न्यायिक सक्रियता कितनी समस्या? क्या समाधान?

Posted By: admin on May 21, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Untitled-1आजकल न्यायपालिका और विधायिका के आपसी संबंधो में प्रत्यक्ष टकराव की भूमिका बन गई है। टकराव सडको पर आना बाकी था जो उत्तराखण्ड मामले में उच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति के विरुद्ध की गई टिप्पणी तथा अरुण जेटली द्वारा राज्यसभा में न्यायपालिका की सीमाओं का ध्यान दिलाने से शुरु हो गया है। टकराव सडको पर आयेगा यह निश्चित
दिखता है, भले ही उसमें एक दो वर्ष की देर भले ही हो जाये।
स्वतंत्रता के पूर्व ही लोक और तंत्र के बीच आपसी संबंधो और सीमाओं को लेकर दो धारणाएॅ थीं 1 गॉधी जी की विचारधारा जो लोक को मालिक और तंत्र को प्रबंधक के रुप में मानकर चलती थी। 2 विचारधारा उन राजनेताओं की थी जो तंत्र को संरक्षक और लोक को संरक्षित मानकर चलती थी। स्वतंत्रता के पूर्व सुभाषचन्द्र बोस तानाशाही के पक्षधर थे, तो सरदार पटेल सीमित मताधिकार के पक्षधर। नेहरु अम्बेडकर बालिग मताधिकार के पक्ष में होते हुए भी केन्द्रित शासन प्रणाली के पक्षधर थे। यह सब होते हुए भी गॉधी जी को जिस तरह लोक का अन्ध समर्थन प्राप्त था, उसके समक्ष ये सब बौने सिद्ध हो रहे थे। गॉधी जी ने पटेल और सुभाष जी की तुलना में नेहरु अम्बेडकर का पक्ष लिया, किन्तु गॉधी के मरते ही ये सब परम स्वतंत्र हो गये।
भारत में संविधान का शासन है शासन का संविधान नहीं। संविधान का शासन लोकतंत्र होता है और शासन का संविधान तानाशाही। स्वतंत्रता के बाद गॉधी की मृत्यु होते ही हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र की लोकनियंत्रित तंत्र वाली परिभाषा को बदलकर लोक नियुक्त तंत्र कर दिया, जिसका अर्थ हुआ कि तंत्र को लोक संवैधानिक तरीके से नियुक्त तो कर सकता है किन्तु संविधान पर अंतिम नियंत्रण तंत्र का ही होगा, लोक का नहीं। इसका अर्थ हुआ कि संविधान संषोधन मे लोक की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी प्रका की भूमिका नही होगी । संविधान संशोधन के सारे अधिकार तंत्र से जुडे तीन अंगों, न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका ने आपस में बांट लिए। इसका अर्थ हुआ कि संविधान इन तीनों अंगो का गुलाम हो गया और जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव हुआ कि तंत्र शासक बन गया क्योकि संविधान पर इन तीनों इकाईयों की संयुक्त प्रक्रिया का एकाधिकार हो गया। यही कारण था कि तंत्र ने स्वयं को सरकार घोषित कर दिया, जबकि उसे स्वयं को प्रबंधक घोषित करना चाहिए था।
सीधा सा सिद्धांत है कि लुटेरे लूट की कार्यवाही को अंजाम देते समय एक जुट रहते है, किन्तु किसी तरह का खतरा समाप्त होने के बाद लूट का माल बटवारा करते समय आपस में विवाद पैदा होते है। तंत्र के तीनों अंगो में भी तत्काल विवाद पैदा हुए जिसकी शुरुवात 1950 में विधायिका ने की। विधायिका ने संविधान संशोधन के सारे अधिकार संविधान लागू होने के एक वर्ष के भीतर ही अपने पास समेट लिए और न्यायपालिका को उससे बाहर कर दिया। कुछ ही वर्षो बाद विधायिका ने राष्ट्रपति के अधिकारों में भी कटौती कर दी। और इस तरह संविधान एक मात्र विधायिका के नियंत्रण में आ गया। न्यायिक समीक्षा से मुक्त होने के बाद विधायिका ने संविधान में बेशर्म तरीके से मनमाने संशोधन किये। संविधान में आरक्षण की सीमा दस वर्ष थी तो मनमाने तरीके से उसे आज तक बढाया जाता रहा। दूसरी ओर संविधान में समान नागरिक संहिता एक नीति निदेशक तत्व था किन्तु कभी समान नागरिक संहिता लागू करने के विषय में कोई प्रयत्न नहीं किया गया। समाज को धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग के आधार पर तोडकर उनमें वर्ग संघर्ष पैदा करने के भरपूर प्रयास किये गये, किन्तु कभी परिवार या गॉव को संवैधानिक अधिकार और मान्यता देने की चिंता नही की गई।एक बार भूल से राजीव गॉधी ने वैसा प्रयत्न किया भी तो उस प्रयत्न को अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभाव हीन बना दिया गया।
आमतौर पर यह माना जाता है कि सत्ता जब तानाशाह होती है तो उसकी प्रत्यक्ष लोकप्रियता भय के कारण बढती है तथा अप्रत्यक्ष लोकप्रियता घटती है। भारत में भी यही हुआ और विधायिका का चरित्र गिरता गया, प्रतिष्ठा गिरती गई और लोकतंत्र के कारण अव्यवस्था बढती गई। ऐसे ही समय में अवसर पाकर न्यायपालिका ने जनहित याचिका तथा मूल ढांचा के नाम पर विधायिका की तानाशाही में अप्रत्यक्ष घुसपैठ की। मैं कह सकता हॅू कि न्यायपालिका ने इन दो असंवैधानिक निर्णयों के द्वारा भारत के लोकतंत्र को बचा लिया अन्यथा भारत में लोकतंत्र का क्या हाल होता यह कल्पना ही की जा सकती है। किन्तु दुनिया में पावर का नशा अन्य सब प्रकार के नसों से ज्यादा प्रभावशाली होता है। और इसलिए न्यायपालिका भी धीरे धीरे पावरफुल होती गई और उस पर सत्ता का नषा सवार होने लगा। न्यायपालिका के तीन काम होते है। 1 व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा चाहे वह संविधान द्वारा ही खतरे में क्यों न आ जाये। 2 संविधान के विरुद्ध बनने वाले कानूनों से संविधान की सुरक्षा। 3 कानून के अनुसार न्याय की पहचान। स्पष्ट है कि विधायिका कानून के अनुसार न्याय को परिभाषित करती है, न्यायपालिका न्याय अन्याय को अलग अलग करती है, तथा कार्यपालिका न्याय को कार्यान्वित करती है। न्यायपालिका को न तो न्याय को परिभाषित करने का अधिकार है न ही कार्यान्वित करने का। ज्यां ज्यों विधायिका न्यायपालिका के समझ झुकती गई त्यां त्यों न्यायपालिका विधायिका के कार्य भी अपने हाथ में लेती गई तथा कार्यपालिका के भी। हद तो तब हो गई जब न्यायपालिका ने कॉलेजियम सिस्टम घोशित करके संविधान संषोधन तक के अधिकार अपने पास समेटने शुरु कर दिये। न्यायपालिका किसी संविधान संषोधन को मूल ढांचे के विरुद्ध घोषित करके शून्य तो घोषित कर सकती है किन्तु उसकी जगह कोई व्यवस्था नहीं दे सकती । किन्तु न्यायपालिका ने किया। न्यायपालिका का मनोबल बढता गया और न्यायपालिका ने उत्तराखण्ड मामले में राष्ट्रपति पर भी अनाधिकार टिप्पणी करने की गलती कर दी। उसका मनोबल और बढा और उसने केन्द्र सरकार को यह आदेश भी दे दिया कि वह सूखे के लिए बजट में प्रावधान करके न्यायपालिका को सूचित करे। विधायिका लम्बे समय से न्यायिक सक्रियता से परेशान थी और सूखे संबंधी आदेश ने विधायिका को मूॅह खोलने का अवसर दे दिया। मैं मानता हॅू कि उत्तराखण्ड संकट विधायिका की ही देन है, न्यायपालिका की नहीं। उत्तराखण्ड विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष ने नैतिकता के विरुद्ध कानून का सहारा लिया तो केन्द्र सरकार ने भी नैतिकता को छोडकर कानून का सहारा लिया और विधानसभा भंग कर दी । न्यायपालिका ने भी अपनी सुविधा अनुसार कहीं नैतिकता का सहारा लिया तो कहीं कानून का। न्यायपालिका का निर्णय भी स्पष्ट रुप से नहीं कहा जा सकता कि उसने कानून के अनुसार न्याय किया अथवा नैतिकता के आधार पर। फिर भी उत्तराखण्ड मामले से जले भुने राजनेताओं ने सूखे संबंधी न्यायिक आदेश को आगे रखकर टकराव का मार्ग चुना।
न्यायपालिका और विधायिका के गुण दोष अलग अलग होते है। न्यायपालिका का आदेष किसी उपर की इकाई में नहीं ले जाया जा सकता। न तो विधायिका उसकी समीक्षा कर सकती है न ही जनता। चूंकि जनता न्यायपालिका को प्रत्यक्ष नियुक्त नहीं करती इसलिए जनता का कोई नियंत्रण भी नहीं है। यदि न्यायपालिका प्रषासनिक आदेश देने लगेगी और वह आदेश गलत होगा तो उसके संषोधन का न लोक के पास कोई मार्ग है न ही तंत्र के पास। संविधान भी ऐसे आदेष मे हस्तक्षेप नही कर सकता। दूसरी ओर यदि विधायिका पर विचार किया जाये तो विधायिका को भी यदि यह अधिकार दे दिया जाये तो इसके दोष स्पष्ट है। विधायिका में बैठा व्यक्ति तानाशाह भी हो सकता है जबकि न्यायपालिका में बैठा व्यक्ति तानाशाह नहीं हो सकता क्योंकि सर्वोच्च पदाधिकारी न्यायपालिका में अल्पकाल के लिए ही हो सकते है जबकि विधायिका में तो अपने मरने के बाद भी अपनी पीढियों के लिए स्थान सुरक्षित कर जाते है। मेरे विचार से न्यायिक सक्रियता में न्यायपालिका से न्यायिक तानाषाही का खतरा है व्यक्ति की उच्श्रृखलता का नहीं। जबकि विधायिका में विधायी तानाशाही का खतरा नहीं हॅ व्यक्ति की तानाषाही का है। इसलिए दोनों इकाइयां मे संतुलन के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि न्यायपालिका विषेष परिस्थितियों में ही कार्यपालिक आदेश दे अन्यथा अपनी सीमा का उलंघन न करे तथा स्वयं को न्यायिक आदेश तक सीमित रखे। इसी तरह विधायिका को भी कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
किन्तु यह कोई समाधान न होकर एक तात्कालिक व्यवस्था मात्र है। लूट का माल यदि वास्तविक मालिक को वापस नहीं हुआ तो टकराव समाप्त नहीं होगा। जब तक संविधान पर तंत्र की इकाइयों का नियंत्रण होगा तब तक यह विवाद नहीं सुलझेगा। इसका आदर्ष समाधान तो यही है कि संविधान संशोधन के असीम अधिकार संसद के पास न रहकर उसमें लोक के भी हस्तक्षेप का कोई न कोई प्रावधान होना चाहिए चाहे वह जनमत संग्रह हो अथवा संविधान सभा द्वारा अथवा लोक संसद जन संसद या कोई और। संविधान पर तंत्र का एकाधिकार सारी बुराईयों की जड है, और उसका समाधान इस एकाधिकार में लोक का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप ही हो सकता है, जो तंत्र के तीनों अंगों में से किसी को स्वीकार नहीं, क्योंकि उनका उददेष्य लूट के माल को मालिक के पास पहुॅचाना नही है।
फिर भी यदि हम वर्तमान स्थिति का विचार करे तो न्यायिक सक्रियता के पूर्व की विधायिका से लोक को खतरा ज्यादा था। अब न्यायपालिका की छोटी छोटी गलतियॉ पुनः विधायिका को मजबूत कर सकती है और यह विधायिका का सशक्तिकरण यदि अधिक बढा तो फिर पुरानी खतरनाक स्थिति की ओर जा सकता है, जिसे न्यायपालिका भी रोक नहीं पायेगी। अच्छा हो कि न्यायपालिका विधायिका को ऐसे अवसर न दे कि विधायिका उसका लाभ उठाकर अपने को मजबूत करने की दिशi में तेजी से आगे बढ सके।
हम लोक के लोग तो किं कर्तव्य विमूढ हैं, कि हम किसका साथ दें। न्यायपालिका और विधायिका संविधान को अपनी अपनी मुट्ठी में रखने की लडाई लड रहे है। जब विधायिका मजबूत थी तो जनमत ने न्यायपालिका का साथ दिया और अब न्यायपालिका सीमा उलंघन कर रही है तो जनमत विधायिका की तरफ झुक रहा है। लेकिन यह तो हमारे लिए कोई आदर्श स्थिति नहीं है। आदर्श स्थिति तो तब होगी जब दोनो में से कोई एक संविधान को अपनी मुटठी से बाहर करने की कोई योजना प्रस्तुत करे। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो हम प्रतीक्षा ही कर सकते है या दोनां के टकराव में कमजोर पक्ष का साथ देकर उसे टकराने के लिए प्रोत्साहित ही कर सकते है। हम उस दिन की प्रतिक्षा कर रहे है जब हमारा संविधान तंत्र की मुठ्ठी से मुक्त होकर खुली हवा मे सांस ले सकेगा तथा लोक के साथ मिलकर तंत्र को नियंत्रित कर सकेगा।

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