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मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...
हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति ...
कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है। 1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है। 2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरू...
सामयिकी–बजरंग मुनि
लम्बे समय से दुनियां की अर्थ व्यवस्था श्रम शोषण के आधार पर अपनी योजनाएं बनाती रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत भी उनकी नकल करता रहा । भारत की सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था मे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी कि...
ज्ञान यज्ञ–बजरंग मुनि
ज्ञान यज्ञ का कार्येक्रम 3 घंटे व प्रति माह अम्बिकापुर छ०ग० दिनाँक:- 22 मई 2018 दिन मंगलवार समय:- सायं 06.30 बजे से 09.30 बजे तक सयुंक्त परिवार विषय पर चर्चा, स्थान:- अग्रेसन भवन अम्बिकापुर छत्तीसगढ़ में रखा ...

मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–

Posted By: admin on July 7, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।

1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापित कर दिया जाता है।

2 दुनियां मे परिभाषाओ को विकृत करने का सबसे अधिक प्रयास साम्यवादियो ने किया और सबसे कम मुसलमानो ने।

3 दुनियां मे योजना पूर्वक पचासो परिभाषाए पूरी तरह बदल दी गई है। इनमे मंहगाई बेरोजगारी गरीबी महिला उत्पीडन आदि अनेक परिभाषाए शामिल है।

4 गुलामी के बाद भारत मे अपना चिंतन बंद हो गया और भारत सिर्फ नकल करने लगा। साम्यवाद और पश्चिम की विकृत परिभाषाओ को भारत मे सत्य के समान मान लिया गया जो अब तक जारी है।

5 मंहगाई सेन्सेक्स बेरोजगारी जी डी पी रूपये का मूल्य ह्रास आदि से सारा भारत चिंतित है जबकि उनमे से किसी का भारत की सामान्य जनता पर अब तक कोई अच्छा बुरा प्रभाव नही पडा।

6 मंहगाई जी डी पी बेरोजगारी रूपये का मूल्य ह्रास सेन्सेक्स आदि का सामान्य अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पडने का प्रचार काल्पनिक है यथार्थ नही।

अपने 65 वर्षो के लगातार चिंतन के बाद भी मै कभी नही समझा कि मंहगाई बेरोजगारी जी डी पी का भारत के सामान्य जन जीवन पर क्या और कितना अच्छा बुरा प्रभाव पडा। स्वतंत्रता के बाद मंहगाई कितनी बढी और उसका क्या प्रभाव पडा यह बताने वाला कोई नही। कौवा कान ले गया और अपना कान न देखकर कौवे के पीछे पूरा भारत भाग रहा है। भारत मे आवश्यक वस्तुओ मे मंहगाई स्वतंत्रता के बाद करीब 60 गुनी बढी है और औसत जीवन स्तर इसके बाद भी सुधर कर करीब चार गुना बढ गया। सेन्सेक्स घटने बढने का तो प्रभाव कुछ समझ मे ही नही आता। जी डी पी भी हर साल घटते बढते रहता है लेकिन न कभी अच्छा प्रभाव दिखा न कभी बुरा। बेरोजगारी घटने बढने का भी कोई अच्छा बुरा प्रभाव आज तक स्पष्ट नही हुआ क्योकि इन सबकी जान बुझकर परिभाषाए बदलने मे पश्चिम
की नकल की गई । जब परिभाषा ही बदल दी गई तब वास्तविक अर्थ का पता ही नही चलेगा। यदि आपको दो और दो पांच लगातार पढाया जाये तो उससे आपके निष्कर्ष गलत होना स्वाभाविक है। दोष निष्कर्ष निकालने वाले का नही है बल्कि गलत परिभाषा का है।

भारत मे डालर की तुलना मे रूपये के गिरते मूल्य की बहुत चिंता हो रही है। देश का हर आदमी चिंता कर रहा है कि रूपये का मूल्य गिरकर 70 रूपये के आस पास हो गया है। मै तो भावनात्मक रूप से इन सारे प्रचार को षणयंत्र मानता हॅू क्योकि यदि वास्तव मे डालर की तुलना मे रूपया स्वतंत्रता के बाद 70 गुना गिर गया तो उसका प्रभाव भारत की अर्थ व्यवस्था पर अब तक कितना पडा यह बताने वाला कोई नही है। आर्थिक दृष्टि से जो भी लोग अखबारो मे या इस मूल्य ह्रास की चर्चा करते है वे पश्चिम की कितावे पढकर उस गलत परिभाषा के आधार पर परिस्थितियो का आकलन करते है जबकि परिभाषा गलत होने से सारे परिणाम भी गलत हो जाते है । मै दशको से सुनता रहा हूॅ कि डालर की तुलना मे रूपया गिर गया और उसके प्रभाव से भारत पर विदेशों का कर्ज बढ गया । लेकिन मै आज तक नही समझा कि कर्ज बढा या नही और यदि बढा तो कितना बढा और उसका भारत की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव क्यो नही दिखा। सन 47 मे एक डालर का मूल्य एक रूपये के बराबर था जो आज करीब 70 रूपये के बराबर हो गया है तो क्या भारत पर विदेशों का कर्ज 70 गुना बढ गया । मैने इस संबंध मे जब अपनी परिभाषाओ के आधार पर सोचना समझना शुरू किया तो मुझे स्पष्ट दिखा कि ये सब कुछ भ्रम पैदा करने का प्रभाव है । न तो भारत पर कोई कर्ज बढा है न कोई उसका प्रभाव पडा है।

एक आकलन के अनुसार स्वतंत्रता के बाद भारत मे अपने रूपये का आंतरिक मूल्य करीब 95 रूपये के बराबर हो गया है । इसका अर्थ हुआ कि भारत मे जो औसत वस्तुए उस समय एक रूपये मे मिलती थी वे यदि आज 95 रूपये मे मिलती है तो इस प्रकार का कोई बदलाव नही हुआ है। न कोई चीज सस्ती हुई है न मंहगी। स्पष्ट है कि इस आधार पर भारत मे डालर का मूल्य भी 95 रूपये होना चाहिये था जो अभी 70 रूपये के आस पास है। इसका भी एक कारण है भारत मे स्वतंत्रता के बाद औसत मूल्य वृद्धि साढे छ प्रतिशत वार्षिक की है । प्रत्येक 10 वर्ष मे रूपये की किमत आधी हो जाती है अमेरिका मे डालर का मूल्य 10वर्षो मे 10 प्रतिशत के आसपास ही घटता है । यही कारण है कि जहां रूपये का आंतरिक मूल्य 10 वर्षो मे दो गुना हो जाता है वही डालर की तुलना मे रूपये का मूल्य 12 वर्षो मे दो गुना होता है। अर्थात यदि सन 47 मे डालर एक रूपया के बराबर था तो बारह वर्षो के बाद दो के बराबर चालिस वर्षो के बाद करीब आठ के बराबर और अब सत्तर वर्षो के बाद करीब 75 रूपये के बराबर होना चाहिये था जो अभी 70 के आस पास है। स्पष्ट है कि रूपया अब भी डालर की तुलना मे कुछ मजबूत है। यह अलग बात है कि मनमोहन सिंह के कार्य काल मे डालर को साठ होना चाहिये था किन्तु 44 पर रूका था। स्पष्ट है कि आर्थिक मामलो मे मनमोहन सिंह बहुत अधिक सिद्ध हस्त थे।

विदेशी कर्ज रूपये के आधार पर कभी घटता बढता नही है। कल्पना करिये कि सन 47 मे शक्कर एक रूपया अर्थात डालर की दो किलो उपलब्ध थी। यदि हम पर 100 डालर का कर्ज था तो उसके बदले हमे दो सौ किलो शक्कर देनी पडेगी। आज भी यदि हम पर 100 डालर का कर्ज है और शक्कर 70 रूपये के बराबर है तो हमे 200 किलो ही शक्कर देनी है। रूपया वस्तु का स्थान नही ले सकता । बल्कि वह तो सिर्फ एक विनिमय माध्यम है। रूपये के आंतरिक मूल्य घटने बढने का विदेशी लेने देन पर कोई अच्छा बुरा प्रभाव तब तक नही होता जब तक लेन देन विदेशी मुद्रा मे न होकर भारतीय मुद्रा मे न हो । आम लोगो को आर्थिक मामलो मे धोखा देने के लिये घाटे का बजट जान बूझकर बनाया जाता है जिससे मंहगाई मुद्रा स्फीति और अन्य अनेक आर्थिक भ्रम फैलाने मे सुविधा हो ।

आयात निर्यात भी इसमे बहुत प्रभाव डालता है। यदि आयात अधिक होगा और निर्यात कम तो अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव पडना निश्चित है। सरकारे राजनैतिक लाभ के लिये कभी नही चाहती हैं कि आयात निर्यात का संतुलन हो । क्योकि यदि आयात कम होगा तो सुविधाएं घटेगी। झुठे वादे और यथार्थ के बीच अंतर बढ जायेगा। इसका राजनैतिक दुष्प्रभाव स्वाभाविक है। स्पष्ट दिखता है कि डीजल पेट्रोल का आयात सबसे बडी समस्या है। वर्तमान समय मे इसे कम करने का किसी तरह का कोई प्रयास नही हो रहा है क्योकि खाडी देशों से संबंध भी सुधारने है । साथ ही डीजल पेट्रोल के आयात के खेल मे दो नम्बर का भी काम बहुत होता है और आयात कम करने से आवागमन मंहगा होगा जिससे मध्यम उच्च वर्ग का आक्रोश झेलना पडेगा। इसलिये कोई भी सरकार सब कुछ कर सकती है किन्तु डीजल पेट्रोल का आयात घटने नही देगी। आवागमन कभी मंहगा नही होने देगी।

मैन यह लेख मंथन के अंतर्गत लिखा गया है कोई अंतिम निष्कर्ष नही है । मै नही कह सकता कि मेरे लेख मे सभी निष्कर्ष सही होंगे किन्तु मै अपने साथियो से जानना चाहता हूॅ के मेरे चिंतन मे कहां गलत है और क्या गलत है । यदि कोई बात गलत होगी तो मै सुधारने के लिये सहमत हॅू। मेरी हार्दिक इच्छा है कि विदेशो की नकल करके असत्य को सत्य के समान स्थापित करने की भारतीय आदत को चुनौती देनी चाहिये । इसी उद्देश्य से मंथन के अंतर्गत यह लेख लिखा गया है।

नोट- मंथन का अलगा विषय हिंसा या अहिंसा होगा।

सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on July 5, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली सरकार हाइकोर्ट उप राज्यपाल या केन्द्र सरकार । यह निर्णय उच्चतम न्यायालय का नही था बल्कि संविधान पीठ का निर्णय था।
सब जानते है कि भारत मे संविधान का शासन है। संविधान की जो व्याख्या केन्द्र सरकार ने की थी उसके अनुसार वह जो कर रही थी वह सही कदम था। उप राज्यपाल भी जो कर रहे थे उसमे कुछ भी गलत नही था क्योकि वे भी संविधान के अनुसार ही कार्य कर रहे थे। उच्च न्यायालय मे भी संविधान की सही व्याख्या की थी। उच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या नही कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले मे कोई हस्तक्षेप नही किया और मामला संविधान पीठ मे भेज दिया। संविधान पीठ ने इस मामले मे संविधान के शब्दो का भौतिक अर्थ और मूल भावना के बीच अंतर की व्याख्या की और निर्णय दिया की चुनी हुई सरकार जनता की प्रतिनिधि होती है । उसे कोई अन्य इकाई सहायक के रूप मे उपयोग नही कर सकती। इसका अर्थ हुआ कि केजरीवाल भी अपनी जगह पर सही थे जो संविधान की मूल भावना को समझ रहे थे।
अब यह विवाद निपट जाना चाहिये परन्तु निपटेगा नही क्योकि केजरीवाल जी का संघर्ष दिल्ली सरकार चलाने तक सीमित नही है बल्कि प्रधान मंत्री की दौड मे स्वयं को आगे रखने का है। केजरीवाल नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध सबसे आगे रहने के लिये नये नये विवाद खोजते रहेंगे दूसरी ओर केन्द्र सरकार उनकी इच्छा के अनुसार उनपर कोई ऐसा प्रत्यक्ष आक्रमण नही करेगी जिससे उन्हे सहानुभूति मिले। केन्द्र सरकार चाहेगी कि किसी भी परिस्थिति मे केजरीवाल सरकार को बर्खास्त न किया जाय जो केजरीवाल लम्बे समय से प्रतिक्षा कर रहे है । दिल्ली की आम जनता से किसी को कोई मतलब नही है। क्योकि राजनेताओ की तो यह दुकानदारी है और संविधान उस दुकानदारी मे काम आने वाला तराजु और बांट। सारा दोष संविधान मे था जिसके कारण ये सारा विवाद पैदा हुआ और आज तक बना हुआ है।

सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on July 4, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने के प्रयास हुए। टी वी मे बैठकर सबने किसी न किसी तरह की हत्या का संदेह व्यक्त करना शुरू किया। कुछ लोगो ने उच्च स्तरीय जांच की भी मांग की। रिश्तेदारों ने भी हत्या कहना शुरू कर दिया। कुछ लोगो ने किसी तांत्रिक का हाथ बताया तो किसी ने और कई संदेह व्यक्त किये जबकि मामला बिल्कुल सीधा दिखता है कि परिवार का कोई एक सदस्य मोक्ष की कामना से प्रभावित होकर धीरे धीरे पूरे परिवार की सोच उस दिशा मे मोडता रहा और पूरा परिवार उसके प्रभाव मे आकर उसकी सलाह से आत्महत्या के लिये तैयार हो गया।
किसी काल्पनिक सुख की कामना से खुशी खुशी आत्महत्या करने का यह पहला मामला नहीं है। आतंकवादी मुसलमान तो आम तौर पर ऐसा ही करते है। उन्हे स्वर्ग मे अनेक सुविधाओ का विश्वास करा दिया जाता है और वे उन कल्पनाओ को यथार्थ मानकर जान देने के लिये तैयार रहते है। फर्क यह है कि हिन्दुओ मे ये काल्पनिक सुविधाए सात्विक होती है तो मुसलमानो मे तामसी । हिन्दुओ मे ऐसे प्रचार का दुरूपयोग कुछ स्वार्थी धर्मगुरू अपने लिये करते है तो मुसलमानो मे अपने संगठन विस्तार के लिये। यह ग्यारह आत्म हत्याओ का मामला कुछ भिन्न है क्योकि इसके पीछे कोई स्वार्थ नही है।
अनेक अन्ध श्रद्धा उन्मूलन संस्थाएं समाज मे लगातार प्रयास रत है और अन्ध श्रद्धा बढती जा रही है। सच्चाई यह है कि इन संस्थाओ का स्वयं का तरीका ठीक नही। ये संस्थाएं प्रायः व्यावसायिक है। खास बात यह है कि जब तक आप पर रोगी का विश्वास नही होगा तब तक आपका प्रभाव नही होगा। अन्ध श्रद्धा दूर करने का सरल उपाय है तर्क शक्ति जागरण। आज समाज मे एक वर्ग ऐसा है जो लगातार समझाता है कि तर्क से दूर रहना उचित है क्योकि तर्क किसी नतीजे तक नही पहुचने देता। दूसरी ओर बडी मात्रा मे लोग हर प्रकार की श्रद्धा का विरोध करते रहते है । ऐसे लोग ईश्वर तक का विरोध करने लगते है। दोनो ही अतिवाद घातक है। समन्वय की आवश्यकता है । हमलोगो ने एक छोटे से शहर मे प्रयोग किया। तर्क या अंध श्रद्धा का विरोध बिल्कुल नही किया और धीरे धीरे विचार मंथन का अभ्यास कराया तो परिणाम अच्छे आये । यदि कोई तर्क का विरोध करे तो उससे बचने की जरूरत है। कोई श्रद्धा को भी गलत बतावे तो दूरी बनाइयें। बीच का मार्ग ही ठीक है।

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