Lets change India
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...
हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति ...
कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है। 1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है। 2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरू...
सामयिकी–बजरंग मुनि
लम्बे समय से दुनियां की अर्थ व्यवस्था श्रम शोषण के आधार पर अपनी योजनाएं बनाती रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत भी उनकी नकल करता रहा । भारत की सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था मे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कि...
ज्ञान यज्ञ–बजरंग मुनि
ज्ञान यज्ञ का कार्येक्रम 3 घंटे व प्रति माह अम्बिकापुर छ०ग० दिनाँक:- 22 मई 2018 दिन मंगलवार समय:- सायं 06.30 बजे से 09.30 बजे तक सयुंक्त परिवार विषय पर चर्चा, स्थान:- अग्रेसन भवन अम्बिकापुर छत्तीसगढ़ में रखा ...

मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा

Posted By: admin on May 26, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।
1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।
2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष की जन्मदर लगभग बराबर होती है। किसी प्रकार का असंतुलन होने पर प्रकृति स्वयं संतुलन बना लेती है।
3 प्रत्येक महिला और पुरूष के बीच एक प्राकृतिक आकर्षण होता है जिसकी तुलना लोहा और चुम्बक से होती है।
4 प्रत्येक व्यक्ति मे लोहा और चुम्बक दोनो की मात्रा अवश्य होती है भले ही वह अलग अलग और असमान होती है चाहे महिला हो या पुरूष।
5 सवर्णो या धनवानो मे यौन शुचिता को आर्थिक प्रगति की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता हैं जबकि गरीबो और अवर्णो मे आर्थिक आवश्यकता को यौन शुचिता से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
6 आजतक यह निश्चित नही हो सका कि सैद्धान्तिक रूप से महिला और पुरूष के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। दूरी का घटना बढना व्यक्ति की शारीरिक आवश्यकता पारिवारिक वातावरण, तथा सामाजिक व्यवस्था के सम्मिलित मापदंड से बनती है।
स्पष्ट है कि महिला और पुरूष के बीच यदि दूरी घटेगी तो यौन शुचिता से आंशिक मझौता करना ही पडेगा । यदि यौन शुचिता अधिक महत्वपूर्ण है तो दोनो के बीच दूरी बढाना आवश्यक है। इसीलिये समाज मे कभी भी यह नियम नही बना कि दोनो के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। सिद्धान्त रूप से यह स्वतंत्रता प्रत्ये्यक्ति को अथवा परिवार को प्राप्त है। कोई अन्य स्वतंत्रता मे बाधक नही बन सकता। स्त्री और पुरूष के बीच आकर्षण इतना अधिक तीव्र होता है कि उसकी गति प्रकाश या बिजली की गति से भी अधिक मानी जाती है। इस आकर्षण को कभी बल पूर्वक नही रोका जा सकता। यह अवश्य है कि इसे परिस्थिति अनुसार अनुशासित किया जा सकता है। इसी अनुशासन की प्रथा के रूप मे विवाह और पर्दा प्रथा प्रचलित हुई। पर्दा प्रथा इस तीव्र आकर्षण के बीच एक कुचालक का काम करती है। इस तरह पर्दा प्रथा कोई कुव्यवस्था नही है । न ही कोई सामाजिक कुरीति है क्योकि यह बाध्यकारी नही है, नियमानुसार नही है और कानून सम्मत भी नही है। अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार स्वैच्छिक है।
कुछ लोगो का यह मानना है कि प्राचीन समय मे पर्दा प्रथा नही थी बल्कि यह मुगल काल से भारत मे आयी क्योकि मुगलो मे पहले से पर्दा प्रथा थी और मुगल अन्य महिलाओ पर तुलनात्मक रूप से अधिक लालायित होते थे। इसलिये सुरक्षा की दृष्टि से पर्दा प्रथा विकसित हुई। मेरे विचार से यह धारणा गलत है क्योकि मुगलो के पूर्व भी उच्च वर्ण मे यह धारणा थी कि बालिग या वयस्क भाई-बहन, मां-बेटा अथवा जेष्ठ और बहू भी कभी एकांत वास न करे न ही कभी अनावश्यक एकांत बात चीत करे बल्कि दोनो के बीच एक संतुलित दूरी रहनी चाहिये। स्पष्ट है कि यही से पर्दा प्रथा का अस्तित्व समझ मे आता है।
यौन शुचिता के आधार पर ही समाज मे यह धारणा विकसित हुई कि उच्च वर्ग की महिलाओ को बिना किसी सुरक्षा के अकेले मे बाहर नही निकलना चाहिये। उसके साथ साथ उचित पर्दा और सामान्य ड्रेस की भी सलाह दी जाती थी। उच्च वर्ग के बीच महिलाओ को कभी रोजगार मे लगाना भी अच्छा नही माना जाता था क्योकि पर्दा प्रथा के कारण उनका रोजगार करना भी कठिन था तथा बच्चो की जन्मदर अधिक होने के कारण उन्हे बाहर निकलने के अवसर भी कम मिलते थे। परिस्थितियां बदली जब भारत मे पश्चिम की गुलामी आयी तब यहां यौन शुचिता को कम महत्व दिया जाने लगा। महिला और पुरूष के बीच दूरी घटायी गई । बच्चो की जन्म दर कम की गई । महिलाओ को रोजगार मे लगाया गया। जब भारत साम्यवाद की तरफ बढा और साम्यवाद ने वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग संघर्ष को अपना प्रमुख आधार बनाया, तब भारत मे महिला सशक्तिकरण का एक नया प्रयोग शुरू हुआ। इस तरह पर्दा प्रथा जो पहले स्वैच्छिक थी वह समाज सुधार के नाम पर एक नये व्यवासाय का आधार बन गयी। योजना पूर्वक पर्दा प्रथा को एक सामाजिक कुरीति के रूप मे प्रचारित किया गया। साथ ही महिला और पुरूष के बीच की दूरी भी घटाई गई। स्वाभाविक है कि ये दोनो प्रयत्न पश्चिम की संस्कृति के भी अनुकूल थे और साम्यवादी लक्ष्य की ओर भी बढाने वाले थे। यह नया व्यवसाय राजनैतिक आश्रय पाकर खूब फला फूला । अब स्वतंत्रता के बाद भी भारत इन दोनो बीमारियों से ग्रस्त है। अब भी पर्दा प्रथा को एक बुराई के रूप मे प्रचारित किया जाता है और महिला पुरूष के बीच दूरी कम करना भी एक सामज सुधार का कार्य माना जाता है । किन्तु इसके साथ साथ इसमे होने वाले दुष्परिणामो को भी बढा चढाकर एक गंभीर समस्या के रूप मे इस तरह पेश किया जाता है कि साम्यवादियो की एक मात्र इच्छा वर्ग संघर्ष से भारत के महिला और पुरूष किसी भी रूप मे बच न सके। मै किसी भी रूप मे पर्दा प्रथा का समर्थक नही हॅू । मै महिला और पुरूष के बीच दूरी घटाने या बढाने मे से भी किसी एक का पक्षधर नही हॅू । मेरे विचार मे प्रत्येक व्यक्ति परिवार या समाज को यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वे इस संबंध मे अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार निर्णय कर सके। किसी को यौन शुचिता की अपेक्षा धन की अधिक आवश्यकता है तो वह धन का उपयोग कर सकता है और किसी को यौन शुचिता महत्वपूर्ण लगे तो वह धन का मोह छोड सकता है। अपने अपने निर्णय की स्वतंत्रता होनी चाहिये। महिला और पुरूष के बीच दूरी या पर्दा प्रथा के मामले मे भी परिवारो को पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिये। बलात्कार के गंभीर अपराधो को छोडकर अन्य किसी भी प्रकार के महिला पुरूष संबंधो पर राज्य को कोई कानून नही बनाना चाहिये। यहां तक कि छेडछाड की घटनाएं भी यदि सामाजिक नियंत्रण से बाहर न हो तब तक सरकारो को हस्तक्षेप नही करना चाहिये। यह नही हो सकता कि महिलाएं जान बूझकर महिला पुरूष के बीच की दूरियों को घटाती जाये और उसके स्वाभाविक आकर्षण रूपी परिणाम का दोष एक पक्ष पर डालते जाये। यह उचित नही है । मेरे विचार से पर्दा प्रथा एक पुरानी व्यवस्था है जिसमे परिस्थिति अनुसार सुधार किया जा सकता है किन्तु ऐसा सुधार स्वैच्छिक होना चाहिये । किसी कानून के आधार पर नही किसी अभियान के आधार पर नही।

मंथन का अगला विषय कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित होगा

सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 24, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

लम्बे समय से दुनियां की अर्थ व्यवस्था श्रम शोषण के आधार पर अपनी योजनाएं बनाती रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत भी उनकी नकल करता रहा । भारत की सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था मे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के विरूद्ध पूंजीपति शहरी बुद्धिजीवी किसानो के उत्पादन तथा उपभोग की सभी वस्तुओ पर भारी कर लगाकर आवागमन या संचार माध्यमो को सस्ता करने पर खर्च किया गया। शिक्षा का बजट लगातार बढाया गया और पूर्ति के लिये रोटी कपडा मकान दवा जैसी मूल भूत आवश्यक वस्तुओ पर भारी कर लगाये गये।
आज भारत की सभी आर्थिक समस्याओ का मुख्य कारण डीजल पेट्रोल की बढती खपत के साथ जुडा है। कृत्रिम उर्जा की बढी खपत पर्यावरण प्रदूषण बढाती है, विदेशी आयात बढाने के लिये मजबूर करती है, श्रम की मांग और मूल्य बढने नही देती, ग्रामीण उधोग धंधे खत्म करती है। यह भी निर्विवाद है कि कृत्रिम उर्जा के मंहगा होने से उसकी खपत घटती है, श्रम की मांग और मूल्य बढता है, ग्रमीण उधोग उन्नति करते है, पर्यावरण प्रदूषण घटता है। फिर भी भारत मे कोई सरकार इतनी हिम्मत नही कर पा रही कि वह सीधे सीधे डीजल पेट्रोल का मूल्य ढाई गुना करके भारत की सभी आर्थिक परेशानियों से मुक्ति पा जावे। उसे डर लगता है शहरी, बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों के संगठित आक्रोश का। डीजल पेट्रोल की थोडी सी मूल्य वृद्धि होते ही सभी श्रम शोषक एक स्वर से उसके विरूद्ध चिल्लाना शुरू कर देते है। अमीरो के एजेन्ट बुद्धिजीवी मीडिया कर्मी तथा चैनल वाले एक स्वर से उसके विरूद्ध अभियान छेड देते है। विपक्ष इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और सरकार डरकर मूल्य वृद्धि से राहत की योजना बनाने लगती है। अब इस समस्या से निपटने का अभियान छिडना चाहिये। श्रम शोषको के विरूद्ध ग्रामीणो गरीबो श्रमजीवियो कृषि उत्पादको का एक मजबूत प्रेशर ग्रुप बनना चाहिये जो कृ़ित्रम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि के लिये सरकार पर दबाव बना सके तथा डीजल पेट्रोल के बढते आयात के विरूद्ध जनमत खडा कर सके।

ज्ञान यज्ञ–बजरंग मुनि

Posted By: admin on in Recent Topics - Comments: No Comments »

33343120_642356746109218_2911824072469905408_nज्ञान यज्ञ का कार्येक्रम 3 घंटे व प्रति माह अम्बिकापुर छ०ग० दिनाँक:- 22 मई 2018 दिन मंगलवार समय:- सायं 06.30 बजे से 09.30 बजे तक सयुंक्त परिवार विषय पर चर्चा, स्थान:- अग्रेसन भवन अम्बिकापुर छत्तीसगढ़ में रखा गया। ज्ञान यज्ञ की शुरुआत आधा घंटे भावनात्मक, 2 घंटे पर विभिन्न विचारकों, बुद्धिजीवी व आये भावनात्मक लोगो ने विचार रखा साथ ही मुनि जी ने भी सयुंक्त परिवार पर अपना अनुभव रखा। जिसमे मुनि जी कहा कि परिवार व्यवस्था को सहजीवन की पहली पाठशाला बताया है और प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था के साथ अवश्य ही जुडना चाहिए। किन्तु पिछले कुछ सौ वर्षो से हम देख रहे है कि परिवार व्यवस्था टूट रही है। किसी भी व्यवस्था में यदि रुढिवाद आता है तो उसके दुष्परिणाम भी स्वाभाविक है।

मैं जिन मुददो पर गंभीरतापूर्वक सोचता हॅू किन्तु साथ ही यह भी महसूस करता हॅू कि मेरी सोच वर्तमान प्रचलित धारणाओं के विपरीत है उन्हें समाज के बीच प्रस्तुत करने के पूर्व मैें लम्बा प्रयोग भी अवश्य करता हॅू। मैं बचपन से ही महसूस करता था कि परिवार व्यवस्था बहुत अच्छी व्यवस्था है किन्तु उसमें विकृति आ गई है और उसे टूटने से बचाने के लिए कुछ सुधार करने होंगे। मैंने ऐसे सुधार के लिए करीब 50 वर्ष पूर्व ही अपने परिवार को चुना। उस समय मेरे परिवार में कुल 10 सदस्य थे और हम सबने बैठकर चार महत्वपूर्ण निर्णय लिये-

