मंथन क्रमांक-31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज

Posted By: admin on April 29, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मंथन क्रमांक 31
कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं-
1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं।
2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात्र होता है अर्थात समाज मालिक होता है और राष्ट्र मैनेजर।
3 राष्ट्र कई प्रकार के होते है लोकतांत्रिक,तानाशाही,इस्लामिक,धर्मनिरपेक्ष आदि। राष्ट्र और देश लगभग समानार्थी होते है।
4 राष्ट्र की एक सरकार होती है,व्यवस्था नहीं। समाज की एक व्यवस्था होती है,सरकार नहीं।
कश्मीर की समस्या भारत की राष्ट्रीय समस्या है,सामाजिक नहीं। कश्मीर भारत में रहे या पाकिस्तान में या स्वतंत्र यह समाज का विषय नहीं है क्योंकि यह सामाजिक समस्या नहीं है किन्तु यह राष्ट्र और सरकार के लिए चिंता का विषय है।
इसलिए कश्मीर की बिगडती हुई स्थिति से सरकार अधिक चिंतित है,समाज कम। यदि हम सामान्य रुप से विचार करे तो यह बात न्याय संगत लगती है कि जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान के साथ जुडना चाहते है और उसके लिए मरने मारने को तैयार है तो हम उन्हे क्यों बलपूर्वक तकनीकी आधार पर अपने साथ रखने का प्रयास करें। स्पष्ट दिख रहा है कि कश्मीर को भारत में बनाये रखने में भारत के नागरिकों को बहुत अधिक खर्च करना पडता है। वह खर्च सैनिक भी होता है और उनकी व्यवस्था पर भी। विश्व स्तर पर भी कश्मीर को साथ रखने से देश का कोई बहुत अधिक सम्मान नहीं बढता । इसलिए क्यों न कश्मीर में जनमत संग्रह की बात मान ली जाये। सामान्यतया तो यह तर्क उचित दिखता है किन्तु यदि व्यावहारिक धरातल पर आकलन करें तो कश्मीर समस्या भावनात्मक नहीं बल्कि वास्तविक है। कश्मीर समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच की कोई भूभाग तक सीमित समस्या नहीं है, जैसा कि आमतौर पर लोग मानते है। मेरे विचार में तो पाकिस्तान इसमें कोई पक्षकार है ही नहीं बल्कि वह तोे इस्लामिक देश होने के नाते तथा इस विवाद में लाभ उठाने तक सीमित हैै। वास्तविक समस्या इस्लामिक विस्तारवाद से जुडी है। सारी दुनिया में जिस तरह दारुल इस्लाम के संगठित प्रयास हो रहे है उन प्रयासों में भारत का कश्मीर एक ऐसा क्षेत्र है जो वर्तमान में उस प्रयास को रोकने का युद्ध क्षेत्र है। कटटरपंथी इस्लाम में सारी दुनिया में युद्ध के अलग अलग फ्रंट खोल रखे है। कश्मीर उनमें ंसे मात्र एक है। ऐसी बात नहीं है कि कश्मीर छोड देने से इस्लामिक कटटरवाद से भारत को मुक्ति मिल जायेगी। बल्कि उससे ठीक आगे बढकर एक नया टकराव का क्षेत्र खुल जायेगा और हम कमजोर हो जायेंगे । यह भ्रम है कि कश्मीर विवाद तकनीकी कारणों से है। सच्चाई यह है कि कश्मीर विवाद इस्लामिक विस्तारवाद का एक युद्ध क्षेत्र है और वह भारत के लिए जीवन मरण का प्रश्न है । यही कारण है कि कश्मीर मुददे पर मैं भारत पाकिस्तान के बीच अथवा न्याय अन्याय के बीच कोई विचार नहीं करना चाहता। बल्कि मैं इस बात से सहमत हॅू कि किसी भी स्थिति में कश्मीर को भारत में बनाये रखना चाहये।
मैं जानता हॅू कि दुनिया में मुसलमान कभी किसी भी परिस्थिति में सहजीवन को स्वीकार नहीं करता । यदि वह कमजोर होता है तो दबकर मजबूत होने की प्रतिक्षा करता है और मजबूत होता है तो दबाकर दूसरे के समाप्त होने का प्रयत्न करता है।वह हर समय मरने मारने के लिए तैयार रहता है। वह अनंतकाल तक लडने में विश्वाश करता है क्योकि वह इसे धर्म युद्ध समझता है। इस तरह यह सोचना ही व्यर्थ है कि कश्मीर के मुस्लिम बहुमत को कभी समझाया जा सकता है। क्योंकि वह समाज से भी उपर और राष्ट्र से भी उपर अपने धार्मिक संगठन को मानता है जिसका बहुत बडा हिस्सा भारत के बाहर रहता है।
विचारणीय यह है कि भारत सरकार को क्या करना चाहिये और भारतीय समाज को क्या करना चाहिये। भारतीय सरकार के लिए तो यह स्पष्ट है कि उसे साम दाम दण्ड भेद किसी भी तरीके से कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखना चाहिये। किन्तु सामाजिक आधार पर कुछ स्थिति जटिल है। भारत में 95 प्रतिषत ऐसे लोग है जिन्हें अपनी रोजी रोटी की चिंता है और वे इन मुददों पर ध्यान नहीं दे पाते। पांच प्रतिषत ऐसे लोग है जो इन मुददों पर सोचते है । इनमें कुछ विचारक कुछ रिटायर्ड लोग तथा अधिकांश राजनेता या उनके कार्यकर्ता शामिल होते है। ये लोग दो विचारधाराओं में बटे हुये है। एक वे है जो अप्रत्यक्ष रुप से वामपंथी इस्लामिक संगठनों से सहानुभूति रखते है। ऐसे सभी लोग दिन रात बिना मांगे सरकार को कष्मीरियों से बातचीत की सलाह देते है। ये लोग इससे भी आगे बढकर पाकिस्तान से भी बातचीत के लिए निरंतर दबाव बनाये रखते है।ये अपने को धर्मनिरपेक्ष कहते है किन्तु होते है पूरी तरह अल्पसंख्यक समर्थक। दूसरा समूह उन लोगों का है जो अपने को राष्ट्रवादी कहते है। ऐसे लोग बिना मांगे सरकार को हिंसा करने की सलाह देते रहते है। इन्हे न विश्व समीकरण की चिंता है न ही जीत हार की। ये तो सिर्फ मार दो कुचल दो के अलावा कुछ अन्य बोलते ही नहीं। ऐसे लोग अपने शहर के किसी नामी गुण्डे के खिलाफ गवाही तक नहीं दे सकते किन्तु अपने शहर में पाकिस्तानी राष्ट्रपति का पुतला जलाने में बहुत उछलकूद करते दिखते हैं। यदि कश्मीर में या पाकिस्तान के बार्डर पर पांच सैनिक शहीद हो जाते हे तो इन नकली राष्ट्रवादियों की उछलकूद देखते ही बनती है। भले ही अगर डाकू हमारे जिले के पांच लोगों की हत्या कर दे तो इनकी सक्रियता नहीं दिखती। ये दोनों ही विचारधाराओ के लोग गलत है तथा वास्तविक समस्या से ध्यान हटाते है। यदि ये आपस में लडते रहे तो कोई बहुत बडा नुकसान नहीं होता किन्तु ये आपस में तो सिर्फ मौखिक लडाई लडते है और उसका नुकसान शांतिप्रिय लोगों को उठाना पडता है।
मैं मानता हॅू कि सैनिक भी हमारी सुरक्षा के लिए ही नियुक्त है और उनका भी बहुत महत्व है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि किसी सैनिक और किसी गांव के किसान या मजदूर के बीच में अन्ययापूर्ण अंतर होना चाहिये। एक सैनिक,एक प्रोफेसर,एक डाक्टर,एक वैज्ञानिक और एक गंभीर विचारक के बीच में सबका अलग अलग महत्व है। सिर्फ सैनिक का ही नहीं। एक सैनिक की मृत्यु पर यदि एक करोड रुपया दिया जाता है तो किसी ग्रामीण को हाथी या सरकारी भालू द्वारा मार दिये जाने पर दो लाख रु. इस तरह दिया जाता है जैसे कोई जूठन दी जा रही हो। जबकि वह सैनिक उस ग्रामीण के दिये हुए टैक्स से ही अपने दायित्व पूरे करता है। मैं नहीं समझता कि अंतर इतना क्यों होना चाहिये। जब सैनिक राष्ट्र के लिए प्राण न्यौछावर करते है तो फिर वे जंतर मंतर पर धरना क्यों देते है।क्या उन्हे प्राप्त सुविधायें भारत के औसत नागरिकों से कम है। यदि वे यह सोचते है कि जिस तरह राजनेता दोनों हाथों से देश को लूटते रहे है उसी तरह उन्हे भी उसका हिस्सा चाहिए तब तो उनके प्रदर्शन का कुछ औचित्य है अन्यथा मैं नहीं समझता कि सैनिकों को प्राप्त सम्मान कम है और अपनी सम्मान वृद्धि के लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए। जिस तरह एक सैनिक ने अपने कार्य की चिंता छोडकर खाने की थाली दिखाने का नाटक किया तथा उसे अनावश्यक महत्व मिला अथवा जिस तरह किसी सैनिक की लाश को जाते समय मुख्यमंत्री की गाडी को भी रोक देनी की सलाह दी गई अथवा जिस तरह किसी सैनिक की मृत्यु पर अलग अलग सहायता देने की सरकारों में होड मच जाती है यह मुझे लगता है कि राष्ट्रभक्ति का नकली नाटक मात्र हैं। उससे तो वास्तव में यह विचार बनता है कि इनमें कितनी राष्ट्र भक्ति है और कितनी नौकरी।
कश्मीर के लिए कुछ राजनेताओं के दलाल अथवा राष्ट्र भक्त लोग सारे देश भर में वातावरण बनाते है वह भी बहुत हानिकारक है। उससे हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक समस्या पर से ध्यान बट जाता है।हमने कश्मीर समस्या के सुलझाने के लिए एक सरकार को दायित्व दे दिया है। सरकार पर हमें विश्वास है कि उसकी नीयत ठीक है तो हमें उस मामले में क्योें बार बार चिंता व्यक्त करनी चाहिये। हमने एक गाडी चलाने के लिए ड्राईवर रखा हुआ है और ड्राईवर ठीक तरीके से बल्कि मालिक से भी अच्छा गाडी चलाने जानता है। तो हमें बार बार उस ड्राईवर को गाडी चलाते समय क्यों सलाह देनी चाहिये। ऐसी सलाह प्रायः नुकसान करती है। जब न तो सरकार सलाह मांग रही है न ही सेना सहायता मांग रही है तो हमें अनावश्यक देश भर में वातावरण खराब नहीं करना चाहिये। सरकार यदि बातचीत करना ठीक समझती है तब भी ठीक है और यदि वह टकराना चाहती है तब भी ठीक है । क्या करना है यह उसके उपर निर्भर है।
मैं समझता हॅू कि कश्मीर समस्या इस्लामिक कट्टरवाद से जुडी हुई है पाकिस्तान से नहीं। ऐसी स्थिति में यदि हम भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच आपसी संबंधों को शांतिपूर्ण बनाये रखने की मिसाल पेश कर सके तो वह मिसाल कश्मीर समस्या के मामले में भारत के लिए कवच का काम करेगी । क्या बिगड जायेगा अगर दो चार वर्ष गायों का आन्दोलन और विलंबित हो जाये। क्या बिगड जायेगा अगर मंदिर का आन्दोलन भी कुछ और बाद में हो जाये। अभी सरकार बनी है और हम भारत के लोग अपना सहजीवन का सिद्धांत छोडकर भारत के मुसलमानों से बदला देने की जल्दबाजी शुरु कर दे तो यह हिन्दुत्व की मूल अवधारणा के तो विरुद्ध है ही साथ ही इसका कश्मीर समस्या पर निश्चित ही बुरा असर पडेगा। क्या यह उचित नहीं होगा कि हम कश्मीर से बाहर की अपनी हिन्दू मुस्लिम समस्या को सरकारी स्तर पर स्वाभाविक रुप से निपटने दे। कोई ऐसा पहाड नहीं टुटने वाला है कि भाारत मुस्लिम राष्ट्र बन जायेगा। इतना ही तो होगा कि भारत हिन्दू राष्ट्र न बनकर धर्म निरपेक्ष रह जायेगा । अब वह स्थिति कभी नहीं आने वाली है जैसा 70 वर्षो तक हुआ और भारत सरकार ने भारत के मुसलमानों को अधिक महत्व देकर हिन्दुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा। जो लोग ऐसा समझते है कि हिन्दू मुस्लिम एकता हो ही नहीं सकती वे भ्रम में है। वे जाकर ऐसा प्रयोग रामानुजगंज में जाकर देख सकते है जहाॅ कटटरपंथी हिन्दू और मुसलमान सामाजिक एकता के समक्ष पूरी तरह दबे हुये है।
अंत में मेरी तो सही सलाह है कि भारत के लोगों में किसी भी प्रकार की धार्मिक उत्तेजना हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए भी गलत है, देश के लिए भी गलत है और समाज के लिए भी। साथ ही हमारी यह उत्तेजना कश्मीर समस्या पर भी बूरा प्रभाव डालती है। भले ही हम भारत के मुसलमानों के खिलाफ नारे लगावे या कश्मीरी आन्दोलन के खिलाफ। हम यदि अपनी स्थानीय सामाजिक व्यवस्था को ठीक से चला ले और सरकार को राष्ट्रीय या कश्मीर समस्या से निपटने के लिए खुली छूट दे दे तो भले ही हमारे अहम की तुष्टि न हो किन्तु हमारा भारत स्वर्ग बन सकता है ऐसा मुझे दिखता है।
मंथन 32 का अगला विषय होगा उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क।

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