मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा

Posted By: admin on June 10, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते है अन्यथा अधिकांश व्यक्ति या तो ईश्वर के भय से ठीक चलते है या सामाजिक बहिष्कार के डर से। और यदि दोनों का भय न हो या असफल हो जाये तब दण्ड का भय ही उन्हें रोक सकता है। स्पष्ट कर दॅू कि समाज या तो समझा सकता है या सिर्फ बहिष्कार कर सकता है दण्डित नहीं कर सकता। दण्ड तो राज्य ही दे सकता है। वर्तमान समय में ईश्वर का भय सीमित होता जा रहा है। समाज तोड दिया गया है और राज्य अपना काम छोडकर समाज या ईश्वर के काम में लग गया है। आदर्श स्थिति में समाज को भय रहित होना चाहिये और अपराधियों को भयभीत। भारत में समाज विभिन्न कानूनों के कारण भयग्रस्त है और अपराधी लगभग भय मुक्त।
किसी अपराध के लिए दण्ड की मात्रा और तरीका क्या हो यह किसी सिद्धांत पर निर्भर न होकर परिस्थितियों पर निर्भर करता है। उद्देश्य है अपराधियों को भयग्रस्त करना। दण्ड की मात्रा और तरीका उसी पर निर्भर करता है। कोई भी दण्ड कभी मानवीय नहीं हो सकता। इसलिए दण्ड की मात्रा और तरीका समाज पर पडने वाले प्रभाव और मानवता के बीच तालमेल करके चलता है। दण्ड मानवीय हो यह कथन पूरी तरह अव्यवस्था फैलाने वाला है। यदि हम वर्तमान अव्यवस्था की समीक्षा करें तो उसका सबसे बडा कारण यह है कि दण्ड और मानवता को एक साथ जोड दिया गया। कुछ लोग तो यहाॅ तक सक्रिय दिखे कि उन्हें बाहर के लोगों के जीवन स्तर की कभी चिंता नहीं रही किन्तु जेल सुधार के नाम पर उन्होने सारा जीवन खपा दिया। किरण बेदी स्पष्ट उदाहरण है।
दण्ड में भी फांसी हो या ना हो यह चर्चा का विषय नहीं हो सकता। दण्ड के तीन उद्देश्य होते है – (1) अपराधियों में सुधार (2) पीडित को संतोष (3) समाज में अपराध के प्रति भय का संदेश । यदि हम फांसी की सजा पर चर्चा को केन्द्रित करें तो इसमें व्यक्ति के सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। पीडित को संतोष भी सामान्य सरीखा ही होता है। किन्तु समाज को दिया जाने वाला संदेश बहुत अधिक महत्वपूर्ण होता है और इस संदेश की बहुत आवश्यकता है। यही कारण है कि राज्य समय समय पर मृत्युदण्ड का उपयोग करता है। मृत्युदण्ड को घोषित रुप से तो कभी बंद करना ही नहीं चाहिये। बल्कि यदि समाज में अपराधी भय मुक्त हो रहे है तो मृत्युदण्ड की मात्रा को अधिक बढा देना चाहिए। मैंने मृत्युदण्ड विरोधी विचारधारा के कुछ लोगों का आकलन किया तो अधिकांश या तो किसी विदेशी धन प्राप्त संगठन के सदस्य मिले अथवा साम्यवादी विचारधारा के लोग। साम्यवादी प्रभाव वाले देशो में किस तरह आम लोगों को खुलेआम मार दिया गया, लाखों करोडो की संख्या में यह विश्व विदित है। आज भी वामपंथ प्रभावित नक्सलवादी किस तरह मृत्युदण्ड देते है यह मैंने स्वयं देखा है। इसलिए ऐसे लोगों की चर्चा करना व्यर्थ है। मेरे विचार में वर्तमान समय में भारत में फांसी की सजा को और अधिक उपयोग में लाने की जरुरत है। यदि इसके बाद भी प्रभाव न पडता दिखे तो खुली फांसी का भी प्रयोग किया जा सकता है और यदि आवश्यक हो तो नमूने के तौर पर इससे भी अधिक वीभत्स तरीके से मृत्युदण्ड दिया जा सकता है। किन्तु यह नहीं हो सकता कि अपराधियों के मन से भय निकल जाये।
इन सबके बाद भी मैं इस पक्ष का हॅू कि न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र होनी भी चाहिये और दिखनी भी चाहिये। मृत्युदण्ड के मामले में विशेष रुप से न्यायपालिका को सतर्क रहना चाहिये कि कोई निरपराध दण्ड न पा जाये और कोई अपराधी बच न जाये। इस प्रकार के गंभीर अपराधों का निपटारा भी एक वर्ष के अंदर हो जाना चाहिये भले ही अन्य कार्य क्यों न पिछड जाये। इस प्रकार के गंभीर अपराधों में न्यायपालिका को गुप्तचर न्यायालय की भी सहायता लेनी चाहिये। जिससे निष्पक्षता प्रभावित न हो।
फिर भी मैं मृत्युदण्ड का एक विकल्प प्रस्तावित कर रहा हॅू। मृत्युदण्ड का मुख्य उद्देश्य समाज पर पडने वाला दीर्घकालिक प्रभाव है। फांसी दे देने के बाद कुछ वर्षो में वह प्रभाव भूल जाता है। मैं सोचता हॅू कि यदि फांसी की सजा पाया व्यक्ति न्यायालय से जमानत देकर निवेदन करे कि वह कुछ समय के लिए दोनों आंख निकालकर तथा अंधा रहकर जीना चाहता है तो न्यायालय उसे उचित शर्तो और उचित जमानत के आधार पर तब तक के लिए छोड सकता है जब तक वह स्वयं और जमानत देने वाला सहमत है। यह सुझाव मृत्युदण्ड घोषित व्यक्ति के लिए एक विकल्प के रुप में है, बाध्यकारी नहीं । जमानत देना न्यायालय के लिए भी बाध्यकारी नहीं है।
मैं उचित समझता हॅू कि फांसी की सजा सदा के लिए बंद हो जाये इसके लिए आवश्यक है कि एक बार कुछ अधिक फांसी देकर आम अपराधियों में भय का वातावरण पैदा किया जाये। इसका एक लोकतांत्रिक तरीका हो सकता है कि पूरे देश में घोषित कर दिया जाये कि तीन महिने की अवधि में 50 ऐसे लोगों को चुनकर फांसी दी जायेगी जिन्हें गुप्तचर पुलिस द्वारा गुप्त रुप से प्रस्तुत मुकदमें तथा गुप्तचर न्यायालय द्वारा गुप्त रुप से जांच करके दिये गये दण्ड पर आधारित हो । हो सकता है कि कुछ बडे प्रभावशाली लोग या राजनेता भी इस चपेट में आ जाये। कोई अन्य तरीका भी सोचा जा सकता है। किन्तु समाज में दण्ड का भय तो मजबूत होना ही चाहिये। इसके साथ ही फांसी के मेरे प्रस्तावित फार्मूले पर भी विचार किया जाये। हो सकता है कि मेरा प्रस्तावित फार्मुला फांसी की सजा से भी मुक्त करा दे और समाज में अपराधों के प्रति भय भी अधिक व्यापक हो जाये।
मंथन 38 का अगला विषय ‘‘महिला वर्ग या परिवार का अंग’’ होगा।

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