हुआ कि रामानुजगंज पर भी बाहर की हवाओ का प्रभाव धीरे धीरे पडने लगा। बाहर के सभी शरीफ और धूर्त इकठ्ठे होकर रामानुजगंज की व्यवस्था के विरूद्ध सक्रिय हो गये। वहां भी साम्प्रदायिकता अथवा जातिवाद के नाम पर संगठन बनने लगे । वहां भी राजनैतिक टकराव आंशिक रूप से पैर फैलने लगा । कर्मचारियो और नागरिको के बीच की एकता कमजोर होने लगी। अब तो ऐसा भी दिख रहा है कि वहां धीरे धीरे अपराधियो का भी प्रवेश शुरू हो जायेगा । चोरी डकैती गुंडा गर्दी दादागिरी से अभी तक तो सुरक्षित है किन्तु जब सामाजिक एकता ही छिन्न भिन्न हो जायेगी तो कब तक बचा सकेंगे।
स्पष्ट है कि हम प्रयोग मे सफल होकर भी असफल हुए, क्योकि ऐसे वैचारिक प्रयोग किसी एक क्षेत्र से सफल नही हो पाते । इसलिये यह सोचा गया कि अब ज्ञान यज्ञ का विस्तार राष्टीय स्तर पर हो । साथ ही हम समस्याओ का समाधान करने का प्रयत्न न करे। हम वर्ग विद्वेश मे सक्रिय समूहो का विरोध न करके सामाजिक एकता की एक और अधिक बडी लकीर खीचने का प्रयास क्यो न करें। इसका अर्थ हुआ कि हम जाति धर्म भाषा आदि के नाम पर बने संगठित समूहो का विरोध न करके एक संयुक्त समूह की ओर बढने का प्रयत्न करे जैसा रामानुजगंज मे प्रारंभ मे किया गया था। अर्थात ज्ञान यज्ञ के नाम से एक प्रकार के लोग एक साथ बैठने की आदत डाले । भले ही वे किसी भी संगठन के सदस्य क्यो न हो।
ज्ञान यज्ञ की विधि बहुत सरल है। पूरा कार्यक्रम यदि तीन घंटे का है तो आधा घंटा यज्ञ यथवा किसी अन्य भावनात्मक धार्मिक कार्यक्रम से श्रद्धा पूर्वक शुरूआत करनी चाहिये। यह समय पूरे कार्यक्रम का एक/छः से अधिक न हो । दो घंटा किसी एक पूर्व निश्चित विषय पर स्वतंत्र विचार मंथन होना चाहिये जिसमे विपरीत विचारो के लोग अपनी बात स्वतंत्रता पूूर्वक कहने की हिम्मत कर सके और दूसरे लोग विपरीत विचारो को सुनने की अपनी सहन शक्ति जागृत कर सकें । अंतिम आधा घंटा मे स्वराज्य प्रार्थना तथा प्रसाद वितरण आदि का कार्य होता है। आयोजक अपनी श्रद्धा अनुसार धार्मिक क्रिया के लिये स्वतंत्र है। चर्चा का विषय भी चुनने के लिये आयोजक स्वतंत्र है। किन्तु वक्ता की स्वतंत्रता को किसी भी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता भले ही वह किसी की भावनाओ के विरूद्ध ही क्यो न हो। ज्ञान यज्ञ के बैनर तले कोई सामूहिक निष्कर्ष निकालना प्रतिबंधित है । सब लोग व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालने को स्वतंत्र हैं । ज्ञान यज्ञ के बैनर तले न कोई भी अन्य सक्रियता हो सकती है न ही योजना बन सकती है। अर्थात ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य व्यक्तिगत रूप से अथवा अन्य बैनर तले बाढ सहायता राष्ट्रीय संकट मे मदद या भूखो को भोजन आदि सेवा कार्य करने को स्वतंत्र है, किन्तु ज्ञान यज्ञ के नाम से पूरी तरह प्रतिबंधित है। ज्ञान यज्ञ की केवल एक ही सक्रियता है कि भिन्न विचारो के लोग एक साथ बैठकर स्वतंत्रता पूर्वक विचार मंथन कर सके तथा भावना और बुद्धि के बीच विवेक एंव शराफत और चालाकी के बीच समझदारी का विस्तार हो सके। मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को रोकने का प्रयास छोडकर वर्ग मुक्त वर्ग खडा करने का जो भी प्रयास करेगा वह अपने आप स्वाभाविक रूप से समाधान होगा । समस्याओ का समाधान करने मे तो भारत मे गली गली मे लोग मिल जायेगे किन्तु ज्ञान यज्ञ का प्रयास यह है कि समस्याओ की प्राकृतिक रूप से आधोशित तरीके से कम होने की प्रणाली विकसित की जाये । ज्ञान यज्ञ एक ऐसी ही सफल प्रणाली है जिसमे ज्ञान यज्ञ परिवार पूरे राष्टीय स्तर पर सक्रिय हो रहा है।
