मंथन क्रमांक-75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क-बजरंग मुनि

Posted By: admin on March 3, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्तियो की सहमति से तथा समाज की स्वीकृति से बनती है। राष्ट्र की कोई भौगौलिक सीमा अवश्य होती है जबकि समाज की कोई भौगोलिक सीमा नहीं हुआ करती।
प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 सामाजिक 2 राष्ट्रीय । व्यक्ति हमेशा समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का। प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार भी अलग अलग होते है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्ति के रूप मे जो प्राकृतिक अधिकार मिलते है उन्हे मौलिक अधिकार कहते है । इन प्राकृतिक अधिकारो के आधार पर व्यक्ति समाज का अंग होता है। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त होते है जो उन्हे राष्ट्र या राज्य के द्वारा दिये जाते है । इन्हे नागरिक अधिकार कहा जाता है। मै स्पष्ट कर दू कि समाज के सुचारू संचालन के लिये राज्य एक अनिवार्य आवश्यकता होती है। प्राकृतिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के समान होते है । उनमे कभी कोई भेद नही होता न ही वे अधिकार उसकी सहमति के बिना किसी भी तरह कम ज्यादा किये जा सकते है। नागरिक अधिकार संविधान प्रदत होते है और वे अलग अलग हो सकते है। साथ ही कम ज्यादा भी किये जा सकते है। इस तरह हम कह सकते है कि व्यक्ति समाज का अंग होता है और नागरिक राष्ट्र का । भले ही प्रत्येक व्यक्ति की दोनो भूमिकाए अलग अलग होते हुए भी उसी व्यक्ति मे निहित होती है।
किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसे समाज का अंग नही बनाया जा सकता। न ही उसकी सहमति के बिना उसके उपर कोई कानून थोपा जा सकता है। इसका अर्थ हुआ कि सिद्धान्त रूप से कोई भी व्यक्ति अकेला रह सकता है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर प्रत्येक व्यक्ति को समाज के साथ संबंद्धता उसकी मजबूरी होती है। क्योकि उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी समाज ही देता है। समाज भी उसकी सुरक्षा की गारंटी राज्य के माध्यम से ही देता है। इस तरह दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राष्ट्र की नागरिकता के लिये मजबूर होता है और यह मजबूरी ही उसकी स्वीकृति है। अर्थात कोई भी व्यक्ति अकेला रहने के लिये स्वतंत्र है किन्तु वह अकेला रह नही सकता और उसे व्यक्ति और नागरिक की दोहरी भूमिका निभानी ही होती है।
कोई भी व्यक्ति यदि किसी अन्य देश मे जाता है और रहता है तो उसे भले ही उस देश के नागरिक अधिकार प्राप्त न हो किन्तु उसके सामाजिक अधिकार सुरक्षित रहते है । दुनिया का कोई भी कानून उस व्यक्ति की सहमति के बिना उसके प्राकृतिक अधिकारो मे किसी प्रकार की कोई कटौती नही कर सकता। साथ ही जब कोई व्यक्ति किसी देश का नागरिक बन जाता है तब उसके सारे प्राकृतिक अधिकार तब तक उस देश के संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहमत मान लिये जाते है जब तक वह सहमत है । इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी देश की नागरिकता कभी भी छोड सकता है और वह नागरिक कानूनो से मुक्त हो सकता है। किन्तु जब तक वह नागरिकता नही छोडता तब तक वह उस देश की कानूनो को मानने के लिये बाध्य है। इस तरह आदर्श राजनैतिक व्यवस्था मे किसी भी व्यक्ति को कभी भी देश छोडने से नही रोका जा सकता जब तक उसने कोई अपराध न किया हो। वर्तमान स्थिति यह है कि अनेक देश तो अपने नागरिको को देश छोडने के प्रयत्नो मे गोली तक मार देते है जबकि यह उसकी स्वतंत्रता है क्योकि उक्त व्यक्ति समाज का सदस्य पहले है और राष्ट्र का नागरिक बाद मे । इतना अवश्य है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी देश मे प्रवेश करने के पूर्व अनुमति स्वीकृति आवश्यक है ।
किसी भी देश का कानून उसकी सहमति के बिना व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बना सकता न ही उसे दंड दे सकता है। इसका अर्थ हुआ कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बनाने मे भी उस व्यक्ति की अप्रत्यक्ष सहमति है। इतना अवश्य है कि जिस व्यक्ति ने किसी देश की नागरिकता स्वीकार की है उस देश के सारे कानूनो मे उस व्यक्ति की सहमति मान ली जाती है। इस तरह कानून के अनुसार व्यक्ति को दंडित करना उसकी अप्रत्यक्ष सहमति है।
आज सबसे बडी कठिनाई यह खडी हो गई है कि राष्ट्र और समाज के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। आम तौर पर पढे लिखे लोग भी व्यक्ति और नागरिक के बीच का अंतर नही समझते। यह भी जानकारी नही हो पाती है कि मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार के बीच क्या फर्क होता है। अधिकांश लोग तो राष्ट्र को ही अंतिम इकाई मान लेते है और समाज को राष्ट्र के अंतर्गत कहने लग जाते है। अथवा कुछ लोग समाज के भी कई भाग कर देते है। ये सारा भ्रम जानकारी के अभाव मे फैल जाता है अथवा फैला दिया जाता है। व्यक्ति एक सर्व सम्प्रभुता सम्पन्न प्राकृतिक इकाई के रूप मे होता है और उसकी सहमति के बिना उसी स्वतंत्रता की कोई सीमा नही बनाई जा सकती । इस तरह यदि किसी राष्ट्र मे कोई कानून बनता है तो उस कानून के बनाने मे उस राष्ट्र के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सहमति आवश्यक है। इसका अर्थ हुआ कि जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र से भी उपर समाज का अंग है तब सम्पूर्ण विश्व की भी कोई एक ऐसी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिये जिसकी सहमति या स्वीकृति से ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारो को छीना जा सके। अब तक दुनियां मे ऐसी कोई व्यवस्था बन नही सकी है भले ही आंशिक रूप से इस दिशा मे कुछ प्रयत्न हुए भी और धीरे धीरे आगे बढ भी रहे है।
इस तरह व्यक्ति और नागरिक अधिकारो के मामले मे अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के साथ जुडे हुए होते है। क्योकि प्रत्येक व्यक्ति के लिये दोनो भूमिकाओ मे रहना उसकी मजबूरी है और उसकी सहमति के बिना कोई भी अन्य उसकी स्वतंत्रता मे कटौती नही कर सकता। आदर्श व्यवस्था यह होगी कि चरित्र निर्माण मे मुख्य भूमिका परिवार और समाज की होनी चाहिये तथा राज्य को विशेष परिस्थिति मे ही हस्तक्षेप करना चाहिये । वर्तमान समय मे व्यवस्था का अर्थ समाज और परिवार से हटकर राज्य तक सीमित हो गया है। परिवार और समाज को किनारे करके राज्य ने सारी व्यवस्था स्वयं तक सीमित कर ली है। दुनियां के राष्ट्रो के बीच आपसी टकराव भी इसी शक्ति संग्रह के परिणाम होते है। उचित होगा कि राज्य परिवार और समाज अपनी अपनी अलग अलग भूमिकाओ को समझे । राज्य इन भूमिकाओ को अलग अलग सक्रिय होने दे और यदि राज्य ऐसा न करे तो व्यक्तियो को चाहिये कि वे राज्य को इस दिशा मे मजबूर करे। व्यक्ति और नागरिक की अलग अलग पहचान और भूमिका स्पष्ट होनी चाहिये जिसका अभाव वर्तमान अव्यवस्था का मुख्य कारण है।
नोट-मंथन का अगला विषय भय का व्यापार होगा।

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