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ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि
दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार ............................................................. 1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर ज...
मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि
धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्त...
मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि
दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्ल...
मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इका...
मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि
ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है...
मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्व...
मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि
आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्...
मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि
आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यव...
मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...
मंथन क्रमांक 129 ’’विचार और चिंतन” का फर्क–बजरंग मुनि
विचार और चिंतन एक दूसरे के पूरक हैं। विचार निष्कर्ष है और चिंतन निष्कर्ष तक पहुॅचने का मार्ग। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निरंतर नये नये विचार तथा समस्याएं आती रहती हैं। व्यक्ति चिंतन मनन क...

मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 21, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्त है। प्राचीन समय से हिन्दू धर्म की दो अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं- एक गुण प्रधान हिन्दुत्व और दूसरे पहचान प्रधान। गांधी गुण प्रधान हिन्दुत्व की विचारधारा से ओतप्रोत थे और हत्या करने वाला पहचान प्रधान हिन्दुत्व से। गांधी में हिन्दुत्व के मौलिक गुण कूट कूट कर भरे पडे़ थे और वे गुण प्रधान हिन्दुत्व को अपने जीवन में पूरी तरह उतार रहे थे। वे कहीं भी पहचान प्रधान हिन्दुत्व की जीवन पद्धति में बाधक नहीं थे। वैसे भी आमतौर पर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में पूरी तरह अहिंसक होता है। यदि कभी हिंसा करनी हो तो हिन्दू धर्मव्यवस्था में ऐसी हिंसा राज्य व्यवस्था के माध्यम से ही हो सकती है, सीधे नहीं। इसलिये इस प्रश्न का उत्तर और जटिल हो गया है।

गांधी के कार्यकाल में अनेक संगठन गांधी के विरूद्ध काम कर रहे थे। गांधी स्वतंत्रता को पहला उददेश्य मान कर चल रहे थे तो विभिन्न संगठन स्वतंत्रता से अलग कुछ और भी उददेश्य आगे रखकर चल रहे थे जिनमें चार प्रकार के लोग प्रमुख थे- 1. संघ 2. जिन्ना 3. अम्बेडकर 4. कम्युनिस्ट। ये चारो समूह गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि गांधी स्वतंत्रता को सबसे प्रमुख महत्व देते थे और ये चारों अलग-अलग उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे भले ही स्वतंत्रता कुछ पिछड ही क्यों न जायें। इन चारो में भी जिन्ना अम्बेडकर और कम्युनिस्टों के अपने-अपने स्वार्थ थे और संघ की प्राथमिकता स्वार्थ से कुछ भिन्न थी। संघ अंग्रेजो की तुलना में मुसलमानों को अधिक घातक मानता था। गांधी अंग्रेजो की गुलामी से मुक्ति को प्राथमिकता देते थे। ये चारो समूह आपस में भी टकराते रहते थे, जिसे गांधी निपटाने का प्रयास करते थे किन्तु चारों आपस में चाहे जितना भी टकराते हो किन्तु गांधी विरोध में चारो की भाषा एक होती थी। इस संबंध में कोई किसी से नहीं टकराता था। ये सभी गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि चारो के अलग-अलग संगठन थे। संगठनों का उददेश्य स्वार्थ से जुडा होता है और संस्थाओं का परमार्थ से। चारो में किसी का स्वरूप संस्थागत नहीं था भले ही संघ अपने को संस्था कहने का ढोेंग करता था।

