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मंथन क्रमाॅक-95 बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं। 1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है। 2. किसी भी संविधान के निर्माण में ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...
हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति ...
कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है। 1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है। 2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरू...

सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 30, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है
1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है।
2 लोकतंत्र दो तरह का होता है। 1 आदर्श और विकृत । आदर्श लोकतंत्र मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार प्रकृत्ति प्रदत्त होते है और विकृत लोकतंत्र मे मौलिक अधिकार संविधान देता है और ले सकता है।
3 दुनियां मे लोकतंत्र कई प्रकार का है । संसदीय लोकतंत्र, राष्ट्रपतीय प्रणाली, सहभागी लोकतंत्र, तानाशाही लोकतंत्र। भारत का लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली और साम्यवादी देशो का तानाशाही लोकतंत्र माना जाता है।
4 सुशासन और स्वशासन मे बहुत फर्क होता है। स्वशासन आदर्श लोकतंत्र है सुशासन विकृत। सुशासन लोकतंत्र मे भी संभव है और तानाशाही मे भी।
5 आदर्श लोकतंत्र मे लोक नियंत्रित तंत्र होता है। लोक मालिक और तंत्र प्रबंधक। तानाशाही मे तंत्र मालिक और लोक गुलाम रहता है।
6 भारत का लोकतंत्र अप्रत्यक्ष रूप से तंत्र की तानाशाही के रूप मे है, आदर्श लोकतंत्र नही । यहां तंत्र मालिक है और लोक गुलाम।
7 जब न्याय और कानून मे टकराव होता है तब आदर्श लोकतंत्र मे न्याय महत्वपूर्ण होता है और विकृत लोकतंत्र मे कानून।
8 विकृत लोकतंत्र मे संगठन शक्तिशाली होते है, संस्थाए कमजोर । आदर्श लोकतंत्र मे संस्थाए मजबूत होती है संगठन कमजोर।
सन 75 मे इंदिरा गांधी ने व्यक्तिगत कारणो से आपातकाल लगाया था। उस आपातकाल मे सरकार ने घोषणा की थी कि मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गये है। घोषणा के अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति को कभी भी बिना कारण बताये गोली मार सकती थी। संसद और न्यायपालिका पर असंवैधानिक तरीके से नियंत्रण कर दिया गया था। सरकार की समीक्षा करने पर भी प्रतिबंध लग गया था। आलोचना या विरोध का तो कोई प्रश्न ही नही था। उस समय का आपातकाल पूरी तरह व्यक्तिगत तानाशाही थी क्योकि भारत का संविधान किसी व्यक्ति का गुलाम बन गया था। दो वर्ष बाद सन 77 मे फिर से विकृत लोकतंत्र की स्थापना हुई जो अब तक जारी है।
चार वर्ष पूर्व भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था मे आमूल चूल बदलाव दिखा। नरेन्द्र मोदी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद 70 वर्षो से लगातार जारी शासन व्यवस्था के तरीके मे आमूलचूल परिवर्तन किये जिसके अच्छे और बुरे परिणाम भी दिखे और आगे भी दिखेगे। मोदी सरकार ने चुनावो के पूर्व जनता से जो वादे किये उनमे से कोई भी वादा पूरा नही हुआ। क्योकि असंभव वादे कर दिये गये थे चाहे 15 लाख की बात हो अथवा रोजगार देने की या भ्रष्टाचार समाप्त करने की । अब भी मोदी सरकार ऐसे ही असंभव वादे करती जा रही है जो पूरे नही हो सकते। वर्तमान सरकार सिर्फ उन्ही कार्यो को आगे बढा रही है जो पिछली सरकारो के समय योजना मे थे या शुरू हुए थे। सिर्फ कार्य प्रणाली बदली है। फिछली सरकार किसी कार्य को पांच वर्ष मे पूरा करने की गति से चलती थी तो वर्तमान सरकार उसे एक वर्ष मे पूरा करने की घोषणा कर देती है। स्वाभाविक रूप से कार्य मे एक की तुलना मे डेढ दो वर्ष लग जाते है । अब इस विलंब को वर्तमान सरकार की सफलता माने या असफलता । लगभग सब प्रकार के कार्यो की गति बहुत तेज हुई है और घोषणा उससे भी अधिक तेज गति की कर दी जाती है। पिछली सरकारे नौकरी को ही रोजगार मानकर चलती थी वर्तमान सरकार ने पकौडा पौलिटिक्स के माध्यम से रोजगार को श्रम के साथ जोडने की शुरूआत की किन्तु हिम्मत टूट गई और फिर उसी परिभाषा पर सरकार आ गई है। वर्तमान सरकार आने के बाद राजनैतिक भ्रष्टाचार मे बहुत कमी आई है। सरकारी कर्मचारियों के भी भ्रष्टाचार मे आंशिक कमी आई है किन्तु जैसा वादा किया गया था उस तरह तेजी से भ्रष्टाचार घट नही रहा है। राजनीति मे परिवार