मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 8, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा मजबूत का भी नहीं हो सकता।आवश्यक है कि शोषित कमजोर, हो मजबूर हो और शोषण से सहमत हो। शोषण कभी भी अपराध नहीं होता न ही समाज विरोधी कार्य होता है। शोषण किसी के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करता किन्तु शोषण अनैतिक और असामाजिक कार्य हो सकता है।
एक बुढिया किसी प्यास से छटपटा रहे राजा से एक गिलास पानी के लिये उसका आधा राजपाट मांग ले तो यह बुढिया द्वारा किया गया शोषण नहीं माना जाता। किन्तु कोई अमीर किसी प्यासी बुढिया से एक गिलास पानी के लिए उसकी मजबूरी का लाभ उठाकर उसकी जमीन ले ले तो यह उस अमीर द्वारा किया गया शोषण माना जायेगा । वर्तमान समय में मुख्यशोषण पांच प्रकार के माने जाते है- 1 अमीरों द्वारा गरीबों का 2 बुद्धिजीवियों द्वारा श्रम का। 3 परिवार व्यवस्था में पुरुषों द्वारा महिलाओं का 4 राजनैतिक शक्ति प्राप्त तंत्र द्वारा लोक का। 5 सवर्णाे द्वारा अवर्णो का। 6 धूर्त व्यक्तियों द्वारा शरीफ लोगो का। ये छः प्रकार के शोषण समाज में लम्बे समय से चल रहे है और आज भी चल रहे है । वैसे तो शोषण शब्द का दुरूपयोग सभी राजनेता करते है किन्तु साम्यवादी और समाजवादी शोषण शब्द का दुरूपयोग करने मे सबसे आगे रहते है। ये लोग आर्थिक सामाजिक गैर बराबरी को तो शोषण मानकर बहुत हल्ला करते है किन्तु राजनैतिक गैर बराबरी को निरंतर बढाते चले जाते है। जबकि राजनैतिक असमानता शोषण का सबसे बडा हथियार है। राज्य जितना ही इस प्रकार के शोषण को रोकने में हस्तक्षेप करता है उतना ही शोषण अधिक बढता जाता है भले ही उसका स्वरुप क्यों न बदल जाये। क्योंकि सच्चाई यह है कि किसी प्रकार का शोषण रोकने के लिए राज्य किसी वर्ग को विशेष अधिकार देता है और उसका यह दुष्परिणाम होता है कि उस वर्ग के धूर्त लोग दुसरे वर्ग के शरीफ लोगों का शोषण शुरु कर देते हैं। इस तरह शोषण रोकने के नाम पर शोषण करने वाले धुर्त लोगों का एक नया वर्ग खडा हो जाता है जिसका समाधान राज्य नहीं कर पाता क्योंकि राज्य ही ऐसे वर्ग के धुर्तो को संरक्षण देता है। मकान मालिक के विरुद्ध किरायेदारों को संरक्षण दिया गया । दहेज के विरुद्ध महिलाओं को संरक्षण दिया गया। अथवा जाति प्रथा के विरुद्ध अवर्णो और आदिवासियों को संरक्षण दिया गया। इन सबका परिणाम एक ही है कि संरक्षित वर्ग के धुर्तो ने असंरक्षित वर्ग के शरीफों का शोषण किया। एक दूसरी स्थिति यह भी बनी कि राज्य समाज का सबसे बडा शोषक होता है। राज्य शोषण रोकने के नाम पर शक्ति अपने पास इक्टठी करते जाता है और उस शक्ति का दुरुपयोग शोषण के रुप में प्रकट हो जाता है। जनहित के नाम पर देश में ऐसे हजारों कानून बने है जो राज्याश्रित शोषण के हथियार का काम करते है।
मजबूत द्वारा कमजोर की कमजोरी का लाभ उठाना ही शोषण माना जाता है। शोषण अपराध नहीं होता किन्तु अनैतिक होता है। शोषण रोकने का सबसे अच्छा तरीका है कमजोर की मजबूरी को कम करने का प्रयास, किन्तु राजनेता ऐसा प्रयास न करके हमेषा मजबूत की मजबूती को कम करने का प्रयास करता है। परिणाम होता है वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष और लाभ होता बिचैलिये का अर्थात तंत्र को । एक व्यक्ति मजबूरी मे किसी संपन्न व्यक्ति के घर मे पचास रूपये मे काम कर रहा है जबकि उसकी उचित मजदूरी दो सौ रूपये और सरकार द्वारा घोषित ढाई सौ रूपया है। तंत्र से जुडे लोग उस काम कर रहे व्यक्ति को पचास रूपये मे भी काम देने की व्यवस्था न करके काम करने वाले और काम देने वाले के बीच टकराव पैदा करते है । मै समझता हॅू कि यह भी एक प्रकार का शोषण है । छत्तीसगढ के मजदूर अधिक मजदूरी के लिये बाहर काम करने जाते है । छत्तीसगढ सरकार उन्हे शोषण से बचाने के नाम पर या तो रोकती है या कई प्रकार के कानूनो से जकडती है। इससे उन जाने वालो का लाभ हुआ या नही यह अलग प्रश्न है किन्तु छत्तीसगढ के उद्योग पतियों का अवश्य लाभ होता है। जिससे उन्हे कम मजदूरी मे मजदूर मिलते रहते है। विचार करिये की शोषण बढा या घटा। भारत का हर पूंजीपति और बुद्धिजीवी पूरा प्रयत्न करते है कि कृत्रिम उर्जा सस्ती हो जिससे उन्हें अप्रत्यक्ष सस्ता श्रम मिलता रहे । विचार करिये कि यह प्रवृत्ति श्रम शोषण है या नहीं। महिलाओं का शोषण कभी नही होता या तो बलात्कार होता है या धोखा, किन्तु महिला शोषण रोकने के नाम पर महिला और पुरूष के बीच एक दीवार खडी की जाती है जिसका लाभ तंत्र उठाता है।एक रोटी के लिये भूखी महिला को रोटी देकर एक यौन भूखा पुरूष अपनी भूख मिटाता है तो नैतिक तरीके से दोनो की भूख मिटाने की व्यवस्था न करके दोनो के बीच बाधा उत्पन्न करने वालो को यदि शोषक न कहा जाय तो क्या कहा जाय? आज कल प्राइवेट स्कूलो की फीस के नाम पर बहुत नाटक हो रहा है। यू पी के मुख्य मंत्री भी इस बहती गंगा मे हाथ धो रहे है। वर्तमान मे मंहगी फीस लेकर पढा रहे प्राइवेट स्कूलो को रोकने की अपेक्षा क्यो न हम कम फीस वाले अच्छे स्कूल शुरू करते है । कौन रोकता है आपको स्वस्थ प्रतियोगिता से? किन्तु करना धरना तो कुछ है नही और जो कुछ हो रहा है उसे शोषण के नाम पर अव्यस्थित करना ही आज की राजनीति है। ऐसे लोगो के चमचे भी उनकी प्रषंसा करके उन्हे और मजबूत करते रहते है।
किसी कमजोर के साथ करने योग्य व्यवहार मजबूत का कर्तब्य होता है कमजोर का अधिकार नही। समानता का व्यवहार करना भी मजबूतों का कर्तव्य होता है,कमजोरों का अधिकार नहीं। राज्य हमेशा मजबूत के करने योग्य व्यवहार को कमजोर का अधिकार बताकर वर्ग संघर्ष की परिस्थितियां पैदा करता रहता है। इससे समाज मे टूटन तो आती है किन्तु लाभ किसी का नही होता । स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे की आप सहायता तो कर सकते है किन्तु आगे निकल रहे के निकलने में बाधा पहुचाना आपका आपराधिक कृत्य होगा।
शोषण रोकना परिवार व्यवस्था का काम है समाज व्यवस्था का काम है। सरकार का नही। शोषण रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार और गांव की होती है क्योंकि परिवार और गांव द्वारा आंतरिक व्यवस्था में सबकी सहमति समान होती है । मैं मानता हॅू कि वर्तमान समय में ऐसी समानता का अभाव है और इस अभाव का दुष्परिणाम शोषण के रुप में सामने आता है। किन्तु ऐसी व्यवस्था बनना बहुत कठिन नहीं क्योंकि परिवार व्यवस्था यदि लोकतांत्रिक है तो उसमें शोषण हो ही नहीं सकता। शोषण का अंतिम आधार समाज व्यवस्था है प्राचीन समय में समाज को यह अधिकार था कि वह किसी प्रकार के अनैतिक कार्य के विरुद्ध अपने बहिष्कार रुपी अधिकार का प्रयोग कर सके। जब से राज्य व्यवस्था मजबूत हुई और उसमें परिवार गांव और समाज के अनुशासन के यह बहिष्कार रूपी हथियार पर भी रोक लगाकर अपना हस्तक्षेप बढा दिया तब से सम्पूर्ण समाज का शोषण का ठेका राज्य रुपी एकमात्र इकाई के पास चला गया। अब समाज न तो शोषण को रोकने में कुछ कर सकता है न ही राज्य को नियंत्रित कर सकता है क्योंकि जनहित की परिभाषा राज्य करता है। शोषण की परिभाषा भी राज्य ही करता है तथा राज्य जब चाहे तब शोषण को अपराध या अपराधों को शोषण के रुप में बदल सकता है। मेरा अंत में सुझाव है कि शोषण मुक्ति के लिए सबसे पहले शोषण और अपराध को अलग अलग करे। शोषण मुक्ति से राज्य को अलग करें। तथा शोषण मुक्ति में परिवार गांव तथा समाज को अधिक सक्रिय करने का प्रयास करें।
मंथन का अगला विषय ‘‘समाज में बढते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’ होगा।

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