मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव- बजरंग मुनि

Posted By: admin on October 29, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है
1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।
2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्ठ माने जाने का प्रमुख आधार बिन्दु योग है। किसी अन्य संस्कृति को योग की न जानकारी है न ही विश्वास ।
योग महर्षि पतंजली से शुरू हुआ अथवा और पहले से था यह बात मुझे नही मालूम किन्तु मैने योग की दो तीन परिभाषाएं सुन रखी हैं।, जिनमे एक है योगः कर्मशु कौशलम्। इसका अर्थ होता है कि कार्य मे कुशलता ही योग है । इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि कार्य मे कुशलता योग के प्रभाव से आती है । कुछ लोग कुशलता को कुशाग्रता भी बताते है। एक दूसरा अर्थ है योगः चित्त वृत्ति निरोधः अर्थात चित्त या मन पर नियंत्रण ही योग है। एक तीसरा योग का अर्थ होता है जोड। इसका अर्थ हुआ कि महर्षि पतंजली ने तीन वृत्तियो को एक साथ जोडकर योग बनाया। 1 मानसिक पवित्रता 2 शरीर शुद्धि 3 आत्मिक विकास । मुझे तीसरी परिभाषा ज्यादा उपयुक्त लगी। इन तीनो मे भी मानसिक पवित्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसका अर्थ हुआ कि योग की शुरूआत करने के लिये मानसिक पवित्रता को प्रथम चरण मानना अनिवार्य है। योग के तीनो चरण मिलकर अष्टांग योग बनते हैं। प्रथम चरण के रूप मे यम और नियम आते हैं । यम अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रहमचर्य अपरिग्रह के पांच सूत्रो को मिलाकर बनता है। यम के बाद नियम आता है। नियम के भी पांच भाग है। । शौच 2 संतोष 3 तप 4 स्वाध्याय 5 ईश्वर प्रणिधान। यम और नियम प्रारंभ करने के बाद ही आसन प्राणायाम और प्रत्याहार की शुरूआत करनी पडती है। अंतिम चरण के रूप मे धारणा ध्यान और समाधि मे जाने की व्यवस्था है। वर्तमान युग को देखते हुए यदि यम का आंशिक रूप मे भी पालन करना शुरू कर दिया जाये तो दुनियां की कई समस्याए कम हो सकती हैं ।
योग का सबसे पहला उल्लंघन राजाओ ने शुरू किया । उन्होने यम नियम को माना ही नहीं। अन्य को तो मानने का सवाल ही नहीं है। परिणाम हुआ कि राजाअो मे आपसी टकराव बढा और भारत गुलाम हो गया । फिर भी, गुलामी काल होते हुए भी, समाज मे यम नियम का प्रभाव बना रहा । परिणाम स्वरूप देश भले ही गुलाम हो गया किन्तु समाज मे कोई बहुत बडी अव्यवस्था नहीं आई। स्वतंत्रता के बाद राजाओं का स्थान राजनीति ने ले लिया और उसने समाज को इस प्रकार गुलाम बनाया कि समाज की पूरी सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई। परिणाम स्वरूप यम और नियम समाज से दूर होते चले गये। इसका परिणाम हुआ टकराव छल प्रपंच का बढना।
मै 14 वर्ष की उम्र मे ही आर्य समाज से जुडा और योग से बहुत प्रभावित हुआ । अहिंसा और सत्य पर मेरा विश्वास बढा। आनंद स्वामी तथा गुरू दत्त का साहित्य मै बहुत पढा। साथ ही अनेक अच्छे सन्यासियों के साथ सम्पर्क मे आकर एक दो वर्षो मे ही योग के ध्यान धारण समाधि तक आगे बढा। मै यह कह सकता हॅू कि बचपन मे मैने कुछ वर्षो तक जो योग का प्रयोग किया उसने मेरे अंदर विलक्षण प्रतिभाएं विकसित की। यह अलग बात है कि सत्रह अठठारह वर्ष की उम्र मे ही मुझे राजनीति की बीमारी लग गई। परिणाम स्वरूप धीरे धीरे मेरा योग बंद हो गया। किन्तु बचपन मे पडा यम नियम का प्रभाव आजतक मेरे संस्कारो और बौद्धिक क्षमता के साथ जुडा हुआ है। सन 84 मे राजनीति से अलग हो गया किन्तु फिर भी दुबारा योग के अंतिम आत्मिक उत्थान के तीन सूत्रो की ओर नही जा सका।
