सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 27, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

विधायिका न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव चरम पर है। दिल्ली के मुख्य मंत्री की जानकारी मे मुख्य सचिव के साथ मारपीट ने इस विवाद को सडक पर लाकर खडा कर दिया है। विवाद तो पंडित नेहरू के ही कार्यकाल से शुरू हो गया था ! जब विधायिका ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकारो का अतिक्रमण शुरू किया । लोकतंत्र मे तीनो इकाइयां समकक्ष होती है तथा तीनो एक दूसरे की सहायक भी होती है और नियंत्रक भी। विधायिका ने दादागिरी करते हुए अन्य दो को कमजोर किया । न्यायपालिका ने तो पिछले कुछ वर्षो से अपनी भी दादागिरी दिखाई। किन्तु कार्यपालिका अब भी इन दोनो के दबाव मे है। साधारण सा न्यायाधीश अपने न्यायालय मे इनके साथ जैसी भाषा का प्रयोग करता है वह अपमान जनक होती है। एक गुण्डा भी विधायक या मंत्री बन जाता है तो गर्व से कहता है कि वह जनता का चुना हुआ है अर्थात वह मालिक है तो शेष सब उसके सहायक।
पहली बार दिल्ली मे कार्यपालिका के लोगो ने विधायिका की दादागिरी के विरूद्ध मोर्चा खोला है। मै जानता हॅू कि सरकारी कर्मचारियों की छवि आम जनता के बीच नेताओ और न्यायाधीशो की तुलना मे ज्यादा खराब होती है क्योकि दोनो अपने सारे अत्याचार इन कर्मचारियों के माध्यम से ही कराते है । इसलिये सारी लूट पाट मे प्रत्यक्ष भूमिका तो इन्ही कर्मचारियों की होती है। फिर भी सैद्धान्तिक रूप से यह शुभ संकेत है कि जनता को गुलाम बनाकर रखने वाली तीनो लोकतांत्रिक इकाईयों के बीच लूट के माल के बटवारे का विवाद अब सडक पर आ गया है। सत्तर वर्षो से दो इकाइयो ने कार्यपालिका के साथ जिस तरह बटवारे मे पक्षपात किया वह अरविन्द केजरीवाल के उन्मादी स्वभाव के कारण सडक पर आ गया। इस संबंध मे कार्यपालिका की मदद होनी चाहिये। क्योकि जब तक टकराव बराबरी का नही होगा तब तक लूट का माल उसके वास्तविक मालिक अर्थात लोक के पास आना संभव नहीं।

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