(1) परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर दसो सदस्यों का सामूहिक अधिकार होगा, जो उसके अलग होते समय ही उसे समान रुप से प्राप्त हो सकेगा।
(2) परिवार का प्रत्येक सदस्य सामूहिक अनुशासन में रहने के लिए बाध्य होगा।
(3) परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड सकता है अथवा कभी भी बिना कारण बताये परिवार से हटाया जा सकता है।
(4) परिवार में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर हमारे कुटुम्ब प्रमुख के समक्ष अपील हो सकती है जिनका निर्णय सबके लिए बाध्यकारी होगा।

हमारे परिवार में 50 वर्षो से लगातार संख्या घटती बढती रही। अब हमारा एक परिवार विभाजित होकर तीन परिवार बन गये है तथा हमारे कुटुम्ब में कुल 6 परिवार है। हमारे पूरे परिवार में उपरोक्त व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यहाॅ तक कि कुटुम्ब अर्थात 6 परिवारों के पूरे 50 सदस्य हर चार महिने में कहीं एक साथ बैठकर विचार मंथन किया करते है। यह प्रक्रिया भी 50 वर्षो से निरंतर चल रही है। परिवार की आंतरिक बैठक तो समय समय पर होती ही रहती है। हमारे कुटुम्ब का प्रमुख भी सभी सदस्य मिलकर ही चुनते है। वर्तमान में हमारे कुटुम्ब के प्रमुख हमारे सबसे छोटे भाई है जबकि तीन बडे भाई अभी भी सक्रिय है। कुछ महिने पूर्व हमारे परिवार ने यह महसूस किया कि अब इस प्रणाली को सार्वजनिक तथा कानूनी स्वरुप दिया जाये । हम लोगो ने परिवार का एक सार्वजनिक और कानूनी स्वरुप इस प्रकार बनाया -

समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.)
यह समझौता ज्ञापन आज दिनांक 23.10.2016 को नीचे लिखे तेरह सदस्यों की आपसी सहमति से तैयार तथा कार्यान्वित हो रहा है। सबने आपसी सहमति से स्वयं को भौतिक तथा कानूनी रुप से ज्ञापन में लिखे नियमों से एक सूत्र मंे बांधा है।
नियम-
(1)समूह का नाम कांवटिया परिवार क्रमांक एक होगा।
(2)परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार के सभी सदस्यों की चल, अचल, नगद, ज्वेलरी, बान्ड, लेनदारी, देनदारी या अन्य किसी भी प्रकार की वर्तमान तथा भविष्य में अर्जित सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार होगा। अर्थात् वर्तमान में प्रत्येक सदस्य का हिस्सा तब तक तेरहवा हिस्सा होगा जब तक सदस्य संख्या कम या अधिक न हो।
(3)परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने व्यापार, आय, व्यय, संग्रह, कर्ज, अलग रखने के लिये उस सीमा तक स्वतंत्र होगा जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(4)परिवार का कोई भी सदस्य पूरी तरह परिवार के अनुशासन से बंधा होगा। उसकी राजनैतिक ,धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधि उस सीमा तक ही स्वतंत्र होगी जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(5)परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड़ सकता है अथवा परिवार द्वारा परिवार से हटाया जा सकता है किन्तु हटने वाला सदस्य परिवार से हटते समय की सम्पूर्ण सम्पत्ति में से सदस्य संख्या के आधार पर अपना हिस्सा ले सकता है।
(6) परिवार में रहते हुये परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर प्रत्येक सदस्य का सामूहिक अधिकार होगा, व्यक्तिगत नहीं। कोई सदस्य किसी अन्य को भविष्य के लिये कोई विल, दानपत्र अथवा अधिकार पत्र या घोषणा नहीं कर सकेगा क्योंकि परिवार में रहते हुए उसकी किसी सम्पत्ति पर उसका परिवार की सहमति तक ही व्यक्तिगत अधिकार है।
(7) परिवार के किसी सदस्य का नवजात बालक तत्काल ही परिवार का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त सदस्य प्राकृतिक रुप से ही मान लिया जायेगा। तत्काल ही सम्पूर्ण सम्पत्ति में उसका बराबर हिस्सा हो जायगा। परिवार में रहते हुए किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो प्राकृतिक रुप से उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
(8)परिवार के बाहर के कोई भी व्यक्ति (स्त्री,पुरुष,या बालक,बालिका) परिवार की सहमति से परिवार के सदस्य बन सकते हैं। सदस्य बनते ही उन पर ज्ञापन की सभी कंडिकाओं के अधिकार और कर्तव्य लागू हो जायेंगे।
(9)परिवार का कोई बालक बारह वर्ष की उम्र तक ना बालिग माना जायगा। उम्र पूरी होते तक बालक के परिवार से निकलने अथवा निकालने की स्थिति में उस क्षेत्र की स्थानीय इकाई अर्थात् ग्राम सभा या नगरीय निकाय को सूचना दी जायगी। उसके हिस्से की सम्पत्ति भी उक्त स्थानीय निकाय की सहमति से बनाई गई व्यवस्था के अन्तर्गत ही स्थानान्तरित हो सकेगी।
(10) परिवार के सदस्य आपसी सहमति से परिवार के संचालन के लिये आंतरिक उपनियम बना सकेंगे तथा आवश्यकतानुसार उनमें फेर बदल भी कर सकेंगे। ऐसे सभी नियम या फेर बदल सभी सदस्यों के हस्ताक्षर से ही लागू होंगे।
(11) यदि परिवार का कोई सदस्य परिवार की सहमति के बिना कोई कर्ज लेता है, नुकसान करता है, सरकारी कानून का उल्लंघन करता है तो उक्त सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति तक ही सीमित होगी। परिवार के किसी अन्य सदस्य की सम्पत्ति उससे प्रभावित नही होगी। किन्तु परिवार मे रहते तक उस सदस्य का सामुहिक सम्पत्ति मे बराबर का हिस्सा बना रहेगा जो उसे परिवार छोडने की स्थिति मे प्राप्त हो सकता है।
(12 ) परिवार का कोई सदस्य परिवार के निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह उच्चसमिति के समक्ष अपनी बात रख सकता है। उच्चसमिति में तीन सदस्य होंगे-1. राजेन्द्र कुमार ,आत्मज-धुरामल जी, 2. कन्हैयालाल,आत्मज-धुरामल जी, 3. सुशील कुमार, आत्मज-राधेश्याम जी । उच्चसमिति का निर्णय अंतिम होगा।
(13) यदि इस ज्ञापन की कोई कन्डिका किसी कानून के विरुद्ध जाती है तो न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा। किसी तरह के विवाद की स्थिति में भी विवाद के समय प्रचलित कानून के नियमों के अनुसार लिये गये न्यायालयीन निर्णय मान्य होंगे।
(14) ज्ञापन की किसी कंडिका में कुछ जोड़ना,घटाना या सुधार करना हो तो उसी प्रक्रिया से हो सकता है जिस प्रक्रिया से यह समझौता ज्ञापन बना है।
इस कानूनी स्वरुप को हम लोगो ने नोटरी के द्वारा रजिस्टर्ड भी कराया जिससे कि भविष्य में कोई समस्या पैदा हो तो कानूनी समाधान निकल सके। मैं समझता हॅू कि उपरोक्त पारिवारिक ढाॅचा से अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। परिवारों में महिला अधिकार अथवा महिलाओं को सम्पत्ति और संचालन व्यवस्था में समानता के अधिकार की मांग अपने आप समाप्त हो जायेगी और मेरे विचार से ऐसा होना न्याय संगत भी है। परिवार में रहते हुये कोई कानूनी रुप से अपने को माता-पिता,पति-पत्नी जैसी अन्य कोई विशेष मान्यता नहीं रख सकेगा और न ही देश का कोई कानून परिवार के आंतरिक मामलो मे कोई हस्तक्षेप कर सकेगा। विवाह तलाक बालक बालिका आदि के झगडे या कोड बिल अपने आप समाप्त हो जायेगे। सारे संबंध पारिवारिक या सामाजिक तक ही सीमित होंगे। इस व्यवस्था में यह बात भी विशेष महत्व रखती है कि अब तक सारी दुनिया में प्रचारित व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार संशोधित हो जायेगा और परिवार की सम्पत्ति सभी सदस्यों की सामूहिक होगी,व्यक्तिगत नहीं। इस व्यवस्था से अनेक प्रकार के सम्पत्ति अथवा अन्य कानूनी मुकदमें समाप्त हो जायेंगे। मैं तो अपने अनुभव से तथा कल्पना के आधार पर यह घोषित करने की स्थिति में हॅॅू कि उपरोक्त पारिवारिक व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का आधार बन सकती है। मैं मानता हॅू कि अन्य परिवारों को परिस्थिति अनुसार उपरोक्त प्रारुप में कई जगह बदलाव भी करने पड सकते है और उन्हें करने चाहिए किन्तु मेरा एक सुझाव अवश्य है कि सम्पत्ति की समानता के अधिकार में कोई संशोधन करना उचित नहीं है।

