Lets change India
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...
मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्र...
मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रका...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि
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मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’–बजरंग मुनि
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1. परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाएॅ ही महत्व...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”–बजरंग मुनि
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्या...

मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि

Posted By: admin on October 31, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ निष्कर्ष हैः-
1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं।
2. समाज में चार प्रकार के लोग होते है- मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक। मार्गदर्शक और पालक को प्रवृत्ति में दयालु होना चाहिए जबकि रक्षक और सेवक को दयालु प्रवृत्ति प्रधान नहीं होना चाहिए।
3. न्यायाधीश को प्राप्त शक्ति तंत्र की अमानत होती है। न्यायाधीश को किसी भी मामले में किसी के साथ दया करने का अधिकार नहीं है।
4. मनुष्य को छोडकर किसी अन्य जीव को मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। पशु-पक्षी या पेड-पौधे का कोई मौलिक अधिकार नहीं होता।
5. समाज किसी भी पशु जीव पेड-पौधे को अवध्य घोषित कर सकता है किन्तु कोई वर्ग नहीं कर सकता। किसी वर्ग द्वारा घोषित किसी पशु पक्षी को सम्मान देना अन्य वर्ग की मजबूरी नहीं है।
6. जो लोग गाय को माता न समझ कर पशु समझते है उनकी स्वतंत्रता में तब तक बाधा नहीं पहुॅचाई जा सकती जब तक सम्पूर्ण समाज ने मान्य न किया हो।
7. सब प्रकार के जीवों के बीच संतुलन होना चाहिए। जीव दया का सिद्धांत असंतुलन पैदा करता है। दया या हिंसा करना व्यक्ति की स्वतंत्रता है, बाध्यता नहीं।
8. बंदर, कुत्ते और नील गायों की बढती संख्या अव्यवस्था फैलाती है। बंदर हनुमान का भी प्रतीक हो सकता है और बालि का भी।
9. भारत के वर्तमान कानूनों में दया का भाव अधिक होने के कारण अपराध भी बढ रहे है तथा आवारा पशुओं की संख्या भी अव्यवस्था फैला रही है।
मेरा अपना अनुभव है कि जीव दया का सिद्धांत अधिक प्रभावी होने से अव्यवस्था फैलती है जैसा भारत में हो रहा है। सरकारों ने अनेक अनावश्यक कानून बना दिये है। पशुओं को किस प्रकार का कष्ट दिया जाये इसके भी नियम बनाये गये है। कोई व्यक्ति अमानवीय तरीके से अपने पशु को नहीं पीट सकता न हीं अमानवीय तरीके से काट सकता है। मुर्गे को काटा जा सकता है रेत-रेत कर जब्हा किया जा सकता है किन्तु ठूस-ठूस कर गाडी में नही भरा जा सकता क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता। जब मनुष्य को छोडकर किसी भी अन्य जीव को मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है तब सरकार ऐसे मामले में कानून कैसे बना सकती है। फिर भी सरकारे कानूनों का दखल बढा रही हैं। राज्य अनेक मामलों में दया करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है जबकि राज्य की शक्ति समाज की अमानत है और समाज के निर्णय के बाद ही राज्य किसी के साथ दया कर सकता है, किन्तु वह करता है। यदि राज्य दया करने लग जायेगा तो समाज में अपराध और अव्यवस्था बढेगी ही वर्तमान समय में राज्य निरंतर ऐसा ही कर रहा है।
मैं हिमाचल के एक गांव में गया था। मैंने देखा कि वहाॅ के आम लोग बंदरों से बहुत परेषान थे लेकिन वे धार्मिक भावना से बंदर को मार नहीं सकते थे और कानून भी उन्हें रोकता था। मैंने उन्हें सलाह दी कि आपको जो बंदर हनुमान सरीखा दिखे उसकी रक्षा किजिए और बालि सरीखा दिखे तो मार देना चाहिए क्योंकि भगवान राम ने भी ऐसे बंदर का वध किया था। बिहार और उत्तर प्रदेश में बडी संख्या में किसान नील गायों से परेशान है। मुख्यमंत्री नितिश कुमार ने इस समस्या को समझकर समाधान करना चाहा तो निकम्मे धर्म-प्रेमियों ने रोडा डालने का प्रयास किया। हमारे छत्तीसगढ के सरगुजा संभाग में हाथियों का उत्पात मचा हुआ है। जंगली हाथी प्रति वर्ष बडी मात्रा में फसलों को नुकसान करते है, ग्रामीणों के घर तोड देते है और सैकडों की संख्या में निरपराध लोगों की हत्या कर देते है। यदि ग्रामीण किसी आक्रामक हाथी की हत्या कर दे तो वह जेल में बंद कर दिया जायेगा किन्तु यदि हाथी किसी ग्रामीण की हत्या कर दे तो उसे सिर्फ दो लाख रूपये मुआवजा दिया जायेगा। दूसरी ओर ग्रामीण अगर किसी ट्रेन एक्सीडेंट में या दुर्घटना में मर जाये तो मुआवजा दो लाख से कई गुना अधिक मिल सकता है किन्तु हाथी के मारने पर दो लाख की भीख सरकार द्वारा दी जाती है। बडी संख्या में आवारा कुत्ते निर्दोष लोगों को काटते है और उसके लिये भारी संकट झेलना पडता है। मैं जब नगरपालिका का अध्यक्ष था तब मैंने आवारा कुत्तों को मरवाने का अभियान चलाया। अनेक तथाकथित दयालु लोग सामने आये कि कुत्तों को इस तरीके से निर्दयतापूर्वक मारना ठीक नहीं है। इन नासमझों ने कभी यह नहीं सोचा कि इन कुत्तों के काटे हुये लोग कितनी परेशानी झेल रहे है। जीव दया के नाम पर जिस प्रकार असंतुलन बढाया जा रहा है वह भारत के कृषि उत्पादन पर भी बहुत विपरीत प्रभाव डाल रहा है।
मैं देख रहा हॅू कि गौ हत्या के नाम पर नर हत्या का भी समर्थन किया जा रहा है। गाय आपकी माता है, आवश्यक नहीं कि वह मेरी भी माता हो। गाय कोई धार्मिक प्रतीक नहीं है क्योंकि हिन्दू अपने को साम्प्रदायिक न मानकर समाज के रूप में मानता है अर्थात हिन्दुत्व जीवन पद्धति है सिर्फ पूजा पद्धति तक सीमित नहीं है। ऐसी स्थिति में गौ रक्षा का निर्णय समाज जब तक नहीं करता तब तक आप किसी को यह मजबूर नहीं कर सकते है कि वह गाय को माता माने। जीव दया के सिद्धांत में सबसे ज्यादा अव्यवस्था जैन लोगों ने की है। भगवान महावीर ने अपना वैचारिक और नैतिक प्रभाव डालकर दया और अहिंसा पाठ पढाया, कानून का सहारा कभी नहीं लिया। निकम्में दयावान लोग कानून के द्वारा दया भाव का विस्तार करना चाहते है जो एक गलत मार्ग है।