ज्ञान यज्ञ परिवार मे जुडने के लिये एक ही शर्त है कि ऐसे व्यक्ति को कम से कम वर्ष मे एक बार ज्ञान यज्ञ मे शामिल होने की प्रतिबद्धता स्वीकार करनी चाहिये। ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को हम ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य मान रहे है। इस सदस्यता मे कोई जाति धर्म का भेद नही है। अपराध निरपराध का भी भेद नही है। राष्टीयता का भी भेद नही है। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य बन सकता है। इस सदस्यता का न कोई शुल्क है न कोई अन्य प्रतिबद्धता।
मै समझता हॅू कि विनोबा जी ने ऐसे कार्य को नाहक मिलन शब्द से स्थापित किया था । मुझे तो पूरा विश्वास है कि ज्ञान यज्ञ के माध्यम से हम समाज सशक्तिकरण की दिशा मे तेजी से कदम बढा सकेंगे और समाज सशक्तिकरण अनेक समस्याओ का समाधान करने मे सफल होगा । हमारे कुछ मित्र ग्राम संसद अभियान के माध्यम से राज्य कमजोरी करण का जो अभियान चला रहे है उनकी सफलता के लिये भी हम ईशवर से प्रार्थना करते है। अपनी बासठ वर्ष की सक्रियता तथा अनुभव के आधार पर मै आश्वस्त कि भारत की सभी समस्याओ के समाधान की शुरूआत ज्ञान यज्ञ विस्तार के माध्यम से हो सकती है। जब भिन्न विचारो के लोग अपने अपने संगठनो मे रहते हुए भी एक साथ बैठकर चर्चा करने की आदत डालेगे तो परिणाम अवश्य ही अच्छे होंगे । इसी आधार पर हम ज्ञान यज्ञ परिवार का राष्टीय स्तर पर सफलता पूर्वक विस्तार कर रहे है। कुछ लोग मानते है कि इसका कोई बडा लाभ नही होगा । हो सकता है ऐसा हो किन्तु मै आश्वस्त हॅू कि इस प्रयत्न का कोई नुकसान नही होगा। जो लोग अन्य प्रयत्नो मे लगे है उनके किसी प्रयत्न मे ज्ञान यज्ञ परिवार जरा भी बाधक नही है। वे अपने प्रयत्नो मे सफल हो इससे हमे कोई कठिनाई नही। ज्ञान यज्ञ परिवार नये तरीके से समाज सशक्तिकरण का कार्य कर रहा है।
मंथन का अगला विषय ग्राम संसद क्यो क्या और कैसे ?

जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 3, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा की गारंटी देती है तो राष्टीय सुरक्षा के अतर्गत सरकार विदेशी आक्रमणो से अपनी सीमाओ की सुरक्षा की व्यवस्था करती है। सामाजिक सुरक्षा के लिये सरकार पुलिस विभाग बनाती है तो राष्टीय सुरक्षा के लिये सेना भर्ती करती है। दोनो ही महत्वपूर्ण हैं किन्तु समाज के लिये दोनो मे से क्या अधिक महत्वपूर्ण है यह विचारणीय है।
कोई भी सरकार सेना को अधिक महत्वपूर्ण मानती है क्योकि उसके लिये सीमाओ की सुरक्षा बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। समाज पुलिस विभाग को अधिक महत्व देता है क्योकि उसकी सुरक्षा मे सेना की भूमिका नगण्य और पुलिस विभाग की बहुत महत्वपूर्ण होती है। हर अपराधी लगातार यह प्रयत्न करता है कि पुलिस का मनोबल गिरा रहे क्योकि पुलिस ही उसके अपराधीकरण मे बडी बाधा होती है। यहां तक कि अपराधी न्यायालय से उतना नही डरते जितना पुलिस से डरते है। अपराधियो को सेना से कोई विशेष खतरा नही होता। दूसरी ओर दूसरे देश के लोग हमेशा यह प्रयत्न करते है कि पडोसी देश की सेना का मनोबल लगातार गिरा हुआ रहे क्योकि सशक्त सेना ही उसके लिये बडी बाधा होती है। यदि हम भारत का आकलन करे तो सम्पूर्ण भारत मे भी लगभग वही हाल है। भारत का भी हर अपराधी लगातार पुलिस विभाग का मनोबल तोडने का प्रयत्न करता है। किसी भी पुलिस वाले से कोई गलत कार्य हो जाये तो पूरे पुलिस विभाग पर आरोग लगाया जाता है। न्यायपालिका के लोग भी अपने न्यायालय मे पुलिस विभाग के लोगो के साथ बहुत ही नीचे स्तर का व्यवहार करते है। आम आदमी पुलिस विभाग को भ्रष्ट कहने मे गर्व का अनुभव करता है किन्तु जितने भी छापे पडे है उनमे पुलिस वालो की तुलना मे दूसरे विभागो का खजाना कई गुना अधिक पकडा जाता है। हर नेता पुलिस वालो पर गैर कानूनी कार्य करने के लिये दबाव बनाता है और जब पुलिस वाला बदनाम होता है तब वह किनारे हो जाता है। थाने नीलाम होते है और नीलाम करने वाला कभी भ्रष्ट नही कहा जाता है। भ्रष्ट मान जाता है, पुलिस वाला जो नीलामी मे थाने की बोली लगाता है।
दूसरी ओर सेना के सैनिको का सम्मान बना रहे इस बात का प्रयत्न पूरी सरकार करती है, पूरी न्यायपालिका करती है, हर नेता करता है और हर नागरिक से भी चाहता है कि सेना के सैनिक को सर्वोच्च सम्मान दिया जाय। किसी नेता ने पुलिस वालो के पक्ष मे कुछ बोल दिया तो सब उस नेता पर टूट पडते है जबकि किसी नेता ने सिर्फ यह कह दिया कि सैनिक तो जान देने के लिये ही बार्डर पर रहता है तो ऐसे नेता को माफी तक मागनी पडी। अगर कोई सैनिक शहीद होता है तो उसे लगभग एक करोड रूपये की सहायता दी जाती है उसके बाद भी उसके परिवार वाले पचीस तरह का नाटक करते रहते है, जबकि पुलिस वालो के लिये यह राशि बहुत छोटी होती है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि पुलिस समाज की सुरक्षा करती है और सेना देश की । फिर भी पुलिस और सेना के बीच इतना अंतर क्यो। पुलिस वालो के पद हमेशा खाली रहते है जबकि सेना का बजट हमेशा बढाने की मांग होती है । भारत मे आंतरिक असुरक्षा लगातार बढती जा रही है जबकि वार्डर के असुरक्षित होने का अभी तक कोई बडा खतरा नही दिखता । इसके बाद भी लगातार समाज मे इस प्रकार की भावना फैलायी जा रही है, जिससे पुलिस का मनोबल गिरा रहे । राष्टीय सुरक्षा के लिये भारत सरकार पूरे प्रयत्न कर रही है। यदि सीमाओ पर कोई असुरक्षा होगी तब भारत सरकार जनता का आहवान करेगी और जनता को ऐसे संकट मे सेना के साथ जुट जाना चाहिये किन्तुु अपराधियो और गुण्डा तत्वो से पुलिस निपटने मे किसी न किसी कारण से कमजोर पडती है तब सरकार या पुलिस के समर्थन मे आहवान के बाद भी कोई नही आता। कोई अपराधी अनेक अपराध करने के बाद भी भ्रष्टाचार या तकनीकी कारणो से निर्दोष सिद्ध हो जाता है तब भी न्यायपालिका से किसी तरह का कोई प्रश्न नही होता। प्रश्न होता है पुलिस से कि उसने ठीक से जांच नही की। ऐसा लगता है जैसे न्यायपालिका का नेतृत्व भगवान के पास हो और पुलिस मे सारे भ्रष्ट लोग भरे हुए है। यदि बार बार न्यायपालिका से मुक्त हुए वास्तविक अपराधी को पुलिस फर्जी मुठभेड मे मार देती है तो सारे निकम्मे नेता मानवाधिकारवादी न्यायालय सभी अपने अपने विलो से निकलकर अपराधी के पक्ष मे चिल्लाना शुरू कर देते है। कोई नही कहता कि पुलिस वाले ने अच्छी नीयत से गैर कानूनी कार्य किया है अर्थात कानून पुलिस वाले को दंडित करेगा किन्तु समाज को इस संबंध मे निर्पेक्ष रहना चाहिये। कश्मीर मे दो सैनिक पाकिस्तान की सेना द्वारा मार दिये जाते है और किसी शहर मे अपराधियो द्वारा चार व्यक्तियो की हत्या कर दी जाती है । कश्मीर मे मारे गये सैनिक और अपराधियो द्वारा मारे गये नागरिक के बीच आसमान जमीन का फर्क होता है। सैनिक नागरिको द्वारा दिये गये वेतन से वहां नियुक्त है और नागरिक वेतन देने वाला मालिक है। कोर्इ्र भी देश प्रेमी मालिक की चिंता बिल्कुल नही करते । मेरे विचार मे राष्टीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा के बीच यह अंतर खतरनाक है। पुलिस विभाग का गिरता मनोबल इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आपराधिक मनोबल बढ रहा है। रामानुजगंज के लोगो ने लीक से हटकर ज्ञान यज्ञ के माध्यम से एक नया प्रयोग किया, जिसमे पुलिस विभाग का मनोबल उंचा करने का प्रयत्न हुआ। उसका परिणाम हुआ कि रामानुजगंज शहर मे देश के अन्य भागो की तुलना मे एक प्रकार के अपराधो का ग्राफ बहुत तेजी से गिरा ।
मै चाहता हॅूु कि हम राष्टीय सुरक्षा के साथ साथ सामाजिक सुरक्षा का भी महत्व समझे। राष्ट्र प्रेम का यह अर्थ नही है कि हम समाज को लगातार कमजोर होने दे । राष्ट और समाज के बीच एक संतुलन होना ही चाहिये जो वर्तमान समय मे बिगड रहा है। राष्ट को ही सरकार और सरकार को ही समाज मान लेने की भूल हो रही है। इस दिशा मे देश के चिंतनशील लोगो को विचार करना चाहिये।
मंथन का अगला विषय-ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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