मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 25, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-
1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।
2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिना व्यक्ति की सहमति के उसकी सम्पत्ति न टैक्स के रुप में ली जा सकती है, न ही कोई सीमा बनाई जा सकती है।
3 गरीबी, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, अशिक्षा दूर करना राज्य का दायित्व नहीं है। राज्य को इनके बढाने में की जा रही अपनी भूमिका से दूर हो जाना ही पर्याप्त है।
4 किसी भी इकाई के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए एक बजट अवश्य बनावे और उसका पालन करे।
5 अर्थव्यवस्था में बाजार की स्वतंत्रता में सरकार का कोई भी हस्तक्षेप घातक होता है।
6 राजनीति से जुडा प्रत्येक व्यक्ति बाजारवाद का अधिक विरोध करता है।
7 महंगाई एक अस्तित्वहीन समस्या है। मंहगाई होती ही नहीं। सरकारें जानबूझकर मुद्रा स्फीति बढाते है और उसे मंहगाई कहकर प्रचारित करते है।
समाजवाद का अर्थ होता है समाज सर्वोच्च। जिस तरह सम्प्रदाय वाद ने धर्म शब्द का अर्थ विकृत करके उसे संगठनात्मक स्वरूप दे दिया उसी तरह साम्यवाद ने समाजवाद का अर्थ विकृत करके उसे अर्थ प्रधान कर दिया। आज समाज वाद शब्द पूरी तरह बदनाम हो गया है । यही कारण है कि हमलोगों ने समाजवाद शब्द को छोडकर समाजीकरण शब्द का उपयोग शुरू कर दिया। साम्यवाद मे कुव्यवस्था होती है और समाजवाद मे अव्यवस्था। वास्तविक समाजवाद अर्थात समाजीकरण मे व्यवस्था होती है। समाजीकरण मे राज्य किसी सामाजिक इकाई की आंतरिक स्वतंत्रता मे कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता बल्कि ऐसी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस गारंटी के परिपालन मे हो रहे खर्च तक ही राज्य आर्थिक व्यवस्था कर सकता है, इससे अधिक नहीं। आज तो स्थिति यह है कि राज्य पूरे समाज की अर्थ नीति का निर्माता बन गया है। राज्य गरीबी दूर कर रहा है तो रोजगार शिक्षा स्वास्थ भी अपने जिम्मे ले रहा है। न्याय और सुरक्षा तो वह सम्हाल नही पा रहा और भूख मिटाने के प्रयत्न कर रहा है। परिणाम यह है कि न उससे भूख मिट रही है न असुरक्षा।
भारतीय संविधान में सम्पत्ति को मौलिक अधिकार माना गया था जिसे बहुत बाद में कुछ राजनेताओं ने संविधान से निकालकर मनमाने तरीके से समाजवाद शब्द घुसा दिया। सम्पत्ति मौलिक अधिकार होता है और कोई भी व्यक्ति या सरकार उसकी सहमति के बिना कोई टैक्स नहीं ले सकती। दुनिया में जो टैक्स की परंपरा है वह एक प्रकार से व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा का टैक्स है और उस टैक्स को उसकी सहमति मान लिया जाता है। यदि कोई सरकार अनावश्यक टैक्स वसूल करती है तो विश्व व्यवस्था उसे इसलिए रोक सकती है क्योकि व्यक्ति विश्व व्यवस्था का सदस्य है, राष्ट्र का नहीं। राष्ट्र के लिए तो व्यक्ति सिर्फ नागरिक मात्र होता है। यह अलग बात है कि अभी दुनिया में ऐसी कोई सर्वस्वीकृत विश्व व्यवस्था नहीं बन पायी है जिससे व्यक्ति और नागरिक की अलग अलग पहचान बन सके, क्योंकि साम्यवाद और इस्लाम व्यक्ति के मूल अधिकारों को ही नहीं मानता। इसका अर्थ हुआ कि या तो साम्यवाद और इस्लाम अपने विचारों में संशोधन करें अथवा समाप्त हो जाये तभी कोई सर्वस्वीकृत विश्व व्यवस्था बन सकती है। यह हमारा सौभाग्य है कि भारत इस्लाम और साम्यवाद से मुक्त है। भारत में लोकतंत्र भी है और भारत विश्व व्यवस्था के साथ जुडा हुआ भी है।
