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मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जु...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपाल...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”–बजरंग मुनि
कुछ सिद्धान्त है। 1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है। 2 समाज को एक ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...

मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 27, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त हैः-

1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जुला स्वरूप होता है।
2. गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर यदि आॅकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलते है। इन्हें हम विचारक, प्रबंधक, व्यवस्थापक और श्रमिक के रूप में विभाजित कर सकते है। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था।
3. भारत की वर्ण व्यवस्था दुनियाॅ की एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो आदर्श है। यदि यह व्यवस्था विकृत होकर योग्यता की जगह जन्म का आधार नहीं ग्रहण करती तो अब तक सारी दुनियां इसे स्वीकार कर चुकी होती।
4. बहुत लम्बे समय के बाद सामाजिक व्यवस्थाएं रूढ होकर विकृत हो जाती है और उसके दुष्परिणाम उस पूरी व्यवस्था को ही सामाजिक रूप से अमान्य कर देते है।
5. वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियाॅ सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण, कर्म, स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियाॅ बनती है।
6. वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
7. स्वामी दयानंद महात्मा गांधी सरीखे महापुरूष वर्ण व्यवस्था की विकृतियों को दूर करना चाहते थे। भीमराव अम्बेडकर, नेहरू आदि ने वर्ण व्यवस्था की विकृतियों पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का प्रयास किया। उसका दुष्परिणाम भारत भोग रहा है।
8. वर्ण व्यवस्था में योग्यता और क्षमतानुसार कार्य का विभाजन होता है और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग वर्ण को अलग-अलग उपलब्धियाॅ भी प्राप्त होती है।
9. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था है। उसका राजनीति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं। सामाजिक व्यवस्था में राजनीति का प्रवेष जितना ही बढता है उतनी ही अव्यवस्था बढती है जैसा भारत में हो रहा है।
10. वर्ण व्यवस्था में विचारक को सर्वोच्च सम्मान, प्रबंधक को शक्ति, व्यवस्थापक को अधिकतम आर्थिक सुविधा और श्रमिक को अधिकतम सुख की गारंटी और सीमा निर्धारित होती है।

प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण विचार प्रधान होता था, क्षत्रिय शक्ति प्रधान, वैश्य कुशलता तथा श्रमिक सेवा प्रधान जाना जाता था। सबके गुण और स्वभाव के आधार पर वर्ण निर्धारित होते थे। जन्म के अनुसार सबको शून्य अर्थात शुद्र माना जाता था और धीरे-धीरे जन्म पूर्व के संस्कार पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश के आधार पर वह अपनी योग्यता सिद्ध करता था तब उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का विशेष वर्ण दिया जाता था। ऐसी भी बात सुनी जाती है कि आठ वर्ष की उम्र में जो बालक ब्राह्मण की योग्यता की परीक्षा पास कर लेता था उसे ब्राह्मण का यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण घोषित किया जाता था। वह भविष्य में ब्राह्मण की पढाई विशेष रूप से करता था और उस एक दिशा में ही निरंतर आगे बढता जाता था। दस वर्ष की उम्र में शेष बच्चों की एक अलग तरह की परीक्षा होती थी। उस परीक्षा में उत्तीर्ण बच्चों को क्षत्रिय का यज्ञोपवीत दिया जाता था। बारह वर्ष की उम्र में वैश्य की परीक्षा होती थी और ऐसे बालक वैश्य का यज्ञोपवीत लेते थे। जो बालक तीन परीक्षाओं में पास नहीं होते थे उन्हें श्रमिक माना लिया जाता था और उन्हें यज्ञोपवीत से वंचित कर दिया जाता था। ब्राह्मणों के लिए जीवन पद्धति क्रियाकलाप तथा उपलब्धियाॅ सीमित होती थी। जो ब्राह्मण सम्मान के अतिरिक्त धन या राजनैतिक सत्ता की ओर प्रयत्न करता था उसे असामाजिक मान लिया जाता था अथवा उसका वर्ण बदल भी दिया जाता था। इसी तरह अन्य वणों के लिए भी था यदि कोई बढी उम्र में भी कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता था तो उसका वर्ण बदलने की भी व्यवस्था थी। इसी तरह क्षत्रिय को ब्राह्मण की तुलना में कम सम्मान और सामान्य धन के आधार पर जीवन बिताना पडता था। वैश्य को सबसे कम सम्मान तथा राजनैतिक शक्ति शून्य पर संतोष करना था। श्रमिक को सर्वोच्च सुख की सुविधा प्राप्त थी उसे सम्मान, पाॅवर और धन से मुक्त होकर सेवा के माध्यम से अधिकतम सुख की व्यवस्था थी। उसकी सामान्य जीवन उपयोगी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की गारंटी थी। ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शुद्र को श्रम के आधार पर अपनी सुविधाएं इकठ्ठी करने की सीमाएं बनी हुयी थी। इन सीमाओं को न कोई तोड सकता था न ही उनकी तोडने की मजबूरी थी क्योंकि सामाजिक व्यवस्था इतनी मजबूत और सुचारू ढंग से चल रही थी कि किसी के सामने कोई संकट या मजबूरी कभी आती ही नही थी। कार्य विभाजन सबका अलग-अलग था और व्यवस्थित था। कोई किसी दूसरे के कार्य में न हस्तक्षेप करता था न प्रतिस्पर्धा करता था। कोई भी व्यक्ति एक से अधिक कार्य अपने पास केन्द्रीत नहीं कर पाता था। परिणामस्वरूप किसी भी वर्ण में बेरोजगारी का खतरा नही था। महिलाओं के संबंध में उच्च वर्ण के पुरूष निम्न वर्ण की महिलाओं के साथ विवाह और संतान उत्पत्ति कर सकते थे। निम्न वर्ण के पुरूष द्वारा उच्च वर्ण की महिलाओं से विवाह या संतान उत्पत्ति वर्जित था। यह सब सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक संरचना के आधार पर चल रही थी। जब यह रूढ बनी और बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से इस वर्ण व्यवस्था में आरक्षण लागू किया और योग्यता की परीक्षा की अपेक्षा जन्म के आधार पर वर्ण निश्चित करना शुरू कर दिया तब इसका दुरूपयोग शुरू हुआ और अव्यवस्था असंतोष बढने लगा। जब मूर्ख लोग ब्राह्मण बनकर ज्ञान और सम्मान के केन्द्र बनने लगे तब स्वाभाविक ही था कि समाज में असंतोष बढे। स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी ने इस वर्ण व्यवस्था की विकृति को ठीक करने का प्रयास शुरू किया और उसके बहुत अच्छे परिणाम आये लेकिन स्वतंत्रता के बाद नेहरू और भीमराव अम्बेडकर ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस विकृति का लाभ उठाना चाहा और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को तोडकर जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की। परिणाम हुआ कि वे कोई नई व्यवस्था तो नहीं बना सके किन्तु पुरानी बनी हुई विकृत या अच्छी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। वर्तमान समय में समाज व्यवस्था को तोडकर राज्य व्यवस्था को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का उनका षणयंत्र सफल हो गया। धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर हो रही है, टूट रही है और राज्य व्यवस्था अधिक से अधिक शक्तिशाली होती जा रही है।

