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मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...
मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्र...
मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रका...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि
------------------------------------------------------------------- कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः- 1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’–बजरंग मुनि
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1. परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाएॅ ही महत्व...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”–बजरंग मुनि
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्या...

मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 15, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ निष्कर्ष हैं।
1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;
2. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की उपलब्धियां सीमित होती हैं। मार्गदर्शक की सीमा सर्वोच्च सम्मान तक, रक्षक की सर्वोच्च शक्ति तक, पालक की सर्वोच्च सुविधा एवं धन संपत्ति तक तथा सेवक की सर्वोच्च सुख तक होती हैं;
3. आदर्श वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्तियां भी अलग-अलग होती हैं। मार्गदर्शक अर्थात ब्राह्मण मर सकता हैं मार नहीं सकता, हृदय परिवर्तन कर सकता हैं डरा नहीं सकता, सत्य छुपा सकता हैं किन्तु झूठ नहीं बोल सकता;
4. आदर्श वर्ण व्यवस्था में रक्षक अर्थात क्षत्रिय कूटनीति का प्रयोग कर सकता हैं बल प्रयोग कर सकता हैं किन्तु उपदेश अथवा प्रवचन नहीं दे सकता। मरने और मारने के लिये तैयार होता हैं;
5. आदर्श वर्ण व्यवस्था में पालक अर्थात वैश्य जनहित में सच छुपा भी सकता हैं और झूठ भी बोल सकता हैं। मरने से भी बचेगा और मारने से भी बचेगा। लालच दे सकता हैं शत्रु को धोखा भी दे सकता हैं किन्तु प्रवचन उपदेश अथवा डर भय नहीं दिखा सकता;
6. वर्तमान भारतीय राजनीति में कोई अच्छा व्यक्ति चुनाव में नहीं जीत सकता। यदि अपवाद स्वरूप जीत भी गया तो अच्छा नहीं रहेंगा और यदि कोई फिर भी अच्छा रह गया तो जल्दी ही निकाल दिया जायेगा;
7. नीति निर्धारण में विचार महत्वपूर्ण होते हैं चरित्र नहीं। क्रियान्वन में चरित्र का महत्व हैं विचारों का नही;
8. जो कुछ पुराना हैं वह सब सही हैं अथवा जो कुछ पुराना हैं सब गलत हैं ऐसी धारणा उचित नहीं हैं अतिवादी लोग ऐसी धारणा बनाकर उसे स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं;
9. भारत की प्राचीन राजतंत्र प्रणाली आदर्श नहीं हैं, राजतंत्र या तानाशाही की तुलना में लोकतंत्र अधिक अच्छा हैं किन्तु अपर्याप्त और असफल हैं। लोकतंत्र की जगह लोक स्वराज अधिक अच्छी प्रणाली हैं;
10. प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को अधिक सम्मान प्राप्त था। मध्यकाल में राजषक्ति और धनशक्ति ने ज्ञान और त्याग को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। दस वर्ष पूर्व तक भारत में गुण्डा शक्ति सर्वोच्च स्थान पर थी जो अब कमजोर हो रही हैं;
11. व्यवसाय के माध्यम से तीन प्रकार के लोग आगे बढते हैंः-1. जो सेवा के उद्देश्य से बिना लाभ-हानि के लागत मूल्य पर व्यापार करते हैं 2. जो उचित लाभ लेकर तथा नैतिकता के आधार पर व्यापार करते हैं 3. जो मिलावट और कमतौल के माध्यम से अनैतिक व्यापार करते हैं।

राजनीति में भी तीनों प्रकार के लोग होते हैं। कुछ लोग बिना लाभ-हानि के राजनीति करते हैं। कुछ लोग भ्रष्टाचार की राजनीति करते हैं तो कुछ लोग राजनीति में हत्या, डकैती जैसे अपराधों का भी सहारा लेते हैं। भारतीय राजनीति में वर्तमान समय मे तीसरे प्रकार के लोग अधिक आगे बढते देखे गये हैं। पहले प्रकार के लोगों की असफलता को देखकर अब राजनीति में अच्छे लोगों का आकर्षण खत्म हो गया हैं क्योंकि व्यापार और राजनीति अथवा धन और सत्ता का पूरी तरह घालमेल हो गया हैं। सत्ता धन के साथ सामंजस्य बिठाकर चल रही हैं तो पूंजीपति भी सत्ता को अपने हाथ में रखने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।

भ्रष्टाचार करना राजनेताओं की कुछ मजबूरी भी बन गया हैं। चुनाव में बेतहाशा खर्च करना पडता हैं। कार्यकर्ता आधारित चुनाव व्यवस्था होने के कारण कार्यकर्ताओं को भी खुश रखना पडता हैं। उन पर खर्च भी करना पडता हैं और उनके अवैध कार्य को संरक्षण देना भी मजबूरी बन गया हैं। परिवार, रिश्तेदार और मित्र भी बहुत अपेक्षा रखते हैं। इसलिये बिरले लोग ही स्वयं को भ्रष्टाचार से मुक्त रख पाते हैं। मैंने स्वयं देखा हैं कि चालीस वर्ष पूर्व जब मैं राजनीति में अच्छे पदों पर था तब मेरे साथ सक्रिय साथियों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। हमारे जिले के लोग विकास में बहुत पीछे होते हुए भी संतुष्ट थे। फिर भी हमारे सब साथी पूरी तरह ईमानदार रहे। आज उसी तरह के राजनीतिक पद रखने वालों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हैं क्षेत्र भी बहुत विकसित हुआ हैं फिर भी शायद ही कोई ईमानदार हो। यहाॅ तक कि पार्टी के लिये बेइमानी करने को ईमानदारी ही माना जाता हैं किन्तु ऐसा भी व्यक्ति मिलना मुश्किल हैं। बाद मे मैनें स्वयं प्रयोग किया और रामानुजगंज शहर का नगरपालिका अध्यक्ष बना तब मेरे सामने भी ऐसी ही मजबूरी आयी मैंने भी अपने मतदाताओं से सलाह लेकर दस प्रतिशत भ्रष्टाचार की छूट प्रदान की। सोचा जा सकता हैं कि राजनेताओं के सामने भी कुछ मजबूरियाॅ हैं और मतदाताओं के सामने भी। यदि किसी साधारण भ्रष्ट को किसी तरह हटने के लिये सहमत भी कर लिया जाये तो आगे आने वाला उससे कई गुना अधिक भ्रष्ट होना निष्चित दिखता हैं। ऐसे में मतदाता के पास क्या विकल्प हैं।