यदि हम देश में तानाशाही की जगह लोकतंत्र को सफल होता हुआ देखना चाहते है तो हमें इसकी शुरुवात परिवार से करनी चाहिए। परिवार व्यवस्था में तानाशाही और राज्य व्यवस्था मे लोकतंत्र एक अव्यावहारिक कल्पना है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने कुछ ऐसी विचित्र कल्पना की कि उन्होने परिवार व्यवस्था में तो लोकतंत्र को शून्य हो जाने दिया और राज्य व्यवस्था में लोकतंत्र की बात करते रहे। परिणाम हुआ कि परिवार व्यवस्था लोकतंत्र के अभाव में टूटती रही और राज्य व्यवस्था निरंतर तानाशाही की तरफ अर्थात पारिवारिक केन्द्रीयकरण की तरफ बढती गई। मेरा सुझाव है कि देश के लोगों को संशोधित परिवार व्यवस्था पर विचार करना चाहिए और अपने-अपने परिवारों में लागू करना चाहिए। प्रश्नोत्तर व प्रसाद वितरण के साथ कार्येक्रम समाप्त किया।

जालसाजी धोखाधडी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 20, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहुत प्राचीन समय से धोखाधडी का उपयोग होता रहा है। यहां तक कि देवताओ तक ने कभी जनहित मे तो कभी अपने व्यक्तिगत हित मे जालसाजी का उपयोग किया। जालसाजी धोखाधडी पूरी तरह अनैतिक कृत्य भी माना जाता है और आपराधिक कृत्य भी । दोनो के बीच की सीमा रेखा तय करना बहुत कठिन कार्य है। वैसे मिलावट और कम तौलना जैसे अपराध भी जालसाजी के साथ ही जुडे हुए होते है।
जालसाजी का पूरी दुनियां मे बहुत व्यापक प्रभाव है। व्यक्ति दो समूहो मे बटे हुए है। 1 भावना प्रधान 2 बुद्धि प्रधान। भावना प्रधान लोग शरीफ माने जाते है और बुद्धि प्रधान लोग चालाक । चालाक लोग शरीफ लोगो को धोखा देकर उनसे या उनको ठगने का प्रयास करते है तो बेचारे शरीफ लोग ऐसी ठगी मे फसकर अपना नुकसान उठाते है। धार्मिक मामलो मे ठगी का व्यापक उपयोग होता है। संतो का चोला पहनकर तथा आध्यात्म की भाषा बोलकर धूर्त लोग आसानी से धर्म प्रधान लोगो को ठग लिया करते है। धार्मिक अथवा सामाजिक कार्यो के नाम पर ठगी का प्रयास आमतौर पर पूरे भारत मे प्रचलित है। राजनीति मे तो जालसाजी का व्यापक उपयोग होता ही आया है। पुराने जमाने मे भी विष कन्याओ के माध्यम से अनेक गंभीर घटनाएं होती हुई पायी गई है । वर्तमान समय मे भी राजनीति मे धोखाधडी का खुला उपयोग होता है। यहाँ तक कि राजनीति मे तो इस कार्य को कूटनीति का नाम देकर सफलता का मापदंड बता दिया जाता है। सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर पूरे भारत मे लोग नौकरी के नाम पर ठगे जाते है। सोना-चांदी क्रय-विक्रय अथवा सोना चांदी के साफ सफाई के नाम पर ठगी गांव गांव तक प्रचलित है। भूत प्रेत के नाम पर भी ठगने वालो का कोई अभाव नही है। यहां तक कि नकली नोट, नकली स्टांप टिकट या नकली रेल की टिकट भी आमतौर पर बिकती रहती है। अच्छे अच्छे लोग यहां तक कि कभी कभी बैक भी नकली नोट को नही पहचान पाते। जमीनो के खरीद बिक्री मे आप धोखाधडी का व्यापक उपयोग देख सकते है। दूसरे देश के लोग दूसरे देश मे अपने जासूस भेजकर उनसे जो जानकारी इकठ्ठी कराते है उसमे भी कई बार जालसाजी और धोखाधडी का उपयोग होता है। क्या चीज असली है और क्या नकली यह पता लगाना भी कठिन होता जा रहा है। नकली इतिहास लिखा जा रहा है तो नकली धर्म ग्रन्थ तक प्रचारित हो रहा है। आमलोगो को ठगने के लिये असत्य को बार बार का सत्य के समान स्थापित किया जा रहा है। पूरे भारत मे मंहगाई गरीबी, दहेज, महिला उत्पीडन आदि का ऐसा झूठा आभास करा दिया गया है कि भारत का हर नागरिक इन अस्तित्वहीन समस्याओ से स्वयं को पीडित समझ रहा है। असत्य को बार बार बोलकर उससे लाभ उठाने वाले आपस मे भी प्रतिस्पर्धा करते दिखते है। चालाक लोग आपस मे भी एक दूसरे को ठगते रहते है । हर बुद्धि प्रधान व्यक्ति भावना प्रधान व्यक्ति को बेवकूफ बनाकर ठग लेना अपनी खास विशेषता मानता है। अधिक बुद्धि प्रधान कम बुद्धि प्रधान को ठग लेना अपनी सफलता मानता है।
