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ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि
दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार ............................................................. 1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर ज...
मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि
धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्त...
मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि
दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्ल...
मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इका...
मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि
ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है...
मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्व...
मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि
आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्...
मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि
आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यव...
मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...
मंथन क्रमांक 129 ’’विचार और चिंतन” का फर्क–बजरंग मुनि
विचार और चिंतन एक दूसरे के पूरक हैं। विचार निष्कर्ष है और चिंतन निष्कर्ष तक पहुॅचने का मार्ग। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निरंतर नये नये विचार तथा समस्याएं आती रहती हैं। व्यक्ति चिंतन मनन क...

मंथन क्रमांकः116 “#मानवाधिकार”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 29, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1. व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है 1. प्राकृतिक अथवा मौलिक 2. संवैधानिक 3. सामाजिक। मौलिक अधिकारो को ही प्राकृतिक अथवा मानवाधिकार भी कहा जा सकता है;
2. मानवाधिकार सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर सृष्टि के समापन तक स्थिर होते है। उनमें कभी कोई बदलाव नहीं आता;
3. मानवाधिकार का उल्लंघन अपराध, संवैधानिक अधिकारो का उल्लंघन गैरकानूनी तथा सामाजिक अधिकारो का उल्लंघन अनैतिक माना जाता है;
4. प्रत्येक व्यक्ति के मानवाधिकारो की सुरक्षा समाज का दायित्व होता है, स्वैच्छिक कर्तव्य मात्र नहीं;
5. प्रत्येक व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार है। कोई भी अन्य इस स्वतंत्रता की सीमा नहीं बना सकता;
6. प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक व्यवस्था में सहभागी होना उसके लिये बाध्यकारी है। सामाजिक व्यवस्था के समक्ष सम्पूर्ण समपर्ण उसकी मजबूरी है;
7. परिवार सामाजिक व्यवस्था की प्रथम तथा विश्व समाज व्यवस्था की अंतिम इकाई है। प्रत्येक व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता प्राप्त है जो उसे अपनी स्वेच्छा से परिवार के साथ जोडनी आवश्यक है;
8. मानवाधिकार व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता है और सहजीवन उसके अधिकारों का पूर्ण समर्पण। सहजीवन प्रत्येक व्यक्ति के लिये बाध्यकारी है, स्वैच्छिक नहीं;
9. दुनियां में किसी भी व्यक्ति के लिये अकेला रहना न संभव है न उचित। यदि कोई व्यक्ति दूसरो की सुरक्षा में भागीदार नही बनना चाहता तो कोई अन्य उसकी सुरक्षा की गांरटी क्यो लेगा;
10. व्यक्ति का सिर्फ एक ही प्राकृतिक अधिकार होता है असीम स्वतंत्रता तथा एक दायित्व होता है सहजीवन। स्वतंत्रता के चार भाग है 1. जीवन की 2. अभिव्यक्ति की 3. सम्पत्ति की 4. स्वनिर्णय की। सहजीवन के तीन भाग है 1. पारिवारिक 2. स्थानीय 3. राष्ट्रीय।
11. किसी भी इकाई में सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी व्यक्ति की ईकाई से अलग होने की स्वतंत्रता हमेशा सुरक्षित रहती है। किसी भी परिस्थिति में किसी समझौते के अंतर्गत संबंध विच्छेद की स्वतंत्रता में कटौती नही की जा सकती;
12. परिवार, गांव, राष्ट्र आदि इकाईयां समाज व्यवस्था की ईकाईयां मानी जाती है। किसी भी व्यक्ति की उसकी सहमति के बिना राज्य भी अपने साथ जुडकर रहने के लिये बाध्य नहीं कर सकता;
13. कोई भी संविधान व्यक्ति को मौलिक अधिकार न दे सकता है और न ले सकता है। संविधान उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गांरटी मात्र देता है। चाहे संविधान परिवार का हो स्थानीय हो अथवा राष्ट्रीय।
14. प्रत्येक व्यक्ति के मानवाधिकारों की सुरक्षा समाज व्यवस्था का दायित्व है। मनमाने तरीके से बने मानवाधिकार संगठन विष्व में और विशेषकर भारत में मानवाधिकार के नाम पर दुकानदारी चलाते है। उनका मानवाधिकार से कोई संबंध नहीं है;
15. सभी मानवाधिकार संगठनों का भारत में रिकार्ड बहुत खराब है। इन्हें निरूत्साहित करना चाहिये;
16. सिर्फ मनुष्य को ही मानवाधिकार प्राप्त हैं, पशु, पक्षी, पेड-पौधों को यह अधिकार प्राप्त नही है;
17. समाज संपूर्ण विश्व का एक होता है। समाज राष्ट्रों या समूहों का संघ नहीं हो सकता। समाज सिर्फ व्यक्तियों का समूह होता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकार समान होते है;
18. व्यक्ति चाहे कितना भी अधिक शक्तिशाली क्यों न हो, व्यवस्था हमेशा उसके उपर होती है। दुर्भाग्य से व्यवस्था के उपर व्यक्ति बनाये जा रहे है जो गलत है;
19. दुनियां में यह भ्रम फैला हुआ है कि राष्ट्र सम्प्रभुता सम्पन्न इकाई है जो मौलिक अधिकारों में फेरबदल कर सकती है। यह भ्रम दूर होना चाहिये;
20. इस्लाम और साम्यवाद घोषित रूप से मौलिक अधिकारों को अस्वीकार करते है। इस्लाम और साम्यवाद का अस्तित्व समाज के लिये सबसे बडा संकट है। पूरी दुनियां को चाहिये कि इन दो विचारधारा के लोगों को या तो सामाजिक व्यवस्था मानने के लिये सहमत करे या बाध्य करे;
21. मानवाधिकार की सुरक्षा के लिये सबसे पहला काम इस्लामिक तथा साम्यवादी विचारों पर दबाव बनाना है;
22. कोई बडे से बडा अपराधी भी समाज व्यवस्था की सहभागिता से वंचित नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि किसी दण्ड प्राप्त अपराधी को भी किसी कानून के अंतर्गत संसद की सहभागिता से तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक संसद संविधान संशोधन की अन्तिम अधिकार प्राप्त इकाई है;
23. समानता की सिर्फ एक परिभाषा होती है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान स्वतंत्रता। इसके अतिरिक्त समानता की सारी परिभाषायें असमानता पैदा करती है। समानता के नाम पर असमानता पैदा करके वर्ग विद्वेष बढाना राजनीति का मुख्य आधार है।

वैसे तो सारी दुनियां में मानवाधिकार के विषय में स्पष्ट धारणा का भाव है किन्तु भारत में यह अभाव बहुत व्यापक है। आमतौर पर यह धारणा बनी हुयी है कि संविधान मौलिक अधिकार देता भी है और ले भी सकता है। आम लोग कहते हैं कि संसद को संविधान संशोधन के असीम अधिकार होने चाहिये और अपराधियों को संसद प्रवेश से वंचित किया जाना चाहिये। अच्छे-अच्छे विद्वान भी यह बात ठीक से नही समझ पाते है कि व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार क्या है जिनमें उसकी सहमति के बिना कोई कटौती नहीं हो सकती। अनेक नासमझ तो राष्ट्र को अंतिम इकाई मान लेते है तथा समाज को राष्ट्र से नीचे सिद्ध करते रहते है। कई नासमझ तो व्यक्ति की अभिव्यक्ति की अथवा सम्पत्ति की अधिकतम सीमा भी बनवाने का प्रयास करते रहते है जबकि अभिव्यक्ति अथवा सम्पत्ति की कोई सीमा या तो व्यक्ति स्वयं की मर्जी से बना सकता है अथवा विश्व समाज की व्यवस्था से। वैसे तो किसी व्यक्ति को दंड देना भी विश्व व्यवस्था के कानूनों के अंतर्गत ही होना चाहिये। इसी व्यवस्था के अन्तर्गत दुनियां के साथ साथ भारत भी न्यायपालिका का यह दायित्व है कि वह किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के विरूद्ध किये गये किसी संविधान संशोधन को रद्द कर दे। मुस्लिम और साम्यवादी देशो को छोडकर दुनियां भर के न्यायालय इस दायित्व से बंधे है। यही कारण है कि इस्लामिक साम्यवादी विचारधारा दुनियां के मानवाधिकार के लिये सबसे बडा खतरा है। सबसे पहले इस विचारधारा से निपटना चाहिये।

यह बात भी विचारणीय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी अन्य के साथ सहजीवन षुरू करना उसकी बाध्यता है, स्वतंत्रता नही। कोई व्यक्ति इस बाध्यता से इंकार नही कर सकता। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की सुरक्षा में भागीदारी नहीं कर सकता है तो समाज उसकी स्वतंत्रता की गांरटी क्यो दे। इसलिये यह धारणा भी गलत है कि व्यक्ति अकेला रह सकता है। यह धारणा भी गलत है कि व्यक्ति के मौलिक अधिकार समय समय पर कम ज्यादा होते रहे है। मेरे विचार से सृष्टि के प्रारम्भ से अंत तक मानवाधिकार समान है। भारत में मानवाधिकार के नाम पर ब्लेकमेल करने वालो की बाढ सी आयी हुयी है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों के पक्ष में खडा होना तथा राज्य को कटघरे में खडा करना एक प्रकार का व्यवसाय बन गया है। इस तरह के व्यवसायियों से भी समाज को मुक्त करना चाहिये। जिस तरह समाज में एकात्ममानववाद के नाम पर किसी विचारधारा को प्रश्रय दिया जा रहा है उससे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि एकात्ममानववाद के साथ-साथ सर्वात्ममानववाद की चर्चा आगे बढायी जाये जिस पर अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सर्वात्ममानववाद अधिक महत्वपूर्ण है।

मानवाधिकार संरक्षण तथा सहजीवन का तालमेल आवष्यक है। इसके लिये हमें कुछ कदम उठाने चाहिये।
1. विश्व संविधान बनना चाहिये जिसके निर्माण में दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की बराबर भूमिका हो;
2. भारत के संविधान में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होनी चाहिये;
3. परिवार और गांव व्यवस्था को स्वतंत्र अधिकार दिये जाने चाहिये जिससे कोई भी व्यक्ति स्वतंत्रता पूर्वक परिवार से निकल सके। इसी तरह राष्ट्रीय व्यवस्था को भी यह स्वीकार करना चाहिये कि कोई भी व्यक्ति कभी भी देष छोडकर तब तक जा सकता है जबतक उसने कोई अपराध नहीं किया हैं।
भारत सरकार को यह स्वीकार करना चाहिये कि वह इस्लामिक या साम्यवादी व्यवस्था का अंग न होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंग है। उसे लोकतांत्रिक विश्व का पूरा पूरा सम्मान और सहभागिता करनी चाहिये। मानवाधिकार संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का महत्वपूर्ण दायित्व है और इस दायित्व को हम सबको पूरा करना चाहिये।

मंथन क्रमाँक-115 ’’ज्ञान, बुद्धि, श्रम और शिक्षा’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 17, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