मैंने सन 55 से 84 तक पच्चीसों बार चुनावों का संचालन किया हैं और हर चुनाव में मतदाताओं को पैसा, शराब अथवा अन्य किसी प्रकार से उपकृत करना पडा हैं। मैंने तो एक बार मतदाताओं को सलाह दी थी कि यदि राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं तो आप किसी अच्छे या कम भ्रष्ट को प्राथमिकता दे। यदि ऐसा न हो तो ऐसा कोई चुने जो आपका अच्छा परिचित हो और सुख-दुख के समय में काम आ सके और फिर भी कोई नही हैं तो तत्काल जो भी मिले तो वह ले लेना कोई अपराध नहीं हैं क्योंकि जब राजनीति व्यवसाय हैं तब मुफ्त में वोट देने की मूर्खता क्यों की जाये। इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि किसी अपराधी या हत्यारें को किसी भी परिस्थिति में वोट न दिया जाये। वोट की सौदेबाजी कोई गलत कार्य नहीं हैं।

मेरे विचार से भारत की राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गयी हैं और सबसे खतरनाक इसका अपराधीकरण की तरफ बढना हैं। अपराध मुक्त करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं फिर भी यह स्थिति आदर्श नही हैं और इसे पूरी तरह बदलना चाहिये। जो लोग मतदाताओं को बदलना चाहते हैं वे भी कहीं न कही नासमझ हैं जो लोग राजनेताओं को बदलना चाहते हैं वे भी या तो ढोंग कर रहैं हैं या गलती। न मतदाता बदल सकता हैं न ही राजनेता। हमें तो पूरी राजनीति को बदलना पडेगा और जब तक पावर इकठ्ठा होता रहेगा तब तक राजनीति का व्यवसायीकरण नहीं रोका जा सकता। यदि राजनेताओं की संवैधानिक शक्ति विकेन्द्रित हो जाये तो सारी समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता हैं न राजनेताओं को सुधारना पडेगा और न मतदाताओं को। इसलिये मेरा मत हैं कि हमे अन्य सब कार्य छोडकर राजनीतिक सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की दिशा में आगे बढना चाहिये।

राजनीति बन गयी तवायफ नेता हुये दलाल,

ऐसे में क्या होगा भैया इस समाज का हाल,

संसद को एक पलंग समझ कर उस पर शयन किया

संविधान को मानकर चादर खींचा ओढ़ लिया

अब तक हमने बहुत सहा अब सहेंगे नहीं हम, चुप रहेंगे नहीं चादर हटा देंगे हम, सब कुछ दिखा देंगे हम, कचरा जला देंगे हम !!!!!

मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि

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कुछ निष्कर्ष है।
1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है;
2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनैतिक है न करने योग्य कार्य करना अपराध होता है;
3. प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यवस्था से संचालित होता है और व्यवस्था व्यक्ति समूह से जिस समूह में वह स्वयं शामिल होता है;
4. व्यवस्था पारिवारिक, समाजिक तथा राजनीतिक होती है। तीनों व्यवस्थायें अगल-अगल होते हुये भी एक-दूसरे की पूरक होती है;
5. स्वतंत्रता, अनुशासन और शासन का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत होती है, किसी अन्य से जुडते ही वह अनुशासन में बंध जाती है। स्वतंत्रता शासन व्यवस्था से बाध्य होती है;
6. प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वभाव होता है कि वह स्वयं दूसरों से अधिकाधिक स्वतंत्रता चाहता है और दूसरों को कम से कम स्वतंत्रता देना चाहता है;
7. सारी दुनियां में व्यवस्था का केन्द्रीयकरण हो रहा है। राजनीतिक सत्ता समाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले रही है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी संकुचित होती जा रही है;
8. परंपरागत परिवार व्यवस्था दोषपूर्ण है उससे व्यक्ति पर व्यवस्था का अनुशासन तो है किन्तु व्यवस्था पर व्यक्ति समूह का नियंत्रण नहीं है;
9. साम्यवादी तथा इस्लामिक व्यवस्थायें व्यक्ति को स्वतंत्रता को न मानने के कारण त्यागने योग्य है। भारतीय परिवार व्यवस्था संशोधन योग्य है और लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुकरणीय है;
10. व्यवस्था से चरित्र बनता है। चरित्र से व्यवस्था नही। जो लोग व्यवस्था में चरित्र को महत्वपूर्ण मानते है वे गलत है क्योंकि व्यवस्था व्यक्ति से नहीं व्यवस्था से व्यक्ति संचालित होता है;
11. नीति निमार्ण में विचार महत्वपूर्ण होता है और क्रियान्वय में चरित्र की भूमिका प्रमुख होती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति-निमार्ण विधायिका का और क्रियान्वन कार्यपालिका का कार्य माना जाता है;
12. संघ परिवार चरित्र को हर मामले में महत्वपूर्ण मानता है तो साम्यवाद किसी मामले में चरित्र को महत्वपूर्ण नहीं मानता मेरे विचार से दोनो गलत है;
13. यदि व्यवस्था ठीक हो तो हमें चरित्र निमार्ण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये यदि अव्यवस्था या कुव्यवस्था हो तो चरित्र निमार्ण को रोक कर व्यवस्था परिवर्तन का कार्य करना चाहिये;
14. यदि अपराध अनियंत्रित हो तो शराब, जुआ, वैश्यावृत्ति जैसे अनैतिक कार्यो करने वालों से दूरी घटा लेनी चाहिये। चरित्र निमार्ण के प्रयत्न घातक होते है;
15. यदि गाडी का ड्राइवर गलत हो तब भी अव्यवस्था होगी और गाडी खराब हो तो भी। वर्तमान समय में व्यवस्था रूपी गाडी ही गडबड है इसलिये गाडी ठीक करना आवश्यक है।
16. क्या करना चाहिये इसका निर्णय व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता है। न करने योग्य कार्य करने से रोकने का काम व्यवस्था का है। चरित्र व्यक्तिगत होता है और व्यवस्था सामुहिक होती है;

वैसे तो सारे विश्व की ही व्यवस्था गडबड है क्योंकि जब तक साम्यवाद और इस्लाम से व्यवस्था मुक्त नहीं होती तब तक व्यवस्था में सुधार सम्भव नहीं। सौभाग्य से भारत की व्यवस्था इन दोनों से बहुत कम प्रभावित है फिर भी पिछले समय में जो अव्यवस्था विकसित हुयी है उसे व्यवस्था परिवर्तन से ही सुधारा जा सफल है चरित्र निमार्ण से नहीं। क्योंकि तानाशाही में चरित्र से व्यवस्था सुधरती है और लोकतंत्र में व्यवस्था से चरित्र सुधरता है। भारत सैकडो वर्षो तक गुलाम रहने के कारण व्यक्ति के नेतृत्व से व्यवस्था के संचालन का अभयस्त हो गया है जो उचित नहीं है। व्यवस्था निरंतर प्रभावहीन होती जा रही है दूसरी ओर अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, संघ परिवार, गायत्री परिवार या आर्य समाज पूरी ईमानदारी और सक्रीयता से चरित्र निमार्ण के कार्य में लगे हुये है किन्तु औसत चरित्र गिरता जा रहा है क्योंकि व्यवस्था दोषपूर्ण है और जितनी गति से चरित्र निमार्ण हो रहा है उसकी तुलना में कई गुना अधिक चरित्रपतन राजनीतिक व्यवस्था कर रही है। कुल मिलाकर चरित्र गिर रहा है किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हम व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को नहीं समझ पा रहे है। व्यवस्था में भी पारिवारिक आर्थिक, समाजिक व्यवस्था को राजनीतिक व्यवस्था ने इतना गुलाम बना लिया है कि सब प्रकार की व्यवस्थाये राजनीतिक अव्यवस्था से प्रभावित हो रही है। राजनीतिक व्यवस्था को ठीक किये बिना चरित्र पतन रूक नही सकता भले ही हम चरित्र निमार्ण द्वारा आंशिक रूप से उस पतन को गति को कम कर सके। इसके बाद भी व्यवस्था परिवर्तन के महत्व को न समझकर चरित्र निमार्ण पर अधिकतम शक्ति लगाना ना समझी का कार्य है जो हम लगातार किये जा रहे है। राजनीतिक व्यवस्था में भी हमने कई बार ड्राइवर बदलने का प्रयास किया किन्तु गाडी आगे बढकर पीछे ही जा रही है क्योंकि हम समझ ही नहीं रहे है कि गाडी खराब है ड्राइवर नहीं।

आवश्यकता इस बात की है कि महत्वपूर्ण लोगो को चरित्र निमार्ण की तुलना में व्यवस्था परिवर्तन पर अधिक शक्ति लगानी चाहिये और समझना चाहिये कि लोकतंत्र में चरित्र से व्यवस्था नहीं बल्कि व्यवस्था से चरित्र बनता है। जब यह अंतिम सत्य है कि व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति समूह अर्थात समाज होता है तब हम उल्टी दिशा में चलकर समाज के उपर व्यवस्था और व्यवस्था के उपर व्यक्ति का प्रयोग क्यों करें। उचित होगा कि इस वर्तमान प्रणाली को पलटकर व्यक्ति के उपर व्यवस्था और व्यवस्था और व्यवस्था के उपर समाज का प्रयोग करें।

मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 6, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-
1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है;
2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगाकर कमजोर लोगों को कर मुक्त करना चाहिये। वर्तमान समय में इसका उल्टा हो रहा है;
3. आर्थिक विषमता बहुत बडी समस्या होती है। आर्थिक विषमता को कम किया जाना चाहिये;
4. हजारों वर्षों से बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे और उनका लाभ उठाया। वर्तमान भारत में भी बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम शोषण के नये-नये तरीके खोजे जा रहे है।
5. राज्य को सिर्फ सुरक्षा और न्याय तक सीमित रहना चाहिये राज्य को कभी समाज सुधार अथवा व्यापार नहीं करना चाहिये;
6. भारत की संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी होनी चाहिये जिस पर संविधान के अतिरिक्त किसी अन्य का नियंत्रण न हो;
7. कोई भी बुद्धिजीवी श्रम के साथ न्याय के प्रयत्न नहीं करता। हर बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध करता है क्योंकि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि श्रम की मांग और श्रम का मूल्य बढाने में सहायक है;
8. सभी प्रकार के कर हटाकर एक सुरक्षा कर होना चाहिये जो सम्पत्ति कर के रूप में हो सकता है;
9. किसी प्रकार की सुविधा के लिये सरकार को फीस लेने की व्यवस्था करनी चाहिये, टैक्स नहीं;
10. राज्य की भूमिका सुरक्षा का वातावरण बनाने तक सीमित होती है। सुरक्षित रहना व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है।
11. सुरक्षा में बाधा की स्थिति में राज्य को मुआवजा देना चाहिये। अन्य किसी प्रकार का मुआवजा बंद कर दिया जाये;
12. सुरक्षा का अर्थ सुरक्षित रखना नहीं है बल्कि सुरक्षा की बाधाओं को दूर करना है। राज्य को कभी सुरक्षा नहीं देनी चाहिये बल्कि बाधाओं को दूर करना चाहिये;

भारत में अर्थव्यवस्था पूरी तरह विपरीत दिशा में जा रही है। समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद जैसे दुनियां के अनेक वादों के चक्कर में भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है। समाजवादी और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में सरकारीकरण को मजबूत किया तो पूंजीवाद ने सरकारीकरण को तो कमजोर किया किन्तु आर्थिक असमानता को मजबूत किया। आदर्श स्थिति में अर्थव्यवस्था न तो पूरी तरह सरकार के अधीन होनी चाहिए न ही पूरी तरह बाजार के अधीन।

भारत में एक बडी समस्या श्रम शोषण की है। गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी और कृषि उत्पादन पर भारी कर लगाकर बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, उपभोक्ताओं तथा शहरी लोगों ने आर्थिक विषमता भी बढाई है और श्रम शोषण भी किया है। इन दोनों समस्याओं से निपटना न्याय संगत है। इसके लिए राज्य को अल्पकाल के लिये विषेष प्रवाधान करना चाहिये जिसमें सब प्रकार के कर हटाकर एक कृत्रिम उर्जा कर इस प्रकार लगाया जाये ताकि उसका कोई भी धन सरकारी खजाने में न जाये। बल्कि वह प्रत्येक नागरिक में इस तरह बराबर-बराबर बाँट दिया जाये जिसके परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढे, शहरी आबादी घटे, कृत्रिम उर्जा का उपयोग नियंत्रित हो जाये, विदेशी कर्ज घट जाये, पर्यावरण सुधर जावें। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य भारत में आपातकाल समझ कर ढाई गुना कर दिया जाये तो आर्थिक विषमता भी बहुत कम हो जायेगी अन्य अनेक समस्यायें अपने आप घटेगी।

सरकार का काम न तो सुविधा देना होता है न ही सुरक्षित रखना। सरकार का सिर्फ एक काम होता है अपराध नियंत्रण जिसका अर्थ होता है व्यक्ति की स्वतंत्रता में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करना। राज्य वर्तमान समय में अपराध नियंत्रण छोडकर हर मामले में हस्तक्षेप करता है। वह व्यक्ति को सुरक्षा देता है और सुविधा भी देता है जो उसका काम नहीं है। इस तरह यदि राज्य स्वयं को अपराध नियंत्रण तक सीमित कर लेगा तो राज्य का बजट बहुत कम हो जायेगा और कर भी बहुत कम लगाना पडेगा। राज्य को सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में एक कर लेकर अन्य सारे कर समाप्त कर देना चाहिये। राज्य को पुलिस, सेना और न्याय का बजट सम्पत्ति कर के रूप में पूरा करना चाहिये क्योंकि राज्य प्रत्येक व्यक्ति के जान-माल की सुरक्षा की गांरटी देता है। अन्य किसी प्रकार का होने वाला खर्च फीस के रूप में लिया जा सकता है चाहे शिक्षा और स्वास्थ्य हो अथवा अन्य कोई भी सुविधा।

मैं जानता हूॅ कि भारत का कोई पूंजीपति सम्पत्ति कर से सहमत नहीं होगा भले ही उसे कुछ भी करना पडे। इसी तरह भारत का कोई भी बृद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से भी सहमत नही होगा क्योंकि ये दोनों सुझाव दोनों प्रकार के लोगों अर्थात पूंजीपतियों, बुद्धिजीवियों के लिये घातक है। इस सुझाव के आधार पर आवागमन मंहगा हो जायेगा शहरी उद्योग गांव की ओर चले जायेगें मशीनीकरण घट जायेगा तथा श्रम बहुत मंहगा हो जायेगा जो न कोई बुद्धिजीवी चाहता है न ही पूंजीपति। भारत का हर बुद्धिजीवी गरीबी दूर करने और अमीर-गरीब के बीच टकराव वर्धक सुझाव पर विश्वास करता है लेकिन समाधान की चर्चा नहीं करता है। क्योंकि समाधान उनकी सुविधाओं में कटौती कर देगा और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर प्रष्न चिन्ह खडा करेगा। भारत का हर समाजवादी प्रशासनिक तरीके से आर्थिक समस्याओं के समाधान की बात करता है और किसी भी प्रकार के निजीकरण के विरूद्ध होता है। इसी तरह भारत का हर वामपंथी पूंजीवाद का विरोध करता है, श्रमजीवियों के समर्थन का नाटक करता है, अमीरी रेखा और गरीबी रेखा के लिये आंदोलन करता है, किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि के विरोध में सबसे आगे रहता है क्योंकि समस्या का जीवित रहना ही उसके अस्तित्व के लिये आवश्यक है। सभी राजनैतिक दल आर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक समाधान करना चाहते है, आर्थिक नहीं।

मेरा सुझाव है कि 1-राज्य का सारा खर्च सुरक्षा और न्याय तक सीमित करके सिर्फ सम्पत्ति कर के रूप में पूरा किया जाना चाहिये। 2-एक स्वतंत्र अर्थपालिका होनी चाहिये जो राज्य के आय-व्यय की समीक्षा करे और उसका बजट बनावें। 3-श्रम के साथ न्याय हो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये और इसके लिये कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि होनी चाहिये तथा देष का निर्यात इतना अधिक बढाया जाये कि उपभोक्तावाद पर अकुंश लगे और उत्पादक सुखी हो। 4-समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद जैसी बुराईयों से पिंड छुडाकर हमें समाजीकरण की दिशा में बढना चाहिये जिसका अर्थ है प्रत्येक गांव को संवैधानिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वतंत्रता। मेरे विचार से यह सुझाव आदर्श अर्थव्यवस्था के लिये मील का पत्थर बन सकता है।

आदर्श स्थिति तो सम्पूर्ण समाजीकरण ही है जिसमें अन्य मामलों के अतिरिक्त आर्थिक स्वतंत्रता से भी राज्य का हस्तक्षेप समाप्त हो कर समाज का नियंत्रण होना चाहिये किन्तु व्यावहारिक रूप से अभी तत्काल ऐसी संभावना नही है। इस लिये तात्कालिक रूप से हमें ऐसी नीति बनानी चाहिये जिससे आर्थिक मामलों में राज्य का हस्तक्षेप और शक्ति कम होती चली जाये। जो लोग अमीरी या गरीबी रेखा के नाम पर राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने के पक्षधर है वे गलत है। सम्पत्ति कर के नाम पर राज्य को मनमानी करने के अधिकार देना भी उचित नहीं है तथा कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करके राज्य अपना खजाना भरता रहे ऐसी मांग का समर्थन भी करना उचित नहीं है। राज्य के आर्थिक अधिकार समाज नियंत्रित होने चाहिये और राज्य सम्पत्ति कर तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि से प्राप्त धन किसी स्वतंत्र अर्थपालिका के निर्देशानुसार खर्च करने को वाध्य हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये। अभी तात्कालिक रूप से अधिकतम निजीकरण का समर्थन और राज्य की शक्तियों का आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप कम होना ही व्यावहारिक दृष्टिकोण होना चाहिये।

मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि

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कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है।
1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये।
2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमजोर तथा धूर्तता को मजबूत करता है।
3 आरक्षण सिर्फ व्यक्ति की प्रवृत्ति के आधार पर दिया जाना चाहिये। कानून का पालन करने वालो को सुरक्षा का आश्वासन ही एक मात्र आरक्षण दिया जाना चाहिये।
4 आरक्षण हमेशा घातक होता है। स्वतंत्रता पूर्व का जातीय अथवा परिवार व्यवस्था मे पुरूषो को प्राप्त सामाजिक आरक्षण भी घातक था और स्वतंत्रता के बाद का संवैधानिक आरक्षण भी घातक है।
5 संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त है । आरक्षण उस समानता को अ समान बना देता है।
6 जातीय आरक्षण, महिला आरक्षण, धार्मिक आरक्षण अथवा गरीबी आरक्षण के दुष्परिणाम स्वाभाविक होते है। भारत इन दुष्परिणामो की चपेट मे है।
7 किसी भी प्रकार के अन्य आरक्षण की तुलना मे महिला आरक्षण अधिक घातक है। अन्य आरक्षण समाज को तोडते है और महिला आरक्षण परिवार को ।
8 स्वतंत्रता के पूर्व भी श्रम के विरूद्ध बुद्धिजीवियो ने आरक्षण प्राप्त कर लिया था तथा स्वतंत्रता के बाद भी श्रमजीवियो के खिलाफ बुद्धिजीवियो का आरक्षण जारी रहा । यह आरक्षण अंबेडकेर जी का षणयंत्र था।
9 भारतीय राजनैतिक व्यवस्था मे सबसे अधिक घातक भूमिका अम्बेडकर जी की रही है। उन्होने निरंतर जान बूझकर सत्ता की लालच मे समाज को खंड खंड करने का काम किया ।
10 वर्तमान समय मे सवर्णो द्वारा आरक्षण का विरोध स्वार्थ पूर्ण है, क्योकि वे सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है। महिला आरक्षण धार्मिक आरक्षण आर्थिक आरक्षण का नही करते है।
हजारो वर्षो से पूरी दुनियां मे श्रम शोषण के नये नये तरीके बुद्धिजीवियो द्वारा खोजे जाते रहे है। भारत मे भी यह प्रकृया लम्बे समय से चलती रही है और आज भी जारी है। स्वतंत्रता के पूर्व बुद्धिजीवियो ने जन्म के आधार पर वर्ण और जाति बनाकर श्रमशोषण का रास्ता खोला था। इसी तरह पूरूष प्रधान व्यवस्था भी मजबूत की गई थी । स्वतंत्रता के बाद भी बुद्धिजीवियो का उद्देश्य श्रम शोषण ही रहा किन्तु स्वरूप बदल दिया गया। बुद्धिजीवियो ने अम्बेडकर जी के नेतृत्व मे श्रम के विरूद्ध सफल षणयंत्र किया और सवर्ण बुद्धिजीवी तथा अवर्ण बुद्धिजीवी के बीच समझौता कराकर जातीय आरक्षण का एक नया कानून लागू कर दिया गया। श्रम के प्रति न्याय होता तो श्रम मूल्य वृद्धि के प्रयत्न होते किन्तु ऐसे प्रयत्नो को रोकते हुए जातीय आरक्षण लागु कर दिया गया। इस आरक्षण को लगातार आज भी जारी रखा जा रहा है। एक नया आरक्षण महिलाओ के नाम से लाने का प्रयत्न हो रहा है। उचित होता कि महिलाओ को पारिवारिक व्यवस्था मे समान भूमिका दे दी जाती तथा परिवार की संपूर्ण सम्पत्ति मे भी बराबर का अधिकार दे दिया जाता। सारे विवाद खत्म हो जाते । किन्तु महिला आरक्षण के नाम पर कुछ न कुछ समस्याओ के विस्तार का षणयंत्र चलता रहता है। हिन्दू मुसलमान के नाम पर भी आरक्षण की आवाज उठती रहती है। यदि सबको समान अधिकार मिल जाता तो यह समस्या पैदा ही नही होती । गरीबो की सहायता के नाम पर भी आर्थिक आरक्षण की बात उठती रहती है। यदि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढा दिया जाता तो गरीब अमीर की खाई अपने आप खत्म हो जाती और श्रम का मूल्य बढ जाता । ग्रामीण उधोग मजबूत हो जाते और शहरी आबादी अपने आप संतुलित हो जाती किन्तु आर्थिक आरक्षण के नाम पर यह षणयंत्र भी अब तक जारी है। भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। क्योकि आरक्षण के नाम पर कमजोरो का शोषण करने का बुद्धिजीवियो को अप्रत्यक्ष लाभ भी होता है तथा साथ ही कमजोरो की मदद करने से उनकी सहानुभूति का प्रत्यक्ष लाभ भी मिलता है । यही कारण है कि भारत का हर बुद्धिजीवी किसी न किसी रूप मे भीम राव अंबेडकर का प्रशंसक है, क्योकि सब प्रकार के आरक्षण के मार्ग खोलने का पहला श्रेय भीम राव अम्बेडकर को जाता है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी तथा संघ परिवार भी अंबेडकर के प्रशंसक बन गये है।
किसी भी प्रकार का आरक्षण वर्ग विद्वेष का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। वर्ग विद्वेष को योजना पूर्वक बढाया जाता है और उसके दुष्परिणामो से सुरक्षा का ढोंग भी साथ साथ किया जाता है। यदि वर्ग विद्वेष पैदा ही न हो तो किसी प्रकार के समाधान की आवश्यकता ही नही है। किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा धूर्तता और अपराधो का विस्तार करता है। जिस वर्ग को आरक्षण प्राप्त होता है उस वर्ग के धूर्त भिन्न वर्ग के शरीफो का शोषण करने का अधिकार प्राप्त कर लेते है। इस तरह शराफत कमजोर होती जाती है और धूर्तता मजबूत । आज भारत का हर बुुद्धिजीवी अधिक से अधिक चालाक होने का प्रयत्न कर रहा है जिससे वह मजबूतो के शोषण से बच भी सके और कमजोरो का शोषण कर भी सके। व्यवस्था लगातार टूट रही है धूर्तता मजबूत हो रही है।
कुछ लोग जातीय आरक्षण का विरोध कर रहे है। ये लोग सब प्रकार के आरक्षण का विरोध न करके सिर्फ जातीय आरक्षण का विरोध करते है क्योकि स्वतंत्रता के पूर्व उन्हे शोषण का एकाधिकार प्राप्त था । स्वतंत्रता के बाद उस एकाधिकार मे से थोडा सा हिस्सा अवर्णो के खाते मे चला गया। ऐसे लोग समान नागरिक संहिता के लिये कोई आंदोलन नही करते न ही कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि के लिये करते है। ऐसे लोग महिला आरक्षण गरीबो का आरक्षण धार्मिक आरक्षण का भी खुला विरोध नही करते। कुछ लोग हिन्दू राष्ट की मांग करते हे तो कुछ अन्य लोग मुसलमानो का आरक्षण देना चाहते है। अनेक लोग महिला सशक्तिकरण का नारा लगाते है तो अनेक लोग गरीबो को आर्थिक आरक्षण देने की वकालत करते है । जबकि स्पष्ट दिखता है कि किसी भी प्रकार का आरक्षण हमेशा घातक होता है । अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है। किसी को भी विशेष अधिकार देते है तो समानता का सिद्धान्त अपने आप खंडित हो जाता है। किसी विशेष स्थिति मे किसी की सहायता की जा सकती है और की जानी चाहिये किन्तु अधिकार किसी को अलग से नही दिये जा सकते ।
मै लम्बे समय से आरक्षण का विरोधी रहा हूॅ और आज भी हॅू । मै अपने व्यक्तिगत जीवन मे प्र्रयत्न करता हॅू कि जो अवर्ण जातीय आरक्षण का समर्थन करते है उन्हे अछूत मानू और उनसे दूरी बनाकर रखूं। इसी तरह जो महिलाएं महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण का समर्थन करती है उन्हे अपने घर मे न घुसने दूं क्योकि वे समाज के लिये गंभीर समस्या है । जो हिन्दू या मुसलमान धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग करते है उनसे भी अधिक से अधिक दूरी बनाकर रखता हॅू। जो लोग गरीब और अमीर के बीच मे समाज को विभाजित करना चाहते है उन्हे भी मै खतरनाक मानता हॅू। मेरे विचार से सब प्रकार के आरक्षण समाप्त करके नयी व्यवस्था शुरू होनी चाहिये, जिसमे 1 समान नागरिक संहिता हो । व्यक्ति एक ईकाई हो। धर्म जाति, गरीब अमीर, महिला पूरूष का भेद न हो। 2 कृत्रिम उर्जा की भारी मुल्य वृद्धि करके सब प्रकार के टैक्स तथा सबसीडी समाप्त कर दी जाये। 3 परिवार की आर्थिक और पारिवारिक व्यवस्था परंपरागत की जगह लोकतांत्रिक हो । परिवार मे व्यक्ति का सम्पत्ति अधिकार सामूहिक हो और सम्पूर्ण सम्पत्ति मे सिर्फ परिवार छोडते समय उसे बराबर का हिस्सा दिया जाये। इन सब सुधारो मे भी समान नागरिक संहिता तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि विशेष महत्व रखते है। जो बुद्धिजीवी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि या समान नागरिक संहिता का विरोध करते है ऐसे श्रम शोषक बुद्धिजीवियो से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। अंत मे मेरा यह सुझाव है क किसी भी प्रकार के आरक्षण का पूरी तरह विरोध करना चाहिये। मै ऐसे विरोध का पक्षधर हॅू।

मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि

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कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-

1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्रधान। धर्म में नैतिकता प्रमुख होती है तो राजनीति में कूटनीति प्रमुख होती है

2. लोकतंत्र तानाशाही की तुलना में अच्छा तथा लोकस्वराज की तुलना में बुरा समाधान माना जाता है। लोकतंत्र में लम्बे समय बाद अव्यवस्था निश्चित होती है और उसका समाधान होता है तानाशाही

3. भारत की राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही के रूप में कार्यकर रही है। तंत्र मालिक है और लोक गुलाम

4. स्वतंत्रता के बाद मनमोहन सिंह सबसे अधिक लोकतांत्रिक और सफल प्रधानमंत्री माने जाते है। पुत्रमोह में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को अस्थिर किया।

भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी के कार्यकाल से ही कांग्रेस पार्टी कोई राजनैतिक दल न होकर एक पारिवारिक सत्ता के रूप में स्थापित हो गयी थी जो आज तक यथावत है। जो लोग इसे दल मानते है वे पूरी तरह से भ्रम में है। किन्तु यदि नैतिकता और राजनीति के समन्वय की बात करे तो नेहरू और इंदिरा गांधी अधिक अनैतिक तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में माने जाते है जबकि राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल अपेक्षाकृत अधिक नैतिकता के पक्षधर। इंदिरा गांधी, पंडित नेहरू और संजय गांधी के व्यक्तिगत आचारण के साथ यदि राजीव और सोनिया के अचारण की तुलना की जाये तो जमीन आसमान का फर्क दिखता है। युवा अवस्था में विधवा होने के बाद भी सोनिया गांधी की प्रंशसा करनी चाहिये। यह प्रंशसा तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब सोनिया जी विदेशी संस्कार में पली बढी हैं। इस मामले में राहुल गांधी की भी प्रशंसा करनी चाहिये कि जहॉ 16 से 20 वर्ष के बीच के भारतीय नवयुवक और धर्मगुरू अपने को सुरक्षित नही रख पा रहे हो वही 48 वर्ष का नौजवान अविवाहित राहुल गांधी अच्छा आचरण प्रस्तुत कर रहे हो। सोनिया जी ने जिस तरह प्रधानमंत्री पद का मोह छोडकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया वह उनकी राजनीति में नैतिकता की पराकाष्ठा कही जा सकती है किन्तु बाद में उन्होंने पुत्रमोह में पडकर जिस तरह मनमोहन सिंह को कमजोर किया वह उनकी नैतिकता के लिये एक अनैतिक आचरण ही माना जाना चाहिये। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी अव्यवस्था बढी उसका बडा भाग सोनिया गांधी की चालाकी से पैदा हुआ था। उस समय मैनें ज्ञान तत्व क्रमॉक 279 और 282 में लिखकर सोनिया जी को सलाह दी थी कि वे राहुल को अभी आगे स्थापित करने की जल्दबाजी न करे अन्यथा नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना निश्चित हो जायेगा। मैंने यह भी लिखा था कि अभी राहुल गांधी शराफत के मामले में बहुत परिपक्व है किन्तु कूटनीति का अभाव है जो किसी राजनेता का अनिवार्य गुण माना जाता है। मेरी बात नहीं सुनी गयी और परिणाम जो होना था वह हुआ। यदि कोई उक्त अंक फिर से पढना चाहे तो मैं आवश्यकतानुसार फेसबुक या व्हाटसअप एप में डाल सकता हूॅ।

पांच वर्ष बीत चुके है और अभी भी मेरी धारणा वहीं बनी हुयी है कि राहुल गांधी में गांधी के गुण अधिक है और नेहरू के कम। राहुल गांधी सफलतापूर्वक कांग्रेस अध्यक्ष का कार्य तो कर सकते है किन्तु प्रधानमंत्री के पद के लिये अभी पूरी तरह अयोग्य है क्योंकि उनमें कूटनीति का अभाव है शराफत बहुत अधिक है। वैसे भी राजनैतिक सूझबुझ यही कहती है कि राहुल गांधी की जगह किसी अन्य विपक्षी नेता अथवा सत्तारूढ दल में से किसी को भी आगे करके पांच वर्षो के लिये राहुल गांधी को प्रतीक्षा करनी चाहिये। यह प्रतीक्षा देश हित में भी होगी, कांग्रेस पार्टी के हित में भी होगी और राहुल गांधी के हित में तो होगी ही।

वर्तमान समय में देश की राजनीति ठीक दिशा में जा रही है। नरेन्द्र मोदी बिल्कुल ठीक दिशा में जा रहे है। प्रतिपक्ष की भूमिका में भी नितिश कुमार और अखिलेश यादव तक राजनीति केन्द्रीत हो रही है। राहुल गांधी इस राजनैतिक ध्रुवीकरण के बीच अनावश्यक पैर फंसा रहे हैं। सत्ता के लालच में जाति संघर्ष अथवा क्षेत्रीयता का उभार अल्पकालिक लाभ दे सकता है किन्तु उससे दीर्घकालिक नुकसान संभावित है। गुजरात में अलपेश ठाकुर के माध्यम से जो लाभ उठाया गया उसका नुकसान भी स्वाभाविक है।

राहुल गांधी के आचरण से भारत की राजनीति मे आमूल चूल बदलाव दिख रहा है। अब तक भाजपा और संघ हिन्दुत्व के अकेले दावेदार थे। साथ ही मुस्लिम कट्टरवाद वोट बैंक के रूप में अन्य सभी राजनीतिक दलों की ढाल बना हुआ था। राहुल गांधी ने पहल करके इस समीकरण की पूरी तरह से बदल दिया है। अब भाजपा और संघ हिन्दू-मुस्लमान के बीच ध्रुवीकरण करने में कठिनाई महसूस कर रहे है क्योंकि राहुल की पहल के बाद अन्य सभी राजनीतिक दलों ने भी हिन्दू वोट बैंक का महत्व समझ लिया है। मैं पांच वर्ष पहले भी स्पष्ट था और आज भी मानता हूॅ कि इस बदलाव में राहुल गांधी की कोई राजनैतिक योजना न हो कर यह उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो पहले स्पष्ट नहीं दिख रही थी। राहुल गांधी हिन्दू मंदिरों में अधिक जाकर कोई ढोंग नही कर रहे है क्योंकि राहुल गांधी मे दीर्घ कालिक ढोग की समझ ही नही है। राहुल के जीवन में वास्तविक हिन्दुत्व की धारणा मजबूत हो रही है।

इस हिन्दुत्व के नवजागरण मे भी राहुल गांधी से एक भूल हुई है। नरेन्द्र मोदी एक राजनीति के सफल खिलाडी है तो राहुल गांधी एक असफल अनाडी। एक वर्ष पहले तक यह स्पष्ट दिख रहा था कि संघ परिवार ओर नरेन्द्र मोदी एक साथ नही रह सकेगे । टकराव अवश्य ही होगा और वह टकराव राहुल गांधी के लिये लाभदायक होगा। किन्तु राहुल गांधी ने जिस तरह अल्पकालिक लाभ के लिये संघ के समक्ष प्रवीण तोगडिया का सहारा लिया उसके कारण संघ और मोदी के बीच की दूरी समाप्त हो गयी। अब राहुल गांधी के सामने यह संकट है कि वे कट्टरवादी हिन्दुत्व और जातिय टकराव को एक साथ कैसे रख पायेगे । संघ ने तो पंद्रह दिन पूर्व मोहन भागवत के भाषण के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि वह नरेन्द्र मोदी के साथ नरम हिन्दुत्व की ओर बढेगे। राहुल गांधी के अलावा अन्य सभी विपक्षी दल भी नरम हिन्दुत्व की ओर जाने को लालायित है। राहुल गांधी मे इतनी समझ नही है कि वे कट्टरपंथी इस्लाम और कट्टरपंथी हिन्दुत्व की दो नावो की सवारी एक साथ कर सके। राहुल को चाहिये था कि वे संघ परिवार और मोदी के बीच की दूरी को हवा दें। किन्तु ऐसा लगता है कि वे चूक गये। मैं अभी भी इस मत का हॅू कि सोनियां गांधी के आगे आकर यह घोषणा कर देनी चाहिये कि अगले पांच वर्ष के लिय किसी भी परिस्थिति मे नेहरू इंदिरा परिवार का कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। शायद यह घोषणा नरेन्द्र मोदी की सफलता मे बाधक बन सके। शायद पांच वर्ष बाद राहुल गांधी का नम्बर आ जाये अन्यथा अधिक सम्भावना यही दिखती है कि राहुल गांधी माया मिले न राम की तरह न गांधी जैसे सम्मानित स्थान पा सकेगे और न ही नेहरू और इंदिरा सरीखे राजनीतिक शक्ति पा सकेगें।

मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 5, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ निश्चित सिद्धान्त है।
1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है।
2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक परिभाषा से जुडी हुई है जबकि संघ परिवार साम्यवाद और इस्लाम संगठनात्मक परिभाषा से ।
3 हिन्दू बहुमत गुण प्रधान धर्म को महत्व देता है तो मुसलमान बहुमत संगठन प्रधान धर्म को।
4 दुनियां मे दो प्रकार के व्यक्ति होते है। 1 प्रेरक 2 प्रेरित। आम तौर पर प्रेरक संचालक होते है और प्रेरित संचालित।
5 दुनियां मे कुल मिलाकर जितने अपराध धर्म के नाम पर होते है उससे कई गुना कम अपराध वास्तविक अपराधियो द्वारा।
6 धर्म की आदर्श परिभाषा संख्या विस्तार मे बाधक होती है और संगठन प्रधान परिभाषा बहुत लाभदायक।
7 गुण प्रधान धर्म राज्य की विचार धारा को प्रभावित करने तक सीमित रहता है जबकि संगठन प्रधान धर्म राज्य की सभी गतिविधियो पर सहभागिता करना चाहता है। मुसलमान इस मामले मे सबसे अधिक सक्रिय रहता है।
8 गुण प्रधान धर्म व्यक्ति के मौलिक अधिकार मानता है संगठन प्रधान धर्म मौलिक अधिकार को अमान्य करके व्यक्ति को सामाजिक अधिकार तक सीमित करता है।
9 संगठित इस्लाम संख्या वृद्धि के लिये सब प्रकार के साधनो का उपयोग करना धर्म समझता है चाहे साधन नैतिक हो या अनैतिक । दुनियां के अन्य धर्मो की तुलना मे मुसलमान इसे पहला दायित्व समझता है।
प्राचीन समय मे गुण प्रधान धर्म को ही एक मात्र मान्यता प्राप्त थी। इस्लाम ने इस मान्यता को बदलकर उसमे संगठन प्रधानता का समावेश कर दिया जो धीरे धीरे बढकर अब मुख्य आधार बन चुका है। इस्लाम का जो समूह जितना अधिक संगठित है वह उतनी ही अधिक तेज गति से विस्तार कर रहा है। यह संगठित समूह सबसे पहले राज्य पर नियंत्रण करने का प्रयास करता है। इन समूहो मे वर्तमान समय मे सुन्नी समुदाय सबसे आगे है जबकि सुफी गुण प्रधान होने के कारण सबसे कमजोर। गुण प्रधान इस्लाम 5 शिक्षाओ को ज्यादा महत्व देता है। एकेश्वर वाद, रोजा, नमाज, जकात, हज। संगठन प्रधान इस्लाम संख्या विस्तार बहु विवाह राज्य व्यवस्था पर अंकुश तथा हिंसा पर अधिक विश्वास करता है। गुण प्रधान इस्लाम भिन्न विचार धाराओ का भी सम्मान करता हैं तो संगठन प्रधान इस्लाम किसी अन्य के अस्तित्व को ही स्वीकृति नही देता। गुण प्रधान सहजीवन को महत्व देता है। संगठन प्रधान इस्लाम एकला चलो की नीति पर विश्वास करता है।
यदि हम संगठन प्रधान धर्म की उत्पत्ति पर विचार करे तो वह किसी व्यक्ति तथा किसी ग्रंथ पर अंतिम विश्वास के साथ शुरू होती है। धीरे धीरे संगठन विस्तार करता है और जब निरंतर विस्तार करता रहता है तब कुछ सौ वर्षो मे वह संगठन संप्रदाय का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। जब संप्रदाय भी कुछ सौ वर्षो तक बढता जाता है तब वह धीरे धीरे अपने को धर्म कहने लग जाता है। इस्लाम के साथ भी यही हुआ और अन्य संगठन प्रधान धर्मो के साथ भी। धीरे धीरे जैन बौद्ध और सिख भी विस्तार के साथ साथ धर्म बनते चले गये। आर्य समाज धर्म बनने मे पिछड गया तो संघ परिवार निरंतर विस्तार पर है। संगठन सफलता की सीढिया चढकर अपने को धर्म घोषित कर देता है जबकि वर्तमान समय मे हिन्दुत्व को छोडकर कोइ्र भी अन्य अपने को धर्म कहने का हकदार नही है क्योकि अन्य एक महापूरूष तथा एक ग्रन्थ को अंतिम सत्य मानते है और दूूसरो के अस्तित्व नही मानते जबकि हिन्दू इसके ठीक विपरीत है। इस तरह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व जीवन पद्धति है संगठन नही। हिन्दू संगठनो का समूह कहा जा सकता है ।
वर्तमान समय मे इस्लाम संगठन शक्ति के आधार पर जितनी तेज गति से आगे बढा उतनी ही तेज गति से बदनाम भी हुआ। मुसलमान और उसका एक मात्र धर्म ग्रन्थ कुरान प्रेरक है तो मुसलमान प्रेरित । कुरान मे ही गुण प्रधान धर्म की शिक्षाओ का भी विस्तृत विवरण है तो कुरान मे ही संगठन प्रधान धर्म को भी पूरी मान्यता दी गई है। मुसलमान जिस दिशा मे जाना चाहता है उस दिशा मे जाने की पूरी शिक्षाए कुरान मे उपलंब्ध है। मुसलमान आम तौर पर भावना प्रधान होता है, प्रेरित होता है, धर्म भीरू होता है और इमानदार होता है। मुसलमान संगठनात्मक विस्तार के लिये जो भी हिंसा और अपराध करता है उसकी प्रेरणा भी उसे कुरान से ही प्राप्त होती है। इसका अर्थ हुआ कि दुनियां मे मुसलमना यदि एक गंभीर समस्या के रूप मे स्थापित हो रहा है तो उसका कारण धर्म ग्रंथ कुरान है और उसके प्रमुख धर्म गुरू कुरान के उस खतरनाक अंश को मुसलमानो तक ज्यादा प्रयास करके पहुचाते है। कुरान मे चार शादी करने को अच्छा नही माना गया है। इसका अर्थ हुआ कि मुसलमान यदि चार से अधिक शादी करता है तब वह पतित होगा चार से कम मे नही। यदि कोई सरकार यह नियम बना ले कि उसके देश का मुसलमान एक से अधिक विवाह नही करेगा तो मुल्ले मौलवी इसे धर्म के विरूद्ध प्रचारित करते है क्योकि यह संख्या विस्तार के विरूद्ध जाता है जबकि कुरान ऐसा नही कहता। गोमांस भक्षण भी मुसलमान के लिये आवश्यक नही है। इस तरह अनेक ऐसे मामले है जो संगठन प्रधान इस्लाम के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाते है और उस प्रतिष्ठा के लिये कही न कही कुरान की आयते खोज ली जाती है जिस पर सभी मुसलमानो की गहरी आस्था है।
समस्या बहुत जटिल है क्योकि मुसलमान प्रेरित है और इस्लाम प्रेरक । प्रेरक कभी अपराध नही करता क्योकि प्रेरक तो सिर्फ प्रेरणा देने तक सीमित रहता है। प्रत्यक्ष क्रिया मे उसकी कोई भूमिका नही होती। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति मे दुनियां के निशाने पर मुसलमान ही होते है जो अपने धर्म गुरूओ और धर्म ग्रंथो की प्रेरणा से प्रभावित होकर समस्याए पैदा करते है। जबकि वास्तविक दोष धर्म ग्रंथो और धर्म गुरूओ का होता है। समाज के पास इसका कोई विकल्प नही दिखता क्योकि धर्म ग्रंथ मुसलमानो के लिये अंतिम सत्य है और वह उससे भिन्न कोई आचरण नही कर सकता । दुसरी ओर धर्म ग्रंथो मे किसी प्रकार का बदलाव संभव नही है। इसलिये समाधान बहुत सोच समझकर योजना बद्ध तरीके से करना होगा। मुसलमानो को धीरे धीरे व्यवहार के माध्यम से समझा बुझा कर धार्मिक दिशा मे मोडना होगा जिससे वे अपने संगठनात्मक ढाचे से दूरी बनावे । दूसरी ओर संगठनात्मक इस्लाम के साथ कुछ कठोर व्यवहार उचित होगा । वर्तमान समय मे संघ परिवार ने राष्टीय मुस्लिम मंच के नाम से जो नई पहल शुरू की है उसे और अधिक विस्तार दिये जाने की आवश्यकता हैं। यह पहल मुसलमानो के सहजीवन के साथ जुडने की प्रेरणा देगी। इस पहल से मुसलमान संगठन प्रधान इस्लाम से कुछ दुरी बना सकेगा और भारत दुनियां की इस खतरनाक प्रवृत्ति को बचने की पहल कर सकेगा। मेरा ऐसा मत है कि इस समय विशेष परिस्थिति मानकर तथा सब प्रकार के भेद भाव भूलकर राष्टीय मुस्लिम मंच का तेजी से विस्तार करना चाहिये।

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