अहिंसा और दया के एक पक्षीय प्रचार ने भारत का बहुत नुकसान किया। शत्रु के साथ कैसी दया कैसी अहिंसा? अहिंसा और दया भाव ज्ञान प्रधान तथा व्यवसायी प्रवृत्ति के लोगों तक सीमित रहना चाहिये। यदि राज्य भी अहिंसा और दया करने लगेगा तो गुलामी स्वाभाविक है। आज सारी दुनियां में यदि कट्टरवादी इस्लाम समस्या के रूप में खडा हो रहा है तो उसका मुख्य कारण यही अहिंसा और दया का भाव है। स्पष्ट नीति बननी चाहिेये कि राज्य का काम अहिंसा या दया करना नहीं है क्योंकि राज्य को दी गई शक्ति समाज की अमानत है और राज्य का दायित्व सुरक्षा और न्याय। उसके लिए आवश्यक है कि हिंसा और दया के बीच संतुलन हो। यदि असंतुलन होता है तो राज्य को ऐसा संतुलन बनाने के लिए समुचित हिंसा का उपयोग करना चाहिए।
जो विचारक या व्यवसायी हैं उन्हें दया और अहिंसा को अपनाना चाहिये किन्तु कभी राज्य पर दबाव नहीं बनाना चाहिये कि वह अहिंसा और दया को नीतियों का आधार बनाये। मेरे विचार से वर्तमान भारत में दयाभाव का विस्तार एक समस्या के रूप में विस्तार पा रहा है। इसे समाधान के रूप में आना चाहिए।

मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि

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कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-
1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तरह बनी हुयी है।
2. संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन महापुरूष के विचारों को दीर्घकालिक बनाता है, रूढ बनाता है और किसी संशोधन के विरूद्ध उसी तरह टकराता है जिस तरह उक्त महापुरूष को टकराना पडा था।
3. संगठन मृत महापुरूषों के विचार समाज तक पहुॅचाने का सबसे सफल और घातक माध्यम होता है इसलिए मृत महापुरूषों के विचार बिना विचारे कभी अक्षरशः स्वीकार नहीं करना चाहिए।
4. जब वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित होती है तब महाजनों येन गतः स पन्थाः का आंख मूंदकर अनुकरण करना चाहिए और जब जन्म पर आधारित हो तब बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहिए।
5. गांधी समस्याओं के समाधान कर्ता थे और विनोबा संत। गांधी समझदार थे और विनोबा शरीफ। गांधी ने स्वतंत्रता दिलाई और विनोबा ने राजनेताओं की गुलामी।
6. गांधी और लोहिया में बहुत फर्क था राजनैतिक मामलों में लोहिया गांधी के समान सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के पक्षधर थे और आर्थिक मामलों में सत्ता के केन्द्रीयकरण केे जबकि गांधी दोनों मामलों में अकेन्द्रीयकरण चाहते थे।
7. जयप्रकाश, विनोबा और लोहिया में बहुत फर्क था। विनोबा सत्ता से बाहर रह कर आचार्य कुल के माध्यम से राजनीति पर अंकुश रखने तक सीमित रहना चाहते थे तो जयप्रकाश सत्ता के साथ तालमेल करके उसका शुद्धिकरण चाहते थे और लोहिया उसमें घुसकर।
8. नाथुराम गोडसे और नेहरू में बहुत फर्क था। एक ने गांधी की शरीर की हत्या कर दी तो दूसरे ने विचारों की।
9. गोडसे का मार्ग गलत था और नेहरू की नीयत। गोडसे यदि गलत विचारों से प्रभावित न होता गांधी के साथ जुडा होता तो नेहरू की तुलना में अच्छा प्रधानमंत्री बन सकता था।
10. गोडसे का कार्य समाज के लिये घातक और अक्षम्य अपराध था साथ ही हिन्दू धर्म के लिए कलंक भी था।
जब भी समाज में कोई विचारक गंभीर विचार मंथन के बाद कुछ निष्कर्ष निकालता है तो वह निष्कर्ष समाज की प्रचलित मान्यताओं से कुछ भिन्न होता है। यदि उक्त निष्कर्ष समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान में निर्णायक परिणाम देता है तो उक्त विचारक महापुरूष बन जाता है। उक्त महापूरूष के निष्कर्षो को सामान्य लोग बिना विचार किये ही स्वीकार करने लग जाते है। विचारक से महापुरूष बनने तक के बीच के कालखंड में विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिये एक संगठन की आवश्यकता होती है। ऐसा संगठन उक्त विचारक के जीवन काल में भी बन सकता है और जीवन पश्चात भी। संगठन विचारों को समाज तक पहुॅचाने की व्यवस्था करता है और जब उक्त विचार सफल प्रमाणित हो जाता है तब उक्त विचार को धीरे-धीरे रूढ बनाकर उन पर संगठन कुन्डली मारकर बैठ जाता है। इस तरह संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन के माध्यम से विचार सुरक्षित, अदृष्य, दीर्घकालिक और अनुपयोगी हो जाते है। संगठन विचारों को पुनर्विचार से दूर कर देते है। तात्कालिक समस्याओं के समाधान के लिये जब कोई नया विचार सामने आता है तो उक्त संगठन के महापुरूष को आक्रमण झेलने पडते है। प्रत्येक संगठन अपने महापुरूष के साथ किये गये दुर्ष्यवहार को अत्याचार घोषित करता है जबकि वह स्वयं भी आगे वाले विचारकों के साथ बिल्कुल वैसा ही अत्याचार करना शुरू कर देता है।
महात्मा गांधी ने गुलाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। उन्होंने इस संग्राम के लिये सत्य और अंहिंसा को मुख्य मार्ग घोषित किया। विदेशी वस्तु बहिष्कार उनका सहायक मार्ग था। धार्मिक, सामाजिक, जातीय एकता उक्त संग्राम के उपमार्ग थे, चर्खा, खादी और गांधी टोपी उक्त संग्राम की पहचान स्वरूप थे. लक्ष्य सिर्फ एक था, बिल्कुल स्पष्ट और सर्वमान्य था राष्ट्रीय स्वराज्य। स्वराज्य के लिये उन्होने मार्ग, सहायक मार्ग, उपमार्ग, सहायक उपमार्ग आदि तय किये और तदनुसार ही वे इन मार्गों की उपयोगिता भी मानते थें। गांधी जी ने सत्य और अंहिसा से कभी समझौता नहीं किया क्योंकि यह उनका मुख्य मार्ग था। चर्खा, खादी, गांधी टोपी से वे समझौते के लिये तैयार थे। यदि कोई व्यक्ति भिन्न वस्त्र टोपी या भिन्न संगठन वाला भी हो तो वे उसका बहिष्कार नहीं करते थें। गांधी के आन्दोलन में सब प्रकार के लोग शामिल थे चाहे वे गांधी जी के बताये कुछ उप मार्गो से असहमत ही क्यो न हों। गांधी जी ने अपने जीवन में किसी को अछूत नहीं माना क्योंकि उनके विचारों में अछूत कार्य होता है कर्ता नहीं। उन्होंने नारा दिया पाप से घृणा करो पापी से नहीं। गांधी जी ऐसे ऐसे बीमारों की भी सेवा करते थे जिनकी बीमारी गांधी जी को नुकसान कर सकती थी किन्तु उन्होंने ठीक करने का भरसक प्रयास किया।
गांधीजी के बाद उनके विचारों ने गांधीवाद का स्वरूप ग्रहण किया। गांधीवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा थी तत्कालीन समस्याओं का सत्य और अंहिसा के मार्ग से समाधान का प्रयत्न। इसमें तत्कालीन समस्याओं का समाधान लक्ष्य था और सत्य अंहिंसा मार्ग। गांधी के बाद गांधीवाद विचारों से दूर होने लगा और धीरे-धीरे विचारों से हटकर संस्कार बन गया। अब उसकी परिभाषा बदल कर हो गई सत्य औेर अहिंसा के आधार पर ही समस्याओं के समाधान का प्रयत्न। सत्य और अंहिसा लक्ष्य बन गया, समाधान गौण। समस्याओं की पहचान के लिये तात्कालिक परिस्थियों के साथ कोई तालमेल नहीं रहा और धीरे-धीरे गांधी से दूर होता चला गया।
गांधी की मृत्यु के बाद राजनेताओं ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में गांधीवाद के दुरूपयोग की योजना बनाई। गांधी संस्थाओं के पक्षधर थे और नेता संगठन बनाना चाहते थे। उन लोगों ने सीधे-साधे विनोबा को धोखा देकर एक सर्व-सेवा-संघ नाम से गांधीवादियों का संगठन बना दिया। बिचारे विनोबा जीवन भर समाज सुधार का कार्य करते रहे और देशभर के राजनेता सारे हिन्दुस्तान को राजनैतिक आधार पर गुलाम बनाने में सफल हो गये। सर्वोदय के लोग आज भी देशभर में समाज सेवा के उच्चकीर्ति मान बनाते देखे जाते है और सारा मालमलाई 70 वर्षो से देश के नेता खा रहे है लेकिन सर्वोदय के लोगों की या तो आंख बंद है या असहाय है अथवा हो सकता है जूठन से संतुष्ट हो।
इसमें शामिल अधिकांश लोग बहुत त्यागी चरित्रवान पद और धन के प्रलोभन से दूर उच्च संस्कारवान है किन्तु उनमें विचार एवं चिन्तन शक्ति का सर्वथा अभाव है। वे समस्याओं का ठीक-ठीक आॅकलन नहीं कर पातें। वे समस्याओं के समाधान के लिये अहिंसा को शस्त्र के रूप में प्रयोग न करके अपने पलायन की ढाल के रूप में उपयोग करते है। वे विपरित विचार वालों से तर्क नहीं कर सकते। विचार मंथन इनके आचरण में दूर-दूर तक नहीं है।
गांधी विपरीत विचार रखने वाले को अछूत नहीं मानते थें गांधीवादी उन्हें अछूत मानकर घृणा करते है। गांधी जी स्वयं को इतना दृढ मानते थे कि उन पर असत्य के प्रभावी होने का कोई भय नहीं था परिणाम स्वरूप वे सबके बीच अपनी वात रखने का साहस करते थें। गांधीवादी इतने भयभीत है कि वे दुसरों के विचारों से प्रभावित होने के डर से उनसे दूर भागते है। गांधी जी वैचारिक विस्तार के पक्षधर थे। गांधीवादी संगठन की सुरक्षा में ही परेशान रहते है। गांधी जी इस्लाम के खतरे को भली भांति समझते हुए भी एक रणनीति के अन्तर्गत उनसे समझौता करते थे। गांधीवादी इस्लाम के खतरे को न समझते है न समझना चाहते है। गांधी जी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। वे साम्प्रदायिकता को कभी स्वीकार नहीं करते थे। गांधीवादी धर्मरिपेक्षता का एक ही अर्थ समझते है संघ का विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण। गांधी जी साम्यवाद को घातक विचार मानते थे गांधीवादी साम्यवाद को समझते ही नहीं। मुझे तो आश्चर्य होता है कि हिंसा का सैद्धान्तिक रूप से भी और व्यावहारिक रूप से भी समर्थन करने वाले साम्यवादियों और आतंकवादी मुसलमानोें के विरूद्ध गांधीवादियों का न कभी प्रत्यक्ष विरोध दर्ज होता है और न परोक्ष। किन्तु यदि प्रषासन इनके विरूद्ध कोई कठोर कदम उठाता है तो गांधीवाद अवश्य ही विरोध में हल्ला करना शुरू कर देते है। गांधी जी सरकारीकरण के बिल्कुल विरूद्ध थे और समाजीकरण के पक्षधर थे गांधीवादी सरकारीकरण के पक्षधर है और समाजीकरण को समझते ही नहीं। वे तो व्यापारीकरण के स्थान पर सरकारीकरण की वकालत तक करते है। गांधी जी निजीकरण के स्थान पर समाजीकरण चाहते थे। गांधीवादी निजीकरण का विरोध तो करते है परन्तु वे सरकरी कारण को या तो समझते नहीं या उनके संस्कार उनकी समझदारी में बाधक है।
आज देश में ग्यारह समस्याएँ बढ रहीें है। भारत के सभी राजनैतिक दल इन ग्यारह समस्याओं के समाधान की अपेक्षा दस प्रकार के नाटकों में संलग्न है। इन राजनैतिक दलो की नीतियाँ तो गलत है ही नीयत भी गलत है। साम्यवादी भी अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये इन दस नाटकों को प्रोत्साहित करते रहते हैं। संघ परिवार की नीयत अर्ध राजनैतिक है। उसकी नीतियाँ साम्प्रदायिकता से भी प्रभावित है और पूूँजीवाद से भी। परिणाम स्वरूप वे सात समस्याओं के तो समाधान की चिन्ता करते है किन्तु आर्थिक असमानता और श्रम शोषण पर नियंत्रण की वे कभी नहीं सोचतें। मिलावट की रोकथाम के विषय में भी वे चुप ही रहते है। क्योंकि मिलावट और व्यापार का चोली दामन का संबंध बन गया है। सबसे दुखद है कि संघ परिवार साम्प्रदायिकता के विषय में भी स्पष्ट नहीं है। उसके अनेक कार्य तो साम्प्रदायिकता को मजबूत करने मे ही सहायक होते है। गांधीवादियों का वर्ग ही एक ऐसी जमात है जो राजनीति से संबंध नहीं रखती किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि इनकी नीयत ठीक होते हुए भी नीतियाँ देश की सभी ग्यारह समस्याओं के विस्तार में सहायक हो रही है। राजनीतिज्ञ जानबूझकर नाटक करते रहते हे और गांधी वादी अनजाने में उसके पात्र बन जाते हैं। मेरा यह आरोप अत्यन्त ही गंभीर हैं और हो सकता हैं कि यह गलत ही हो किन्तु अब तक मैंने जो समझा वह ऐसा ही है और यदि इस संबंध में कोई बहस छिडती है तो मैं उसका स्वागत ही करूँगा।
मैंने गांधी को बहुत सुना और समझा है। गांधीवाद को भी प्रयोग करके पूरी तरह सफल होता देखा है और गांधीवादियों से भी खूब चर्चा की हैं। गांधीवादी तर्क से बहुत भागते है। वे स्वयं को अन्य लोगों से अधिक श्रेष्ठ और आचरणवान मानकर दुसरों से घृणा करते है। किसी भी मामले मे अपनी बात कहीं नहीं कहते बल्कि जो भी कहते है उसमें गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम जोडे बिना न एक लाईन लिख सकते है, न बोल सकते है और न भाषण दे सकते हेै। उन्होंने गांधी, विनोबा, जयप्रकाश को कभी समझने का प्रयास किया हो तब तो वे उनकी बात को अपने शब्दों में वर्तमान स्थितियों के साथ जोडकर कह पातें। उन्हे तो सभी समस्याओं के समाधान के रूप में गांधी, विनोबा, जयप्रकाश के उस समय की परिस्थितियों में कहे गये शब्दों के आधार पर बने उनके संस्कार ही पर्यात्त दिखते है और यही आज की सबसे बडी समस्या है। अधिकांश गांधीवादी इन बातों को समझते भी है और गुप्त रूप से चर्चा भी करते है किन्तु संस्कारित गांधीवादियों के समक्ष वैचारिक गांधीवादी हमेशा भयभीत रहते है। कितनी चिंता की बात है कि जो गांधी गुजरात से अहिंसा की शिक्षा लेकर सारी दुनियां का मार्गदर्शन करने में सफल हुआ उसी गुजरात से हिंसा का पाठ सीखकर नरेन्द्र मोदी सारी दुनियां में लगातार सफल होते जा रहे है। क्योंकि सर्वोदय के पास मृत गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम मात्र है, अपने विचार नहीं। वे संघ की आलोचना तक सीमित है, विकल्प नहीं बता सकते। चितंन का विषय है कि जो गांधी अंहिसा और सत्य को सर्वोच्च स्थान देते थे वहीं गांधीवादी अब नक्सलवादियों और मुस्लिम उग्रवादियों के पक्ष में खडे दिखते है। जिस गांधी को हिन्दुओं के बहुमत का समर्थन प्राप्त था उन हिन्दुओं को गांधीवादियों ने धक्का देकर संघ परिवार के पक्ष में खडा कर दिया क्योंकि गांधी के पास मौलिक चिंतन था और सर्वोदय के पास मात्र नकल। गांधी के पास समझदारी थी तो सर्वोदय के पास शराफत। सर्वोदय के लोग साम्यवादियों के जाल में फॅसकर इतने अंधे हो गए थे कि उन्हें साम्यवादी गांधी व विनोबा के समान दिखते थे। एक बाद ठाकुरदास बंग, सिदराज ढडडा आदि ने इस संगठनात्मक ढाॅचे को तोडने का प्रयास किया तो कुमार प्रशांत ने आगे आकर साम्यवादियों के पक्ष में इस सुधार का भरपूर विरोध किया और सफलता पायी।
मैं महसूस करता हूँ कि स्वतंत्रता के बाद जिन ग्यारह समस्याओं का विस्तार हुआ है उसका समाधान सिर्फ गांधीवाद के पास है। न तो इसका समाधान पूंजीवाद के पास है न ही साम्यवाद के पास। ये दोनों ही या तो समस्याओं को बढा सकते है या उससे लाभ उठा सकते हैं। गांधीवाद ही इनके समाधान का मार्ग निकाल सकता है और आज की समस्याओं के समाधान के निमित्त गांधीवाद को कोई गांधी ही परिभाषित कर सकता है गांधीवादी नहीं। क्योंकि गांधी दाण्डी यात्रा समस्या के समाधान के लिये करते थे और ये गांधी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए नकल करते है। गांधी जी के वस्त्र किसी पूर्व महापुरूष की नकल न होकर भारत के आम निवासियों के दुख दर्द की असल थें। ये लोग नकल करके गांधी चश्मा,उनके कपडे और उनकी दाण्डी यात्रा करके गांधी बनना चाहते हैै। ये गांधी को कभी समझे नहीं तो गांधीवाद को क्या समझेगें। इस लिए आज भारत को एक गांधी की जरूरत है, एक ऐसे गांधी की जो अपना नाम गांधी रखे या कोई और, वह चाहे खादी पहने या कुछ और, वह दाण्डी यात्रा करे या कोई और यात्रा करे यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वह गांधी के सत्य और अहिंसा का डण्डा ओर झण्डा उठाकर ग्यारह समस्याओं के समाधान के लिए निकल पडे और भारत की सभी हिंसक, साम्प्रदायिक, जातीय स्वार्थान्ध, राजनैतिक शक्तियों को एकसाथ चुनौती देकर घोषणा करें कि अब तक हमने बहुत सहा अब सहेगें नही, हम चुप रहेंगे नहीं, झंडा उठा लेगे हम।
मै जानता हूँ कि स्थापित संगठन ऐसे विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकते। यदि किसी गांधी ने आकर गांधीवाद को इस ढंग से परिभाषित किया तो उक्त विचारक गांधी को सबसे पहले टकराव संस्कारित गांधीवादियों का ही झोलना पडेगा और वह टकराव किसी भी सीमा तक जा सकता है। यदि गांधी ने इन संस्कारित गांधीवादियों को समझाकर कोई मार्ग निकाल लिया तब तो उसके जीते जी ग्यारह समस्याओं के समाधान का मार्ग निकल सकता हे अन्यथा उनका भी वही हाल होगा जो इशुमसीह का हुआ गांधी का हुआ और तब उनके बाद उनके नाम से एक नया संगठन नयावाद खडा होगा औंर दुनियां में वादों के साथ एक नया वाद जुडकर वाद-विवाद में सहायक बन जायेगा।

मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on October 29, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः-
1. परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाएॅ ही महत्वपूर्ण होती हैं।
2. परिवार में महिला या पुरूष एक-दूसरे के पूरक होते हैं। परिवार की आंतरिक व्यवस्था में महिलाएॅ तथा बाह्य में पुरूष प्रधान होते हैं किन्तु कुल मिलाकर सब बराबर हैं।
3. सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से कम तथा सम्मान सुरक्षा पुरूषों से अधिक होती है।
4. परंपरागत परिवारों में आयी विकृतियों के कारण महिलाएॅ पारम्परिक व्यवस्था की अपेक्षा आधुनिकता की ओर तेजी से बढ रही हैं।
5. पुरूष प्रधान व्यवस्था विकृति नहीं बल्कि व्यवस्था है किन्तु परिवार का प्रमुख, परिवार प्रमुख तक सीमित रहना चाहिये, मालिक नहीं। वर्तमान पारंपरिक परिवारों में मुखिया मालिक बन गये जो एक मुख्य विकृति है।
6. परंपरागत परिवारों की महिलाओं में घुटन अधिक है टूटन कम। आधुनिक महिलाओं में परिवार के प्रति टूटन अधिक है घुटन कम। दोनों स्थितियां ठीक नहीं।
7. अनुशासन और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं। परंपरागत परिवारों में अनुशासन की जगह नियंत्रण बढा और आधुनिक परिवारों में अनुशासन की जगह उच्श्रृंखलता।
8. परंपरागत महिलाएॅ परिवार के सुचारू संचालन, सन्तानोत्पत्ति तथा बच्चों के नैतिक विकास को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं तो आधुनिक महिलाएॅ स्वतंत्रता, सेक्स तथा बच्चों के भौतिक विकास को अधिक महत्तवपूर्ण मानती हैं।
9. परंपरागत महिलाएॅ सहजीवन को भौतिक विकास की तुलना में अधिक महत्व देती हैं तो आधुनिक महिलाएॅ भौतिक विकास को सहजीवन की तुलना में अधिक महत्व देती हैं।
10. परंपरागत परिवार व्यवस्था में सुधार तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था पर अंकुश आवश्यक है। परंपरागत या आधुनिक परिवार की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था एकमात्र समाधान है।