1. ज्ञान और शिक्षा अलग-अलग होते है। ज्ञान स्वयं का अनुभवजन्य निष्कर्ष होता है तो शिक्षा किसी अन्य द्वारा प्राप्त होती है;
2. ज्ञान निरंतर घट रहा है और शिक्षा लगातार बढ रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी शिक्षा लगभग चार गुनी बढी है तो ज्ञान उसी मात्रा में कम हो गया है;
3. बुद्धि और विवेक में बहुत फर्क होता है। विवेक निष्कर्ष निकालता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं। बुद्धि निष्कर्ष के आधार पर कार्य पूरा करने का माग तलाशती है;
4. विवेक और ज्ञान भी अलग-अलग होते है। ज्ञान सब प्रकार अच्छे-बुरे कार्याे के लाभहानि के अनुभव तक सीमित होता है तो विवेक करने योग्य और न करने योग्य कार्यो को अलग कर देता है;
5. शिक्षा हमेशा व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का विस्तार करती है चाहे व्यक्ति ज्ञान की दिशा में हो अथवा आपराधिक कार्यो में लिप्त हो। शिक्षा कभी चरित्र निर्माण का माध्यम नहीं होती, सिर्फ सूचना तक सीमित होती है;
6. हर बुद्धिजीवी समाज के समक्ष यह सिद्ध करता है कि शिक्षा का चरित्र निर्माण पर प्रभाव पडता है किन्तु यह बात गलत है;
7. शिक्षा पूरी तरह शासन मुक्त होनी चाहिये। शिक्षा पर सरकार को किसी प्रकार का कोई धन खर्च नहीं करना चाहिये क्योंकि शिक्षा अच्छे और बुरे दोनों की क्षमता के विस्तार में भेद नहीं करती;
8. ज्ञान के तीन स्रोत होते हैः-1. जन्म पूर्व के संस्कार 2. पारिवारिक वातावरण 3. सामाजिक परिवेश। परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था को कमजोर करने के कारण पूरी दुनियां में और विशेषकर भारत में ज्ञान तेजी से घट रहा है;
9. पिछले कुछ हजार वर्षो से बुद्धिजीवियों ने भारत में श्रम शोषण के अनेक तरीके खोजे है। स्वतंत्रता के पूर्व जाति आरक्षण का सहारा लिया गया तो स्वतंत्रता के बाद शिक्षा विस्तार, जातीय आरक्षण तथा कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण को आधार बनाया गया;
10. ज्ञान हमेशा सकारात्मक दिशा में निष्कर्ष निकालता है तो बुद्धि दोनो दिशाओं में चलायमान रहती है;
11. सरकार हमेशा श्रमजीवियों के पक्ष में दिखती है और रहती है हमेशा बुद्धिजीवियों के पक्ष में। साम्यवादी इस मामले ये सबसे अधिक सक्रिय रहते है बुद्धिजीवियों के पक्ष में और दिखते है श्रमजीवियों के साथ।
12. भीमराव अम्बेडकर की सभी नीतियां श्रमजीवियों के विरूद्ध और बुद्धिजीवियों के पक्ष में रही। आज भारत का हर अवर्ण या सवर्ण बुद्धिजीवी अम्बेडकर जी का प्रशंसक है;
13. भारत की सम्पूर्ण अर्थनीति गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी उत्पादकों के विरूद्ध पूंजीपति, शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्ताओं के पक्ष में कार्य करती है;
14. शिक्षा को योग्यता और कार्यक्षमता विस्तार के माध्यम तक सीमित होना चाहिये था किन्तु भारत में शिक्षा योग्यता की जगह रोजगार के अवसर का माध्यम बन गयी है;
15. वर्तमान समय में बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम के विरूद्ध किये जाने वाला षडयंत्र एक बहुत बडा अन्याय है। इसे प्राथमिकता के आधार पर समाधान की आवश्यकता है;
16. गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी तथा उत्पादको को न्याय मांगने या न्याय के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा देना असामाजिक कार्य माना जाना चाहिये। क्योंकि इससे वर्ग विद्वेष बढता है।
17. पूंजीपति, शहरी, बुद्धिजीवी तथा उपभोक्ताओं को शोषितों की सहायता के लिये प्रेरित करना, सामाजिक कार्य होगा। तात्कालिक रूप से सरकार को समझाना या मजबूर करना चाहिये;
18. भारत में अविकसित, अशिक्षित क्षेत्रों के निवासियों की तुलना में विकसित तथा शिक्षित क्षेत्रों के निवासियों में ज्ञान विवेक और नैतिकता का अधिक पतन हुआ है।

सम्पूर्ण समाज में स्वार्थ, हिंसा तथा अनैतिकता का विस्तार हो रहा है। शिक्षा व्यक्ति की क्षमता का विकास करती है। नैतिकता मात्र का नहीं। एक ही गुरू से एक साथ एक ही प्रकार की शिक्षा लेने वाले तो शिक्षार्थीयों में एक युधिष्ठिर तथा दूसरा दुर्योधन बन जाता है। स्पष्ट है कि शिक्षा का चरित्र निर्माण से कोई संबंध नहीं। यही कारण है कि ज्यों-ज्यों भारत में शिक्षा का तेज गति से विस्तार हो रहा है उतनी ही तेज गति से स्वार्थ, हिंसा तथा अनैतिकता भी बढ रही है। दोनों का कोई संबंध नहीं है। आवश्यक नहीं कि चरित्र पतन के विस्तार में शिक्षा की कोई भूमिका रही होे किन्तु चरित्र पतन बढने के साथ साथ यदि शिक्षा का विस्तार होता है तो चरित्र पतन की भी गति बढ जाती है। क्योंकि शिक्षा का विस्तार पतित चरित्र को अधिक प्रभावशाली बनाता है। भारत में यही हो रहा है।

जातीय आरक्षण के माध्यम से स्वतंत्रता के पूर्व सफलता पूर्वक श्रम शोषण किया जाता था। स्वतंत्रता के बाद अम्बेडकर जी ने सवर्ण अवर्ण बुद्धिजीवियों का जातीय आरक्षण के माध्यम से समझौता कराकर श्रम शोषण जारी रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। साम्यवादियों ने कृत्रिम उर्जा को सस्ता रखने का दबाव बनाकर श्रमशोषण का एक और आधार बना दिया। सशक्त बुद्धिजीवियों ने सरकार पर दबाव डालकर शिक्षा का बजट बढवाया। यहाॅ तक कि बुद्धिजीवियों ने गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी एवं उत्पादकों की भी कोई परवाह नही की और उनके उत्पादन, उपभोग की वस्तुओं पर भारी कर लगा कर अपना वेतन, सुविधा, शिक्षा का बजट बढवाते रहे। निरंतर हो रही किसान आत्महत्या तथा उपभोक्ता वस्तुओं का लगातार सस्ता होना यह प्रमाणित करता है कि बुद्धिजीवियों का षडयंत्र सफल हो रहा है। साम्यवादियों ने बडी बेशर्मी से गरीब तबके को यह विश्वास दिलाया कि कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण तथा शिक्षा का विस्तार ही उनके हित में है। बेचारे नैतिकता प्रधान गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, उत्पादक इन चालाक संगठित बुद्धिजीवियों पर विश्वास करके ठगे गये।