भारत की सरकारे निरंतर प्रयास करती हैं कि गरीबी , बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, आर्थिक असमानता, श्रमशोषण जैसी आर्थिक समस्यायें लगातार बढती रहें। इसके लिए वे निरंतर प्रयत्न शील रहती है क्योंकि यदि गरीबी , बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, श्रमशोषण ही कम हो जायेंगे तो सरकारों के पास राजनीति का खेल खेलने के लिए कोई खुला मैदान ही नहीं मिलेगा। यदि सरकारें इनसे बाहर हो जाये तो ये समस्याये अपने आप सुलझ सकती हैं।
मैंने बजट पर बहुत विचार किया। टैक्स इस प्रकार से लगाया जाना चाहिए कि वह गरीब ग्रामीण श्रमजीवी को बिल्कुल प्रभावित न करें और सक्षम व्यक्तियों से ही पूरा कर लिया जाये। इसका अर्थ हुआ कि यदि उपभोक्ता वस्तुओं से कर लेना बिल्कुल मजबूरी हो तो सभी वस्तुओं की सुची बनाकर उसमें क्रमानुसार नीचे से टैक्स इस प्रकार लगे कि उपर जाते जाते वह शून्य हो जाये। रोटी, कपडा ,मकान, दवा क्रमानुसार उपर से शुरु होते है। उसके बाद आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य का नंबर आता है। उसके बाद ही मनोरंजन की वस्तुये होती है। सरकार को रोटी, कपडा, मकान, दवा को टैक्स फ्री रखना चाहिए था किन्तु सरकारें आमतौर पर इन पर टैक्स लगाती है और आवागमन ,मोबाईल जैसी वस्तुओं को आम उपयोग की वस्तु बताकर उन्हें सस्ता रखती है। इसी तरह राज्य का यह दायित्व नहीं कि वह आर्थिक विषमता दुर करे। राज्य तो आर्थिक विषमता दूर करने के नाम पर ऐसी नीति बनाता है जिससे आर्थिक विषमता बढती चली जाती है। कितने दुख की बात है कि भारत आर्थिक मामलों में इतनी तेजी से आगे आ रहा है इसके बाद भी भारत में 20 करोड ऐसे लोग है जो तीस रु से कम पर जीवन जीने के लिए मजबूर है। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकारें कृत्रिम उर्जा को इतना सस्ता बनाकर रखती है कि वे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी को प्रतिस्पर्धा से बिल्कुल बाहर कर देती है। राष्ट्रीय प्रगति का सर्वश्रेष्ठ मापदण्ड यह होता है कि देश में श्रम का मूल्य कितना बढा क्योंकि श्रम का मूल्य बढना ही गरीब ग्रामीण श्रमजीवी की प्रगति का एकमात्र मापदण्ड होता है। स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षो मे श्रम का मूल्य भारत में करीब दोगुना ही बढ पाया जबकि बुद्धिजीवियों का जीवन स्तर लगभग आठ गुना और पूॅजीपतियों का औसत 64 गुना बढा माना जाता है। यह हमारे लिए राजनैतिक षडयंत्र का स्पष्ट प्रमाण है। राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कभी बाधक नहीं बनना चाहिए किन्तु राज्य प्रतिस्पर्धा में बाधक बनता है। वह खुले बाजार में भी हस्तक्षेप करता है। वह किसानों के उत्पादन का मूल्य भी नहीं बढने देता। यहाॅ तक कि राज्य प्राकृतिक और जैविक खाद की तुलना में कृत्रिम खाद तक को सबसीडी देता रहता है क्योंकि राज्य की नीयत में खोट है। राज्य निजी स्कूलों से स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा न करके उन्हें हर तरह से कानून के जाल में फसा कर रखना चाहता है।
मैं समझता हॅू कि भारत नई अर्थव्यवस्था के माध्यम से सारी दुनिया के सामने आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। सारी दूनिया यह प्रयास करती है कि वह अपना सामान दूसरे देशो में भेजकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करे भले ही उससे आयातक देश के गरीब लोगों का शोषण ही क्यों न हो। इस निर्यात की बीमारी के कारण ही अपने देश में कृत्रिम उर्जा को इतना सस्ता रखा जाता है कि वहाॅ श्रम का मूल्य न बढे और निर्यातक वस्तुये दुनिया से प्रतिस्पर्धा कर सके। भारत को इस प्रकार की पहल करनी चाहिए कि भारत न निर्यात के लिए अपने देश का शोषण करेगा, न ही आयात की मजबूरी में फंसा रहेगा। इसके लिए पूरे आर्थिक ढांचे को बदलने की आवश्यकता है। सिर्फ दो प्रकार के टैक्स लगाये जाने चाहिए। 1 सुरक्षा कर 2 समानता कर। सुरक्षा कर के रुप में भारत के प्रत्येक व्यक्ति से उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति पर एक पर दो प्रतिश त वार्षिक टैक्स लेना ही पर्याप्त होगा। इस टैक्स के माध्यम से सरकार का सेना पुलिस वित विदेष न्याय जैसा आवश्यक खर्च पूरा हो जायेगा। अन्य सब प्रकार के इन कम टैक्स या अन्य टैक्स पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे। समानता कर के रुप में भारत में उपयोग की जाने वाली सम्पूण कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढाकर ढाई गुना कर दिया जायेगा और इससे प्राप्त सारा धन प्रत्येक व्यक्ति को बराबर बराबर इस प्रकार बांट दिया जायेगा जिससे उसकी आवश्यकताये पूरी हो सके। किसी को किसी भी प्रकार की अन्य सुविधाये समाप्त कर दी जायेगी। किसी अन्य सुविधा के लिए सरकार बाजार से प्रतिस्पर्धा करेगी और सुविधा के लिए फीस ले सकती है किन्तु कर नहीं।
मेरे आकलन के अनुसार दो प्रतिशत सम्पत्ति कर से पूरे देश में करीब 20 लाख करोड रुपया सरकार को मिल सकता है। इस बजट में सरकार का सारा खर्च अच्छी तरह चल सकता है। कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि से भी सरकार को वार्षिक 20 लाख करोड मिल सकता है। यह राषि भी प्रत्येक व्यक्ति को 15 हजार रु वार्षिक के हिसाब से आवष्यक उपयोग के लिए दी जा सकती है। इसका अर्थ हुआ कि पांच व्यक्तियों के परिवार को करीब 75 हजार रु वार्षिक मिल सकता है। इस कार्य को एकाएक करना कठिन है । सम्पत्ति कर तो तत्काल किया जा सकता है किन्तु कृत्रिम उर्जा की मूल्यवृद्धि एकसाथ करना अव्यवस्था का कारण बन सकती है। मेरे विचार से प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत मूल्यवृद्धि करके उससे प्राप्त सारा धन प्रत्येक व्यक्ति को समान स्तर पर दिया जा सकता है। यदि सबकी सहमति हो तो यह समानता कर से प्राप्त राशि सिर्फ आधी गरीब आबादी में भी बांटी जा सकती है जिससे उन्हें वर्ष में 30 हजार रु प्रति व्यक्ति भी मिल सकता है। मुझे तो लगता है कि भारत की जनता इस समानता कर और वितरण का पुरजोर समर्थन करेगी। वर्तमान समय में जनता कृत्रिम उर्जा मूल्यवृद्धि का इसलिए विरोध करती है कि वह सरकार के खजाने में जाता है उसके व्यक्तिगत खजाने में नहीं।
भारत जिस तरह भ्रष्टाचार, अपराध वृद्धि, अनैतिकता की दिशा में बढ रहा है उसके आर्थिक समाधान के रुप में नई अर्थनीति बहुत सहायक हो सकती है। सरकार को सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर देना चाहिए। मांग और पूर्ति के आधार पर वस्तु से अपना महत्व और मूल्य निर्धारित करने की स्वतंत्र हो। मांग और पूर्ति के आधार पर मजदूर और मालिक स्वतंत्रता से प्रतिस्पर्धा कर सकें। सरकार अपना अपराध नियंत्रण मे भी अधिक सफल हो सकेगी क्योंकि अन्य आलतू फालतू खर्चे बंद होकर सरकार को सेना पुलिस और न्याय पर अधिक खर्च करने की सुविधा प्राप्त हो जायेगी।
मैं व्यक्तिगत रुप से महसूस करता हॅू कि मैं वर्तमान समय में दुनिया का सबसे अधिक सुखी और संतुष्ट व्यक्ति हॅू। आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक धरातल पर मैंने क्षमता और कल्पना से अधिक उपलब्धि प्राप्त की है। मैंने हमेशा आर्थिक, सामाजिक मामलों में लिक से हटकर नये मार्ग तलाशे है। इन सबका श्रेय मैं नई आर्थिक सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को देता हॅू। इसलिए मैं इस नई अर्थव्यवस्था का पक्षधर हॅू।
मंथन का अगला विषय‘‘ भौतिक या नैतिक उन्नति’’ होगा।

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