सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 16, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

निर्भया कांड के समय संभवतः मै भारत का अकेला व्यक्ति था जिसने बलात्कार के लिये कडे कानून को और कडा करने का खुला विरोध किया था। यहां तक कि मैने जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशो को भी घातक माना था। मैने स्पष्ट लिखा था कि यदि इस प्रकार कानून कडे किये गये तो भारत मे बलात्कार तो बढेंगे ही साथ साथ हत्याओ की भी बाढ आ जायेगी। आप दिसम्बर 2013 के ज्ञानतत्व 260 और 262 के लेख पढ सकते है। उसके बाद भी मैने कई बार इस संबंध मे लिखा । दबे छुपे मुलायम सिंह और शरद यादव भी इस मत के थे किन्तु नेतागिरी के कारण बोल नही सकते थे। पांच वर्ष बाद परिणाम वही हुए। बलात्कार तो बढे ही जिनके लिये यह कहा जा सकता है कि उस समय अनेक घटनाएं प्रकाश मे नही आती होगी किन्तु बलात्कार के साथ हत्याओ की बाढ का एकमात्र कारण निर्भया कांड के बाद बनाये गये कठोर कानून के अतिरिक्त कुछ और नही। तंत्र अपनी भूल न सुधार कर कानून अधिक कठोर करेगा और उसी अनुपात मे बलात्कार एंव हत्याओ का विस्तार होता रहेगा।
प्राचीन समय मे गंभीर बलात्कार को छोडकर साधारण छेडछाड की घटनाए प्रकाश मे नही आती थी। अधिकांश सामाजिक स्तर से निपटती थी। अब उसके ठीक विपरीत ऐसी घटनाओ को बढा चढाकर प्रचारित करना एक फैशन बनता जा रहा है। कितनी विचित्र हालत है कि उन्नाव के एक ऐसे अपराधी दादा जिनसे सारा इलाका डरता था उन पर अंकुश के सारे प्रयत्न असफल होने के बाद अन्त मे बलात्कार के एक अस्पष्ट आरोप का सहारा लेना पड रहा है। बलात्कार की यह घटना बिल्कुल विलक्षण नही। आम तौर पर ऐसे रसूखदार लोग अपने आस पास की लडकियो के साथ ऐसे अनुचित संबंध बनाते रहे है। इस लडकी ने हिम्मत करके रिपोर्ट की तो रिपोर्ट दबा दी गई। विधायक ने लडकी के माता पिता को समझाने और दबाने का प्रयास किया तब भी परिवार नही दबा। विधायक के भाई ने अपने पूर्व स्वभाव के अनुसार लडकी के पिता को इतना पीटा की पिता मर गया । मै नही मानता कि इस घटना मे महिलाओ पर अत्याचार की कोई विशेष घटना है।
कठुआ की घटना कुछ विशेष स्थान रखती है । मुझे स्वयं समझ मे नही आया कि संभावित घटना क्रम क्या हो सकता है। मैने कई गंभीर लोगो से संभावनाओ की चर्चा की, किन्तु सब मेरे समान ही भ्रम मे मिले । हम सब मानते रहे कि घटना जैसी प्रचारित है वैसी असंभव है किन्तु यदि भिन्न भी है तो क्या हो सकती है यह किसी के समझ मे नही आया। साफ स्थिति तो कुछ दिन बाद ही पता चलेगी किन्तु एक धुंधली तस्वीर स्पष्ट हो रही है कि एक हिन्दू नाबालिग ने एक मुस्लिम आठ वर्ष की छोटी बच्ची का अपहरण करके बलात्कार किया। लडकी चिल्लाना चाहती थी तो उसे नशा देकर चुप किया गया। लडकी द्वारा विरोध के कारण उसे रोक कर रखा गया। लडके का चचेरा भाई आता है तो वह भी लडकी से बलात्कार करता है। घटना के सामने आने के डर से उसे मंदिर मे छिपाया जाता है जहां उसके साथ अन्य लोग भी बलात्कार करते है। लडके के पिता घटना को छिपाने के लिये पुलिस वालो को पैसा देता है । पुलिस वालो मे से भी कुछ लोग बलात्कार करते है। लडकी चुप रहने को तैयार नही और बात सामने आना बहुत खतरनाक है इसलिये लडकी की हत्या का मार्ग चुना गया। हत्या के बाद पुलिस जांच शुरू होती है। जिसमे कोइ्र ईमानदार पुलिस वाला बिना प्रभावित हुए जांच करता है। मामले मे एक नाबालिग की गिरफतारी के बाद मुसलमानाो की ओर से जुलुस और नारे लगते है। लडके के जिस पिता ने बेटे को बचाने का प्रयास किया वह हिन्दू संगठनो से जुडा होगा । हिन्दू संगठनो ने उसके पक्ष मे जुलुस निकाला। वकीलो ने भी उसके पक्ष मे प्रभाव डाला । पूरा मामला एक स्वाभाविक घटना का विस्तार है। कही महिला उत्पीडन नही है, कही हिन्दू मुस्लिम का भाव नही है। समाज के अतिवादी हिन्दू मुस्लिम संगठन बिना सच्चाई जाने ऐसे आंदोलनो के लिये रात दिन तैयार मिलते है। फिर भी कठुआ मामले की जिस तरह आम हिन्दुओ ने एक स्वर से निन्दा की वह आम हिन्दू और आम मुसलमान के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खीच देती है। ऐसे ऐसे संवेदन शील मामलो मे भी देखा जाता है कि आम मुसलमान या तो चुप रहता है या किन्तु परन्तु लगाकर बोलता है जबकि आम हिन्दू ने इस घटना की एक स्वर से बिना किन्तु परन्तु के निंदा की।
उन्नाव का सच तो स्पष्ट है किन्तु कठुआ का सच आगे पता चलेगा। मेरा उद्देश्य भी किसी घटना विशेष की चर्चा मे न जाकर बढते बलात्कारो तक सीमित रहना है। मेरे विचार मे राजनेताओ द्वारा बनाये गये अप्राकृतिक अस्वाभाविक कानून ही बलात्कार और हत्याओ की बाढ के प्रमुख कारण है । जिन लोगो को समाज शास्त्र का रत्ती भर ज्ञान नही वे ऐसे ऐसे विषयो पर वर्ग विद्वेष बढाने की बुरी नीयत से कानून की समीक्षा करेंगे तो परिणाम ऐसे आने ही है। यदि दंडित करना ही आवश्यक हो तो पहले ऐेसे ऐसे अव्यावहारिक कानून बनाने वालो को सामाजिक दंड की शुरूआत करनी चाहिये जिनकी नीयत भी गलत है और नीतियां भी। अभी तो इक्का दुक्का नाबालिग शिकार हो रही है भविष्य मे कही ये घटनाए आम न हो जावे । यदि कानून को और अधिक कठोर किया गया तो तीन परिणाम संभावित है -1 बडी संख्या मे निर्दोष लडकियों की हत्या हो जायेगी । 2 बडी संख्या मे भावना प्रधान लडके फांसी चढ जायेंगे । 3 बडी संख्या मे धूर्त महिलाएं शरीफ लोगो को ब्लैकमेल करने लगेंगी।

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