मंथन क्रमांक 80- ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे? बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 7, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।
यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोगजार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।
इन सब परिस्थितियों का आकलन करके ही बासठ वर्ष पूर्व हम कुछ मित्रो ने रामानुजगंज शहर मे ज्ञान यज्ञ की शुुरूआत की । रामानुजगंज मे बासठ वर्षो से प्रतिमाह की एक निश्चित तारीख को आधे घंटे की धार्मिक प्रक्रिया से प्रारंभ करके दो घंटे की एक पूर्व निश्चित विषय पर चर्चा होती है जो अबतक सफलता पूर्वक जारी है। अबतक करीब तीन सौ अलग अलग विषयो पर स्वतंत्र चर्चा हो चुकी है । अन्य नये विषय भी शामिल होते है। सोचा गया था कि एक शहर यदि समस्याओ के समाधान मे आगे बढकर आदर्श प्रस्तुत करेगा तो अपने आप देश पर उसका प्रभाव पडेगा । रामानुुजगंज शहर मे इस प्रयत्न को अच्छी सफलता भी मिली किन्तु धीरे धीरे वे सफलताए रामानुजगंज से बाहर विस्तार नही कर सकीं क्योकि बाहर के लोगो को शराफत से आगे निकालकर समझदारी की ओर ले जाने का हमने कोई प्रयास नही किया। बल्कि उसका दुष्परिणाम हुआ कि रामानुजगंज पर भी बाहर की हवाओ का प्रभाव धीरे धीरे पडने लगा। बाहर के सभी शरीफ और धूर्त इकठ्ठे होकर रामानुजगंज की व्यवस्था के विरूद्ध सक्रिय हो गये। वहां भी साम्प्रदायिकता अथवा जातिवाद के नाम पर संगठन बनने लगे । वहां भी राजनैतिक टकराव आंशिक रूप से पैर फैलने लगा । कर्मचारियो और नागरिको के बीच की एकता कमजोर होने लगी। अब तो ऐसा भी दिख रहा है कि वहां धीरे धीरे अपराधियो का भी प्रवेश शुरू हो जायेगा । चोरी डकैती गुंडा गर्दी दादागिरी से अभी तक तो सुरक्षित है किन्तु जब सामाजिक एकता ही छिन्न भिन्न हो जायेगी तो कब तक बचा सकेंगे।
स्पष्ट है कि हम प्रयोग मे सफल होकर भी असफल हुए, क्योकि ऐसे वैचारिक प्रयोग किसी एक क्षेत्र से सफल नही हो पाते । इसलिये यह सोचा गया कि अब ज्ञान यज्ञ का विस्तार राष्टीय स्तर पर हो । साथ ही हम समस्याओ का समाधान करने का प्रयत्न न करे। हम वर्ग विद्वेश मे सक्रिय समूहो का विरोध न करके सामाजिक एकता की एक और अधिक बडी लकीर खीचने का प्रयास क्यो न करें। इसका अर्थ हुआ कि हम जाति धर्म भाषा आदि के नाम पर बने संगठित समूहो का विरोध न करके एक संयुक्त समूह की ओर बढने का प्रयत्न करे जैसा रामानुजगंज मे प्रारंभ मे किया गया था। अर्थात ज्ञान यज्ञ के नाम से एक प्रकार के लोग एक साथ बैठने की आदत डाले । भले ही वे किसी भी संगठन के सदस्य क्यो न हो।
ज्ञान यज्ञ की विधि बहुत सरल है। पूरा कार्यक्रम यदि तीन घंटे का है तो आधा घंटा यज्ञ यथवा किसी अन्य भावनात्मक धार्मिक कार्यक्रम से श्रद्धा पूर्वक शुरूआत करनी चाहिये। यह समय पूरे कार्यक्रम का एक/छः से अधिक न हो । दो घंटा किसी एक पूर्व निश्चित विषय पर स्वतंत्र विचार मंथन होना चाहिये जिसमे विपरीत विचारो के लोग अपनी बात स्वतंत्रता पूूर्वक कहने की हिम्मत कर सके और दूसरे लोग विपरीत विचारो को सुनने की अपनी सहन शक्ति जागृत कर सकें । अंतिम आधा घंटा मे स्वराज्य प्रार्थना तथा प्रसाद वितरण आदि का कार्य होता है। आयोजक अपनी श्रद्धा अनुसार धार्मिक क्रिया के लिये स्वतंत्र है। चर्चा का विषय भी चुनने के लिये आयोजक स्वतंत्र है। किन्तु वक्ता की स्वतंत्रता को किसी