केन्द्र सरकार का महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन

Posted By: admin on May 18, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

National-Institution-for-Transforming-Indiaभारत सरकार ने अपनी नीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए घोषित किया है कि भविष्य में खेती के लिए कृत्रिम खाद को निरुत्साहित तथा जैविक खाद को प्रोत्साहित किया जायेगा। इस बदलाव की गति इतनी अधिक तेज है कि छ0ग0 सरकार ने इसी वर्ष पॉच जिले चयनित करके वहॉ कृत्रिम खाद अर्थात यूरिया आदि को समाप्त करने की योजना बनाई है।
भारत के पारम्परिक किसान लम्बे समय से जैविक खाद को महत्वपूर्ण मानते आ रहे थे। यहॉ तक कि लगभग 60 वर्षो तक पूरी सरकार पूरी ताकत से कृत्रिम खाद को प्रोत्साहित करती रही। किन्तु भारत का पारम्परिक किसान कभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ। मुझे याद है कि 1965 में भारत सरकार ने रामानुजगंज में लगभग निशुल्क यूरिया देना शुरु किया था और फिर भी सामान्य किसान उपयोग करने कि लिए तैयार नहीं थे। मैं एक प्रगतिशील किसान माना जाता था और मेरे उपर सरकारी प्रचार की विश्वसनीयता का रंगीन चश्मा लगा हुआ था। इसी का परिणाम था कि मैंने उस समय किसानों को यूरिया उपयोग बढाने के लिए प्रोत्साहित किया। आज मैं सोचता हॅू कि प्रगतिशीलता के माप दण्ड पर सवार मैंने अंधी सरकारों का अंध समर्थन करके एक गलत कार्य किया था, जिसका मैं दोषी हॅॅू। प्रश्न यह खडा होता है कि सरकारों को यह निष्कर्ष बदलने में सात दशक क्यों लग गये। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण और विचारणीय विषय यह है कि क्या यह सरकार का काम है कि वह खेती में खाद के उपयोग के लिए योजना बनाकर किसी विचारधारा को प्रोत्साहित या निरुत्साहित करे? क्या लम्बे समय से चली आ रही परम्पराओं को आंख मूंद कर बिना सोचे समझे बदलने की परम्परा ही प्रगतिशील होने की निशानी है? आज सरकार फिर से जैविक खादों को प्रोत्साहित करने में अपनी शक्ति लगाकर वैसी ही भूल कर रही हैं। क्या यह अंतिम रुप से सिद्ध हो गया है कि अब कृत्रिम खाद की दिशा में कोई सरकार नहीं जायेगी। सच बात यह है कि खाद कृत्रिम हो या जैविक यह निर्णय करना किसान का काम है सरकार का नहीं। यदि सरकार को कोई विशेष निर्णय दिखता है तो वह किसानों को वैसा निर्णय बता सकती है किन्तु उसके पीछे प्रोत्साहन या निरुत्साहन के लिए शक्ति नहीं लगा सकती। खाद का मामला अकेला ऐसा नहीं है जिसके पीछे सरकारें अनावश्यक शक्ति लगा रही हैं। महिला सशक्तिकरण जैसे अनेक ऐसे प्रयास हैं जिन्हे सरकारें भविष्य में गलत मानकर अपनी नीतियों में बदलाव कर रही है। अभी अभी हमने देखा है कि मकान किराया कानून अथवा दहेज कानून के संबंध में भी सरकारों ने यूटर्न लिया है। मेरी सलाह है कि सरकारों को इस प्रकार के मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। सरकार का काम न महिला सशक्तिकरण है, न किराया कानून बनाना और न ही दहेज कानून बनाना। ये सब काम समाज के है और समाज के कामों में सरकारों को विशेष परिस्थिति में ही हस्तक्षेप करना चाहिए सामान्यतया नहीं। जबकि सरकारें सामान्यतया हस्तक्षेप करती है तथा भविष्य में ऐसे हस्तक्षेप को गलत कहकर यूटर्न लेती है। सरकारों का तो कुछ नहीं बिगड़ता किन्तु समाज को बहुत नुकसान हो जाता है।

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal