सामयिकी- बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 11, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भारत मे स्वतंत्रता के पूर्व श्रम शोषण के उद्देश्य से सवर्ण आरक्षण था। भीम राव अम्बेडकर एक बडे बुद्धिजीवी थे जो जन्म से तो अवर्ण थे किन्तु श्रम शोषण के लिये अन्य सवर्णो की तुलना मे बहुत आगे थे। उस समय भारत की सम्पूर्ण अवर्ण आबादी मे एक प्रतिशत आबादी ही बुद्विजीवी थी अन्यथा शेष निन्यानवे प्रतिशत श्रमजीवी थी। अम्बेडकर जी ने गुप्त रूप से सवर्ण बुद्धिजीवियो और अवर्ण बुद्धिजीवियो के बीच एक समझौता करा दिया। यह गुप्त समझौता ही जातीय आरक्षण नाम से विख्यात है।

हर सवर्ण से लेकर अवर्ण बुद्धिजीवी श्रम शोषण के उद्देश्य से किये गये इस समझौते के लिये अम्बेडकर जी की प्रशंसा करता है क्योकि अम्बेडकर जी नही होते तो श्रम और बुद्धि के बीच इतना फर्क नही रहता । ग्रामीण उद्योग धंधे खतम नही होते। श्रम की मांग और मूल्य बढता । निन्यान्नवे प्रतिशत श्रमजीवी अवर्णो को लाभ होता और दो तीन प्रतिशत अवर्ण सवर्ण अम्बेडकर जी की आलोचना करते । आज श्रम का मूल्य एक सौ अस्सी से अधिकतम तीन सौ पचास रूपये प्रतिदिन है तो एक चपरासी से लेकर प्रायमरी स्कूल का मास्टर आधी मेहनत करके भी हजार से पंद्रह सौ रूपये तक प्राप्त करता है। कुछ अवर्ण नेता बनकर जो आनंद कर रहे है वह आनंद सिर्फ अम्बेडकर जी की ही कृपा का परिणाम है अन्यथा संभव है कि श्रम और बुद्धि के बीच इतना अमानवीय फर्क नही होता और इनका वेतन भी हजार पंद्रह सौ की तुलना मे आधे से भी कम ही होता।

आरक्षण के समर्थन विरोध की लडाई बुद्धि और श्रम के बीच बेमेल समीकरण की नही है। लडाई तो लूट के माल के बंटवारे की है। श्रम शोषण से प्राप्त साशत अवर्ण उस हिस्सेदारी को छोडने को तैयार नही है। मैने पूरे भारत मे एक भी बुद्धिजीवी नही देखा जो श्रम और बुद्धि के बीच की दूरी घटाने की बात करता हो। कई बुद्धिजीवी तो नौकरी के घमंड मे पकौडा बेचने को नीच काम तक कहने लगते है और श्रमजीवियो का अपमान करने मे सवर्ण अवर्ण का कोई भेद नही करते।

आरक्षण के पक्ष विपक्ष मे टकराव को खतम करने का सिर्फ एक ही आधार है कि सरकारी नौकरी और प्रायवेट वेतन की असमानता खतम कर दीजिये। नौकरी को या तो बाजार मूल्य आधारित कर दे या टेंडर शुरू कर दे। सारी मारामारी खतम । अम्बेडकर की पूजा बंद। आरक्षण के पक्ष विपक्ष की लडाई बंद। न रहेगा लूट का माल न बंटवारे का झगडा।

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