भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना-बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 7, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ मान्य सिद्धान्त है।
1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।
2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पूरी तरह असत्य है ऐसी आधुनिकता भी ठीक नही। सत्य और असत्य का निर्णय विद्वानो को विचार मंथन के द्वारा करना चाहिये।

3 किसी भी यथार्थ को अंतिम सत्य कभी नही मानना और कहना चाहिये। प्रकृति मे अंतिम सत्य होता ही नही। किसी विचार को अंतिम सत्य कहकर प्रचारित करने वाले बुरी नीयत के लोग होते है।

4 प्रकृति के रहस्य असीम हैं । पुराने रहस्यो पर विज्ञान पर्दा उठाता है तो नये रहस्य उसके सामने आ जाते है।

5 भारतीय मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति जितना गंभीर विचारक होता है वह उतना ही बडा नास्तिक होता है। विचारक पूजा पाठ अथवा भक्ति और उपासना की अपेक्षा चिंतन पर अधिक जोर देते है।

6 श्रद्धा और विचार बिल्कुल अलग अलग होते है। ब्राम्हण प्रवृत्ति के लोग विचार प्रधान होते है तो अन्य तीन प्रवृत्तियो के लोग श्रद्धा प्रधान। दोनो व्यवस्था के लिये एक दूसरे के पूरक होने चाहिये।

7 विचार विहीन श्रद्धा व्यक्ति को मुर्खता की ओर बढा सकती है तो श्रद्धा विहीन विचार धूर्तता की ओर।

मै बचपन से ही आर्य समाज से जुडा रहा । प्रारंभ से ही मुझे स्वामी दयानंद के दो विचार याद रहे। 1 भूत प्रेत तंत्र मंत्र जादू टोना अस्तित्व हीन समस्याएं है। 2 प्रत्येक व्यक्ति को सत्य को ग्रहण करने तथा असत्य को छोडने के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये । इन दो बातो पर मैने बचपन से ही बहुत विचार किया कि यदि कभी मुझे स्वामी दयानंद का कोई कथन सत्य से दूर प्रतीत हो तो मै स्वामी जी के कथन को मानू अथवा अपने निष्कर्ष को । मैने इस संबंध मे बीच का मार्ग निकाला कि यदि ऐसी कोई स्थिति आती है तो मै स्वामी जी के कथन को असत्य नही कहूंगा किन्तु उसे सत्य भी न मानकर अपने निष्कर्ष को सत्य मानूगा। मै स्पष्ट कर दू कि मैने बचपन मे ही अष्टांग योग के माध्यम से बहुत आगे तक जाकर चिंतन मंथन मे क्षमता प्राप्त की थी। यदि मै 17 वर्ष की उम्र मे ही राजनीति के कीचड मे नही फंसा होता तो संभव है कि मेरी दिशा कुछ भिन्न होती।

बचपन मे ही मुझे परिवार ने यह बताया कि भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना का अस्तित्व भी है और उसका प्रभाव भी होता है। आर्य समाज ने मुझे यह बताया कि ये सब अस्तित्वहीन है और इनका कोई प्रभाव नही होता । मैने इस विषय मे अनुुसंधान शुरू किया १ मै कई माह तक श्मसान मे सोकर अनुभव करता रहा । अन्य भी कई प्रकार से मैने सत्य को खोजने के प्रयास किये। 2004 तक के पचास वर्षो तक मेरे प्रयत्न जारी रहे। इस संबंध मे मैने कई घटनाओं को प्रत्यक्ष से देखा और स्वयं अनुभव भी किये । जब भी मुझे कही भूत-प्रेत होने की सूचना मिली तो मै उस स्थान पर जाकर पूरी खोज करता रहा। न तो मुझे कभी श्मसान मे भूत-प्रेत दिखा या अनुभव हुआ न ही किसी अन्य जगह पर । अधिकांश घटनाए किसी भ्रम या जालसाजी का परिणाम सिद्ध हुई। मैने सबके सामने ऐसी जालसाजियां सिद्ध भी करके बता दिया । मै जब आपात काल मे जेल मे था तो मुझे एक जादूगर द्वारा कुछ जादू देखने को मिला । जेल मे ही मैने रिसर्च करके अपने साथियों को वे सारे खेल दिखा दिये। कई बार ऐसे भी अवसर आये, जब भूत-प्रेत पीडित व्यक्ति को मैेने मंत्र पढने का बहाना बनाकर उस पर फूक दिया तो वह व्यकित ठीक हो गया। मैने एक बार भूत-प्रेत का प्रभाव सिद्ध करने वालो को एक बहुत बडी राशि का इनाम देने की घोषणा की चुनौती दी। कई लोग आये। हजारों दर्षक एकत्रित हुए । झाड-फूक वालो ने पूरा प्रयत्न किया। किन्तु सफल नही हुए। मैने अपने शहर ही नही बल्कि आस पास के क्षेत्र तक भी किसी ऐसी जालसाजी ठगी को सफल नही होने दिया जो भूत-प्रेत जादू-टोना तंत्र मंत्र के नाम पर फैलायी जा रही हो। सिर्फ हिन्दुओ तक ही नही बल्कि मुसलमानों आदिवासियों तक मे मेरा विलक्षण प्रभाव था। आम तौर पर लोग ऐसे मामलो मे मुझसे सम्पर्क करते रहे।

इन सबके बाद भी कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिन्हे मै न तो जालसाजी ही कह सका न अप्राकृतिक ही। मैने कई बार उपर से बडे बडे पत्थर गिरते देखे। सारा दिमाग लगाने के बाद भी मुझे मानना पडा कि यह मामला भिन्न है। एक परिवार के सभी सदस्य जब घर मे प्रवेश करते थे तो चाहे बालक हो अथवा वृद्ध, वे असामान्य हो जाते थे। उनके इलाज के लिये भी मुझे असमान्य प्रयत्न करने पडे। एक दो ऐसे भी जादू मैने देखे जिन्हे मै नही समझ सका। मैने जब भूत दिखाने की चुनौती दी और ओझा लोग भूत चढाने का मंत्र पढने लगे तब जिस पर भूत चढ रहा था वह भी उसका षणयंत्र नही था। मै आज तक नही समझा कि उस पर क्या प्रभाव था, और मेरे डाटते ही वह प्रभाव कैसे समाप्त हुआ । किन्तु यह सच है कि प्रभाव था और खत्म भी हुआ। एक भूत प्रभावित व्यक्ति के दोनो कानो मे पीपल की लकडी सटाकर तथा उसके दोनो हाथो की उंगलियों के बीच लकडी लगाकर दबाते ही भूत उतारने का प्रयोग मैने किया है। वह क्या था और कैसे उतर गया यह कारण और परिणाम मै आज तक नही समझ सका । असामान्य गतिविधि के बच्चो को झाड-फूक से भी ठीक होते मैने देखा है, और उन्ही बच्चो को डाक्टर से भी ठीक होते देखा है। यदि बीमारी थी तो दूर से फूक देने से कई माह के लिये ठीक कैसे हुई यह रहस्य मै अब तक नही सुलझा सका।

लम्बे समय तक पूरे प्रयत्न के बाद भी मै निश्चित रूप से यह नही कह सका कि भूत-प्रेत शारीरिक बीमारी है या मानसिक अथवा कोई प्राकृतिक प्रकोप भी है। अन्त मे हार थक कर मैने रामानुजगंज छोडते समय यह निष्कर्ष लिखा कि प्रकृति के अनसुलझे रहस्यो को भूत और सुलझ गये रहस्य विज्ञान कहे जाते है। जब तक हसने वाली गैस का शोध नही हुआ तब तक वह चमत्कार था और बाद मे विज्ञान बन गया। हिस्टीरिया की बीमारी का भी कुछ ऐसा ही इतिहास रहा है। संभव है कि आज हम जिन घटनाओ को असमान्य मान रहे है वे भविष्य मे विज्ञान द्वारा सामान्य प्रमाणित कर दी जावे और हम उन्हे भूत-प्रेत, जादू-टोना, तंत्र-मत्र की जगह विज्ञान सम्मत घटनाए मानने लग जावे किन्तु जब तक विज्ञान प्रमाणित नही करता तब तक उन्हे किसी तर्क से असत्य सिद्ध करने का कोई औचित्य नही है। मैने रामानुजगंज मे जो प्रयोग किया उसके कारण वहां के आस पास के लोग भूत प्रेत के नाम पर होने वाले छल कपट और जालसाजी से बच गये। कुछ लोग तो यहां तक कहने लग गये कि आपका नाम बजरंग होने के कारण ही हो सकता है कि भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र आपसे डर कर दूर भागता है किन्तू मै जानता हॅू कि इस कहानी मे कोई दम नही है। फिर भी इस कथन मे कुछ सच्चाई दिखती है कि मेरे द्वारा भूत-प्रेत के अस्तित्व को अस्वीकार करने के कारण मेरा मानसिक मनोबल उंचा हैं इसलिये मै इन सबसे प्रभावित नही होता । बल्कि टकराकर इनकी पोल खोल देता हॅू। मुझे, मेरे परिवार को तथा मेरे निकट वर्ती मित्रो को यदि भूत प्रेत तंत्र मंत्र न मानने के कारण कोई सुरक्षा मिली हुई है तो फिर क्यो न अन्य लोग भी ऐसा ही प्रयास करे। न मानने वाले मानने वालो की तुलना मे अधिक संतुष्ट है। इसलिय मै समझता हूॅ कि इनके अस्तित्व के होने न होने की बहस से दूर रहते हुए इन्हे अस्वीकार कर दिया जाये।

मै पिछले साठ वर्षो के अनुभव से यह बताने की स्थिति मे हॅू कि धीरे धीरे स्वाभाविक रूप से भूत-प्रेत की घटनाएं कम हो रही है। फिछले दस पंद्रह वर्षो से मैने रामानुजगंज शहर मे पत्थर गिरने की कोई भी घटना नही देखी। किसी व्यक्ति को भूत लगे ऐसी घटनाए भी बहुत ही कम हो गयी है। क्या प्रभाव है और क्यो भूत-प्रेत कम हो रहे है। यह समझ पाना मेरे बस की बात नही। किन्तु भूत प्रेत के नाम पर आज भी धूर्तो और ठगो का बाजार बंद नही हुआ है।

मै अब तक नही कह पा रहा हॅू कि भूत प्रेत का अस्तित्व है या नही । किन्तु मेरी एक सलाह अवश्य है कि हम अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन मे भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र के अस्तित्व को बिल्कुल स्वीकार न करे। किन्तु यदि कोई अन्य ऐसा मानता है तो हम उसके समक्ष ऐसा कोई दावा भी न करे कि वह झुठ बोल रहा है अथवा ऐसी घटनाए असत्य है। क्योकि असत्य कह देने मात्र से कोई बात असत्य नही हो जाती । यदि किसी व्यक्ति को किसी बीमारी का भूत प्रेत से इलाज कराने पर विश्वास हो तो उसे हम समझा सकते है कि वह ऐसा न करे और डा0 से इलाज करावे। किन्तु हम उसे जोर देकर न कहे अथवा कानून द्वारा उसे रोकने का प्रयास न करे तो अच्छा होगा। कई लोग अंध श्र्रद्धा उन्मूलन का अच्छा कार्य कर रहे है इस तरह वैचारिक धरातल पर इन घटनाओ को चुनौती दी जा सकती है। और दी जानी चाहियें किन्तु तोड मरोड कर या कुतर्क के माध्यम से मै भूत प्रेत तंत्र मंत्र को भ्रम सिद्ध करने पर अधिक जोर देने के पक्ष मे नही हूॅ । मै चाहता हॅू कि विज्ञान निरंतर आगे बढकर ऐसे अंघ विष्वास की पोल खोलता जाए जिससे हम प्रकृति के अनसुलझे रहस्यो को वैज्ञानिक घरातल पर सुलझाने मे सफल हो सके।

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal