न्यायपालिका

Posted By: admin on May 27, 2016 in Recent Topics - Comments: No Comments »

Law

व्यक्ति तथा ना गरिक की भूमिकाएॅ अलग अलग होती है, भले ही दोनों का संचालक एक ही होता हैं। व्यक्ति समाज का अंग होता है तो नागरिक राष्ट्र का। व्यक्ति के रूप में उसे मौलिक तथा सामाजिक अधिकार प्राप्त होते है तो नागरिक के रूप में संवैधानिक । किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार छीन लेने के बाद भी उसके मौलिक तथा सामाजिक अधिकार रह सकते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा तथा उच्चश्रृंखलता पर नियंत्रण तंत्र का दायित्व होता है तथा समाज का कर्तव्य। समाज उच्चश्रृखलता को सिर्फ अनुशासित ही कर सकता है, नियंत्रित नहीं। क्योंकि समाज को दंडित करने का अधिकार नहीं है। लोक तंत्र में तंत्र तीन इकाइयों के तालमेल से अपना काम करता हैं- 1 विधायक 2 न्यायपालिका 3 कार्यपालिका। प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा ही उसके प्रति न्याय है तथा उच्चश्रृखलता पर नियंत्रण ही उसकी व्यवस्था। विधायिका न्याय को परिभाषित करती है , न्यायपालिका उक्त परिभाषा के अनुसार न्याय और दण्ड की मात्रा तय करती है तथा कार्यपालिका न्यायालय के निर्णय अनुसार कार्यान्वयन करती है। व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की संपूर्ण सुरक्षा न्यायालय का महत्वपूर्ण दायित्व हैं । यदि ऐसी असुरक्षा किसी व्यक्ति से हो तो न्यायालय तंत्र की अन्य इकाइयों के साथ मिलकर सुरक्षा देता है। और यदि असुरक्षा तंत्र के ही किसी भाग से हो तो न्यायालय संविधान के अनुसार उसकी सुरक्षा करता है और यदि संविधान भी ऐसे मौलिक अधिकारों के विरूद्ध कुछ करे तो न्यायालय ऐसे संविधान संशोधन को भी अमान्य कर सकता है।

व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा की व्यवस्था के साथ साथ न्यायपालिका व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा में भी सक्रिय रहती हैं। यद्यपि मौलिक अधिकारों की सुरक्षा न्यायालय का दायित्व है तो संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा उसका स्वैच्छिक कर्तव्य।
नई व्यवस्था में निम्न संशोधन प्रस्तावित है-
1 पश्चिम की न्याय की अवधारणा है कि चाहे सौ अपराधी छूट जाये किन्तु एक भी निरपराध दडिंत न हो । इसे बदलकर इस तरह किया जायगा कि न कोई निरपराध दंडित हो, न कोई अपराधी छूट सके।
2 प्रशिक्षण कैंप लगाकर न्यायाधीशो को प्रशिक्षित किया जायगा कि ( क) वे अपराध गैर कानूनी तथा अनैतिक का अंतर समझे।
( ख) वे पुलिस द्वारा सिद्ध अपराधी को न्यायिक प्रक्रिया चलते तक संदिग्ध माने, निर्दोष नहीं।
( ग) वे पुलिस को न्याय सहायक समझे, पक्षकार नही।
( घ) वे अपनी सीमाएं समझें जिसके अनुसार वे किसी व्यक्ति को सीधा न्याय नहीं दे सकते ,बल्कि कानून के अनुसार ही फैसला करने तक सीमित हैं। यदि कोई कानून गलत है तो वे कानून को रदद कर सकते है और संविधान की धाराएं भी रदद कर सकते है किन्तु निर्णय करते समय जो कानून हैं, न्यायालय उसके विरूद्ध नहीं जा सकते।
(च ) न्यायपालिका किसी कानून या संवैधानिक प्रावधान को रदद कर सकती है किन्तु कोई कानून बना नहीं सकती।
( छ) न्यायपालिका न तो जनहित को परिभाषित कर सकेगी न ही जनहित याचिकाएं सुन सकती हैं।
3 न्यायपालिका किसी भी सामाजिक मामले में कभी कोई दखल नहीं दे सकती । वर्तमान में न्यायालय में लम्बित ऐसे करोडो मुकदमे तुरंत समाप्त हों जायेंगे।
4 न्यायपालिका पांच प्रकार के अपराधो से जुडें मामले प्राथमिकता के स्तर पर देखेगी।
5 अधिकांष न्यायिक प्रकरण तो परिवार, गांव, स्तर तक ही निपट जायेंगे, कुछ ही मामले न्यायालय तक जायेंगे।
6 किसी भी आपराधिक मामले का अंतिम निर्णय जिला जज ही करेंगे। कोई अपील होने पर उच्च न्यायालय उक्त लोक प्रदेश के या विशेष स्थिति में किसी भी अन्य जिला जज या जिला जजो की टीम को पुनःपरीक्षण या पुनः विचार हेतु भेज सकता है किन्तु निर्णय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय नहीं दे सकता। उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय अन्य कानूनी या संवैधानिक मामलो तक सीमित रहेंगे।
7 पांच प्रकार के अपराधों में संलिप्त मुकदमों में दोष सिद्धि का भार अभियुक्त पर होगा। सबसे पहले अभियुक्त के बयान होंगे तथा पुलिस या न्यायालय उससे जिरह कर सकेगा।
8 न्यायालय में सच बोलने वाले और झूठ बोलने वाले अभियुक्त के दंड में युक्ति संगत इतना फर्क किया जायगा कि न्यायालय में सच बोलने की प्रवृत्ति प्रोत्साहित हो।
9 किसी भी मामले में कानून अधिकतम दंड निर्धारित कर सकता है किन्तु न्यूनतम दंड नहीं। न्युनतम दण्ड की मात्रा न्यायालय पर निर्भर होंगी।
10 किसी मामले में अनावश्यक अपील करने वालो से भारी अर्थदंड लिया जायेगा।

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