मैं अच्छी तरह समझता हूॅ कि समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था से अच्छी कोई अन्य व्यवस्था नहीं हो सकती किन्तु वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के नाम से संशोधित या प्रचलित करना न संभव है न उचित। कुछ नये नामों पर विचार करके फिर से वर्ण व्यवस्था को सक्रिय और प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिए। ब्राह्मण की जगह विचारक विद्वान या मार्गदर्शक नाम दिया जा सकता है। क्षत्रिय की जगह सुरक्षाकर्मी, प्रबंधक, राजनैतिक, राजनेता सरीखे नाम दिया जा सकता है। वैश्य की जगह व्यापारी, व्यवस्थापक या और नाम दे सकते है। शुद्र की जगह श्रमिक उपयुक्त नामकरण है किन्तु वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वह जन्म के आधार पर न होकर गुण और स्वभाव के आधार किसी परीक्षा के बाद घोषित होनी चाहिए।

ऐसी कोई सामाजिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिये जो फिर से सम्मान, शक्ति, सुविधा और सेवा को योग्यता और क्षमतानुसार अपनी-अपनी सीमाओं में बिना किसी राजनैतिक कानून के दबाव में बांधने और संचालित करने में सक्षम हो सके। मैं पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के पक्ष में हूॅ। मैं समझता हूॅं कि ऐसी कोई नई व्यवस्था बनाना बहुत कठिन कार्य है किन्तु इसकी शुरूआत इस तरह हो सकती है कि वर्तमान समय में बने हुए व्यावसायिक बौद्धिक राजनैतिक या श्रमिक समूहों को मान्यता देकर उन्हें अपनी आंतरिक व्यवस्था को मान्यताएं दी जाये। इसका अर्थ हुआ कि अधिवक्ता समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं तय करे तो वस्त्र व्यवसायी अपनी स्वयं । इसी तरह संत समाज के लोग भी अपने आंतरिक व्यवस्था स्वयं बना ले श्रमिक समूह भी बना सकते है। शिक्षक समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था और नियमावली स्वयं बना सके। मैं तो इस मत का हूॅ कि विवाह शादी तथा अन्य सामाजिक संबंधो में भी यदि जाति और वर्ण को प्राथमिकता दी जाए तो व्यवस्था और अच्छी होगी यदि वकील लडके का विवाह वकील लडकी से हो और श्रमिक का विवाह श्रमिक कन्या से हो तो इसमें लाभ ही होगा हानि नहीं। इस तरह धीरे-धीरे नये तरह की आदर्श वर्ण व्यवस्था एक स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सरकार को भी ऐसे समूहों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 18, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है।