वाद का समापन दिखने लगा है। अब नेहरू गांधी परिवार या लालू मुलायम राम विलास करूणा निधि जैसे परिवारो के राजनैतिक सत्ता विस्तार के दिन गये जमाने की बात बन गये है। अब ये लोग धीरे धीरे या तो अस्तित्वहीन हो जायेगे अथवा अपने मे बदलाव करेंगे। अखिलेश यादव परिवार की अपेक्षा अपनी स्वतंत्र योग्यता पर आगे बढ रहे है किन्तु उन्होने भी मुख्यमंत्री निवास खाली करने के मामले मे अपने उपर एक कलंक जोड लिया है। स्वाभाविक है कि अब भारत मे परिवार वाद के नाम पर राजनीति नही चल पायेगी। वैसे तो लगभग बीस वर्षो से ये लक्षण दिखने लगे थे कि राजनीति मे अच्छे लोग ही आगे बढ पायेंगे। अटल जी मनमोहन सिंह नीतिश कुमार अखिलेख यादव नरेन्द्र मोदी सरीखे अच्छे लोग समाज मे सम्मान पाते रहे और गंदे लोग धीरे धीरे कमजोर होते गये । अब नरेन्द्र मोदी के बाद यह बात और मजबूती से आगे बढी है कि राजनीति मे अच्छे लोग ही आगे बढ पायेगे चाहे वे सत्ता पक्ष मे हो अथवा विपक्ष मे।
नरेन्द्र मोदी ने अपने चार वर्षो के कार्यकाल मे सीधा सीधा धु्रवीकरण कर दिया है। 70 वर्षो तक जो लोग पक्ष विपक्ष मे विभाजित होकर सम्पूर्ण समाज का मार्ग दर्शन और नेतृत्व कर रहे थे उन सब लोगो को नरेन्द्र मोदी ने किनारे लगा दिया है। सम्पूर्ण विपक्ष तो पूरी तरह नाराज है ही किन्तु सत्ता पक्ष के भी करीब करीब सभी लोग नरेन्द्र मोदी से नाराज है । भले ही वे डर से समर्थन क्यो न करते हो । लगभग सभी संगठन मोदी से नाराज है चाहे वे हिन्दू संगठन हो या मुस्लिम इसाई संगठन। व्यापारी संगठन भी नरेन्द्र मोदी से नाराज हैं चाहे वे बडे उद्योग पति हो या छोटे व्यापारी । मीडिया मे भी नरेन्द्र मोदी के प्रति भारी असंतोष है भले ही कुछ लोग उनसे लाभ लेकर उपर उपर उनका गुणगान कर रहे हो । किसान संगठन के लोग हो या श्रमिक संगठन सब नरेन्द्र मोदी की नीतियो से असंतुष्ट है। सवर्णो के संगठन और अवर्णो के संगठन भी नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध इकठठे हो रहे है। गाय गंगा मंदिर के पक्षधर भी उनसे नाराज है तो इनके विरोधी भी। राजनैतिक सामाजिक धार्मिक व्यावसायिक किसी भी क्षेत्र का कोई भी ऐसा व्यक्ति मोदी से खुश नही है जो अपनी ताकत पर सौ पचास वोट दिलवाने की हिम्मत रखता हो। यहां तक कि एन डी ए मे शामिल घटक दल भी पूरी तरह मोदी के खिलाफ है। इसका मुख्य कारण यह है कि मोदी किसी की बात नही सुनते जो उनको ठीक लगता है वह बिना किसी की सलाह लिये स्वयं करते है। वे हर मामले मे स्वतंत्र रूप से तकनीकी लोगो की टीम बनाकर उससे जांच कराते है और किसी के दबाव मे नही आ रहे है।यहां तक कि संघ परिवार जिसका ताकत पर मोदी प्रधान मंत्री बने उसकी भी इन्होने कभी कोई विशेष परवाह नही की । मै जानता हॅू कि सिर्फ एक बार बडी मुस्किल से कुछ आर्थिक मुददे पर नरेन्द्र मोदी भागवत जी के दबाव मे आये थे और उस दबाव के कारण जो अर्थनीति मे थोडा बदलाव किया गया उसके दुष्परिणाम भी हुए। अन्यथा किसी और मामले मे मोदी किसी अन्य के दबाव मे नही झुके। यही कारण है कि देश के लगभग सभी सरकार के सहयोगी और मोदी विरोधी एक स्वर से उन्हे तानाशाह कहने लगे है। मै समझता हॅू कि नरेन्द्र मोदी ने यह जुआ खेला है। इसके अच्छे परिणाम भी हो सकते है और बुरे परिणाम भी। नरेन्द्र मोदी व्यक्तिगत रूप से सीधे मतदाताओ को संबोधित कर रहे है न कि बिचौलियो के माध्यम से। बिचौलियो को किनारे करके सीधे मतदाताओ से संपर्क करने का उनका प्रयास कितना सफल होगा । यह तो 2019 मे ही पता चलेगा । । वास्तव मे लीक छोडकर मोदी ने जो मार्ग अपनाया है वह अप्रत्यक्ष रूप से राष्टपतीय प्रणाली की ओर जाता है जिसका अर्थ है जनता राष्टपति का चुनाव करती है और राष्टपति शक्तिशाली व्यक्ति होता है। 70 वर्षो से चली आ रही राजनैतिक व्यवस्था मे वोटो के व्यापारी जिस प्रकार बिचौलिये की भूमिका निभाते थे वे समाप्त होगे या एक जुट होकर नरेन्द्र मोदी को समाप्त कर देंगे। यह अभी स्पष्ट नही कहा जा सकता।