परिवार समाज व्यवस्था की पहली संगठनात्मक इकाई है। सेक्स की भूख, सन्तानोत्पत्ति, सहजीवन की ट्रेनिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य एक साथ सम्पन्न होने की पहली कार्यशाला है परिवार। परिवार के सभी उद्देश्य ठीक-ठाक पूरे हों इसके लिये महिला और पुरूष का एक साथ एकाकार स्वरूप में रहना आवश्यक है। अब तक भारत की परंपरागत परिवार व्यवस्था को दुनियां में सर्वाधिक सफल माना गया किन्तु धीरे-धीरे उसमें आयी कुछ विकृतियों के कारण अब उसका स्थान पाश्चात्य परिवार व्यवस्था लेती जा रही है। महिलाओं की भूमिका परिवार व्यवस्था के सफल संचालन में बहुत महत्वपूर्ण होती है और वर्तमान समय में महिलाओं में परंपरागत परिवार की अपेक्षा आधुनिक परिवार की ओर तेजी से कदम बढ रहे हैं इसलिये इसके कारण, लक्षण, परिणाम और समाधान की चर्चा आवश्यक है।
परंपरागत और आधुनिक महिलाओं के रहन-सहन, प्राथमिकताएॅ तथा जीवन प्रणाली में कई अन्तर स्पष्ट हैं।
1. परंपरागत महिलाएॅ कर्तव्य प्रधान होती हैं। वे कभी समान अधिकार की भी मांग नहीं करतीं। वे परिवार में होने वाले अपने शोषण के विरूद्ध चुप रहती हैं। आधुनिक महिलाएॅ समान अधिकार से भी संतुष्ट नहीं। उन्हें समान अधिकार भी चाहिये तथा विशेष अधिकार भी चाहिये। परंपरागत महिलाएॅ त्याग प्रधान होती हैं, आधुनिक महिलाएॅ संग्रह प्रधान होती हैं।
2. परंपरागत महिलाएॅ सेक्स की तुलना में सन्तानोत्पत्ति को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाओं में सन्तानोत्पत्ति के प्रति अरूचि और सेक्स के प्रति अधिक आकर्षण होता है।
3. परंपरागत महिलाएॅ सहजीवन को अधिक महत्वपूर्ण मानकर संयुक्त परिवार को अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाएॅ व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देकर परिवारों को छोटे से छोटा करने को महत्वपूर्ण मानती हैं।
4. परंपरागत महिलाएॅ भावना प्रधान अधिक होती हैं बुद्धि प्रधान कम। आधुनिक महिलाएॅ बुद्धि प्रधान अधिक होती हैं, भावना प्रधान कम।
5. परंपरागत महिलाएॅ नैतिकता को भौतिकता की तुलना में अधिक महत्व देती हैं। आधुनिक महिलाएॅ भौतिक उन्नति के लिये नैतिकता से जल्दी समझौता करने को तैयार रहती हैं।
6. परंपरागत महिलाएॅ अन्य पुरूषों से आवश्यकता से अधिक दूरी बना कर रखती हैं। यदि इनके साथ कोई साधारण छेडछाड की आपराधिक घटना हो तो या तो छिपाती हैं या सामाजिक स्तर से निपटाना चाहती हैं। आधुनिक महिलाएॅ अन्य पुरूषों के साथ कम से कम दूरी बनाने की कोशिश करती हैं तथा मामूली छेडछाड की घटना में आसमान सर पर उठा लेती हैं।
7. परंपरागत महिलाएॅ परिवार या रिश्तेदारी तक आकर्षक तथा बाहर में अनाकर्षक पोषाक, हावभाव, बोलचाल का प्रयोग करती हैं। आधुनिक महिलाएॅ परिवार में अनाकर्षक तथा बाहर में आकर्षक पोषाक, हावभाव तथा बोलचाल व्यवहार करती हैं।
एक अनुमान के अनुसार अब भी भारत में लगभग अठान्नवे प्रतिशत महिलाएॅ पारंपरिक जीवन पद्धति में शामिल हैं तो दो प्रतिशत अति आधुनिक प्रणाली में। भौतिक विकास के आॅकलन में भी ये दो प्रतिशत आधुनिक परिवार अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो नैतिक पतन में भी। परिवार तोडने, तलाक, असंतोष, नैतिक पतन तथा सामाजिक अव्यवस्था विस्तार में भी ये दो प्रतिशत महिलाएॅ अठान्नवे की तुलना में बहुत आगे हैं तो परिवार की भौतिक उन्नति, शिक्षा विस्तार, अधिकारों के लिये संघर्ष, में भी इन दो प्रतिशत आधुनिक महिलाओं का परंपरागत की तुलना में कई गुना अधिक योगदान है। परंपरागत महिलाएॅ प्राचीन संस्कारों को आॅख मूंदकर चलने पर अधिक विश्वास करती है तो आधुनिक महिलायें प्राचीन संस्कारों को बिना विचारे आॅख मूंदकर तोडने और छोडने पर अधिक विश्वास करती है। परंपरागत महिलाएॅ वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष को घातक मानती है तो आधुनिक महिलाएॅ वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को महत्व देती है।
यह स्पष्ट है कि महिलाएॅ परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के टूटने में आधुनिक महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है किन्तु यह भी मानना होगा कि परम्परागत परिवार व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो आधुनिक परिवार व्यवस्था को न रोका जा सकता है न सुधारा जा सकता हैं क्योंकि महिलाएॅ ही अब इतनी जागरूक है कि वे घुटन की अपेक्षा टूटन को अधिक महत्व दे रही है। साथ ही भारत की संवैधानिक राजनैतिक व्यवस्था इस टूटन को अधिक विस्तार दे रही है। एक तरफ तो संवैधानिक व्यवस्था महिलाओं को समान अधिकार देना नही चाहती तो दूसरी ओर उन्हें विशेष अधिकार का लालच देकर आधुनिक बनने की ओर प्रेरित कर रही है। किसी तरह का कानूनी दबाव न तो परम्परागत परिवार व्यवस्था को बचा सकता है न ही आधुनिक व्यवस्था को रोक सकता है। यदि हम महिलाओं को आधुनिकता की अंधी दौड से रोकना चाहते है तो हमें परम्परागत परिवार व्यवस्था में आयी कमजोरियों को दूर करना चाहिए। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार व्यवस्था के संचालन में महिला पुरूष का भेद किया जाए या सम्पत्ति के अधिकार में दोनों की भूमिका अलग-अलग हो। अब यह नहीं चल सकता कि परिवार से अलग होने के लिए महिलाओं को किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता है। महिला पुरूष के बीच भेद करने वाले सब प्रकार के कानून हटाकर सबको बराबर का अधिकार दे देना चाहिए। परम्परागत परिवार व्यवस्था तथा आधुनिक परिवार व्यवस्था की परिवार तोडक भूमिका को बदलकर लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था प्रारंभ होनी चाहिए जिसका अर्थ है परिवार और समाज के संचालन तथा आर्थिक मामलों में भी महिलाओं के समान संवैधानिक कानूनी तथा परिवारिक अधिकार होना।
मैं समझता हूॅ कि लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का सुझाव न तो परम्परागत महिलाओं को पसंद आएगा। न ही आधुनिक महिलाओं को। परम्परागत महिलाएं इतनी डरी हुई है कि उन्हें लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था के लिए पुरूष वर्ग सहमत होने देगा न ही आधुनिक महिलाएॅ इस दिषा में कदम आगे बढने देगी क्योंकि ऐसा होते ही उनके विशेषाधिकार भी खत्म हो जाऐंगे तथा उनका न्यूसेंस वेंल्यू भी कम हो जाऐगा। किन्तु समाज व्यवस्था के सफल संचालन के लिए ऐसी परम्परागत महिलाओं को विचार प्रचार द्वारा सहमत करना होगा तथा आधुनिक महिलाओं को नियंत्रित करना होगा। मैं समझता हूॅ कि विषय बहुत गंभीर है तथा इस विषय पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि भारत की टूटती परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था का कारण क्या है और समाधान क्या है? मेरा सुझाव है कि परम्परागत महिलाओं को परिवार व्यवस्था में अधिक छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान समय में यह उचित होगा कि सरकार परिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने वाले कानून हटा लें। साथ ही परिवारों को इस प्रकार के सामाजिक और कानूनी निर्णय की स्वतंत्रता दी जाए की वे स्वंय मिल बैठकर इस बात का निर्णय कर ले कि उन्हें परम्परागत व्यवस्था में चलना है, आधुनिक मार्ग पकडना है अथवा लोकतांत्रिक मार्ग। मैं लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था का पक्षधर हूॅ।

मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”–बजरंग मुनि

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1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य।
2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्याओ का निवारण समाज का दायित्व होता है और सरकार को उसमे सहयोग करना चाहिये।
3 दुनियां मे अपराध एक ही होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता मे किसी प्रकार से बाधा पहुंचाना। राज्य का दायित्व होता है, उस स्वतंत्रता को सुरक्षा देना।
4 भारत मे समस्याए तीन प्रकार की होती है- 1 आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक । इन तीनो प्रकार की समस्याओ का स्वरूप कृत्रिम होता है और समाधान कठिन नहीं है।
5 दुनियां मे समस्याएं तीन प्रकार की होती है। 1 प्राकृत्रिक 2 भूमंडलीय 3 कृत्रिम । कृत्रिम समस्याए भी तीन होती है। आर्थिक 2 सामाजिक 3 राजनैतिक।
6 आर्थिक समस्याए कई्र प्रकार की होती है। आर्थिक असमानता, मंहगाई, गरीबी, भूख, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, श्रम शोषण, विदेशी कर्ज।
7 सामाजिक समस्याए कई होती है। जातिय भेदभाव, साम्प्रदायिकता, छुआछूत उॅच नीच, वर्ण व्यवस्था का विकृत होना।
8 राजनैतिक समस्याए कई है। किसी समस्या का ऐसा समाधान जिसमे नई समस्या पैदा हो, वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहन, समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये अधिक से अधिक कानून बनाना, अपनी गलतियां छिपाने के लिये समाज पर दोषारोपण, राष्ट्र को समाज से उपर सिद्ध करना।
सारी दुनियां अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक सत्ता की गुलाम बनी हुई है। दुनियां के दो महा शक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष आपस मे टकरा जाये तो दुनियां के पांच अरब लोग मिलकर भी विश्व युद्ध से नही बच सकते। यह सत्ता का केन्द्रियकरण बहुत दुखद है। भारत की राजनैतिक स्थिति भी इससे भिन्न नही है। भारत मे अपराध तेजी से बढ रहे है। अपराध रोकना सरकार का दायित्व है किन्तु सरकारे अपराध रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता न देकर सामाजिक आर्थिक समस्याओ का समाधान करते रहती है। यह समाधान भी इस प्रकार होता है कि उससे कुछ नई समस्याओ का विस्तार होते रहता है। समस्याये बढती रहती है और समाधान निरंतर जारी रहता है। अपराध बढते रहते है और सत्ता की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। इसका अंतिम परिणाम होता है गुलाम मानसिकता का विस्तार। आर्थिक समस्याए, कई प्रकार की दिखती है। इनमे मंहगाई, गरीबी, अमीरो गरीबो के बीच बढती दूरी, बढता पर्यावरण प्रदूषण, भूख से मृत्यु, श्रम शोषण, विदेशो का बढता हुआ कर्ज, शहरी आबादी का बढना, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि अनेक समस्याए विकराल होती जा रही है जिनका कोई समाधान नही दिखता । यदि गंहराई से विचार किया जाये तो ये समस्याए या तो राज्य द्वारा गलत अर्थनीति के परिणाम है अथवा अस्तित्वहीन समस्याए है जिन्हे राज्य ने प्रत्यक्ष बनाकर रखा है। मंहगाई तो है ही नही । गरीबी अमीरी भी इसी तरह आभाषीय शब्द है। स्पष्ट नही है कि कौन गरीब है कौन अमीर। अन्य समस्याए भी कृत्रिम है ही । ऐसी सभी आर्थिक समस्याओ का सिर्फ एक समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा अर्थात डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, कोयला गैस की भारी मुल्य वृद्धि कर दी जाये । सिर्फ इस अकेले प्रयास से सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का समाधान हो जायेगा । यह एक छोटा सा समाधान है किन्तु इस समाधन से सब प्रकार की आर्थिक समस्याए अपने आप सुलझ सकती है। किन्तु मै देख रहा हॅू कि कोई भी राजनेता इस समाधान के पक्ष मे नही है । क्योकि बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों और राजनेताओ को इस समाधान से यह स्पष्ट परिणाम दिखता है कि श्रम की मांग बढ जायेगी श्रम का मूल्य बढ जायेगा आर्थिक असमानता घट जायेगी गरीब अमीर का भेद कम हो जायेगा और उनका स्वयं के अहंकार को चोट लगेगी। इसलिये वे समाधान के अनेक प्रकार के नाटक तो करते रहते है किन्तु किसी भी कृत्रिम उर्जा की किसी भी मूल्य वृद्धि का सब मिलकर विरोध करते है। यहां तक कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले पर एक जुट हो जाते है।
सामाजिक समस्याओ के रूप मे भी कई समस्याए समाज मे व्याप्त दिखती है। जातीय टकराव साम्प्रदायिकता, छुआछूत, उंच नीच का भेदभाव, विकार ग्रस्त वर्ण व्यवस्था इनमे से प्रमुख दिखती है। इन समस्याओं के समाधान मे भी राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। ये समस्याए हमेशा बढती ही चली जाती है और समाज मे इतना असंतोष बढाती है कि वह यदा कदा टकराव का रूप ग्रहण कर ले । इस पूरी समस्या का एक साधारण समाधान है समान नागरिक संहिता । व्यक्ति एक इकाई होगा और संवैधानिक स्वरूप मे धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर, किसान मजदूर का कोई संवैधानिक या कानूनी भेदभाव नही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के संवैधानिक अधिकार होगे। यह एक छोटा सा प्रयत्न इन सब समस्याओ का समाधान हो सकता है। किन्तु किसी भी राजनैतिक सामाजिक संगठन की इसमे कोई रूचि नही है क्योकि यदि ऐसा हो जायेगा तो वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष को नुकसान होगा। समाज मे अनेक समाज सुधारको के ऐसे संगठन बने हुए है जिनकी रोजी रोटी इन्ही समस्याओ पर निर्भर करती है। ये संगठन भी कभी नही चाहते कि समान नागरिक संहिता लागू हो । संघ परिवार बात तो समान नागरिक संहिता की करता है किन्तु चाहता है कि समान नागरिक संहित के नाम से समान आचार संहिता लागु हो और मुसलमान ऐसी आचार संहिता का विरोध करे। संघ परिवार भी सबको बराबर का अधिकार देने के पक्ष मे नही है। महिला संगठन भी बात समानता की करते है किन्तु महिलाओ को विशेष अधिकार उन्हे अवश्य चाहिये क्योकि समान नागरिक संहिता लागु होते ही सबकी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
राजनैतिक असमानता भी निरंतर बढती जा रही है। नये नये कानून बन रहे है और राज्य पर निर्भरता भी बढती जा रही है। परिवार के पारिवारिक और गांवो के गांव संबंधी आंतरिक मामलो मे भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। नये नये संगठन बन रहे है और ये संगठन शक्तिशाली होकर पूरे समाज को असमान कर रहे है। ये संगठन जब चाहे तब राज्य के सहायक भी बन जाते है और व्लैकमेलर भी। राज्य भी ऐसे समाज तोडक संगठनो को प्रश्रय देता रहता है। क्योकि ये संगठन वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष, के विस्तार सहायक होते है और जब विपरीत समूह आपस मे टकराते है तब राज्य उसमें पंच की भूमिका मे खडा होकर हस्तक्षेप करता है। ये सब समस्याए राज्य और राज्य द्वारा घोषित सामाजिक राजनैतिक धार्मिक संगठनो द्वारा पैदा की जाती है और ये सब मिलकर समाज को अशान्त किये रहते है। इन सभी समस्याओ का सीधे एक समाधान है सहभागी लोक तंत्र। इसमे राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेता है तथा परिवार गांव जिला प्रदेश को अधिकतम अधिकार बाटकर सिर्फ पुलिस सेना वित्त विदेश न्याय अपने पास रख लेता है। मै जानता हॅू कि यदि लोक स्वराज्य अर्थात सहभागी लोकतंत्र आ जाये तो अपने आप कानून कम हो जायेग, राज्य की आवश्यकता कम हो जायेगी, साथ ही राज्य पर निर्भरता भी कम हो जायेगी, राज्य पोशित अनेक समूह अपने आप समाप्त हो जायेगे। लेकिन ऐसे परिजीवी लोक स्वराज्य आने नही देंगे क्योकि ऐसा होना वे भी नही चाहते और राजनीति से जुडे लोग भी ऐसा बिल्कुल नही चाहते। उनकी भी दुकानदारी खतम हो जायेगी।
मै स्पष्ट हॅू कि सब प्रकार की आर्थिक समस्याओ का एक समाधान है कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण, सामाजिक समस्याओ का एक समाधान है समान नागरिक संहिता और राजनैतिक समस्याओ का एक समाधान है, लोक स्वराज्य। यदि इन तीन समाधानो पर आगे बढा जाये तो भारत की लगभग सभी समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी और राज्य पूरी ताकत से अपराध नियंत्रण की दिषा मे सक्रिय हो सकता है। हम सबके लिये उचित होगा कि हम इन तीनो समस्याओ के एक एक समाधान की दिशा मे आगे बढे। हम लोगो का कर्तब्य है कि हम इन समस्याओ के वास्तविक समाधान पर पूरे देश मे जन जागरण मजबूत करे। जो संगठन इन समस्याओ से हटकर अन्य समाधानो का नाटक करते रहते है इन संगठनो की वास्तविकता समाज के समझ प्रकट होने दे। देश की समस्याए भी अपने आप सुलझ जायेगी और अपराध नियंत्रण भी अपने आप हो जायेगा।

मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’–बजरंग मुनि

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कुछ मान्य धारणाएं हैः-
(1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है।
(2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे वह इकाई परिवार हो, गांव हो अथवा देश।
(3) देश या राष्ट्र व्यवस्था की अंतिम इकाई नहीं होते हैं क्योंकि संपूर्ण विश्व-समाज ही व्यवस्था की अंतिम इकाई होता है। वर्तमान समय में विश्व व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने से राष्ट्र को संप्रभुता संपन्न इकाई मान लिया गया है।
(4) किसी अन्य देश का नागरिक यदि अपना देश छोड़कर किसी अन्य देश में जाता है तो उसके तीन कारण हो सकते हैंः-
(क) जीवन पर संकट (ख) सुविधाओं का अंतर (ग) राजनीतिक सामाजिक षड्यंत्र।
(5) दुनियां में मुसलमान अकेला ऐसा समुदाय है जो अन्य समुदायों की तुलना में सामाजिक धार्मिक षड्यंत्रों के आधार पर दूसरे देश में अधिक पलायन करता है।
(6) अन्य सभी सम्प्रदायों की तुलना में मुसलमान सहजीवन सर्व-धर्म समभाव की अपेक्षा संगठन और धार्मिक संख्या-विस्तार को अधिक महत्व देता है।
(7) वर्तमान समय में पूरी दुनियां के समक्ष संगठित इस्लाम सबसे बड़ी समस्या है। भारत के लिए तो यह समस्या खतरनाक स्वरुप धारण कर चुकी है।
भारत में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है कि वे शरणार्थी हमारे अस्थाई मेहमान हैं या घातक शत्रु? जो लोग किसी तरह की वैधानिक सहमति या स्वीकृति लेकर भारत में आए हैं उनके संबंध में हम कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम तो चर्चा सिर्फ उन लोगों की कर रहे हैं जो बिना अनुमति के, छिपकर चोरी से भारत में घुस आए हैं और रह रहे हैं। स्वाभाविक है कि सामान्य रूप से ये सब घुसपैठिए ही माने जाएंगे किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाए तो उनमें से कुछ लोग ऐसे होंगे जो किसी खतरे से बचाव के लिए भारत में प्रवेश किए होंगे। कुछ ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन्हें बांग्लादेश की तुलना में भारत में अधिक भौतिक सुविधाएं मिल रही हों तथा कुछ अल्प संख्या ऐसे भी लोगों की हो सकती है जो भारत में किसी षड्यंत्र के अंतर्गत आए हो।