1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्षा की गारंटी देती है तो न्यायपालिका न्याय की।
2. सुरक्षा और न्याय पूरा होने के लिए आवश्यक है कि पुलिस और न्यायालय एक-दुसरे के पूरक और समन्वयक हो।
3. यदि न्यायपालिका न्याय देने में असफल हो जाती है तब पुलिस की मजबूरी हो जाती है कि वह सुरक्षा देने के लिए असंवैधानिक तरीकों का भी प्रयोग करे।
4. वर्तमान भारत में न्यायपालिका न्याय देने में भी असफल है और पुलिस के काम में निरंतर बाधा भी पहुॅचाती है।
5. न्याय और सुरक्षा देना राज्य का लक्ष्य होता है और कानून उसका मार्ग। यदि कानून का पालन कराना लक्ष्य मान लिया गया तो अव्यवस्था निश्चित है।
6. यदि न्याय और कानून के बीच दूरी बढ जाती है तब कानून की समीक्षा की जाती है न्याय की नहीं।
7. लोकतंत्र में विधायिका न्याय को परिभाषित करती है न्यायपालिका उस परिभाषा के अनुसार समीक्षा करती है और कार्यपालिका इसे क्रियान्वित करती है।
8. समाज में अपराधियों में पुलिस का भय होना चाहिए और निरपराध लोगों में विश्वास होना चाहिए। वर्तमान समय में उलटा हो रहा है।
9. सूचना और शिकायत में अंतर करने की आवश्यकता है। न्यायपालिका इन दोनो के बीच का फर्क और उसके कारण बढ रही अव्यवस्था के विषय में नही सोचती।

पिछले 70 वर्षो में न्यायपालिका ने समाधान कम किए और समस्याएं अधिक पैदा की। न्यायपालिका को समझना चाहिए था कि वह कानून के अनुसार न्याय घोषित करने तक सीमित है न्याय को परिभाषित विधायिका करती है और क्रियान्वित कार्यपालिका। न्यायालय न्याय को परिभाषित करने पर भी सक्रिय हो गया और क्रियान्वित करवाने में भी। न्यायालय यह सिद्ध करने में जुट गया कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है जबकि यह सोच पूरी तरह गलत है। परिणाम हुआ कि अपराधियों को या तो दंड मिलने में विलम्ब होने लगा या दंड महत्वहीन हुआ। परिणाम हुआ कि भारत की आम जनता में प्रत्यक्ष हिंसक और अराजक दंड देने के प्रति विश्वास बढ रहा है। इन परिस्थिति को देखते हुए पुलिस विभाग भी सुरक्षा देने के लिए सक्रिय हुआ। उसमे भी अपराधियों को पकड-पकड कर अवैधानिक तरीके से मारना शुरू हुआ क्योंकि पुलिस के लिए न्याय की तुलना में सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है और यदि न्यायालय पुलिस के कार्य में लगातार बाधक बनता है तो पुलिस के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं बचता की वह झूठ का सहारा लेकर अपराधियों को सीधे दंडित करने का प्रयास करे। सोहराबुद्दीन हत्या इशरत जहां का प्रकरण स्पष्ट उदाहरण है जब पुलिस ने इस प्रकार की सुरक्षा के लिए गैरकानूनी कार्य किए और सम्पूर्ण समाज का विश्वास अर्जित किया भले ही न्यायालय ने उसमें कितने भी रोडे़ अटकाये हो। पंजाब में आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पुलिस की अतिसक्रियताही कारगार हो सकी। छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित उत्तरी हिस्से को नक्सलवाद से मुक्त करवाने में भी पुलिस की अतिसक्रियता की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। जिस पुलिस अफसर ने यह कार्य किया उसे आज भी उस क्षेत्र के लोग भगवान सरीखे मानते है। उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्श में पुलिस की अतिसक्रियता के कारण जितने अपराधी मारे गये है उस आधार पर पुलिस की विश्वसनीयता बढी है।

मैंने पुलिस की अतिसक्रियता के अच्छे भी परिणाम देखे है और बुरे भी। महाराष्ट्र के एक न्यायालय से एक बडे अपराधी को बाहर निकाल कर कुछ महिलाओं ने हत्या कर दी थी उन महिलाओं को बहुत प्रशंसा मिली। इसी तरह अम्बिकापुर शहर में महिलाओं का चैन लूटकर भाग रहे पेशेवर लूटेरो को एक बार पकडे जाने पर भीड ने उनमें एक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पकडने वाले को वहाॅ के नागरिकों ने और पुलिस विभागों ने भी सम्मानित किया। एक विपरीत घटना में हमारे जिले में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पीछे बैठाकर मोटर साइकिल से जा रहा था स्पीड ब्रेकर के उछलने के कारण पत्नी गिरकर मर गयी और पुलिस ने उस मामले में उस मोटरसाइकिल चालक पति पर मुकदमा कर दिया। कुछ ही वर्ष बीते है कि यदि आज महाराष्ट्र और अम्बिकापुर की कानून तोडकर भीड द्वारा दिए गए दंड की आज समीक्षा हो तो कुछ वर्ष पूर्व जिन्हें सम्मानित किया गया था आज लिचिंग के अपराध में हत्या का मुकदमा झेल रहे होते। समझ में नही आता कि न्याय की परिभाषा सुविधानुसार बदली जा रही है। यदि कोई अपराध होता है और अपराध के पीछे कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं है, भूल है या उद्देश्य जनहित है तो ऐसे कार्य को गैरकानूनी माना जाना चाहिए अपराध नहीं। दोनों के दंड में भी अंतर होना चाहिए। एक पुलिस वाले ने जनहित की भावना से किसी अपराधी की हत्या कर दी या भूल से किसी निर्दोष की हत्या कर दी तथा यदि व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर किसी अपराधी या निर्दोष की हत्या कर दी तो यह तीनों घटनाएं भिन्न-भिन्न परिणाम रखती है। कानून और न्यायालय को इन सब में भिन्नता देखनी चाहिये। आश्चर्य होता है कि न्यायपालिका इतने स्पष्ट अंतर को भी नहीं समझ पाती। गैरकानूनी और अपराध बिल्कुल अलग-अलग होते है और अलग-अलग समझे जाने चाहिये। अपराध में अपराधी की नीयत अवश्य परिभाषित होनी चाहिए किन्तु हम देखते है कि जो न्यायालय बीस-तीस हत्याएं करने के बाद भी अपराधी को दंडित नहीं कर पाती या निर्दोष घोषित कर देता है उस अपराधी को कोई पुलिस वाला अवैध तरीके से मार दे तब न्यायिक सक्रियता देखते ही बनती है।

विचित्र स्थिति है कि भारत में अनेक अपराधियों ने हत्या और अपराध को अपना व्यवसाय बना लिया है। भारत की न्यायपालिका को ऐसी खुली हुई दुकाने कभी विचलित नहीं करती। उसकी प्राथमिकता क्या है? न्यायपालिका तो लिचिंग रोकना अथवा बलात्कार को रोकना सबसे अधिक प्राथमिक कार्य समझती है। पेशेवर अपराधी भले ही दंडित न हो किन्तु किसी अल्पवयस्क कन्या के साथ किए गए बलात्कार के लिए न्यायालय बहुत सक्रिय हो जाता है और 40 दिन में फाॅसी का आदेश देकर अपनी पीठ थपथपाता है। मैं स्पष्ट हूॅ कि न्यायपालिका को अपनी प्राथमिताएं समझनी चाहिये। अपराधियों की खुली दुकाने सम्पूर्ण भारत के लिए बहुत बडा कलंक है। जिन पर आजतक कोई नियंत्रण नहीं होता है।

लोकतंत्र में कोई एक इकाई व्यवस्था की ठेकेदार नहीं होती। 20-30 वर्ष पूर्व विधायिका अपने को ठेकेदार समझने लगी थी और पिछले कुछ वर्षाे से न्यायपालिका समझने लगी है, दोनो ही गलत है। न्यायपालिका को अपना काम छोड कर जनहित याचिकाएं निपटारा करने में मजा आने लगा है। परिणाम हुआ कि पुलिस को भी न्यायालय से हटकर सीधा न्याय देने में मजा आना शुरू हो गया है। यह टकराव पूरी तरह घातक है लेकिन इस टकराव में न्यायपालिका की भूमिका बहुत अधिक गलत दिखती है। अपराधी पुलिस के सामने सरेंडर करने की अपेक्षा न्यायालय के पास जाना अधिक सुरक्षित समझने लगे है। अपराधियों में पुलिस का भय घट रहा है और न्यायपालिका पर विश्वास बढ रहा है। यह अच्छी स्थिति नहीं है। न्यायपालिका को अच्छी तरह समझना चाहिये कि अपराध नियंत्रण में उसकी भी भूमिका एक सहयोगी की है। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति पुलिस के बीच पूरी तरह तटस्थ भूमिका में नहीं रह सकती। यह सिद्धान्त भी गलत है कि जब तक कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा अपराधी सिद्ध न हो जाये तब तक वह निर्दोष है। होना तो यह चाहिए कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध कर देती है तो वह व्यक्ति निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी है। उसे निर्दोष नहीं माना जाना चाहिये। यदि कोई असम्बद्ध व्यक्ति कोई शिकायत करता है तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उस शिकायत को सूचना समझकर कार्यवाही करे शिकायत समझ कर नहीं। वर्तमान समय में ऐसी सूचनाओं को शिकायत मान लेने के कारण अनेक ऐसे परजीवी व्यक्ति या संगठन खडे हो गये है जिनका ऐसी शिकायत करना एक व्यवसाय बन गया है और वे दिन रात न्यायालय के इर्द-गिर्द रहकर ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है।

पुलिस की अतिसक्रियता एक अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु पुलिस को ऐसी भौतिक या नैतिक छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपना काम छोडकर जनहित का काम करने लग जाए। इस समस्या का सिर्फ एक ही समाधान है कि न्यायालय स्वयं को न्याय तक सीमित कर ले तथा सुरक्षा और न्याय के बीच खीचतान को समाप्त करके दोनों में समन्वय करे। यदि कानून और न्याय मिलकर एकाकर हो जाऐगे पुलिस की सक्रियता अपने आप बंद हो जाऐगी अथवा सब मिलकर उसे अपनी सक्रियता छोडने के लिए मजबूर कर देगे।

मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन”–बजरंग मुनि

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कुछ सिद्धान्त है।
1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है।
2 किसी भी प्रकार की सत्ता हमेशा वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष का प्रयत्न करती है। वर्ग संघर्ष सत्ता के सशक्तिकरण का मुख्य आधार होता है। इसे ही बांटो और राज करो कहा जाता है।
3 साम्यवाद खुलकर वर्ग संघर्ष का प्रयत्न करता है, समाजवाद अप्रत्यक्ष रूप से तथा पूंजीवाद आंशिक रूप से।
4 लोकतंत्र मे संगठन वर्ग संघर्ष का आधार होता है और वर्ग संघर्ष विभाजन की स्थितियां पैदा करता है।
5 मुसलमान चाहे जिस देश मे रहे वह संगठन भी बनायेगा ही और वर्ग विद्वेष बढाकर विभाजन भी करायेगा ही । विभाजन उसका लक्ष्य होता है मजबूरी नही।
6 हिन्दू कभी संगठन नही बनाता और यदि अन्य लोग संगठित हो तब भी वर्ग समन्वय का प्रयत्न करता है।
स्वतंत्रता के बहुत पूर्व धर्म के आधार पर राजनैतिक संगठन की शुरूआत मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने की । किसने किसकी प्रतिक्रिया मे की यह अलग विषय है किन्तु लगभग साथ साथ दोनो बातें उठी । एक तीसरी शक्ति के रूप मे संघ आया और चौथी शक्ति के रूप मे गांधी। हिन्दू महासभा की यह मान्यता थी कि भारत हिन्दू राष्ट होना चाहिये। मुसलमान इसके विरोधी थे और मुस्लिम राष्ट्र का सपना देख रहे थे। उनका मानना था कि भारत की सत्ता मुस्लिम राजाओ से अंग्रेजो ने छीनी है इसलिये मुसलमानो का उस पर पहला अधिकार है। हिन्दू महासभा का मानना था कि हिन्दुओ से मुसलमानो और मुसलमानो से अंग्रेजो ने सत्ता छीनी इसलिये भारत की सत्ता पर मूल रूप से हिन्दुओ का अधिकार है। संघ ने बीच का मार्ग अपनाया और माना कि अंग्रेजो की तुलना मे मुसलमान अधिक घातक है इसलिये सारा विरोध मुसलमानो के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिये। गांधी का मानना था कि हम पहले अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त हो जाये और शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो जिसमे हिन्दू मुसलमान का वर्गीकरण न करके या तो प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार हो या यदि मजबूरी हो तो वर्ग समन्वय हो वर्ग संघर्ष नही। इस चार समूहो मे से किसी भी समूह ने किसी के साथ कोई समझौता नही किया और चारो अलग अलग तरीके से सक्रिय रहे । आर्य समाज कभी संगठन नही रहा बल्कि संस्था के रूप मे रहा। यही कारण था कि आर्य समाज ने मुसलमानो को छोडकर शेष तीनो से मिलकर स्वतंत्रता संघर्ष का साथ दिया तथा स्वतंत्रता के बाद भी आर्य समाज ने अपने को सत्ता संघर्ष से अलग कर लिया। स्वतंत्रता संघर्ष मे संघ लगभग निर्लिप्त रहा इसलिये उसने अपने को सांस्कृतिक संगठन घोषित कर लिया । लेकिन सतर्कता पूर्वक संलिप्तता संता के मामले मे इस तरह रही कि मुसलमान किसी भी रूप मे कमजोर रहे । गांधी के लिये स्वतंत्रता पहला लक्ष्य था तो हिन्दू महासभा के लिये हिन्दू राष्ट और संघ के लिये मुस्लिम सत्ता मुक्त भारत। इसी बीच अम्बेडकर के रूप मे एक पांचवे समूह का उदय होता है और उसने आदिवासी हरिजन को एक वर्ग बनाकर अलग सत्ता की मांग शुरू कर दी। विभाजन रोकने के लिये गांधी अम्बेडकर की उस मांग से ऐसा समझौता करने को मजबूर हुए जो आजतक भारत की अखंडता की कीमत चुका रहा है। गांधी चाहते थे कि जिन्ना और पटेल के बीच भी कोई समझौता हो जाये किन्तु दोनो अपनी अपनी जिद पर अडे थे। जिन्ना विभाजन के अतिरिक्त कुछ मानने को तैयार नही थे तो पटेल मुसलमानो को अलग वर्ग के रूप मे भी नही मानना चाहते थे । पटेल किसी भी रूप मे मुसलमानो को किसी तरह का विशेष महत्व नही देना