यह स्पष्ट है कि स्वतंत्रता के बाद योग का महत्व कम होता जा रहा था। समाज मे यम और नियम निष्प्रभावी हो रहे थे । कई लोग योग के यम और नियम को महत्व दे रहे थे किन्तु परिणाम अच्छा नहीं हो रहा था। ऐसे समय मे बाबा रामदेव ने यम और नियम को योग के विस्तार मे बाधक समझा और उन्होने आसन प्राणायाम प्रत्याहार को ही योग के रूप मे सीमित करके समाज के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। स्वाभाविक है कि योग बहुत सरल हो गया और आम लोग अपने स्वास्थ के लिये योग को महत्व देने लगे। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी ने योग के इस सरल मार्ग को पूरी दुनियां तक पहुंचा दिया और दुनियां भी इस संषोधित मार्ग को महत्व देने लगी। मै यह नही कह सकता कि बाबा राम देव का यह प्रयास समाज के लिये कितना अच्छा है कितना बुरा। लेकिन मै इतना अवश्य कह सकता हूँ कि सरलीकृत योग और बाबा रामदेव एक दूसरे की पहचान बन गये गये। अर्थात योग ने बाबा रामदेव को जमीन को उठाकर आसमान तक पहुंचा दिया तो बाबा रामदेव ने भी योग को आसमान से उतारकर जमीन तक उपयोगी बना दिया। आज बाबा राम देव के आर्थिक चमत्कार का मुख्य आधार योग ही है।
मै नही कह सकता कि बाबा रामदेव स्वयं यम और नियम का किस सीमा तक पालन करते हैं लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होने योग की पूरी पूरी मार्केटिंग की । आज तक यह बात साफ नही हुई कि बाबा रामदेव एक सन्यासी हैं अथवा व्यापारी फिर भी यह बात अवश्य है कि बाबा रामदेव कुल मिलाकर अन्य लोगो की तुलना मे अच्छे व्यक्ति हैं। यदि उन्हे सन्यासी की कसौटी पर परखा जाये तो वे एक पतित सन्यासी से अधिक कुछ नही हैं । किन्तु यदि उन्हे एक व्यापारी की कसौटी पर कंशे तो वे भारत के सर्वश्र्रेष्ठ व्यापारियो मे माने जाने चाहिये। उन्होने मिलावट को चुनौती दी, स्वदेशी का विस्तार किया, आयुर्वेद तथा प्राचीन विद्या को भी आगे बढाने मे अपने धन का बहुत उपयोग किया । आज भी बाबा रामदेव का बहुत बडा व्यय सामाजिक कार्यो मे होता है। हम भले ही सन्यासी के रूप मे बाबा रामदेव के चरण स्पर्ष करने से अपने को दूर रख ले किन्तु एक आदर्श व्यापारी के रूप मे तो उनका महत्व पूर्ण सम्मान होना ही चाहिये। जिस तरह भारत की राजनीति नीचे गिरती रही है उसमे बाबा रामदेव ने नरेन्द्र मोदी के साथ खडे होकर सम्हालने का प्रयास किया है। वह प्रयास भी बहुत अच्छा है।
फिर भी योग का सरलीकृत स्वरूप कोई आदर्श स्थिति नहीं है। यम और नियम का विस्तार होना ही चाहिये । मानसिक पवित्रता के अभाव मे सामाजिक शान्ति हो ही नही सकती चाहे हम कितना भी व्यक्ति को आसन प्राणायाम प्रत्याहार करा लें और मानसिक पवित्रता सिर्फ यम के प्रारंभ से ही आ सकती है। वर्तमान सरकार भी आसन प्राणायाम और प्रत्याहार के माध्यम से योग को आगे बढाकर समस्याओ का आंशिक समाधान खोज रही है और कर रही है किन्तु यम नियम को प्रभावी प्रभावी किये बिना समाधान नही हो सकेगा। स्पष्ट है कि राजनेताओ ने ही यह समस्या पैदा की है और वही यम नियम को समाज से बाहर करने के दोशी माने जायेगे। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि बिना यम नियम की ओर बढे समस्याओ का समाधान नही होगा । इसलिये आवश्यक है कि समाज राजनीति पर सामाजिक अनुशासन का मार्ग खोजे। यही मार्ग समाज की समस्याओ का समाधान कर सकेगा। और तब योग के माध्यम से भारत विश्व गुरू भी बनने की क्षमता बढा सकता है। इस संबंध मे हमारे धर्म गुरूओ को भी विचार करना चाहिये औेर बाबा रामदेव को भी । मुझे तो सिर्फ राजनीति ने ही योगभ्रष्ट किया था बाबा रामदेव तो राजनीति और सम्पत्ति दोनो के फेरे मे पड गये है।
मंथन का अगला विषय‘‘ राजनीति में दस नाटक’’ होगा।

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