यदि हम वर्ण व्यवस्था के आधार पर धोखाधडी जालसाजी की समीक्षा करे तो जो लोग ब्राम्हण प्रवृत्ति के है अर्थात विचारक है उन्हे किसी भी परिस्थिति मे कूटनीति का सहारा नही लेना चाहिये। असत्य बोलना या धोखा देना विचारको के लिये पूरी तरह वर्जित है चाहे वह धोखा जनहित मे ही क्यो न हो। किन्तु जब राजनीति की चर्चा शुरू होती है तो राजनीति मे कूटनीति को मान्य किया जाता है। अर्थात एक सीमा तक शत्रु को धोखा दिया जा सकता है। यह अलग बात है कि विपक्षी विरोधी और शत्रु की अलग अलग पहचान होनी चाहिये किन्तु शत्रु को धोखा देना योग्यता का मापदंड होता है। भगवान कृष्ण अथवा शिवा जी का उदाहरण स्पष्ट है। अन्य भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते है जिसमे राजाओ ने जनहित मे जालसाजी और धोखाधडी का सहारा लिया । चाणक्य की तो सारी सफलता ही कूटनीति के दावपेंच पर निर्भर रही है। वैष्य प्रवृत्ति के लोगो को कूटनीति का सहारा लेना अनैतिक माना जाता है । लेकिन व्यापारिक प्रतिस्पर्धा मे आंशिक रूप से कूटनीति का उपयोग मान्य परंपरा है। श्रमजीवियो को किसी प्रकार की कोई जालसाजी धोखाधडी या ठगी की कोई आवश्यकता नही पडती। हो सकता है कि श्रमजीवी दूसरो के द्वारा ठगे भले ही जाते है किन्तु वे किसी को ठग भी नही सकते और वैसा करना उनके लिये उचित भी नही हैं
अपने व्यक्तिगत हित मे जालसाजी धोखाधडी ठगी या विश्वासघात हमेशा अनैतिक ही माने जाते है चाहे वह कोई भी क्यो न करे। किन्तु जनहित मे यदि ब्राम्हण छोडकर शेष लोग इनका उपयोग करते है तो इस उपयोग को अनैतिक नही माना जाता। इसलिये जालसाजी और धोखाधडी की भी परिस्थिति अनुसार समीक्षा करके उनकी सीमाए समझनी चाहिये। आवश्यक नही है कि हर धोखाधडी अनैतिक ही हो। साथ ही आवश्यक नही है कि हर प्रकार की धोखाधडी नैतिक ही हो । प्रायः हर आदमी अपने किये गये अनैतिक कार्य को नैतिक सिद्ध करने का प्रयास करता है। किन्तु समाज के विचारक वर्ग का कर्तब्य है कि वह ऐसी अनैतिकता को नैतिक स्वरूप प्रदान न होने दे ।
स्पष्ट है कि इस प्रकार के किसी भी अनैतिक कार्य मे उसकी नीयत देखी जाती हैं। यदि उसकी नीयत खराब है तो किसी भी प्रकार की जालसाजी धोखाधडी अनैतिक और आपराधिक कार्य माना जाना चाहिये। किन्तु यदि नीयत ठीक है तब ऐसा कार्य अनैतिक नही भी मान सकते है।
जालसाजी और धोखाधडी पर नियंत्रण बहुत कठिन कार्य है। क्योकि बचपन से ही बच्चो को डराने के लिये भूत या पुलिस का झूठा सहारा लिया जाता है और धीरे धीरे उसके संस्कार मे असत्य और चालाकी का समावेश शुरू हो जाता है। इसलिये उससे बचना बहुत कठिन कार्य है।
आज दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति दुहरा चरित्र जी रहा है। हर भावना प्रधान व्यक्ति किसी को धोखा देना गलत समझता है किन्तु उसमे स्वयं की इतनी क्षमता नहीं कि वह दूसरों द्वारा धोखा देने से स्वयं को बचा सके। वैसे तो धर्म के नाम पर बहुत अधिक जालसाजी और ठगी होती रही है किन्तु सबसे ज्यादा जालसाजी और ठगी राजनीति के नाम पर हुई है। धर्म के नाम पर तो सिर्फ व्यक्ति ठगे जाते है समाज नही किन्तु राजनीति सम्पूर्ण समाज को ही गुलाम बना लेती है। धर्म के नाम पर किसी को ईश्वर बनाकर उसके प्रति श्रद्धा पैदा की जाती है किन्तु राजनीतिक व्यवस्था तो एक संविधान बनाकर उसे भगवान सरीखे मानने के लिये संपूर्ण समाज को बाध्य कर देती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य किसी प्रकार की धोखाधडी की तुलना मे राजनैतिक व्यवस्था सबसे अधिक विकृत हो गई है। सारी दुनिया शुरू से जानती रही है कि साम्यवादी धोखा देने के मास्टर माइन्ड होते है। जहां ये कमजोर होते है वहां मानवाधिकार की सारी चिंता करने का ठेका सिर्फ साम्यवादियों के पास ही सुरक्षित रहता है किन्तु जहां वे ताकतवर हुए वहां मानवाधिकार नाम की कोई चीज रही ही नहीं। साम्यवाद का पूरा इतिहास जानते हुए आज भी बडी संख्या मे लोग इनसे धोखा खाते है। दूसरी बात यह भी है कि हर आदमी धोखा खाने के मामले मे अक्षम होते हुए भी स्वयं को इतना सक्षम समझता है कि वह किसी से धोखा खा नही सकता। वह शराफत का ऐसा प्रबल पक्षधर बन जाता है कि वह कभी समझदार बनने का प्रयास ही नही करता। हर धूर्त शराफत का प्रबल समर्थक होता है और हर शरीफ तो शराफत का पक्षधर होता ही है इसलिये इस समस्या से निपटना और भी कठिन है। समस्या बहुत विकराल है । समाधान कठिन है। एक ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है कि हर आदमी शराफत छोडकर समझदारी की ओर बढने का प्रयास करे तभी समस्या पर नियंत्रण संभव है। समाज को धूर्तता ठगी चालाकी जालसाजी से बचाना भी आवश्यक है । इसके लिये कानूनी प्रावधान तो है ही किन्तु समाज मे भी जन जागृति आवश्यक है। समाज मे नैतिकता का पक्ष प्रबल होना चाहिये और अनैतिक लोगो की पहचान का तरीका खोजा जाना चाहिये। यदि समाज के लोग आपस मे मिल बैठकर विचार करने की आदत डाले तो कुछ हद तक इस समस्या का समाधान हो सकता है। वैसे इसके लिये चौतरफा प्रयास करने की आवश्यकता है।

नोट – मंथन का अगला विषय पर्दा प्रथा होगा १

सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 13, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

जो काम जान बूझकर बुरी नीयत से किये जाये वही अपराध होते है, अन्य नही । यदि पूरे भारत की कुल आबादी का आकलन करे तो अपराधियो की संख्या एक प्रतिशत से भी कम हो सकती है। इसमे भी हिंसा और मिलावट या जालसाजी करने वाले का प्रतिशत अधिक होता है, जबकि चोरी डकैती करने वालो का कम। बलात्कार तो और भी बहुत कम होते है । अपराध रोकने के लिये दो अलग अलग प्रयत्न होते है। 1 समाज द्वारा हृदय परिवर्तन अथवा अपमान का भय। 2 राज्य द्वारा दंड का भय। समाज को अपना कार्य अपनी सीमाओ मे रहकर करना चाहिये। और राज्य को अपनी सीमाओं मे । दुर्भाग्य से भारत मे समाज अपनी सीमाए तोडकर अपराध नियंत्रण के लिये दंड का उपयोग करने का अभ्यस्त हो रहा है तो दूसरी ओर राज्य अपनी सीमाए तोडकर हृदय परिवर्तन या अपराधियो मे सुधार का कार्य करता है। राज्य का काम अपराधियो मे सुधार करना नही है किन्तु ये हमेशा ही सुधार का कार्य करने का प्रयास करता है। राज्य शराब बंदी गो हत्या बंदी छुआछूत उन्मूलन गरीबी उन्मूलन शिक्षा का विस्तार जैसे अनावश्यक कार्यो को बढचढ कर करता है दूसरी ओर राज्य लोगो को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिये हथियार के लाइसेंस देता है अथवा अपने शहर मे पहरा करने की सलाह देता है। शर्म की बात है कि हमारी पुलिस रात को गस्त करते समय जागते रहो की आवाज लगाती है जबकि राज्य को यह घोषणा करनी चाहिये कि लोग सुख की नींद सोवे। किसी प्रकार के अपराध से उन्हे चिंता करने की आवश्यकता नही है।
समय आ गया है कि अब समाज अपनी सीमाए समझे और राज्य अपनी। यदि दोनो ने अपनी अपनी सीमाओ का उलंघन किया तो वर्तमान अव्यवस्था मे कोई निर्णायक बदलाव कठिन दिखता है। 99 प्रतिशत आबादी एक प्रतिशत अपराधियो पर नियंत्रण न कर सके यह संभव नही किन्तु 99 प्रतिशत लोगो की विपरीत रणनीति के कारण एक प्रतिशत अपराध समाज के लिये सिरदर्द बने हुए है।

सामयिकी– कसडोल छत्तीसगढ की एक घटना के अनुसार–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 8, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

पति की प्रताडना से परेशान होकर शादीशुदा बेटी घर बैठी है। उसे ससुराल मे जलाने की कोशिश हुई तो मामला पुलिस तक और फिर कोर्ट कचहरी तक जा पहॅुचा । इसी से नाराज होकर समाज ने विवाहिता के पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिय। परिवार मे दो और बेटियां शादी के लायक हो गई है। लेकिन बहिष्कार के चलते रिश्ते नही आ रहे । इससे परेशान उनके माता पिता समाज प्रमुख के पास न्याय मांगने पहुचे तो जवाब मिला कि पहले केश वापस लो तभी बहिष्कार खत्म होगा । यह सदमा मां बर्दाश्त नही कर सकी । वह बेहोश हो गई और उसकी मृत्यु हो गई।
पूरी घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया जैसे मृतक महिला के पूरे परिवार के साथ पूरा स्थानीय समाज मिलकर अत्याचार कर रहा हो। आजकल महिला सशक्तिकरण के नाम पर परम्पाए और समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने का पूरे देश मे एक फैशन चल पडा है। इस घटना को भी आधार बनाकर मानवाधिकारवादी आगे आने लगे । एक परिवार के पति पत्नि मे विवाद होता है। बिना जांच किये यह कैसे मान लिया गया कि पति गलत था? क्या पत्नि गलत नही हो सकती? गांव की पंचायत होती है । पंच लोगो ने कुछ निर्णय दिये और न मानने पर महिला के परिवार का बहिष्कार किया । क्या गांव के भी सब लोग गलत थे जिन्होने कुछ निष्कर्ष निकाले। क्या किसी समूह को किसी व्यक्ति का बहिष्कार करने का भी अधिकार नही होगा? प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता है कि वह किसी भी अन्य का किसी भी सीमा तक बहिष्कार कर सकता है। यह स्वतंत्रता व्यक्ति समूह को भी प्राप्त है। यह स्वतंत्रता कैसे छीनी जा सकती है। दुर्भाग्य है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर हमारे कानून बनाने वाले तथा समाज व्यवस्था के कुछ पेशेवर ठेकेदार अब समाज के बहिष्कार के अधिकार को भी छीनने का प्रयास कर रहे है। एक समय था जब मुसलमानो मे महिलाओ की भूमिका को आधा माना जाता था। उस समय भी भारत मे सबको समान अधिकार प्राप्त थे। अब एक नयी व्यवस्था आ रही है जिसमे महिलाओ को पूरूषो की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय बनाने का प्रयास हो रहा है। अधिकारो के मामले मे सब समान होने चाहिये। यह नही हो सकता कि महिला समूह सही होता है या पुरूष।
स्थानीय समाज ने यदि किसी को केश वापस लेने की सलाह दी तो यह किसी भी आधार पर गलत नही कहा जा सकता। सलाह मानना न मानना उनकी स्वतंत्रता है और न मानने पर बहिष्कार करना समाज की स्वतंत्रता । यदि इसके कारण उसकी दो बहने अविवाहित है तो क्या अब समाज के लोग इसके लिये दोषी माने जायेगे। महिला सशक्तिकरण के नाम पर वर्ग विद्वेष फैलाने का जो प्रयत्न हो रहा है उसपर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है। मै तो इस मत का हॅू कि चाहे महिला हो या पूरूष सबके अधिकार समान हो । सबका महत्व समान हो साथ ही समाज की सामाजिक गतिविधियों पर सरकार का कोई अंकुश न हो। सरकार स्वयं को समाज से भी उपर मानने की भूल न करे।

सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 6, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मै एक आस्थावान हिन्दू हॅू और गांधी को स्वामी दयानंद के बाद का सर्वश्रेष्ठ महापुरूष मानता हॅू। मेरा सर्वोदय और संघ परिवार से निकट का संबंध है यद्यपि दोनो एक दूसरे के शत्रुवत है। कुछ मुददो पर मेरी दोनो से मत भिन्नता रही है। संघ परिवार येन केन प्रकारेण गांधी हत्या का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास करता है। संघ कार्यकर्ता गोडसे की चर्चा करते समय अंत मे किन्तु परन्तु अवश्य लगाता है जबकि मै गोडसे के कार्य को पूरी तरह अवांछनीय मूर्खतापूर्ण और निन्दनीय मानता हॅू। मै तो गोडसे के कार्य का परोक्ष समर्थन भी निन्दनीय मानता हॅू। इसी तरह मेरे सर्वोदयी मित्र संघ परिवार का विरोघ करने के नाम पर नक्सलवाद तथा मुस्लिम आतंकवाद तक का समर्थन करते है। मेरे सर्वोदयी मित्र प्रोफेसर गिलानी की रिहाई पर उन्हे सम्मानित करते है तो अभी अभी पुलिस द्वारा मारे गये पचास नक्सलियो के प्रति अप्रत्यक्ष सहानुभूति व्यक्त करते है। मुझे आश्चर्य है कि एक विदेशी शासक माओ के हिंसक अनुयायी भारत मे अहिंसा के पुजारी गांधीवादियों की सहानुभूति कैसे प्राप्त कर लेते है। मै आश्वस्त हॅू कि चाहे मुस्लिम आतंकवाद हो अथवा नक्सली हिंसा कोई भी समझदार व्यक्ति इनका कभी समर्थन नही कर सकता किन्तु अंध संध विरोध तथा वामपंथियो से प्रभावित सर्वोदयी इन अवांछनीय हिंसक प्रयासो तक का समर्थन करते रहते है।
मै सार्वजनिक जीवन मे शत प्रतिशत अहिंसा का पक्षधर हॅू साथ ही मै सरकार का यह दायित्व समझता हॅू कि वह हिंसक गतिविधियो से समाज की सुरक्षा के लिये आवश्यक बल प्रयोग करे । पिछले कई वर्षो से कांग्रेस सरकार की ढूलमुल नीति के कारण नक्सलवाद बढा । अब नीतियां बदली है। समाज का काम हृदय परिवर्तन होता है और जो फिर भी नही मानता उसे नष्ट करना सरकार का कर्तब्य है।यदि गुमराह लोगो द्वारा की गई हिंसा के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई तो गोडसे भी तो गुमराह ही था। इसलिये दो भिन्न तर्क उचित नही । मेरे दोनो मित्र भले ही भिन्न भिन्न घटनाओ मे भिन्न भिन्न तर्क रखे किन्तु मेरे विचार से न गोडसे के कार्य का किसी प्रकार समर्थन उचित है न नक्सलवाद का।

मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 5, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधक न हो। कोई भी व्यवस्था किसी भी स्वतंत्रता की उस व्यक्ति की सहमति के बिना कोई सीमा नही बना सकती। इस तरह अपराध सिर्फ एक ही होता है और वह होता है किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधा पहुचाना । अपराध दो प्रकार के होते है। 1 बल प्रयोग 2 धोखाधडी तीसरा कोई कार्य अपराध नही होता । मौलिक अधिकार भी चार प्रकार के होते है। 1 जीने की स्वतंत्रता 2 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 3 सम्पत्ति की स्वतंत्रता 4 स्व निर्णय की स्वतंत्रता । इन चारो स्वतंत्रताओ की कोई सीमा उसकी सहमति के बिना तब तक नही बन सकती जब तक किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधक न हो। अपराध भी पांच प्रकार के होते है । 1 चोरी डकैती और लूट। 2 बलात्कार 3 मिलावट कमतौल 4 जालसाजी धोखाधडी 5 हिन्सा और बल प्रयोग। इन सबमे भी हिंसा बल प्रयोग और धोखाधडी के बिना कोई कार्य अपराध नही होता।
चोरी डकैती और लूट एक ही प्रकार के अपराध होते है जिसमे किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का कोई भाग छिपकर अथवा बल प्रयोग द्वारा अपने अधिकार मे कर लिया जाता है किन्तु चोरी आम तौर पर छिपकर की जाती है और डकैती या लूट बल प्रयोग के द्वारा। डकैती और लूट मे कोई विशेष फर्क नही होता। यदि लुटेरे पांच से कम है तो उसे लूट कहते है और पांच या उससे अधिक है तो डकैती।
स्वतंत्रता के बाद आबादी करीब चार गुनी बढी है । सरकारो की आर्थिक अथवा तकनीकी सुविधाए आबादी की तुलना मे कई गुना अधिक बढी है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर बहुत सुधरा है। भीख मागने वाले का भी स्तर उंचा हुआ है। इस तरह अपराधो का ग्राफ बहुत कम होना चाहिये था किन्तु आबादी की तुलना मे कई गुना अधिक बढ गया है। चोरी डकैती और लूट भी स्वतंत्रता के समय की तुलना मे पचीस गुना तक अधिक कह सकते है । ये अपराध निरंतर बढते ही जा रहे है। प्रश्न उठता है कि जब भारत भौतिक उन्नति के मामले मे दुनियां से कम्पीटिशन कर रहा है और विकास शील की जगह विकसित राष्टो की श्र्रेणी मे शामिल हो रहा है तब ये चोरी डकैती के अपराध स्वयं क्यो नही रूक रहे अथवा सरकारे सफल क्यो नही हो रही।
इस गंभीर प्रशा पर गंभीरता से विचार मंथन हुआ। आम तौर पर लोग भय के कारण अपराधो से दूर रहते है। भय तीन प्रकार का हो सकता है। 1 ईश्वर का 2 समाज का 3 सरकार का । ईश्वर का भय निरंतर घटता जा रहा है। समाज को इस प्रकार छिन्न भिन्न किया गया कि समाज का अस्तित्व रहा ही नही। कुल मिलाकर सरकार का भय ही एक मात्र आधार बचता है जिससे चोरी डकैती रूक सकती है। हम सरकार की अगर समीक्षा करे तो सरकार का भय भी इन अपराधो को रोकने मे सफल सिद्ध नही हो रहा है।
भारत नकल करने के लिये प्रसिद्ध हो गया है। दुनियां के विकसित राष्ट अपराध नियंत्रण करने के बाद जन कल्याण के कार्य करते है तो भारत अपराध नियंत्रण को छोडकर भी जन कल्याण के कार्यो मे सक्रिय हो जाता है । स्पष्ट है कि बलात्कार और डकैती दोनो ही अपराध होते है। दोनो मे ही बल प्रयोग होता है । किन्तु डकैती की तुलना मे सरकारे बलात्कार को अधिक गंभीर अपराध मानती है। जबकि डकैती अधिक गंभीर अपराध होता है। डकैती मे किसी व्यक्ति के स्वामित्व की कोई वस्तु छीनकर उसपर अपना स्वामित्व बना लिया जाता है। बलात्कार मे ऐसा नही होता । इसी तरह किसी धर्म ग्रन्थ का अपमान एक भावनात्मक मुददा है किन्तु उसे भी गंभीर अपराध बना दिया गया है। अवैध बंदूक और पिस्तौल किसी भी परिस्थिति मे रखना गंभीर अपराध होना चाहिये किन्तु बंदूक और पिस्तौल बिना लाइसेन्स के भी रखना छोटा अपराध है और गांजा अफीम रखना गंभीर अपराध । किसी आदिवासी हरिजन को गाली दे देना बहुत बडा गंभीर अपराध बना दिया गया है। कोई व्यक्ति किसी की सहमति से वर्षो तक शारीरिक संबंध बनाकर उससे अलग होना चाहे तो वह बलात्कार का दोषी मान लिया जाता है। मै आज तक नही समझा कि यह बलात्कार की कौन सी परिभाषा है। काष्टींग कौच को भी बलात्कार सरीखा अपराध मानने की चर्चा चल रही है जबकि वह शुद्ध सौदेबाजी है। सामाजिक बुराईया रोकने का काम समाज का है। सरकार का नही। सरकार का काम सिर्फ अपराध नियंत्रण है लेकिन सरकारे सब प्रकार की सामाजिक बुराईया भी रोकने का प्रयत्न करती है। एक सिद्धान्त है कि किसी दायित्व की मात्रा जितनी ही बढती जाती है उसकी गुणवत्ता की क्षमता उतनी ही घटती जाती है।सरकारो की शक्ति सीमित है । यदि सरकारे ओभर लोडेड होती है तो स्वाभाविक है कि उसकी गुणवत्ता घटेगी । सरकारे वास्तविक कार्यो को छोडकर वर्ग संतुष्टी के कार्यो को प्राथमिकता के आधार पर करना शुरू कर देती है जबकि उन्हे अपराध नियंत्रण पहले करना चाहिये था। जब तक जान बुझकर बुरी नीयत से किसी की भावनाओ को चोट न पहुंचाई जाये तब तक भावनाओ को चोट लगना किसी भी प्रकार का कोई अपराध नही माना जा सकता है। नीयत का महत्व है भावनाओ का नही। सरकारे भावनाओ का महत्व समझती है, नीयत से मतलब नही रखती है। इसका दुष्परिणाम होता है कि चोरी डकैती सरीखे अपराध बढते चले जाते है। दुख की बात है कि हत्या आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधियो के मुकदमे बीस बीस वर्ष चलते रहते है तो बलात्कार के मुकदमे मे त्वरित निपटारो की मांग और प्रयत्न हो रहे है। यहां तक मांग हो रही है कि बलात्कार को हत्या की तुलना मे भी अधिक गंभीर अपराध बना दिया जाये।
एक तरफ तो न्यायपालिका ओभर लोडेड है । चोरी डकैती हत्या के मुकदमे कई दशक तक चलते रहते है तो उत्तर प्रदेश मे खुलेआम अपराधियो को गोली मारने का भी आदेश क्रियान्वित किया जा रहा है। ये दोनो क्रियाए पूरी तरह एक दूसरे के विपरीत है। अच्छा तो यह होता कि न्यायिक प्रकृया के अंतर्गत गंभीर अपराधो मे छः महिने के अंदर निर्णय करना अनिवार्य कर दिया जाता तो गोली मारने की आवश्यकता ही नही पडती। किन्तु सरकारे न्यायिक प्रकृया को लंबा करते जाती है और यदाकदा जनहित मे अलोकतांत्रिक तरीके अपना लिये जाते है। मेरे विचार से चोरी डकैती लूट का अस्तित्व हमारे लिये एक कलंक है। छुआछूत से भी ज्यादा, गांजा और अफीम से भी ज्यादा। इसे हर हालत मे रोका ही जाना चाहिये। सरकारो को और समाज को भावना और बुद्धि के बीच के अंतर को समझना चाहिये । इस आधार पर अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिये। बिना विचारे दुनिया की नकल करना हमारे लिये आदर्श स्थिति नही है। इससे बचा जाना चाहिये।
गंभीर अपराधो की प्राथमिकताएं तय करते समय कुछ मापदंडो पर विचार होना चाहिये। 1 अपराध अपराधी की आवश्यकता थी अथवा इच्छा । 2 अपराध भावना वश हुआ या योजनापूर्वक 3 अपराध के द्वारा अपराधी को कोई भौतिक लाभ हुआ या नही। 4 पीडित पक्ष को भावनात्मक क्षति हुई अथवा भौतिक । इस तरह की अनेक प्राथमिकताओ पर विचार करने के बाद यह धारणा बनती है कि चोरी चकैती और लूट अन्य भावनात्मक अपराधो की तुलना मे अधिक गंभीर अपराध है। वर्तमान समय मे मेरा कथन कुछ विपरीत दिख सकता है किन्तु इस विषय पर चर्चा होनी चाहिये।

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal