मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि

Posted By: admin on December 23, 2017 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-
(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार कर लिया है, जो ठीक नहीं।
(2) लोकतंत्र तानाशाही और लोकस्वराज्य अलग अलग संवैधानिक व्यवस्था होती हैं। तानाशाही में तंत्र नियंत्रित संविधान होता है तो लोकतंत्र में संविधान नियंत्रित तंत्र। लोकस्वराज्य में सभी इकाईयों के अपने अपने संविधान और अपने अपने तंत्र होते है।
(3) आदर्श स्थिति में लोक के अनुसार संविधान कार्य करता है, संविधान के अनुसार लोक नहीं। भारत में संविधान लोक को निर्देशित करता है जो गलत है।
(4) लोकतंत्र मे व्यक्ति व्यवस्था के अनुसार कार्य करता है। व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, व्यवस्था नहीं बनाता। व्यवस्था तो लोक बनाता हैं जिसके अनुसार व्यक्ति संचालित होता है। व्यक्ति किसी भी स्थिति में संचालक नहीं हो सकता।
वैसे तो पूरी दुनिया में लोकतंत्र असफल हो रहा है। भले ही किसी नये विकल्प के अभाव में उसे चलाये रखने की मजबूरी हो किन्तु भारत में तो दुनिया के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा लोकतंत्र अपना स्वरुप ही खो बैठा है। पता नहीं चलता कि भारत में संसदीय लोकतंत्र है अथवा संसदीय तानाशाही। जिस देश का संविधान तंत्र का गुलाम हो उसे लोकतंत्र कहना पूरी तरह गलत है। भारतीय संविधान पूरी तरह तंत्र का गुलाम है। यही कारण है कि भारत में व्यक्ति शक्तिशाली हो जाता है और व्यक्ति व्यवस्था का सुत्रधार भी हो जाता है। यह कैसी संवैधानिक व्यवस्था हैं। जिस देष का संविधान समाज को निर्देष देता हो उसे किसी भी रुप में लोकतंत्र नहीं कह सकते क्योकि लोक तो संविधान के माध्यम से तंत्र को निर्देष देता है और तंत्र व्यक्ति को। व्यक्ति और लोक एक दूसरे के पूरक है किन्तु एक नहीं। दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है। इसलिए आवष्यकता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में आयी कमियों को दूर करके एक नई संवैधानिक व्यवस्था का प्रारुप बने।
लम्बे समय तक चिंतन के बाद वर्षो तक प्रयत्न करके देश भर के कई सौ बुद्धिजीवियों ने रामानुजगंज में पहाडी के नीचे बैठकर नई व्यवस्था का एक प्रारुप बनाया और 4 नवंबर 1999 को राष्ट्र को समर्पित किया । इस संवैधानिक व्यवस्था के मुख्य सुझाव इस प्रकार हैं-
(1) संविधान के प्रियंबुल में सेे समानता शब्द को निकालकर स्वतंत्रता शब्द डाल दिया जाये। जब दुनियां के कोई भी दो व्यक्ति कार्य क्षमता और उपलब्धि मे एक समान नही हो सकते तब समानता शब्द भ्रामक है। संविधान मे प्रयुक्त समानता शब्द ही असमानता का मुख्य कारण है। यह शब्द ही वर्ग विद्वेष बढाता है तथा यही शब्द अधिकांश समस्याए पैदा करता है। निठल्ले लोग शब्द के कारण अपना अधिकार समझने लगते है। जबकि कमजोरो की सहायता करना मजबूतो का कर्तब्य होता है। कमजोरो का अधिकार नही।
(2) भारतीय संविधान पांच प्राथमिकताओं पर केन्द्रित हो (1) लोकस्वराज्य (2) अपराध नियंत्रण की गारंटी (3) आर्थिक असमानता में कमी (4) श्रम सम्मान वृद्धि (5) समान नागरिक संहिता। स्पष्ट है कि इन पांच प्राथमिकताओं का क्रम भी इसी तरह का होना चाहिये। किन्तु वर्तमान समय मे भारत मे सबकुछ बदला हुआ है। पांचो आधारो पर तंत्र पूरी तरह असफल है बल्कि कहा जा सकता है कि तंत्र इन समस्याओ को बढाने मे सहायक हो रहा है।
(3) भारत परिवारों का संघ होगा सिर्फ राज्यों का नहीं। इसका अर्थ हुआ कि परिवार एक रजिस्टर्ड इकाई होगी। प्रत्येक व्यक्ति को किसी परिवार का सदस्य होना अनिवार्य होगा। तभी उसे नागरिकता दी जायेगी अन्यथा वह व्यक्ति के रुप में रह सकता है और राष्ट्रीय व्यवस्था के संचालन में उसका कोई योगदान नहीं होगा। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य के साथ नही रह सकता तब उसे किसी अन्य की संवैधानिक व्यवस्था मे शामिल होने का क्यो अधिकार होना चाहिये।
(4) व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार समाप्त हो जायेगा। सम्पूर्ण सम्पत्ति परिवार की सामूहिक होगी, न कि व्यक्तिगत।
(5) व्यवस्था की इकाईयां व्यक्ति, परिवार, गांव, जिला, प्रदेष, केन्द्र के आधार पर होगी। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र, लिंग, गरीब, अमीर के आधार पर व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा। भारत सवा सौ करोड व्यक्तियों का देश होगा, परिवारों गांवो का संघ होगा, न कि धर्माे जातियों या अन्य वर्गो का। वर्ग मान्यता संवैधानिक रुप से अमान्य होगी। कानून के समक्ष प्रत्येक व्यक्ति समान होगा ।
(6) व्यवस्था दो प्रकार की होगी (1) उपर से नीचे की ओर (2) नीचे से उपर की ओर। केन्द्र सरकार के पास सिर्फ पांच विभाग होगे। सेना पुलिस वित विदेश न्याय। अन्य सारे विभाग केन्द्र सभा के पास जा सकते है। केन्द्र सरकार पांच विभागों के आधार पर उपर से नीचे तक नियंत्रित करेगी। अन्य सारे अधिकार केन्द्र सभा को नीचे की इकाईयां कभी भी दे सकती है और वापस ले सकती है।
(7) प्रत्येक इकाई को अपने इकाईगत निर्णय की असीम स्वतंत्रता होगी किन्तु कोई भी इकाई किसी अन्य इकाई्र की स्वतंत्रता में बाधा नहीं पहुंचा सकती। ऐसी बाधा अपराध माना जायेगा और केन्द्र सरकार प्रत्येक इकाई को ऐसे अपराध से सुरक्षा के लिए गारंटी देगी किन्तु केन्द्र सरकार भी किसी इकाई की इकाईगत स्वतंत्रता का उलंघन तब तक नहीं कर सकती जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। केन्द्र सरकार दो सभाओं को मिलाकर बनेगी (1) लोकसभा (2) परिवार सभा। लोकसभा का चुनाव सीधा होगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अथवा सुविधानुसार परिवार का मुखिया वोट देकर गठन करेगा। परिवार सभा परिवार से गांव जिला प्रदेश होते हुए केन्द्र सभा का निर्माण करेगी । लोकसभा स्थायी होगी और प्रतिवर्ष उसके एक बटा पांच सदस्यों का चुनाव होगा। लोकसभा कभी भंग नहीं होगी। परिवार सभा पांच वर्ष मे एक बार चुनी जायेगी।
(8) न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका का स्वरुप एक दूसरे पर सहयोग और नियंत्रण का मिला जुला होगा जैसा वर्तमान में है।
(9) केन्द्र सरकार सिर्फ सुरक्षा कर के नाम से एक टैक्स लगा सकेगी। वह टैक्स प्रत्येक परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर वार्षिक दो प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकेगा। यदि आवश्यक होगा तो न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के समान ही एक स्वतंत्र अर्थपालिका भी बनाई जा सकती है। केन्द्र सभा या केन्द्र सरकार आर्थिक असमानता और श्रम शोषण को नियंत्रित करने के लिए सम्पूर्ण कृत्रिम उर्जा का मुल्य ढाई गुना बढाकर उससे प्राप्त सम्पूर्ण धन राशि प्रत्येक व्यक्ति को बराबर के हिसाब से परिवारों में बांट देगी। अन्य कोई टैक्स न केन्द्र सरकार लगा सकेगी न ही कोई अन्य। कोई भी इकाई अपने आंतरिक खर्च के लिए आपस में धन संग्रह का कोई भी तरीका लागू कर सकती है।
(10) शिक्षा स्वास्थ्य विज्ञान रेलवे पर्यावरण आदि सभी विभाग आवश्यकता नुसार नीचे की इकाईयां केन्द्र सभा को दे सकती है केन्द्र सरकार को नहीं। केन्द्र सरकार के पास सिर्फ पांच ही विभाग होंगे।
(11) प्रत्येक इकाई को अपनी इकाईगत भाषा की स्वतंत्रता होगी। केन्द्र सरकार की भाषा सिर्फ हिन्दी होगी।
(12) यदि संविधान की कोई धारा व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है तो न्यायालय उसे अवैध घोषित कर सकता है। जनहित की कोई परिभाषा न्यायालय नही कर सकता। उसकी परिभाषा या तो विधायिका कर सकती है अथवा जन स्वयं। न्यायालय किसी भी इकाई की इकाईगत स्वतंत्रता मे किसी अन्य इकाई के हस्तक्षेप को रोकने की कानून के अनुसार व्यवस्था करेगा।
(13) विदेशो से किसी प्रकार का कोई टकराव होने की स्थिति में विश्व बन्धुत्व को राष्ट्रीय अस्मिता की तुलना में अधिक महत्व दिया जायेगा।
(14) तंत्र संविधान द्वारा निर्देषित होगा। संविधान संशोधन के लिए एक अलग संविधान सभा बनायी जायेगी जिसके किसी सदस्य का तंत्र के किसी भाग से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं होगा। इस संबंध में एक सुझाव दिया गया है कि पूरे देश के 111 ऐसे लोग चुने जायेंगे जिनमें 100 डिग्री काॅलेज या उसके उपर के प्राचार्य होंगे तथा 11 ऐसे लोग होंगे जो पूर्व राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हो। इन सबका चुनाव डिग्री काॅलेज के प्रोफेसर ही कर सकेंगे। एक दुसरा सुझाव भी है कि लोक सभा के चुनाव के समय ही पांच सौ तैतालिस अन्य सदस्यो का चुनाव करके एक लोक संसद बना ली जाय जो संविधान सभा का काम करे।
मैंने बहुत संक्षेप मं प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था का प्रारुप लिखा है इसका विस्तार प्रस्तावित संविधान की पुस्तिका से मिल सकता है जिसमें पूरे संविधान को 165 अनुच्छेदों में समेटा गया है। 99 के बाद अब तक उस प्रारुप में किसी संशोधन की आवष्यकता महसूस नहीं की गई है और यह माना गया है कि उक्त संविधान के अधिकांश प्रस्ताव संवैधानिक व्यवस्था का विकल्प बनने की क्षमता रखते हैं। हम आगे भी वर्तमान संविधान और वैकल्पिक संवैधानिक व्यवस्था पर निरंतर चर्चा करते रहेंगे।
मंथन का अगला विषय ‘‘ हिन्दू कोड बिल’’ होगा।

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