मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम- बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 4, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः-
(1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक राजनैतिक कम। स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक शोषण अधिक हो गया, आर्थिक सामाजिक कम।
(2) व्यक्ति तीन प्रकार के होते हैंः-(1) शरीफ (2) समझदार (3) धूर्त। समाज में शरीफ लोगों की संख्या 95 प्रतिषत से अधिक होती है। धूर्तों की संख्या तीन चार प्रतिषत होती है और समझदारों की संख्या नगण्य।
(3) समाज के समक्ष समस्याएॅ पांच प्रकार की होती हैं-(1) वास्तविक (2) कृत्रिम (3) प्राकृतिक (4) भूमण्डलीय (5) अस्तित्वहीन। समाज प्राथमिकताओं के क्रम में उपरोक्त क्रम से समाधान चाहता है तो राजनीति ठीक विपरीत क्रम से समाधान करती है।
(4) लोकतंत्र में शासन को लोकहित की अपेक्षा लोकप्रियता की अधिक चिंता बनी रहती है जबकि तनाशाही में ऐसा नहीं होता। तानाशाही और लोकतंत्र की तुलना में लोकस्वराज्य आदर्श स्थिति होती है।
(5) भारत में कुल कानूनों के दो तीन प्रतिषत ही कानून आवश्यक है। शेष सभी अव्यवस्था फैलाने के उद्देश्य से बनाये गये हैं। कानूनों की संख्या बिल्कुल कम कर देना चाहिये।
भारत में लोकतंत्र है। लोकतंत्र का अधिक से अधिक लाभ उठाने के उद्देश्य से राजनेता निरंतर लोकहित को छोडकर लोकप्रिय बनने का प्रयास करते रहते है। इसके लिए उन्हे दस प्रकार के नाटक करने पड़ते हैं-
(1) प्रशासनिक समस्याओं का आर्थिक सामाजिक, अर्थिक समस्याओं का प्रशासनिक सामाजिक तथा सामाजिक समस्याओं का आर्थिक प्रशासनिक समाधान करने का प्रयास।
(2) समाज में आठ आधारों पर वर्ग विभाजन करके वर्ग विद्वेष फैलाना और वर्ग संघर्ष तक ले जाना।
(3) किसी भी समस्या का इस तरह का समाधान खोजना और करना जो किसी नई समस्या को पैदा करें।
(4) राष्ट्र शब्द को उपर उठाकर समाज शब्द को निरंतर नीचे गिराना। सामाजिक भावनाओं को कमजोर करके राष्ट्रीय भावना को सशक्त करना।
(5) वैचारिक मुददों पर होने वाली चर्चा को कमजोर करके भावनात्मक मुददों पर चर्चा को जारी रखना।
(6) समाज को शासक और शासित के रुप में बांटकर समाज को शासन का मुखापेक्षी बनाना।
(7) गैरकानूनी और अनैतिक को भी इस प्रकार अपराध प्रचारित करना जिससे सम्पूर्ण समाज स्वयं को किसी न किसी रुप में अपराधी मानने लगे और उसका मनोबल गिरा रहे।
(8) शासन की भूमिका बिल्लियों के बीच बंदर के समान हो। बंदर चाहता है कि बिल्लियों की रोटी कभी बराबर न हों, बंदर निरंतर बराबर करता हुआ दिखे तथा छोटी रोटी वाली बिल्ली के मन में असंतोष की ज्वाला निरंतर जलती रहे।
(9) प्रजातांत्रिक तरीके से निरंतर आर्थिक असमानता को बढाया जाये। इसके लिए श्रमशोषण को सर्वाधिक सुरक्षित मार्ग माना जाता है।
(10) सुरक्षा और न्याय की जगह पर जनकल्याणकारी कार्यो को अधिक प्राथमिकता दी जाये।
उपरोक्त दस नाटको में से इस लेख के माध्यम से हम केवल पहले क्रम पर चर्चा कर रहे है। समस्याएॅ तीन प्रकार की होती हैं- (1) सामाजिक (2) आर्थिक (3) आपराधिक। राज्य को न्याय और सुरक्षा के निमित्त ही बनाया जाता है। सुरक्षा और न्याय उसका दायित्व होता है और इस कार्य के लिए राज्य को अनेक प्रकार की प्रशासनिक शक्तियां तथा सुविधायें भी समाज के द्वारा दी जाती हैं। सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त अन्य सामाजिक आर्थिक समस्याओं का समाधान राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है,दायित्व नहीं। राज्य जब समाज को धोखा देने के निमित्त नाटक करना शुरु करता है तब वह विपरीत तरीके से समस्याओं का समाधान प्रारंभ करता है। राज्य चोरी, डकैती, लूट, बलात्कार, मिलावट, जालसाजी , धोखाधडी जैसे