चाहते थे भले ही विभाजन क्यो न हो जाये । गांधी को छोडकर राजनैतिक स्वरूप के जितने भी लोग स्वतंत्रता संघर्ष मे शामिल थे उनमे से कोई भी ऐसा नही निकला जिसने विभाजन का विरोध करने मे गांधी का खुंलकर साथ दिया हो। विभाजन मे अंग्रेजो की भी रूचि थी । हिन्दू मुस्लिम आदिवासी संघर्ष समाप्त न हो इसलिये वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पीठ थपथपाते थे। अंत मे सत्ता लोलुप नेहरू पटेल अम्बेडकर तथा अन्य सबने मिलकर विभाजन स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि विभाजन की नींव वर्ग निर्माण से शुरू हुई थी और यह वर्ग निर्माण भारत मे मुसलमानो के द्वारा प्रारंभ किया गया। इसलिये विभाजन का सबसे बडा दोषी तो जिन्ना को ही माना जाना चाहिये। इसी तरह विभाजन का एक मात्र विरोधी सिर्फ गांधी को माना जाना चाहिये क्योकि वे किसी भी रूप मे विभाजन के विरोधी थे। यदि बीच के पटेल नेहरू और अम्बेडकर की बात करे तो इन सबकी विभाजन के प्रति पूरी सक्रियता रही। कांग्रेस पार्टी मे सरदार पटेल का बहुमत था और नेहरू को पता था कि गांधी जी नेहरू को ही प्रधान मंत्री स्वीकार करेंगे । अम्बेडकर आगे स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सत्ता के सपने देख रहे थे और तीनो ने मिलकर अन्य सबकी सहमति ले ली जिसके कारण गांधी भी विभाजन के लिये मजबूर हो गये।
राजनैतिक सत्ता बहुत चालाक होती है । वह षणयंत्र स्वयं करती है और दोषारोपण दूसरे पर करती है। वह अपने चाटुकारो को प्रचार माध्यमो मे लगाकर वे गुनाह को गुनाहगार प्रमाणित कर देती है। संघ स्वतंत्रता के पूर्व भले ही निर्लिप्त रहा हो किन्तु राजनैतिक सत्ता से उसकी दूरी कभी रही नही । स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान अलग हुआ और भारतीय सत्ता पर संघ की पकड मजबूत हो इसके लिये विभाजन का दोषी गांधी को सिद्ध करना आवश्यक था। संघ ने जान बूझकर गांधी को टारगेट किया क्योकि गांधी की छवि उसके संगठित वर्ग निर्माण मे बहुत बडी बाधा थी। गांधी सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू थे जबकि संघ संगठित हिन्दुत्व का पक्षधर रहा। कोई भी वर्ग कभी नही चाहता कि वर्ग समन्वय की बात मजबूत हो। जबतक वह कमजोर होता है तो न्याय की बात करता है और मजबूत होता है तब व्यवस्था की बात करता है। इसलिये संघ ने गांधी के जीवित रहते से लेकर आज तक बेगुनाह गांधी को विभाजन का दोषी प्रमाणित करने मे अपनी सारी ताकत लगा दी और विभाजन के प्रमुख दोषी सरदार पटेल को साफ बचा लिया। कांग्रेस पार्टी सत्ता लोलुप थी। नेहरू स्वयं गांधी की छवि का लाभ उठाना चाहते थे किन्तु गांधी की विचार धारा से उनका जीवन भर विरोध रहा । इसलिये कांग्रेस पार्टी ने संघ के इस गांधी विरोधी प्रचार से अपने को किनारे कर लिया। गांधीवादी धीरे धीरे साम्यवादियो के चंगुल मे फंस गये इसलिये वे संघ का विरोध करते रहे किन्तु गांधी विचारो का समर्थन नही कर सके। विभाजन मे गांधी की भूमिका विरोधी की थी यह बात स्पष्ट करने वाला कोई नही बचा था इसलिये विभाजन का सारा दोष निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया गया।
यदि आज भी भारत पाकिस्तान बंगलादेश को एक राष्ट्र के रूप मे मान लिया जाये और सबको समान मतदान का अधिकार दे दिया जाये तो सबसे ज्यादा विरोध संघ की ओर से आयेगा। भारत के मुसलमान इससे पूरी तरह सहमत हो जायेगे। आज अखंड भारत का लगातार राग अलाप रहे संघ के लोग अब एक भारत कभी नही चाहेंगे क्योकि वर्तमान मे सोलह प्रतिशत की मुस्लिम आबादी यदि इतनी बडी समस्या के रूप मे बनी हुई है और पाकिस्तान बंगलादेश मिल जाने के बाद यह आबादी पचीस प्रतिशत होगी तब शक्ति संतुलन और बिगड सकता है। इसलिये अखंड भारत का नारा संघ परिवार का नाटक मात्र है और कुछ नही।
मै इस मत का हॅू कि अब विभाजन का दोषी कौन इसकी खोज बंद कर देनी चाहिये और यह खोज तभी बंद हो सकती है जब इसके वास्तविक दोषी को सामने खडा कर दिया जाये जिससे विभाजन विरोधी गांधी पर आक्रमण अपने आप बंद जो जाये और यह चर्चा पूरी तरह समाप्त हो जाये। मै स्पष्ट हॅू कि यदि वर्ग निर्माण और संगठनो की मान्यता को अब भी नही रोका गया तो नये विभाजनो का खतरा बना रहेगा । भविष्य मे विभाजन न हो इसका सिर्फ एक ही समाधान है और वह है समान नागरिक संहिता । सबको मिलकर इस दिशा मे काम करना चाहिये।

मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 3, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त है।
1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।
2 समाज को एक बृहद परिवार कहा जा सकता है। जिस तरह की संरचना परिवार की होती है वैसी ही समाज की भी होती है।
3 स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है तो सहजीवन और परिवार भावना विकसित करना उसका कर्तब्य ।
4 समाज मे कुछ परिवार अक्षम और कुछ सक्षम होते है। सक्षम परिवारो का कर्तव्य है कि वे अक्षम लोगो की सहायता करे।
5 वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य को छोडकर शेष तीन वर्ण के लोग आर्थिक दृष्टि से अक्षम माने जाते है। दान चंदा और भीख इन तीन वर्णो की व्यवस्था के आधार होते है।
6 कर्तव्य और अधिकार एक दूसरे के पूरक होते है। किसी के सामाजिक अधिकार तब तक पूरे नही हो सकते जब तक अन्य लोग कर्तव्य न करे।
7 वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख का निरंतर दुरूपयोग हो रहा है। इसलिये इसपर नये तरीके से सोचने की आवश्यकता है। इन तीन मे भी चंदा अधिक बडा व्यवसाय बनता जा रहा है।

दान चंदा और भीख अलग अलग अर्थ और प्रभाव रखते है । दान स्वेच्छा से और अपनी क्षमतानुसार दिया जाता है। दान पर दान लेने वाले का पूरा अधिकार होता है । देने के बाद देने वाले का कोई अधिकार या हस्तक्षेप नही होता। यहां तक कि देने वाला उसका कोई हिसाब भी नही पूछ सकता। दान बिना मांगे दिया जाता है और देने के बाद किसी भी परिस्थिति मे वापस नही लिया जा सकता। किसी भी प्रकार का दान देने वाला कर्तव्य भावना से देता है। चंदा और दान मे बहुत फर्क होता है। चंदा दिया और लिया नही जाता बल्कि इकठठा किया जाता है। चंदे पर देने वाले का पूरा अधिकार होता है । वह कभी भी हिसाब मांग सकता है और विशेष परिस्थिति मे वापस भी ले सकता है। चंदा एक आपसी समझौता है जिसे हम सहभागिता भी कह सकते है। भीख एक भिन्न प्रकार की प्रक्रिया है । भीख मांगने पर दी जाती है। आवश्यकता का आकलन करके दी जा सकती हैं तथा भीख पर देने वाले का कोई अधिकार नही होता। भीख आमतौर पर दया की भावना से दी जाती है। भीख भी दान की तरह स्वेच्छा से दी जाती है जिसका न कभी हिसाब लिया जा सकता है न ही वापस मांगा जा सकता हैं।
यदि हम भारत की पुरानी व्यवस्था का आकलन करे तो दान चंदा और भीख एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था के रूप मे माना जा सकता है। प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता है कि वह परिस्थिति अनुसार तीनो मे सहयोग करे। सरकार द्वारा लिया जाने वाला टैक्स भी चंदा की ही श्रेणी मे आता है। यदि हम भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की समीक्षा करें तो दान चंदा और भीख का पूरी तरह दुरूपयोग हो रहा है। अधिकांश लोगो ने तीनो को अपना व्यवसाय बना लिया है। वास्तविक भिखारी तो अब शायद ही दिखते है । पेशेवर भिखारी ही मिलते है यहां तक कि शारीरिक दृष्टि से पूरी तरह अक्षम और कुछ सक्षम लोग भी इसे व्यवसाय समझ लिये है। मैने तो सुना है कि कुछ गरीब लोगो को भीख मांगने के लिये जान बूझकर अपाहिज बनाया जाता है और उससे यह व्यापार कराया जाता है। चंदा मांगना तो एक धंधा बन ही गया है। चंदे के नाम पर अधिकांश धूर्त अपनी दुकानदारी चला रहे है। मैने अपने 60 वर्षो के कार्यकाल मे अपने रामानुजगंज शहर मे जब भी चंदा करने वालो के कार्य का आकलन किया तो एक दो सामाजिक संस्थाओ को छोडकर बाकी सब जगह आर्थिक घपला मिला चाहे वह यज्ञ के नाम पर होता हो या मंदिर या पूजा के नाम पर । यहां तक कि राष्टीय सुरक्षा के नाम पर भी किये गये धन संग्रह मे कई प्रकार की गडबडी प्रमाणित हो गई । अच्छी अच्छी नामी संस्थाओ के नाम पर भी होने वाले धन संग्रह मे भ्रष्टाचार प्रमाणित हुआ। सरकारें जो टैक्स के रूप मे चंदा लेती है उनमे भ्रष्टाचार तो जग जाहिर है। इसी तरह दान के नाम पर भी दुर्गति देखी जा रही है। बडे बडे मठाधीश आम लोगो को दान के लिये प्रेरित करते है और उस प्राप्त दान का दुरूपयोग करते है। धर्म के नाम पर या समाज सेवा के नाम पर दान मांगना फैशन बन गया है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वर्तमान समय मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दान मांगने वालो की समाज मे भीड लगी हुई है।
किसी महापुरूष ने कहा था कि जो मागने जाता है वह तो एक प्रकार से मर ही जाता है किन्तु जो मांगने पर भी नही देता उसकी मृत्यु मांगने वाले से भी पहले हो जाती है । आदर्श स्थिति मे इस कहावत का बहुत महत्व है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों मे यह कहावत बहुत अधिक हानिकारक है। हर धूर्त इस कहावत का पूरा पूरा दुरूपयोग करता है । इसलिये किसी अन्य महापुरूष को यह सलाह देनी पडी कि कुपात्र को दिया गया दान दाता को भी नर्क मे ले जाता है। इसका अर्थ हुआ कि दान बहुत ही सोच समझकर दिया जाना चाहिये क्योकि यदि दान का दुरूपयोग हुआ तो उसके पाप मे दान दाता भी हिस्सेदार माना जायेगा। इसी तरह चंदा भी बहुत सोच समझकर ही देना चाहिये। और दिये जाने के बाद उसपर अपनी नजर अवश्य रखनी चाहिये। क्योकि बिना सोचे समझे चंदा देना भी एक प्रकार से असामाजिक तत्वो का प्रोत्साहन माना जायेगा। भीख के मामले मे हम उस समय दया कर सकते है जब कोई अक्षम और अपंग हो और उसके पास अपने भरण पोषण का कोई अन्य मार्ग उपलब्ध न हो । वर्तमान समय मे सरकार सबको भरण पोषण के पर्याप्त साधन उपलब्ध करा रही है। मै नही समझता कि ऐसी परिस्थिति मे भीख मांगने का भी कोई औचित्य बचा है। दान चंदा या भीख न देना उतना हानिकर नही है जितना गलत व्यक्ति को देना। सरकार के टैक्स के मामले मे भी सतर्क रहने की आवश्यकता है । सरकारे मनमाना टैक्स लगाकर उसका भरपूर दुरूपयोग कर रही है। कोई ऐसी व्यवस्था सोची जानी चाहिये जिसमे सरकारी टैक्स पर भी कुछ अंकुश लग सके।
आजकल तो मतदान को भी दान कहकर प्रचारित किया जा रहा है। सिद्धान्त रूप से दान मांगा नही जाता किन्तु वोट के भिखारी दिन रात वोट मांगते भी है और उसे दान भी कहते है। वोट न तो दान है न ही भीख है । उसे आप चंदे की श्रेणी मे रख सकते है। मतदान का भी पूरा पूरा दुरूपयोग हो रहा है । इसे भी एक व्यवसाय बना दिया गया है। मेरा सुझाव है कि दान बहुत सोच समझकर दिया जाना चाहिये। दान और भीख की तुलना मे चंदा लेना देना अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। चंदे का धंधा दान की प्रवृत्ति को भी निरूत्साहित कर रहा है। चंदा मांगना एक बुरी आदत है किन्तु बहुत बडे बडे लोग भी चंदा मांगकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते है। कहते है मालवीय जी ने चंदे के माध्यम से बनारस हिन्दू विश्व विधालय खडा कर दिया। यह बात सच होते हुए भी मै किसी भी प्रकार के चंदा लेने और देने के विरूद्ध हॅू क्योकि चंदा का कोई न तो हिसाब किताब रखा जाता है न ही किसी को दिखाया जाता है। यदि किसी कार्य के लिये धन संग्रह आवश्यक है और उसमे कोई घपला नही करना है तो उसे अधिकतम पारदर्शी होना चाहिये। साथ ही ऐसा धन संग्रह सिर्फ सहमत और सम्बंद्ध लोगो के बीच ही हो सकता है। दूसरे लोगो से नही मांगा जा सकता। वर्तमान समय मे दान चंदा और भीख के नाम पर जो खरपतवार खेतो मे पैदा हो गये है इन सबको नष्ट करने के लिये एक बार पूरे खेत की जुताई कर दी जाये और कोई बहुत आवश्यक पौधा हो तो उसे ही सुरक्षित रखा जाये । याद रखिये कि दान चंदा या भीख का दुरूपयोग आपके लिये भी घातक है और समाज के लिये भी ।

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