गांधी विदेशी गुलामी से हर भारतीय की मुक्ति को अंतिम लक्ष्य मान कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता को पड़ाव मानते थे। गांधी का अंतिम लक्ष्य था व्यक्ति स्वातंत्र। इसलिये गांधी ने हिन्द स्वराज के बाद ग्राम स्वराज को लक्ष्य घोषित किया। स्वतंत्रता संघर्ष में जो प्रमुख लोग सक्रिय थे उनमें से अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्रीय स्वराज्य को अंतिम लक्ष्य मानते थे। यही कारण था कि कांग्रेस के नेहरू, पटेल सहित प्रमुख नेता गांधी की कोई बात कभी स्वीकार नहीं करते थे भले ही स्वार्थ वश मान लेते थे और वैसा करते थे। यदि कभी भी कांग्रेस पार्टी में मतदान हुआ तो गांधी की सोच के विपरीत हुआ और गांधी के डर से मान लिया गया। गांधी के साथ देश के करोड़ो लोगो की भावना जुडी हुई थी तो इन नेताओं को अपने स्वार्थ के कारण कुछ स्वार्थी लोगों के अतिरिक्त किसी एक का भी समर्थन प्राप्त नहीं था। वैसे भी भारत हिन्दू बहुल देश था और हिन्दू आमतौर पर व्यवस्था के साथ चलने वाला होता है। सामान्य हिन्दू आबादी राजनीति में दखल नहीं देती और राजा को श्रद्धा देती है। स्वतंत्रता के बाद भी आजतक आमतौर पर स्वतंत्रता पूर्व के राजाओं या उनके वंशजों को बहुत श्रद्धा प्राप्त है। स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू को श्रद्धा प्राप्त हुई और आजतक इनके वंशज उसका लाभ उठा रहे है। यह हिन्दुओं का स्वभाव है। स्वतंत्रता के पूर्व भारत की लगभग पूरी हिन्दू आबादी ने गांधी और उनकी नीतियों पर विश्वास कर लिया था। इसी का परिणाम था कि सभी नेता गांधी की नीतियों का विरोध करने के बाद भी गांधी के आदेश को चुपचाप स्वीकार कर लेते थे। पंडित नेहरू तथा अन्य राजनेता भी गांधी की नीतियों से नाराज रहते थे लेकिन खुलकर नहीं बोल पाते थे।
स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस पार्टी नेतृत्व कर रही थी। कांग्रेस का चरित्र संस्थागत था संगठनात्मक नहीं। अनेक विचारों के लोग स्वतंत्रता के लिये एक मंच पर आये थे। जब स्वतंत्रता मिलने के लक्षण दिखने लगे तब गांधी को किनारे करके कांग्रेस को संगठनात्मक स्वरूप देना शुरू हुआ। इस मामले में पंडित नेहरू सबसे अधिक दोषी हैं। स्वतंत्रता के समय पंडित नेहरू की सत्ता के प्रति नीयत बिगड गई। सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह आदि का मार्ग गलत था नीयत गलत नहीं। नेहरू के अतिरिक्त अन्य चार की तो नीतियां भी गलत थी और नीयत भी। मैंने सुना है कि गांधी कांग्रेस को संगठन के रूप में न बनाकर उसे स्वतंत्रता के बाद भंग करना चाहते थे लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया।
गांधी विचारो से सबसे अधिक चिढ़ सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के कारण थी चाहे कोई राजनेता रहा हो अथवा हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाला। कोई भी नहीं चाहता था कि देश में ग्राम स्वराज आवे और सत्ता अकेन्द्रित होकर परिवारो तक चली जाये। गांधी इन सबके लिये सबसे बडी बाधा थे। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी के विरूद्ध वातावरण बनाने में गांधी की स्वराज की यह परिभाषा भी सहायक सिद्ध हुई होगी। कुछ लोग ऐसा भी बताते है कि गांधी हत्या का प्रयास स्वतंत्रता से कई वर्ष पूर्व भी हुआ था। यदि यह बात सच है तो फिर उस समय तक न पाकिस्तान बना था न ही कोई 55 करोड रूपया देने का मामला था। साथ ही यदि गांधी हत्या में हिन्दू मुसलमान की बात ही प्रमुख होती तो स्वतंत्रता के बहुत पूर्व हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर बंगाल में सरकार चलाई जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि भी शामिल थे। एक अन्य बात यह भी है कि यदि विभाजन इसका कारण था तो विभाजन में मुख्य भूमिका नेहरू, पटेल तथा जिन्ना की रही, गांधी की नहीं। यदि इस कारण से ही हत्या होती तो इन तीनो मे से किसी की होनी चाहिये थी किन्तु यदि इन सबको छोडकर गांधी की हत्या हुई तो इसका कारण कहीं और खोजा जाना चाहिये। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी हत्या का मुख्य कारण गांधी की सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की नीति रही जिसके लियेे बहाना विभाजन को बनाया गया और लोगो के बीच भ्रम फैलाया गया। गांधी के हत्यारे गोडसे के मन में भले ही विभाजन या हिन्दू मुसलमान की बात रही हो किन्तु हत्या का वातावरण बनाने के पीछे देश के राजनेताओं की सत्तालोलुपता थी जिसमें गांधी सबसे बडी बाधा थे। वैसे भी नेताओं की नजर में गांधी का उपयोग अब समाप्त हो चुका था। पंडित नेहरू ने गांधी विचारो को तिलांजलि देकर साम्यवाद की नीति अपना ली। जिन्ना पहले से ही अलग हो चुके थे। अम्बेडकर ने कानून मंत्री बनकर हिन्दू कोड बिल का ताना बाना बुनना शुरू कर दिया और बचे संघ, हिन्दू महासभा तो, इन्होंने गांधी के खिलाफ वातावरण बनाना शुरू कर दिया। सबने अपना-अपना अलग-अलग गांधी विरोधी मार्ग पकड लिया था। यदि गांधी जीवित रहते तो इनके लिये कुछ समस्याएं ही पैदा करते इसलिये किसी मुर्ख ने गांधी की हत्या कर दी और बाकी सब लोगो ने राहत की सांस ली। ठीक गांधी विचार के विपरीत सत्ता का ढांचा तैयार किया गया और लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल दी गई। आज पूरी तरह गांव और परिवार को संविधान से बाहर करके राजनैतिक सत्ता अधिक से अधिक केन्द्रीयकरण की दिशा में बढ रही हैं।

गांधी पर चर्चा के बाद गोडसे पर भी चर्चा समीचीन है। कोई हिन्दू कभी स्वेच्छा से और बिना समाज से अधिकार प्राप्त किये किसी पर बल प्रयोग नहीं कर सकता। मुस्लिम संस्कृति इसकी इजाजत देती है। विषेषकर यदि कोई हिन्दू किसी हिन्दू की हत्या करे और वह भी किसी गुण प्रधान हिन्दू की तो यह बात पूरी तरह इस्लामिक संस्कृति से मेेल खाती है। ऐसे संस्कार गोडसे में कहा से आये यह अलग शोध का विषय है किन्तु ये संस्कार हिन्दुत्व विरोधी थे, यह पूरी तरह सच है। कुुछ इक्का दुक्का लोग आज भी ऐसी हिंसा के प्रशंसक या समर्थक मिल जाते है जिनकी संख्या धीरे धीरे बढ रही है। समाज को चाहिये कि हिन्दुओं में बढती ऐसी इस्लामिक संस्कृति के विरूद्ध वातावरण बनावे। यदि आप शेर से नहीं टकरा सकते तो गाय की हत्या कर दें यह तो और भी अधिक कायरता है। गोडसे का कार्य और उसका समर्थन पूरी तरह हिन्दू विरोधी माना जाना चाहिये।