गंभीर आपराधिक मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप की अपेक्षा हृदय परिवर्तन अथवा आर्थिक समाधान को अधिक महत्व देता है। सब प्रकार के आपराधिक कार्यो का प्रशासनिक तरीके से ही समाधान संभव है। लेकिन हम देख रहे है कि नक्सलवाद कश्मीर का आतंकवाद अथवा डकैती सरीखी भी आपराधिक घटनाओं के समाधान के लिए या तो आर्थिक विषमता को कारण बताया जा रहा है या नैतिक पतन को । जबकि इन दोनों का ऐसी घटनाओं से न तो कोई संबंध होता है न ही ये कोई समाधान कर सकती हैं। इसके ठीक विपरीत जुआ शराब वैष्यावृत्ति सरीखी नैतिक पतन की सामाजिक बुराईयां पूरी तरह हृदय परिवर्तन से सुलझ सकती है किन्तु राज्य ऐसे मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप करके अपनी जेलो में भीड बढाता रहता है। छूआछूत अथवा जाति प्रथा शुद्ध रुप से सामाजिक समस्या है प्रशासनिक नहीं। किन्तु राज्य इनमें भी कानून बनाकर निरंतर हस्तक्षेप करता है। गरीबी बेरोजगारी आर्थिक समस्यायें हैं। इनका आर्थिक आधार पर समाधान भी संभव है किन्तु राज्य आर्थिक मामलों में भी प्रशासनिक अथवा सामाजिक समाधान के प्रयास करता रहता है।
महिला और पुरुष के बीच के संबंध बलात्कार को छोडकर अन्य सभी मामलों में सामाजिक हैं या आर्थिक हैं। किसी भी रुप में इन संबंधो में प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। विवाह भी एक सामाजिक व्यवस्था है किन्तु राज्य इस प्रकार के महिला पुरुष के आपसी संबंधों में भी हस्तक्षेप करके समस्यायें पैदा करता है। विवाह, दहेज, तलाक, परिवार व्यवस्था, सम्पत्ति का उत्तराधिकार जैसे सामाजिक मामलों में कानूनी हस्तक्षेप अनावश्यक हैं। इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करने की प्राकृतिक और सामाजिक व्यवस्था है। स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक और मौलिक अधिकार है। राज्य का काम स्वतंत्रता की सुरक्षा करना है किन्तु राज्य हस्तक्षेप करके ऐसी स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में बाधक बनता हैं। राज्य का काम असमान योग्यताओं को समान करने का प्रयास नहीं है किन्तु राज्य ऐसा करता है। श्रम और बुद्धि के बीच राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा करने देना चाहिए था अथवा श्रम को कुछ सहायता देनी थी किन्तु राज्य श्रम की तुलना में शिक्षा को अधिक महत्व देकर श्रम को कमजोर करने का प्रयास करता है। इस तरह मेरे आकलन के अनुसार राज्य का दायित्व है पांच प्रकार के अपराधों पर अंकुश लगाना। इस मामले में राज्य अपना दायित्व पूरा नहीं करता और समाज को अथवा बाजार को दोष देता है। दूसरी ओर राज्य को चाहिए कि वह सामाजिक और व्यावसायिक मामलो में न्यूनतम हस्तक्षेप करें तो राज्य ऐसे सामाजिक और व्यावसायिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। इस हस्तक्षेप के ही परिणाम स्वरुप छः प्रकार की कृत्रिम समस्यायें बढती है-(1) भ्रष्टाचार (2) नैतिक पतन (3) साम्प्रदायिकता (4) जातीय कटुता (5) आर्थिक असमानता (6) श्रम शोषण। यदि राज्य स्वयं को इन छः समस्याएॅ से बाहर निकाल ले तो ये छः समस्यायें अपने आप समाप्त हो जायेगी।
मैं स्पष्ट हॅू कि राज्य को प्रशासनिक समस्यायो का प्रशासनिक समाधान करने की पहल करनी चाहिए और स्वयं को सामाजिक आर्थिक समस्याओं से दूर कर लेना चाहिए। या कम से कम इतना अवश्य करना चाहिए कि सामाजिक आर्थिक समस्याओं का सामाजिक आर्थिक तरीके से समाधान खोजे। इसमें प्रशासनिक न्यायिक हस्तक्षेप न करें। साथ ही प्रशासनिक समस्याओं का प्रशासनिक न्यायिक समाधान खोजे उसमें हृदय परिवर्तन चरित्र निर्माण जैसे अनावश्यक प्रयोग न करें।
मंथन का अगला विषय ‘‘आपराधिक आतंकवाद और समाधान’’ होगा।

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