मैं मानता हूॅ कि बडी संख्या में बुद्धिजीवी यह जानते ही नहीं कि वे श्रमजीवियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। वे भी यह समझते हैं कि सरकार की यह शिक्षा विस्तार, कृत्रिम उर्जा नीति श्रमिकों के हित में है। बडी संख्या में बुद्धिजीवी जानबूझकर ऐसा नहीं करते। यदि उन्हे यह पता चले कि वे अन्याय कर रहे हैं तो अनेक बुद्धिजीवी भी इसका समर्थन छोड देगे किन्तु उन्हें बताने वाला चाहिये। यह सच्चाई गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, उत्पादकों को बताना भी घातक है क्योंकि पहली बात तो यह है कि उन्हे संगठित गिरोहो ने भरपूर विश्वास दिला रखा है दूसरी बात यह भी है कि इससे वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष का खतरा बढ जायेगा। इसलिये बुद्धिजीवियों को ही सच्चाई बताने की जरूरत है। बडी संख्या में बुद्धिजीवी इस अनैतिकता को समझेगे और श्रम शोषण के विरूद्ध आपका साथ देंगे।

समस्या बहुत विकराल भी है और जटिल भी। समस्या विश्वव्यापी होते हुये भी भारत में बहुत बढी हुई है। इसके समाधान के लिये चौतरफा प्रयास करने होगे। शुरूआत सरकार पर दबाव बनाने से हो सकती है। 1. ज्ञान वृद्धि के लिये परिवार गांव और समाज व्यवस्था को अधिक निर्णय के अधिकार दिये जाने चाहिये क्योेंकि ज्ञान के विस्तार में यही प्रमुख सहायक होते है; 2. शिक्षा को पूरी तरह स्वावलम्बी और शासन मुक्त होना चाहियें। शिक्षा पर होने वाला खर्च तथा उसकी नीति समाज संचालित होनी चाहिये, राज्य संचालित नहीं। 3. श्रम और बुद्धि के बीच वर्तमान आर्थिक असंतुलन बंद होना चाहिये। गरीब, ग्रामीण श्रमजीवी तथा उत्पादकों के उत्पादन और उपभोग की सभी वस्तुएं कर मुक्त होनी चाहियें। 4. पूंजीपतियों, शहरी आबादी बुद्धिजीवी तथा उपभोक्ताओं को किसी भी प्रकार की आर्थिक सुविधा बंद की जानी चाहिये। रोजगार को श्रम के साथ जोडा जाना चाहिये और बौद्धिक रोजगार को बाजार पर स्वतंत्र कर देना चाहिये।

मेरा यह स्पष्ट मत है कि ज्ञान का घटना एक बहुत ही बडी समस्या है। इसके साथ ही श्रम के साथ अन्याय भी एक बडी समस्या के साथ साथ अमानवीय कार्य भी है। इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

मंथन क्रमांक-114 ’’ईश्वर का अस्तित्व’’–बजरंग मुनि

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कुछ निष्कर्ष है-
1. ईश्वर है, किन्तु यदि नहीं भी हो तो एक ईश्वर मान लेना चाहिए;
2. ईश्वर और भगवान अलग-अलग होते है। धर्म दोनों को अलग-अलग मानता है और सम्प्रदाय एक कर देता है;
3. ईश्वर एक अदृश्य शक्ति के रूप में होता है और भगवान प्रेरणादायक महापुरूष के रूप मे;
4. अदृश्य भय व्यक्ति को गलत करने से रोकता है और दृश्य भय, ब्लैकमेल भी कर सकता है। ईश्वर अदृश्य भय होने के कारण बहुत उपयोगी होता है;
5. ईश्वर का भय कम होते जाने के कारण मार्क्स ने अ दृश्य भय के लिए नया तरीका खोजा था। मार्क्स की नीयत ठीक थी, तरीका गलत था। मार्क्स ने व्यवस्था की तुलना में व्यक्ति पर अधिक विश्वास करने की भूल की।
6. दर्शन और धर्म अलग-अलग होते है और दोनों का समन्वय समाज के लिए उपयोगी है। दार्शनिक समझता है कि ईश्वर नहीं होता है किन्तु समाज को समझाता है कि ईश्वर है क्योंकि समाज के ठीक-ठीक संचालन के लिए ईश्वरीय सत्ता का अस्तित्व मानना आवश्यक होता है;
7. ईश्वर निराकार होता है और भगवान साकार होते हैं। ईश्वर की मुर्ति नहीं होती, भगवान की होती है। रामकृष्ण भगवान माने जाते है, ईश्वर नहीं;
8. ईश्वर एक है। हिन्दू हो या ईसाई मुसलमान, नाम या भाषा के आधार पर अलग-अलग हो सकते है;
9. मूर्ति पूजा दार्शनिकों के लिए निरर्थक है और सामान्य व्यक्तियों के लिए सार्थक। वैसे भी मूर्ति पूजा निरर्थक कार्य हो सकती है किन्तु समाज विरोधी कार्य नहीं। इसलिए मूर्ति पूजा का विरोध करना निरर्थक कार्य माना जाता है;
10. ईश्वर के प्रति विश्वास होना चाहिये और महापुरूष के प्रति श्रद्धा। अदृश्य के प्रति विश्वास और दृश्य के प्रति श्रद्धा होती है। महापुरूषों की मूर्तियां दृश्य मानी जाती है।
इस प्रकार की बहस में कभी नहीं पडना चाहिये कि ईश्वर है कि नहीं क्योंकि ईश्वर काल्पनिक है और प्रकृति वास्तविक।
11. जब किसी का अस्तित्व कल्पना से भी बाहर हो जाता है तब उसे ईश्वर मान लेना चाहिए। ब्रह्मांड का विस्तार कल्पना से भी अधिक दूर है और ब्रह्मांड की सूक्ष्मता भी कल्पना से बाहर है। इसलिए ईश्वर को मान लेना उचित होता है;
12. जो लोग नास्तिक होते है वे सत्य जानते है कि ईश्वर नहीं होता। किन्तु वे समाज व्यवस्था के ठीक संचालन के लिए ईश्वर की आवश्यकता है ऐसा न मानकर भूल करते है।
13. भारतीय वर्ण व्यवस्था में ईश्वर को मानने और न मानने का एक बहुत अच्छा संतुलन है। अधिकांश विद्वान ईश्वर को नहीं मानते किन्तु अन्य तीन वर्णो को ईश्वर पर विश्वास कराने का पूरा प्रयत्न करते है।

मैंने भी ईश्वर के अस्तित्व पर अपने पूरे जीवन काल में बहुत सोचा समझा। जिस तरह प्रकृति किसी व्यवस्था के आधार पर किसी बने बनाये नियम के अनुसार चलती है उससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर है। मनुष्य का शरीर भी जितनी जटिल प्रक्रिया से बना है उससे आभास होता है कि उसका बनाने वाला कोई अवष्य होगा। किन्तु साथ ही यह प्रश्न भी खडा होता है कि यदि मानव शरीर और प्रकृति को किसी ने बनाया है तो उस बनाने वाले को किसने बनाया? मैं कभी इन दोनों प्रश्नों का उत्तर नही खोज सका। इसलिए मैं इस निष्कर्ष पर पहुॅचा हूॅ कि चाहे ईश्वर हो या न हो किन्तु हमें ईश्वर के अस्तित्व को मान लेना चाहिये। मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी कुछ ऐसी घटनाये घटी जिनके आधार पर मैंने यह माना कि किसी अदृश्य शक्ति द्वारा मेरी सहायता की जा रही है। उन घटनाओं ने भी मुझे ईश्वर का अस्तित्व मानने के लिए मजबूर किया। मुझे यह पूरा विश्वास है कि मूर्तियॉ या मूर्तियों में कोई अलग से ईश्वर नहीं है किन्तु मैं मूर्ति पूजा पर पूरी तरह अविश्वास करते हुए भी मूर्ति पूजा का विरोध नहीं करता क्योंकि कुछ वर्षो तक आर्य समाज में सक्रिय रहने के बाद मैंने यह महसूस किया कि मेरी तर्क शक्ति बहुत तेजी से बढ रही है और श्रद्धा घट रही है। अर्थात मैं धीरे-धीरे नास्तिकता की ओर बढ रहा हूॅ। कर्मकांड तो छूट गया किन्तु यज्ञ पर विश्वास बढने की अपेक्षा यज्ञ भी औपचारिक होने लगा। इसलिए मैंने उचित समझा कि मूर्ति पूजा का विरोध करना अकर्म है, आवश्यक नहीं, उचित भी नहीं। मुझे पूरा विश्वास है कि स्वामी दयानंद ठीक समझते थे कि ईश्वर निराकार है, मूर्ति पूजा निरर्थक है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में समाज के ठीक-ठीक संचालन के लिए मूर्तियां भय पैदा करती है तो जब तक उसका अच्छा विकल्प न बने तब तक उसका विरोध नहीं करना चाहिए। मार्क्स ने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करके राज्य को तैयार करने का प्रयास किया था। उनका मानना था कि राज्य को एक ऐसी अदृश्य शक्ति के रूप में खडा किया जाये जो धीरे-धीरे अपने आप अदृश्य हो जाये और समाज उस अदृश्य शक्ति से भयभीत होकर ठीक चलता रहे। इसलिए मार्क्स ने कहा था कि मार्क्सवाद का चरम उत्कर्ष होगा जब राज्य पूरी तरह अदृश्य हो जायेगा। स्टेट शैल विदर अवे। दुर्भाग्य से वह राज्य अदृश्य होकर समाज को काल्पनिक भय से संचालित करने के ठीक विपरीत दृश्य भय के रूप में गुलाम बनाकर रखने लगा अर्थात साम्यवाद अदृश्य शक्ति की जगह तानाशाही में बदल गया और यह स्पष्ट है कि साम्यवाद दुनियां में सबसे बुरी व्यवस्था है। साम्यवाद ने सारी दुनियां में अव्यवस्था पैदा की और अब धीरे-धीरे साम्यवाद से पिंड छूट रहा है अर्थात साम्यवाद प्रभावित देशो में भी ईश्वर को मानने वालों की संख्या बढ़ रही है।

ईश्वर को मानने वाले ईश्वर को एक शक्ति के रूप में मानते है, किसी व्यक्ति या जीव के रूप में नहीं, चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान।, ईसाई मुसलमान भी खुदा और पैगम्बर को अलग-अलग मानते है तो ईसाई भी गॉड और यीशू को एक नहीं मानते है। स्पष्ट है कि महापुरूष धीरे-धीरे भगवान कहे जाते है। ऐसे ही भगवानों में बुद्ध, महावीर और राम कृष्ण भी हुये। अब तो कुछ लोग साई बाबा को भी उस दिशा में आगे बढा रहे है। वैसे तो रजनीश को भी भगवान कहना शुरू कर दिया गया था किन्तु इन सबको भगवान मानने की एक सीमा है। उन्हें ईश्वर नहीं माना जाता है। यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप से समाज में भय पैदा करने के लिए कुछ ऐसी काल्पनिक दंत कथाएं जोड दी जाती है जो इन महापुरूषो की लौकिक घटनाओं को अलौकिक सिद्ध कर देती है। हो सकता है कि कुछ घटनाएं वास्तविक भी हो किन्तु अधिकांश घटनाएं काल्पनिक और कहानियों के रूप में होती है। इसलिए हमें चाहिए कि यदि कोई घटना तर्क संगत नहीं है तो किसी महापुरूष को स्थापित करने के लिए हमें उस घटना का उपयोग नहीं करना चाहिए। साथ ही हमें ऐसी काल्पनिक घटनाओं का विरोध करने में भी शक्ति नहीं लगानी चाहिए क्योंकि हम स्पष्ट नहीं है कि घटना असत्य ही है और यह भी साफ नहीं है कि उस काल्पनिक घटना का समाज में बुरा प्रभाव पडेगा ही। मैं देखता हूॅ कि अनेक लोग अपना सारा काम छोडकर अंध विश्वास निवारण को अपना व्यवसाय बना लेते है। मैं इसे ठीक नहीं मानता। अंध विश्वास दूर होना चाहिए यह सही है किन्तु यह प्रयत्न दुधारी तलवार के समान है जिसका लाभ भीं हो सकता है और नुकसान भी। मैंने स्वयं अपने परिवार और सीमित मित्रों के बीच अंध विश्वास दूर करने का पूरा प्रयास किया किन्तु मैं देख रहा हूॅ कि अंध विश्वास कम होते-होते ईश्वर के प्रति विश्वास भी कम होता जा रहा है।

ईश्वर का अस्तित्व तर्क का विषय न होकर श्रद्धा और विश्वास का है। हमारा प्राचीन विश्वास रहा है कि ईश्वर है। पहले मुसलमानों और बाद में अंग्रेजों की गुलामी ने हमारी प्राचीन विद्वत्ता और वैज्ञानिक क्षमता पर संदेह पैदा करके यह समझाया कि भारत प्राचीन समय में वैज्ञानिक आधार पर बहुत पिछडा था। यहां तक झूठ समझाया गया कि आर्य विदेशो से आये और आदिवासी यहां के मूलनिवासी थे। स्वतंत्रता के बाद हम भौतिक गुलामी से मुक्त होकर साम्यवाद समाजवाद की वैचारिक गुलामी से जकड गये। परिणाम हुआ कि हमारी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियां और अधिक संदेह के घेरे में आ गयीं। हर पढा, लिखा भारतीय यह समझने लगा कि जो कुछ प्राचीन था वह अधिकांश अंधविश्वास था। मैं इससे सहमत नहीं। मैं समझता हूॅ कि प्राचीन समय की कुछ मान्यताएं अंधविश्वास हो सकती हैं तो कुछ वैज्ञानिक आधार पर भविष्य में प्रमाणित भी हो सकती हैं। हमारी पुरानी मान्यता ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करती है और जब तक यह पूरी तरह प्रमाणित न हो जाये कि ईश्वर नहीं था, न है, तब तक यदि कोई ईश्वर को मानता है तो गलत नहीं। मेरा सुझाव है कि हम ईश्वर भूत प्रेत तंत्र मंत्र पूजा के अस्तित्व को माने या न माने यह हमारी स्वतंत्रता है किन्तु इन मान्यताओं का खुलकर विरोध करना भी उचित नहीं, जब तक कोई मान्यता पूरी तरह अंध विश्वास और समाज के लिए घातक सिद्ध न हो जाये। मेरा तो ईश्वर पर विश्वास है किन्तु यदि किसी को नहीं है तो यह उसका व्यक्तिगत विश्वास है। मैं उसे अपना विश्वास बता सकता हॅू किन्तु उसे सहमत करने का प्रयत्न उचित नहीं क्योंकि ईश्वर तर्क का विषय न होकर श्रद्धा विश्वास तक सीमित है।

मैं हरि अनंत हरि कथा अनंता पर विश्वास करता हूॅ। ईश्वर की चर्चा भी अनंत काल से चलती रही है और चलती रहेगी। उसी कडी में मैं भी इस चर्चा में शामिल हुआ हूॅ और आपसे भी अपेक्षा करता हूॅ कि आप इस संबंध में अपने विचार देकर इस चर्चा को आगे बढायेगे।

मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 2, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-
1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;
2. दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति सुख की इच्छा करता है और सुख मिलता है निरन्तर भौतिक विकास और संतुष्टि के समन्वय से;
3. वर्तमान समय में पूरी दुनियां में पर्यावरण का संतुलन बिगड रहा है। मानव शरीर के पांचों मूल तत्व विकृत होते जा रहे है। इसका दुष्प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य से लेकर उसके स्वभाव पर भी स्पष्ट दिखता है।
4. जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी अर्थात सभी पांचो मूल तत्व बहुत तेजी से विकृत हो रहे है। इसका प्रभाव संपूर्ण मानव एवं जीव जन्तु पर पड रहा है किन्तु भारत पर इसका प्रभाव और भी ज्यादा है;
5. आकाश में खतरा ओजोन गैस का है। अग्नि को खतरा विनाशक हथियारों तथा बारूद का है। जल, पृथ्वी और वायु निरंतर प्रदूषित हो रहे है। प्लास्टिक का बढता उपयोग भी पृथ्वी के लिये समस्या बनता जा रहा है।
6. पर्यावरण ताप वृद्धि बहुत बडी समस्या है और इस संबंध में निरन्तर चिंता भी हो रही है। किन्तु उससे भी ज्यादा खतरनाक समस्या है मानव स्वभाव ताप वृद्धि। दुर्भाग्य से इस खतरनाक समस्या पर पूरी दुनियां में कोई चिंता नहीं हो रही है;
7. मानव स्वभाव ताप वृद्धि तथा मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि दुनियां की सबसे अधिक गंभीर समस्याएं है। किन्तु इस खतरे की गंभीरता को नहीं समझा जा रहा है।
8. भारत में पर्यावरण और मानवाधिकार के नाम पर बने हुये पेशेवर संगठन पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुॅचा रहे है। ये संगठन विदेशो से धन लेकर भारत की सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था को असंतुलित करते है;
9. पर्यावरण के नाम पर काम कर रहे पेशेवर संगठन अपनी दुकानदारी चलाने के लिये समाज में जागरूकता के नाम पर भय पैदा करने का काम करते है;
10. कोई संगठन ओजोन गैस के नाम पर डर दिखाता है तो कोई दूसरा हिमयुग अथवा तापवृद्धि का। जबकि सामान्य जन जीवन पर इसका न कोई प्रभाव पडता है, न ही समाधान में भूमिका होती है।

यह निर्विवाद सत्य है कि पर्यावरण बहुत तेजी से बिगड रहा है। सारी दुनियां के साथ-साथ भारत की गति औेर भी अधिक तेज है। प्राचीन समय में आबादी बहुत कम थी। लोग अशिक्षित, अविकसित और गरीब थे।
समाज में कई कुरीतियाॅ थी किन्तु पर्यावरण के प्रति सजग थे। सामाजिक व्यवस्था में पानी को गंदा करना अनैतिक माना जाता था। वृक्षारोपण को बहुत महत्व दिया जाता था और पेडों तक की पूजा होती थी। वायु शुद्धि के लिये भी यज्ञ आदि करके एक भावनात्मक वातावरण विकसित किया जाता था। धीरे-धीरे हम विकास की दौड में आगे बढे किन्तु भौतिक विकास की गति बहुत तेज रही और नैतिक पतन बढता चला गया। विकास और नैतिकता का संतुलन बिगड गया। पर्यावरण के प्रति जो भावनात्मक श्रद्धा थी उसे अंधविश्वास के नाम पर समाप्त कर दिया गया। पेशेेवर लोग पर्यावरणवादी बनकर सामाजिक वातावरण को और अधिक नुकसान पहुॅचाते रहे। ये विदेशी दलाल विदेशों से धन या बडे-बडे सम्मान लेकर भारत के वातावरण को बिगाडते रहे। जो व्यक्ति पूरे जीवन में कभी एक भी पेड नहीं लगाया है वह भारत के पर्यावरण संरक्षकों में शामिल हो जाता है समाज में जागरूकता की जगह भय पैदा किया जाता है। कोई कहता है कि वातावरण इतना गरम हो जायेगा कि बर्फ पिघल जायेगी और नदियों में बाढ आ जायेगी तो दूसरा पर्यावरणवादी यह भी कहता है कि जल संकट आने वाला है और पानी की इतनी कमी हो जायेगी कि पानी के लिये मार-काट हो जायेगी। इस तरह की ऊल-जलूल बातें 60-70 वर्ष पूर्व भी सुनाई देती थी और आज भी सुनाई देती है लेकिन इन पेेशेवर लोगों का धंधा निरन्तर बढता जा रहा है।

वर्तमान समय में भारत की आबादी तेज गति से बढी। उचित होता कि पर्यावरण संरक्षण के लिये कुछ विशेष व्यवस्था की जाती किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत। पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन व्यवस्था को अंधविश्वास के नाम पर छोड दिया गया। अब कोई गंगा नदी में तांबे का पैसा डाल दे तो अंध विश्वास कहा जायेगा। फलदार वृक्षों की पूजा भी अंध विश्वास। यज्ञ करना अंध विश्वास। पानी में गंदगी डालना पाप मानना अंधविश्वास। पर्यावरण संरक्षण विकास की दौड की भेंट चढ गया। सारी दुनियां तेज विकास के लिये पर्यावरण का शोषण कर रही है इसलिये भारत भी पीछे क्यों रहे, इसे आवश्यकता मान लिया गया। पर्यावरण सुरक्षा समाज शास्त्र का विषय न रहकर पेशेवर पर्यावरण वादियों मानवाधिकार वादियों का व्यवसाय बन गया।

परिणाम हुआ कि भारत में भी पंचतत्व बहुत तेज गति से प्रदुषित हुये। सबसे ज्यादा प्रदूषित हुई वायु। पेड कटे और वायु में डीजल पेट्रोल का प्रदूषण तेजी से बढा। भारत की आबादी सत्तर वर्षो में चार गुना बढी किन्तु डीजल पेट्रोल की खपत चालीस गुनी बढ गई। मनुष्य और पशु बेरोजगार बेकार घूम रहे हैं। सौर उर्जा के मामले में भारत सौभाग्य शाली है किन्तु बिजली के बिना कोई छोटा सा काम भी संभव नहीं और बिजली बनेगी कोयले से भले ही प्रदूषण कितना भी क्यों न हों। भारत का जल भी जहरीला बन गया। सारी मानवीय से लेकर औद्योगिक तक गंदगी नदियों में डालकर अब उस पानी को साफ करके उपयोग करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पृथ्वी तत्व भी लगातार प्रदूषित हो रहा है। रासायनिक खाद से लेकर प्लास्टिक तक को सस्ता किया जा रहा है। कृषि उत्पादन, वन उत्पादन पर टैक्स लगाकर रासायनिक खाद या प्लास्टिक का महत्व बढाया जा रहा है। अग्नि तथा आकाश के प्रदूषण में भारत की गति शेष दुनियां से कुछ कम है। सारी दुनियां जिस तरह रासायनिक हथियार तथा ओजोन परत को नुकसान कर रही है उस मामले में भारत अभी बहुत पीछे अवश्य है किन्तु प्रयत्नशील तो है ही।

एक तरफ पूरे भारत में तेज गति से भौतिक विकास की आवाज उठाई जा रही है तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण के कारण भौतिक विकास में बाधाएं भी पैदा करने का प्रयत्न निरन्तर जारी है। भौतिक विकास की मांग करने वाले और विरोध करने वाले अपने रोजी-रोटी की व्यवस्था कर लेते है और शेष भारत उन धूर्तो से ठगा जाता है। एक धूर्त कहता है सबको जमीन दो तो दूसरा कहता है अधिक से अधिक पेड लगाओं, तीसरा कहता है खेती का रकबा बढाओं और चौथा कहता है गांव-गांव में कुएं और तालाब बने और सिंचाई के साधन हो। एक तरफ आबादी बढने के कारण जमीन की कमी हो रही है तो दूसरी ओर मुसलमानों को मरने के बाद भी जमीन पर कव्जा चाहिये। मैं नही समझता कि ये सभी बैठकर एक साथ तय क्यों नहीं कर लेते कि जमीन का बंटवारा किस तरह हो। जब जमीन बढाई नही जा सकती यह सभी जानते है तो मिल बैठकर निर्णय करने अथवा सुझाव देने के अपेक्षा मांग करने का औचित्य क्या है? एक सामाजिक शुभचिंतक भारत को अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न बनने की मांग करता है तो दूसरा वैसा ही शुभचिंतक भारत को हिंसक शास्त्रों से दूर रहने की बात भी करता है ऐसे विपरित विचारों के लोग पर्यावरण के लिये सबसे बडी समस्या है।

सब मानते है कि यदि आबादी बढेगी तो पर्यावरण प्रदूषण बढेगा। यदि भौतिक विकास तेज होगा तब भी पर्यावरण प्रदूषण बढेगा लेकिन इनके संतुलन की किसी कोशिश को महत्व नहीं दिया जा रहा है। आबादी वृद्धि की बात छोड दीजिए। आबादी का घनत्व भी शहरों की ओर बढाकर लगातार असंतुलित किया जा रहा है किन्तु इस विषय पर आज तक भारत में कोई समाधान नहीं खोजा गया।

भारत में चार प्रकार की समस्याएं है। 1. व्यक्तिगत 2. सामाजिक 3. आर्थिक और 4. राजनैतिक। व्यक्तिगत समस्याओं का एक मात्र समाधान अपराध नियंत्रण की गारंटी से है, जो राज्य को देना चाहिए। सामाजिक समस्याओं का एक मात्र समाधान समान नागरिक संहिता है। इसी तरह राजनैतिक समस्याओं का एक मात्र समाधान लोक स्वराज्य प्रणाली से है। हम वर्तमान समय में पर्यावरण की समस्याओं की चिंता कर रहे है और पर्यावरण में समस्याओं की वृद्धि का मुख्य कारण तीव्र भौतिक विकास है।

इसका समाधान आर्थिक ही हो सकता है और भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का एक-मात्र समाधान है, कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि। आश्चर्य व दुख होता है कि जब भी कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की बात आती है तब सभी पेशेवर, पर्यावरणवादी, मानवाधिकारवादी और अन्य एक जुट होकर इस मांग का विरोध करते है। यदि कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि हो गयी तो भौतिक विकास की गति भी अपने आप बढ जायेगी और पर्यावरण भी अपने आप ठीक हो जायेगा। शहरी आबादी कम हो जायेगी वातावरण में जहर नहीं घुलेगा। पानी अशुद्ध नहीं होगा लेकिन पेशेवर पर्यावरणवादियों की दुकानदारी बंद हो जायेगी क्योंकि उन्हें गांव में जाकर पेड़ लगाने पड़ेंगे । खेती करनी पड़ेगी अथवा कोई अन्य व्यवसाय करना पड़ जायेगा।

यदि किसी परिवार में पारिवारिक वातावरण प्रदूषित है और वह परिवार चिन्ता नहीं कर रहा है तो उसकी चिंता पूरे समाज को क्यों करनी चाहिए। जब तक वह समस्या गांव की न हो तब तक गांव को चिंता नहीं करनी चाहिए। यहाॅ तो स्थिति यह हो गई है कि जो काम नगरपालिका और नगर निगम को करना चाहिए वह काम भी सुप्रीम कोर्ट करने लगा है। किसी शहर में किसी मकान की उंचाई कितनी हो यह उसी शहर पर क्यो न छोड दिया जाये? क्यों उसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप करे? ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से असंतुलन पैदा होता है। किसी नदी का पानी गंदा है तो उस गंदगी की चिंता उस नदी का पानी उपयोंग करने वाले मिलकर बैठकर करे और या तो साफ करने की व्यवस्था करे या गंदा करने वालो पर रोक लगावे। यह चिंता करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। पेशेवर पर्यावरण वादी ऐसे मामलों में न्यायालय को घसीटते है और न्यायालय को भी अपना आवश्यक काम छोडकर ऐसा करने में आनंद आता है।

मैं मानता हूॅ कि आकाश, जल, अग्नि पृथ्वी और हवा का प्रदूषित होना एक बहुत बढी समस्या है। इसका मानव जीवन पर दूरगामी प्रभाव पडेगा। किन्तु मैं यह भी समझता हूॅ कि इस प्राकृतिक संकट की तुुलना में मानव स्वभाव में ताप और स्वार्थ वृद्धि कई गुना बडी समस्या है। मानव स्वभाव तापवृद्धि इस प्रकार के पर्यावरणीय संकट में भी एक बडी भूमिका निभाती है। मानव स्वभाव तापवृद्धि हथियारों के संग्रह का भी एक प्रमुख कारण है। दुर्भाग्य से जितनी चर्चा ओजोन परत, बढते तापमान, वायु और जल प्रदूषण की हो रही है उसका एक छोटा सा हिस्सा भी मानव स्वभाव मे बढते आक्रोश ओर स्वार्थ के समाधान के लिये नहीं हो रहा। दिल्ली में वायु प्र्रदूषण रूके इसके लिये सुप्रीम कोर्ट बहुत चिंतित है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज तक यह चिंता नहीं की कि दिल्ली के लोगो में इतनी तेजी से हिंसा और स्वार्थ के प्रति आकर्षण क्यों बढ रहा है। क्यों दिल्ली की आबादी इतनी तेजी से बढ रही है और क्यों इतनी प्रदूषित वायु होते हुये भी भारत के लोग भाग-भाग कर दिल्ली आ रहे है। हमारे पर्यावरण की चिंता करने वाले सारे भारत को पानी बचाओं बिजली बचाओं का संदेश देते है तो दिल्ली का वायु प्रदुषण दूर करने के लिये सडकों और पेडों पर जल छिडकाव की व्यवस्था की जाती है। क्यों ऐसा प्रदूषित वातावरण बन गया है कि जहाॅ शुद्ध हवा है वहाॅ से भागकर लोग गंदी जगह में आ रहे है और उस गंदी हवा को साफ करने के लिय मुख्य सकडों के बीचोबीच पेड लगाने का नाटक कर रहे है। पर्यावरण प्रदूषण के लिये इतना नाटक ओर ढोंग करने की अपेक्षा क्यों नहीं कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि कर दी जाये कि शहरों की आबादी अपने आप कम हो जायेगी और न रहेगा बाँस न बजेगी बांसुरी।

मैं तो इस मत का हूँ कि भारत की पर्यावरण संबंधी सभी समस्याओं के समाधान में कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि की एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है ओैर इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। पर्यावरण का बढता प्रदूषण मानव अस्तित्व के लिये एक गंभीर संकट है। इसके समाधान के चौतरफा प्रयास करने होंगे। विकास की प्रतिस्पर्धा और संतुष्टि के बीच तथा भावना और बु़िद्ध के बीच समन्वय करना होगा। पर्यावरण को प्रदूषित करके उसे साफ करने की अपेक्षा प्रदूषण बढाने वालों के प्रयत्नों को निरूत्साहित करना होगा। पर्यावरण प्रदूषण कम करने का सारा दायित्व सरकारों पर न छोडकर उसमें जन जन से लेकर स्थानीय संख्याओं की सहभागिता जोडनी होगी। शहरी आबादी वृद्धि एक बडी समस्या है। उसका समाधान करना ही होगा। प्लास्टिक तथा कृत्रिम उर्जा की इस सीमा तक मूल्य वृद्धि करनी होगी कि इनका उपयोग निरूत्साहित हो। पेशेवर पर्यावरणवादियों को सिर्फ रोजगार से हटकर प्रदूषण कम करने की दिशा में वास्तविक सक्रियता की दिशा में प्रेरित करना होगा।

पर्यावरण प्रदूषण कोई प्राकृतिक समस्या न होकर मानवीय समस्या है। छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलाव इस समस्या से मुक्ति दिला सकते हैं।

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