यदि सामान्यतः देखा जाए तो जो भी हिंदू बांग्लादेश से भागकर भारत आए है वेे किसी न किसी संकट के कारण यहां आए हैं। स्पष्ट है कि वे या तो वहां से भगाए गए हैं या डर कर भाग आए हैं जो भी मुसलमान भागकर आए हैं उनमे शायद ही कोई ऐसा हो जो किसी भय के कारण भारत आया हो। आमतौर पर वह सुविधाओं के लालच में भारत आया है लेकिन यह बात भी साफ है कि वह भारत में कुछ समय तक रह जाने के बाद भारत के संगठित मुसलमानों के साथ जुड़ जाता है धार्मिक मुसलमानों के साथ बिल्कुल नहीं जुड़ता। इस तरह यह बात लगभग निश्चित है कि वह भारत के लिए साम्प्रदायिक समस्याओं के विस्तार में सहयोगी बन जाता है समाधान नहीं।
स्पष्ट है कि बाहर से आए हुए अवैध हिन्दू भारत में शरणार्थी माने जाने चाहिए और उन्हें बिना जांच-पड़ताल किए नागरिकता प्रदान कर देनी चाहिए क्योंकि वे या तो भगाए जाने के कारण आये हैं अथवा डरकर। जो भी मुसलमान आए हैं उन लोगों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए और यदि उनमें से किसी के विषय में यह प्रमाणित हो जाता है कि उसको कोई खतरा था तब उस पर परिस्थितियों के अनुसार विचार किया जा सकता है. किंतु जो मुसलमान सुविधाओं के लालच में भारत आए हैं उन्हें पूरी तरह घुसपैठिया मानकर देश से निकाल देना चाहिए. क्योंकि भविष्य में वे भारत की सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाएंगे ही। इस संबंध में यदि कोई कानूनी या संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिए। यह समस्या सिर्फ आसाम तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के हर क्षेत्र में गांव-गांव तक इस समस्या का विस्तार हुआ है।
पूरी दुनियां के लिए संगठित इस्लाम हिंसा और आतंक का पर्याय बन गया है चाहे पश्चिम के देश हो अथवा साम्यवादी रूस और चीन। सभी इस खतरे को दुनियां का सबसे बड़ा खतरा समझ रहे हैं। भारत के लिए यह खतरा और भी अधिक गंभीर है। यदि वर्तमान स्थिति का ठीक-ठीक आॅकलन किया जाए तो संगठित और हिंसक इस्लाम भारत की सबसे बड़ी समस्या है और इसे आपातकाल मानकर सारी शक्ति इस समस्या के समाधान में लगनी चाहिए। यह खतरा इसलिए और भी अधिक गंभीर हो जाता है कि भारत के मजबूत पड़ोसी देशों की भारत को अस्थिर करने में गंभीर रूचि है और भारत का संगठित इस्लाम उनके लिए सहायक हो सकता है। मरता हुआ भारत का साम्यवाद इस संगठित इस्लाम को अपना संरक्षक समझकर उसके साथ मजबूती से खड़ा हुआ है। इन दोनों का तालमेल पूरा प्रयत्न कर रहा है कि येन केन प्रकारेण अन्य समुदायों को विभाजित करके उन्हें टुकड़ों में बांट दिया जाए। वे अन्य समुदायों के बीच सवर्ण-अवर्ण, हिंदू-ईसाई-सिख आदि के नाम पर मतभेद पैदा करके विभाजन के लिए दिन-रात सक्रिय रहते हैं। दूसरी ओर हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐसी अस्पष्ट भाषा बोलते हैं जिससे साम्यवादी व संगठित इस्लाम के गठजोड़ को अप्रत्यक्ष सहायता मिलती है। वर्तमान समय चुनावों के हिसाब से निर्णायक वर्ष है और काफी सोच समझकर निष्कर्ष निकालने की आवश्यकता है।
वर्तमान चुनावों में साफ-साफ धु्रवीकरण होना चाहिए जिसमें एक तरफ वे लोग हों जो संगठित इस्लाम और साम्यवादीे गठजोड़ को सबसे बड़ा खतरा समझते हैं तो दूसरी ओर वे लोग हों जो इस गठजोड़ को अपनी राजनीतिक सत्ता के लिए सहायक मानते हों। जो लोग कश्मीर के संबंध में ढुलमुल हो, बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति रखकर हिंदू शरणार्थियों को भी उन्हीं की श्रेणी में रखने की भाषा बोलते हों, म्यामार से आए मुस्लिम शरणार्थियों को मानवीय आधार पर भारत में रखे जाने की वकालत करते हों, भारत में समान नागरिक संहिता का विरोध करके अल्पसंख्यक बहुसंख्यक धारणा को मजबूत करते हों, या कश्मीर के संबंध में बातचीत की वकालत करते हो इस प्रकार के लोगों से पूरा सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि ऐसे लोग या तो खतरे को ठीक से समझ नहीं रहे अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए जयचंद की भूमिका निभा रहे हैं। साथ-साथ ऐसे लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है जो वर्तमान समय में सवर्ण-अवर्ण का मुद्दा उठाकर अप्रत्यक्ष रूप से संगठित इस्लाम व साम्यवादी गठजोड़ को लाभ पहुंचा रहे हैं। ऐसे नासमझ लोगों को भी समझाने की आवश्यकता है।
खतरा बहुत बड़ा है और भारत के लिए इस पार या उस पार का निर्णायक समय है। वर्तमान समय यह विचार करने का नहीं है कि राफेल डील में भ्रष्टाचार हुआ कि नहीं नोटबंदी से फायदा हुआ कि नुकसान, न्याय पालिका चुनाव आयोग आदि संस्थाओं की स्वायत्तता पर खतरा है कि नहीं, विपक्षी दलों के अस्तित्व पर संकट है या नहीं, अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही है या रसातल में जा रही है। वर्तमान समय तो सिर्फ एक प्रश्न का उत्तर खोजने में है कि भारत में साम्यवादी व संगठित इस्लाम के संभावित खतरे से कौन निपट सकता है और उसके लिए कौन प्रयत्नशील हो सकता है। वर्तमान समय में भारत के लोकतंत्र को कोई खतरा है या नहीं यह प्रश्न भी महत्व नहीं रखता है क्योंकि साम्यवादी व संगठित इस्लाम का गठजोड़ अव्यवस्था का विस्तार करेगा, वर्ग समन्वय की जगह वर्ग विद्वेष पैदा करेगा, व गृह युद्ध की परिस्थितियां पैदा करेगा जिसका निश्चित परिणाम तानाशाही है। चाहे वह तानाशाही शरीयत की हो या साम्यवादी हम किसी भी परिस्थिति में इस प्रकार के खतरे को नहीं झेल सकते हैं. अंत में मेरा सुझाव है- 1400 वर्षों के बाद दुनिया को यह महसूस हुआ है कि संगठित इस्लाम दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है. इस खतरे से निपटने में भारत का अपना भी हित निहित है और विश्व का भी. इस संकट काल में किसी भावना में बह कर मानवता के नाम पर अथवा, राजनीतिक स्वार्थ में की गई उनकी कोई भूल देष व संपूर्ण विष्व-समाज को निर्णायक नुकसान पहुंचाएगी, इसके प्रति सावधान होकर निर्णय करना चाहिए।

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संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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