मै कोई भविष्य वक्ता नही हॅू। मै तो स्पष्ट देख रहा हॅू कि एक तरफ साम्प्रदायिकता जातियता संगठनवाद और सत्ता की जोड तोड मजबूती के साथ खडी है तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने अंगद का पैर इस तरह जमा दिया है उसे हिलाना भी बहुत कठिन हो रहा है। मै तो व्यक्तिगत रूप मे साम्प्रदायिकता जातिवाद परिवारवाद संगठनवाद का विरोधी हॅू किन्तु मै इस कार्य मे मोदी जी की कोई मदद नही कर पा रहा क्योकि मुझे अपने वोट देना नही है । वोट दिलाना भी नही है। मै तो जब तक भारत मे मोदी या कोई अन्य विकृत लोकतंत्र की उठा पटक को छोडकर आदर्श लोकतंत्र अर्थात लोक स्वराज्य या सहभागी लोकतंत्र की दिशा मे नही बढेगा तब तक मै कुछ करने की स्थिति मे नही हॅू। इसलिये मै तो सिर्फ मोदी के सशक्त होने के लिये ईश्वर से प्रार्थना मात्र कर सकता हॅू। मैने तो पिछले चुनाव के पूर्व मे मनमोहन सिंह के लिये भी ऐसी प्रार्थना की थी। किन्तु सोनियां गांधी ने पुत्र मोह मे पडकर मेरी प्रार्थना को ठुकरा दिया था और मनमोहन सिंह सरीखे एक लोक तांत्रिक संज्जन महापुरूष को राजनीति से असफल सिंद्ध किया गया था। उस समय ईश्वर ने मेरी नही सुनी अब क्या होगा मुझे पता नही।
नरेन्द्र मोदी से आम जनता को जिस प्रकार की उम्मीदे थी वे पूरी नही हुई , किन्तु पिछले 70 वर्षो मे जितने भी प्रधान मंत्री हुए है उन सबकी तुलना मे नरेन्द्र मोदी ने बहुत कम समय मे बहुत अच्छा काम किया है। अब पुरानी व्यवस्था का तो समर्थन नही किया जा सकता। और यदि नरेन्द्र मोदी से भी कोई अच्छी व्यवस्था दिखाई देती है तब आम लोग वैसा प्रयोग कर सकते है। नीतिश कुमार अखिलेश यादव से अभी भी बहुत उम्मीदे बनी हुई है। नरेन्द्र मोदी उम्मीद से कई गुना अच्छा कार्य कर रहे है और अपनी नई प्रणाली के आधार पर प्रमुख लोगो को नाराज भी कर रहे है। इतिहास रचते रचते गोर्वा चोव गायव हो गये। मोदी का क्या होगा यह भविष्य बतायेगा।

स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा

Posted By: admin on June 23, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है।
2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक वह व्यक्ति है एक से अधिक होते ही वह समाज का अंग बन जाता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है किन्तु एक से अधिक होते ही सबकी स्वतंत्रता समान हो जाती है।
3 असीम स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है। यह सीमा वहां तक होती है जहां से किसी अन्य की स्वतंत्रता का उल्लंघन न होता हो।
4 प्राकृतिक रूप से कोई भी दो व्यक्ति किसी भी मामले मे समान नही होते । असमानता प्राकृतिक है और समानता के प्रयत्न करना षणयंत्र।
5 समान स्वतंत्रता प्राकृतिक सिद्धान्त है । समान करने का प्रयास ऐसी समानता को असमान बनाता है।
6 कमजोरो की मदद करना मजबूतो का कर्तब्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही । राजनैतिक षणयंत्र इसे कमजोरो का अधिकार बताता है और निकम्मे लोग इस षणयंत्र को अपना हथियार बनाते हे।
7 व्यक्ति दो प्रकार के होते है भावना प्रधान और बुद्धि प्रधान । हर बुद्धि प्रधान बिल्लियो के बीच बंदर की भूमिका मे भावना प्रधान लोगो को ठगने के लिये समानता दूर करने के प्रयास को हथियार बनाते है ।
8 हर बुद्धि प्रधान अपने से उपर वाले से स्वतंत्रता चाहता है और अपने से नीचे वालो को स्वतंत्रता नही देना चाहता।
9 गरीब अमीर उंच नीच छोटा बडा, कमजोर और मजबूत भ्रामक शब्द है । हर व्यक्ति अपने से मजबूत की अपेक्षा कमजोर और कमजोर की अपेक्षा मजबूत समझता है। यह सापेक्ष शब्द है निर्पेक्ष नही।
वैसे तो पूरी दुनियां मे समानता के नाम पर बहुत बडा षणयंत्र चल रहा है किन्तु भारत मे इसका दूष्प्रभाव सबसे ज्यादा है। समानता लाने के नाम पर जो भी प्रयत्न किये जा रहे है वे सब हर मामले मे असमानता को बढा रहे है। इस मामले मे सबसे अधिक सक्रियता तंत्र से जुडे लोगो की है। ऐसे लोग आर्थिक सामाजिक असमानता दूर करने के नाम पर निरंतर राजनैतिक असमानता बढाते जाते है। यहां तक कि असमानता दूर करने के नाम पर ही तंत्र ने लोक को इतना गुलाम बना लिया है कि वोट देने के अतिरिक्त लोक के पास कोई ऐसी स्वतंत्रता नही बची है, जो तंत्र की दया पर निर्भर न हो। गली गली मे जाति प्रथा छुआछूत महिला उत्पीडन अमीरी और गरीबी रेखा के नाम पर दुकाने खुली हुई है और लगभग सबके तार राजनैतिक सत्ता के प्रयत्न से जुडे दिखते है। राजनीति के नाम पर अलग अलग गिरोह बने हुए है जो समाज के समक्ष तो आपस मे टकराने का नाटक करते है किन्तु खतरा दिखते ही सब एक हो जाते है। समझ मे नही आता कि जब प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता समान है तथा संवैधानिक अधिकार भी एक बराबर है तब ये राजनैतिक नेता और समाज सुधारक किस बात को बराबर करना चाहते है। जब व्यक्तिगत क्षमता प्राकृतिक रूप से असमान होती ही है और उसे किसी भी तरह समान नही किया जा सकता तो फिर समानता के प्रयत्नो का औचित्य क्या है? प्रष्न यह भी उठता है कि समान अधिकारो वाला व्यक्ति कैसे किसी दूसरे की असमानता दूर कर सकता है। किसी भी व्यक्ति या राज्य का यह अधिकार है कि वह किसी भी अन्य की किसी भी रूप मे मदद कर सकता है किन्तु किसी को यह अधिकार नही है कि वह किसी अन्य के अधिकार काटकर किसी अन्य को दे सके क्योकि अधिकार सबके समान होते है।