भी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता भले ही वह किसी की भावनाओ के विरूद्ध ही क्यो न हो। ज्ञान यज्ञ के बैनर तले कोई सामूहिक निष्कर्ष निकालना प्रतिबंधित है । सब लोग व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालने को स्वतंत्र हैं । ज्ञान यज्ञ के बैनर तले न कोई भी अन्य सक्रियता हो सकती है न ही योजना बन सकती है। अर्थात ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य व्यक्तिगत रूप से अथवा अन्य बैनर तले बाढ सहायता राष्ट्रीय संकट मे मदद या भूखो को भोजन आदि सेवा कार्य करने को स्वतंत्र है, किन्तु ज्ञान यज्ञ के नाम से पूरी तरह प्रतिबंधित है। ज्ञान यज्ञ की केवल एक ही सक्रियता है कि भिन्न विचारो के लोग एक साथ बैठकर स्वतंत्रता पूर्वक विचार मंथन कर सके तथा भावना और बुद्धि के बीच विवेक एंव शराफत और चालाकी के बीच समझदारी का विस्तार हो सके। मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को रोकने का प्रयास छोडकर वर्ग मुक्त वर्ग खडा करने का जो भी प्रयास करेगा वह अपने आप स्वाभाविक रूप से समाधान होगा । समस्याओ का समाधान करने मे तो भारत मे गली गली मे लोग मिल जायेगे किन्तु ज्ञान यज्ञ का प्रयास यह है कि समस्याओ की प्राकृतिक रूप से आधोशित तरीके से कम होने की प्रणाली विकसित की जाये । ज्ञान यज्ञ एक ऐसी ही सफल प्रणाली है जिसमे ज्ञान यज्ञ परिवार पूरे राष्टीय स्तर पर सक्रिय हो रहा है।
ज्ञान यज्ञ परिवार मे जुडने के लिये एक ही शर्त है कि ऐसे व्यक्ति को कम से कम वर्ष मे एक बार ज्ञान यज्ञ मे शामिल होने की प्रतिबद्धता स्वीकार करनी चाहिये। ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को हम ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य मान रहे है। इस सदस्यता मे कोई जाति धर्म का भेद नही है। अपराध निरपराध का भी भेद नही है। राष्टीयता का भी भेद नही है। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य बन सकता है। इस सदस्यता का न कोई शुल्क है न कोई अन्य प्रतिबद्धता।
मै समझता हॅू कि विनोबा जी ने ऐसे कार्य को नाहक मिलन शब्द से स्थापित किया था । मुझे तो पूरा विश्वास है कि ज्ञान यज्ञ के माध्यम से हम समाज सशक्तिकरण की दिशा मे तेजी से कदम बढा सकेंगे और समाज सशक्तिकरण अनेक समस्याओ का समाधान करने मे सफल होगा । हमारे कुछ मित्र ग्राम संसद अभियान के माध्यम से राज्य कमजोरी करण का जो अभियान चला रहे है उनकी सफलता के लिये भी हम ईशवर से प्रार्थना करते है। अपनी बासठ वर्ष की सक्रियता तथा अनुभव के आधार पर मै आश्वस्त कि भारत की सभी समस्याओ के समाधान की शुरूआत ज्ञान यज्ञ विस्तार के माध्यम से हो सकती है। जब भिन्न विचारो के लोग अपने अपने संगठनो मे रहते हुए भी एक साथ बैठकर चर्चा करने की आदत डालेगे तो परिणाम अवश्य ही अच्छे होंगे । इसी आधार पर हम ज्ञान यज्ञ परिवार का राष्टीय स्तर पर सफलता पूर्वक विस्तार कर रहे है। कुछ लोग मानते है कि इसका कोई बडा लाभ नही होगा । हो सकता है ऐसा हो किन्तु मै आश्वस्त हॅू कि इस प्रयत्न का कोई नुकसान नही होगा। जो लोग अन्य प्रयत्नो मे लगे है उनके किसी प्रयत्न मे ज्ञान यज्ञ परिवार जरा भी बाधक नही है। वे अपने प्रयत्नो मे सफल हो इससे हमे कोई कठिनाई नही। ज्ञान यज्ञ परिवार नये तरीके से समाज सशक्तिकरण का कार्य कर रहा है।
मंथन का अगला विषय ग्राम संसद क्यो क्या और कैसे ?

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal