मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि

Posted By: admin on July 22, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प के रुप में लोकतंत्र को विकसित किया। लोकतंत्र तानाशाही का समाधान न होकर एक अस्थायी सुधार मात्र था। अब तक वही विकृत लोकतंत्र दुनिया में तानाशाही से मुकाबला कर रहा है, किन्तु वह समाधान न होने से कुछ समस्याएॅ भी पैदा कर रहा है। कुछ स्वीकृत सिद्धांत हैं-
(1) लोक सर्वोच्च है और तंत्र प्रबंधक। वर्तमान में तंत्र संरक्षक बन गया है और लोक संरक्षित।
(2) दुनिया की अनेक बडी समस्याएॅ धर्म, राष्ट्र, अर्थ आदि के माध्यम से वर्चस्व प्राप्त करने की छीनाझपटी का परिणाम है। इनमें भी राज्य की भूमिका सर्वाधिक है।
(3) किसी भी दायित्व को पूरा करने के लिए प्रबंधक को कुछ शक्ति दी जाती है। यह शक्ति दाता की अमानत होती है, प्रबंधक का अधिकार नहीं। वर्तमान में राजनेता अमानत को अधिकार मानने लगे है।
(4) स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। राज्य उस अधिकार की सुरक्षा मात्र करता है। वर्तमान में राज्य दाता बन गया हैं।
(5) राज्य कानून के द्वारा व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर नियंत्रण करता है,समाज पर नहीं , क्योकि समाज मालिक होता है और राज्य प्रबंधक।
(6) समाज एक अदृश्य इकाई है जिसमें दुनिया के सभी व्यक्ति समान रुप से शामिल होते है, चाहे वे कहीं के नागरिक हो या न भी हो।
दुनिया की व्यवस्था चार प्रवृत्तियों का समिश्रण होती है-(1) विचार मंथन और मार्ग दर्शन (2) शक्ति और सुरक्षा (3) धन और सुविधा (4) पूर्ण स्वतंत्रता और सेवा। इसे ही प्राचीन समय में ब्राम्हण,क्षत्रिय,वैष्य,शूद्र प्रवृत्ति का नाम दिया गया था। भारत मुख्य रुप से ब्राम्हण प्रवृत्ति का, इस्लाम क्षत्रिय प्रवृत्ति का, पश्चिम वैश्य प्रवृत्ति का और साम्यवाद शूद्र प्रवृत्ति को मुख्य आधार बनाकर चले। ब्राम्हण और वैश्य प्रवृत्ति वालो ने दुनिया में हिंसक खतरे को या तो निरुत्साहित किया या मजबूरी में अपनाया । जबकि क्षत्रिय और शूद्र प्रवृत्ति वालो ने हिंसा को पहले शस्त्र के रुप में उपयोग किया। मैं ऐसे परिवारों को जानता हॅू जिन्होने अपना नुकसान सहकर भी प्रत्यक्ष या कानूनी टकराव को टाला। कभी कभी ऐसे टकराव टालने को कायरता की भी संज्ञा दी गई किन्तु उन्होने टकराव से बचने को प्राथमिकता दी। मैं देख रहा हॅू कि ऐसे लोग अपने जीवन के हर क्षेत्र में अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक सफल रहे। ऐसे परिवारों में हर सदस्य को यह विशेष ट्रेनिंग होती थी कि गलत बात बर्दास्त करने की आदत ही विचारक और वैश्य की पहचान होती है। दूसरी ओर अनेक परिवार मॅूछ की लडाई में बर्बाद होते तक परेशान देखे गये। स्पष्ट है कि हिन्दू और इसाई ब्राम्हण या वैश्य प्रवृत्ति प्रमुख माने जाते है। दूसरी ओर मुसलमान साम्यवादी क्षत्रिय और शूद्र प्रवृत्ति के।
यदि हम वर्तमान विश्व की शांति व्यवस्था की समीक्षा करें तो दुनिया में लोकतंत्र निर्णायक बढत लेने के बाद भी युद्ध के खतरों से मुक्ति का विश्वास नहीं दिला पाया। कई विष्व युद्ध होने और उसके नुकसान को देखने के बाद भी दुनिया फिर विश्व युद्ध के खतरे की तरफ बढ रही है। वर्तमान दुनिया में विश्व युद्ध के लिए चार संभावनाएॅ प्रबल हो रही हैं-(1) उत्तर कोरिया और अमेरिका। (2) पाकिस्तान और भारत (3) कतर और साउदी अरब (4) चीन और भारत। मैं स्पष्ट कर दॅू कि अमेरिका दुनिया में एक शक्ति केन्द्र के रुप में दिख रहा है, तो चीन दूसरे शक्ति केन्द्र के रुप में। विश्व युद्ध की दृष्टि से चीन हर युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा तो अमेरिका भी चीन के विरुद्ध रहेगा ही। दुनिया चांद पर जा रही है नये नये ब्राम्हांड खोज रही है। गौड पार्टिकल तक रिसर्च हो रहा है किन्तु विश्व युद्ध से बचने का कोई स्थायी फार्मूला नहीं निकल पा रहा। विश्वयुद्धों में होने वाले नुकसान की विभीशिका की कल्पना भी रोंगटे खडे कर देती है किन्तु वर्चस्व की लडाई उससे भी आगे निकल रही है।
हम यदि दुनिया से बाहर निकल कर भारत की समीक्षा करें तो भारत भी अपने आंतरिक मामलों में निरंतर गृहयुद्ध की दिशा में बढ रहा है। नरेन्द्र मोदी के आने के पूर्व तक हिन्दू अपने को दूसरे दर्जे का नागरिक मानकर संतुष्ट रहने के लिए मजबूर था। स्पष्ट है कि गृहयुद्ध का कोई खतरा दूर दूर तक नहीं दिखता था। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद आमतौर पर हिन्दुओं में वर्चस्व की इच्छा बढी है जबकि मुसलमान अब भी अपनी पुरानी स्थिति के फिर से आने की प्रतिक्षा कर रहा है। यह वर्चस्व की लडाई ही भारत में गृहयुद्ध की संभावना का विस्तार कर रही है। मुझे तो स्पष्ट दिखता है कि यदि भारत के मुसलमानों ने अपनी प्रतीक्षा को नहीं छोडा तो गृहयुद्ध टाला नहीं जा सकेगा। सारी दुनिया में भी मुस्लिम साम्प्रदायिकता इस सीमा तक कटघरे में खडी हो चुकी है कि कहीं से उन्हें भारत में मजबूत समर्थन मिलने की संभावना नहीं है। भारत का हिन्दू जनमत अब तीन वर्ष पूर्व की स्थिति में जाने को तैयार नहीं है। इसका अर्थ है कि भारत का गृहयुद्ध टालने की पहल सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम विवेक के पास ही है।
मैं देख रहा हॅू कि यदि भारत के मुसलमान दब भी गये तो साम्प्रदायिक संघ परिवार उसे दबने नहीं देगा। क्योंकि साम्प्रदायिकता को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उसे तो सिर्फ कुचला ही जा सकता है और वर्तमान परिस्थितियों में हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता को एक साथ कुचलना मोदी के बस की बात नहीं है। इसलिए यह संभव दिखता है कि यदि मुसलमानों ने सुझबुझ से काम नहीं लिया तो संघ परिवार के बढते वर्चस्व पर नियंत्रण असंभव हो जायेगा। विपक्ष में नीतिश कुमार को छोडकर अन्य कोई ऐसा नेता नहीं है जिससे भारत के अल्पसंख्यकों को कोई उम्मीद करनी चाहिये। लेकिन नासमझ अल्पसंख्यक अब भी इन मृत विपक्षी नेताओं के जीने की प्रतीक्षा में समय गंवा रहे हैं। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है और भारत के अल्पसंख्यकों को जल्दी ही निर्णय लेना चाहिये। उनके समक्ष तीन विकल्प दिखते हैं-
(1) अल्पसंख्यक बहुत तेजी से समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए अल्पसंख्यक बहुसंख्यक शब्द और कानून का विरोध शुरु करे । स्पष्ट है कि संघ परिवार समान नागरिक संहिता के विरुद्ध समान आचार संहिता अथवा हिन्दू राष्ट्र की मांग शुरु कर देगा।
(2) भारत के अल्पसंख्यक बहुत तीब्र गति से कश्मीर के कटटरवादी मुसलमानों के विरुद्ध आवाज उठानी शुरु कर दें। कश्मीर का समाधान बातचीत से नहीं बल्कि सैनिक बल पर होना चाहिए, यह मांग अल्पसंख्यक करनी शुरु कर दें।
(3) भारत के अल्पसंख्यक बहुत तेजी से नरेन्द्र मोदी के पक्ष में खडे हो जाये क्योंकि 2019 के चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार के बीच वर्चस्व के लिए टकराव होना निश्चित है।
(4) यदि विपक्ष को मजबूत करना हो तो अल्पसंख्यकों को नीतिश कुमार की तरफ ध्रुवीकृत हो जाना चाहिए।
हमें विश्व युद्ध से बचने का मार्ग भी खोजना होगा और गृहयुद्ध से भी। वर्तमान संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व युद्ध को कुछ दिन के लिए विलंबित कर सकता है किन्तु खतरा हमेशा बना रहेगा। इसके लिए आवश्यक है कि एक विश्व सरकार की पहल की जाये। वह विश्व सरकार राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व न करे बल्कि मनुष्यों का करें। अर्थात दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति उस विश्व सरकार का मतदाता हो। विश्व सरकार के पास काम के रुप में सिर्फ सुरक्षा और न्याय ही हो। इस तरह एक विश्व समाज की रुपरेखा बनायी जा सकती है। यद्यपि यह यूटोपिया से अधिक कुछ नहीं दिखता किन्तु वैचारिक शुरुवात तो हो ही सकती है। इसके साथ साथ गृहयुद्ध को टालने के लिए हमेें भारत के अल्पसंख्यकों को यथार्थ स्थिति से अवगत कराना चाहिए तथा ज्यों ज्यों अल्पसंख्यक यथार्थ को समझने लगे त्यों त्यों हम हिन्दू साम्प्रदायिकता पर भी आक्रमण बढाते चले। गृहयुद्ध को टालने के लिए दो साम्प्रदायिक शक्तियों के बीच वर्चस्व की लडाई में तीसरी शक्ति के रुप में खडे होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। आशा है कि भारत के अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक इस दिशा में सोचेंगे।
लोक तंत्र हमारा मार्ग है लक्ष्य नहीं। कई सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि भारत विश्व युद्ध या गृह युद्ध के भय से मुक्त नही हो सका तो भारत को लोक तंत्र की कमजोरियां खोजकर दुनियां का मार्ग दर्शन करना चाहिये। मुस्लिम साम्प्रदायिकता से सुरक्षा के लिये यदि हिन्दु साम्प्रदायिकता का सहारा लेना पड रहा है तो यह हमारी अल्प कालिक मजबूरी तो हो सकती है किन्तु समाधान नहीं। हम इस गंभीर विश्व व्यापी समस्या के दीर्घकालिक समाधान पर भी विचार करें। दुनियां को तानाशाही से मुक्त बनाने की दिशा मे पश्चिम निरंतर प्रयत्नशील है। भारत दुनियां को साम्प्रदायिकता से मुक्त कराने की दिशा मे पहल कर सकता है। मेरे विचार से वह पहल हो भी चुकी है। भारत को अपने आंतरिक लोकतंत्र के सुधार के लिये संसद मे सत्ता और विपक्ष की शासन प्रणाली को बदलकर निर्दलीय संसद व्यवस्था की भी पहल करनी चाहिये।
दुनियां के लोकतंत्र के समक्ष सबसे बडी समस्या यह है कि मै और हम के बीच मै हम पर हावी हो जा रहा है। यह स्थिति परिवार से लेकर विश्व तक की बन गई है। स्वामी दयानंद ने आर्य समाज के दसवे नियम मे मै और हम की सीमाएं बताई है किन्तु उन्हे ठीक से समझा नही जा रहा है। मेरे विचार से समय आ गया है कि मै पर हम भारी पडे।
मंथन का अगला विषय‘‘ एन जी ओ ’’ होगा।

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