स्पष्ट है कि आज हमारे बीच गांधी नहीं है किन्तु जिस समय गांधी ने स्वतंत्रता के लिये योजना बनानी शुरू की उस समय भी देश में कोई स्थापित गांधी नहीं था। करमचंद मोहन दास ने शून्य से आगे बढकर गांधी तक का सफर तय किया है। गांधी के मरते ही यदि फिर से स्थिति बिगडते बिगडते शून्य तक पहुंच गई तो अब फिर से बदलाव के लिये किसी को नये गांधी के रूप में सामने आना चाहिये। फिर से राजनैतिक सत्ता के अकेन्द्रीयकरण की आवाज उठनी चाहिये। मुझे पूरा विश्वास है कि भारत की जनता फिर से नये गांधी का समर्थन करने के लिये तैयार दिखेगी।

मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि

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आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यवस्था में प्रदेश और केन्द्र दो ऐसी ही अलग-अलग इकाईयां हैं। प्रदेशो को अनेक प्रकार की स्वतंत्रताएं दी जाती हैं। इन स्वतंत्रताओं का दुरूपयोग करके प्रदेश यदि अन्य प्रदेशो से टकराव का स्वरूप ग्रहण कर लें तब पूरी राष्ट्रीय एकता पर बुरा प्रभाव पडता है।

राज्य अर्थात राष्ट्रीय सरकारें यह प्रयत्न करती हैं कि समाज कभी एकजुट न हो जाये। यदि समाज एकजुट हो जाये तब राज्य को अपने उपर खतरा दिखने लगता है। इस सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिये राज्य फूट डालों और राज करों की नीति पर निरंतर चलता रहता है। इसके लिये राज्य अनेक शस्त्रों का उपयोग करता है। ऐसे शस्त्रों में आठ प्रमुख माने जाते है। 1. धर्म 2. जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रियता 5. उम्रभेद 6. लिंग भेद 7. आर्थिक भेद 8. उत्पादक/उपभोक्ता। इन आठों में से प्रत्येक पर राज्य निरंतर सक्रिय रहता है। चाहे सरकार किसी भी दल की क्यों न हो किन्तु पूरी ईमानदारी से सभी दल इस फूट डालो की नीति पर मिल जुलकर काम करते हैं। कभी किसी एक मुद्दे को आगे बढाकर वर्ग संघर्ष को बढाया जाता है तो उस मुददे को ठंडा होते ही कोई एक नये वर्ग संघर्ष की तैयारी होने लगती है निरंतर वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाज में टकराव चलता रहे इसके लिये लगातार किसी न किसी मुददे को आगे बढाना ही सफल राजनीति मानी जाती है। क्षेत्रियता अर्थात प्रादेशिकता भी इन आठ प्रकार के टकरावों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हर एक-दो वर्ष में कहीं न कही क्षेत्रियता के नाम पर जन उभार का प्रयत्न शुरू किया जाता है। सभी राजनैतिक दल दो गुटों में बंटकर आपस में टकराव का नाटक करते है और उस नाटक के दर्शक भावनाओं में बहकर आपस में वास्तविक टकराव में उलझ जाते हैं। परिणाम होता है कि दोनो सामाजिक समूहों में स्थायी रूप से वैमनस्यं की मजबूत दीवार खडी हो जाती है। राजनैतिक दल इस प्रकार के क्षेत्रीय संघर्ष को रोकने के नाम पर कुछ नये कानून बनाकर अपनी शक्ति बढ़ा लेते हैं तथा कुछ वर्षो के बाद किसी दूसरे क्षेत्र में पुनः उस शस्त्र का उपयोग करते है।
हम वर्तमान भारत का आंकलन करें तो स्वतंत्रता के बाद लगातार पूरे देश में क्षेत्रियता का विस्तार किया गया। शान्त वातावरण में पंडित नेहरू ने सबसे पहले भाषा वार प्रांत रचना के नाम से ऐसा बीच बोया जिसने भारत को स्थायी रूप से उत्तर और दक्षिण में बाॅट दिया। वह खाई अब तक नहीं मिटी है। इस क्षेत्रिय विभाजन के प्रमुख सूत्रधार एम करूणा निधि जी इसी माध्यम से सत्ता के शीर्ष तक बनें रहने में कामयाब रहे । उनकी सबसे बडी खूबी यही मानी जाती है कि उन्होंने क्षेत्रीयता को सत्ता का माध्यम मान लिया और सफल हुुये । इसी प्रकार बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र और मराठी के नारे को सत्ता का माध्यम बना लिया और सफल भी हुये, इन लोगो ने खुले आम हिंसा को प्रोत्साहित किया। उन्होंने सारी संवैधानिक और सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन किया यहाॅ तक कि बाल ठाकरे तो अपनी तुलना शेर से करने लगे थे। किसी लोकतांत्रिक देश में कोई दादा समाज की तुलना गाय से और स्वयं की शेर से करे और वह व्यक्ति सम्मानित हो यह लोकतंत्र का खुला अपमान है। इस सीमा तक क्षेत्रियता का नंगा नाच हम सबने देखा है। यदि हम व्यक्तिगत आधार को छोड़ दे और सामान्य जन मानस में क्षेत्रियता के जहर का आॅकलन करें तो इसमें सबसे ऊपर नंबर बिहार का आता है। आबादी बढाने में भी बिहार आगे रहता है तो दूसरे प्रदेशो में रहते हुये क्षेत्रिय एकता का दुरूपयोग करने में भी बिहार की अग्रिम भूमिका रहती है। जब क्षेत्रियता के नाम पर सारे नियम कानून को किनारे करके कोई व्यक्ति या समूह समाज में प्रगति करने लगता है तो अन्य लोग भी उस मार्ग पर चलना शुरू कर देते है। इस प्रकार अन्य प्रदेशो में भी छत्तीसगढी या गढवाली के नाम पर क्षेत्रियता के विष बीज अंकुरित होने लगते है। स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ ऐसे अंकुरण का लाभ उठाने को तैयार दिखते हैं और खाद पानी देकर उस विष वृक्ष को इतना मजबूत कर देते है कि वह उन लोगो के लिये छाया बन जाता है। मैंने स्वयं देखा है कि क्षेत्रियता की आवाज मजबूत करने वाला हर व्यक्ति कहीं न कहीं राजनैतिक व्यवसाय से जुड़ने की इच्छा रखता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता जो सामाजिक धारणा भी रखता हो और क्षेत्रियता को भी प्रोत्साहन दे। राजनीति का तो क्षेत्रियता के प्रोत्साहन देना मुख्य आधार ही माना जाता है।

क्षेत्रियता के विस्तार में मुख्य रूप से बुद्धि जीवियों का स्वार्थ छिपा होता है किन्तु बहुत चालाकी से ऐसे लोग भावना प्रधान लोगो को आगे करके उन्हें टकराव के लिये प्रोत्साहित करते हैं। समाज के लोग दो गुटों में बंटकर टकराते हैं तथा दोनो गुट अपना नुकसान करते हंै किन्तु राजनेता इस टकराव का लाभ उठाते हैं। समस्या बहुत जटिल हो गयी है अब तो पूरे भारत में क्षेत्रियता की भावना बढती जा रही हैं। योग्यता के स्थान पर स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकताये दी जाये इसकी मांग खुलेआम होने लगी है। क्षेत्रीयता और भाषा को भावनात्मक मुददा बनाने के लिये उसके साथ संस्कृति को भी जोड लिया जाता है। इस तरह भाषा और संस्कृति को जोड़कर क्षेत्रियता की आग जलाई जाती है जबकि न भाषा का क्षेत्रियता से कोई संबंध होता है न संस्कृति का।

समस्या जटिल है किन्तु बहुत खतरनाक है। समस्या लगातार बढती जा रही है राजनीति से जुडे लोग इस समस्या को उभार कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने में लगे हैं। समाज के ही विद्वानों को इसका समाधान खोजना चाहिये। सबसे बडी भूल संविधान निर्माताओं से हुई कि उन्होंने प्रदेशो को अंतिम अधिकार दे दियें। यदि केन्द्र से लेकर कुछ अधिकार प्रदेशो को दिये गये थे तो प्रदेशो से लेकर कुछ अधिकार जिला, गांव और परिवार तक विकेंद्रित करने चाहिये थे। यदि अधिकारों का केन्द्रीयकरण प्रदेश और केन्द्र तक नहीं होता तो न राष्ट्रवाद पंनपता न ही क्षेत्रवाद। अधिकारों का इकट्ठा होना ही राजनेताओं को आकर्षित करता है और ऐसे राजनेता अपने स्वार्थ के लिये इन भावनात्मक मुददों को उछालकर उनका लाभ उठाते हैंै। इसलिये अधिकारों का विकेन्द्रीयकरण इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान है। समान नागरिक संहिता भी इस समाधान में सहायक हो सकती है। हमें चाहिये कि हम क्षेत्रीयता के नाम पर लाभ उठानेे वाले राजनेताओं की मंशा को समझें और ऐसे प्रयत्नों से अपने को दूर रखें।

मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 3, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा समाज के लिये अनिवार्य है तो समाज के साथ जुडकर रहना व्यक्ति की मजबूरी है। जब व्यक्ति स्वतंत्रता की सीमायें तोडता है तब वह उच्श्रृंखल हो जाता है। जब व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमायें टूटती है तब वह गुलाम हो सकता है। उच्श्रृंखल व्यक्ति पर नियंत्रण और गुलामी से सुरक्षा के लिये समाज एक व्यवस्था बनाता है। इस व्यवस्था को व्यक्ति और समाज अपने अधिकार देते हैं, तब ऐसे अधिकार उस व्यक्ति की शक्ति बन जाते हैं। इस शक्ति के बल पर ही वह व्यवस्था सेना, पुलिस, वित्त आदि के अधिकार अपने पास रखती है, ऐसी अधिकार प्राप्त इकाई मनमानी न करने लगे इसलिये उसे अधिकार देने वाली इकाई उसके अधिकारों और हस्तक्षेप की सीमाये निश्चित कर देती है। ऐसी सीमायें निश्चित करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते हैं। ऐसे संविधान प्रत्येक इकाई के अलग-अलग हो सकते हैं, किन्तु यह आवश्यक है कि संविधान बनाने में इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की समान और स्वतंत्र भूमिका हो। किसी एक व्यक्ति को भी निकालकर किसी इकाई का संविधान नहीं बन सकता।

व्यवस्था की कई इकाईयां होती है, और सबके अपने अपने संविधान भी हो सकते हैं। परिवार व्यवस्था की पहली इकाई है इसी तरह ग्राम व्यवस्था राष्ट्र व्यवस्था और विश्व व्यवस्था को माना जा सकता है। स्वाभाविक है कि सबके अपने अपने स्वतंत्र संविधान हों। हो सकता है कि ऐसे संविधान लिखित हों भी और न भी हों किन्तु सभी सदस्यों की सहमति से बनी परम्परा भी संविधान मानी जाती है। यदि कोई अधिकार प्राप्त व्यक्ति है तो उसके अधिकारों की सीमायें निश्चित करने वाले प्रावधान संविधान की अनिवार्य आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति के कुछ मौलिक अधिकार होते हैं। उस व्यक्ति की सहमति के बिना उन प्राकृतिक अधिकारों में कभी कोई कटौती नहीं की जा सकती। इसका अर्थ हुआ कि संविधान बनाने में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति अनिवार्य है। किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारो के विषय में उसकी सहमति के बिना ना कोई समझौता हो सकता है और ना ही क्रियान्वित हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति की सहमति से कोई ऐसा समझौता होता है जो उसकी स्वतंत्रता के विरूद्ध है तो उस व्यक्ति की सहमति के बिना यह समझौता लागू नहीं किया जा सकता। कल्पना करिये कि मैंने किसी व्यक्ति या इकाई से यह समझौता कर लिया कि यदि मैं आपको गाली दूंगा तो आप मुझे पीट सकते हैं किन्तु इस समझौते के बाद भी यदि मैं गाली देता हूॅ तो वह व्यक्ति मेरी सहमति या स्वीकृति के बिना मुझे पीट नहीं सकता। मेरी उच्श्रृंखलता के दंड के लिये मैं या वह दोनो को समाज के पास पक्ष प्रस्तुत करके निर्णय कराना ही होगा। बिना मेरी स्वीकृति या समाज के निर्णय के मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नही हो सकता।

परिवार, गांव और राष्ट्र आदि व्यवस्था की इकाईयां है और जाति, धर्म क्षेत्रीयता आदि इन व्यवस्थाओं की सहायक इकाईयां। जाति, धर्म आदि को कोई शक्ति प्राप्त नहीं होती। वह मार्गदर्शक अथवा समन्वयक इकाई मानी जाती है इसलिये इन सबका कोई संविधान नहीं होता, किन्तु परिवार, गांव, राष्ट्र आदि शक्ति संपन्न इकाईयां हैं इसलिये इनके संविधान होते है। आदर्श स्थिति में परिवार, गांव, राष्ट्र और विश्व के अपने अपने संविधान होने चाहिये और ऐसे प्रत्येक संविधान निर्माण में उस इकाई के प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होनी चाहिये। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का संविधान भी परिवार के सभी सदस्यों की सहमति से ही बन सकता है और राष्ट्रीय संविधान भी उस देश में रहने वाले सभी नागरिकों की सहमति से बनेगा। विश्व संविधान में भी दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्र और समान भूमिका होनी चाहिये। राष्ट्र प्रमुख मिलकर कोई दुनियां का संविधान नहीं बना सकते, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका अनिवार्य होती है। दुर्भाग्य से अब तक विश्व सरकार नहीं बन पाई है, और विश्व का संविधान भी नहीं बन सका है जो बनना चाहिये। इसी तरह परिवार व्यवस्था और ग्राम व्यवस्था को भी आतंरिक स्वतंत्रता न देकर राष्ट्र व्यवस्था ने इनका अपहरण कर लिया है। इसलिये परिवार और गांव के भी संविधान नही बने हैं। राष्ट्रों के कुछ देशों में संविधान बने है और जिन देशों में संविधान बने हैं ऐसे देशों में भारत भी एक है।

जिस समय भारत का संविधान बनना शुरू हुआ उस समय भारत गुुलाम था इसलिये संविधान बनाने में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति न लेकर अंग्रेजो ने अपनी इच्छा से एक बीच का मार्ग निकाला और एक संविधान सभा बनाकर उसके प्रस्ताव को ही जन स्वीकृति मान लिया और संविधान में लिख दिया कि हम भारत के लोग अपने लिये संविधान को आत्म समर्पित करते है। उक्त प्रस्ताव के आधार पर जो चुनाव हुआ उस चुनाव को ही जन स्वीकृति घोषित कर दिया गया। स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति मिलकर संविधान बनाते है उन व्यक्तियों को ही संविधान संशोधन का अधिकार होता है। इसका अर्थ हुआ कि भारत के सभी नागरिकों की सहमति अथवा स्वीकृति के बिना कोई संविधान संशोधन नहीं हो सकता, किन्तु भारतीय संविधान में एक ऐसा प्रावधान डाल दिया गया जिसके अनुसार संविधान संशोधन के असीम अधिकार तंत्र को दे दिये गये और लोक को उस भूमिका से बाहर कर दिया गया। व्यवस्था का ढाॅचा इस तरह होता है कि सबसे उपर लोक अर्थात समाज होता है उसके नीचे एक संविधान होता है जो राज्य पर अनुशासन बनाता है, राज्य कानून बनाता है और व्यक्ति सबसे नीचे की इकाई होता है अर्थात वह कानून का पालन करने के लिये बाध्य है। जब संविधान तंत्र पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से बनाया जाता है तब तंत्र संविधान का पालन करने के लिये बाध्य है संविधान तंत्र को अधिकार देता है लेता नहीं, किन्तु छलपूर्वक संविधान निर्माताओं ने तंत्र को ही संविधान संशोधन के असीम अधिकार दे दिये। व्यक्ति के मौलिक अधिकार स्वैच्छिक है और मौलिक अधिकारों में कोई भी संविधान उसकी इच्छा के बिना कोई कटौती नहीं कर सकता किन्तु संविधान निर्माताओं ने संसद को वह अधिकार भी सौप दिया यद्यपि 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक तरीके से संसद के उक्त अधिकार पर आशिंक रोक लगाई। संविधान संशोधन का अधिकार लोक के अतिरिक्त किसी और को दिया जाना प्राकृतिक न्याय के विपरीत है, किन्तु आज तक इस संबंध में न कोई मामला भारतीय न्यायालय में प्रस्तुत हुआ ना ही विश्व व्यवस्था में। प्रस्तुत करने का भी लाभ नहीं दिखता क्योंकि ना तो कोई विश्व संविधान बना है ना ही विश्व व्यवस्था। भारतीय न्याय व्यवस्था भी तंत्र का एक हिस्सा है और वह भी संविधान को गुलाम बनाकर रखने की लडाई ने विधायिका के साथ संलग्न है इसलिये उसकी भी कोई रूचि नहीं है। परिवार व्यवस्था और गांव व्यवस्था को तोड मरोडकर छिन्न-भिन्न कर दिया गया है। देश के प्रमुख विद्वानों और विचारको को भी कई प्रकार के सम्मान और लालच से उनका मुॅह बंद कर दिया गया है, इसलिये वे भी मुॅह नहीं खोल पाते। यदि कुछ लोग समझते भी हैं तो उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान हो जाती है। किन्तु सब कुछ होते हुये भी यह एक मौलिक समस्या है, कि संविधान निर्माण और संशोधन में प्रत्येक व्यक्ति की स्वंतत्र भूमिका का होना ही लोकतंत्र है यदि संविधान निर्माण मेें ऐसी भूमिका नहीं है तो भारत का लोकतंत्र, लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही है जिसे छलपूर्वक लोकतंत्र कहा जा रहा है। लोकतंत्र के लिये पूरे देश में आवाज उठनी चाहिये और उसका प्रारंभ यही से हो सकता है कि संविधान संशोधन के तंत्र के असीम अधिकारो में किसी न किसी प्रकार की कटौती होनी चाहिये।

यह प्रश्न भी विचारणीय है कि संविधान संशोधन के लिये ऐसी क्या व्यवस्था हो सकती है जो व्यावहारिक हो। इस संबंध में कई तरीके हो सकते हैं। संसद द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधन के लिये एक अलग प्रक्रिया बन सकती है, उसके लिये जनमत संग्रह हो सकता है, उसके लिये सभी सरपंच अथवा ग्राम सभाओं की स्वीकृति का प्रावधान बनाया जा सकता है, उसके लिये एक अलग संविधान सभा बन सकती है जो नागरिको के द्वारा चुनी जाये अथवा किसी और प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है किन्तु किसी भी परिस्थिति में लोकतंत्र की जगह संसदीय तानाशाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह कार्य अत्यन्त कठिन है किन्तु आवश्यक भी है और इस संबंध में सामाजिक जागृति ही इसकी शुरूआत हो सकती है क्योकि तंत्र से जुडे लोग अथवा उससे लाभान्वित व्यक्ति जन जागृति के पक्ष में नहीं खडे होगे। इसलिये हम लोगों ने संपूर्ण समाज के समक्ष इस समस्या को प्रस्तुत किया है। ज्ञान यज्ञ परिवार और बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान ने मिलकर ऋषिकेश में पंद्रह दिनों का ज्ञानोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया है। उस कार्यक्रम में पांच सितम्बर को तथा आठ सितम्बर को इस विषय पर विस्तृत रूप से चर्चा होगी। इस चर्चा के माध्यम से पूरे देश में इस आवश्यकता की भूख पैदा हो यह प्रयत्न होगा। इस विचार मंथन के निष्कर्ष भी समाज के सामने आयेंगे ही। अधिक से अधिक लोगो को ज्ञानोत्सव 2019 में शामिल होना चाहिये।

मंथन क्रमांक 129 ’’विचार और चिंतन” का फर्क–बजरंग मुनि

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विचार और चिंतन एक दूसरे के पूरक हैं। विचार निष्कर्ष है और चिंतन निष्कर्ष तक पहुॅचने का मार्ग। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निरंतर नये नये विचार तथा समस्याएं आती रहती हैं। व्यक्ति चिंतन मनन करके इनमें से कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालता है। ऐसे निष्कर्ष ही कालान्तर में व्यक्ति के विचार और समस्याओं के समाधान बन जाते हैं। जिस तरह कोई वैज्ञानिक भौतिक आधार पर रिसर्च करके कुछ नये निष्कर्ष निकालता है उसी तरह विचारक सामाजिक विषयों पर रिसर्च करके कुछ निष्कर्ष निकालता है। विचारक चिंतक और मौलिक चिंतक भी अलग-अलग होतें है। जब कोई व्यक्ति अनेक विषयों पर ठीक ठीक निष्कर्ष निकालने में सफल हो जाता है तब उसे चिंतक मानना शुरू कर देते है और जब कोई चिंतक विश्व स्तरीय मान्यताओं पर चिंतन करके अब तक प्रसारित कुछ भिन्न निष्कर्ष निकालने में सफल हो जाता है तब उसे मौलिक चिंतक मानना शुरू कर देते हैं।

समाज के सुव्यवस्थित संचालन के लिये प्रत्येक व्यक्ति में विचार और क्रिया का संतुलन होना चाहिये। ऐसा ही संतुलन सामाजिक आधार पर भी आवश्यक है। यदि विचारहीन क्रिया होगी तो समाज में अव्यवस्था का खतरा है। दूसरी ओर यदि क्रिया हीन विचार होगा तब भी अव्यवस्था निश्चित है। दोनों ही स्थितियां अच्छी नहीं है इसलिये समाज में संतुलन आवश्यक है जो वर्तमान विश्व में नहीं है। वर्तमान विश्व में चिंतन का अभाव होता जा रहा है और यदि चिंतन ही नहीं होंगे तो विचार या मौलिक चिंतन की तो कल्पना ही व्यर्थ है। एक अनुमान के अनुसार समाज में दस प्रतिशत के करीब विचारकों की संख्या होनी चाहिये। वर्तमान समय में यह संख्या एक प्रतिशत से भी कम है और निरंतर घटती जा रही है।
यदि हम भारत का आंकलन करें तो भारत की स्थिति तो और भी अधिक खराब है। कुछ हजार वर्ष पूर्व वैचारिक धरातल पर भारत पूरी दुनियां में सबसे अधिक समृद्ध था। भारत विचारों का निर्यात करता था और इस आधार पर दुनियां में भारत का सम्मान था। कुछ हजार वर्षो से भारत में विचारकों और विचारो का अभाव हुआ जिसके परिणाम स्वरूप भारत दुनियां से विचारों का आयात करनें लगा। आज भारत के किसी भी विद्वान से चर्चा करिये तो वह या तो पश्चिम के अनेक विद्वानों के निष्कषो को आधार बनाकर आप के सामने अपने तर्क प्रस्तुत करता है अथवा बहुत पुराने समय के भारतीय विद्वानों के निष्कर्षो को आधार बनाता है। शायद ही कोई व्यक्ति मिले जो किसी भी सामाजिक विषय पर अपनी खुद की राय या निष्कर्ष बता सकें क्योंकि ऐसे चिन्तन का भारत मंे पूरी तरह अभाव हो गया है। यह एक दुःखद स्थिति है किन्तु भारत इस स्थिति को बदल नही पा रहा क्योंकि भारत में कोई ऐसा वातावरण नहीं बन पा रहा है कि विचार और चिंतन की दिशा में किसी का आकर्षण हों।

मैंने इस संकट पर बहुत सोचा। भारत यदि धन-सम्पत्ति, विज्ञान अथवा राजनैतिक क्षेत्र में सारी दुनियां के साथ, प्रतिस्पर्धा कर रहा है तों विचारों के क्षेत्र में भारत पिछड क्यों रहा है? दुनियां में कुछ समय से मौलिक चिंतन का अभाव बढ रहा है और उसका परिणाम है कि भारत दुनियां के अधूरे चिंतन से निकलें निष्कर्षो को ही आधार बना कर उनकी आंख बंद करके नकल करने और उसे आगे बढाने को मजबूर है। मैंने जब भारत में प्रचारित और सर्वस्वीकृत सैकडो सामाजिक विषयों पर गंभीर चिंतन किया तों मैं इस निष्कर्ष तक पहुॅचा कि दुनियां से आयात किये गये अनेक निष्कर्ष न केवल गलत है बल्कि समाज शास्त्र के विरूद्ध भी है, लेकिन भारत में ऐसे विरोधी निष्कर्षो को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है। उसका परिणाम है कि भारत भौतिक उन्नति की ओर तो बढ रहा है किन्तु वैचारिक धरातल पर लगातार गिरावट की दिशा में जा रहा है। भारत में राजनीति शास्त्र, अर्थ शास्त्र, विज्ञान आदि की तो अच्छी शिक्षा प्राप्त हो रही है किन्तु समाजशास्त्र की या तो शिक्षा प्राप्त नहीं हो रही है या अप्रर्याप्त शिक्षा मिल रही है। यदि भारत में किसी बालक में कोई प्रतिभा दिखने लगती है तो उसे प्रारंभिक काल में ही अनेक तरह के संगठन अपने साथ जोडकर उसकी स्वतंत्र विचार क्षमता को गुलाम बनाना शुरू कर देते है। बचपन से ही उसका इस तरह ब्रेनवाश शुरू हो जाता है कि वह स्वतंत्र विचार नहीं कर पाता और वह उस संगठन का एक प्रचारक मात्र बन जाता है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था में इसकी सामाजिक मान्यता थी और लगभग दस प्रतिशत लोग प्रारम्भ में स्वतंत्र विचार मंथन की दिशा में आगे बढते थे लेकिन यह व्यवस्था उलट गई और परिणाम हुआ कि भारत वैचारिक धरातल पर कंगाल हों गया।

मैं भी अपने जीवन में इस संकट से दो चार होता रहा। विभिन्न संगठनों ने मेरी स्वतंत्र विचार क्षमता को अपनी दिशा में मोडने की कोशिश की किन्तु मैं बचता रहा और अब तक बचा हुआ हूॅ। मुझे बहुत लोगो ने यह सलाह दी और अब भी दे रहे है कि विचार तो बहुत हुआ अब क्रिया की आवश्यकता है। मेरा ऐसा मानना है कि क्रिया तो बहुत हो रही है किन्तु विचार नहीं हो रहा। देश में छोटे-छोटे मुद्दों पर गोलियां तक खाने वाले आप को हर जगह मिलेंगे किन्तु ऐसे लोगों का आप कों अभाव दिखेगा जो किसी सामाजिक विषय पर कोई निष्कर्ष निकालने की क्षमता रखते हो। मैं इस संकट से बचा रहा। मैंने अपने जीवन में कुछ नही किया किन्तु मुझे संतोष है कि कुछ न करने के बाद भी मैंने जीवन में बहुत कुछ किया क्योंकि मैं वैचारिक धरातल से उपर उठकर चिंतन की दिशा तक आगें गया और चिंतन से भी आगे बढकर मौलिक चिंतक के रूप में आगे बढ सका। मुझे महसूस होता है कि विभिन्न विषयों पर दुनियां के विचारों का आयात करके जो असत्य धारणा भारत में प्रचारित हो गई है उसे सफलतापूर्वक और बहुत आसानी से चुनौती दी जा सकती है। इतना ही नहीं दुनियां में भारत की जो वर्तमान स्थिति है उसमें भारत विचारों का निर्यात भी कर सकता है।

भारत में ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर भी मैंने विचार किया। भारतीय वर्ण व्यवस्था में विचारकों को सर्वोच्च सम्मान, रक्षकों को सर्वोच्च राजनैतिक शक्ति, पालको को सर्वोच्च सुविधा और सेवकों को सर्वोच्च संतुष्टि की गारंटी और सीमा बनायी गयी थी। जब वर्ण व्यवस्था विकृत हुई और विकृत होने के बाद टूट गयी तब शक्ति सम्मान और सुविधा की छीना झपटी में राजनेता और पूंजीपति आगे निकल गये तथा विचारक धीरे धीरे किनारे होते गये। विचारक को राजनैतिक शक्ति नहीं चाहिये, सुविधा नहीं चाहिये किन्तु सम्मान भी यदि नही होगा तो विचारक बनने वालों की लाइन कमजोर होती जायेगी। वही हुआ और अच्छे अच्छे प्रतिभाशाली लोग भी या तो सत्ता की दौड में चले गये या धन कमाने में लग गये। परिणाम स्वरूप चिंतकों तथा विचारकों का अभाव होना ही था और हुआ भी। इसी के परिणाम स्वरूप भारत विदेशों से विचारों का आयात करने लगा और भारत में भी समाज के समक्ष यह मजबूरी हो गई कि वह राजनेताओं या पूंजीपतियों को ही विचारक मानकर उनका अनुकरण करने लगें। इस संकट से हमें निकलना चाहिये क्योंकि इस संकट का कोई अन्य समाधान नहीं है। मैंने अपने जीवन के पैंसठ सक्रिय वर्ष इस समस्या के समाधान के चिंतन में लगाकर यह निष्कर्ष निकाला कि अब इस प्रकार के प्रयत्नों को आगे बढाने की आवश्यकता है। धीरे-धीरे चिंतक आगे आयेगे तभी विचारों की धारा बढेगी और तभी भारत कुछ मौलिक निष्कर्ष निकालकर दुनियां को दे सकेगा।

यही सोचकर मैंने अपना घर बार छोडकर पिछले छः महीने से ऋषिकेश को केन्द्र बनाया है। इस कडी में हमारा पहला कार्यक्रम इकतीस अगस्त से चैदह सितम्बर दो हजार उन्नीस तक पंद्रह दिनों का ऋषिकेश में होगा। पंद्रह सितम्बर को प्रातः काल समापन होगा। इस कार्यक्रम में एक तरफ कुछ धार्मिक आयोजन भी चलते रहेंगे दूसरी और प्रतिदिन दो विषयों पर गंभीर विचार मंथन भी होता रहेगा। कोशिश की जायेगी कि भावना प्रधान लोग कुछ विचारो में भी रूचि ले तथा उनका महत्व समझे। इस पंद्रह दिवसीय ज्ञान-यज्ञ में देशभर के अधिक से अधिक लोगो को आमंत्रित किया जा रहा है जिनके भोजन और निवास की पूरी व्यवस्था ऋषिकेश के नागरिक करेंगे। मै स्वयं तथा बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान के निदेशक आचार्य पंकज जी जून महीने के दूसरे सप्ताह से एक महीनें तक उत्तर भारत की यात्रा करके सामाजिक समस्याओं के समाधान विषय पर विचार भी रखेंगे तथा पंद्रह दिवसीय इस ज्ञानोत्सव कार्यक्रम के लिये समाज को आमंत्रित भी करेंगे। इस तरह ज्ञान यज्ञ तथा शोध संस्थान के सम्मिलित प्रयास से यह अभिनव प्रयोग किया जा रहा है। आप सबकी स्वीकृति, सहमति और सहयोग की अपेक्षा है।

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