समान स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है । इसमे किसी प्रकार का बदलाव न उचित है न संभव । बिना व्यक्ति की सहमति के इसकी स्वतंत्रता मे कोई कटौती नही की जा सकती। यह भी आवश्यक है कि उसकी सहमति के बाद भी उसकी स्वतंत्रता मे कोई मौलिक समझौता नही किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई समझौता उसकी सहमति के बाद भी तभी तक लागू रह सकता है जबतक उसकी सहमति है। अन्यथा वह समझौता समाज के लिये विचार का आधार बनेगा। ऐसी परिस्थिति मे राज्य समाज की सहमति से बनी हुई एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जो प्रत्येक व्यक्ति की उसकी असीम स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस तरह समानता की यह परिभाषा बनती है कि किसी स्थापित व्यवस्था द्वारा घोषित सीमा रेखा से नीचे वालो को समान सुविधा तथा उपर वालो को समान स्वतंत्रता की गारंटी दी जानी चाहिये। स्वाभाविक है कि राज्य इस निमित्त सबसे अधिक उपयुक्त व्यवस्था है । समाज इस व्यवस्था मे सहायता कर सकता है। मेरे विचार मे किसी प्रकार की असमानता को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि समानता के लिये किये जाने वाले सारे प्रयत्न बंद कर दिये जाये क्योकि ये कानूनी प्रयत्न ही असमानता के प्रमुख कारण है। परिणाम स्वरूप अपने आप सबकी स्वतंत्रता समान हो जायेगी और किसी को कोई प्रयत्न नही करना होगा।

हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति

Posted By: admin on June 9, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा। कोई व्यक्ति बिना सोचे तत्काल किसी कार्य को बार बार करने लगता है तब वह उस व्यक्ति की आदत मान ली जाती है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह संस्कार बन जाती है। ऐसे संस्कार किसी इकाई के अधिकांश लोगो के हो जावे तब वह उस इकाई की संस्कृति मान ली जाती है। सोच समझकर लिया गया निर्णय और तदनुसार किया गया कार्य संस्कार नही माना जाता है । धर्म व्यक्तिगत होता है समूह गत नही होता जबकि संस्कृति समूहगत होती है व्यक्तिगत नहीं।
हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लगभग एक ही बताया जाता है इसलिये दोनो के बीच अंतर करना बहुत कठिन कार्य है। किन्तु मुझे दोनो के बीच मे बहुत अंतर दिखता हैं इसलिये मै इस विषय की विस्तृत समीक्षा कर रहा हॅू। करीब एक हजार वर्ष पहले जब तक भारत मे विदेशी गुलामी नही आयी थी तब तक भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृत एक मानी जाती थी । इस संस्कृति मे जैन बौद्ध सिख आर्य वैदिक और सनातनी मिलकर माने जाते है। जबसे भारत मे इसाई और मुसलमान शासक के रूप मे स्थापित हुए उस समय से हिन्दू संस्कृति पर धीरे धीेरे विदेशी संस्कृति का प्रभाव पडना शुरू हुआ। स्वाभाविक है कि प्राचीन संस्कृति मे धीरे धीरे विदेशी संस्कृति की मिलावट हुई और स्वतंत्रता के बाद जब उस संसकृति मे साम्यवाद शामिल हुआ तब वह मिलावट बहुत ज्यादा हो गई। इसलिये स्पष्ट है कि हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति मे इतना अधिक अंतर हो गया कि दोनो मे समानता खोजना ही बहुत कठिन हो गया।
हम भारत की प्राचीन संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के नाम से नामकरण कर रहे है । प्राचीन संस्कृति मे विचार प्रधान होता था और विचारो के आधार पर निकले निष्कर्ष को शेष समाज अपनी संस्कृति के रूप मे विकसित करता था। हिन्दू संस्कृति मे त्याग महत्वपूर्ण था, गुलामी के बाद विकसित भारतीय संस्कृति मे त्याग की जगह संग्रह प्रधान बन गया। विचारो के स्थान पर भी सत्ता और धन महत्वपूर्ण हो गये। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे स्पष्ट देखा जा सकता है कि धन और पद के लिये इतनी अधिक छीना झपटी हो गई है कि हर नई पीढी का सदस्य धन और पद की छीना झपटी मे इस तरह लग गया है कि उसे नैतिकता या अनैतिकता की न कोई चिंता है न ज्ञान। इसी तरह हिन्दू संस्कृति मे वर्ग समन्वय महत्वपूर्ण था। कोई भी समूह सख्या विस्तार को महत्व नही देता था बल्कि हर समूह गुण प्रधानता को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। भारतीय संस्कृति मे हिन्दू संस्कृति के ठीक विपरीत संख्या विस्तार को महत्व दिया जाने लगा । येन केन प्रकारेण हिन्दू संस्कृति के लागो की मान्यता और विष्वास को बदलकर उसे अपने साथ ले लेने को महत्व दिया गया । दुनिया मे हिन्दू संस्कृति आज तक ऐसा कीर्तिमान बनाये हुए है कि वह किसी अन्य संस्कृति के व्यक्ति को किसी तरह अपने साथ शामिल करने का प्रयत्न नही करती। अन्य विदेशी संस्कृतियां इन सब प्रयत्नो मे कितना भी नीचे उतरने के लिये तैयार रहती है। हिन्दू संस्कृति गुलामी सह सकती है किन्तु गुलाम नही बना सकती । वर्तमान भारतीय संस्कृति गुलामी सह तो सकती ही नही है बल्कि गुलाम बनाने को अपनी सफलता मानने लगी है। यही कारण है कि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे निरंतर हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। यह भी प्रत्यक्ष है कि हिन्दू संस्कृति अपने को सुरक्षात्मक मार्ग पर आगे बढ रही है तो भारतीय संस्कृति विस्तार वादी नीति पर चल रही है। हिन्दू संस्कृति का पक्षधर एक महत्वपूर्ण अंश संघ परिवार के नाम से भारतीय संस्कृति के मार्ग पर तेजी से बढने का प्रयास कर रहा है। नई पीढी शराफत को छोडकर अधिक से अधिक चालाक बनने की ओर अग्रसर है। वर्तमान भारतीय संस्कृति एक मुख्य पहचान बना चुकी है कि मजबूत से दबो और कमजोर को दबाओ। इसका प्रमुख कारण है कि प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे संगठन का कोई महत्व नही था जबकि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे सगठन को ही सबसे अधिक सफलता का मापदंड मान लिया गया है। गर्व के साथ संधे शक्ति कलौ युगे का खुले आम नारा लगाया जाता है। मै समझता हॅू कि हिन्दू संस्कृति पर आये विस्तारवादी संकट से सुरक्षा की आवश्यकता समझकर कुछ लोगो ने यह नारा लगाया है कि किन्तु यह नारा हिन्दू संस्कृति की परंपरा और पहचान के रूप मे स्वीकार नही किया जा सकता। प्राचीन संस्कृति मे व्यवस्था प्रमुख थी, राजनैतिक व्यवस्थ का हस्तक्षेप सामाजिक व्यवस्था मे न्युनतम था। दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था भी राजनैतिक व्यवस्था मे हस्तक्षेप नही करती थी। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे धन और सत्ता इतने महत्व पूर्ण हो गये है कि इन्होने मिलकर पूरे समाज को ही गुलाम बना दिया । प्राचीन हिन्दू संस्कृति लगभग सत्ता निरपेक्ष थी लेकिन वर्तमान भारतीय संस्कृति पूरी तरह सत्ता और धन सापेक्ष हो गई है। हिन्दू संस्कृति मे वसुधैव कुटुम्बकम सर्वधर्म समभाव का महत्व था। उस समय धर्म और राष्ट्र की तुलना मे समाज को सर्वाधिक महत्व पूर्ण माना जाता था। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते थे । वर्तमान भारतीय संस्कृति मे समाज और धर्म की परिभाषा भी बदल दी गई और महत्व भी बदल दिया गया। अब समाज की जगह या तो धर्म को उपर माना जाता है या राष्ट को। धर्म का अर्थ गुण प्रधान से बदलकर पहचान प्रधान हो गया है तो राष्ट का अर्थ बदलकर राज्य तक सीमित हो गया है। अब समाज सर्वोच्च तो रहा ही नही । हमारी प्राचीन संस्कृति मे नैतिक प्रगति को भौतिक उन्नति की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाता था। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे नैतिक पतन की तो कोई चिंता ही नही है। भौतिक उन्नति ही सब कुछ मान ली गई है। इस तरह यदि हम वर्तमान भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण व्याख्या करे तो उसमे दो निष्कर्ष निकलते है। 1 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना। 2 कम से कम परिश्रम और अधिक से अधिक लाभ का प्रत्यन करना । दोनो दिशाओ मे भारत दूनिया के अन्य देशो की तुलना मे अधिक तेज गति से छलांग लगा रहा है।
हम इसके कारणो पर विचार करे तो पायेंगे कि हमारी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा के लिये धर्मगुरू और राजनेता महत्वपूर्ण हुआ करते थे। सम्पूर्ण समाज इन दो के पीछे चला करता था। आज भी सम्पूर्ण समाज तो इन दो के पीछे चल रहा है किन्तु इन दोनो की नीयत खराब हो गई है। धर्मगुरू भी समाज को गुलाम बनाने का प्रयास कर रहे है जबकि उन्हे मार्ग दर्शन देना चाहिये था तो सत्ता भी गुलाम बनाने का प्रयास कर रही है जबकि उन्हे सुरक्षा और न्याय की गारंटी देनी चाहिये थी। हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय की गारंटी थी, प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार प्राप्त थे। समाज किसी को भी अनुशासित तो कर सकता था किन्तु दंडित नही कर सकता था । वर्तमान संस्कृति मे समाज विदेशियो की नकल करके दंडित करना सीख गया तो राज्य समाज के हाथ से अनुशासित करने के अधिकार को भी छीन चुका है। अब खाप पंचायते दंड भी देने लग गई है तो राज्य समाज को बहिष्कार के अधिकार से भी वंचित कर रहा है।
प्राचीन और वर्तमान संस्कृति मे आये बदलाव का परिणाम साफ दिख रहा है। परिवार व्यवस्था टूट रही हैे। राज्य व्यवस्था भी अव्यवस्था की तरफ जा रही है। सुरक्षा और न्याय पर से विश्वास घटकर सामाजिक हिंसा पर विश्वास बढ रहा है। लोकतंत्र की जगह तानाशाही की आवश्यकता महसूस हो रही है। सम्पूर्ण समाज किं कर्तब्य विमूढ की स्थिति मे है। वह अपनी गौरव शाली प्राचीन संस्कृति का अनुकरण करके ठगा जाता रहे अथवा वर्तमान भारतीय संस्कृति के साथ घुल मिलकर समाज को ठग ले यह निश्चय करना कठिन हो रहा है। ऐसी परिस्थिति मे क्या करना चाहिये यह बहुत कठिन है। न तो हम ठगे जाने तक की शराफत की सलाह दे सकते है न ही ठग लेने तक की चालाकी को हम अच्छा मान सकते है। इसलिये जो कुछ हमारी हिन्दू संस्कृति का आधार है उसका ही आखं मूदंकर अनुकरण किया जाये इससे मै सहमत नही। साथ ही मै इस धारणा के भी विरूद्ध हॅू कि जो कुछ पुराना है वह पूरी तरह रूढिवादी है , विकास विरोधी है और उसे आंख मुदकर बदल देना चाहिये । मै तो इस मत का हॅू कि हम शराफत और चालाकी की जगह समझदारी से काम ले अर्थात प्राचीन हिन्दू संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति के सैद्धान्तिक गुण दोषो की विवेचना करके उन्हे व्यावहारिक धरातल की कसौटी पर कसा जाये। उसके बाद कोई मार्ग समाज को दिया जाये इस संबंध मे मेरा विचार यह है कि सबसे पहले पूरे भारत मे इस धारणा को विकसित किया जाये कि समाज सर्वोच्च है धर्म और राष्ट्र उसके सहायक या प्रबंधक है । परिवार को समाज की प्राथमिक और अनिवार्य इकाई माना जाये । अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी के साथ मिलकर सहजीवन मे जीवन जीने की शुरूआत करनी होगी । परिवार के बाद गांव को भी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई माना जाये। भारतीय संविधान मे से धर्म और जाति की जगह परिवार ओर गांव को शामिल किया जाये । व्यवस्था के मार्ग दर्शन का अंतिम अधिकार धर्मगुरूओ तथा राजनेताओ से निकाल कर संपूर्ण समाज की भूमिका महत्वपूर्ण की जाये। इसका अर्थ हुआ कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र से निकालकर लोक को अथवा लोक द्वारा बनायी गई किसी व्यवस्था को दिया जाये जिसमे तंत्र से जुडी किसी इकाई का कोई हस्तक्षेप न हो । यहां से हम शुरूआत करे तो आगे आगे कुछ और मार्ग निकल सकते है जिसके परिणाम स्वरूप प्राचीन संस्कृति और वर्तमान संस्कृति के बीच का कोई संशोधित मार्ग निकल सकता है जो हमारे लिये आदर्श बने ।
नोट- मंथन का अगला विषय समाज मे बढता हिंसा पर विश्वास के कारण और निवारण

कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित

Posted By: admin on June 5, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट रखे। भारत में स्वतंत्रता पूर्व के शासक समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से सरकारी कर्मचारियों को अधिक से अधिक सुविधाएॅं देने की नीति पर काम करते रहे। स्वतंत्रता के बाद भी शासन की नीयत में कोई बदलाव नहीं आया। इसलिये उनकी मजबूरी थी कि वे अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएॅं भी दें और संतुष्ट भी रखें।
प्रारंभिक वर्षों में सरकारी कर्मचारियों में असंतोष नहीं के बराबर था किन्तु जब उन्होंने देखा कि भारत का राजनेता सरकारी धन सम्पत्ति को दोनों हाथों से लूटने और लुटाने में लगा है तो धीरे धीरे इनके मन में भी लूट के माल में बंटवारे की इच्छा बढ़ी। सरकार के संचालन में राजनैतिक नेताओं के पास निर्णायक शक्ति होने के बाद भी उन्हें हर मामले में कर्मचारियों की सहायता की आवश्यकता होती थी क्योंकि संवैधानिक ढांचे के चेक और बैलेन्स सिस्टम में कर्मचारी भी एक पक्ष होता है। अतः व्यक्तिगत रूप से कर्मचारी लोग नेताओं के भ्रष्टाचार के सहायक और हिस्सेदार होते चले गये। किन्तु यदि हम भ्रष्टाचार की चर्चा न भी करें तो शासकीय कर्मचारी अपने पास अधिकार होते हुए भी एक पक्ष को इस तरह अकेले अकेले खाते नहीं देख सकता था। अतः उसने धीरे धीरे दबाव बनाना शुरू किया। दूसरी ओर सरकार ने भी नये नये विभाग बनाकर इनकी संख्या बढ़ानी शुरू कर दी और ज्यों ज्यों सरकारी कर्मचारियों की संख्या आबादी के अनुपात से भी कई गुना ज्यादा बढ़ने लगी त्यों त्यों उनकी ब्लैकमेलिंग की क्षमता भी बढ़ती चली गई। इस तरह भारत में लोक और तंत्र के बीच एक अघोशित दूरी बढ़ती चली गई जिसमें सरकार समाज की स्वतंत्रता की लूट करती रही, नेता भ्रष्टाचार के माध्यम से लूट लूट कर अपना घर भरते रहे और शासकीय कर्मचारी ब्लैकमेल करके इस लूट के माल में अपना हिस्सा बढ़ाते रहे।
किसी सरकारी कर्मचारी को इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसकी जरूरतें क्या हैं? न ही उसे इस बात से मतलब है कि भारत के आम नागरिक का जीवन स्तर क्या है। उसे इस बात से भी मतलब नहीं कि उसी के समकक्ष गैर सरकारी कर्मचारी के वेतन और सुविधाओं की तुलना में उसे प्राप्त वेतन और सुविधाएॅं कितनी ज्यादा हैं। उसे तो मतलब है सिर्फ एक बात से कि लोकतांत्रिक भारत में जो धन और अधिकारों की लूट मची है उस लूट में उसकी भी सहभागिता है। उस लूट के माल में हिस्सा मांगना उसका न्यायोचित कार्य है। यदि ठीक से सोचा जाये तो उसका तर्क गलत भी तो नहीं है। कर्मचारी लोक का तो भाग है नहीं। है तो वह तंत्र का ही हिस्सा। फिर वह अपने हिस्से की मांग से पीछे क्यों रहे? कुछ प्रारंभिक वर्षों में शिक्षक और न्यायालयों से संबद्ध लोग ऐसा करना अनुचित मानते थे किन्तु अब तो वे भी धीरे धीरे उसी तंत्र के भाग बन गये हैं। न्यायपालिका और विधायिका का वर्तमान टकराव तथा न्यायपालिका मे आपसी टकराव स्पष्ट प्रमाणित करता है कि सब जगह पावर या धन के अतिरिक्त समाज सेवा का नाम सिर्फ ढोंग है जो समय समय पर लोक को धोखा देने के लिये उपयोग किया जाता है।
सरकारी कर्मचारी अपना वेतन भत्ता बढ़वाने के लिये कई तरह के मार्ग अपनाते हैं। उसमें मंहगाई का आकलन भी एक है। भारत में स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षों में रोटी, कपड़ा, आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में औसत साठ पैसठ गुने की वृद्धि ही हुई है लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद छियानवे गुनी मूल्य वृद्धि हो चुकी है। छियानवे गुनी वेतन वृद्धि तो इनकी जायज मांग मान ली जाती है। यदि भारत में आवश्यक वस्तुओं के औसत मूल्य पांच प्रतिशत बढ़ते हैं तो सरकारी आंकड़े उन्हें सात आठ दिखाते हैं क्योंकि आंकड़े बनाने में कुछ और भी अनावश्यक चीजें शामिल कर दी जाती हैं। इसके बाद भी कई तरह के दबाव बनाकर इनके वेतन और सुविधाओं में वृद्धि होती ही रही है। स्वतंत्रता के बाद आज तक समकक्ष परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी का वेतन करीब दो सौ से ढाई सौ गुना तक बढ़ गया है। उपर से प्राप्त सुविधाओं को तो जोड़ना ही व्यर्थ है। समाज इस पर उंगली उठा नहीं सकता क्योंकि जब नेता ने अपना वेतन भत्ता इनसे भी ज्यादा बढ़ा लिया तथा नेता ने अपनी उपरी आय भी बढ़ा ली तो कर्मचारी बेचारा क्यो न बढावे? सरकार और नेता सरकारी कर्मचारियों की ब्लैकमेलिंग से बचने के लिये कभी निजीकरण का मार्ग निकालते हैं तो कभी संविदा नियुक्ति जैसा। तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर कर्मचारी भी किसी न किसी रूप में इन तरीकों की काट खोजते रहते हैं। और यदि शेष समय में कर्मचारी दब भी जावे तो चुनावी वर्ष में तो वह अपना सारा बकाया सूद ब्याज समेत वसूल कर ही लेता है। अभी कुछ प्रदेशो और केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। कर्मचारी लंगोट कसकर चुनावों की प्रतीक्षा कर रहा है। चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही उसकी सांकेतिक हड़ताल और अन्य कई प्रकार के नाटक शुरू हो जायेंगे। प्रारंभ में सरकार भी उन्हें दबाने का नाटक करेगी। कुछ लोगों का निलम्बन और कुछ की बर्खास्तगी भी होगी। समझौता वार्ता भी चलेगी और अन्त में कर्मचारियों की कुछ मांगे मान कर आंदोलन समाप्त हो जायेगा। हड़ताल अवधि में की गई सारी प्रशासनिक कार्यवाही वापस हो जायेगी क्योंकि सभी नेता जानते हैं कि कर्मचारी चुनावों में जिसे चाहें उसे जिता या हरा सकते हैं। यद्यपि कर्मचारियों की कुल संख्या मतदाताओं की तीन प्रतिशत के आस पास ही होती है किन्तु उनके परिवार, उनके गांव गांव तक फैलाव और उनके एकजुट प्रयत्नों को मिलाकर यह अन्तर सात आठ प्रतिशत तक माना जाता है। आम तौर पर शायद ही कोई नेता हो जो इतना अधिक लोकप्रिय हो कि इतना बड़ा फर्क झेल सके अन्यथा दो तीन प्रतिशत का फर्क ही हार जीत के लिये निर्णायक हो सकता है। नेता को हर पांच वर्ष में जनता का समर्थन आवश्यक होता है जबकि सरकारी कर्मचारी को किसी प्रकार के जनसमर्थन की जरूरत नहीं। चुनावों के समय नेताओं के दो तीन गुट बनने आवश्यक हैं जबकि ऐसे मामलों में सभी कर्मचारी एक जुट हो जाते हैं। फिर उपर से यह भी कि कर्मचारियों को सुविधा देने से नेता को न व्यक्तिगत हानि है न सरकारी क्योंकि अन्ततोगत्वा सारा प्रभाव तो जनता को झेलना है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेता स्वयं अपनी सब प्रकार की सुख सुविधाएॅं बढ़ाता जाता है तो उसका नैतिक पक्ष भी मजबूत नहीं रहता। यही कारण है कि कर्मचारियों का पक्ष जनविरोधी, अनैतिक ब्लैकमेलिंग होते हुए भी नेता झुककर उनसे समझौता करने को मजबूर हो जाता है।
अधिकांश कर्मचारी नौकरी पाते समय ही भारी रकम देकर नौकरी पाते हैं। बहुत कम ऐसे होते हैं जो बिना पैसे या सिफारिश के नौकरी पा जायें। स्वाभाविक है कि उनसे इमानदारी या चरित्र की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो व्यक्ति घर के बर्तन या जमीन बेचकर एक नौकरी पाता है वह भ्रष्टाचार भी करेगा और ब्लैकमेलिंग भी करेगा। यदि नहीं करेगा तो परिवार से भी तिरस्कृत होगा और अन्य कर्मचारियों में भी मूर्ख ही माना जायेगा। ऐसी विकट परिस्थिति आज सम्पूर्ण भारत की है। चाहे केन्द्र सरकार के कर्मचारी हों या प्रदेश सरकार के। सबकी स्थिति एक समान है। चाहे हवाई जहाज के पायलट हो या बैंक कर्मचारी या कोई चपरासी। चाहे दस हजार रूपया मासिक वाला छोटा कर्मचारी हो या लाख दो लाख रूपया मासिक वाला सुविधा सम्पन्न कर्मचारी। सबकी मानसिकता एक समान है, सबकी एक जुटता एक समान है, सब स्वयं को तंत्र का हिस्सा मानते हैं। लोक को गुलाम बनाकर रखने में भी सब एक दूसरे के सहभागी हैं और लोक को नंगा करने में भी कभी किसी को कोई दया नहीं आती।
कोई भी सरकार चाहे कितना भी जोर लगा दे चुनाव के समय उसे कर्मचारियो के समक्ष झुकना ही पडेगा । 130 करोड की आबादी मे 127 करोड लोक के लोग है तो 3 करोड तंत्र से जुडे। इसमे भी नेताओ की कुल संख्या कुछ लाख तक सीमित है। ये ढाई करोड कर्मचारी तो परिस्थिति अनुसार एक जुट हो जाते है किन्तु पचास लाख राजनेता चुनावो के समय दो गुटो मे बट जाते है। इस समय उन्हे न देश दिखता है न समाज । इस समय उन्हे न न्याय दिखता है न व्यवस्था । उन्हे दिखता है सिर्फ चुनाव और किसी भी परिस्थिति मे वे मुठठी भर संगठित कर्मचारियों का समर्थन आवश्यक समझते है। यही कारण है कि 127 करोड का लोक इन नेता और कर्मचारी के चक्रव्यूह से अपने को कभी बचा नही पाता।
विचारणीय प्रश्न यह है कि इस स्थिति से निकलने का मार्ग क्या है? नेता चाहता है कि जनता सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ खड़ी हो। यह संभव नहीं क्योंकि जनता ने तो नेता को चुना है और नेता द्वारा बनाई गई व्यवस्था द्वारा सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति में जनता का कोई रोल नहीं होता। जनता जब चाहे कर्मचारी के विरूद्ध कुछ नहीं कर सकती जब तक उसका काम नियम विरूद्ध न हो। दूसरी ओर नेता को जो शक्ति प्राप्त है वह जनता की अमानत है। जनता जब चाहे नेता को बिना कारण हटा सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के विरूद्ध जन आक्रोश का कोई परिणाम संभव नहीं। उचित तो यही है कि इस विकट स्थिति से निकलने की शुरूआत नेता से ही करनी पड़ेगी। यदि कर्मचारी ब्लैकमेल करता है तो उसका सारा दोष नेता का है। नेता ही समाज के प्रति उत्तरदायी है। यही मानकर आगे की दिशा तय होनी चाहिये।
यह स्पष्ट है कि नेता कर्मचारी का गठबंधन टूटना चाहिये और अनवरत काल तक कभी टूटेगा नही । यदि नेता चाहे भी तो टूट नही सकेगा। इसका सबसे अच्छा समाधान सिर्फ निजीकरण है। अनावश्यक विभाग समाप्त हो राज्य सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो कर्मचारियो की संख्या अपने आप कम हो जायेगी। राज्य रोजगार और नौकरी की अबतक चली आ रही परिभाषाओ को बदले । राज्य का काम रोजगार के अवसर पैदा करना होता है न कि नौकरी के माध्यम से रोजगार देना । यह तो गुलामी काल की परिभाषा थी जिसे अबतक बढाया जा रहा है। मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता है और इसके लिये जनजागरण करना होगा । कोई भी सरकारी कर्मचारी जान दे देगा किन्तु निजीकरण नही होने देगा। कोई भी नेता भले ही निजीकरण की बात करे किन्तु घुमफिर कर निजीविभागो पर अनावश्यक नियंत्रण करके उन्हे परेशान करेगा जिससे वे तंत्र के चंगुल मे बने रहे। समस्या विकट है समाधान करना होगा और इसके लिये जनजागरण ही एक मात्र मार्ग है।

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